श्रीगणेशाय नमः।

Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 61–70

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड ६७ –बन्धलक्षणा ' शुक्रविभूति ' ६८ – गतिलक्षणा ' प्राणविभूति ' ६६ -– साधनलक्षणा ' ज्ञान - कर्मेद्रियविभूति ' ७० — सर्वव्याप्तिलक्षणा पूर्णेन्द्र विभूति ' ७१ – सत्य संकल्पत्त्वविभूति ७७ – पारयात्री भोक्तात्मा ७८ - जीवात्मविभूति प्रदर्शन ७६ – षडवस्था स्वरूप परिचय ८०- अविध्या स्वरूप ८१ - बन्ध स्वरूप ८२ - कर्म्मविपाक स्वरूप प्रस्तावना ७२ — एकरसत्त्वविभूति ७३ --- एकावस्यत्त्वविभूति ७४ – विश्वब्यापकत्त्व - सृष्टत्वविभूति ७६ —– पाप्माऽससृष्टत्वविभूति ८३ – प्राशय - स्वरूप ८४—– ग्रपुर्णत्व - स्वरूप ७५ – सर्वसाक्षित्त्व, वशित्व, कर्म्माध्यक्षत्व - विभूति ८५ – संसार ( गमनागमन ) स्वरूप प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि पञ्चात्म विज्ञानोपनिषदात्मिका- ' प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् ' पष्ठी समाप्तश्चायमात्मविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्धविज्ञानान्तर्गतः प्रथमः खण्डः २ – पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ( द्वितीखण्ड ) -एतन्नामक द्वितीय खण्ड में वैज्ञानिक दृष्टि से ' पितृ ' तत्त्व का विश्लेषरण हुआ हैं । ' आत्मविज्ञानो-पनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड में जिन गाठ ग्रात्मस्वरूपों का विवेचन हुआ है, उनमें से ' महानातात्मविज्ञानो-निषत् ' नामक अवान्तर प्रकरण में प्रतिपादित ' महानात्मा ' ही पिण्डदानादिलक्षरण पार्वणादिश्राद्धकर्म्म प्रतिष्ठा है । सौम्यशुक्राधारेग प्रतिष्ठित महानात्मा में चतुरशीतिकल पितृप्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । इसी पितृप्राणसमप्टि की तृप्ति के लिए श्राद्धकर्म विहित है । ' अध्यात्म - अधिभूत अधिदैवत - भेद से त्रिसंस्थ बने हुए पितृप्रारण का मौलिक स्वरूप क्या है? ' – नान्दीमुख- पार्वरण - श्रश्रमुख नामक पितरों का क्या स्वरूप है? ' – ' प्रग्निषत् सोमसत् - बहिषत् - नामक अन्नात्मक पितर, प्राज्यपा सोमपा - हविर्भुक्नामक श्रनादात्मक पितर, सुकाली - नामक अनुभय पितर अपना कैसा स्वरूप रखते हुए कहां प्रतिष्ठित रहते हैं? ' क्या करते हैं? ' - ' वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा शरत् - हेमन्त शिशिर भेदभिन्न ऋतुपितरों का कश स्वरूप है? ' क्यों उन्हें ' ऋतु पितर ' कहा गया? ' - ' पितृप्रारण की मूलप्रतिष्ठारूप, श्रतएव - ' पितृरणां पितरः ' नाम से प्रसिद्ध पितृदेवताओं का क्या स्वरूप है ' इत्यादि प्रश्नों के वैज्ञानिक समाधान अतिरिक्त प्रारम्भ में ही प्रस्तुत प्रकरण ( २ खण्ड ) में उन श्रौतस्मार्त- प्रमाणों का भी संग्रह हुग्रा है, जो विस्पष्ट भाषा में ' मृतपितृ श्राद्धकर्म्म ' का समर्थन कर रहे हैं । श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ' पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ' नामक इस द्वितीयखण्ड में निम्नलिखित पाँच प्रवान्तर प्रकरणों तथा परिच्छेदों का समावेश हुआ है— [ ५२ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड २ - पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि - ( द्वितीयखण्डात्मिकायाम् ) १- प्रमाणोपनिषत् २- पितृदेवतास्वरूप विज्ञानोपनिषत् ३- दिव्य पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ४ - ऋतु पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ५- प्रेत पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् २ - श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ' पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ' नामक द्वितीयखण्ड– पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषद - ( द्वितीयखण्डात्मिकायाम् ) -१ - ' प्रमाणोपनिषत् ' -प्रथमा ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - प्रजा की शास्त्रनिष्ठा २ - ' प्रमाण ' शब्द मीमांसा ३ – शाब्दी दृष्टि, युक्ति, ४ - स्वतः परतः प्रामाण्यवाद ५ – प्रत्यक्षप्रमाण के दो विवर्त्त ६- शब्दप्रामाण्यवाद ७ – प्रमाणचतुष्टयी : " ८ – वृद्धव्यवहार की प्रामाणिकता ६ – श्राद्धकर्मानुगत प्रामाण्यवाद १० - वेदसंहितोक्त प्रामाण्यवाद ११ – ब्राह्मणभागोक्त प्रामाण्यवाद १२ - शास्त्रीय प्रश्नमीमांसा प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि - ' प्रमाणोपनिषत् ' प्रथमा पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषदि -२ - ' पितृदेवतास्वरूपविज्ञानोपनिषत्'- द्वितीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - अमृतात्मब्रह्म का सिंहावलोकन ३ - लेखात्मिका पुरविभूति २ – सृष्टिविवर्त्त समतुलन ४ – त्रयीब्रह्म का वैभव [ ५३ ] प्रस्तावना

