Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 81–90

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 81–90

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् चलते हैं, हाथ काम करते हैं, मन मनन करना है, बुद्धि विचार करती है । व्यवहार होता है - मैं देखता हूं, मैं सुनता हूं, मैं स्वाद ले रहा हूं, मैं सूंघता हूं, मैं चलता हूं, मैं काम कर रहा हूं, मैं मनन करता हूं, इत्यादि । इस प्रकार सर्वथा विभिन्न चक्षुः प्राणादि के साथ यह " मैं " ( आत्मा ) युक्त हो रहा है । इसी आधार पर इस “ मैं ” ( अहम् ) तत्त्व को, किंवा आत्मतत्त्व को शरीरावयवों से पृथक् मानना आवश्यक, एवं वास्तविक हो जाता है । प्रकारान्तर से यों समझिए कि, नास्तिकवर्ग ' प्रजातन्त्ररूपा संघशक्ति को प्रधान मानता है, एवं ग्रास्तिकवर्ग ' राजतन्त्र रूपा प्राजापत्यशक्ति ' को प्रधानता देते हुए संघशक्ति का स्वागत करता है । जिस दृष्टि से इन दोनों दलों ने ग्रात्मा के स्वरूप का विचार किया है, वही दृष्टि ' दर्शन ' नाम से प्रसिद्ध है । नास्तिकदर्शन, एवं आस्तिकदर्शन, दोनों ही ग्राचार्यभेद से निम्नलिखित रूप से ६-६ भागों में विभक्त माने गए हैं । नास्तिकदर्शन और उसके प्रवर्त्तक १ - चार्वाकदर्शन--२ - माध्यमिकदर्शन ---३ – योगाचारदर्शन-४ - सौत्रान्तिकदर्शन-५ - वैभाषिकदर्शन--६ - प्रार्हतदर्शन-बृहस्पति गोतमबुद्ध और उसके शिष्य प्रास्तिकदर्शन और उसके प्रवर्त्तक २ ३ - सांख्यदर्शन-१ - न्यायदर्शन-- गोतम -वैशेषिकदर्शन-- कणाद -कपिल ४ – कमीमांसा दर्शन-- जैमिनि ५ – ब्रह्ममीमांसादर्शन-व्यास श्रमणकाचार्य ७ -- योगदर्शन -- पतञ्जलि वस्तुतस्तु वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रात्मदर्शन नास्तिक, आस्तिक, भेद से कुल ६ भागों में ही विभक्त समझने चाहिएँ । तीन नास्तिक दर्शन हैं, एवं तीन ही आस्तिक दर्शन हैं । नास्तितत्त्व की मूलप्रतिष्ठा ' असद्बल ' है, अस्तितत्त्व की मूलभित्ति ' सद्रस ' है । रस ' अमृत ' है, वल ' मृत्यु ' है । अमृत - मृत्यु की समष्टि ही आत्मप्रपञ्च है । इसे ग्रस्तिरूप से भी देखा जा सकता है, एवं नास्तिकरूप से भी देखा जा सकता है । ' मनः - प्राण- वाक् ' ये तीन अमृतकलाएँ हैं, तीनों की समष्टि ही ' ग्रस्ति ' किंवा ' सत्ता ' है । ' नाम - रूप-कर्म्म, ये तीन मृत्युकलाएँ हैं । इन तीनों की समष्टि ही ' नास्ति ' है । सुतराँ आत्मदृष्टि, किंवा आत्म-दर्शन का संभूय ६ भागों में ही पर्यवसानसिद्ध हो जाता है । अपि च ईश्वर प्रजापति पूर्णेन्द्र होने से वत्तुलाकार ( गोलाकार ) है । अतएव इसे ' सर्वतः पाणि-पाद, सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ' कहा जाता है । गोलाकार वस्तु को ६ भागों में विभक्त करके ही सर्वात्मना देखा जा सकता है । इन दृष्टियों में तीन दृष्टियों का बलात्मक नास्तिभाग के साथ सम्बन्ध है, एवं तीन [ ७३ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ही दृष्टियों का रसात्मक अस्तिभाग के साथ सम्बन्ध है । इस दृष्टि से भी दर्शन कुल ६ ही होते हैं । अस्तु. कुछ भी हो, इस अप्राकृतिक दर्शन - प्रसङ्ग का उपबृंहण करना प्राकृतिक है । उक्त दर्शन चर्चा से प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि, ग्रात्मा के सम्बन्ध में भारतवर्ष में सदा से दो मतवाद चले प्रा रहे हैं । जो महानुभाव नास्तिकवाद के अनुयायी हैं, जिन्होंने शरीर को ही आत्मा समझ रक्खा है, जो -" भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः " के उपासक हैं, उनके लिए कुछ भी वक्तव्य नहीं है । श्रद्धेय उद-यनाचार्य के निम्नलिखित शब्दों में ऐसे दयनीय महानुभावों की कल्याण - कामना करते हुए, एवं आस्तिकवर्ग की ओर से जगदीश्वर से यामीयातना के निरोध की प्रार्थना करते हुए स्वान्तः सुखार्थ श्रात्म-प्रकरण आरम्भ किया जाता है । प्रास्तिकों के महाप्रतिनिधि सर्वश्री उदयनाचार्य अपने सुप्रसिद्ध ' न्याय-कुसुमाञ्जलि ' ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए लिखते हैं-इत्येवं श्रुति - नीति संप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते । येषां नास्पदमादधासि हृदये ते शैलसाराशयाः ॥

