Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 21–30
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 21–30
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् wwwwwwwww १३- ये अग्निष्वात्ता ये अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते ॥ तेभ्यः स्वराऽसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयन्ति ॥ ( यजुः १ ९ / ६० ) " अग्नि से खाए हुए - प्रतएव ' प्रग्निष्वात्ता ' नाम से प्रसिद्ध, अग्नि से न खाए हुए, अतएव श्रनग्निष्वात्ता ' नाम से प्रसिद्ध पितर ( हमारे दिए हुए ) स्वधा अन्न से अन्तरिक्ष में आनन्दित हो रहे हैं । उन मोदमान पितरों के लिए दीप्तिमान अग्नि कामतानुसार नवीन शरीर ( प्रतिवाहिक शरीर ) का निर्माण करते हैं " । मन्त्रोपात अग्निष्वात्तादि पितर प्राणात्मक प्रेत पितर के ही उपोद्बलक माने जा सकते हैं । क्या जीवित पितर अन्तरिक्षलोक में निराधार प्रतिष्ठित रह सकते हैं? ----१४ - " नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय, नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः, पितरो नमो वः, गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो दे ० तद्वः पितरो वासः । " ( यजुः सं ० २।३२ ) मन्त्रप्रदर्शित रस - शोष - जीव - स्वधा — घोर - मन्यु- लक्षण पितर प्राणात्मक प्राकृतिक पितर ही हो सकते हैं । ---** १५ – ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् । स्वधा स्थ तर्पयत मे पितृन् ॥ ( यजुः सं ० २०३४ ) " बलप्रद ऊ रस, ' अमृत ' नामक शिवतम सोमरस, घृत नामक अन्तरिक्ष्यरस दुग्धरस, आदि अनेक रसों को धारण करने वाले हे जल देवता! श्राप स्वधा बनकर मेरे पितरों को तृप्त करों " । इस मन्त्र में स्पष्ट शब्दों में जलाञ्जलि से पितृतर्पण का उल्लेख हुआ है । ---१६ – एतत् ते प्रततामह ये स्वधा ये च त्वामनु । ( अथर्व ० १८ / ४।७५ ) | [ १६ ]
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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् www I " हे श्रततामह! ( प्रपितामह ) ग्रापके लिए ( श्रद्धापूर्वक ) दिया हुआ ग्रन्न आपके लिए स्वधा ( अन्तर्य्याम सम्बन्ध से ग्रापका भोग्य ) बने, साथ ही में जो आपके अनुयायी हैं, उनके लिए भी स्त्रधा बने " । प्रदत्त पिण्डान्नरूप स्वधा से परलोकस्थ पितामह प्रपितामहादि तृप्त होते हैं, इस से बढ़कर श्राद्ध की प्रामाणिकता के लिए और कौनसा प्रमाण चाहिए?
हैं-१७ - मैनमग्ने विदो माभि शूशुचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम् ।
शृतं यदा करसि जातवेदो ऽथेमेनं प्रहिणुतात् पितृभ्यः ॥
( अथर्व ० १८ ।२।४ ) । " हे क्रव्यादग्ने! आप इस प्रेत शरीर को कष्ट के साथ न जलावें, इसे शोकसंतप्त न करें, इसकी चमड़ी बाहर न फैंक, अपितुं ( इसके प्रात्म भाग को सुरक्षित रखते हुए ) शरीर ( शव ) को सर्वात्मना जला डालिए । हे जातवेदा अग्ने! जब शरीर जलने पर प्रेतात्मा परिपक्व हो जाय, तो उस अवस्था में आप इसे पितरों के अधिकार में कर दें । अर्थात् पितृलोक में स्थित इसके पूर्व पितरों के साथ इसका सपिण्ड्य भाव करा दें । " १८ – समिन्धते अमर्त्य हव्यवाहं घृतप्रियम् । स वेद निहितान् पितृन् परावतो गतान् ॥ ( अथर्व ० १८।४।