पृष्ठ 63

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं ५ – ब्रह्म की ' स्वात् ' विभूति ६ – पितृप्राणप्रतिष्ठात्मकतत्त्व ७ - पितृलक्षण पवित्रसोम ८ - भृगुद्वारा विजातीयप्रारणाप्रवृत्ति E —प्रङ्गिरा के ३३ विवर्त्त १० – दाम्पत्यभावमूलक विराट्पुरुष ११ – अमृत, सत्य, यज्ञ - त्रयीमीमांसा १२ – संस्कार्य्यं विश्वविवर्त्त १३ – ऋषि - पितृ - देव प्राणत्रयी १४ – ब्राह्म जगत् १५ – प्राकृतिकपितृप्राणमीमांसा १६ – पर, मध्यम, अवर पितृत्रयी १७ – त्रिविश्वपितृप्राण की मूलप्रकृति १८ - की ऋत - सत्य - सृष्टि १ ९ – सत्तास्वरूपपरिचय २० विष्टतिस्वरूपपरिचय २१ – धृतिस्वरूपपरिचय २२ – ग्रात्मसत्यस्वरूपपरिचय २३ – नाभि, प्रधि, भावद्वयी २४ – सर्वप्रतिष्ठातत्त्व २५ – सर्वाग्रज सत्यतत्त्व २६ – अग्नित्रयी मीमांसा २७ – सोमत्रयीमीमांसा २८ – यमस्वरूपपरिचय २६ – अग्नि- सोम की अभिन्नता ३० - श्रङ्गिरा - भृगु - यम- का पितृत्त्व ३१ – तत्त्वाभिव्यक्ति ३२ - तत्त्वद्वयी की व्यापकता ३३ – अग्निविभूतिप्रदर्शन ३४ - वायुविभूतिप्रदर्शन ३५ - प्रादित्यविभूतिप्रदर्शन ३६ – मनु, यम, मृत्युविभूतिप्रदर्शन ३७ – दशविध सोमविभूतिप्रदर्शन प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि - ' पितृदेवतास्वरूपविज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया _स्वरूप विज्ञानोपनिषदि ३ - ' दिव्य पितृस्वरूप विज्ञानोपनिषत् ' तृतीया ( तत्र विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - दिव्य पितृस्वरूपविज्ञानोपक्रम २ - सौम्यासः पितरः ३ – प्रङ्गिरसः पितरः ४ – सुस्वधाः पितरः ५ - सप्त दिव्याः पितरः ६ - आत्मब्रह्म की सप्तपुरुषता ७ - विरोधाभास, एवं तन्निराकरण प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि - " दि ० पि ० विज्ञानोपनिषत् " तृतीया [ ५४ ] प्रस्तावना

