Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 111–120
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 111–120
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् १२ - विष्णुः दो विजातीय पदार्थों का अथवा अनेक विजातीय पदार्थों का अन्तर्य्याम सम्बन्ध ( रासायनिक मिश्रण ) से अपूर्व भाव में परिणत हो जाना ही यज्ञ है । मिलने वाली इन दो वस्तुनों में एक अन्नाद बनती है, दूसरी अन्न बनती है । श्रन्नाद को अग्नि कहा जाता है, अन्न को सोम कहा जाता है । अन्नाद अग्नि में अन्न सोम का प्राहुत होना ही यज्ञ है । अन्नादाग्नि में अन्न की आहुति देने वाली सौर आकर्षण शक्ति ही विष्णु के नाम से प्रसिद्ध है । पूर्व की अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् में पश्चाक्षर का निरूपण करते समय विष्णुतत्त्व का विस्तार से स्वरूप बतलाया जा चुका है । वहाँ प्रागतितत्त्व को ही विष्णु कहा गया है । शनाया सूत्र से सोम को आकर्षित कर उसे अग्नि में आहुत करना प्रगति धर्म्मा विष्णु का ही कर्म है । ऐसी स्थिति में इस विष्णुतत्त्व को यज्ञस्वरूपसमर्पक होने से हम अवश्य ही यज्ञ नाम से व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । प्रकृत में विष्णु के सम्बन्ध से केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि वह आदित्यप्राण जो हृद्याक्षर सम्बन्ध से प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में प्रतिष्ठित होकर प्रशनाया सूत्र द्वारा अन्नाहुति से जीवनसत्तकमूल पदार्थों के यज्ञ को सुरक्षित रखता है, वही प्रादित्यविष्णु नाम से प्रसिद्ध । जब तक यह वैष्णवी शक्ति काम करती रहती है, तब तक वस्तु की जीवन सत्ता रखने वाला अन्नादान रूप यज्ञ होता रहता है । वैष्णवी शक्ति के उत्क्रान्त होते ही यज्ञ बन्द हो जाता है, पदार्थ नष्ट हो जाता है । विष्णु ही विश्व के पालक हैं । तैंतीस यज्ञ देवताओं के अन्त में इसी विष्णु देवता का साम्राज्य है । द्वादश प्रादित्य विभूति का यही संक्षिप्त स्वरूप परिचय है -8-पूर्व प्रकरण में जिन १२ आदित्यप्राणों का दिग्दर्शन कराया गया है उनमें से विवस्वान् नाम के नवें आदित्यप्राण से मनु - यम - मृत्यु नाम के तीन मनु - यम - मृत्यु विभूति - स्वरूप परिचय - तत्त्व उत्पन्न होते हैं । प्रसंगागत इन वैवस्वत तत्त्वों का स्वरूप जान लेना भी अनावश्यक न होगा । इन तीनों का स्वरूप वैवस्वत के आधार पर इन्द्र - अग्नि- वरुण के समन्वय से निष्पन्न होता है । ये तीनों देवता क्रमशः मनु, यम, मृत्यु के रेतः ( उपादान द्रव्य ) हैं एवं विवस्वान इन तीनों की योनि है । विवस्वान रूपा योनि में इन्द्र - रेतः की प्राहुति होने से मनुतत्त्व उत्पन्न होता है । अग्नि - रेतः की आहुति से यम तत्त्व का विकास होता है एवं मुच्यु नाम से प्रसिद्ध वरुणरेतः की आहुति मृत्यु - देवता की स्वरूप सम्पा-दिका है । इन्हीं का स्वरूप क्रमशः पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है । १ - मनु निरुक्तिः त्रिवृत्स्तोम ( 2 ) स्थानीय " पृथिवीलोक " पञ्चदशस्तोम ( १५ ) स्थानीय अन्तरिक्षलोक एवं एकविंश ( २१ ) सोमस्थानीय द्युलोक भेद से इन्द्र - तत्त्व तीन भागों में विभक्त है । इन तीनों लोकों के प्रतिष्ठावा देवता क्रमशः श्रग्नि वायु आदित्य है । इनमें क्रमशः अग्निप्रधान पार्थिवेन्द्र वासव नाम से, वायुमय प्रान्तरिक्ष्येन्द्र मरुत्वान् नाम से एवं प्रादित्यमय दिव्येन्द्र मघवा नाम से प्रसिद्ध है । " सूर्य्यो-बृहती मध्यूढस्तपति " " बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः " " बिभ्राड् बृहत् पिबतु सौम्यम् " इत्यादि श्रोत वचनों के अनुसार बृहत् नाम से प्रसिद्ध सूर्य को बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित माना गया है । गायत्री - उष्णिक् - अनुष्टुप् [ १०६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwwwwww आदि सातों छन्दों में ( जो कि छन्दः ज्योतिशास्त्र परिभाषा के अनुसार अहोरात्रवृत्त