४१ ) । " मरणरहित एवं घृतप्रिय ( देवताओं के हव्यवहन करने के कारण ) ' हव्यवाहन ' नाम से प्रसिद्ध अग्नि को ( प्रकृतिरहस्यवेत्ता यज्ञसंचालक ऋत्विक्लोग सामिधेनी रूप मन्त्रशक्ति से ) * समिद्ध करते हैं । क्योंकि यह ( समिद्ध ) अग्नि गुप्त सम्पत्तियों को पहिचानने वाले हैं, साथ ही में ( पृथिवी लोक से ) बहुत दूर रहने वाले ( प्रजाप्रवर्त्तक ) पितरों को भी यही पहिचानते हैं । ( ऋत्विजों को यज्ञ द्वारा यज्ञाधिष्ठाता यजमान के लिए पार्थिव धन सम्पत्ति, एवं पितर- प्राण मूलक प्रजा सम्पत्ति ही अपेक्षित है, एवं दोनों * पार्थिव अग्नि भूतप्रधान है । इसके साथ सौर प्रारणदेवता का सम्बन्ध करना है । जिस मन्त्रबल प्रयोगरूप विशेष प्रक्रिया से पार्थिव प्रज्वलित अग्नि को सौर तत्त्व से युक्त कर इसे दिव्यशक्ति युक्त बनाया जाता है, वही प्रक्रिया " समिन्धन " नाम से प्रसिद्ध है । अध्वर्यु इसे प्रज्वलित करता है, होता सामिधेनी मन्त्रों के द्वारा इसे समिद्ध करता है । यही समिद्ध अग्नि वसुवित् है -" वयुनानि विद्वान् " ( देखिए शत ० ब्रा ० सामि ० ब्राह्मण ) । [ १७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड --[ १८ ] प्रमाणोपनिषत् - अथर्व ० १८ | ४ | ६४ । मृताः 1 सम्पत्तियों के अधिष्ठाता समिद्ध ( वैध - याज्ञिक ) अग्नि ही है । अतः उक्त फल प्राप्त्यर्थ अग्नि का समिन्धन आवश्यक है ) । " मन्त्र ने जिस समिद्ध अग्नि को स्पष्ट शब्दों में " परावतः " कहते हुए जिन परलोकगत पितरों को पहिचानने वाला बतलाया है, क्या वह पितर जीवित पितर हैं?
१ ९ – यद्वो अग्निरजहादेकमङ्ग पितृलोकं गमयं जातवेदाः ।
तद्वत् पुनराप्याययामि साङ्गाः स्वर्गे पितरौ मादयध्वम् ॥
" हे पितर देवताओ! परलोक में जाते हुए आपके जिस एक * अङ्ग को जातवेदा अग्नि ने छोड़ दिया है, ( अग्नि से परित्यक्त ) उस अङ्ग को ( इस आहुति के द्वारा ) मैं पुनः पूर्ण करता हूँ । आप पूर्णाङ्ग बनते हुए स्वर्ग में आनन्द कीजिए " । मन्त्रने प्राहुति के द्वारा पितरों को तृप्त करना बतलाया है । हमारे द्वारा नहीं, अग्नि के द्वारा । अवश्य ही मन्त्रोपात्त ' पितर ' शब्द प्रारणी का वाचक न होकर प्रारण का ही वाचक है । २०- जीवानामायुः प्रतिरत्वमग्ने पितृरणां लोकमपि गच्छन्तु गार्हपत्यो विपन्नरातिमुषामुषां श्रेयसीं धेास्मै ॥ अथर्व ० १२।२।४५ । अने! जीवित दशा में आप ( प्राणी की ) आयुवृद्धि करें, मरने पर उन्हें पितृलोक पहुँचाने का अनुग्रह करें । कृपण मनुष्य को दग्ध करते, इस प्राणी के शत्रुओं को जलाते हुए हे गार्हपत्य ( अग्ने )! इस जीवात्मा के लिए ( प्रेत पितर के लिए ) आप कल्याणकारिणी नूतन - नूतन उषाओं को धारण करें । ” वेद महर्षि ने स्पष्ट ही मृत्यु के अनन्तर पितरात्मक प्राणी का परलोक गमन बतलाया है । ग्रवश्य ही वह पितृलोक प्राणात्मक पितर से युक्त होना चाहिए । * भूवायु से सम्बन्ध रखने वाला हंसात्मा पार्थिव कर्मात्मा का ही एक अङ्ग है । यह कर्मात्मा के साथ लोकान्तर में जा कर यहीं भूवायु में रह जाता है, जैसा कि पूर्व की " प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अग्नि इस अङ्गरूप हंसात्मा को यहीं छोड़ देता है । इसकी तृप्ति के लिए स्वतन्त्र हवि दी जाती है ।