पृष्ठ 64

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि -४ - ' ऋतु पितृस्वरूपविज्ञोपनिषत् ' चतुर्थी ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – ऋतुपितृस्वरूपजिज्ञासा २ – दिग्विभागप्रदर्शन ३ – ऋतु, और ऋत्विक् ४ - दशविध अग्निविवर्त्त ५ - त्रिंशद्विध सोमविवर्त्त ६ - प्रयोजिका धर्मत्रयी ७— ऋतुसर्गमीमांसा ८ — ऋतुसम्बन्धी राशिचक्र ६ - यज्ञानुगतपञ्चर्त्तुविज्ञान १० – षड्ऋतुस्वरूप विज्ञान ११ – उद्ग्राभ, निग्राभ, तारतम्य १२ ऋतुकालानुगत प्रजाविवर्त्त १३ – ऋतु पितृ स्वरूपपरिचय १४ - ऋतु पितरों की सप्तपुरुषता प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि ' ऋतु पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ' चतुर्थी पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि -५- ' प्रेतपितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् पञ्चमी ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - लोकानुगत पितृस्वरूपपरिचय २ - प्राधिकारिक, काम्मिक, पितृषट्क ३ – सौम्य पितृस्वरूपपरिचय ४ – ' प्रायन्तु नः पितरः ' ५ – प्रजोत्पादक पितर ६ – त्रैगुण्यभावानुगत पितर ७- नान्दीमुख पितृस्वरूपमीमांसा ८ - पार्वण पितृस्वरूपमीमांसा ६ - प्रमुख पितृस्वरूपमीमांसा १० - प्रेतपितृस्वरूपपरिचय प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदि - प्रेतपितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् ' पञ्चमी समाप्तश्चायं पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्ध विज्ञानन्तर्गतो द्वितीयः खण्डः [ ५५ ] प्रस्तावना

