Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 71–80

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 71–80

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड - ** -[ ६२ ] प्रस्तावनः विधेय: -मोतीलाल शर्मा भारद्वाजः ( गौड़: ) थोड़े से प्रयास से अपनी चिरसंस्कारानुगता भुसंस्कृता मातृभाषा के अवबोध में सफलता प्राप्त न कर सके । ' प्रावसिक्ताः पितरश्च प्रीणिताः ' न्याय से हमारे ये निबन्ध प्रतिपाद्य विषयों के साथ साथ प्रार्षशैली, भाषा, आदि के भी परिचायक बनें, यही प्रधान - लक्ष्य है, एवं इस लक्ष्य के प्रति जितने भी साम-यिक सुझाव हैं, वे सब प्रागन्तुकधर्मलक्षण- पर धर्म्मम्थानीय बनते हुए न केवल भयावह ही हैं, अपितु स्वधर्म्म ( आर्षधर्म्म ) के स्वरूपविघातक भी हैं । फलतः - ' स्वधम्र्मे निधनं श्रेयः परधम्मों भयावहः ' न्याय से उक्त सुझाव हमारे लिए दूर से ही प्रणम्य हैं । सर्वान्त में प्रास्ताविक - वक्तव्य समाप्त करते हुए केवल यह कहना शेन रह जाता है कि, प्रस्तुत ' श्राद्ध विज्ञान ' ग्रन्थ ग्राज से लगभग ७ वर्ष पहिले ही सम्पन्न हो गया था । परन्तु कई एक सामयिक विप्रतिपत्तियों के कारण इसे प्रकाशित न किया जा सका । पितृदेवता के श्रद्धासूत्रानुगत अनुग्रह से चिरकालानन्तर यह वाङमय पिण्डपितृयज्ञ सम्पन्न होने जा रहा है । प्रस्तुत प्रस्तावनोपसंहार प्रस्तावना के साथ ' आत्मविज्ञानोपनिषत् प्रथमखण्ड ही सर्वप्रथम प्रकाशित हो रहा है | आर्षप्रजा का आवश्यक सहयोग ही जागे के तीन खण्डों के प्रकाशन का प्रवान निमित्त है, और प्रतीक्षामय दृढ़ विश्वास है कि, आर्यप्रजा अवश्य ही इस प्रधान निमित्त का शीघ्र स्वरूप सम्पादन करेगी । हम अपने इस प्रयास में कहाँ तक सफल हुए हैं? इसका निर्णय भार तो विचारशील पाठकों पर ही निर्भर है । हाँ, अपनी ओर से इस सम्बन्ध में यह बलपूर्वक कहा जा सकता है कि, अत्यावश्यक श्राद्धकर्म्म के सम्बन्ध में आज जो कुतर्कवाद प्रक्रान्त हैं, वेद को निमित्त बना कर घाम्मिक जगत् की श्रद्धा पर जो आघात किया जा रहा है श्रद्धालु जनता इस पर प्रत्यय के मोह जाल में बद्ध होकर जिस पिण्डदानादि - लक्षण श्राद्धकर्म से विमुख होती जा रही है, ये सब विप्रतिपत्तियाँ बहुत अंशों में इस निबन्ध से हट जायँगी । किसी पर आक्षेप न करते हुए वैदिक विज्ञानदृष्टि से, प्रधानतः श्रीतप्रमाणों का ग्राश्रम लेते हुए, साथ ही तर्क, तथा युक्तिवाद को भी लक्ष्य बनाते हुए ' श्राद्धविज्ञान ' सम्पन्न हुआ है । यद्यपि अनृतसंहित मनुष्य से भ्रान्ति हो जाना उसका स्वाभाविक धर्म है । परन्तु सद्भावना, अथवा कुभावना, उभयथा प्रदर्शित उस भ्रान्ति के संशोधन के लिए अन्तरात्मा सदा सन्नद्ध है ।

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30 अथ श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमखण्ड १ १ - प्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् -- प्रथमा २ – श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनित्-- द्वितीया ३ - - यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् -- तृतीया ४ - विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् - चतुर्थी ५ --- महदात्मविज्ञानोपनिषत् -- पञ्चमी ६ --- प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् -- षष्ठी - * -स्वयमेवात्मानमात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम! भूतभावन! भूतेश! देवदेव! जगत्पते! ॥१ ॥