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड हो जाता है । [ १६ ] प्रमाणोपनिषत् - अथर्व ० ११।७।२७ । - अथर्व ० १८ | ४ | ४८. २१ – ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चो द्वताः । सर्वास्तानग्ने वह पितृन् हविषे अत्तवे ॥ - अथर्व ० १८ । १ । ३४ । " जो भूमि में गाड़े गये हैं, जो पानी में बहा दिए गए हैं, जो अग्नि में जला दिए गए हैं, एवं जो यों ही फेंक दिए गए हैं, हे अग्ने! उन सबको श्राप हवि ( श्राद्धान्न ) भक्षरणार्थं बुलाइए । " . यह मन्त्र तो स्पष्ट शब्दों में ही मृत पितरों के लिए श्राद्धान्न का विधान कर रहा है । मन्त्र से यह भी विदित होता है कि, वैदिकयुग में शवदाह के सम्बन्ध में चार प्रकार की पद्धतियाँ प्रचलित थीं । अदन्तक शिशुओं को जमीन में गाड़ा जाता था, तीर्थातिरिक्त प्रदेशों में मरने वाले सदन्तकों को अग्नि से जलाया जाता था, वाराणसी - हरिद्वार श्रादि गाङ्गय प्रदेशों में मरने वालों को गङ्गाप्रवाह में प्रवाहित किया जाता था, सन्यस्त श्राश्रमवासियों को विशेषतः शून्य जंगल में डाल दिया जाता था, वहाँ वन्य हिंस्रक पशु पक्षी उसके शव को कवलित कर लेते थे । इन चारों में आरम्भ की तीन पद्धतियाँ तो आज भी प्रचलित हैं ।
२२ - देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरश्च ये ।
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः ॥
इस मन्त्र में पितरों की मनुष्यों से पृथक् गणना हुई है । फलतः पितृतत्त्व का प्राणत्त्व सिद्ध २३- पृथिवीं त्वा पृथिव्यामावेशयामि देवो ना धाता प्रतिरात्यायुः परा परंता वसुविद् वो प्ररुचधा मृताः पितृषु सम्भवन्तु ॥ * • " पृथिवी से उत्पन्न होने के कारण पृथिवी रूप तुझ को पृथिवी में मिला रहा हूँ । धाता देव हमें आयु प्रदान करें । हमसे ( हमारे इस पृथिवी लोक से ) दूरातिदूर जाने वाले हे पितरो! धाता देवता तुम्हारा प्रश्रय दाता हो, एवं मृतभाव को प्राप्त होने वाले तुम ( परलोक में जाकर वहां रहने वाले ) पितरों में मिल जोनो ” । * इसी मन्त्रभाग के आधार पर लोक में - " मिट्टी में मिट्टी मिल गई " आखिर है मिट्टी की मिट्टी " इत्यादि किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं ।
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड.. wwwwwwwww प्रमाणोपनिषत् श्मशान भूमि में जब शव को गाड़ दिया जाता है, जला दिया जाता है, पानी में बहा दिया जाता है, अथवा फैंक दिया जाता है, तो अनन्तर इस मृत प्राणी के पुत्रादि उक्त मन्त्र बोलते हैं । श्राज उन्होंने वास्तव में इस पार्थिव शरीर को पृथिवी के समर्पित कर दिया है । इस कर्म्म द्वारा आज इनके आत्मा में भी मृत्युभाव का समावेश हुआ है । इसके निराकरण के लिए ( हम तो दीर्घजीवी बनें रहें, इस कामना के लिए ) यह आगे जाकर - " धाता देव हमें श्रायु प्रदान करे, जीवित रक्खे ' यह कहते हैं । आगे जाकर मन्त्र कहता है कि इस प्राणी का परलोक में ( पितृलोक में ) गमन होता है, एवं तत्रस्थ पितरों के साथ इसका एकीकरण होता है । यही प्रक्रिय । ' सापिंड्य ' नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार उक्त मन्त्र स्पष्ट शब्दों में सपिण्डीकरण की प्रामाणिकता सिद्ध कर रहा हैं । - * -२४ – “ नमो वः पितर ऊर्जे, नमो वः पितरो रसाय " ( अथर्व ० १८ | ४ | ८ ) नमो वः पितरो भासायनमो वः पितरो मन्यवे " ( अथर्व ० १८।४।८२ ) यहाँ रस - भाम - मन्यु आदि तत्त्वों को पितर शब्द से सम्बोधित किया गया है, क्या इन्हीं जीवित पितरों की श्रद्धापूर्वक सेवा करना श्राद्ध है?
