Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 121–130

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 121–130

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् निकलने वाली गौ नाम की रश्मियों का अवरोध करना " बलासुर " का कार्य है । इन बल ग्रन्थियों को तोड़ना भी इन्द्र विशेष का ही कार्य है अतएव इन्द्र को बलाराति कहा जाता है । भौमस्वर्ग व्यवस्था में बल - प्राण प्राकृतिक, अतएव बल नाम से ही प्रसिद्ध मनुष्यविध असुर ने एक बार देवगुरु बृहस्पति की गाएँ चुरा ली थीं । इन्हें एक अज्ञात पर्वतकन्दरा में छुपा दी थीं । ग्रागे जा कर सरमा नाम की शुनी ( कुत्ती ) की सहायता से इन्द्र ने पता लगा कर गायों को मुक्त किया था ( ऋक् ० ५।४५ । ७ ) । एवं इसी अपराध पर इन्द्र ने मारुति सेना के बल पर बलासुर का संहार किया था । एक वस्तु का दूसरी वस्तु अन्नरूप में त होना ही न है । यज्ञस्वरूप सम्पादक इस अन्नादान का अवरोध कर यज्ञकर्म बन्द कर देना उक्त तीनों असुरों का मुख्य कर्म है, अतएव इन्हें यज्ञावरोधक एवं अराति नामों से व्यवहृत किया जाता है । २ - असुरः-१ — वृत्रः—— → प्रावरणं- -- + ३३ : निरोधः ३३ +88 २ - तमुचि: -. ३ – बलम् — गवां संहरणम् - ३३ ) आन्तरिक्ष्य मरुत्वान् इन्द्र पर्जन्यरूप से ३३ प्रवस्थापन नमुचि प्रारण का नाश करता है । स्वायम्भुव विश्वकर्म्मा नाम का ज्ञानेन्द्र ज्ञानज्योति रूप से ३३ अवस्थापन बलासुर का विनाश करता है । इस प्रकार स्वायम्भुव ज्ञानज्योतिर्मय ज्ञानेन्द्र, सौरभूतज्योतिर्मय मघवेन्द्र, आन्तरिक्ष्य वायवेन्द्र ही क्रमशः बल - वृत्र-नमुचि का विनाश करते हैं । इसी अभिप्राय से इन्द्र को ६६ असुरों का विनाशक माना गया है जैसा कि मन्त्रश्रुति कहती है " जघान नवतीर्नव ” ( ऋक् सं ० १।८४।१३ ) । ३.३- श्राप्यः ( जाया - धारालक्षणः ) प्राप्य सोम की इन्दु - दिक् भेद से दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । इन्दुसोम भास्वर सोम कहलाता है, दूसरा दिक्सोम नाम से प्रसिद्ध है । भास्वरसोम पिण्डात्मक ( सायतन ) होता हुप्रा " सहृदयं सशरीरं सत्यम् ” इस लक्षण के अनुसार " सत्य " है । दिक्सोम पिण्डप्रान्तरूप विशाल अन्तरिक्ष में वायुरूप से व्याप्त होने के कारण " अहृदयमशरीरं ऋतम् " इस लक्षण के अनुसार ऋत है । दोनों ही सोम - जाया धारा लक्षण हैं । अग्नि में ग्राहुत हो कर सम्पूर्ण पार्थिव पदार्थों के प्रादुर्भावक होने से इस आप्य सोम को जाया ( जनिप्रादुर्भावे ) कहा जाता है एवं ऋतरूप से सब का आलम्बन होने से धारा नाम से प्रसिद्ध है । लोक स्वरूपनिर्माण करना ( पिण्ड स्वरूप सम्पादन करना ) जाया लक्षण भास्वर सोम का मुख्य कार्य है एवं लोकप्रान्त ( वहिः सीमा ) स्वरूप सम्पादक धारा लक्षण दिक्सोम है । पिण्ड भूमि है, यह सत्य है । सत्य सोमात्मक सत्यपिण्ड ऋक्सोमात्मक ऋतमहिमा के गर्भ में ही प्रतिष्ठित रहते हैं । लोकनिर्माण ( पिण्ड निर्माण ) भी प्राप्यसोम ( भास्वर सोम ) से ही होता है