पूर्वापरवृत्त इत्यादि नामों से प्रसिद्ध मध्य का नवाक्षर छन्द ही बृहती नाम से व्यवहृत है । चक्षुः शास्त्र परिभाषा के अनुसार यही छन्द विष्ववृत्त नाम से व्यवहृत हुआ । इसका प्रत्येक चरण ६-६ अक्षर का है, संभूय बृहती छन्द ' के ३६ अक्षर हो जाते हैं । सौरी गौसाहस्री के सम्बन्ध से एक - एक बृहती प्रारण सहस्र - सहस्र संख्या में परिणत हो जाता है । इस प्रकार बृहती के ३६ अक्षर प्राणों के ३६००० ( छत्तीस हजार ) प्रारण हो जाते हैं । ये छत्तीस हजार बृहती प्राण वास्तव में सौर मचवेन्द्र प्रारण ही है । इन्दु तत्त्व ही महिमा रूप से ३६ संख्या में परिणत हो कर शतायुपुरुष के आयुसूत्र का अधिष्ठाता बन रहा है । उक्त प्रयुसूत्र से बढ़ कर पदार्थों का मित्र किंवा हितैषी और कौन हो सकता अतएव इस आयु प्राण को विश्वामित्र ( विश्व का मित्र ) नाम से व्यवहृत किया जाता है । प्रायुप्रदाता इस बृहती सहस्र ( ३६०० ) ऐन्द्र प्राण के प्रथम द्रष्टा ऋषि भी विश्वामित्र नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । ऐन्द्र प्राण विश्वामित्र हैं, इसके प्रथम आविष्कारक मनुष्य ऋषि भी विश्वामित्र हैं । विश्वामित्र ऋषि उपासना के द्वारा इन्द्र को प्रसन्न करते हैं । आठ * प्रकार के देवतानों में से " अभिमानि व्यपदेशस्तुविशेषानुगतिभ्याम् " ( ब्रह्म सू ० २।१।५ ) के अनुसार अभिमानी कोटि के इन्द्र देवता मनुष्याकार में परिणत होकर इन्द्र के सामने उपस्थित होते हैं और कहते हैं— " ऋषे! प्रियं धामोपागाः । वरं वृणीष्व! ( हे विश्वामित्र! आप मेरे प्रिय स्थान पर पहुँच गए हैं, वर मांगिए ) । ऋषि उत्तर देते हैं - " त्वामेवाहं वृणे " ( मैं आपका – इन्द्र का ही स्वरूप जानना चाहता हूँ ) । आगे जा कर बृहती सहस्र का स्वरूप बतलाते हुए इन्द्र कहते हैं— " एतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मा विजानीयात् । प्राणे वा हमस्मृषे! प्राणस्त्वं, प्राणः सर्वाणि भूतानि, प्राणे वेष य एष तपति । स $ “ मित्रे वर्षों ” पाणिनीय सूत्र के अनुसार ऋषिवाचक विश्वमित्र शब्द का दीर्घ हो जाने से विश्वामित्र बन जाता है । जो अर्थ लौकिक भाषा में विश्वामित्र का है, वही अर्थ ऋषिवाचक विश्वामित्र शब्द का समझना चाहिए । * इन आठों देवतानों का विशद निरूपण शतपथ हिन्दी विज्ञानभाष्य ( १ वर्ष ) में देखना चाहिए । ठ ( " मैं आपका ही स्वरूप जानना चाहता हूं ", विश्वामित्र के यह वह मांगने पर इन्द्र अपना स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं ) – मैं मनुष्य के लिए यह सब से बड़ा हित समझता हूँ कि वह मुझे ( इन्द्र तत्त्व को ) पहिचान जाय । हे ऋषे! मैं प्राणतत्त्व हूँ, तुम प्रारण हो, सम्पूर्ण भूत प्राणात्मक है । यह प्राणतत्त्वही हैं जो कि ( आकाश में सूर्य्य ) तप रहा है ( प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः ) सो मैं प्राणरूप से ही सर्वत्र व्याप्त हो रहा हूँ । इनमें दक्षिण की ओर रहने वाला प्रारण मेरा अन्नात्मक मित्र है । जो कि वैश्वामित्र रूप से तपता हुआ ही मैं ( स्व स्वरूप से ) प्रतिष्ठित हो रहा हूँ । इन्द्र ने यही उत्तर. दिया ।........ इस प्रकार यह ( इन्द्रप्राण ) बृहती - सहस्र ( ३६००० ) सम्पन्न हो गया । इस प्राण के व्यञ्जन ( मर्त्य भौतिक भाग ) शरीर बनते हैं, घोष भाग प्रात्मा एवं ऊष्मा भाग प्रारण बनता है । ( ऐ प्रा. २।२।४ ) । → [ १०७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् एतेन रूपेण सर्वा दिशे विष्टोऽस्मि । तस्य मैनं मित्रं दक्षिरणम् । तद्वैश्वामित्रमेष तपन्नेवास्मीति होवाच तद्वा इदं बृहती सहस्रं सम्पन्नम् । तस्य यानि व्यञ्जनानि तच्छरीरं, यो घोषः स श्रात्मा, य ऊष्मारणः स प्राणः । " ( ऐ ०० २/२/४ ) इति । " सर्व हीदं प्राणेनावृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध:, एवं सर्वाणि भूतानि - प्रापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् ” ( ऐ ०० २।१।७ ) । उक्त बृहती सहस्र प्रारण जब विवस्वान नाम के आदित्यप्राण के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है तो वही सांयौगिकप्राण " मनु " नाम से व्यवहृत होने लगता है । विवस्वद् गर्भित मनु नामक यह बृहती प्राण ही का अधिष्ठाता माना गया है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । आयु स्वरूप समर्पक इस प्रारण की सत्ता प्रत्येक प्रदार्थ के हृदय ( केन्द्र ) में मानी जाती है । प्राणापानवायु के आधारस्वरूप व्यान-वायु को ही जीवन ( यु ) सत्ता का कारण माना जाता है, जैसा कि उपनिषत् श्रुति कहती है—