२५ - इदं मे ज्योतिरमृतं हिरण्यं पक्वं क्षेत्रात् कामदुधा म एषा ।
इदं धनं निदधे ब्राह्मणेषु कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः ॥
– अथर्व ० ११।१ । १ । “ यह सुवर्णं मेरा अविनाशी प्रकाश है । क्षेत्र से उत्पन्न होने वाला यह पक्व अन्न ( पिण्ड ), एवं ( उत्सृष्ट वृषभ ) मेरी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है । इस ( दक्षिणा रूप - हिरण्य - अन्न- गौ ) धन को मैं निधिरूप से ( पिण्ड पितृयज्ञ के सम्पादक ) ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित करता हूँ । इन सब साधनों के द्वारा मैं पितरों के लिए वह मागें बनाता हूँ, जो कि सुखप्रद है । " यह उक्ति श्राद्धकर्त्ता यजमान की है । पक्व तण्डुलपिण्ड दान पितरों के लिए है । साथ ही दान में दी जाने वाली गौ, एवं हिरण्य ( धानुद्रव्य रुपया पैसा आदि यथाश्रद्धा ) यद्यपि दिए जाते हैं ब्राह्मणों को, परन्तु इस दक्षिणादान से जो अतिशय उत्पन्न होता है, श्रद्धासूत्र के द्वारा उसका सम्बन्ध प्रेतात्मा के साथ होता है । श्राद्धकर्म में उपयुक्त अन्न पिण्ड, एवं ब्राह्मणोपयोगी भोजनान्न भेद से दो भागों में विभक्त है । कृत कर्म्म में मनुष्य - सुलभ अनृतभाव से होने वाले दोष के मार्जन के लिए ही कर्मान्त में [ २०
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं प्रमाणोपनिषद् ब्राह्मण भोजन का विधान है, जैसा कि श्राद्धपद्धति प्रकरण में सोपपत्तिक स्पष्ट हो जायगा । ऋषि को उभयविध अन्न का संग्रह अभीष्ट था, अतः " पक्वं क्षेत्रात् " कहा है । इस प्रकार पिण्डदान ब्राह्मणभोजन-द्रव्यदान - गौदान आदि से उत्पन्न होने वाला प्राणात्मक अतिशय श्रद्धासूत्र के द्वारा अवश्य प्रेतात्मा को तृप्त करता है । प्रेतात्मा जिस मार्ग से जाता है, यह अतिशय उसी सूक्ष्म प्रतिवाहिक मार्ग से जाता है । जैसा कि ब्राह्मणश्रुति कहती है-" ता वा एताः ऋत्विजामेव दक्षिणाः । अन्यं वा एत एतस्य ( गच्छतः ) श्रात्मानं संस्कुर्वन्ति एतं यज्ञं ऋङ मयं, यजुर्मयं साममयं आहुतिमयम् । सोऽस्यामुष्मिल्लोकात्मा भवति, तद्ये प्राजीजनन्तेति - तस्माद् ऋत्विग्भ्य एव दक्षिणा दद्यात्, नानृत्त्वग्भ्यः । अथ प्रतिपरेत्य गार्हपत्यं - दक्षिरणानि जुहोति । स दशाहोमीये वाससि हिरण्यं प्रबध्यावधाय जुहोति । देवलोके मेऽप्यसदिति वै यजते, यो यजते । सोऽस्यैष यज्ञो ( यज्ञातिशयो ) देवलोकमेवाभिप्रति, तदनूची दक्षिणा यां ददाति सा - एति । दक्षिणामन्वारभ्य यजमानः । ” ( शत ० ४।३।४ । ५ = ६–७ ) इति । - * -२६ - जीवं रुदन्ति विनयन्त्यध्वरं दीर्घामनुप्रसितं दीध्युर्नरः । वामं पितृभ्यो य इदं समीरिरे मयः पतिभ्यो जनये परिष्वजे । — अथर्व ० १४।१।