पृष्ठ 65

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं ३ - सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ( तृतीयखण्ड ) – प्रस्तावना एतन्नामक तृतीयखण्ड में महानात्मा से सम्बन्ध रखने वाले, बीजीपुरुष से प्रारम्भ कर उसकी सप्तम सन्तति पर्य्यन्त वितत होने वाले साप्तपौरुप सापिण्ड्यभाव का ही वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है । सप्त पुरुष पर्यन्त वितत प्रजातन्तु का क्या स्वरूप है? ' - पुत्रोत्पादन, पार्वरणादिश्राद्ध, गया श्राद्धादि से श्राद्धकर्त्ता पितृऋरण से कैसे विमुक्त हो जाता है? ' ' गोत्रसापिण्ड्य, विवाहसा पिण्ड्य, दायदसा पिण्ड्य, श्रादि सापिण्ड्यभावों की मूलप्रतिष्ठा क्या है? " पितृऋण का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? - प्रजातन्तुप्रवर्तक पितृप्रारणात्मक सहः पिण्डों का क्या स्वरूप है? ' – ' सप्तम पुरुष के अनन्तर सपिण्डता क्यों निवृत्त हो जाती है? ' – ' गोत्र का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? ' - समानगोत्रों में विवाह सम्बन्ध क्यों निषिद्ध माना गया है? ' - पिण्डभाजः - लेपभाज: - प्रेतपितरों का क्या स्वरूप है? ' – ' प्रेत पितृनिमित्त प्रदत्त पिण्ड, एवं गोदानादि, विदूरस्थ प्रेतपितरों के समीप कैसे पहुंच जाते हैं? ' – ' प्रधाशोच - सूतकाशौच - शावाशौच-श्रादि प्राशौचों का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? ' -- सम्पूर्ण वंशजो में प्राशौच सम्बन्ध कैसे संक्रान्त हो जाता है? — इत्यादि प्रश्नों के वैज्ञानिक समाधान का विश्लेषण करने वाले प्रस्तुत तृतीय खण्ड में निम्नलिखित श्रदान्तर प्रकरणों तथा परिच्छेदों का समावेश हुआ है— ३ - सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि - ( तृतीयखण्डात्मिकायाम् ) -१ – प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् २ - ऋणमोचनोपायविज्ञानोपनिषत् ३ - प्राशौचविज्ञानोपनिषत् ३ - श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ' सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्ड — सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषदि - ( तृतीयखण्डात्मिकायाम् ) १ - ' प्रजातन्तुवितानविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमा १ - विषयोपक्रम ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) २ - महानात्मानुगत पितृत्त्व ३ – प्रजातन्तुप्रतिष्ठालक्षरण महानात्मा ४ – भूतसम्परिष्वक्त महानात्मा ५ - महानात्मा का ग्राविर्भावक ६ – ग्रोपपातिक कर्मात्मा ७ – ' रेतो ' मय कर्मात्मा – इरा ' रसमय कम्र्मात्मा ६ - प्रपदप्रतिष्ठ कम्मरमा १० - ' करारविन्देन पदारविन्दम् ' [ ५६ ]

पृष्ठ 66

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना ११ - कर्मात्मा के तीन जन्म २२ – सहः १२ – रेत योनि, रेतोधा, कादि चार पिण्ड २३ – सहभाग का पितृप्रारणात्मकत्त्व १३ – कौषीतकि का विचक्षरण ' तत्त्व २४ - शुक्रक्षयमीमांसा १४ — ' सम्वत्सरस्य प्रतिष्ठा ' १५ – ' मासि मासि वोऽशनम् ' १६ – दधि, घृत, मधु - लक्षण कम्र्मात्मा १७ - आत्मविवर्त्त सम्परिष्वक्ति १८ – चन्द्रलोकानुगत महानात्मा १६ – गमनस्थिति विश्लेषण २० – गोत्रसृष्टिमीमांसा २१ – पितृस हः स्वरूपविज्ञान २५ – प्रपत्य - पत्य- पुरुष मीमांसा २६ – पितृसोमयज्ञद्वारा ऋणप्रवृत्ति २७ – पितृधनावापमीमांसा २८ - श्रावापपिण्ड, बीजपिण्ड मीमांसा २६ – निवाप, पितृ, तन्य, पिण्डत्रयी ३० - प्रात्मधन, आत्मऋरण, स्वरूपमीमांसा ३१ – तन्तु वितानसम्बन्धी प्रमाणवाद ३२ – महर्षि ' बृहदुक्थ ' का प्रजातन्तुवितान - विज्ञान प्रकरणोपसहार समाप्ता चेमं सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि - ' प्रजातन्तु विज्ञानोपनिषत् ' प्रथमा सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि -२ - ' ऋणमोचनोपायविज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – पञ्चविध ऋणस्वरूपविज्ञान १० - श्राद्धकर्मानुगत श्रानृष्य विज्ञान ( ३ ) २- प्रजोत्पादनानुगत श्रानृष्य विज्ञान ( १ ) ११ – तन्तुलक्षण श्राद्धकर्त्ता का स्वरूपपरिचय ३ - मात्रानुगत ऋणतत्त्ववितान ४ – ' ऋणमस्मिन् संनमयति ' ५ – द्वादशविध पुत्रस्वरूपपरिचय ६ – प्रजोत्पादनादेश ७ – पुत्रमाहात्म्य प्रदर्शक वैदिक आख्यान १२ – देवयज्ञस्वरूपमीमासा १३ – ' श्रद्धा ' का तात्त्विकस्वरूपविज्ञान १४ – श्रद्धामय ' श्रद्धासूत्र ' १५ – श्रद्धा सूत्रानुगत ' श्राद्धकर्म्म ' १६ – श्रद्धातारतम्य से श्रद्धासूत्र में तारतम्य ८- सापिण्डीकररणानुगत श्रानृण्य विज्ञान ( २ ) १७ - प्राकृतिक हेतु से श्रद्धासूत्र का उपचयापचय E - पितृतन्तु का ताना, वाना, १८ – श्रमावास्या, और पूर्णिमा [ ५७ ]