एवं लोक प्रान्त ( लोकमहिमा ) निर्माण भी प्राप्य सोम से ही होता है । वहीं भास्वरापेक्षया जाया लक्षण ( प्राय ) है, दिगपेक्षया धारालक्षण ( आधार ) है । प्राप्यसोम के इन्हीं दोनों लक्षणों का दिग्दर्शन कराते हुए ऐतिह्य कहता है— [ ११६ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् " अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोकाह्यप्सु प्रतिष्ठिताः । श्रापोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत् ॥ । " १ – इन्दुः-: - → भास्वरसोमः + जायालक्षणः, लोकस्वरूपसम्पादः सत्यः ३ -- प्राप्यः२ - दिश्यः - दिक्सोम: --४ - अन्नम् ( यज्ञलक्षण सोमः ) → धारालक्षणः, लोकप्रान्तस्वरूप सम्पादः ऋतः यज्ञ स्वरूप समर्पक सोम ही अन्नसोम नाम से प्रसिद्ध है । प्रन्न भेद से यह सोम राजा - वाज - ग्रह-विभेद चार भागों में विभक्त है । राजा सोम बल - वीर्य्य - पराक्रम के आधारभूत क्षत्रवीर्य्य को उत्पन्न करता है । राजा सोम के द्वारा ही राजसूय यज्ञ सम्पन्न होता है । राजा सोम का सम्बन्ध सूर्य्य मण्डल से है | वाज सोम उत्साह का प्रवर्तक है । इसका पारमेष्ठ्य मण्डल से सम्बन्ध है । इसके अधिष्ठाता परमेष्ठी के उपग्रहभूत बृहस्पति के साथ हैं अतएव इस वाजसोम से निष्पन्न होने वाले वाजपेय यज्ञ को " बृहस्पति सव " ' कहा जाता है । राजासोम जहाँ क्षत्रवीर्य्यं का प्रवर्तक है, वहाँ वाजसोम को ब्रह्मवीर्य का प्रवर्त्तक माना गया है । आन्तरिक्ष्य वायव्य सोम ग्रहसोम है । इसके उपांशु - अन्तर्याम - स्पृत आदि अवान्तर ४० भेद हैं । इसी ग्रह - सोम से ग्रहयाग नाम से प्रसिद्ध सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम यज्ञ का स्वरूप सम्पन्न होता है । उक्त ग्रहसोम की धारा - सव - पवित्र - अमृत ये चार प्रधान जातिएँ मानी गई हैं । चौथा हविसोम पार्थिव ओषधि ( ब्रीहियवादि ) में रहने वाला अन्न- सोम है | शरीराग्नि को, दूसरे शब्दों में शरीर में रहने वाले प्राण - देवताओं को इस हविसोम का अन्यतम कार्य है । इसी से हविर्यज्ञ स्वरूप निष्पन्न होता है । ५ — अन्नम् – ( १ - राजा ---( सौर: ) — ~ + ( बलवीर्य्य. पराक्रमजनकस्य क्षत्रवीर्य्यस्य प्रदाता ) २ – वाजः ( पारमेष्ठ्यः ) + ( उत्साहजनकस्य वाङ्मय ब्रह्मवीर्य्यस्य प्रवर्त्तकः ) ३ — ग्रहः ( प्रान्तरिक्ष्यः ) - + वायव्यश्चत्वारिंशद्विध: ( धारा: - सवाः पवित्राणि अमृतानि ) ४ ----- वि: ( पार्थिवः ) -1 1- ( शारीर देवतानां पोषकः ) ५ -- भृगुः - ( वायुलक्षणः - शुक्रग्रहोपनीतश्चतुविधः ) चारों दिशाओ में स्थिर वायुरूप में परिणत होने वाला सोम " भृगुसोम " है । दिग्भेद से इसकी प्राण- पवमान - मातरिश्वा - सविता यह चार अवस्थाएँ हो जाती हैं । श्वास - प्रश्वास का अधिष्ठाता प्राण-सोम है, इसकी सत्ता पूर्व में है । सूर्य्य इसका उक्थ है । रसासृगुमांसादि को पवित्र रखने वाला सोम पवमान है । इसकी सत्ता पश्चिम में है । पिण्डस्वरूप समर्पक, एवं पिण्डस्वरूप रक्षक, अतएव वरोह नाम [ ११७ ]

