Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 101–110

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 101–110

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड १ - " पुष्टि पूषा " ( ते ० ब्रा ० २।७१२।१ ) । २ - " पशवो हि पूषा " ( शत ० ५।२।५।८ ) । ३ – “ पूषा रेवत्यन्वेति पन्थाम् " ( तै ० सं ० ३ । १ । २।६ ) । पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् ४ – “ पूषा भागदुघोऽशनं पाणिभ्यामुपनिधाता ” ( शत ० १।१।२।१७ ) । ५ - " तस्मादाहुरदन्तकः पूषा करम्भ भाग इति " कौ ० ६।१३ ) । - ** -५-६ - मित्रावरुणौ सौरद्वादश - आदित्य प्रारण लोकालोकपर्य्यन्त व्याप्त है । खगोल में व्याप्त इस प्रादित्यप्राण की पूर्व - पश्चिम कपालभेद से मित्र वरुण दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । यह याम्योत्तर रेखा ( दक्षिणोत्तर वृत्त ) जो रात्रि के १२ बजे, मध्याह्न के १२ बजे को काटती हुई जाती है, वह उर्वशी नाम की अप्सरा है । विशाल अन्तरिक्ष प्रापोमय अर्णव समुद्र है । सभी ( ३६० ) याम्योत्तर रेखाएं इस अव समुद्र के अप् में सरण के कारण अप्सराएं हैं, परन्तु उपर्युक्त मध्यवृत्त सबकी अपेक्षा उरु ( विशाल ) है अतएव यह मध्यवृत्त उर्वशी नाम से प्रसिद्ध है । इस मध्य वृत्त से पूर्व की ओर का सम्पूर्ण सौरभाग- पूर्व कपाल है, पश्चिम की ओर का सारा विभाग पश्चिमकपाल है । इस कपालद्वयी में " त्वमातयन्तोन्तरिक्षम् " इस इस ऋग्वैदिक सिद्धान्त के अनुसार सौरयज्ञसमर्पक दिक्सोम भरा हुआ है, अतएव उभय कपालावच्छिन्न सोमरस से परिपूर्ण इस खगोल को याज्ञिक परिभाषा में द्रोणकलश ( सोमघट ) कहा जाता है । पूर्वोक्त उर्वशी रेखा ( मध्याह्नवृत्त ) पर पूर्व एवं पश्चिम दोनों कपालों का संयोग है । पूर्व कपाल मित्र है, पश्चिम कपाल वरुरण है । दोनों कपालों का संयोग क्या है, मित्रावरुण का उर्वशी अप्सरा के साथ मिथुनभाव मध्याह्नवृत्तरूप उर्वशी में मित्र वरुण दोनों प्राणों की प्रशात्मना आहुति होती है । यह मैत्रावरुणप्राण स्खलित हो कर कुछ तो घटरूप खगोल में ( क्रान्तिवृत्तावच्छिन्ननाक्षत्रिक एवं ग्रह खगोल में ) प्रविष्ट हो जाता है, इससे मध्याकाशस्थ मत्स्य नाम का अपूर्व तत्त्व उत्पन्न होता है । दक्षिण भाग गिरते हुए मैत्रावरुण प्राण से अगस्त्यप्रारण एवं उत्तर भाग में गिरे हुए मैत्रावरुरण प्रारण से वसिष्ठ प्रारण का उदय होता है । अस्तु इस कथा के विश्लेषण का प्रकृत में पर्याप्त अवर नहीं है । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे तक सौर प्रारण पार्थिव प्रजा की ओर अनुगत रहता है, इतने काल में सौरप्राण हमारे से ( पार्थिवप्रजा से ) स्नेह करता है, प्रतएव एतत् कालावच्छिन्न पूर्वकालस्थ श्रादित्यप्राण " मित्र " कहलाता है । ठीक इसके विरुद्ध दिन के १२ बजे से रात्रि के १२ बजे तक सौरप्राण पार्थिवप्रजा से विशुक्त होता रहता है, संवृत होता रहता है, अतः एतत् कालावच्छिन्न पश्चिम कपालस्थ प्रादित्यप्रारण को " वरुण " नाम से व्यवहृत किया जाता है । अनुकूल भावप्रदाता इन्द्रज्योति सौरप्राण मित्र है, प्रतिकूल भाव का अधिष्ठाता प्रापोमय ही सौरप्रारण वरुरण है । अध्यात्म [ ६६ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् संस्था में ये दोनों प्राण ऋतु एवं दक्ष नाम से प्रसिद्ध हैं । ऋतु ( संकल्प ) पर आरूढ़ होना दक्षभाव है अतः काल का अधिष्ठाता मित्र है, रात्रि की प्रतिष्ठा वरुण है । कुल्हाड़े से काटी हुई वृक्षशाखा वारुणी है, स्वयं गिरी हुई शाखा मैत्री है । यदि प्राप चावल को विशुद्ध अग्नि से ही परिपक्व करते हैं तो वह वारुरण बनता हुआ प्रासुर जाता है, मधुरता नष्ट हो जाती है यदि कुछ काल तक अग्नि से सम्बन्ध करके नीचे उतार कर वाष्प से ही उसका परिपाक करते हैं तो इस अवस्था में वह ओदन मैत्र बनता हुआ दिव्यान्न बन जाता है, इसमें मधुरता अक्षुण्ण रहती है । दुग्ध में मित्र का भाग अधिक है, सोम में वरुण की प्रधानता है । प्राण मित्र है, प्रपान वरुण है । आपूर्यमाण ( शुक्लपक्ष ) मित्र है, अपक्षीयमाण पक्ष ( कृष्णपक्ष ) वरुण है । प्रेमाश्रु का मित्र प्राण से सम्बन्ध है, शोकाश्रु का वरुणप्राण से सम्बन्ध है । आगमन मित्र से संबंध रखता है, गमन वरुण से सम्बन्ध रखता है । मित्रावरुण के इन्हीं स्वरूप धर्मों को लक्ष्य में रख कर निम्नलिखित श्रौतंवचन हमारे सामने आते हैं— १ – “ सर्वस्य व मित्रो मित्रम् " ( आनुकूल्यान् ) ( शत ० ५।३।२।७ ) । २ - " अहर्वै मित्रो, रात्रिर्वरुरण ः " ( ऐत ० ब्रा ० ४।१० ) । ३ – " वरुण्यं वा एतद्यन् मथितं ( प्राज्यम् ) प्रथैतन्मैत्रं यत् स्वयमुदितम् " ( शत ० ५।३।२।६ ) । ४ – “ वरुण्योवा s एष योऽग्निनाश्रितः प्रथैष मित्रो य ऊष्मारणश्रितः " ( शत ० ५।३।२।८ ) । ५ – “ अर्द्धमासौ ( शुक्ल कृष्णपक्षौ ) मित्रावरुणौ ” ( तां ० २५।१०।१० ) । ६ - " वरुण्या वा एषा ( शाखा ) या परशुवृक्रणा, प्रथैषा मैत्री ( शाखा ) या स्वयप्रशीर्णा " ( शत ० ५।३।२।५ ) । ७ - " द्यावापृथिवी वै मित्रावरुणयोः प्रियं धाम " ( तां ० १४।२४ ) । - * -७- अय्यमा सौर संस्था में रहने वाला यह प्रारण जो सौरज्योति - गौ- श्रायु तत्त्वों को प्रजोत्पत्ति के लिए देने के लिए बाध्य करता है, दूसरे शब्दों में सौर भाग का जो प्राण पार्थिव प्रजा को प्रदान करता है, दातृत्व का अधिष्ठाता वही सौरप्राण " अर्थ्यमा " नाम से प्रसिद्ध है । दान की ओर जो हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति * एक दूसरे पदार्थों में अपने - अपने द्रव्यों का विसर्ग एवं परद्रव्यों का प्रदान कैसे होता है? आदान - विसर्ग में भैषज्य लक्षण जीवन - यज्ञ का स्वरूप कैसे सम्पन्न होता है? इत्यादि विषयों का विशद विवेचन ईशोपनिषत् हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रथमं खण्ड में देखना चाहिए । [ ६७ ] '

