Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 91–100

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 91–100

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् स्थिति में साधारण मनुष्यों को यद्यपि उक्त निगम ( वेद ) आगम ( पुराण ) सिद्धान्तों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है, परन्तु वैज्ञानिकों की दृष्टि में अणुमात्र भी विरोध का अवसर नहीं है । अग्नि - सोम का समन्वय यज्ञ है । यज्ञसंयुक्त इन्द्र ही शिव किंवा महेश है । रुद्र - तत्त्व का जब भी हम साक्षात्कार करेंगे, हमें उसके साथ इन्द्र - सोम का सम्बन्ध मिलेगा । इन्द्र से सूर्य्य उपलक्षित है । सोम चन्द्रमा का द्योतक है, स्वयं रुद्र अग्नि है । विश्व को प्रकाशित करने वाली ये तीन ( अग्नि- चन्द्र - सूर्य किंवा अग्नि - सोम - इन्द्र ) ज्योतिएँ हैं । ये ही लोकसाक्षी, दूसरे शब्दों में लोकद्रष्टा हैं । अग्नि - सोम - इन्द्रात्मक शिव के ये ही त्रिनेत्र हैं । श्रुति शिवतत्त्व का पृथक् - पृथक् कला - विभाग बतलाती हुई इन्द्र - अग्नि - सोम तीनों का पृथक् निर्देश करती है, एवं पुराण तीनों की समष्टि का निरूपण करता हुआ तीनों को शिव शब्द से व्यवहृत करता है । इस प्रकार दोनों के सिद्धान्तों में कोई विरोध नहीं रहता । रुद्र - प्राण के सम्बन्ध से ही पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - समष्टि रूपा त्रिलोकी " रोदसी " कहलाती है । इसी आधार पर रोदसी को " रुद्रपत्नी " कहा जाता है । रोदसी त्रिलोकी में व्याप्त घन भावों को, अवरुद्ध भावों को, तरल भावापन्न रुद्राग्नि द्रुत किया करता है, अतएव यह तत्त्व रुद्र कहलाता है, जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में बतलाया जा चुका है । जितने भी पार्थिव पशु हैं सबका आत्मा वायु तत्त्व ही है । आरण्य - ग्राम्य दोनों पशु वायव्य हैं । यही कारण है कि पशु से भी अधिक मात्रा में चेतना रखने वाला मनुष्य उत्पन्न होने के पश्चात् एक संवत्सर पर्यन्त स्व प्रतिष्ठा से खड़ा नहीं हो सकता । कारण इसमें पार्थिव घनाग्नि की प्रधानता है । परन्तु एक गोवत्स उत्पन्न होते ही कूदने - फांदने लगता है । यह उसी वायव्य तत्त्व के अनुग्रह का फल है । पशुत्रों के इसी वायव्य को लक्ष्य में रख कर " इथे त्वोर्जे वा वायवस्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्र ेष्ठतमाय कर्मणे " यह कहा जाता । इधर रुद्र - तत्त्व वायुप्रधान है । वायव्य पशुओं का निग्रहानुग्रह रुद्र पर ही निर्भर है, अतएव रुद्र भगवान् " पशुपति " नाम से प्रसिद्ध हैं । पार्थिव प्राणाग्नि की प्रपान समान भेद से दो अवस्थाएं हैं । सौर प्रारण की प्राण उदान ये दो अवस्थाएँ हैं । हृदय से ऊपर इन दोनों का साम्राज्य है, हृदय से नीचे पार्थिव - प्राण का प्रभुत्व है । इन चारों को गति - प्रगतिशील बनाते हुए इनकी स्वरूप- रक्षा करना हृदयस्थ व्यान का कार्य है । यह व्यान - वायु अन्तरिक्ष्य होने से साक्षात् रुद्र है । कर्म्मचतुष्टयी ( प्राण उदान प्रपान - समान व्यापार के ) प्रेरक होने से रुद्र को चतुर्हस्त कहा जाता है । हस्त कर्म्म का निदान है । वरुण प्रधान दूषित प्राप्य प्राण को