पृष्ठ 123

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं पितॄणां पितर विज्ञानोपनिष wwwwwwwm से प्रसिद्ध वायव्य सोम मातरिश्वा नाम से प्रसिद्ध है । इसका उक्थ अग्नि है, इसकी सत्ता दक्षिण में है । कर्मप्रेरक वायव्य सोम सविता नाम से प्रसिद्ध है । इसका उक्थ चन्द्रमा है, यह उत्तर में प्रतिष्ठित है । ये चारों ही भार्गव सोम हैं । १ - प्राणः --- प्राङेजः २ - पवमानः पश्विमैजः ५ – भृगुः ३- मातरिश्वा --→ दक्षिणजः ४- सविता —— + उत्तरैजः ६ -- अङ्गिरा - ( ज्योतिर्लक्षणः - बृहस्पत्युपनीतः ) ज्योतिर्लक्षण सोम श्रङ्गिरा नाम से प्रसिद्ध है । यह ज्योतिसोम दूसरे शब्दों में ज्योतिप्रवर्त्तक सोम निम्नलिखित पाँच स्थानों में विभक्त हो रहा है--१ – सूर्य्य: -२ - चन्द्र: -→ स्वज्योतिः परज्योतिः ३ – विद्युत् ———— → स्वज्योतिः ४— नक्षत्रम् —— ५ - वैश्वानराग्निः उभयज्योतिः परज्योतिः ७ - - सहः - ( पितृलक्षणः सापिण्ड्य स्वरूप सम्पादकः ) २८ नक्षत्रों के सम्बन्ध से २८ अवस्थानों में परिणत होने वाला पितृप्राणस्वरूपसमर्पक सोम ' सह ' नाम से व्यवहृत होता है । इस सह की रेतः - श्रद्धा - यश ये तीन अवस्थाएँ हो जाती है । शुक्र नाम से प्रसिद्ध घनता लक्षण सहसोम " रेतः " कहलाता है । तरलता लक्षण सत्यभाव प्रवर्तक सहसोम श्रद्धा नाम से व्यवहृत होता है एवं विरलता सम्पादक पितृप्राणमूर्ति सहसोम यश नाम से व्यवहृत होता है । ( १ - रेतः --- घनता लक्षणः →+ शुक्रमूर्त्तिः ७-- सहः२ २ - श्रद्धा - तरलता लक्षण: -+ अमूर्तिः ३ – यशः - विरलता लक्षण: -- → प्राणमूर्तिः [ ११८ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ८-- रसः ९ -- ब्रह्मणस्पति तप्ततनूनं तदामो समश्नुते पितॄणांपितरविज्ञानोपनिषतुं शृतास इद्वहन्तस्तत् समासत् ॥ ( ऋक् ० 81८३1 ९ ) । [ ११६ ] . सोमवल्ली में रहने वाला, वैध ज्योतिष्टोम का स्वरूप समर्पक अत्यन्त मादक सोमरस ही “ रससोम ” नाम से प्रसिद्ध है । सुरा - सीधु - प्रासव भेद भिन्न जितने भी मादक पदार्थ हैं, बुद्धि को [ बुद्धि प्रवर्तक स्नायु तन्तुको ] नष्ट करने वाले हैं । परन्तु मादक पदार्थों में एकमात्र वल्लीसोम ही ऐसा पदार्थ है, जो कि मादक होता हुआ भी बुद्धिवर्द्धक है । इस सोमरस का पान वंशपरम्परा पर निर्भर है! यदि बिना वंशपरम्परा के कोई व्यक्ति दुराग्रहवश सोमरस पी लेता है तो उसके कोढ free ' आते हैं । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए प्रारम्भ में नियत मात्रा में इसका सेवन करना पड़ता है । क्रमशः आत्मसात् हो जाने पर ही यह लाभप्रद होता है । रक्त में एवं शिरात्रों में अन्तर्य्यामसम्बन्ध से सञ्चार होने के अनन्तर ही इसके पुत्रादि ( वंशधर ) सोमपान के अधिकारी बनते हैं । ऐसा वंश -ब्राह्मणग्रन्थों में " सोमपीथी " नाम से व्यवहृत हुआ है । जिस सोमवल्ली से यह रस निकलना है, उसके १५ पत्ते होते हैं ( थे ) । शुक्लपक्ष की एक - एक ि क्रम से एक - एक पत्ता निकसित होता है! पूरे १५ दिन में १५ पत्तों का उदय होता है । कृष्णपक्ष में उसी क्रम से एक - एक पत्ता झड़ने लगता है । अन्त में प्रतिपदा को केवल डण्ठल शेष रह जाता है । सोमवल्ली के पत्ते फास्फोरस के समान चमकीले होते हैं । भौमस्वर्ग में रहने वाले देवता, एवं पृथ्वी में ( भारतवर्ष में ) रहने वाले मनुष्य इस वल्ली के रस से यज्ञ - साधन कर, यज्ञबल के द्वारा ही असुर राक्षसों को परास्त करने में समर्थ होते थे । फलतः असुर प्रारण के उपासक इनके यज्ञों पर, एवं यज्ञ-साधक सोमवल्ली पर निरन्तर आक्रमण किया करते थे । इस सोमवल्ली की रक्षा के लिए अत्रिपुत्र चन्द्रमा नियत किये गये थे । दुःख के साथ कहना पड़ता है कि देवगुरु- पत्नी तारा के अप्रिय सम्वाद को लेकर चन्द्रमा देव विरोधी बनते हुए असुरों के उपोबलक बन गए । चन्द्रमा की इस उदासीनता से अनुचित लाभ उठाते हुए असुरों ने सोमवल्ली को नष्ट कर दिया । आज सोमवल्ली सर्वथा अप्राप्य है । सोमवल्ली के साथ - साथ ही भौम देवता भी एकान्ततः निर्मूल हो चुके हैं । जब तक सोमवल्ली स्वस्वरूप से सुरक्षित रही, हमारी यज्ञविद्या प्रक्षुण्ण बनी रही । सोमवल्ली के विनाश के साथ वास्तविक यज्ञकर्म भी सर्वथा उच्छिन्न हो गया । पारमेष्ठ्य, अभ्भ नाम से प्रसिद्ध, पवित्रता सम्पादक गाङ्गेय सोम ही " ब्रह्मणस्पति ” नाम से प्रसिद्ध है । इस पवित्र सोम का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं--पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते । प्रभूर्गात्राणि पर्येषिविश्वतः ।