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ww % पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् होती है, वह प्रवृत्ति हमारी नहीं, अपितु अध्यात्म में प्रविष्ट प्रर्य्यमा नाम का आदित्यकारण ही इस दानेच्छा का अधिष्ठाता है । यदि प्राणियों में ( आदान विसर्गस्वरूपसम्पादक ) यह दान न हो तो जीवन साधक यज्ञ सम्बन्ध ही उच्छिन्न हो जाए । अन्य पदार्थ से प्रवर्ग्यरूप में परिणत हो कर आने वाली वस्तु ही अन्य पदार्थ की प्रतिष्ठा का में आहुत कर अन्नादाम रूप यज्ञ का स्वरूप समर्पक बनती हुई उस पदार्थ कारण बनती है । इसी आधार पर इस प्रर्य्यमा के लिए " यज्ञो वा अर्थमा " ( तै ० ब्रा ० ३।८।१६।३ ) यह कहा जाता है । दानशील मनुष्य यज्ञ का प्रेरक बनता हुआ साक्षात् श्रर्थ्यमा है । इसी अभिप्राय से " अर्य्यमेति तमाहुर्यो ददाति " ( तै ० ब्रा ० १ । १ । २ । ४ ) यह कहा गया है । " बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः " इस निगम के अनुसार पृथिवी - अन्तरिक्ष द्यौ ( सूर्य्य ) रूप विश्व के उत्तर भाग में इन्द्र ( सूर्य्य ) प्रथम स्थान रखता है । इसी अभिप्राय से इसके लिए " विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः " यह कहा जाता है । वाजपेययज्ञ प्रवर्त्तक बृहस्पति ग्रह परमेष्ठी एवं स्वयंभू रूप उत्तर - विश्व के अन्त में प्रतिष्ठित है । इस बृहस्पति के सम्बन्ध से ही सौरसाम ( महिमामण्डल किंवा विभूतिमण्डल ) बृहत् साम नाम से प्रसिद्ध है । यही " बृहतांपतिः ” है | ऊर्ध्व भाग स्थित बृहस्पति के ऊपर दक्षिणोत्तर ध्रुव को काटता हुआ खगोल में जो एक प्रकाशित तारापुञ्जमार्ग दिखलाई पड़ता है, वह पुराण भाषा के अनुसार " वियद्गङ्गा " - श्राकाश-गङ्गा " - " सुरदीर्घिका " आदि नामों से प्रसिद्ध है । इस तारापुञ्ज में रहने वाला समष्ट्यात्मक प्राण भी " अर्थ्यमा " " नाम से प्रसिद्ध है । इसी आधार पर इस आकाशगङ्गा को वैदिक साहित्य में “ अर्थ्यमरणः पन्थाः ” ( अर्य्यमा का मार्ग ) नाम से व्यवहृत किया गया है जैसा कि वाजिश्रुति कहती है-" एषा वा ऊर्ध्वा बृहस्पतेदिक्, तदेव उपरिष्टादर्यम्णः पन्थाः " ( शत ० ५।५।१।१२ ) खगोलीय संस्था में तीन प्रकार के बृहस्पति हैं । लुब्धक बन्धु नाम के नक्षत्र को ( जां कि रोहिणी नक्षत्र के कुछ पूर्व एवं लुब्धक नक्षत्र से कुछ उत्तर भाग में प्रतिष्ठित है एवं जिसके साथ तारा-हरण उपाख्यान का सम्बन्ध है ) भी बृहस्पति कहा जाता है । " स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु " में बृहस्पति शब्द से लुब्धक - बन्धु नामक नाक्षत्रिक बृहस्पति का ही ग्रहण है । दूसरा बृहस्पति ग्रह है जो कि शनि - मंगल आदि ग्रहविज्ञान से सम्बन्ध रखता है । इसी ग्रह बृहस्पति को मंगल एवं बृहस्पति के मध्य में रहने वाले देवसेना नाम के १०८ ग्रहों का संचालक माना गया है । " बृहस्पतिर्दक्षिणा " यजुर्वेदोक्त यही सुप्रसिद्ध बृहस्पतिग्रह है । सूर्य्य से ऊपर रहने वाला बृहस्पति उक्त दोनों से पृथक् है । यह पारमेष्ठ्य ग्रह है । यही वाज- सोम का प्रवर्त्तक बनता हुआ वाजपेय यज्ञ का अधिष्ठाता है । इसी आधार पर वाजपेय यज्ञ को " बृहस्पति - सव कहा जाता है । [ 85 1