नष्ट करने के कारण ही रुद्र देवता " शूलपाणि " " शूलहस्त " " पशु हस्त " इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है | विधिवत् श्राराधना करने से यही उग्रमूर्ति रुद्र शिव स्वरूप में परिणत हो कर, सम्पूर्ण आपत्तियों को दूर कर पीड़ित उपासक की रक्षा करते हैं, अतएव इन्हें अभय हस्त कहा जाता है । स्वस्थ उपासकों का अभ्युदय, श्री वृद्धि करने के कारण इन्हें वरहस्त कहा गया है । इन कुछ एक स्थूल धर्मों के अतिरिक्त रुद्र देवता के कई एक ऐसे सूक्ष्म कर्म हैं जिनका साक्षात्कार हमारी स्थूल बुद्धि नहीं कर सकती । वे सब सूक्ष्म धर्म्म हम साधारण मनुष्यों के लिए मृग्य ( खोजने योग्य ) हैं । इन मृग्य भावों के दर्शक होने से, दूसरे शब्दों में गुहानिहित ( गुह्य ) मृग्य कार्यो के पवर्त्तक होने से, इन्हें " मृगहस्त " कहा जाता है । इस १ २ ३ ४ ५ रुद्र देवता का विकास अधियज्ञ - अधिभूत - अध्यात्म - श्रधिदैवत- प्रध्यन्तरिक्ष इन पाँच स्थानों में होता है । [ ८६ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं www पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् रुद्र - विकास के पाँच रुख हैं, इसी आधार पर इन्हें " पञ्च वक्त्र " नाम से व्यवहृत किया जाता है । अग्नि-चन्द्र - सूर्य्यं इन तीन ज्योतियों के कारण यह " त्रिनेत्र " नाम से प्रसिद्ध है । सर्पणधर्म्मा वायु ही इनका प्रातिविक भूषण है । निम्नलिखित तालिका से रुद्र देवता के पाँचों विवर्त्तो का स्वरूप स्पष्ट हो जा है । अश्वत्थ नाम से प्रसिद्ध द्य - वृक्ष के नीचे रोदसी त्रैलोक्य है । रोदसी त्रैलोक्य भूत - प्रधान है । यहीं भूतपति विराजमान है, जैसा कि पूर्व प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जा चुका हैं । १ २ ४ ५ ३ १ कृशानुः पृथिवीमूर्तिः शिवः श्रोत्रम् श्रोत्रम् विरूपाक्षः अभ्राजमानः ( ग्राहवनीयाग्निः ) २ प्रवाहणः जलमूर्त्तिः शिवः श्रोत्रम् | त्वक् रैवतः व्यवदातः ( धिष्ण्याग्निः ) ३ दुवस्वान् तेजोमूर्तिः शिवः चक्षुः चक्षुः हरः वासुकिः ( धिष्ण्याग्निः ) ४ बम्भार: वायुमूर्त्तिः शिवः चक्षुः जिह्वा बहुरूपः वैद्य ुतः ( धिष्ण्याग्निः ) ५ कविः आकाशमूत्तिः शिवः प्राणः घ्राणम् त्र्यम्बकः रजतः ( धिष्ण्याग्निः ) विश्ववेदाः सूर्य्यमूत्तिः शिवः प्राणः वाक् भूतेशः परुषः ( धिष्ण्याग्निः ) हव्यवाहनः ( धिष्ण्याग्निः ) चन्द्रमूर्त्तिः शिवः वाक् पाणी जयन्तः श्यामः द प्रचेताः विद्यन्मूत्तिः शिवः | उपस्थम् पादौ पिनाकी कपिल: ( धिष्ण्याग्निः ) मार्जालीयः पवमानः घोरः पायुः. उपस्थम् | अपराजितः अलोहितः ( धिष्ण्याग्निः ) १० ग्रज एकपात् पावकः घोरः नाभिः पायुः अजएकपात् ऊर्ध्वः ( नूतन गार्हपत्यः ) ११ शुचि: घोरः आत्मा आत्मा अवपतनः अवपतनः 1 ( पुराणगार्हः ) इत्यध्यन्तरिक्ष इत्यधियज्ञमुखाः इत्यधिभूतमुखाः इत्यध्यात्ममुखाः इत्यधिदैवतमुखाः १ २ ३ ४ मुखाः ५ [ ६७ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् भू - केन्द्र से आरम्भ कर त्रिवृत्स्तोय पर्य्यन्त घनाग्नि की सत्ता है, पञ्चदशस्तोम पर्यन्त तरलाग्नि ( वायु ) का साम्राज्य है, एवं एकविंशस्तोम पर्य्यन्त विरलाग्नि आदित्य विभूति स्वरूप परिचय - ( आदित्य ) व्याप्त हैं । विरलावस्थापन पार्थिव अग्नि ही प्रदिति के सम्बन्ध से आदित्य नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । पृथिवी का भाग जो सूर्य की ओर रहता हैं, अदिति नाम से प्रसिद्ध है । विरुद्धभाव दिति नाम से व्यवहृत हुआ है जैसा कि " प्राणाम्म विज्ञानोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अदिति के सम्बन्ध से विरलाग्नि को प्रकृत में आदित्य बतलाया गया है । इस सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । भू - पृष्ठ से प्रारम्भ कर एकविशस्तोमपर्यन्त प्रदिति का साम्राज्य है । उक्त तीनों ही अग्नि इस अदिति के गर्भ में प्रविष्ट हैं । ऐसी अवस्था में घन - तरल - विरल तीनों ही अग्नियों को आदित्य शब्द से व्यवहृत करना चाहिए । ऐसा न कर केवल विरलाग्नि को ही प्रादित्य शब्द से क्यों व्यवहृत किया गया? इस प्रश्न के सम्बन्ध में हम यही कहेंगे कि अदिति का प्रदितिपना सौर - प्रकाश पर निर्भर है । सौरतत्त्व ही आदित्य है । इसी कव्याप्ति के कारण सूर्य्यं सम्मुख रहने वाला पार्थिव श्रर्द्धमण्डल " अदिति " कहलाता है । यद्यपि घनाग्नि-तरलाग्नि दोनों में भी इस सौर आदित्य प्रकाश की सत्ता है परन्तु प्रधानता इसकी विरलाग्नि मण्डल में हीं है । कारण " एकविंशो वा इत श्रादित्यः " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी के २२ वें अहर्गण पर सूर्य रूप आदित्य हैं, उधर १५ से २१ पय्यन्त विरलाग्नि का प्रभुत्व है । इसी सान्निध्य के कारण घनाग्नि एवं तराग्नि को आदित्य शब्द से व्यवहृत न कर केवल विरलाग्नि को ही आदित्य कहा जाता है । अग्निवायुवत् विरलावस्था के तारतम्य से इस आदित्य के भी अवान्तर २२ भेद हो जाते हैं । उसका मुख्य कारण है - जगतीछन्द | आदित्य जगतीछन्द से वेष्टित रहता है । जगतीछन्द १२ अक्षर का है । द्वादशाक्षर जगती छन्द के १२ अक्षरों के कारण ही आदित्य को १२ प्रवस्थानों में परिणत होना पड़ता हैं । आदित्य की वे द्वादश अवस्थाएँ निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ इन्द्रो - धाता - भगः - पूषा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा । ह १० ११ १२ विवस्वान्- त्वष्टा च सविता विष्णुरेव च ॥ सौर - प्राण १२ महीनों में विभक्त रहता है । मासावच्छिन्नप्रारण एक आदित्य है । इस प्रकार द्वादश-मास के द्वादशादित्य हो जाते हैं । मासावच्छिन्न सौर रश्मिएँ पार्थिव रसों का प्रदान करती हुईं ( रसों का शोषण करती हुई— लेती हुई ) प्राणदपानत् व्यापार से आगे चलती हैं, इसलिए भी रश्म्यवच्छिन्नमासा-इन सौर प्रारणों को प्रादित्य शब्द से व्यवहृत किया जाता है । ( देखिए वृ ० प्रा ० उ ० ३।६।५ ) । चन्द्र - कक्षा दक्ष नाम से प्रसिद्ध है । चान्द्रसोम ही पार्थिव प्रजा का उपादान है, अतएव चान्द्र सोममय दक्षमण्डल को दक्ष प्रजापति कहा जाता है । प्रादित्य सम्बन्ध से इस दक्ष कक्षा के १२ विभाग हो जाते हैं । आदित्य - प्राण कूर्म्म प्राण में परिणत होकर ही सृष्टि का प्रवर्तक बनता है— [ ८८ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwww पितृणांपितरविज्ञानोपनिषत् wwwwww ww " एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत प्रकरोत् तत्, यदकरोत् तस्मात् कूर्म्मः ” । ( शतपथ ७।