४: ६ " जो मनुष्य पत्नियों के जीवन के लिए रोते हैं, अर्थात् जो स्त्रियों के अभाव को दुःखमय समझते हैं, उनकी दुर्दशा पर आंसू बहाते हैं, यज्ञ में उनको नियुक्त करते हैं, जो उनको कभी पीड़ा नहीं पहुँचाते है, जो प्रेमपूर्वक उनका आलिङ्गन करते हैं, एवं जो पितरों के लिए श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न करते हैं, ऐसे पतियों के लिए पत्नियाँ सदा सुखद रहती हैं " । इस मन्त्र ने प्रजोत्पत्ति को पितृऋरण परिशोध का कारण बतलाया है । दूसरे शब्दों में पितर-प्राण की सन्तुष्टि के लिए संतति उत्पन्न करना मनुष्य का कर्त्तव्य बतलाया गया है, जैसा कि आगे की " ऋण मोचनोपायोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है । उदाहरण के लिए उक्त मन्त्र पर्याप्त हैं । विशेष जिज्ञासुत्रों को ऋक्संहिता के ११४२ ५ – ११७१११२ – १४१०६।३, – १११०६।३, १११०६।७, — [ २१ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं wwwwwww ब्राह्मणभागोक्तप्रामाण्यवाद-[ २२ ] प्रमाणोपनिषत् ana - तै ० ब्रा ० २।३।८।२ १।११ | ४, – २।५।१, – ३।५५।२, ४ | १ | १३, – ४।२।१६ – ४ ४२१८, – ५/४७११, – ६।२१।८, --६।२२।२, —६।४६।१२, – ६ । ४६ । १० – इत्यादि स्थलों के पढ़े हुए पितर शब्द की, यजुः संहिता के २७, — २।३१, – २।३३, – २/३४, – ३।५५ - ५।११, – ६।१, ७/४६, – ८।५८, – १२।४५, – १४।२६, – १६।११, – १६।३७, – १६।४५, – १६।४७, – १६/५०, – १६।५३, - - १६।५४, – १६/६६ – १ ९ ।७०, -२६।४६, –२६।४७, ३८१६, — इत्यादि स्थलों में उपात्त पितर शब्दों की, एवं अथर्व संहिता के १।३०।२, –१२।४, – ४।१५।५, ५११८ ।१३, – ५।२४ । १४, – ५।२४।१५, – ५।३०।११, -- ५।३०।१२, — ६।४६।१, —६।७१।२, ६।११६।२, --६।१२०।३ —-- ७।४१।२, —-- १०।१०।२६, —-११।७।२७, — १२।१।३२, –१४ । १ । ४६ – १५।७।२, १८।१।४५ – १८ । १२४६ – इत्यादि स्थलों के पितर शब्दों की मीमांसा करनी चाहिए । इन सब प्रकरणों का बिना किसी मताभिनिवेश के शुद्ध हृदय से यदि आप विचार करेंगे, तो श्रापको यह मान लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, पितर एक तत्त्वविशेष है, उसकी स्थानभेद से अनेक अवस्थाएँ हो जाती हैं । प्रेतपितर के निमित्त यथाविधि दिया हुआ स्वधा अन्न अवश्य श्रद्धासूत्र के द्वारा अतिशयरूप से उसकी तृप्ति का कारण बन जाता है । प्रयत्न सहस्रों से भी प्राप उपर्युक्त स्थलों में आये हुए स्वधा - प्रन्न - दक्षिणा - जलतर्पण आदि कम्मों के फलभोक्ता पितर शब्दों को जीवित पितरपरक नहीं लगा सकते । हाँ, अभिनिवेश का उत्तर न अद्यावधि कोई दे सका, एवं न भविष्य में ही ऐसे महानुभावों के मनोरञ्जन की कोई प्राशा है । संहितोक्त पितर शब्द के कुछ उदाहरण पाठकों के सम्मुख उपस्थित किए गए । अब देखना यह है कि, वेद के ब्राह्मण [ भाग ने इस सम्बन्ध में अपने क्या विचार प्रकट किए हैं । निम्नलिखित ब्राह्मण वचनों पर आप भी विचार कीजिए, और फिर निष्पक्ष दृष्टि से पितृस्त्ररूप के सम्बन्ध में अपना निर्णय प्रकट कीजिए । १ – “ सोऽसुरान् सृष्ट्वा पितेवामन्यत, तदनु पितृ नसृजत, तत्पितृरणां पितृत्त्वम् ” " उसने असुरों को उत्पन्न कर ( अपने आपको ) पिता के सदृश समझा, असुरों को लक्ष्य में रख उसने पितरों को उत्पन्न किया, यही पितरों का पितृत्त्व है । " ऋषिप्राणमूर्ति स्वयम्भू से ही आपोमय परमेष्ठी का विकास होता है । परमेष्ठी के प्रप्तत्त्व भृगु एवं अङ्गिरा भेद से दो भागों में विभक्त है । इनमें भृगु की पू- वायु- सोम, ये तीन अवस्था है । इनमें अपतत्त्व के आधार पर स्वयम्भू असुरसृष्टि करते हैं,