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणांपित र विज्ञानोपनिषत् जब तक उक्त लक्षण गाङ्गेय सोम शरीर में रहता है, तभी तक शरीर पवित्र रहता है, पूतिभाव रहित रहता है । पवित्र सोम के निकल जाने पर शरीर सड़ने लगता है । इसकी प्रतिष्ठा की मूलभित्ति तप्ततनू है । तात्पर्य यही है कि शरीर में व्यान के आधार पर प्राणापान का घर्षण होता रहता है, तब तक सर्वाङ्गशरीर में ताप लक्षण वैश्वानर अग्नि का संचार होता रहता है । जब तक शरीर में यह ताप लक्षण प्रग्नि प्रतिष्ठित है, तभी तक शरीर में पवित्र सोम प्रतिष्ठित है । अग्नि के निकलने के अव्यव -हितोत्तरकाल में ही प्राणमूर्ति यह पवित्र सोम निकल जाता । जब तक शरीर में रहता है, तब तक " दूषित वारुण कीटाणुओं का प्रभुत्व नहीं होता । इसके उत्क्रान्त होते ही वारुण कीटाणुओं को प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है । शरीर सड़ने लगता है । इसी सोम से भागीरथी का जन्म हुआ है । पारमेष्ठ्य तृतीय लोक से सर्वप्रथम यह सोम सौर ब्रह्माण्ड का भेदन कर सूर्य्यमण्डल में आता है । वहाँ से सजातीयाकर्षंण के अनुसार सौम्या उत्तर दिशा में जाता हुआ व्योमकेश चान्द्रमण्डल में प्रतिष्ठित होता है । वहाँ से अलकनन्दा में मिल कर गङ्गा रूप में परिणत होता है । तीन विभिन्न पथों का अनुगमन करने के कारण ही यह ब्रह्मदेवी भगवती भागीरथी " त्रिपथगा " नाम से प्रसिद्ध है । जब प्राणी मुमूर्षु होता है तो इसमें ब्रह्मणस्पति सोम अल्पमात्रा में रह जाता है । इस अल्पता को दूर करने के लिए ही उस समय प्रार्य ऋषियों ने गाङ्गेय पान कराना आवश्यक समझा है । इतर साधारण जल की अपेक्षा गाङ्ग ेय तोय में क्या विशेषता है, यह आज परीक्षित विषय हो चुका है । गंगा में अवश्य ही कीटाणुओं के नाश की शक्ति विद्यमान है । १० - यज्ञियः ( उत्क्रान्ति लक्षणः ) प्रकृतियज्ञ में ( सौरअग्नि ) में पारमेष्ठ्य ब्राह्मणस्पत्य सोम निरन्तर प्राहुत होता रहता है । निरन्तर दिव्य आदित्याग्नि में श्रद्धा नाम का चान्द्रसोम, पर्जन्य अग्नि में सोम नाम का प्रान्तरिक्ष्यसोम, पार्थिव अग्नि में वृष्टि नाम का प्राप्यसोम, एवं शारीराग्नि में औषधि ( अन्न ) रूप सोम प्राहुत होता रहता है । अचेतन - भौतिक - प्रसंज्ञजीवों में ( भौतिक जड़ पदार्थों में ) दिक्सोम प्राहुत होता रहता है । इसी प्रकार वैध यज्ञ में यज्ञकर्ता यजमान श्राहवनीयाग्नि में वल्लीसोम, एवं पुरोडाशसोम की आहुति डाला करते हैं । अग्नि में आहुत होने वाला यह सोम प्रारूप में परिणत हो कर अग्नि से उत्क्रान्त हो कर तत्तत् पदार्थों में अतिशय उत्पन्न करता हुआ स्वस्व पिण्ड पदार्थ के द्युलोक में प्रतिष्ठित होता रहता है । यह उत्क्रान्त सोम ही यज्ञिय नाम से प्रसिद्ध है । इसी से दैवात्मा का स्वरूप निर्माण होता है । इसी दैवात्मा के आकर्षण से आकर्षित यज्ञकर्ता यजमान का कर्म्मभोक्ता मानुषात्मा नियत आयुभोगानन्तर स्थूल शरीर के छोड़ने पर स्वर्गलोकस्थान नाम से प्रसिद्ध - प्रसिद्ध पृथिवी के सप्तदश स्थान में प्रतिष्ठित होता है । पूर्व के अग्नि विभूति प्रकरण में हमने रुद्रतत्त्व का दिग्दर्शन कराया है । रुक्ष अतएव क्षुब्ध वायव्याग्निरुद्र है । ठीक इसके विपरीत उपर्युक्त सौम्यवायु शान्तिधर्मा शिव है । रुद्र - वायु ही सौम्य शिवस्वरूप में परिणत हो जाता है । वही वायु शुद्ध आग्नेय होता हुआ वायु प्रवेश से शान्त होता हुआ रुद्र है, सोम प्रवेश से वही शिव । इसी अभिप्राय से " अग्निरुद्रः, तस्यैते द्वौ तन्वे घोरान्या च [ १२० ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् शिवान्या च " यह कहा गया है । दशविधसोम का निरूपण करते हुए पूर्व में हमने ब्रह्मणस्पति नाम के जिस पारमेष्ठ्य सोम का दिग्दर्शन कराया है, उसकी अवान्तर श्रम्भ- मरीचि - मर - आपः यह चार अवस्थाएँ हो जाती हैं । तीसरे द्युलोक में ( परमेष्ठी में ) अम्भ का, दूसरे शब्दों में वायु समुद्र में सर्वथा लघुभार अम्भ नाम का पानी प्रतिष्ठित है । दूसरे द्यलोक ( सूर्य्यं ) में मरीचि नाम का अग्निप्रकृतिः पानी प्रतिष्ठित रहता है । पृथिवी में भौतिक भाग से प्रतिमूच्छित प्रतएव मर नाम से प्रसिद्ध पेयं पानी प्रतिष्ठित रहता है । चान्द्रमण्डलगत स्नेहनधर्मा दृष्टि का जनक पानी ही श्रद्धा नाम से प्रसिद्ध है । यही अन्तरिक्ष्य प्राप: है । इन्हीं चारों अवस्थाओं को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-या दिव्या प्रापः पयसा सम्बभूवूर्या प्रान्तरीक्ष्या उतपार्थिवीर्य्याः । हिरण्यवर्णा यज्ञियास्तान आप: शिवा संश्योना सुहवाभवन्तु ॥ १ - प्रम्भः २ -- मरीचिः-या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुः । +हिरण्यवर्णं यज्ञियाः । ३: -- मरः -- -उतपार्थिवीर्याः । ४— आपः —— या अन्तरिक्ष्याः । अग्नि श्रङ्गिरस है, सोम भार्गव है, यम मध्यपतित है । अग्नितत्त्व किंवा अङ्गिरा तत्त्व घन-तरल - विरल इन अवस्थाओं के कारण अग्नि- वायु - प्रादित्य इन तीन भागों में विभक्त है । इन्हीं तीनों अवस्थाओं के कारण सोमतत्त्व, किंवा भृगुतत्त्व अबू - वायु - सोम इन तीन भागों में विभक्त है, एवमेव मध्यपतित, अतएव उभय धर्म्मा यम की भी उत्सादनलक्षणयम, स्तम्भनलक्षरणयम, श्रवसानलक्षरणयम भेद | से तीन अवस्थाएँ होती हैं । १ – अग्निः → घनता लक्षणः १ – अग्निः २ - वायु: ( रुद्रः )- तरलतालक्षणः + अङ्गिरा ३ – आदित्यः - विरलतालक्षणः १ - यमः ---- स्तम्भनलक्षणः २- वायुः २ - मृत्युः --- उत्सादनलक्षणः > यमः १३- अन्तकः → अवसानलक्षणः १ - आपः -- घनतालक्षणः ३ – सोमः २- वायुः-तरलता लक्षणः ३ – सोमः -- विरलतालक्षणः [ १२१ ] भृगुः