५।१।५ ) कूर्म्म ही त्रैलोक्य का द्रष्टा होने से, पश्यक होने से परोक्ष भाषा में कश्यप नाम से प्रसिद्ध है । द्वादशप्राणमूर्ति ( यदि मलिम्लुच नाम से प्रसिद्ध अधिकमास का भी ग्रहण कर लिया जाता है तो त्रयोदश-प्राणमूर्ति ) कश्यप प्रजापति के सम्बन्ध से दक्षवृत के १२ अथवा १३ विभाग हो जाते हैं । दाक्षायणी नाम से प्रसिद्ध ये ही कश्यप की पत्लिएँ हैं । दक्षवृत्त सोमप्रधान होने से योषा ( स्त्री ) है । आग्नेय - प्राण प्रधान कश्यप वृषा ( पुरुष ) है । दोनों के मिथुन से ही सब कुछ उत्पन्न होता है, एवं हुआ है । " कश्यपात् सकलं जगत् ” “ सर्वाः प्रजाः काश्यपः " इत्यादि वचन प्रसिद्ध हैं । सर्प - देवता - पशु - पक्षि- मनुष्य - दैत्य आदि सब इसी कश्यप से उत्पन्न हुए हैं । रेतोधा कश्यप पिता एक योनिरूप प्रारण केंद्र - विनता - दिति प्रदिति-दनु - काला -संज्ञा यादि भेद से भिन्न भिन्न हैं । अस्तु इस व्याख्यान को विस्तृत करना अप्राकृत होगा । यहाँ केवल यही बतलाना है कि अग्नि की विरलावस्था ही आदित्य है । समष्ट्यात्मक एक आदित्यं क्षत्र है । इसे इन्द्र नाम से व्यवहृत किया जाता है । इस क्षत्र आदित्य की अवान्तर अवस्थाएँ ही १२ आदित्य हैं । ये विट् रूप हैं । द्वादशधा विभक्त प्राङ्गिरस पार्थिव आदित्य - विभूति का यही संक्षिप्त निदर्शन है । विरलावस्थापन्नः—– दिव्याग्निरादित्यः – एकविंशस्थानीयः I क्ष fa I १ इन्द्रः २ धाता ४ ३ भगः पूषा मित्रः ६ वरुणः अयमाः अंशुः विवस्वान् १० त्वष्टा ११ सविता १२ विष्णु: → त्रम् शः + [ 58 ]. प्रदित्याः -द्वादश

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड I wwwwwwwww पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् इस प्रकार भू - गर्भ से निकल कर एकविंशस्तोम स्थानीय द्य पृष्ठपर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला एक ही अग्निदेव प्रथम- प्रथम घन - तरल - विरल प्रवस्था - भेद से अग्नि - वायु - इन्द्र इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है, एवं आगे जा कर घन - तरलादि अवस्थाओं के अवान्तर तारतम्य से तीन के ३१ देवता ( ८ वसु-११- रुद्र - १२ - प्रादित्य ) हो जाते हैं । द्यावा - पृथिवी के सम्बन्ध से ३३ हो जाते हैं । यदि इनकी अवान्तर महिमा की गणना की जाती है तो देवता असंख्य हैं । वस्तुतः " श्रग्निः सर्वा देवताः " यही फलितार्थ है - " अग्नि पुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् । " इन ३१ देवताओं के उपक्रम में भू है, उपसंहार में द्यी है । मध्य के ३१ देवताओं में से अग्नि पहिला है । विष्णु सब के अन्त में है जो सबसे बड़ा होता है, विज्ञान-दृष्टि से वही सबसे छोटा है । " जो सबसे छोटा होता है, वही सबसे बड़ा माना जाता है " इस विज्ञान सिद्धान्त के अनुसार ३१ के आदि में रहने वाले अग्नि देव सबसे प्रवम होते हुए भी अग्रगामी ( श्रेष्ठ-महान ) कहलाते हैं, एवं सर्वान्त में रहने वाले सबसे परम ( बड़े ) होते हुए भी विष्णु देव वामन ( छोटे-बौने ) कहलाते हैं । इस छोर में अग्नि है, उस छोर में विष्णु है । मध्य में सब देवता हैं । यहसंवत्सर रूप ज्योतिष्टोम