पृष्ठ 67

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना १६ – अमावास्यानुगत श्राद्धकर्म्म २० – सन्ततिनिरोधक पितृदोष ( १६ ) २८ - श्राद्धानुगत ब्राह्मण भोजन मीमांसा २६ – गया श्राद्धानुगत प्रानृष्य विज्ञान ( ४ ) २१ – श्रोतास्थान द्वारा श्राद्धविज्ञान का स्पष्टीकरण ३० – खण्डात्मानों का यथास्थान विलयन २२ – प्राणविद्यामूलक श्राद्धकर्म्म २३ –श्राद्धकर्मानुगत श्रोतपरिभाषाविज्ञान २४ - श्राद्धोपकरणों की सोमात्मकता २५ -- प्रेतात्मतृप्ति प्रवर्त्तक श्राद्धकर्म्म २६ – श्राद्धकम्र्मभेदमीमांसा २७ - श्राद्धानुगत कालतत्त्वमीमांसा ३१ - गयाप्राणात्मक श्रागन्तुक महानात्मा ३२ — गयाप्राणात्मक आत्मा की क्लान्ति ३३ - मुग्धप्रेतपितरों की भोग्य सामग्री ३४ – पितृसम्पत्, और पितृतुष्टि ३५ – गया क्षेत्र का वैज्ञानिक स्वरूप ३६ – गया श्राद्धद्वारा प्रेततृप्ति प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयं - सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि - ' ऋण मोचनोपाय विज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया सपिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि -१ ३ – ' प्राशौचविज्ञानोपनिषत् - तृतीया ( तत्र विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) प्रशोचपात्रस्वरूपमीमांसा २ - प्राशौचस्वरूप मीमांसा ३ – प्रघाणीचस्वरूप मीमांसा ४ – प्राशोरात्रयीमीमासा ५ - स्पर्शास्पर्शमीमांसा ६ - कर्तव्याकर्तव्यमीमासा किमपि प्रास्ताविकम् ७ – प्राशौचनिमित्तमीमासा ( प्राशौचोपपत्तिः ) ८ – सम्बन्धसूत्र मीमांसा क - योनिकृत सम्बन्ध सूत्र समाप्ता ( १ ) विवाहसा पिण्ड्य ( २ ) दायसा पिण्ड्य ( ३ ) श्राशौचसा पिण्ड्य ( ४ ) पिण्डस्वरूपसिंहावलोकन व — विद्याकृतसम्बन्धसूत्र ग— यज्ञकृतसम्बन्धसूत्र घ — स सर्गकृतसम्बन्ध सूत्र प्रकरणोपसंहार सपिण्ड्य विज्ञानोपनिपदि प्राशौचविज्ञानोपनिषत् ' तृतीया समाप्तश्चायं सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्ध विज्ञानान्तर्गतः -तृतीयः खण्डः [ ५८ ]