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् सोमतत्त्व के आधार पर पितरसृष्टि का विकास होता है । मध्यस्थ वायु गन्धर्व सृष्टि की मूल प्रतिष्ठा है । यही दोनों का विभाजक है । सोम अप् की ही अवस्था विशेष है, इसी अभिप्राय से “ तदनुपितृनसृजत " यह कहा है । - ** -२ - " अग्निमुखा एव तत् पितृलोकाज्जीवलोकमभ्यायन्ति " - शत ० १३ । ८ । ४ । ६ " ( वे पितर ) अग्निमुख बन कर ही पितृलोक से जीवलोक की ओर आते हैं । " " अग्निवें पथोऽ-तिवोढा, स एनानतिवहति " ( शत ० ३ | ८ | ४ | ६ ) के अनुसार अग्नि ही सौम्य प्रारणात्मक पितरों का वहन करने वाला है | पञ्चाग्निविद्या के अनुसार पितर प्राणमय श्रद्धातत्त्व सर्वप्रथम दिव्य प्रादित्याग्नि में परिणत होता हुआ आगे जा कर क्रमशः पर्जन्य- पार्थिव - पुरुष - शोणित इन अग्नियों के सम्बन्ध से सोम-वृष्टि - अन्न - शुक्र - रूप में परिणत होता हुआ अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित होता है - ( देखिए छान्दोग्य उ ० ५ अ ० ४,५,६,७,८, ε खण्ड ) दूसरे शब्दों में एक ही अग्नि प्रादित्य- पर्जन्य- पार्थिव - पुरुष - योषित्, इन पाँच भागों में विभक्त होकर श्रद्धा - सोम - वृष्टि - अन्न- रेत, इस प्रकार पञ्चधा विभक्त सोमतत्त्व का प्रतिवन करता है । श्रद्धामय चान्द्रलोक में प्रतिष्ठित इन्हीं अग्नियों के आधार पर अग्नि को मुख ( अग्रणी ) बना कर ही पितरप्राण स्वलोक से जीवलोक स्थानीय इस धरातल पर प्राणी शरीर में प्रतिष्ठित होता है, यही तात्पर्य है । ३ – “ दक्षिणसंस्थो वै पितृयज्ञः " - कौ ० ब्रा ० ५।७ " पितर दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित रहने के कारण " दक्षिणसंस्थ " कहलाते हैं । " सौम्यप्राण ही पितर है, यह निर्विवाद है । यह सौम्य ऋत प्राण उत्तर दिशा में उक्थ रूप से रहता हुआ अर्क रूप से उसी प्रकार निरन्तर दक्षिण दिशा की ओर जाया करता है, जैसे कि दक्षिण दिशा में उक्थरूप से प्रति-ष्ठित ऋताग्नि अर्करूप से निरन्तर उत्तर दिशा की ओर आया करता है । उत्तर से आने वाले सौम्य प्रारूप पितर की अन्तिम विश्राम भूमि दक्षिणा दिक् ही है । यदि कोई व्यक्ति उत्तर दिशा की ओर मस्तक करके सोता है, तो ब्रह्मरन्ध्र से प्रविष्ट होने वाले प्रायुःस्वरूप - समर्पक सौर इन्द्र प्रारण पर इस पितर प्राण का प्रघात होता है । जाता हुआ पितर इसके जीवनीय पितरों को भी निकाल ले जाता है । इसी आधार पर " नोदोचीनशिराः शयीत " इत्यादि रूप से उत्तर दिशा की ओर मस्तक कर के सोने का निषेध है । - * -४ - " अन्तर्हितो हि पितृलोका मनुष्यलोकात् " - तै ० ब्रा ० ११६।८।६ [ २३ ]