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwwww ~~~ विश्व के यच्चयावत् पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति, नाश ये तीनों व्यापार प्रवस्थानयुक्त उपयुक्त अग्नि-सोम - यम पर ही निर्भर हैं, अतएव इन्हें " पितर " कहा जाता है । सम्पूर्ण देवता, सम्पूर्ण भूत, सम्पूर्ण जीव ( प्रजा ), इन्हीं तीनों से उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न हो कर इन्हीं के आधार से जीवित रहते हैं एवं अन्ततोगत्वा इन्हीं तीनों में सारे प्रपञ्च का लय हो जाता है, परन्तु इतना विवेक अवश्य कर लेना चाहिए कि सोम से उत्पत्ति होती है, अग्नि से स्थिति होती है, एवं यम से विनाश होता है । पितरः -( १ – सोमः ( भृगुः ) - + प्रभवस्थान: ( प्रभवः ) २ – अग्निः ( अङ्गिराः ) - + स्थिति स्थान: ( प्रतिष्ठा ) _ ३ – यमः ( वायुः ) - परायण स्थान: ( परायणम् ) उपर्युक्त तीनों पितर क्रमशः उत्तर - दक्षिण - मध्यस्थान में अपनी - अपनी प्रधानता रखते हैं । श्राग्नेय पितर उक्थरूप दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित रहते हुए अर्क रूप से निरन्तर उत्तर की प्रकररणोपसंहार- ओर जाया करते हैं । दिग्विज्ञान के अनुसार दक्षिण प्रवाचीन ( नीचा ) स्थान है अतएव इन प्राङ्गिरस पितरों को " प्रवरपितर " कहा जाता है । सौम्य पितर उक्थ रूप से उत्तर दिशा में प्रतिष्ठित रहते हुए अर्क रूप से निरन्तर दक्षिण की ओर जाया करते हैं । उत्तर पर - स्थान है, अतएव इन सौम्य पितरों को " पर पितर " कहा जाता है एवं मध्याकाशस्थ ग्राम्य पितर निरन्तर नीचे की ओर आया करते हैं । ये ही " मध्यम पितर " नाम से प्रसिद्ध हैं । प्राकृतिक नित्य पितरों का यही संक्षिप्त परिचय है । इन तीनों नित्य प्राकृतिक पितरों के पितर ( जनक ) श्रङ्गिरा - वसिष्ठ - भृगु ये तीन ऋषिप्राण हैं । आङ्गिरस ( आग्नेय ) पितर वासिष्ठ ( याम्य ) पितर, भार्गव ( सौम्य ) पितरों की मूल प्रतिष्ठा क्रमशः अङ्गिरा - वसिष्ठ - भृगु ऋषि ही हैं । सर्वविध पितर प्राण के जनक ये ही ऋषिप्राण हैं अतएव इन ऋषि प्राणों के लिए अवश्य ही " पितृणांपितरः " यह कहा जा सकता है । इन पितृपितर रूप ऋषिप्राणों से उत्पन्न प्राणमात्र पितर हैं । पितरों से देव एवं असुर- सृष्टि होती है । देवासुर के समन्वय से विश्वसृष्टि होती है । इसी सृष्टि रहस्य को लक्ष्य में रख कर भगवान् मनु कहते हैं—