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् दानपूर्वक यज्ञ का स्वरूप सम्पादन करने वाला प्रदाताप्राण ही " अय्र्यमा " है । जिस व्यक्ति के अन्तरात्मा में इस प्रदाताप्राण की शक्ति रहती है वही स्वभावतः दाता होता है । प्रमा की कमी से ही स्वाभाविक कृपणता का उदय होता है । भारत वर्ष पर इस प्रर्द्धमाप्राण की विशेष कृपा है । अर्थ्यमा प्राण की स्वाभाविक अनुकम्पा से ही यह देश आर्य्यावर्त्त एवं देश के निवासी आर्य कहलाते । आयों की दानशक्ति प्रसिद्ध है । “ दांतारो नोऽभिवर्त्तन्ताम् " ( हमारे कुल में दाता बढ़ें ) यह इस देश का उच्च प्रादर्श . है । प्रमाप्रारण की कृपा से ही इस देश में सर्वप्रथम यज्ञविद्या का आविष्कार हुआ है । अर्य्यमाप्राण के इसी स्वरूप धर्मं को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-१ - " यज्ञो वा अर्थ्यमा " ( तै ० ब्रा ० २ | ३ | ५ | ४ ) २ – “ प्रर्य्यमेति तमाहुर्यो ददाति " ( तै ० ब्रा ० ११११२२४ ) ३ – “ ततो वै स ( अर्य्यमां ) पशुमानभवत् " ( तै ० ब्रा ० ३ | १ | ४ | १ ) -8-८-- अंशुः * १ - " प्राण एवांशुः चक्षुरेवांशुः " ( शत ० ११ ५ । ६ । २ ) । - " मनो ह वांशुः " ( शत ० ११।५।६।२ ) । ३ - " प्रजापतिर्वा एष यदंशुः " ( शत ० ४१६ । १ । १ ) । ४ - " प्रजापतिर्वा एष यदंशुः सोऽस्य ( यजमानस्य ) एष आत्मैव " ( शत ० ४।६।१।१, ११।५।६।१ ) । -कै-९- विवस्वान कल्पदृष्टि से विवस्वान नाम के श्रादित्य का बड़ा महत्त्व है । यही कारण है कि जहाँ और और श्रादित्यप्राण केवल श्रादित्य नाम से प्रसिद्ध हैं वहाँ यह विवस्वान नाम का प्रादित्य " मार्तण्ड " किंवा अंशु ' पर लिखते समय स्वर्गीय पण्डित श्री मोतीलालजी शास्त्री स्थान खाली छोड़ गये हैं । लगता है, अवकाश में फिर इस पर सप्रमाण लिखने का उनका विचार था जो पूरा नहीं हो पाया । अतः यहाँ ग्रन्थ की मौलिकता और प्रामाणिकता की रक्षा के लिए केवल अंशु विषयक श्रुति वचनों के संदर्भ उद्घृत कर सन्तोष लाभ करना ही श्रेयस्कर समझा गया है – सम्पादक । [ ६६ ]