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श्रद्धविज्ञानं द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् " पितृलोक मनुष्यलोक से व्यवहित है । " चन्द्रमा स्वर्ग एवं नरक का विभाजक माना गया है । चन्द्रमा से उत्तर का आकाश स्वर्ग प्रदेश है, दक्षिणाकाश नरक प्रदेश है । ये दोनों ही भाग दो - दो भागों में विभक्त हैं । उत्तर प्रान्त में ध्रुव प्रदेश यावत् प्रदेश देवस्वर्ग है, आगे ब्रह्मलोक है । दक्षिणाकाश में पर्यन्त पितृस्वर्ग है, शनैश्वर के उस पार का अन्धकारमय प्रदेश नरकलोक है, जैसा कि ' आत्मगति-विज्ञानोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । पृथिवीलोक मनुष्यलोक है । त्रिविध पितृलोकों में से पितर प्राण - प्रधान ' प्रद्यौ ' नाम का पितृलोक इस मनुष्यलोक से वास्तव में बहुत व्यवहित ( दूरी पर ) है | - * -५ - " तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्यः " - शत ० २।४।२।२१ " पितर मनुष्यों की दृष्टि से छिपे हुए से हैं । " पितर प्राणतत्त्व है । प्राणतत्त्व का अनुमान हो सकता है, इसे चर्म्मचक्षु से नहीं देखा जा सकता । हम यह जानते हैं कि, शुक्र में प्रतिष्ठित पितर प्राण ही हमारे भौतिक शरीर की प्रतिष्ठा है, यही शक्तिरूप से ( ऊ रूप से ) अनुभव में आता है, एवं यही प्रजातन्तु वितान का प्रवर्त्तक है । इन सब कारणों से तो हम इसे परोक्ष नहीं मान सकते, साथ ही में प्राणमय होने से चर्मचक्षु से इसका प्रत्यक्ष करने में असमर्थ होते हुए हम इसे प्रत्यक्ष भी नहीं कह सकते । इसी प्रत्यक्षाप्रत्यक्षभाव को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने केवल " तिरः पितरः " न कह कर " तिर इव वै पितरः " यह कहा है । --६ – " रात्रिः पितरः " - शत ० २।१।३।१ " रात्रि पितर है । " पिता शब्द का अर्थ है - पालक, रक्षक, भरण - पोषण करने वाला । साधारण मनुष्यों ने सूर्य को पिता समझ रक्खा है । परन्तु पितृस्थानीया वास्तव में रात्रि है । सूर्य्य अहः काल में अपनी रश्मियों से हमारे प्राण खँचा करता है - ( देखिए प्रश्नोपनिषत् २७ ) । सूर्य के रश्म्याकर्षण से, एवं अन्यान्य कम्मों में रत रहने से दिन में हमारे शरीर का जो प्रारण ( शक्ति ) खर्च होता है, वह रात्रि में हमें मिल जाता है । रात्रि क्या है, दात्री है - ( रा दाने ) । रात्रि हमारी विश्राम भूमि है । पिता सूर्य्य ही है, माता रात्रि ही है । सन्तान का पोषण माता के क्रोड़ में ही होता है, पिता तो शासक है । पिता का पालकधर्म्म इस मातृस्वरूपिणी रात्रि से पूर्ण होता है । कारण इसका वही सौम्य पितरप्राण है 1 दिन में सूर्य्य की कृपा से पोषक सोम अग्निगर्भ में रहता है, अतएव दिन को आग्नेय कहा जाता है । रात्रि में निशानाथ चन्द्रमा के अनुग्रह से सोम का साम्राज्य रहता है, अतः रात्रि को सौम्या माना गया है । इसी सौम्य पितरप्राण के साथ अभिन्न भावापन्ना रात्रि " पितर " शब्द से व्यवहृत की गई है । [ २४ ]