न प्राणेनापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥ ( कठो ० ५।५।३ ) व्यान वायु की प्रतिष्ठा हृद्ग्रन्थि है । इस हृद्ग्रन्थि को सुरक्षित रखने वाला पूर्वोक्त विवस्वान-गर्भित मनुरूप बृहतीप्रारण ही है, अतएव अन्ततोगत्वा इसी को जीवनसत्ता की प्रतिष्ठा मान लिया जाता है । यह तत्व प्राणात्मक है, प्राणरूप है । प्रारणतस्व वाक् एवं मन के बिना स्वतन्त्र रूप से कभी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । इसी आधार पर मन वाक् को प्रारण की ' वर्त्तनी ' कहा जाता है । ऐसी स्थिति में “ षट्त्रिंशत् सहस्र ” ( बृहती सहस्र ) प्रारण का अर्थ " मनोवाङ्मय बृहती सहस्रप्राण " यह फलितार्थ हो जाता है । ३६००० मन की कलाएँ हैं, ३६००० प्रारण की कलाएँ हैं । मन वाक् प्रारण तीनों अभिन्न हैं, इसलिए आगे जा कर १०८००० ( एक लाख आठ हजार ) कलाओं की ३६००० कलाएँ ही शेष रह " सम्पूर्ण विश्व प्राण से आवृत है । ( इसी आधार पर " सर्व प्राणिभिरावृतम् ” यह कहा जाता है ) यह आकाश ( रोदसी त्रैलोक्य का पुराणाकाश, किंवा सौर आकाश ) इस बृहतीप्रारण से सर्वतः युक्त हो रहा है । जिस प्रकार यह आकाश बृहतीप्रारण से परिपूर्ण बन रहा है एवमेव एक चिऊँटी से आरम्भ कर महाभूत पर्य्यन्त सारा प्रपञ्च बृहतीप्राण से विष्टब्ध है, यह समझना चाहिए " ( ऐ ० प्रा ० २।१।७ ) । [ १०८ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् जाती हैं । हम एक - एक दिन एक - एक कला का उपभोग करते हैं । ऐसी ३६००० कलाएँ सौर मण्डल से आ कर हमारे हृदय में उक्थ रूप से प्रतिष्ठित रहती हैं । प्रतिदिन एक - एक कला खर्च हो जाती है । इस प्रकार ३६००० दिन में ३६००० कलाएँ समाप्त हो जाती हैं । ये ही हमारी आयु के १०० वर्ष हैं । ३६ हजार दिन के पूरे १०० वर्ष होते हैं । मनुष्य के आयुसूत्र का यह सामान्य मान है । यह प्राण सूर्य्य से आता है ऋत. " आगच्छति " भाव की प्रधानता से इसे आयु कहा जाता है । इसी आधार पर " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता: " " प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः " इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । हृदय में प्रतिष्ठित उपर्युक्त प्रायुसमर्पक मनुप्राण ( हृदय ग्रन्थि से बद्ध ) व्यान वायुरूप उपांशु - सवन ( स्थिर शिला ) के आधार पर प्राणरूप उपांशु अपानरूप अन्तर्य्यामि ग्रह के घर्षण से तोपधर्म्मा वैश्वानर अग्नि उत्पन्न करता है । हम अपने शरीर को जहाँ से छूते हैं वहीं से उसे गरम पाते हैं । यह ताप उसी संयोजक वैश्वानर अग्नि का धर्म है । व्यानतत्त्व के आधार पर सञ्चालित होने वाले प्राणयान के घर्षण से उत्पन्न हुआ है अतएव पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ इन तीनों विश्वों के अधिष्ठाता श्रतएव नर नाम से प्रसिद्ध प्राण - व्यान- अपान ( क्रमशः श्रादित्य - वायु - अग्नि ) से उत्पन्न इस सांयोगिक ताप लक्षण अग्नि “ विश्वेषां नराः - विश्वानराः, विश्वेभ्यो नरेभ्यो जातो वैश्वानरः " इस व्युत्पत्ति से वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । इसी वैश्वानरात्मा से पुरुष यावदायु जीवित रहने में समर्थ होता है । इस प्रकार वैश्वानराग्नि प्रवर्त्तक, प्राणापान व्यापार संचालक विवस्वत्प्राणगर्भित बृहती प्राणात्मक प्रयुसूत्र का अधिष्ठाता हृद्य तत्त्व ही मनु है, यह पूर्व प्रकरण से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । केन्द्र