किन्तु प्रस्तुतविप्रतीपविधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः ।

काले कारुणिक! त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ॥ १ ॥

अस्माकं तु — अस्माकन्तु निसर्गसुन्दर! चिराच्चेतो निमग्नं त्वयी-त्यद्धाऽऽनन्दनिधे! तथापि तरलं नाद्यापि सन्तृप्यते ॥ तनाथ! त्वरितं विधेहि करुरणां येन त्वदेकाग्रतां-याते चेतसि नाप्नुवाम शतशो याम्याः पुनर्यातनाः ॥ २ ॥

- न्या ० कु ० ५ स्तबक १८ - १६ श्लोक । ईश्वरसत्ता पर विश्वास करने वाले, शरीर से पृथक् नित्य आत्मतत्त्व को स्वीकार करने वाले, वेदशास्त्र - सिद्ध आत्मा की प्रागति गति पर श्रद्धा करने वाले ब्रह्मवादी ब्राह्मणों के मतानुसार श्राद्धकर्म्म अवश्यमेव श्रद्धा की वस्तु है । ' ऋज्राश्व ' ऋषि के दौहित्र, ' जेन्दावस्था ' के रचयिता, पारसीधम्मं के प्रव-र्त्तक ' श्रीजरथुस्त्र ' भी आत्मसत्ता स्वीकार नहीं करते थे । श्रसुरधर्म को प्रधान मानते हुए वे ग्रारम्भ में शरीर को ही ग्रात्मा समझते थे । संयोगवश भूमण्डल की परिक्रमा करते हुए एक बार भगवान् ' बाद-[ ७४ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषद् रायण ( व्यास ) ' उधर जा निकले । जेन्दावस्ता में यह उल्लेख मिलता है कि " व्यास के आगमन से पहले ही वहाँ आकाशवाणी हुई कि हे जरथुस्त्र? हिन्दुस्तान मे एक महाबुद्धिमान् व्यास नाम का ब्राह्मण तुम से शास्त्रार्थ करने आ रहा है । " फलतः व्यास भगवान् वहाँ ( श्रार्यायण, वर्तमान में ईरान ) पहुंचते हैं, एवं अपने योगबल के द्वारा जरथुस्त्र को शरीर से अतिरिक्त आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करवाते हैं । तभी से जरथुस्त्र ने अपने धर्म्मग्रन्थ में यह ग्रादेश दिया है कि " वास्तव में श्रात्मा शरीर से पृथ पदार्थ है, एवं शरीर त्यागानन्तर वह स्वकर्मानुसार शुभाशुभ लोकों में गमन करता है । उसके निमित्त उसके पुत्रादि को अन्नदानादि करना चाहिए । " इस प्रकार वैदिक काल में भी कुछ एक महानुभाव आत्मसत्ता स्वीकार करने लगे थे । विगत शताब्दी में कई एक पाश्चात्य विद्वानों ने भी मुक्तकण्ठ से श्रात्मा का अमरत्त्व स्वीकार किया है । उनमें से स्वनामधन्य ' सुकरात, पाइथागोरस, प्लेटो, प्रसिद्ध जर्म्मन् विद्वान् ' शेंगल ' निरन्तर ' अनहलक ' ( अहं ब्रह्मास्मि ) का उद्घोष करने वाले दिव्यप्रेमी ' मन्सूर ' आदि कतिपय महानुभावों के नाम उल्लेखनीय हैं । आज तो ' मेस्मरेजम ' द्वारा मृतात्मा का आह्वान तक सफल सिद्ध हो चुका है । प्रागत ग्रात्मा जिज्ञासु के प्रश्नों का यथावत् समाधान करता है । स्वनामधन्य ' डी०-बी ० ऋषि ' की कृपा से हरिद्वार में हमें भी एक बार कुछ एक मृतात्मायों के संसर्ग का अवसर मिला है । यद्यपि साधारण मनुष्य इस रहस्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखते साथ ही में – ' अशक्तास्तत्पदं गन्तु ं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' के अनुसार प्रत्यक्षदृष्ट घटनाओं के सम्बन्ध में भी वे गजनिमीलिका किया करते हैं, परन्तु विचारशील मनुष्य शीघ्र ही आत्मसत्ता पर विश्वास करने लगते हैं । छान्दोग्य उपनिषत् में बड़ी युक्ति के साथ आत्मसत्ता सिद्ध की गई है । प्रसंगोपात्त उस ग्राख्यान को उद्यत कर देना भी अनुचित न होगा । भारतीय वैदिक सभ्यता के यादि प्रवर्तक भगवान् स्वयम्भू प्रजापति थे । जिसे आज ' एशिया माइनर ' कहा जाता है, वहीं पर प्रजापति निवास करते । देवत्रिलोकी में रहने वाले देवता ( मनुष्य-देवता ), एवं ग्रफीकादि प्रसुरत्रिलोकी में रहने वाले असुर, दोनों ही इन को स्वयम्भू प्रजापति का पितृतुल्य समझ कर इनका आदर करते थे, एवं इनका अनुशासन मानते थे । श्रात्मोपदेश- देवता, और असुर, दोनों ही परम्पराया यह सुनते आ रहे थे कि " जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान जाता है, वह सम्पूर्ण लोकों में यथेच्छ भ्रमण करता है, एवं उस ( आत्मज्ञानी ) की कोई कामना व्यर्थ नहीं जाती " । इसी प्रलोभन से देवता, और असुर, दोनों को ही ' अजर - अमर भय क्षुत्पिपासा रहित श्रात्मा के वास्तविक स्वरूप जानने * " वैव हिन्द वाजगश्ते । " " अकनू बिरहमने व्यास नाम, अज हिन्द आमद, वसदान के आकिल चुना नेस्त । ” ( जरथुस्त की ६५ वीं श्रायत । ) " चं व्यास हिन्दी बलख श्रामद | गस्तस्य जरतुस्तरा बखवद " ( १६ वीं प्रायत ) । 9 इस विषय का विशद ऐतिहासिक विवेचन ' शतपथ विज्ञानभाष्यान्तर्गत भुवनकोशविज्ञान ' में देखना चाहिए । [ ७५ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् की जिज्ञासा हुई । श्रात्मस्वरूप - सम्बन्धिनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए देवताओं की ओर से ' इन्द्र ', एवं असुरों की ओर से ' कायाधव विरोचन ' दोनों समित्पाणी बन कर स्वयम्भूप्रजापति की सेवा में पहुंचे । अभी दोनों ही प्रात्मोपदेश श्रवण के प्रयोग्य थे । फलतः प्रजापति ने दोनों को प्राज्ञा दी कि, तुम ( आत्मविशुद्धयर्थं ) पहिले ३२ वर्ष तक ब्रह्मचर्यव्रत पालन करो! ग्राज्ञानुसार योग्यता - सपादन करने के लिए दोनों ने ही ३२ वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्यव्रत