पृष्ठ 105

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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् wwwww " मार्ताण्ड " इस विशेष नाम से व्यवहृत हुआ है । सृष्टि - विज्ञानान्तर कालविज्ञान के अनुसार वर्त्तमान मन्वन्तर " वैवस्वत मन्वन्तर " नाम से प्रसिद्ध है जैसा कि पूर्व की अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका हैं । इसी विवस्वान प्रादित्य का स्वरूप निरूपण करती हुई मन्त्र श्रुति कहती है—

अष्टौ पुत्रासो प्रदितेर्ये जातास्तन्वस्परि ।

देवाँऽउपप्रैत् सप्तभिर्परामार्त्ताण्डमास्यत् ॥

सप्तभिः पुत्रैरदितिरुपप्रैत् पूर्व्यं युग्मम् । प्रजाय मृत्यवेत् पुनर्मार्ताण्डमाभरत् ॥ ( ऋक् ० १०।७२।८।६ ) । उक्त प्रादित्यों को प्रदितिपुत्र बतलाया गया है । यह अदितितत्त्व १ - पृथिवीमण्डलोपलक्षिता श्रदिति २ – सूर्य्य मण्डलोपलक्षिता श्रदिति ३ – नक्षत्रमण्डलोपलक्षिता प्रदिति भेद से प्रधानरूप से तीन भागों में विभक्त माना गया है । इन तीनों प्रदितियों में प्रकृत मन्त्रों में स्तौम्यत्रिलोकी से सम्बन्ध रखने वाली पृथिवीमण्डलोपलक्षिता प्रदिति का ही निरूपण हुआ है । भू - पिण्ड का प्रांधा अण्डकपाल सदा दृश्य रहता है । आधा अण्डकपाल सदा अदृश्य रहता है । दृश्यकपाल के साथ सौरज्योतिर्मय प्रारण का अविच्छिन्न रूप से सम्बन्ध रहता है, प्रतएव भू - पिण्ड का सौरतेजोऽवच्छिन्न यह पार्थिव दृश्य भाग अदिति कहलाता है । अदृश्य भाग में सौरप्राण कट जाता है, दूसरे शब्दों में उस भाग में सौर तेज का प्रभाव है, अतएव भूपिण्ड का यह तपोमय पार्थिव भाग ' दिति ' नाम से व्यवहृत होता है । खण्डनार्थक दो - दो धातु से ही दिति शब्द निष्पन्न हुआ है ( दो प्रवखण्डने ) । इस व्यवस्था के अनुसार रात्रि में भी प्रदिति सत्ता सिद्ध हो जाती है । पृथिवी अपने अक्ष पर घूम रही है । भूपिण्ड के इस स्वाक्षपरिभ्रमण से ही पृथिवी की दैनंदिन गति होती है । इस दैनंदिनगति से ही अहोरात्र ( दिन - रात ) का स्वरूप निष्पन्न होता है । अहोरात्र स्वरूप समर्पिका इस दैनंदिन गति के आधार पर यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं रह जाती है कि उक्त प्रदिति की सत्ता रात्रि में भी प्रतिष्ठित है । कारण स्पष्ट है । ग्रहः कालवत् रात्रि में भी दृश्य भाग अक्षुण्ण रहता है । सर्वतः परिभ्रमण के कारण ही भूमण्डलोपलक्षिता प्रदिति सम्पूर्ण पृथिवी, सब दिशाएँ, अन्तरिक्ष, द्यौ आदि सबके साथ युक्त हो जाती है । सर्वात्मभूता भूमण्डलोपलक्षिता इसी अदिति का स्वरूप

बताते हुए वेदमहर्षि कहते हैं-दितिरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।

विश्वे देवा दितिः पञ्चजना प्रदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥

( ऋग् ० १।८६।१० ) । इसी अदिति को लक्ष्य में रख कर " इयं वै पृथिव्यदिति: " ( शत ० १ | १ | ४ | ५ ) यह कहा गया है । परिभ्रमणमूला उक्त प्रदितिस्वरूप परिचय से विज्ञ पाठकों को यह भी समझ लेना चाहिए कि यह अदिति वस्तुतः गतिशीला बनती हुई परिवर्तनशीला है, अस्थिरा है । उधर सूर्य्यमूला प्रदिति सर्वा [ १०० ]

पृष्ठ 106

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणांपितरविज्ञानोपनिषत् स्थिर है, इसी प्रकार नक्षत्रमूला प्रदिति जिसका कि सम्बन्ध " देवस्य त्वा अश्विनोर्बाहुभ्यांपूष्णे हस्ता भ्यामाददे नार्यसि " ( यजु ० २ | ६ | ५ | २ ) इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण के • बाद माना गया है, सर्वथा स्थिर है । यज्ञकाल निर्णय में इस नक्षत्रमूलास्थिर * प्रदिति को ही महत्त्व दिया गया है । उक्त दोनों मन्त्रों का इन स्थिर दोनों अदितियों से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि अहः काल में ही अपनी सत्ता रखने वाली स्थिर अदिति के साथ उक्त मंत्रों का सम्बन्ध माना जायेगा तो " देवाँ उपप्रैत् सप्तभिः ” यह कथन सर्वथा असंगत हो जायगा । कारण स्पष्ट है । अहः काल में अदिति के साथ ६ प्रादित्यों का सम्बन्ध होता है, आठवाँ आदित्य स्वयं मार्त्तण्ड ( सूर्य्यपिण्ड ) है । रात्रि में मार्त्तण्ड का सम्बन्ध न रह कर केवल सात आदित्यों का ही प्रदिति से सम्बन्ध रहता है । रात्रि में सूर्य्यपिण्ड के अस्ताचलानुगामी बनने पर भी आदित्यप्रारण अवश्य रहते हैं । इनका अदिति के साथ सम्बन्ध बतलाना तभी घटित हो सकता है जब कि रात्रि में भी अदिति सत्ता मान ली जाय । सूर्यमूला एवं नक्षत्रमूला अदिति स्थिरभाव के कारण ऐसी नहीं हो सकती क्यों कि इसकी सत्ता पूर्वकथानुसार रात्रि में भी है । ' " अष्टौ ह पुत्रा दितेः यांस्त्वेद्देवा प्रादित्या इत्याचक्षते । सप्त हैव ते प्रविकृतं हाष्टमं जनयाञ्चकार मार्ताण्डम् । सन्देघो हैवास । यावानेवोर्ध्व-स्तावांस्तिर्यक् । पुरुषसम्मित इत्यु हैक प्राहुः । तऽउ है as ऊचुः ' देवा श्रादित्या यदस्मानन्वजनि मा तदमुयेव भूत्ऽहन्तेमं विकराम इति । तं विचक्रुः यथायं पुरुषो विकृतः । यमु ह तद्विचक्रुःस " विवस्वान् " प्रादित्यः तस्येमाः प्रजाः " इति ( शत ० ३।१ । ३ । ३ ) । * खगोल संस्था में पृथिवी के परिभ्रमण से स्व - स्थान में सर्वथा स्थिर रहते हुए भी नक्षत्र पूर्व से पश्चिम की ओर उसी प्रकार जाते हुए दिखलाई देते हैं जैसे कि रेलवे ट्रेन में जाने वाले यात्री को मार्ग में. आने वाले स्व - स्थान में स्थिर वृक्ष अपने गतिमार्ग से विरुद्ध दिक् में जाते हुए दिखलाई पड़ते हैं । इस दृश्य परिस्थिति को लक्ष्य में रख कर ही नक्षत्रों का उदयास्त माना गया है । वस्तुतः सब नक्षत्र सदा समान रूप से अपने - अपने नियत स्थानों पर ही प्रतिष्ठित रहते हुए अपने नक्षत्र ( न क्षरतीति क्षत्रम् ) नाम को चरितार्थ कर रहे हैं । " देवस्य त्वा सवितुः " इत्यादि मन्त्रों का यही तात्पर्य है कि जिस समय पूषा नाम से प्रसिद्ध रेवती नक्षत्र पश्चिम क्षितिज में अस्त हो जाता है, डूब जाता है, अदृश्य बन जाता है, उस समय नासत्य एवं दस्र नाम से प्रसिद्ध अश्विनी के दोनों तारें रैवन्त नक्षत्र को साथ लिए डूबने वाले होते हैं । इस दशा में स्वज्योतिर्मय होने से सविता नाम से प्रसिद्ध स्वाती नक्षत्र पूर्व क्षितिज पर रहता है । डूबे हुए सर्वथा अदृश्य रेवती, डूबने वाले किन्तु दृश्य अश्विनी दोनों की मध्य बिन्दु से प्रारम्भ कर पूर्व क्षितिज में प्रतिष्ठित स्वाती नक्षत्रपर्य्यन्त आकाश दिव्याकाश कहलाता है । इस दिव्याकाश का केन्द्रबिन्दु मध्यस्थ पुनर्वसु नक्षत्र का तृतीय चरण होता है । इस प्रकार स्वाती ( सविता ) के प्रसव उदय काल एवं अश्विनी के बाद, पूषा के हाथों से मध्यस्थ स्थिर बिन्दुरूप अदिति का ग्रहण होता है । नक्षत्र-मूला स्थिर अदिति का यही संक्षिप्त निदर्शन है । [ १०१ ]