यज्ञ है । अतएव ज्योतिष्टोम की दीक्षा के लिए दीक्षणएष्टि करता हुआ यजमान प्राग्नावैष्णवएकादशकपालपुरोडाश का निर्वाण करता है । इसी आधार पर श्रुति कहती है-" ग्रपः प्रणीय - श्राग्ना वैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपति । अग्निव सर्वा देवताः । श्रग्नौ ही सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति । श्रग्निवें यज्ञस्यावराय विष्णुः परार्ध्यः । तत् सर्वाश्चैवैतद्देवताः परिगृह्य, सर्वं च यज्ञं परिगृह्य दक्षा इति । तस्मादाग्नावैष्णव एकादशकपालः पुरोडाशो भवति " । ( शत ० ३।३।१ ) " अग्नि देवानामवम विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः ” । ( ऐ ० ब्रा ० १।१ ) प्रसङ्गागत पूर्वोक्त द्वादश प्राणों कीविभिन्न शक्तियों का जान लेना भी आवश्यक होगा । उन १२ शक्तियों का स्वरूप ही पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है । * एक बार किसी भारतीय विद्वान् ने पश्चिमी विद्वानों की पद्धति का अनुकरण करते हुए उक्त श्रुति का अर्थ करते हुए लिखा था कि " किसी समय भारतवर्ष में अग्निपूजा का महत्त्व कम हो गया था, एवं विष्णु ही सबसे प्रधान देवता माने जाने लगे थे । उस स्थिति को लक्ष्य में रख कर ऐतरेय ने अग्नि को श्रम ( छोटा ) विष्णु को परम ( बड़ा ) देवता बतलाया है । " यह है आजकल के वेदज्ञों का अन्वेषण, पाठक विचार करें, क्या यह उच्छिष्टभोग कभी हमें वेदार्थ के ' वास्तविक दृष्टिकोण से परिचित करा सकेगा? [ 80 ]

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विज्ञान द्वितीय खण्ड विष्णु: पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् ३ ९ ३० 2 RT | ११ सविता विवस्वान त्वष्य अशुः स्कीपस्तीमा २१ २६ अ ...... LIE 26 16 अर्थमा ६ वरुणाः II. मित्रा २३ ४ बूबा २३ १३ भगा II I धाता 2.9 ११ ' विरुपाक्षः १८ १८ ई हर ८ बहुरूपः आदित्यः : H यसवःपृ देवा सर्वे ३३-एकादशा 16212 दी आदित्याः !! परन्तप च न रूड़ा --आदित्या प्रज्ञादिम देवस्य जतिरे अदित्यां पभू 13 16 चम्बकः ६ भूवेश: 14 जयन्तः दिनाजी 3 अपराजितः २ १ अदपतः : I ढ X 2 ५ मास! 3 अभिः 12 घरट १ अनमः अवरिष पञ्चयवास्तोष : १५ 93 . १३. वायुः छवी ओना दितिः [ १ ] त्या दिवि

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् १ – इन्द्रः हमारे शरीर में जो एक प्रकार के सहोबल का सञ्चार हो रहा है, जिस बल के आधार पर हम कठिन से कठिन कार्य का भार उठाने का साहस कर बैठते हैं, जिस सहोबल के प्रभाव से हमारे शरीर में एक प्रकार की स्फूर्ति रहती है, जो सहोबल शरीर को तना हुआ रखता है, वही बल किंवा शक्ति ' इन्द्र-शचि ' है । जिस शक्ति के आधार पर ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों का सञ्चार होता है, जिस शक्ति के आधार पर हम अन्य व्यक्तियों पर शासन करने में समर्थ होते हैं वही ' इन्द्र ' है । जिस शक्ति से शारीर रसासृक्-मांसादि धातुत्रों का सञ्चार होता है, दूसरे शब्दों में शरीर में जो गति - भाव रहता है वह इसी इन्द्र - प्राण की महिमा है । जिस शक्ति के आधार पर शरीराग्निः उरः स्थान- कण्ठ स्थान - शीर्षस्थान से टकरा कर क्रमशः श्रनुदात्त - स्वरित उदात्त स्वरों