का सम्यग्रूप से अनुष्ठान किया । ३२ वर्ष समाप्त हो जाने पर पुनः समित्पाणी बन कर दोनों प्रजापति के सम्मुख उपस्थित हुए । “ बोलो क्या चाहते हो? " प्रजापति के यह पूछने पर उत्तर में दोनों ने ही बड़े विनीतभाव से ' सत्यकाम -सत्यसंकल्प - जरामरणद्युत्-पिपासा - शोक - मोह आदि पाप्माओ से रहित श्रात्मस्वरूप की जिज्ञासा प्रकट की । श्रात्मा का साक्षात्कार करवाते हुए प्रजापति कहने लगे कि " हे इन्द्र, विरोचन! तुम अपनी दोनों प्रांखों में जो एक ( प्रतिबि-म्बित ) पुरुष देखते हो, वही आत्मा है " । हमारे सामने जब कोई मनुष्य खड़ा होता है, तो हमारी दोनों आँखों में उस का चित्र चित्रित हो जाता है । इसी की ओर प्रजापति का लक्ष्य था । जब प्रजापति पुरुष ( प्रतिबिम्बित पुरुष ) को श्रात्मा बतलाया, तो कुछ काल के अनन्तर दोनों प्रश्न करने लगे कि “ भगवान् । पानी में और कॉच में जो हम अपना प्रतिबिम्बित रूप देखते हैं, वह क्या है? " उत्तर में प्रजापति ने कहा कि " अरे! यह भी वही है, जो कि चक्षु में पुरुष बतलाया गया है । " आगे जाकर प्रजापति ने कहा कि " अच्छा ठहरो हम तुमको आत्मज्ञानं का और भी सरल उपाय बतलाते हैं । पानी से भरे हुए एक उदशराव ( मृत्पात्र ) में अपने आपको देखो । यदि करने मे ग्रात्मा का स्वरूप तुम्हारी समझ में ना जाय, तो अच्छा है, यदि नहीं तो फिर पूंछना " । आज्ञानुसार दोनो ने ऐसा ही किया । प्रजापति ने पूछा — ' क्या देखा ' उत्तर मिला – ' भगवन्! हमने पानी में अपने शरीर को ज्यों का त्यों प्रतिबिम्बित देखा ' । प्रजापति ने कहा कि " अब तुम सुन्दर मुपरिष्कृत वस्त्राभूषणों से सुसज्जित हो कर उदशराव की ओर देखो " । आज्ञानुसार दोनों ने ऐसा ही किया । प्रजापति के ' क्या देखा? यह प्रश्न करने पर उत्तर मिला कि ' भगवन्! वेशभूषा से सुपरिष्कृत अपने आप को उस पानी में हमने ज्यो का त्यों प्रतिबिम्वित देखा " । प्रजापति ने कहा " बस अब तुम ग्रात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान गए । जिसे तुमने पानी में देखा है, वही ग्रात्मा है " । दोनों की जिज्ञासा शान्त हुई । दोनों अभिवादन कर वापस लौट ग्राए । उन के लौट जाने पर प्रजापति ने विचार किया कि " दोनों ही ग्रात्मा के वास्तविक स्वरूप को बिना पहिचाने ही चले गए । दोनों में से जो इस शरीररूप ग्रात्मोपनिषत् पर विश्वास कर लेगा, निःसन्देह वह पराभव को प्राप्त होगा । अर्थात् हमारे कथनमात्र पर विश्वास कर जो शरीर को ही ग्रात्मा समझ बैठेगा, उस का पतन अवश्यंभावी है । " * प्राचीन समय में जिज्ञासु प्रादेश परिमित समिधा साथ में लेकर गुरू के सम्मुख खड़ा हो जाता था । इससे वह यही सूचित करता था कि मैं प्राप का शिष्य बनना चाहता हूं । यदि गुरू उसे योग्य समझते थे, तो उसके हाथ से समिधा ले लते थे, अन्यथा योग्यतासम्पादनानुकूल उपाय बतला देते थे । प्रादेशमित समिधा क्यों हाथ में ली जाती है? इस विषय का वैज्ञानिक रहस्य ' उपनिषद्विज्ञानभाष्य-भूमिका " प्रथम खण्ड में देखना चाहिए । [ ७६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् इधर प्रजापति उक्त विचार कर रहे थे, प्रजापतिकृत शरीरलक्षण ग्रात्मोपदेश का मनन करते हुए असुरप्रतिनिधि विरोचन असुरमण्डली में पहुंचे । विरोचन के हृदय में ग्राज पूर्ण शान्ति थी । मानों उसे ग्राज वास्तव में आत्मज्ञान हो गया हो । इस प्रकार अपने आपको आत्मज्ञान के सम्बन्ध में कृतकृत्य मानता हुआ विरोचन असुर मण्डली को सम्बोधित कर कहने लगा कि - " हे भाइयों! इस भौतिक शरीर का ही नाम आत्मा है, इसी को समुन्नत करो, इसी की अहर्निश आराधना करो । इसी की उपासना से परमानन्द मिल जाता है । ' विरोचन का अभिप्राय यही था कि, जैसे बने वैसे शरीर को सुखी रक्खो । खाश्रो! पीओ!! मौज उड़ाओ!!! " यदि अमुक वस्तु खा लेंगे तो शरीर ग्रवश्य तुष्ट होगा, परन्तु आत्मा मलिन हो जायगा । परलोक बिगड़ जायगा " ग्राज से ऐसे उपदेशों को केवल कल्पना समझो । विश्वास करो कि, शरीर से अतिरिक्त कोई नित्य आत्मतत्त्व नहीं है । अपितु शरीर ही आत्मा है । " दान का फल यहाँ नहीं मिलता, अपितु परलोक गत ग्रात्मा दानातिशय का उपभोक्ता बनता है | श्रद्धापूर्वक ' गुरु- देवता - पितरों की उपासना से परलोक सुधरता है । ज्योतिष्टोम यज्ञ से श्रात्मा त्रिणाचिकेत स्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है । यद्यपि उक्त ' दान - श्राद्ध - यज्ञादि ' कम्मों का प्रत्यक्ष में कोई फल नहीं दीखता, पग्न्तु परलोक में सब का फल मिलता है " शरीरातिरिक्त ग्रात्मवादियों का यह दृढ़ विश्वास है । परन्तु जो शरीर को ही श्रात्मा मानते हैं, उनकी दृष्टि में ' यज्ञ -तप - दान श्राद्ध ' यादि सब निरर्थक हैं । वे लोग इन सब को केवल स्वार्थियों की स्वार्थ - लीला समझते हैं । " विरोचन के आदेश से शरीर को ही आत्मा समझने वाले असुरों ने उक्त सब शास्त्रीय कम्मों पर अश्रद्धा की " श्रतएव तभी से बज्ञादि पर अश्रद्धा रखने वाली सम्प्रदाय ' ग्रासुर सम्प्रदाय ' नाम से प्रसिद्ध हुई । इसी ग्राधार पर आज भी जो दान नहीं करते, गुरु - देवता की उपासना नहीं करते, श्राद्ध पर विश्वास नहीं