मत्तः परतपं नान्यत किञ्चिदस्ति धनञ्जय! मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगरणा इव ॥ २ ॥

-- श्रीमद्भगवद्गीता १०-१५।७-७१ [ ६३

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रात्मविज्ञानोपनिषत् १ - आत्मस्वरूप परिचय: - ( स्वमूर्त्तिः सर्वात्मा )

कालः स्वभावो नियतिर्यच्च्छा भूतानि योनिः पुरुषेति चिन्त्वा ।

संयोग एषां नत्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ १ ॥

- श्वे ० उ ० १।२ ।

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्ति स्वगुणैनिगूढाम् ।

म ः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ २ ॥

- श्वे ० उ ० १।३ ।

तमेकमि त्रिवृतं षोडशान्तं शतार्द्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।

अष्टकैः षड्भिविश्वरूपैकपाशं त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥३ ॥

- श्वे ० उ ० १ | ४ |

पञ्चस्त्रोतोम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्धयादिमूलाम् ।

पञ्चावर्त्तं पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाषड्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥४ ॥

- श्वे ० उ ० ११५ ॥

सर्व्वाजीवे सर्व्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन् हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्र ।

पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्त्वमेति ॥५ ॥

- श्वे ० उ ० १।६ ।

य एको वर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान् निहितार्थो दधाति ।

वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ॥६ ॥

- श्वे ० उ ० १।७ ।

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।

दूरात्सुरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥७ ॥

मुण्डक ० उ ० ३।१।७ । [ ६४ ।

पृष्ठ 74

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ग्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत्

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा करणा वा ।

ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८ ॥

- मुण्डक ० उ ० ३ | १ | ८ |

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्रारणः पञ्चधा संविवेश ।

प्राणश्चित्तं सर्व्वमतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष श्रात्मा ॥९ ॥

- मुण्डक ० उ ० ३।१।६ । यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जायते तांश्च कामांस्तस्मात् —– ( १ ) – { " श्रात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः " ॥ — मुण्डक ० उ ० ३।१।१० । १ - श्रधिदैवतम् - महामायावच्छिन्न श्चिदात्मा ( पूर्णमदः ) २ - अध्यात्मम् – योगमायावच्छिन्न श्चि दंशः ( पूर्णमिदम् ) अथ श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ' आत्मविज्ञानोपनिषदि ' प्रथमायां " अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " प्रथमा अमृतात्मा - पुरुषात्मा - ' षोडशीप्रजापतिः ' १ - निष्कलः परात्परः ( १ ) २ – पञ्चकलोऽव्ययः [ ६५ ] ( ५ )

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड ३ – पञ्चकलोऽक्षरः अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ( ५ ) ४ – पञ्चकल प्रात्मक्षरः ( ५ ) सोऽयं चतुष्कलः, षोडशकलो वा पुरुषात्मा - षोडशी

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्वाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १ ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः ‘ परमात्मे ' त्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ' ईश्वरः ' ॥२ ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता १५ श्र ० ।१६,१७,। १ - अमृतात्मस्वरूपपरिचय: ( विद्या- कर्ममयो गूढोत्मा )

ग्रहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्व देवेभ्यो ' अमृतस्य ' नाम ।

यो मा ददाति स इ देव मावदहमन्नमन्नमदन्तमधि ॥१ ॥

हमिद्धि पितुः परि मेधा ' मृतस्य ' जग्रह ।

श्रहं सूर्य इवाजनि ॥२ ॥

– सामसं ० पू ० २।२ । – सामसं ० पू ० ६।३ ।

यस्मात् परं नापरमस्ति किचिद्यस्मान्नारणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।

वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं ' पुरुषेण ' सर्वम् ॥३ ॥

- श्वे ० उ ० ३३६

वेदाहमेत ' मजरं पुराणं ' सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्त्वात् ।

जन्म निरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥ ४ ॥

- श्वे ० उ ० ३।२१ । [ ६६ ]

पृष्ठ 76

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड

तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ' तदेवामृत ' मुच्यते ।

तस्यावयभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥९ ॥।

[ ६७ ] अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् —ऋक्सं ० ८।१८।२ ——कठोपनिषत् २।३।१ - श्वे ० उ ० ३।१६ - श्वे ० उ ० ३ | १६ | - श्वे ० उ ० ४।१० ।

एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः ।

एकैवोषाः सर्वमिदं विभाति ' एक ' वा इदं वि बभूव सर्वम् ॥५ ॥

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।

तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन एतद्वैतत् ॥६ ॥

सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥७ ॥

पाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।

स वेत्ति वेद्यं च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं ' पुरुष ' महान्तम् ॥८ ॥

मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु ' महेश्वरम् ' ।

पृष्ठ 77

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ॐ अमृतात्मब्रह्मरण नमः अमृतात्मा - षोडशीप्रजापतिः ' अमृतं ब्रह्म ' त्युपास्य

ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥

- ईशोपनिषत् * द्धकर्म की मूलप्रतिष्ठा ( शरीर से ) भिन्नात्मसत्तावाद ही माना गया है । " आत्मा श्रा * * पाचभौतिक मर्त्य शरीर से भिन्न तत्त्व है, अमृतलक्षण नित्य पदार्थ है । स्थूलशरीर परि-त्यागान्तर आत्मा अङ्ग ष्ठमात्र प्रतिवाहिक शरीर ( सूक्ष्मशरीर ) धारण कर श्रात्मस्वरूप जिज्ञासा - शुभाशुभ कर्मानुसार शुभाशुभ उदर्क ( फल ) भोगने के लिए शुभाशुभ लोकान्तरों में गमन करता है " इस सिद्धान्त की मान्यता के आधार पर ही श्राद्धकर्म्म प्रतिष्ठित है । निधनानन्तर परलोक गमन करते हुए, एवं चान्द्रसम्वत्सरानन्तर परलोक में पहुँचे हुए प्रेतात्मा को पिण्डदानादि से वृष्त करना ही सिद्धान्तपक्ष में ' श्राद्धकर्म ' है । इस सिद्धान्तपक्ष की रक्षा एकमात्र शरीर भिन्न नित्यन्त्रात्मसत्ता-स्वीकृति पर ही अवलम्बित है । आस्तिक शास्त्रों ( उपनिषदादि ) में उपर्वाणित आत्मस्वरूप सर्वसाधारण के लिए दुरधिगम्य है यही कारण है कि, आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में नाना प्रवाद पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं । एक ही ग्रात्मतत्त्व के उन सोपाधिक विविध रूपों के सम्यक् परिज्ञान के बिना श्राद्ध कर्माधिष्ठाता आत्मा का स्वरूपपरिचय प्राप्त कर लेना कठिन है । प्रतएव प्रतिपाद्य श्राद्ध - विज्ञान के प्रारम्भ में ही श्रात्मस्वरूपपरिचय विजिज्ञास्य बन जाता है, जिसका स्पष्टीकरण आवश्यक रूप से अपेक्षित है । विजिज्ञास्य आत्मतत्त्व के सम्बन्ध में चिरकाल से दार्शनिक विद्वानों में मतभेद चला आ रहा है । श्रात्मानुगत उन यच्चयावत् मतवादों को ' प्रास्तिक - नास्तिक - ' इन दो वादों में ग्रन्तर्भूत माना जा सकता * इस मन्त्र के राजनीति, धर्मनीति, विज्ञाननीति भेद से तीन अर्थ हुए हैं । देखिए - ' ईशोपनि षद्विज्ञानभाष्य ' १ खण्ड १ मन्त्रभाष्य । [ ६६ ]