पृष्ठ 68

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ४ - श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ( चतुर्थखण्ड ) – प्रस्तावना एतन्नामक चतुर्थ - खण्ड में कम्र्मात्मा से सम्बन्ध रखने वाली गति का ही वैज्ञानिक विश्लेषण हुआ है । " नित्य - क्रम - गतियों का क्या स्वरूप है? " - आत्मलोक कौन - कौन से हैं? " - " किन कर्मों से आत्मा किन लोकों में जाकर क्या - क्या फल भोगता है? " - " पन्था, कर्म, नाड़ी, आकाश, छन्द, आतिवाहिक, आदि आत्मगतिनिमित्तों का क्या स्वरूप है? " – " ब्रह्मपथ, देवपथ, पितृपथ, यमपथ, -आदि मार्ग कहां कहां व्यवस्थित हैं? " - " परामुक्ति, अपरामुक्ति, समवलय, क्षीणोदर्क, भूमोदकं, कैवल्य, सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य आदि उत्तम गतिभावों का क्या स्वरूप है? " - " कृष्ण मार्ग, शुक्लमार्ग, परोजामार्ग, प्रगतिमार्ग, यादि मार्ग अपना क्या स्वरूप रखते हैं? " - " ब्रह्मगति - प्रवर्त्तक ब्रह्माश्वत्थ, तथा कर्म्मगतिप्रवर्त्तक " कम्मश्वत्थ का वैज्ञानिक स्वरूप क्या है? " — इत्यादि प्रश्नों का वैज्ञानिक विवेचन करने वाले प्रस्तुत चतुर्थ ( अन्तिम ) खण्ड में निम्नलिखित एक प्रकरण तथा ८ परिच्छेदों का समावेश हुआ है: -४- भाद्धविज्ञानान्तर्गत- ' श्रात्मगति विज्ञानोपनिषत् ' नामक चतुर्थखण्ड-१ - श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमेव ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – गतिस्वरूपपरिचय सन्दर्भ सङ्गति २ - आत्मगतिविषयिणी प्रश्नपरम्परा ५ - गत्यारूढ़ प्रत्यगात्मा ६ - प्रात्मक्रान्ति के निमित्त ३ – आत्मगतिमूलक आत्मस्वरूपपरिचय ७ – ग्रात्मोत्क्रान्ति के परिचायक ४- प्रश्नपरम्परा का समाधान - श्रात्मगति के निमित्त क - पन्थानः घ — छन्दांसि * प्रतिवाहिकपरिशिष्ट: ख— कर्माणि ङ - देवताः छ - प्राकाशः ग – नाड्यः च - प्रतिवाहिकाः ज - लाकाः ( श्रात्मगतिस्थानानि ) ( १ ) नित्यगतिस्थानम् ( २ ) क्रमगतिस्थानम् ( ३ ) प्रागतिगतिस्थानम् समाप्ता चेयं चतुर्थखण्डात्मिका- ' श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमा समाप्तश्चायमात्मगतिविज्ञानोपनिषदात्मकः श्राद्धविज्ञानन्तर्गत ः— चतुथः खण्डः [ ५६ ] प्रकरणोपसंहार