से युक्त होता हुआ क - च - ट - त - प आदि रूपा वर्णवाक् में परिणत होता है, वह यही इन्द्र है । जिस शक्ति के प्रभाव से प्रज्ञानमन में एक प्रकार का चाञ्चल्य रहता है, वह विद्यन्मूर्ति यही इन्द्र है । जिस शक्ति से विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) गुहा निहित सुसूक्ष्म विषयों में प्रविष्ट होता है, वह यही मघवा इन्द्र है । जिस शक्ति के प्रसार से चक्षुरिन्द्रिय रूप - दर्शन में समर्थ होता है, " रूपंरूपं-मघवा बोभवीति ” “ इन्द्रो रूपारिण करिकृदचरत् " इत्यादि के अनुसार वह शक्ति यही मघवेन्द्र है । अधिदैवत मण्डल में हम जो विद्य ुत प्रकाश देखते हैं एवं सूर्य्यचन्द्रमादि में जो प्रकाश देखते हैं वह सब इन्द्र का ही कर्म है । पर्जन्य की सहायता से वृष्ट्यवरोधक नमुचि - प्रारण को श्लथ कर वृष्टि करना इसी इन्द्र - प्राण का काम है । भौतिक पदार्थों में रहने वाले वारुण दूषित भावों को नष्ट करना वायुग़त, अतएव मरुत्वान् नाम में प्रसिद्ध इसी इन्द्र का काम है । तत्तत् कर्म्मभेद से ही इस इन्द्र * की चौदह अवस्थाएँ हो जाती हैं । इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व में प्रधिदैवत - अध्यात्म - प्रधिदैवत तीनों प्रपञ्चों में जो एक बलप्रद शक्ति उपलब्ध होती है, जिसकी सत्ता से तत्तत् पदार्थ स्वस्वरूप में सुरक्षित में समर्थ होते हैं, वह बलतत्त्व ही इन्द्र है । इसी विज्ञान के आधार पर इन्द्रतत्त्व का सामान्य लक्षण करते हुए यास्काचार्य कहते हैं— " या च का च बलकृतिरिन्द्रकम्मैवतत् " ( निरुक्त ७।३ ) इन्द्र के उपर्युक्त स्वरूप धम्मों का प्रतिपादन करते हुए ही निम्नलिखित श्रीतवचन सामने आते हैं— १ – “ इन्द्रो बलं बलपतिः " ( शत ० ११ | ४ | ३ | १२ ) । २ – “ इन्द्रो मे बले श्रितः " ( तै ० ब्रा ० ३।१०।८।८ ) । ३ – “ वीर्य्यं वा इन्द्रः ” ( तां ० ब्रा ० ६।७।५।८ ) । ४— “ इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः सहिष्ठः सत्तमः पारयिष्णुतमः " ( ऐ ० ब्रा ० ७।१६ ) । * इन चौदह इन्द्रों का विशद वैज्ञानिक विवेचन " ब्रह्मविज्ञान " नाम के ग्रन्थ में द्रष्टव्य है । [ ६२ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwww ~ - " इन्द्रौजसांपते " ( तै ० ब्रा ० ३।११।४।१ ) । ५. 66 ७ - " अथ य इन्द्रस्सा वाक् " ( जै ० उ ० ब्रा ० १ । ३३ । २ ) । - " यन्मनः स इन्द्रः " ( गो ० ब्रा ० उ ० ४।११ ) । ८ - " क्षत्रं वा इन्द्रः ” ( कौ ० १२।८ ) । - " स्तनयित्नुरेवेन्द्रः " ( शत ० ११।६।३। ) । १० - " यदमिन्द्र इन्द्रियं दधातु " ( शत ० १।८।१।४२ ) । ---पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् www २-- धाता प्रत्येक पदार्थ में एक प्रकार की प्रतिष्ठा ( स्थिति ठहराव ) देखी जाती है । यदि पदार्थ में से यह प्रतिष्ठातत्त्व निकल जाता है तो वह कम्पित हो जाता है । इस प्रतिष्ठा - तत्त्व का स्वरूप निर्माण वषट्कार से होता है । प्रत्येक पदार्थ पिण्ड के केन्द्र से निकल कर ४८ स्तोमपर्यन्त अपना महिमामण्डल बनाने वाला वाङ्मण्डल ही त्रिवृत्पञ्चदशादि ६ वाक्स्तोमों के कारण " वषट्कार " नाम से व्यवहृत हुआ है । " देवपात्रं वा एष वषट्कारः " के अनुसार यही वषट्कार