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श्रद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwww ९ - " अध इव हि पितृलोकः " प्रमाणोपनिषद् www - शत ० १३ | ८ | ४ | ७ -36-- शत ० १४ | ६ | १ | १० [ २५ ] ७- " तत्तमसः पितृलोकादादित्यं ज्योतिरभ्यायन्ति " " ( ऋत्विक् लोग " उद्वयं तमसे ० " इत्यादि मन्त्र के द्वारा ) उसे ( यज्ञात्मा को ) तमः प्रधान पितृ-लोक सेादित्यरूप ज्योतिर्लोक ( देवलोक ) की ओर लौटाते हैं । " दक्षिणायन भाग पितृयारण है, उत्तरायण भाग देवयान है । देवयान में ग्रादित्यज्योति की प्रधानता है, पितृयाण में रात्रिसोम का प्रभुत्त्व है । अतएव पितृलोक को तमोरूप, एवं आदित्य को ज्योतिः शब्द से व्यवहृत किया गया है । ८- " अवान्तरदिशो वै पितरः " - शत ० १।८।१।४० " अवान्तर दिशाएँ पितर हैं, किंवा अवान्तर दिशाओं में पितर रहते हैं " । नियतभाव को सत्य कहा जाता है, अनियतभाव को ऋत कहा जाता है । पूर्व – पश्चिम - उत्तर – दक्षिण – ऊर्ध्व — प्रधः-यह ६ दिशायें सर्वथा नियत हैं, इन्हीं ६ त्रों के ग्राधार पर यागमोक्त पूर्वाम्नाय – पश्चिमाम्नाय - उत्तरा-मनाय - ( पञ्च मकारात्मक वाममार्ग ) – दक्षिणाम्नाय - ( पञ्चदकारात्मक स्मार्त्तमार्ग ) - ऊर्ध्वाम्नाय -योगाना - अधराम्नाय - ( अघोरान्नाय ) यह ६ ग्राम्नाय ( मार्ग ) प्रतिष्ठित हैं । नियतभाव के कारण हम इन दिशाओं को अवश्य ही " सत्य " कहने के लिए तय्यार हैं । उत्तर पूर्व के मध्य में ईशान कोण, पूर्व दक्षिण के मध्य में श्राग्नेयकोण, दक्षिण पश्चिम के मध्य में नैर्ऋतकोण, एवं पश्चिमोत्तर के मध्य में वायव्यकोण है! यही चार अवान्तर दिशाएँ हैं । इनका कोई अपना नियत स्वरूप नहीं है, अपितु पूर्वादि चार प्रधान नियत दिशाओं के आधार पर इन प्रनियत भावों का स्वरूप सम्पन्न होता है । दूसरे शब्दों में चार प्रधान ( भुजा स्थानीय ) दिशाओं के अतिरिक्त सम्पूर्ण प्रान्त भाग प्रवान्तर दिशाएँ हैं । जिसे लोकभाषा में बचाखुचा ( शेष भाग ) कहते हैं, ठीक उसी भाव के लिए ' अवान्तर ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । प्रधान चार दिशा हैं, गौणभाग अवान्तर है । यही इसका ऋतभाव है । अग्नि सत्य है, सोम ऋत है । ऋत सौम्य तत्त्व ही पितर है । इसी विज्ञान के आधार पर श्रुति ने प्रवान्तर दिशाओं को पितर कहा है । " पितृलोक नीचा सा है " । यज्ञविद्या के सम्बन्ध में प्रात्मवित् विदेह जनक के " कत्ययमथा -ध्वर्यु रस्मिन्यज्ञे श्रहुतीष्यति? इति " ( याज्ञवल्क्य! यह अध्वर्यु इस यज्ञ में कितनी आहुति डालेगा? ) यह प्रश्न करने पर भगवान् याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं- " तिस्र " इति " ( तीन आहुतियाँ ) । आगे जाकर— “ कतमास्तास्तिस्र " इति? " ( वे तीन आहुतियाँ कौनसी हैं? ) यह प्रश्न करने पर याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं — राजन्! जो आहुतियाँ अग्नि में हुत होकर ऊपर की ओर प्रज्ज्वलित होती हैं, जो हुत