में श्वोवसीयस किंवा श्वोवस्य सब्रह्म ( तै ० ब्रा ० ) नाम से प्रसिद्ध श्रव्यय मन प्रतिष्ठित रहता है । इस अव्यय मन के अनुग्रह से ही उपर्युक्त विवस्वान् नामक प्रारण मनु नाम से व्यवहृत होने लगता है । इसी आधार पर - " पुनन्तु मनसा धियः " इत्यादि रूप से मन और मनु का अभेद बतलाया जा रहा है । हृदय में हृ - द - य रूप अन्तर्यामी अक्षर की सत्ता है । यही नियतिब्रह्म है । स्वनियति दण्ड से यह हृदयरूप अन्तर्यामी अक्षर सब के हृदय में प्रतिष्ठित हो कर सब का शास्ता बन रहा है । हृदयस्थ शास्ता-अक्षर एवं इन्द्र प्राणात्मक अव्ययमनोऽवच्छिन्न मनु समानायतन होने से समानधर्मा हैं । इसी आधार पर अक्षर सहयोगी इस मनु को भी शास्ता कह दिया जाता है । अव्यय - पुरुष ( मन ) परात्पर नाम से प्रसिद्ध विश्वातीत शाश्वत ब्रह्म से अविनाभूत है । मायाशून्य होने से सीमायुक्त प्रनित्य भावों से विरहित यह परात्पर शाश्वतधर्म नाम से प्रसिद्ध है जैसा कि पूर्व की अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका है 1 शाश्वतधर्माविच्छिन्न हृदयस्थ अव्ययमन के आधार पर ही मनु तत्त्व प्रतिष्ठित है । इस साहचर्य परम्परा से इस मनु को भी शाश्वतधर्म्म नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । परात्परतत्त्व अणोरणीयान् है अतः इस दृष्टि से मनु को श्ररणोरणीयान् भी कहा जा सकता है । सौरप्राण हिरण्मय है, रुक्मकान्तियुक्त है, अतएव तत्प्राणप्रधान मनु को " रुक्माभ " नाम से भी व्यवहृत किया जा सकता है । हृदय में प्रतिष्ठित होने के कारण इसे स्वप्नधीगम्य माना जा सकता है । कारण इसका यही है कि स्वप्नावस्था में मन हृदय स्थान में चला जाता है । अव्ययमनोऽवच्छिन्न होने से मनु को “ पर पुरुष " नाम से भी व्यवहृत किया जा सकता है । वैदिक परिभाषानुसार अव्ययतत्त्व ' पर ' नाम से ही प्रसिद्ध है । इस [ १०६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwww wwwww पितृणांपित र विज्ञानोपनिषत् wwwwwww प्रकार अक्षर समन्वय से प्रशास्ता परात्पर समन्वय से शाश्वतब्रह्म एवं अणोरणीयान् हिरण्मय तत्त्व के सम्बन्ध में रुक्माभ, मनोमय होने से स्वप्नधीगम्य अव्ययमन के समन्वय होने से मनु एवं परपुरुष, वेदाग्नि-मय होने से अग्नि, सर्वसृष्टि प्रवर्तक होने से प्रजापति, सोमप्राणप्रधान होने से इन्द्र, ऋषिप्राणधन होने से प्राण नाम से प्रसिद्ध संसारचक्र का प्रवर्तक तत्त्व ही मनु है । मनु के इन्हीं स्वरूप धर्मों का निरूपण करते हुए महर्षि भृगु कहते हैं—
प्रशासितारं सर्वेषामरणीयांसमणोरपि ।
रुक्माभं स्वप्नधगम्यं तं विद्यात् पुरुषं परम् ॥१ ॥
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ २ ॥
एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः ।
जन्मवृद्धि क्षयैनित्यं संसारयति चक्रवत् ॥३ ॥
कालाग्निस्वरूप यही प्रखण्ड मनु उपाधि भेद से संवत्सर - श्रयन - पक्ष - ग्रहोरात्र - मुहूर्त - घटिका -होरा आदि विविध खण्ड - भावों में परिणत हो कर संसार चक्र का प्रेरक बन रहा है । पुराण परिभाषा-नुसार मुहूर्त्त को ही मनु कहा जाता है । मनु के अवान्तर खण्ड ही मन्वन्तर हैं । पूर्व में मनु को आयुरूप बतलाया गया है । “ आयुर्म्मम्मरिण रक्षति " - " श्रायुरत्नंप्रयच्छति " के अनुसार आयु सूत्र ही मुहुर्मुहु ( क्षण - क्षण प्रतिक्षण ) आत्मा का त्राण किया करता है अतएव आयुरूप मनु को " मुहुस्त्रायते " इस व्युत्पत्ति के अनुसार अवश्य ही " मुहूर्त्त " नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । अहरागम सृष्टिकाल है, रात्र्यागम प्रलयकाल है । " प्रव्यक्तोऽक्षर इत्याहुस्तमाहुः परमां गतिम् " ( गीता ) इस स्मार्त सिद्धान्त के अनुसार अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध अक्षर पुरुष ही अहरागम में व्यक्त हो कर सृष्टि का अधिष्ठाता बनता है एवं रात्र्यागम में वही मनुरूप अक्षर पुनः अपने अव्यक्त भाव में परिणत होता हुआ प्रलय का अधिष्ठाता बन जाता है । इसी अभिप्राय से स्मृति कहती है— अव्यक्तात् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्या प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके ॥ ( गीता, ८।१८ ) । सृष्टिकाल ब्रह्मा का दिन है, प्रलयकाल रात्रि है । मनु प्रजापति के ग्रहःकाल में उपाधिभेद से १५ विभाग हो जाते हैं, ये ही १५ विभाग रात्रि में होते हैं । पञ्चदश भागों में विभक्त ग्रहःकाल, पञ्चदश भागों में रात्रिकाल, दोनों में ग्रात्मा का त्राण करना इसी मनु का काम है । ग्रहोरात्र ( दिन - रात ) सुखपूर्वक * इस विषय का विशद विवेचन शतपय हिन्दी विज्ञान भाष्य में देखना चाहिए । [ ११० ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् इसी आयुरूप मनु की कृपा से व्यतीत होते हैं, अतएव अहोरात्र के ये ३० विभाग " मुहूर्त " नाम से प्रसिद्ध हो जाते हैं । इन मुहूर्तों का स्वरूप लोकम्पृणा नाम की इष्टकाओं से निष्पन्न होता है । यह मूहूर्त्त काल के अवान्तर क्षुद्रखण्ड हैं । इन्हीं से लोकच्छिद्र पूर्ण होते हैं, अतः कालछिद्र पूरक मुहूर्ती को अवश्य ही लोकम्पृणा इष्टका कहा जा सकता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर वाजिश्रुति कहती है— " लोकम्पृणाभिः ( इष्टकाभिः ) मुहूर्त्तानाप्नोति । ” ( शत ० १० । ४ । ३ । १२ ) । " अथ यत् क्षुद्राः सन्त इमाँल्लोकान् पूरयति तस्मात् ( मुहूर्त्ताः ) लोकम्पृणाः " ( शत ० १० । ४ । २ । १८ ) इत्यादि । मानुष अहोरात्र में ६० घड़िएँ होती हैं । " मुहूर्तोघटिकाद्वयम् " के अनुसार एक मुहूर्त्त में दो 1. घटिका ( घड़ी ) होती हैं । हमारे अहोरात्र के सम्बन्ध में जो कालाग्नि खण्ड मुहूर्त्त नाम से प्रसिद्ध है, ब्राह्म अहोरात्र के सम्बन्ध में वही मुहूर्त - मनु किंवा मन्तवन्तर नाम से प्रसिद्ध है । जिस काल खण्ड को हम अपनी भाषा में " तिथि " कह कर सम्बोधित करते हैं, वही ब्राह्मकाल मर्यादा में " कल्प " नाम से व्यवहृत होता है । १५ मन्वन्तर अहःकाल हैं, १५ मन्वन्तर रात्रिकाल हैं एक मन्वन्तर प्रातः संध्या में चला जाता है, एक सायं संध्या में अन्तर्भूत हो जाता है । इस प्रकार १४ मन्वन्तर अहः काल में, १४ मन्वन्तर रात्रिकाल में शेष रह जाते हैं । कहना यही है कि पूर्व प्रतिपादित हृदयस्थ मनु - तत्त्व ही उपाधि भेद से मन्वन्तर रूप में परिणत होता हुआ सृष्टिप्रलयसमष्टिरूप संसार चक्र का प्रवर्त्तक बन जाता है । मन्वन्तरों के इन्हीं ३० खण्डों का निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-" स ( मनुप्रजापतिः ) पञ्चदशाह्रो रूपाण्यपश्यत् श्रात्मनस्तन्वो मुहूर्त्ता लोकम्पृणाः । पञ्चदश वै रात्रेः तद्यन् मुहुस्त्रायंते तस्मान् मुहूर्त्ताः " ( शत ० १० | ४ | २ | १८ ) केन्द्रस्थ यही मनु भृगु श्रङ्गिरा - प्रत्रि - मरीचि - पुलस्त्य - पुलह - ऋतु - दक्ष - वसिष्ठ - विश्वामित्र, इन दस ऋषिप्राणों का प्रवर्त्तक बनता है । दूसरे शब्दों में मन उक्थ ( मूल बिम्ब ) है, १० प्राण इस मूल बिम्ब से निकलने वाले अर्क ( रश्मियाँ ) हैं । १० संख्यायुक्त होने से ही इस दर्शविप्राणसमष्टि को ( छन्दोविज्ञान परिभाषा के अनुसार ) विराट् कहा जाता है । इसी आधार पर " विराजमसृजत् प्रभुः " ( मनु ) यह कहा गया है । इस मनुप्रारण के अण्डज - पिण्डज - उमज - उद्भिज भेद से चार विवर्त्त हैं । एक ही मनु चार प्रकार की मानवी सृष्टि का प्रवर्त्तक बनता हुआ चतुर्धा विभक्त हो जाता है । इस प्रकार यद्यपि अण्डजादि चारों ही सृष्टिएँ मानवसृष्टि नाम से प्रसिद्ध होनी चाहिए थीं तथापि मनुष्य में बुद्धि के समन्वय से मनु - प्राण उत्कृष्ट बन जाता है, अतः मानवसृष्टि केवल पिण्डज सृष्टि को ही माना जाता है । इन्द्रगर्भित विवस्वान् की मनुग्रवस्था का यही संक्षिप्त निदर्शन है । [ १११ ]