करते, यज्ञादि नहीं करते, ऐसे श्रददान, अश्रद्धदान अयज- गानों के लिए विद्वान् कहा करते हैं कि " अरे यह तो ग्रासुरभाव से युक्त है, असुर सम्प्रदाय का अनुयायी है । " असुरों ने ही तो शरीर को आत्मा समझ कर दानादि को अनुपयुक्त समझा है । शरीररूप ग्रात्मोपनिषत् " ग्रासुरीउपनि! म् ” है । विरोचन ने जब ग्रसुरों से कहा कि शरीर ही ग्रात्मा है, तो तब से उन्होंने शव को न जलाने की प्रथा को प्रोर भी दृढ़ कर दिया । आत्मा के निकल जाने पर भी उनका विश्वास है कि, अभी ग्रात्मा ज्यों विद्यमान है, केवल मूर्च्छा मात्र है । अतएव वे लोग अन वस्त्र ग्राभूषणादि उपकरणों के साथ मुर्दों, को सुरक्षित स्थान में रख देते हैं, जलाते नहीं । ग्रागे जाकर श्रुति कहती है कि – ' इन असुरों का ऐसा विश्वास है कि, ऐसा करने से इसे परलोक में सुख मिलेगा । ' सुप्रसिद्ध ' ग्रामिनिया ' स्थान में एक बार महा - देवासुरसंग्राम हुग्रा था । वहाँ पर युद्ध में जो ग्रसुर मरते थे, उन्हें वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कर वहीं नियत सुरक्षित स्थानों में रख देते थे । श्मशानभूमि के लिए ग्रासुरी भाषा में ' अर्मक ' शब्द नियत है, एवं जहाँ शव खखा जाता है वह स्थान ( कचरिस्तान ) " वैल " नाम से प्रसिद्ध है । जो प्रतिष्ठित असुर होते थे, उन के लिए बड़े - बड़े प्रासाद बनाए जाते थे । उनमें चिरकाल तक के लिए पर्याप्त भोग्य { ७७ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृन्त्रात्मविज्ञानोपनिषत् सामग्री रक्खी जाती थी । वही महाशवस्थान ऋग्वेद में " महावल " नाम से प्रसिद्ध है, एवं अवर-कोटि के असुरों का शवस्थान " बैल " नाम से प्रसिद्ध है । वेल एवं महावेल रूपा श्मशान भूमि ही ' अर्मक ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी ' अर्मक ' के सम्बन्ध से यह स्थान आमिनिया ' ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । पुरात्त्ववेत्तात्रों ने आज ऐसे कई स्थानों का अन्वेषण कर यह सिद्ध कर दिया है कि, वास्तव में पुरायुग में शव रखने के लिए बड़े - बड़े स्थान बनाए जाते थे, एवं वहाँ खाद्य वस्त्रादि उपकरण सामग्री प्रचुर मात्रा में रक्खी जाती थी । उस युग की रक्खी हुई जीर्ण शीर्ण वस्तुएँ आज भी उपलब्ध हो रही हैं ।. आत्मसत्ता का वास्तविक स्वरूप न समझने वाले असुर - सम्प्रदायानुयायी मनुष्य आज भी मुर्दों को पुष्पमालादि से अलंकृत कर गाड़ते मात्र हैं । बड़े दुःख के साथ लिखना पड़ता है कि ' भस्मान्तं शरीरम् ' ( ईशोपनिषत् ) सिद्धान्त को मानने वाले ग्रात्मनित्यवादी ग्रास्तिक भी आसुरभावापन्न यवनों के संसर्ग से शव को वस्त्रालङ्कारादि से सुसज्जित कर बाजे गाजे के साथ उसे श्मशानभूमि में ले जाते हैं । उन्हें यह नहीं भुला देना चाहिए, कि - " प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति, संस्कुर्वन्ति, एतेन ह्यमुं-लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते " इस श्रौतकथन के अनुसार यह घासुरसम्प्रदाय है । इससे कोई फल नहीं है । यह तो हुई असुरों की कथा । अब इन्द्र की दशा पर दृष्टि डालिए । प्रजापति के पास से लौट कर इन्द्र देवताओंों के पास न गए । श्रपितु मार्ग में ही एक स्थान पर ठहर गए, एवं प्रजापति के बत-लाए हुए श्रात्मस्वरूप पर विचार करने लगे । उन्होंने अपनी बुद्धि से विचार किया कि, प्रजापति ने शरीर को आत्मा वतलाया है । परन्तु यह बात समझ में नहीं प्राती । यदि हम सुन्दरवस्त्र पहन कर पानी में देखते हैं, तो उसमें वैसी ही परछाई पड़ती है । यदि आँख बन्द कर देखते हैं, तो प्रतिबिम्ब की भी आँखें मिच जाती हैं । यदि कटे हुए हाथ से देखते हैं, तो प्रतिबिम्ब भी काटे हाथ वाला हो जाता है । इन सब परिस्थितियों से तो यही सिद्ध होता है कि, यदि हमारा हाथ कट गया, तो उतना आत्मा कट गया, आँखे फूट गई, तो ग्रात्मा अन्धा वन गया । ये बातें ग्रात्मा के सम्बन्ध में समझ में नहीं आती । प्रजापति ने तो श्रात्मा को ' अमृत अभय - नित्य- अविनाशी ' बतलाया था । परन्तु मैं तो उक्त लक्षणों से इसे सर्वथा भयरूप देख रहा हूं, मरणधर्म्मा पा रहा हूं । सम्भवतः प्रजापति का अभिप्राय कुछ ओर ही होगा । हमन ने आत्मस्वरूप समझने में अवश्य भूल की है । इन्द्र वापस लौटे । समित्पाणी बन कर पुनः प्रजापति के सामने विनीत भाव से खड़े हुए । प्रजापति ने पूछा कि - " मघवन्! तुम तो विरोचन के साथ - साथ कृतकृत्य होकर लौट गये थे । हम ने तो समझा था कि, तुम्हारा समाधान हो गया । फिर वापस लौटने का क्या कारण? " इन्द्र के हृदय में आत्मा के सम्बन्ध में जो सन्देह हुआ था, उसका विश्लेषण करते हुए इन्द्र ने कहा कि, भगवन् आपने ( प्रतिबिम्बरूप ) जिस आत्मा का स्वरूप बतलाया है, वह तो नाशवान् है, सभय है । इधर आत्मा का लक्षण बतलाते हुए आपने कहा था कि, आत्मा नित्य है, अपहतपाप्मा है । उत्तर में प्रजापति ने कहा कि, मथवत्! हमने आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में जो कुछ * प्रवासां मघवञ्जहि शर्धो यातुमतीनाम् । वैलस्थानके श्रर्मके महावैलस्थे श्रर्मके ॥ ऋक् सं ० १ मं ० । १३३ सू ० १३ मन्त्र । [ ७८ ]