पृष्ठ 78

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् है | शरीरातिरिक्त प्रात्मसत्ता स्वीकार करने वाला विद्वद्वर्ग ' ग्रास्तिक ' नास्तिकाभिमत श्रात्मस्वरूप - नाम से, तथा शरीरात्मवादी लौकायतिकवर्ग ' नास्तिक ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । दोनों ही मतवादपुरातन हैं ॥ * स्वयं ऋग्वेद संहिता में ' सद्वाद, असद्वाद ' नाम से दोनों का उपबृंहण हुआ है । ग्रस्तिलक्षण ' ब्रह्म ' तत्त्वोपासक विद्वद्वर्ग ' ब्राह्मण ' कहलाता है, नास्तिलक्षण ' श्रम ' ( कर्म्म ) तत्त्वोपासक लोकायतिकवर्ग ' श्रमरणक ' कहलाया है । ब्रह्मात्मक ' रस ' तत्त्वानुगामी ब्राह्मणवर्ग में, श्रमात्मक ' बल ' तत्त्वानुगामी श्रमणकवर्ग में सदा से प्रतिस्पर्द्धा चली ग्रा रही है । ब्राह्मणवर्ग ' सरोवर ' को दृष्टान्त मानता हुआ आत्मनित्यता का समर्थन कर रहा है, एवं श्रमणक वर्ग ' रथ ' को दृष्टान्त बनाता हुआ शरीर को ही आत्मा मान रहा है । दोनों मतवादों में से प्रथम ' श्रमणकवाद ' ( नास्तिकवाद ) का ही संक्षेप से दिग्दर्शन कराया जाता है । श्रात्मस्वरूप के सम्बन्ध में श्रमणों का यह कहना है कि, -- “ यातायातसाधनभूत ' रथ ' सर्वथा अनित्य, तथा जड़ पदार्थ है । ' धुरा, चक्र, कस्तम्भी, प्रउग, ईषा, आदि कतिपय परिगणित अवयवों की समष्टि ही रथ है । जब तक यह समष्टि बनी रहती, तभी तक ' रथ ' ( श्रवयवी ) स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है, गतिमान् बना रहता है । जिस दिन इसके धुरा चक्र यादि अवयव ग्रन्थिबन्धन से पृथक् हो जाते हैं, उसी क्षण रथ की स्वरूपविच्युति हो जाती है । रथरूप श्रवयवी चक्रादिरूप अवयवों से पृथक् तत्त्व नहीं है । अपितु जिस प्रकार अनेक वृक्षों की समष्टि ' वन ' है, अनेक प्राप्यकणों का समूह ' सरोवर ' है, अनेक क्रियायों का का कूट ' द्रव्य ' है, एवमेव धुर - चक्रादि अनेक अवयवों की समष्टि ही ' रथ ' रूप में परिणत हो रही है । जिस दिन अवयवों का ग्रन्थिबन्धन टूट जाता है, उसी दिन उसी काल में अवयवी का भी विनाश हो जाता है । प्रनेक अवयवों के समन्वय से जो ' रथ ' कहलाता था, अवयवों के श्लथ हो जाने पर, अथवा नष्ट हो जाने पर वह ' रथ ' नाम का पदार्थ लोकान्तर में नही जाता, अपितु अवयवों का नाश ही उस का विनाश है । यही अवस्था आत्मा की है । ' रस- प्रसृक्- मांस - मेद प्रस्थि मज्जा - शुक्र - ओज-त्वक् - चर्म्म ' - श्रादि अनेक अवयवों की समष्टि ही शरीर है । यही शरीर श्रात्मा है । यही अवयवी है । इन अवयवों के समन्वय से तात्कालिक अपूर्व क्रियाभाव उत्पन्न हो जाता है । जिस प्रकार यन्त्र के अवयव ( पुर्जे ) पृथक् पृथक् कर देने से यन्त्र की क्रियाशक्ति नष्ट हो जाती है, एवमेव शरीर के अवयवों के पृथक्-करण से क्रिया अवरुद्ध हो जाती है । ऐसी परिस्थिति में केवल क्रियाधर्म्म को देख कर आत्मा को शरीर से पृथक् माना, साथ ही में उस को नित्य मानना सर्वथा भ्रान्ति है । जिस प्रकार अवयवी रूप रथ परलोक में नहीं जाता, एवमेव शरीर के नष्ट हो जाने पर ग्रवयवी रूप ग्रात्मा का परलोकगमन मानना, साथ ही में उसे शरीर से पृथक् नित्य तत्त्व मानना सर्वथा प्रसङ्गत है " इस प्रकार नास्तिक लोग कई एक हेत्त्वा-भासों के आधार पर स्वतन्त्र ग्रात्मसत्ता का विरोध करते हुए ' रथवत् ' शरीर को ही आत्मा मान रहे हैं । * इन सदसद्वादादि पुरातन वादों का वैज्ञानिक विवेचन ' गीताभाष्यभूमिका ' २ खण्ड ' ख ' विभाग ' ब्रह्मकम्मं परीक्षा ' में देखना चाहिए । [ ७० ]