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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् www वायु विभूति का निरूपण करते हुए हमने प्रान्तरिक्ष्य प्राङ्गिरस वायु को यम तत्त्व का स्वरूप समर्पक बतलाया था । वास्तव यम अग्निमूर्ति ( अङ्गिरामूर्ति ) ही है । केवल यम - मृत्यु निरुक्ति- आग्नेय वायु ही यमतत्त्व का उद्भावक नहीं है, अपितु जब यह श्राङ्गिरस वायु पूर्वोक्त विवस्वान्प्रादित्य के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है, तभी यम नाम से व्यवहृत होता है । दूसरे शब्दों में अग्निगर्भित विवस्वान् ही यम कहलाता है । यही कारण है कि इन्द्र-अग्नि - वरुण प्रारण के सम्बन्ध से निष्पन्न होने वाले मनु - यम - मृत्यु तीनों को वैवस्वत कहा जाता है । मनु - यम - मृत्यु तीनों तत्त्व परस्पर सर्वथा भिन्न हैं परन्तु विवस्वान् तीनों में अभिन्न है । प्रातः काल से सायंकाल पर्य्यन्त मनु - यम - मृत्यु इन तीनों देवताओं का क्रमशः भोग होता है । प्रातः सवन में मनु की प्रधानता है, माध्यंदिनसवन में यम का साम्राज्य है एवं सायं सवन में मृत्यु देवता का प्रभुत्व है । मुच्यु नाम से प्रसिद्ध वरुणगर्भित विवस्वान् ही " मृत्यु " है । जीवन - यात्रा के प्रवाह को सुरक्षित रखना, दूसरे शब्दों में आयु - सूत्र को अविच्छिन्न रखना मनु काही काम है । इसी आधार पर “ आयुर्वेमनुः " यह कहा जाता है । आयुसूत्र प्रवर्त्तक इस मनु की प्रतिष्ठा सूर्य्यं केन्द्र को बतलाया गया है । पुरुष के ब्रह्मरन्ध्र से प्रारम्भ कर सूर्य्य केन्द्र को स्पर्श करता हुआ एक नाड़ी मार्ग है । इसी नाड़ी मार्ग को उपनिषद् भाषा में महापथ कहा जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है-अणुः पन्था विततः पुराणो मां स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव । तेन धीरा पियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ १ ॥
तस्मिञ्छुक्लत नीलमाहुः पिंगलं हरितं लोहितं च ।
एष पन्था ब्रह्मण हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत् तैजसश्च ॥२ ॥
( वृ ० प्रा ० उ ० ६।३1८ - ९ ) । उक्त महापथ के द्वारा ही हृदय - स्थान से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र द्वारा सूर्य्यं केन्द्र तक आयुस्वरूप सम्पादक इन्द्रतत्त्व निरन्तर आया जाया करता है । जितना समय एक निमेष में लगता है, उतने समय में उक्त इन्द्रप्राण तीन बार सूर्य्य- केन्द्र में आता जाता है । महापथ के द्वारा जब तक यह आयु सूत्र अविच्छिन्न रूप से प्राता रहता है तभी तक जीवनसत्ता रहती है । उक्त जीवनयात्रा का स्तम्भन करना नियमनवृत्तिप्रधान यम देवता का अन्यतम कार्य है एवं आयुस्वरूपसमर्पक वैश्वानर अग्नि के अधिष्ठाता व्यान वायु की हृदयग्रन्थि को तोड़ना मृत्यु का अन्यतम कार्य है । जीवनप्रद व्यानवायु को हृदय प्रदेश से उखाड़ कर तदाधारेण प्रतिष्ठित प्राणापान व्यापार को छिन्न - भिन्न कर देता है । प्राण का रुक जाना ( दमघुट बन जाना ) यम का ही कार्य है । प्राण को शरीर के बाहर निकाल फेंकना मृत्यु का ही कार्य है । यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाय तो मनु - यम - मृत्यु काम में ही अन्तर्भाव मानना पड़ेगा । कारण स्पष्ट है । यम का स्वरूप परिचय कराती हुई श्रुति कहती है-[ ११२ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड १ २ ३ ६ ७ ८ १२ १३ ११ दशविध सोमविभूति परिचय-पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् ४ ५ १० & १४ [ ११३ ] अपेत वीत विच सर्पतातो येन पुराना ये च नूतनाः । प्रदाद् यमोऽवसानं पृथिव्या प्रतिमं पितरोलोकमस्मै । ( यजु ० १२।४५ ) । " क्षत्रं वै यमः विशाः पितरः । क्षत्रं यमो विशा........। पितृभिः संविदानोऽस्यामवसानं ददाति " ( शत ० ७ | १ | १ | ४ ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुतिप्रमाण के अनुसार यमराज को अवसान का अधिष्ठाता माना गया है । अवसान अवस्थान ( नीचा स्थान ) है । मनु- मृत्यु भी स्थान भेद से प्रवस्थानं के ही कारण बनते हैं । यही कारण है कि यम के अवस्थान भेद से निम्नलिखित १४ स्वरूप माने जाते हैं—
धर्मराजो - यमो - मृत्युः - सर्वभूतशयो - नाकः ।
कालो - वैवस्वतो - ब्रध्नः - परमेष्ठी - वृकोदरः ॥१ ॥