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड़ अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् कहा था, ठीक कहा था । हमने कभी शरीर को आत्मा नहीं बतलाया । तुम्हारे समझने में भूल हुई है । अच्छा, कोई चिन्ता नहीं । ३२ वर्ष पर्य्यन्त पुनः ब्रह्मचर्य व्रत का अनुष्ठान करो । तत्पश्चात् तुम्हारे लिए श्रात्मस्वरूप का स्पष्टीकरण करूंगा । आज्ञानुसार इन्द्र ने पुनः ३२ बर्ष तक उसी कठिनतम व्रत का अनुष्ठान किया । अनुष्ठान समाप्त हो जाने पर प्रजापति की सेवा में इन्द्र उपस्थित हुए । प्रजापति ने इन्द्र को लक्ष्य कर कहा कि, मधवन्! जिस आत्मा को हमने ग्रारम्भ में चक्षुद्वारा बतलाते हुए ' चाक्षुषपुरुष ' कहा था, ग्रागे जाकर उदशराव के दृष्टान्त से प्रतिबिम्ब द्वारा जिस ग्रात्मा का परिज्ञान करवाया था, वास्तव में वही आत्मा है । यदि तुम इस दृष्टान्त से न समझे, तो ' स्वप्नजगत्, ( सपने की दुनिया ) पर दृष्टि डालो, तुम्हारा समाधान हो जायगा । तुम रात्रि में स्वप्न देखा करते हो । स्वप्न में तुम्हारा शरीर तो जहाँ का तहाँ रहता है, किन्तु ग्रात्म तत्त्व बाहर घूमा करता है । ' रथ - स्त्री- अन्न पानादि महिमानों से युक्त होकर वह इतस्ततः विचरा करता है । वही स्वप्नद्रष्टा महात्मा अभय -अमृत -भावापन्न आत्मा है । " प्रजापति के उक्त श्रात्मोपदेश को हृदयङ्गम कर इन्द्र वापस लौटे । परन्तु अभी वे देवताओं के पास न जाकर मार्ग में ही विचार करने लगे कि - " इस बार प्रजापति ने स्वप्न-द्रष्टा को आत्मा कहा है । यद्यपि यह ठीक है कि, शरीर के क्षत विक्षत होने पर स्वप्नद्रष्टातत्त्व क्षत विक्षत नहीं होता, शरीर के दोष उसका कोई अनिष्ट नहीं कर सकते । स्वप्नावस्था में एक व्यक्ति मर जाता है । साथ ही में वह अपने मरे हुए शरीर को ही देखा भी करता है । इस से उसका शरीर से पार्थक्य भी सिद्ध हो जाता इस प्रकार शरीरात्मवाद में जो भय था, वह तो यहाँ नहीं है । तथापि हम ' देखते हैं कि, इस स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में अन्य व्यक्ति यथेच्छ पीड़ा पहुंचा सकता है । स्वप्नद्रष्टा पर स्वप्न में प्रहार होता है, वह मार दिया जाता है । यद्यपि वह मरता नहीं, परन्तु मरने की प्रत होने लगती है । भौतिक जगत् के प्राक्रमण स्वप्नद्रष्टा में क्षोभ उत्पन्न कर देते है । पुत्रादिमरण का उसे शोक होता है । अपि च दुःख से पीड़ित होकर स्वप्नद्रष्टा स्वप्न में कभी - कभी रोने भी लगता है, अतएव जगने पर अश्रु बिन्दू उपलब्ध होते है । उधर प्रात्मा अजर है, अभय है, अशोक हैं, अविपास है, श्रमृत है । इधर स्वप्नद्रष्टा सभय, सशोक मरण धर्मा है । इसे प्यास लगती है, भूख लगती है । ऐसी अवस्था में स्वप्नद्रष्टा को भी ग्रात्मा नहीं कहा जा सकता । श्रवश्य ही प्रजापति के तात्पर्य्यं समझने में हमने फिर भूल की है । उक्त संदेहों के निराकरण के लिए इन्द्र समित्पाणी बन कर पुनः प्रजापति की सेवा में उपस्थित होते हैं, एवम् अपने संदेह का उल्लेख करते हुए कहते हैं, ' भगवन्! जिस स्वप्नद्रष्टा को अपने ग्रात्मा बतलाया है, वहाँ भी मैं अभिलत्रित फल नहीं देखता ' । अर्थात् ग्रात्मा के जिस विशुद्ध अमृत प्रभय रूप को मैं जानना चाहता था, उसे न जान सका । प्रजापति ने उत्तर दिया कि " मघवन्! हमने जिसे स्वप्न -द्रष्टा कहा है, वह् अवश्यमेव ग्रात्मा है । तुम हमारे ग्राभ्यन्तर अभिप्राय को यथावत् समझ न सके । अस्तु, कोई चिन्ता नहीं । ३२ वर्ष तक और एक बार ब्रह्मचर्य का अनुगमन करो । पश्चात् आत्मा के मौलिक स्वरूप का स्पष्टीकरण करूगा " । श्राज्ञानुसार पुनः ३२ वर्षं पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त कर समित्पाणी इन्द्र प्रजापति के सामने उपस्थित हुए । ग्रात्मस्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए प्रजापति [ ७६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ने कहा कि मघवन्! जो ग्रात्मतत्त्व प्राँखों में रहता है, जो महीयान बनकर स्वप्न देखा करता है, एवम् जो तत्त्व सुषुप्तिकाल में संप्रसादभाव को प्राप्त होता हुआा स्वप्नज्ञान से विमुक्त हो जाता है, जिस अवस्था में सम्पूर्ण बाह्य - आभ्यन्तर विषयों से जिसका सम्बन्ध टूट जाता है, सुषुप्ति का अधिष्ठाता संप्रसादमूर्त्ति वही तत्त्व श्रात्मा है | वह अमृत है, अभय है । " इन्द्र सन्तुष्ट हुए, वापस लौटे, परन्तु अभी देवताओं के पास न जाकर प्रजापति द्वारा निर्दिष्ट ग्रात्मस्वरूप पर विचार करने लगे । वहाँ भी भय ने इन्द्र का पीछा न छोड़ा । इस में भी उन्हें भय दिखलाई पड़ा । F इन्द्र ने विचार किया, " सुपुप्ति अवस्था में जो तत्त्व रहता है; प्रजापति ने उसे आत्मा कहा है । ' परन्तु यह बात भी समझ में नहीं जाती । यह अवस्था तो सर्वशून्यावस्था है । इस में तो ' अहमस्मि ( मैं हूँ ) इस अपनी सत्ता का भी ज्ञान नहीं रहता । साथ ही में ज्ञान - साधक सम्पूर्ण भौतिक विषयों का भी इस अवस्था में आत्यन्तिक अभाव रहता है । दूसरे शब्दों में इस अवस्था में आत्मा विनाश की ओर झुका रहता है । ऐसी स्थिति में सुषुप्ति - प्रवस्था युक्त तत्त्व को भी आत्मा नहीं कहा जा सकता । श्रवश्य मैं अपने ही बुद्धिदोष से प्रजापति के वास्तविक अभिप्राय को यथावत् नहीं समझने पाता । " इस प्रकार अपने आप की प्रतारणा करते हुए इन्द्र समित्पाणी वन कर पुनः प्रजापति के समीप उपस्थित हुए । पुनः ३२ वर्षं के व्रतानुष्ठान का आदेश हुआ । परमधीर देवेन्द्र ने पुनः ३२ वर्ष का अनुष्ठान किया । अनन्तर श्रात्मस्वरूप जिज्ञासा प्रकट की । इन्द्र का यह अद्भुत धैर्य, एवम् वास्तविक जिज्ञासा देखकर प्रजापति हृदय से प्रसन्न होते हुए आत्मा के वास्तविक स्वरूप का विश्लेषण करते हुए कहने लगे-मघवन्! यह शरीर मर्त्य है, मृत्युधर्म से नित्य श्राक्रान्त है । ऐसा मरणधर्म्मा यह शरीर उस अमृत - शरीर -आत्मतत्त्व का अधिष्ठान है । इस मरणधर्मावच्छिन्न शरीर से युक्त होने के कारण सोपा-धिक बनता हुआ शरीरावच्छिन्न अमृतात्मा शरीर से सम्बन्ध रखने वाले प्रियाप्रिणभाव से नित्य ग्राक्रान्त हो रहा है । तुम उसे शरीरावच्छिन्न समझ रहे हो । जब तक ग्रात्मा और शरीर का तुम विवेक ' नहीं कर लोगे, तब तक प्रियाप्रिय ( पुण्यापुण्य - सुख - दुःख- शोकमोह- लक्षण द्वन्दभाव ) से कभी छुटकारा नहीं पा सकोगे । विनाशधर्म्म शरीर का है । आत्मा का नहीं है । ' चाक्षुपुरुष, स्वप्नद्रष्टा, सुपुप्ति का अधिष्ठाता ' तीनों एक तत्त्व है, यह अवश्य आत्मा है । परन्तु तुमने अब तक इसे शरीर की दृष्टि से देखा है । श्रतएव आत्मा के इन तीनों विवर्त्तो में तुम्हें भय के ही दर्शन हुए । इसलिए हम सर्वान्त में तुम्हें यह आदेश कर देते हैं कि, तुम आत्मा को शरीर से सर्वथा पृथक् समझा करो । जिस दिन तुम्हारा यह विवेक मूल बन जायगा, उस दिन तुम अपने ग्राप ग्रात्मा के वास्तविक विशुद्ध रूप को समझ लोगे । ग्रात्मा स्वयं विज्ञाता है – ' विज्ञातार वा अरे केन विजानीयात् ' । तुमने हमसे आत्मा का विशुद्ध रूप पूछा । आत्मा कभी विशुद्ध रहता नहीं । अतः हमें सोपाधिक भावों को आगे कर तटस्थ लक्षणो द्वारा ग्रात्म- ' स्वरूप का प्रतिपादन करना पड़ा । सोपाधिक रूपों में भय की आत्यन्तिक निवृत्ति वास्तव में नही है । अतः तुम्हारा पुनः पुनः संदेह करना ठीक था । परन्तु हम इस से अधिक शब्द द्वारा कहने में असमर्थ । वह तो स्वानुभवकगम्य है - " सो जाने जेहि देहि जनाई " – मैवेपनृणुते तेन लभ्यः " । बात यथार्थ है । ' शर्करा - मिश्री - इक्षुरस- द्राक्षा ' सभी तो मधुर हैं । हम अपने पाठकों से पूछते है कि, इनकी मधुरता में जो [, ८० 1