उस वस्तु का पात्ररूप आलम्बन है । " तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् " इस शतपथवचन के अनुसार वषट्कार वाङ्मय बनता हुआ प्राणाग्निमय है । यही प्रतिष्ठा तत्त्व है, वस्तु को धारण करने वाला धाता है । पञ्चप्रकृतिविज्ञान के अनुसार सूर्य्यवाक् प्रकृति स्थानीय है । सूर्य्यं का यह वाक् भाग किंवा प्राणाग्नि ही वषट्कार का स्वरूप सम्पादक बनता है । सूर्य का वह वाङ्मयप्रारण जो कि वषट्कार का स्वरूपसम्पादक बनता हुआ पदार्थ को धारण करने वाली प्रतिष्ठा बनता है, वही " धाता " है । इसी धाता का स्वरूप धर्म बतलाते हुए निम्नलिखित निगम श्रुतिएँ हमारे सामने आती हैं-१ – “ देवपात्रं वाऽएष यद्वषटकार: " ( शत ० १।७।२।१३ ) । २ - एष वै वषट्कारो य एष तपति " ( शत ० १।७।२।११ ) । ३ – “ यः सूर्य्यः स धाता, स उ एव वषट्कारः " ( ऐतं ० ब्रा ० ३ श ४८ ) । ४– “- " प्राणो वै वषट्कारः ” ( ऐ ० ब्रा ० ३।४७ ) । ५ – “ यो धाता स वषट्कारः " ( ऐ ० ब्रा ० ३।४७ ) । ६ – “ अग्निर्वे धाता ” ( तै ० ना ० ३।३।१०।२ ) । [ ६३

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www wwwwwwwwww पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् m M ७ – “ यत् ( प्रजापतिर्विक्षु पतिष्ठायेदं सर्वं ) - दधत् - विदधत् प्रतिष्ठत् तस्माद्धाता ” ( शत ० ६।५।१।३५ ) । ८ – “ स यः स धाता असौ स श्रादित्यः " ९ - " संवत्सरो वै धाता " ( तै ० ग्रा ० १७१२।१ ) । १० – “ बाक् संवत्सरः ” ( तां ० १०।१२।७ ) । ( शत ० ६।५।१।३७ ) । -३-- भगः प्रत्येक पदार्थ में एक प्रकार की श्री ( शोभा विकास ) देखी जाती है । वृक्षों का सौंदर्य देखिए शाखा प्रशाखा - पत्र आदि अवयवों का विन्यास देखिए, चतुर शिल्पी के हाथ चूमने की इच्छा होती है । उत्पन्न शिशु का मुग्ध भाव देखिए, चन्द्रमा की चन्द्रिका निहारिए, रत्नों में आभा देखिए, रसों में उद्गीथ देखिए, वेदों में साम देखिए, सर्वत्र अपेक्षया आप किसी न किसी प्रकार के सौंदर्य ( श्री भाव ) का अवलोकन करेंगे । तत्तत् पदार्थों में प्रातिश्विक रूप से रहने वाला यह श्री भाव ही तत्तत् वस्तु का एश्वर्य है । १२ ग्रादित्य प्राणों में से जो प्राण ऐश्वर्य प्रदाता है वही विज्ञान भाषा में " भग " नाम से प्रसिद्ध है । " श्री " इस भाग का स्वरूप धर्म है । यदि श्रीप्रवर्तक भग की अवान्तर अवस्थाओं का विचार किया १ २ ३ ४ ५ ६ जाता है तो इसके ऐश्वर्य - धर्म - यश - श्री - ज्ञान - वैराग्य ये ६ विवर्त हो जाते हैं । पत्नी - सन्तान - भोग्य अन्न - वस्त्र- अनुचर - पशु - क्षेत्र - प्रासादादि द्रव्य बहिवित्त ऐश्वर्य है । नित्यसिद्ध प्राकृतिक नियम- संघ धर्मी को स्वस्वरूप में धारण करने के कारण धर्म है । सर्वत्र गुणख्याति यश है । शरीर शोभा श्री है । सदसद्विवेक ज्ञान है । विषयों का अनासक्तिपूर्वक भोग वैराग्य है । भग की इन्हीं छात्रों अवस्थाओंों का दिग्दर्शन कराते हुए अभियुक्त कहते हैं-ऐश्वर्यस्य च समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणः || जिस व्यक्ति में उक्त छत्रों भगों का पूर्ण विकास रहता है, नर - देहवारी वह पुरुष श्रेष्ठ ही " भगवान् " कहलाता है । इसी अभिप्राय से प्राप्तपुरुष कहते हैं कि " वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति । इस भग - प्राण को कोश ( खजाना ) उत्तरफल्गुनी नक्षत्र माना गया है । इस नक्षत्र पर दृष्टि-निक्षेप करने से भगप्राण श्रात्मसात् हो जाता है । ऐश्वर्य की वृद्धि होती है ( द्रष्टव्य तै. ब्रा. १।