नील - श्रौदुम्बर - चित्र - चित्रगुप्त - इमे यमाः 1 अग्नौ सोमं हूयमानं ते नियच्छन्ति वायवः ॥ २ ॥
प्रकृत में इस प्रकरण से हमें केवल यही बतलाना है कि द्वादशादित्यान्तर्गत विवस्वान् नाम का आदित्य ही क्रमशः इन्द्र - अग्नि - वरुण के प्रवेश से मनु - यम - मृत्यु नाम से व्यवहृत होने लगता है । तीनों ही विवस्वान् के गर्भ में प्रविष्ट करने के कारण वैवस्वत नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार पृथिवी केन्द्र से निकल कर २१ ( एकविंशस्तोम ) पर्य्यन्त अग्नितत्त्व उपर्युक्त ३३ आग्नेय देवता, ३ वैवस्वत प्राण भेद भिन्न ३६ विभूतियों में परिणत हो जाता है । इसी आधार पर " अग्निः सर्वा देवता: " ( ऐत ० २।३ ) यह निगम वचन प्रतिष्ठित है । यह तो हुई प्राणाग्नि की विभूति, अब प्राणात्मिका सोमविभूति की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । अग्नि एवं सोम दोनों परस्पर अभिन्न मित्र हैं । सम्पूर्ण विश्व में ( दृश्य जगत् की अपेक्षा से ) केवल अग्नि - सोम का ही साम्राज्य है ( अग्नीषोमात्मकं जगत् ) जैसा कि पूर्व प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अग्नि-सोम के इसी मैत्रीभाव का दिग्दर्शन कराते हुए ऋषि कहते हैं-अग्निर्जागर तमृचः कामवन्ते अग्निजगार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागर तमयं सोम 1 ग्राह तवाहमस्मि सख्ये न्योका ॥ ( ऋक् ० ५।४४।१५ ) ।
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् ' " समानशील व्यसनेषुमैत्री " इस सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि अग्नि - सोम की मित्रता सम्भव नहीं है । कारण कि अग्नि, अन्नाद ( प्रन्नमत्तीति अन्नादः – अन्न खाने वाला ) होने से भोक्ता है एवं सोम अन्न ( अन्नाद ' अग्नि द्वारा खाए जाने वाला होने से - अग्निना प्रद्यते इत्यन्नम् ) भोग्य है । भोक्ता भोग्य में तो सामान्य दृष्टि से सहज वैर माना गया है, फिर इनमें मैत्री कैसी? इस प्रश्न के समाधान के लिए सहचर भाव-समानायतन - स्वरूप रक्षा ये तीन भाव ही सामने रखने पड़ेंगे । अग्नि बिना सोम के नहीं रह सकता । उधर सोम बिना अग्नि के प्रकाश में नहीं आ सकता, यही तीनों का सहचर भाव है । अग्नि एवं सोम दोनों ही मर्त्य अमृतभेद से दो प्रकार के हैं । इनमें से मर्त्य ( चित्य ) अग्नि, एवं मर्त्यं सोम से तो वस्तु पिण्ड का निर्माण होता है । अग्नि ऊष्म भाव है, सोम शीत भाव है । दोनों का समान समन्वय ही अनुष्णशीत भाव का प्रवर्तक है । फलतः प्रनुष्ण शीतपिण्ड में दोनों की समान मात्रा सिद्ध हो जाती है । दूसरे शब्दों में अनुष्ण शीत भूपिण्ड में दोनों का आयतन समान है । अमृत प्रति एवं अमृतसोम से पिण्ड महमा ( बहिर्मण्डल ) का निर्माण होता है । ३३ अहर्गण वाले इस बहिर्मंण्डल के प्रारम्भ के १६ अहर्गणों में अग्नि का साम्राज्य रहता है एवं १८ से ३३ तक ठीक अर्द्धमण्डल में सोम का प्रभुत्व है । इन दोनों मित्रों का समन्वय सत्रहवें ग्रहण पर होता है । यहीं अग्नि में सोम की प्राहुति होती है । इसीलिए " आहूयते यत्र सोम: " इस निर्वचन के अनुसार इस सत्रहवें स्थान को ग्राहवनीय कहा जाता है । अपने अभिन्न मित्र सोम के आगमन से अग्नि का बल बढ़ जाता है १७ तक व्याप्त रहने वाला अग्नि सोमाहुति से प्रज्ज्वलित हो कर २१ वें अहर्गण तक व्याप्त हो जाता है अतएव यज्ञस्वरूपसमर्पिका अग्नि की ३३ विभूतियों का ( ८ वसु - ११ रुद्र - १२ आदित्य - २ अश्विनी भेद भिन्न ३३ यज्ञिय देवताओं का ) २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त सम्बन्ध मान लिया जाता है । इस प्रकार उक्त तीनों भावों से दोनों का मैत्रीभाव सम्पन्न हो जाता है | यह सब कुछ ठीक है, सोम अग्नि का मित्र है अवश्य परन्तु अन्ततोगत्वा सोम अन्न है, भोग्य है । भोग्य मित्र भोक्ता मित्र का समकक्ष नहीं माना जा सकता । इसी स्वाभाविक स्थिति को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने " तवाहमस्मि सख्ये न्योका " ( हे अग्ने! मैं