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् अन्तर है, वह शब्द द्वारा बतलाइये? ' जिह्वा जानती है, कह नहीं सकते ' यही उत्तर होगा । जब लौकिक त्रिषयों के स्पष्टीकरण में भी शब्द की गति रुक जाती है, तो फिर उस लोकातीत ग्रात्मतत्त्व का विश्लेषण शब्द द्वारा कैसे संभव हो सकता है । ग्रात्मतत्त्व की इसी अनिर्वचनीयता, एवं स्वानुभवैकगम्यता का दिग्दर्शन कराते हुए अभियुक्त कहते हैं-नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमैवेष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ कठोपनिषत् १।२।२२ । " आप आत्मा के सम्बन्ध में बड़े - बड़े व्याख्यान देते हैं, ग्राप बहुत बुद्धिमान है, आप रात - दिन तपश्चर्या में रत रहते हैं, ग्रापने पर्य्याप्त विद्याध्ययन किया है, उपदेश सुने हैं, परन्तु इन सबसे प्रात्मज्ञान नहीं हो सकता । ' यज्ञ - तपो - दान लक्षण निष्कामकर्म्म के प्रभाव से जिस दिन ग्रावरण हट जाता है, उस दिन ' तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( गी ० ४।३८ ) । के अनुसार अपने श्राप आत्मदेवता आप पर अनुग्रह कर देते हैं । उस योगी का आत्मा ग्रुपने स्वरूप को खोलकर उसके सामने रख देता है " । " परलोक कोई वस्तु नहीं है । संपत्ति ही सुख का मूल है । जिसे ( आत्मा ) कभी ग्रांखों से नहीं देखा, उसे मानकर सांसारिक सुख छोड़ बैठना मूर्खता है । आत्म - परमात्म - परलोक - प्रागति - गति - पाप - पुण्य श्राद्ध - दान - यज्ञ - तप - ये सब अकर्मण्यों की लीला है " इस प्रकार के कुतकों से आत्मतत्त्व का तिरस्कार करने वालों की स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए, साथही में उन्हें सन्मार्ग पर लाने के लिए कारुणिक महर्षि आदेश करते हैं—