पृष्ठ 107

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खर्ल्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत्. उक्त ब्राह्मण श्रुति का तात्पर्य यही है कि इतर आदित्य प्रारण विकृत हैं, भिन्न - भिन्न रूप से अपनी - अपनी स्वतंत्र संस्थानों में व्याप्त हैं परन्तु सूर्य्यपिण्ड रूप विवस्वान् नाम का श्रादित्य विकृत है, पिण्डरूप है, पुरुषवत् प्रत्यक्ष दृष्ट है । यह अविकृत मार्ताण्ड प्रजाकामुक बनता हुआ आगे जा कर कूर्म्म रूप से परिणत होता हुआ दधि घृत- मधु इन तीन विकृत भागों में उसी प्रकार परिणत हो जाता है जैसे कि पुरुष संस्था अस्थिमांसादि घनभाव, रसशोणितादि तरलभाव, शुक्रग्रोजादि विरलंभाव भेद से तीन विकृत भावों से युक्त रहती है । यही विवस्वान् प्रादित्य की विकृतावस्था है, इसी को चितिविज्ञान के अनुसार कूर्म्म - - कश्यप क - पश्यक आदि विविध नामों से व्यवहृत किया जाता है । जो तात्पर्य-" एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा प्रसृजत । यदसृजत अकरोत्तत् । यदकरोत् तस्मात् कूर्म्मः । कश्यपो वै कूर्म्मः । तस्मादाहुः सर्वा प्रजा काश्यपः ” । इति । ( शत ० ७२४ । १।५ ) । इस वचन का है, उसी अभिप्राय से, उसी अर्थ में " यमुह तद्विचक्रुः स विवस्वानादित्यः, तस्येमाः प्रजाः " यह कहा गया है । निष्कर्ष यही हुआ कि सूर्यकेन्द्र में उक्थ रूप से ( मूल प्रभव रूप से ) प्रतिष्ठित ( प्रतएव मनु नाम से प्रसिद्ध ) कूर्म्म रूप से परिणत हो कर त्रैलोक्य को अपनी रश्मियों से श्राच्छादित करने वाला प्रादित्यप्राणविशेष ही " विवस्वान् " है । यही विवस्वान् आगे जा कर मनु - यम-मृत्यु इन तीन भावों का आरम्भक बनता है जैसा कि आगे बतलाया जाने वाला है । विवस्वान् की इसी वृत्ति को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-१ - " सौ वाऽश्रादित्यो विवस्वानेष ह्यहोरात्रे विवस्ते । तमेष विवस्ते, सर्वतो ह्यनेन परिवृतः ” ( शत ० १० । ५ । २ । ४ ) । २ – “ विवस्वन्नादित्येष ते सोमपीतः " ( शत ० ४।३।५।१८ ) । -- ** -१०- त्वष्टा रूप ही वस्तु का स्वरूप सम्पादक है । इस के आकार एवं वर्ण भेद से दो भाग हैं । कृष्णशुक्ल-हरित - पीत - नील हिरण्मय आदि रूप वर्णरूप हैं । इनका अधिष्ठाता पूर्व प्रतिपादित मघवा नामक इन्द्र नाम का आदित्य है । वस्तु का जो वर्तुल ( गोल ) - चतुष्कोण - षट्कोण - त्रिकोण - श्रष्टकारण-* इस विषय का विशद विवेचन " शतपथ हिन्दी विज्ञान भाष्य " में देखना चाहिए | [ १०२ ]