आपका नीचे दर्जे का मित्र हूँ ) यह कहा है । इन दोनों मित्रों में से क्रमप्राप्त सोमविभूति का निरूपण अपेक्षित है । सोमविभूति के पूर्ण स्वरूप परिचय के लिए तो एक स्वतन्त्र निबन्ध अपेक्षित है । ऐसी स्थिति में प्रकरण से समन्वय के लिए इस विभूति के नाममात्र जान लेना पर्याप्त होगा । ऋग्वेद के दसवें मण्डल में सोम का बड़ा विशद निरूपण हुआ है । वहाँ सोम को १० भागों में विभक्त माना गया है, दूसरे शब्दों में सोम की १० जातियाँ मानी गई हैं । वे सोम जातिएँ – १ – प्रश्ना, २ – असुर, ३ –आप्य, ४ – अन्न, ५ – भृगु, ६ – अङ्गिरा, ७ – सह ८ – ब्रह्मणस्पति, ε– रस, १० - - यज्ञिय इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इनकी आगे जा कर अवान्तर अनेक अवस्थाएँ हो जाती हैं । जैसा कि निम्नलिखित साधारण परिचय से पाठकों को विदित हो जाएगा । [ ११४ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www - प्रश्ना सोमः ( घनतालक्षणः - चतुविधः ) पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् घनता लक्षण यह प्रश्ना सोम ध्रुव - धर्म - धरुरण - धर्म्म भेद से चार भागों में विभक्त है । प्रस्तरादि में जो कठोरता ( निबिडावयवता ) देखी जाती है वह ध्रुव नाम के प्रश्ना- सोम का कार्य है । शीतर्तु में इसी सोम की प्रधानता रहती है, अतएव इस ऋतु में पानी तुषार ( बर्फ ) बन जाता है । अधिक शीत में इसी सोम से शरीरावयव ( अङ्गुल्यादि ) स्तब्ध हो जाते हैं । वह प्रश्ना सोम जो पदार्थों को तरल बना डालता है, धर्त्र नाम से प्रसिद्ध है । प्रकृति में जलादि का, शरीर में असृगादि ( रुधिरादि ) तरल धातुयों का स्वरूप समर्पक यही धर्त्र सोम है । यह प्रश्ना सोम जो पदार्थों को विरलावस्था ( वाष्पावस्था ) में परिणत कर डालता है धरुण नाम से प्रसिद्ध है । प्रकृति में वायु आदि, अध्यात्म में श्वास प्रश्वासादि का अधिष्ठाता यही धरुण सोम है । इसी प्रश्ना सोम की चौथी अवस्था धर्म है । गुणतत्त्व ही धर्मं हैं | ये पदार्थों के आश्रित धर्मं हैं । इस प्रकार अवस्था भेद से एक ही प्रश्ना सोम चार भागों में विभक्त हो जाता है— १- प्रश्ना-१ – ध्रुवः काठिन्यजन्य प्रश्ना, काष्ठं, अस्थि, मांसम् । २ — धर्त्रः—— → तरलता जनकः प्रापः घृतं तैलं, मेदः, असृक् । ३ – धरुणः -- विरलता जनकः वायुः, तेजः, श्वासः, प्रश्वासः । ( ४- धर्मः + गुणकर्म योजकः शब्दः, अर्थः, रूपं रसः, गन्धः । २ - असुर सोमः ( विष्टम्भनलक्षणः - ९९ नवतिनव विधः ) पदार्थों का स्तम्भन कर तद्गत भावों का अन्य भावों के आगमन के साथ निरोध करने वाला, स्तम्भनवृत्ति का अधिष्ठाता सोमविशेष ही असुर नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रसुरसोम की ६६ अवस्थाएँ हो जाती हैं जिनका कि विशद निरूपण सृष्टिविज्ञान - ब्रह्मविज्ञान आदि में द्रष्टव्य है । इनमें वृत्र नमुचि-बल नाम के तीन असुर मुख्य माने जाते हैं । इन तीनों में ही ६६ अवस्थायों का अन्तर्भाव है । वृत्र नमुचि-बल तीनों की ( प्रत्येक की ) ३३ अवस्थाएँ हो जाती हैं । आवरण करना वृत्र का कार्य है अतएव " सर्वं-वृत्व शिष्ये ” ( शत. १।१।३।४ ) इस ब्राह्मणोक्त निर्वचन के अनुसार वृत्र कहा जाता है । रात्रि का अन्धकार चन्द्रग्रहण, सूर्य्यग्रहण यह सब स्वर्भानु सैंडिकेय नाम से प्रसिद्ध चांद्रवृत्र एवं पार्थिव वृत्र का ही कार्य है । दूसरा है नमुचि । अवरोध करना इस असुर का मुख्य कार्य है | बद्दलों में पानी भरा रहता है परन्तु इस नमुचि - प्राण के प्रवेश से रहता हुआ भी पानी भू - पृष्ठ पर नहीं गिरने पाता अतएव " न मुञ्चति " ( यजु ० ( १६।३४ ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार नमुचि नाम से व्यवहृत किया जाता है । इन्द्र - प्राण के प्राघात से पानी में फेन उत्पन्न हो जाता है । इसी फेनात्मक क्षोभ से नमुचि - प्राण प्रतिमूच्छित हो जाता है, पानी गिर पड़ता है ( शत ० १ | १ | ३ | ४ ) | तीसरा है बलासुर । सौर - वान्द्र- प्राग्नेय आदि तेजस्वी पदार्थों में से [ ११५ ]