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।

अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्व्वशमापद्यते मे ॥ १ ॥

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विद्युः ।

आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्वर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ २ ॥

१ –सांसारिक धन के मोह से उन्मत्त बने हुए उस बालबुद्धि की दृष्टि में परलोकगति कोई वस्तु नहीं है । वह ग्रभिमानी, जो अभिमानवश " यही लोक है, परलोक कोई वस्तु नहीं है " यह कहा करता है, वही बार - बार मेरे ( यमलक्षणमृत्युचक्र ) वंश में प्राया करता है । २ – बहुत उपदेश सुनने से भी जिसका स्वरूप ज्ञान नहीं होता, सुन कर भी कितने ही मनुष्य उसके ज्ञान से वञ्चित रह जाते हैं । ग्रात्मस्वरूप को बतलाने वाला, इसे पहवानने वाला, एवं इस का साक्षात्कार करने वाला कोई विरला ही है । [ ८१ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्म विज्ञानोपनिषत्

न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।

श्रनन्यप्रोक्तं गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमनुप्रमारणात् ॥३ ॥

नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।

यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वाङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ४ ॥

प्रशरीरं शरोरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् ।

कठोपनिषत् १ | २ | ६ - ε ।

महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ५ ॥

कठोपनिषत् १।२।२२ । इस प्रकार प्रजापति ने उक्त रूप से तटस्थ लक्षरण द्वारा इन्द्र को आत्मसाक्षात्कार करवाया । प्रजापति के अनुग्रह से इन्द्र आत्मा के वास्तविक रूप को यथावत् हृदयङ्गम कर पूर्ण सन्तुष्ट होकर देव-मण्डली में लौट आए । ( देखिए छां ० उपनिषत् ८७, ८,६,१०,११,१२ खं ० ) उक्त आख्यान के सम्बन्ध में केवल यही प्रश्न शेष रह जाता है कि, " प्रजापति ने आत्मस्वरूप बतलाने में प्रारम्भ में इन्द्र की वश्वना क्यों की? जिस तत्त्व का विश्लेषण उन्होंने सर्वान्त में किया, उसे श्रारम्भ में ही क्यों न बतला दिया "? इस प्रश्न के सम्बन्ध में पहले तो हम यही कहेंगे कि, प्रजापति ने आत्मा के सम्बन्ध में जितने उत्तर दिये, वे सब यथार्थ थे । उदाहरण के लिए पहले चक्षु में प्रतिविम्बित पुरुष को ही लिजिए । प्रजापति ने कहा था कि, हमारी आंखों में तुम्हें जो पुरुष दिखलाई पड़ता है, वही श्रात्मा है । हमारी ग्रांखों में तभी तक अन्य पुरुष का प्रतिबिम्ब विकसित रहता है, जब तक कि आत्म-सत्ता रहती है । मुर्दे की आंख में कभी अन्य मनुष्य का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता । शरीर को ही श्रात्मा मानने वालों से हम पूछते है कि, यदि शरीर ही प्रात्मा है, तो जिस प्रकार जीवित अवस्था में ३. यह श्रात्म तत्त्व किसी साधारण व्यक्ति का कहा हुग्रा नहीं हैं । चिरन्तन काल के ध्यानयोग से प्राप्त होने वाला श्रात्मावबोध सुगम नहीं है । यह श्रात्मधर्म्म सुसूक्ष्म है, स्वानुभवकगभ्य होने से इस के सम्यक् परिज्ञान के लिए अन्य ( गुरु आदि ) के उपदेश के अतिरिक्त ओर गति नहीं है ॥ ४ – कुतर्कों से यह ग्रात्मभावना कभी नहीं हटानी चाहिए । तुम्हें स्मरण रखना चाहिए कि साक्षात्कृतधर्म्मा दूसरे ग्राप्त मनुष्यों से कही हुई यह उपदेश धारा सर्वथा उपयुक्त होती है । अर्थात् आत्म-ज्ञान के लिए आप्तोपदेश का ग्राश्रय लेना परम श्रावश्यक है । हमने तुम्हारे ज्ञानोदय के लिए ही इतना कष्ट उठाया है । ५ - इस विषय का विशद विवेचन ' कठ विज्ञानभाष्य ' में देखना चाहिए । [ ८२ ]