१।२।४ ) । [ ६४ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwwwwww पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् निष्कर्ष यही हुआ कि सांसारिक वैभव, किंवा ऐश्वर्य जिस सौर प्रारण से सम्पन्न होता है वही भग है । अनासक्तिभाव में जो भग ( सांसारिक वैभव ) भगवत् सम्पत्ति का कारण बनता है प्रासक्तिभाव में वही भग श्रात्मज्योति को तिरोहित कर देता है । भग की छत्रों कलाओं में से आत्मा को आवृत करनेवाली प्रधान कला ऐश्वर्य ही है । इसी प्रावरण सम्बन्ध से भग देवता को अन्ध कहा जाता है । भग के इन्हीं स्वरूप धर्मों को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-- " तस्य चक्षुः परापतत् तस्मादाहुरन्धो वै भग इति " ( कौ. ब्रा. ६।१३ ) । २. - " भगस्य वा एतन्नक्षत्रं यदुत्तरे फल्गुनी " - ** -( तै. ब्रा. १ | १ | २ | ४ ) । ४- पूषा ज्ञान क्रिया - प्रर्थ - शक्तिधनसूर्य्यं अपने प्रवर्ग्य भाग से रोदसी त्रिलोकी में रहने वाली प्रजा के ज्ञान - क्रिया अर्थ भावों का उत्पत्ति - स्थिति - लयस्थान है । सौरमण्डल से उक्त तीनों शक्तिएँ पार्थिव प्रजा में समष्टि रूप से आती हैं । समष्टिरूप में आने वाले इस सौर - प्रवग्यन्ति को ( ज्ञान - क्रिया - अर्थों को ) सत्तत् पदार्थों में वैयक्तिक रूप से विभाजित करने वाला सौर प्रारण विशेष ही " पूषा " है । इसी आधार पर पूषा को " भाग धुक् " कहा जाता है । वह सौर आदित्य ( सौरप्राण ) जो पार्थिव भूतों का क्रिया का, ज्ञान का अनुग्राहक बनता हुआ पदार्थों के भूत- किवा - ज्ञान भावों को ( सौरभूत - क्रिया - ज्ञान भावों के प्रदान से ) पुष्ट करता है, " पुष्णाति सर्व " इस निर्वाचन के अनुसार " पूषः " नाम से व्यवहृत हुआ है | ज्ञान- क्रिया - प्रर्थ तीनों में पुष्टि का विशेष सम्बन्ध प्रर्थ ( भूत ) के साथ ही माना गया है । भूत - भाग को अनात्म्य होने से एवं दृष्टिपथ में आने से " पशु " कहा जाता है ' यदपश्यत् तस्मात् पशुः ' ( शत ० ६ ) । " इसी आधार पर पूषा - प्राण को पशुओं का भी अधिष्ठाता बतलाया जाता है । पशु - भाव के प्रवर्त्तक इस पूषा - प्रारण के सौर - नाक्षत्रिक - पार्थिव भेद से तीन विवर्त्त हैं । सौर पूषा " भाग धुक् " बनता हुआ भूतभाग का मूल जनक है, नाक्षत्रिक पूषा तत्त्व रेवती नक्षत्र नाम से प्रसिद्ध है । " पूष्णे हस्ताभ्याम् ” ( तै ० सं ० ४।४।१०।३ ) से रेवती ही अभिप्रेत है । पार्थिव पूजाभाग शूद्र वर्ण का अधिष्ठाता है शौनं वर्णम-सृजत पूषणम् " ( शत ० १४ । ४ । २ । २५ पूषा ' देवता घनभावशून्य है, तरल है, अतएव इसे दन्तक कहा जाता है । भगप्राण श्री का अधिष्ठाता है, परन्तु बिना पुष्टिप्रवर्तक भूतप्रधान पूषा को भगवति माना जाता है ( शत ० ११ | ४ | ३ | १५ ) | पोषक प्रारण ही पूषा है । पूजा प्रारण का यही संक्षिप्त निदर्शन है । निम्नलिखित श्रौत वचन उक्त अर्थ का सही स्पष्टीकरण करते हैं— [ ६५