पृष्ठ 108

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् लम्बा - चौड़ा आदि आकार रूप जिस प्रादित्यप्रारण से विकसित होते हैं, वही " त्वष्टा " नाम से प्रसिद्ध है । " त्वष्टारूपाणि पिशतु " से आकार रूप ही अभिप्रेत हैं । प्रजा निर्माण प्रक्रिया में त्वष्टा - नाभानेदिष्ट - बालखिल्या - एवयामरुत् ये चार प्राण सहचारी माने गए हैं ( द्रष्टव्य ऐ ० ब्रा ० ६ । ३० ) | योष गर्भाशयगत शोणिताग्नि ) में आहुत होने वाली शुक्रबिन्दु आगे जा कर हाथ - पैर - ख - नाक - कान मुख - ग्रीवा - जङ्घा – उदर- कण्ठ - ललाट - अंगुली - नख - कफोरणी - जत्रु - मणिबन्ध आदि विविध आकारों में परिणत क्यों हो जाती है? इसका उत्तर यही त्वष्टाप्रारण है । वस्तुपिण्ड वाङ्मय है । वाक्तत्त्व पाँचों भूतों का मूल है । दूसरे शब्दों में वाक्तत्त्व ही पञ्च-महाभूत में रूप में परिणत होता है । " वाक् परिमाणं छन्दः " के अनुसार वाक् ( भूत ) का परिमाण विशेष ( ढाँचा ) ही छन्द है । बहिःसीमा ( बाहर का दृश्य आकार ) ही उस वस्तु का छन्द कहलाता है । तत्तच्छन्द ही तत्तद् वस्तु का आकार रूप है । इसका विधाता यही त्वष्टाप्राण है । इसीलिए वाक् को भी त्वष्टा कहा जाता है । पूषा नाम के आदित्य का निरूपण करते हुए हमने चर्म्मचक्षु से दिखलाई देने वाले तत्त्व को पशु कहा है । दीखता है आकार, आकार का अधिष्ठाता है त्वष्टा । इसीलिए पशु को भी त्वष्टा कहा जाता है । त्वष्टाप्राण के इन्हीं स्वरूपधम्मों का प्रतिपादन करते हुए निम्नलिखित श्रौत वचन हमारे सामने आते हैं— १– “ वाग्वैत्वष्टा । वाग्घीदं सर्वं त्वाष्टीव " ( ऐ ० ब्रा ० ६।१० ) । २ - " त्वष्टा वै पशूनामीष्टे " ( शत ० ३।७ । ३ । ११ ) । ३ – “ त्वष्टुर्हि पशवः ” ( शत ० ३।८।३।११ ) । ४- " त्वष्टा वै पशूनां रूपाणं विकर्त्ता " ( तां ० वा ० ।१०।३ ) । ५ - " त्वष्टा पशूनां मिथुनानां रूपकृद् रूपपतिः ” ( तै ० ब्रा ० २।५।७।४ ) । ६ – “ त्वष्टा हि रूपाणि विकिरोति " ( तै ० ना ० २।७।२।१ ) । ७ – “ त्वष्टा वै रेतः सिक्तं विकिरोति " ( कौ ० ३।९ ) । ११- सविता परमेष्ठि- - चन्द्रमा - बृहस्पति आदि ग्रहों की तरह सविता भी एक ग्रह है । साथ ही में चन्द्रमा जिस प्रकार पृथिवी का उपग्रह है, पृथिवी - बुध - शुक्र - मंगल- शनि आदि सूर्य के उपग्रह हैं एवमेव ब्रह्मणस्पति - बृहस्पति - सविता सूर्य्य आदि कई उपग्रह परमेष्ठी के माने गए हैं । ये उपग्रह परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगाया करते हैं इनमें से प्रकृत में सविताग्रह ही अभिप्रेत है । वैदिक परिभाषाओं [ १०३ ]