पृष्ठ 79

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् प्रास्तिक मतानुसार आत्मा शरीर से सर्वथा पृथक्, एवं नित्य तत्त्व है । एक सरोवर में पानी भरा हुआ है । चातुर्मास्य ( चौमासा ) समाप्त होने पर सरोवर का सारा पानी सूख जाता है । क्या सरोवर का पानी नष्ट हो गया? कदापि नहीं । दक्षिणाकाशस्थ जलशोषक श्रास्तिकाभिमत श्रात्मस्वरूप – ' अगस्यप्राण ' के सहयोग से " नाड्यो वायुसंयोगादारोहणम् " ( वं ० द ० ५।२।६ ) इस कणाद सिद्धान्त के अनुसार सूर्य्य ने नाड़ी रूप अपनी रश्मियों से सारे पानी को खींच कर उसे वाष्परूप ( वायुरूप ) में परिणत कर विशाल अन्तरिक्ष में वायुधरातल पर प्रतिष्ठित कर लिया है । वस जिस प्रकार सरोवर का पानी सूक्ष्मरूप में परिणत होकर लोकान्तर में चला जाता है, नष्ट नहीं होता, ठीक इसी प्रकार शरीर के नष्ट हो जाने पर यह जीवात्मा भी सूक्ष्मशरीर धारण कर लोकान्तर में चला जाता है । अपि च वाष्परूप में परिणत होकर लोकान्तर में जाने वाले वायुरूप पानी का जैसे हम चर्म्मचक्षुत्रों से प्रत्यक्ष नहीं कर सकते, साथ ही में वह कि प्रदेश प्रतिष्ठित हुआ, यह भी नहीं देख पाते, एवमेव शरीरसत्ताकाल में क्रियादि धर्मों से जिस आत्मा का हम एक प्रकार से प्रत्यक्ष कर रहे थे, शरीरत्यागानन्तर वही सूक्ष्मावस्थापन होता हुआ न शरीर से निकल कर शरीर से निकल कर लोकान्तर में जाता हुआ ही दिखाई देता, एवं न जिस लोक में वह जाकर प्रतिष्ठित होता है, वह लोक एवं स्वयंलोकी ग्रात्मा ही दिखलाई पड़ता । इस प्रकार ऐसे - ऐसे दृष्टान्तों द्वारा प्रास्तिक विद्वान् ' सरवत् ' प्रात्मा को शरीर से सर्वथा पृथक् एवं नित्य मान रहे हैं । प्रास्तिक विद्वान् केवल नित्य प्रात्मतत्त्व की ही सत्ता स्वीकार नहीं करते, अपितु अनित्यशरीर भी इनकी दृष्टि में एक तत्त्व है । इन परमवैज्ञानिकों का कहना है कि, संसार के प्रत्येक पदार्थ में हम प्रतिक्षण परिवर्तन देख रहे हैं । इस क्षणिक परिवर्तन के साथ - साथ एक श्रास्तिकों का तत्त्ववाद - परिवर्तनीय प्रक्षण नित्यभाव का भी साक्षात्कार कर रहे हैं । उदाहरण के लिए उत्पन्न शिशु को ही लीजिए । उत्पत्तिकाल से आरम्भ कर मृत्युकाल पर्यन्त इस शिशु की ' शिशु - पौगण्ड - बाल - किशोर - तरुण युवा - प्रौढ़ स्थविर - वृद्ध दशमी ' - ये १० अवस्थाएं होती हैं । इन दशों में से प्रत्येक अवस्था की प्रवान्तर अनेक ग्रवस्थाएं हो जाती हैं । इन अवस्थाओंों के परिवर्तन के साथ - साथ ' रसासृङ्मांसमेदादि ' शारीरधातु भी बदलते रहते हैं । आगे जाकर इस परिवर्तन का विश्राम क्षणिक भाव पर माना गया है । प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है । क्षण भी एक काल है, स्थिरभाव है । वस्तुतः उक्त परिवर्तन की इस क्षण भाव के साथ भी तुलना नहीं की जा सकती । वह परिवर्तन तो “ रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव " के अनुसार अपने जैसा आप ही है । यह सब कुछ होने पर भी व्यवहार - सौकर्य के लिए उक्त परिवर्तन को " क्षणिक " शब्द से व्यवहृत कर दिया गया है । इसी क्षणिक परिवर्तन के कारण प्रतिक्षण वस्तु नए - नए रूप धारण करती रहती है । वस्तु का जैसा स्वरूप पूर्वक्षण में रहता है, उत्तरक्षण में उस स्वरूप का सर्वथा अभाव है । यदि यह परिवर्तन क्षणिक न होता, तो एक प्रादेश का शिशु प्राप्तवयस्क होने पर कभी साढ़े तीन हाथ का न बनता, साथ ही में इस के शरीर में कभी विविध अवस्थाओं का उदय न होता । इन्हीं सब कारणों से हम शरीर को प्रतिक्षण परिवर्तनशील मानने के लिए तैय्यार हैं । [ ७१ ]