पृष्ठ 69

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना प्रतिपाद्य विषयदिग्दर्शनानन्तर प्रतिपादन शैली, तथा भाषादृष्टि के सम्बन्ध में भी दो शब्द कह देना ग्रावश्यक प्रतीत होता है, एवं उस समय तो यह आवश्यकता और भी अधिक अपेक्षित हो जाती है, जबकि कई एक सम्माननीय महानुभावों के इस सम्बन्ध में प्रतिपादनशैली तथा भाषादृष्टि — अनेक प्रकार के सुझाव हमारे सम्मुख उपस्थित होते रहते हैं । ' हमारे प्रत्येक ग्रन्थ में एक ही विषय की अनेक बार पुनरावृत्ति रहती है । प्रतिपाद्य विषयों के अतिरिक्त समालोचनात्मक अनावश्यक विषयों का समावेश रहता है, जो उभयपक्ष में प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न कराते हैं । भाषा ठेठ ' पण्डिताऊ ' होती है, संस्कृत शब्द प्रचुरमात्रा से समाविष्ट रहते हैं । ग्रन्थ का आकार आवश्यकता से अधिक वृहत् होता है ' ये ही वे कतिपय सुझाव हैं, जिन के लिए हम उन नीर - क्षीर विवेकी महानुभावों के प्रति हृदय से कृतज्ञ हैं । मान्य बन्धुनों द्वारा उद्घाटित दोपों को स्वीकार करते हुए इस सम्बन्ध में हमारी ओर से यही निवेदन करना शेष रह जाता है कि, शताब्दियों से ही नहीं, अपितु सहस्त्राब्दियों से विलुप्त प्राप्त जिस ' प्रार्षविज्ञान ' को हमने जीवन का लक्ष्य बनाया है, उसके सम्बन्ध में प्रत्येक दशा में हमारा यह आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है कि, ग्रामर्य्यादा की रक्षा के नाते प्रतिपादनशैली, तथा भावादृष्टि, दोनों की मूल-प्रतिष्ठा शैली ही बनाई जाय । इन्द्रियातीतविषयप्रधान प्रार्थविज्ञान के स्पष्टीकरण के सम्बन्ध में महर्षियों ने एक ही विषय के पुनः पुनरावर्तन को सर्वथा उपादेय माना है । उदाहरण के लिए निम्नलिखित ब्राह्मण भाग ही पर्य्याप्त होगा । पाठक देखेंगें आरम्भ में ' अन्तर्यामी ' के सम्बन्ध में श्रुति ने जो विषय उद्धृत किया है, विषय समाप्ति पर्य्यन्त वही विषय बार - बार उद्धृत हुआ है १ - ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तर:, यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, स तमात्मान्तर्याम्यमृतः ' । २ - ' यो ऽप्सु तिष्ठन् अद्द्भ्योऽन्तरः, यमापो न विदुः यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयति, सतग्रात्मान्तर्याम्यमृतः: ' । ३- ' यो ऽग्नौ तिष्ठन् ० ' । ४ - य आकाशे तिष्ठन् ० ' । ५- ' यो वायौ तिष्ठन् ० ' । ६ - य श्रादित्ये तिष्ठन् ० ' । ७ - ' यश्चन्द्रतारके तिष्ठन् ० ' ८ – ' यो दिक्षु तिष्ठन् ० ' । ९ – ' यो विद्यति तिष्ठन् ० ' । १० -य स्तनयित्न तिष्ठन् ० ' । ११ - ' यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन् ० ' । १२ - ' यः सर्वेषु वेदेषु तिष्ठन् ० ' । १३ - यः सर्वेषु यज्ञेषु तिष्ठन् ० ' । १४ - यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ० ' । १५ – ‘ यः प्राणे तिष्ठन् ० ' । १६ - ' यो वाचि तिष्ठन् ० ' । १७ - ' यचक्षुषि तिष्ठन् ० ' । १८-' यः श्रोत्रे तिष्ठन् ० ' । १ ९ - ' यो मनसि तिष्ठन् ० ' । २० - यस्त्वचि तिष्ठन् ० ' [ ६० ]