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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् wwwwwm के विलुप्तप्राय हो जाने से आज सविता सूर्य्य का परस्पर पर्य्याय सम्बन्ध माना जा रहा है । यद्यपि सूर्य को भी संविता कहा जा सकता है, परन्तु केवल सूर्य्यं को ही सविता मानना सर्वथा भ्रान्ति है । सविता एक स्वतन्त्र ग्रह है, एवं इसकी सत्ता तीसरे द्युलोक में है । अन्तरिक्ष पहला द्युलोक है, सूर्य दूसरा द्यलोक है, परमेष्ठी तीसरा द्यः लोक है । यहीं सविता प्रतिष्ठित है । इसका एकमात्र कार्य्यं प्रेरणा ( कार्यप्रवृत्ति के लिए उत्तेजना ) है । प्राकृतिक प्राणदेवताओं से ही भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं, एवं प्राणों के आगमन से ही इनका जीवन रहता है । इन प्राण देवताओं को पदार्थोत्पत्ति के लिए एवं जीवन के लिए प्रेरित करने वाला देवता ही सविता है । बिना सविताप्राण की प्रेरणा के किसी भी तत्त्व किंवा वस्तु का अन्य वस्तु के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता । सविता देवता देवतानों के नाजिर हैं । इजरा करना इनका मुख्य कर्म है । अतएव प्रत्येक यज्ञकर्म में तत्तद्यज्ञ विभूतियों को प्राप्त करने के लिए सविता से ही प्रार्थना करते देखा जाता है । इस पारमेष्ठ्य सविताप्राण का सर्वप्रथम सूर्य्य के साथ सम्बन्ध होता है । हमारे त्रैलोक्य में हमें सूर्य के द्वारा सविताप्राण मिलता है, अतः सूर्य को आगे जाकर सविता मान लिया गया है । जैसा कि ऊपर कहा गया है, सूर्य्यं ही सविता नहीं है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि सविता " प्रातर्य्यावारणः " देवता माना गया है । पञ्च पञ्च उषाकालोपलक्षित गायत्री वेला में सविता की सत्ता मानी गई है । सविता के आगमन का प्रधान समय ब्राह्ममुहूर्त से आरम्भ कर सूर्योदय से एक घण्टे पीछे तक माना गया है । इतने काल में हमें सविताप्रारण प्रभूत मात्रा में मिलता है । इस प्रेरणात्मक सविता-प्राण को आत्मसात् करने के लिए ही ब्राह्ममुहूर्त्त में उठ कर नित्यकर्मों से निवृत्त हो कर गायत्री जप करने का आदेश है । गायत्री द्वारा सविता का वरेण्य ( संग्रहणीय ) तेज ही संगृहीत किया जाता है । उधर सूर्य्य सम्पूर्ण अहःकाल का अधिष्ठाता बना हुआ है । इससे स्पष्ट है कि सूर्य्य का नाम सविता नहीं है अपितु सूय्यं में प्रेरणा भाव का उदय करने वाला प्रागन्तुक प्रारण ही सविता है । प्रत्येक पदार्थ में सविता प्राण का भोग होता है, अतएव ब्राह्मण ग्रन्थों में अग्नि- चन्द्रमा सूर्य्य - अन- मन- प्रारण - यज्ञ - पृथिवो - वायु-स्तनयित्नु- वेद - पुरुष - पशु - श्रहः आदि सबको सविता शब्द से सम्बोधित किया है । इस सविताप्राण की प्रतिष्ठा भूमि प्रत्येक पदार्थ की केन्द्रबिन्दु है । केन्द्र से सीधी आने वाली प्रेरणात्मिका रश्मिएँ सावित्री है । उदाहरण के लिए दीपाच ( दीपशिखा ) को सविता समझिए । इससे चारों ओर ऋजुमार्ग से निकलने वाली रश्मियों को सावित्री समझिए । ये ही रश्मिएँ किसी धामच्छद वस्तु से टकरा कर यदि प्रतिफलित हो जाती हैं तो इन्हें गायत्री शब्द से व्यवहृत किया जाता है । प्रत्येक सविता के साथ सावित्री एवं गायत्री का सम्बन्ध रहता है । सौर रश्मिएँ हिरण्यवर्णा हैं अतएव सविता को हिरण्यपारिण कहा जाता है । किसी भी कार्य के लिए हमारे अन्तःकरण में पहिले " इवं कुरु " ( यह करो ), " इदं कर्त्तव्यम् " ( यह काम करना चाहिए ) * इस विषय का विशद विवेचन सन्ध्याविज्ञान रहस्य में देखना चाहिए । [ १०४ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणांपित रविज्ञानोपनिषत् इत्यादि रूप से अन्तःप्रेरणा का उदय होता है । यह प्रेरणा उसी सविताप्राण की प्रेरणा है । सम्पूर्ण कर्म सवितृप्रसूत बन कर ही पूर्णरूप से निष्पन्न होते हैं । सविताप्राण के उपर्युक्त स्वरूप धर्मों को लक्ष्य में रख कर ही निम्नलिखित श्रीतवचन हमारे सामने आते हैं— १ - " सविता वै देवानां प्रसविता " ( शत ० १ १ २ ।१७ ) । २ - " सविता वै प्रसवानामीशे " ( ए ० ब्रा ० १।३० ) । ३ - " आदित्य एव सविता " ( गी ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) । ४ - " एष वाव सावित्रः य एष तपति " ( शत ० ३।२।३।१८ ) । ५ - " अग्निरेव सविता " ( जै ० ब्रा ० उ ० ४।२७।१ ) । ६ - " वरुण एव सविता " ( जै ० ब्रा ० उ ० ४।२७।३ ) । ७- “ विद्युदेव सविता " ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) ८- " वायुरेव सविता ” ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) ९- " चन्द्रमा एव सविता " ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) । १० - " यज्ञ एव सविता " ( जै ० उ ० ४।२७।७ ) | ११ - " इयं ( पृथिवी ) वै सविता " ( शत ० १३ | १।४।२ ) । १२ - " अन्भ्रमेव सविता ” ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) । १३ - " वेदा एव सविता " ( गो ० ब्रा ० पू ० १ ३३ ) । १४ - " अहरेव सविता " ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ ) । १५ - " पुरुष एव सविता " ( जै ० उ ० ४।२७।१७ ) । १६ - " पशवो वै सविता ” ( शत ० ३।२।३।११ ) | १७ - " प्राणो वै सविता " ( ऐ ० वा ० १।१६ ) | १८ - " मनो वै सविता " ( शत ० ६।३।१।१३ ) । १ ९ - " तस्मात् ( सविता ) हिरण्यपाणिरितिस्तुत: ” ( कौ ० ब्रा ० ६।१३ ) । २० " - दातारमद्य सविता विदेय यो नो हस्ताय ( नक्षत्राय ) प्रसुवाति यज्ञम् ” ( तै ० ब्रा ० ३।१।३। ) । [ १०५ ]