पृष्ठ 80

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् इस परिवर्तन के साथ - साथ ही एक अपरिवर्तनीय स्थिरभाव का भी साक्षात्कार हो रहा है । इस स्थिरभाव के लिए ' स एवायं ' ( यह वही है ) यह प्रत्यभिज्ञा होती है । देवदत्त जन्म काल में भी है, मृत्युकाल में भी है, मरे बाद भी है । तभी तो तीनों कालों के साथ सामान्यरूप से - देवदत्त उत्पन्न हुआ है, देवदत्त मरने वाला है, देवदत्त मर गया, इस प्रकार देवदत्त का सम्बन्ध पाया जाता है । शरीर बदलता है, आत्मोपलक्षित देवदत्त नहीं बदलता । प्रतिक्षण बदलते हुए भी शरीर के ' यह वही देवदत्त है, जिसे हमने बचपन में जयपुर में देखा था ' इस प्रकार ' वही ' भाव नहीं बदलता । इस प्रकार परस्पर में अत्यन्तविरुद्ध दो भावों का एक ही पदार्थ में समन्वय हो रहा है । परिवर्तनशील क्षणिक पदार्थ ' शरीर ' है, अपरिवर्तनीय प्रक्षण नित्यतत्त्व ' आत्मा ' है । दोनों का समन्वितरूप ही ' अध्यात्म- अधिदैवत - प्रधिभूत-सस्था है । ग्रपि च - क्रिया प्रतिक्षण परिवर्तनशीला है । परिवर्तनशीला इस क्रिया की स्थिति ( स्वरूप-सत्ता ) तब तक सर्वथा अनुपपन्न है, जब तक कि इस का कोई परिवर्तनीय स्थिर ग्राधार न मान लिया जाय । उधर क्षणमात्र ठहरनेवाली स्वयं क्रिया- क्रिया का प्राधार वन नहीं सकती । इस युक्तिवाद के आधार पर भी क्षणिक क्रिया के साथ नित्य तत्त्व का समन्वय मानना पड़ता है । उसी नित्य तत्त्व को श्राघार बना कर क्रियात्मक बलतत्त्व अपनी चिति ( समूह ) के कारण ' नाम रूप- कर्म्म ' भेद से तीन स्त्ररूपों में परिणत होकर ' सम्भूतिभाव ' को प्राप्त होता हुआ ' वस्तु ' नाम से व्यवहृत होता है । जब तक क्रियात्मक बल पर उस निष्क्रिय ग्रामरूप रस - तत्त्व का अनुग्रह रहता है, तभी तक चितिभावापन्न नामरूपकम्र्मात्मक उस बल की ' संभूति ' है । रसानुग्रह - परित्याग ही उस का विनाश है । संभूति और बिनाश, दोनों का एक ही स्थान पर समन्वय हो रहा है । इसी समन्वय विज्ञान को लक्ष्य में रख कर उपनिष च्छ ति कहती है-सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्व दोभयं सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ – ई ० उपनिषत्१-४ । शरीर अनेक बलो की समष्टि होने से ' काय ' ( निकाय - समूह ) नाम से प्रसिद्ध है । इन प्रनन्त वल का शासक प्रभु एक रस तत्त्व ( आत्मा ) है । ' वाक् प्राण चक्षुः श्रोत्र- मनो- बुद्धि- हस्त पाद- उपस्थ ' श्रादि सारे श्रवयव ' गुणाना च परार्थत्त्वादसम्बन्धः समत्त्वात् ' इस न्याय के अनुसार परस्पर में सर्वथा पृथक हैं । " तेपामिष्टानि विहितानि धामश: " ( ऋक सं ० १ १६४, १५ ) इस श्रीत सिद्धान्त के अनुसार सब के धाम ( स्थान ) एवं इष्ट ( विषय ) नियत हैं । इन भिन्नों में एक अभिन्न तत्त्व ( आत्मा ) सामान्य-रूप से व्याप्त हो रहा है । प्रांख देखती है, काम सुनते हैं, जिह्वा स्वाद लेती है, नाक सूंघता है, पैर * इस विषय का विशद विवेचन ' ईशोपनिषद् हिन्दी - विज्ञान - भाव्य ' के उक्त मन्त्रभाष्य में देखना चाहिए । [ ७२ ]