पृष्ठ 70

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना २१- ' यस्तेजसि तिष्ठन् ० ' । २२ - ' यस्तमसि तिष्ठन् ० ' । २३ - ' यो तसि तिष्ठन् ० ' । २४ - ' य प्रात्मनि तिष्ठन् ० ' । - शत ० ब्रा ० १४।६।७ । यद्यपि इसका यह तात्पर्य नहीं कि, सर्वलोकोपकारक भाषा - ग्रन्थों में भी ठीक वैदिकशैली का अनुकरण करते हुए प्रत्येक विषय का पुनः पुनः आवर्तन किया जाय । तथापि प्रधान तथा स्वतन्त्रविषय निरूपण करते समय श्रवश्यमेव कुछ एक सामान्य परिभाषाओं का प्रतिपादन, तथा सिंहावलोकन करना आवश्यक हो जाता है । ऐसा न करने पर ग्रन्थ सर्वथा लक्ष्यहीन बना रह जाता है । हम तो समझते हैं, दृष्टिकोण भेद से प्रतिपादित ये परिभाषा - प्रकरण सर्वसाधारण के लिए विशेष हितकर ही होते हैं । हां, जिन महानुभावों का लक्ष्य एकमात्र मनोरञ्जन ही है, साथ ही अन्यान्य अर्थसाधक लौकिक कार्यो में अहोरात्र व्यस्त रहने के कारण जिन्हें बुद्धिगम्य, ग्रतएव ' यत्तदग्रे विषमिव ' न्याय से कटुवत् प्रतीयमान प्रार्षसहित्य - स्वाध्याय के लिए समय ही न मिलता हो, उनके लिए प्रवश्यमेव हमारा प्रयास व्यर्थ वन सकता है, जिस व्यर्थता को हम अपने लिए ' इष्टापत्ति ' मानते हैं । जो इस विषय के जिज्ञासु हैं, परमा-त्मानुग्रह से जिन्हें ऐसे साहित्य - स्वाध्याय की सुविधा प्राप्त है, साथ ही जन्मान्तरीय, किंवा ऐहिक संस्कारानुग्रह से जो ग्रार्पशैली से परिचित हैं, उनके लिए पुनरुक्तिमूला यह प्रार्षशैली कदापि उद्व ग का कारण नहीं बन सकती । दूसरे समालोचनात्मक सुझाव के सम्बन्ध में इसलिए विशेष वक्तव्य अनावश्यक है कि, सत्यास-त्यविवेक की दृष्टि से शिष्टभाषानुगत समालोचना - प्रसङ्ग ग्रन्थ का आवश्यक अङ्ग माना गया है । ' वादे वादे जायते तत्वबोधः ' न्याय से यत्र तत्र संक्षेप से निरूपित समालोचना - प्रसङ्ग परम्परया मूल विषय का समर्थन ही कर रहे हैं । यदि श्राद्ध - तत्त्व प्रतिपादनप्रसङ्ग में हम श्राद्ध की अवैदिकता सिद्ध करने वाले भावों का दिग्दर्शन करा देते हैं, तो इसमें कोई श्रापत्ति नहीं की जा सकती । अपना मन्तव्य, भले ही वह शास्त्र विरुद्ध ही क्यों न हो - स्वभावतः प्रेयः पदार्थ है । उसका उद्घाटन करना अवश्य ही तत्पक्षानु-यायी के लिए थोड़ी देर के लिए उद्वेगकर वन जाता है । परन्तु यही उद्वेग कालान्तर में उसे सत्यनिष्ठा भी बना देता है । तीसरे भापानुगत सुझाव के सम्बन्ध में हम क्या कहें, जब कि भाषाज्ञान से हम सर्वथा वश्वित है, और सम्भवतः अपने ग्रावश्यक वेदस्वाध्यायकर्म में विघ्न उपस्थित कर भाषा पाठशाला में प्रविष्ट होना भी हम अपने लिए असम्भव मानते हैं । वर्तमान युग में ' हिन्दी ' मातृभाषा है, तत्पुत्रत्वेन उसके क्रोड़ का ग्राश्रय ग्रहण करना स्वाभाविक है । पुत्र जिस वृत्ति से भी माता का श्राश्रय ग्रहण करे, माता स्वयं उसे संभाल लेती है । जहाँ तक हमारा विश्वास है, ग्रार्षदृष्टिकोण से जिस हिन्दी को भारतवर्ष की ( न कि हिन्दुस्तान की ) मातृभाषा कहना उचित है, उसका आश्रय हमें प्राप्त हुआ है । हमने प्रयास किया है कि, कलिवात्याहित झञ्झावातों से मातृभाषा के स्वरूप को यथासम्भव सुरक्षित रक्खा जाय । यदि समुद्रपार की विदेशी भाषाएँ हमारे ग्रन्तस्तल में स्थान पा सकती हैं, तो कोई कारण नहीं प्रजा [ ६१ ]