मनोर्हरण्यगर्भस्य ये मरोच्यादयः सुताः ।

तेषामृषीणामाद्यानां पुत्राः पितृगणः स्मृताः ॥१ ॥

ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देव दानवाः ।

देवैश्व जगत् सर्वं चरं स्थाण्वनु पूर्वशः ॥२ ॥

इति पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि पितृ णांपितरविज्ञानोपनिषत् समाप्ता [ १२२ ]

पृष्ठ 128

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अथ पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् तृतीया [ ३ ] पूर्व प्रकरण में पितरप्राण के मौलिक तत्त्व ( प्रभवतत्त्व ) का विस्तार से निरूपण किया जा चुका है । उसी प्रकरण में प्रसङ्गोपात्त प्राकृतिक नित्यपितरों दिव्यपितर स्वरूप विज्ञानोपक्रम - का यही संक्षेप में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । वे प्राकृतिक पितर अग्नि- सोम - यम नामों से प्रसिद्ध हैं । ये ही तीनों मौलिक पितर हैं । आगे बतलाए जाने वाले अवान्तर सभी पितर इन्हीं तीनों मौलिक पितरों से सम्बन्ध रखते हैं । ये प्राकृतिक नित्य पितर प्रकृति - भेद से क्रमश: दिव्यपितर ऋतु पितर- प्रेतपितर इन तीनस्वरूपों में परिणत हो जाते हैं । प्रत्येक विभाग में अग्नि - सोम - यम तीनों मौलिक पितर अन्वाभक्त ( शामिल ) हैं । इन तीनों में श्राद्धकर्म की अपेक्षा प्रधान रूप से प्रेतपितर ही निरूपणीय है अतएव सूची - कटाह - न्याय से सर्वप्रथम दिव्य एवं ऋपितरों का ही निरूपण अपेक्षित है । इन दोनों में भी क्रमप्राप्त पहिले दिव्य-पितरों का ही स्वरूप विज्ञ पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है अन्न पितर- अन्नादपितर - अनुभव पितर भेंद से दिव्यपितर तीन भागों में विभक्त माने गए हैं । इन तीनों में प्रथम प्रन्नपितर से पदार्थों की जीवन सत्ता रहती है । अन्नाद-सौम्यासः पितरः- पितर से जीवन सत्ता का उच्छेद होता है एवं अनुभय पितर से पदार्थों का स्तम्भन होता है । प्रत्येक पदार्थ ( वह जड़ हो अथवा चेतन ) अपनी जीवन-सत्ता के लिए अन्नात्मक पितरप्राण को खाया करता है । पितरप्राण को ( अन्नपितर को ) खाने वाले वे [ १२३ ]

पृष्ठ 129

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिव्यपितरविज्ञानोपनिषत् भोक्ता पदार्थ शीत - उष्ण- अनुष्णशीत भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । अग्निप्रधान पदार्थ उष्ण प्रकृतिक हैं, सोमप्रधान पदार्थ शीतप्रकृतिक हैं, एवं उभयप्रधान पदार्थ अनुष्णशीत प्रकृतिक हैं । दूसरे शब्दों में आग्नेय पदार्थ उष्ण हैं, सौम्य पदार्थ शीत हैं, उभय प्रकृतिका वाक् अनुष्णशीता है । अग्निप्रधान आग्नेय पदार्थों में आहुत होने वाले अन्न पितर " अग्नी - प्रात्ता - प्राहुता भवन्ति, श्रग्नावन्नरूपेण गृह्यन्ते " " अग्निना स्वदिताः - प्रास्वादिता भुक्ता वा " इस निर्वाचन के अनुसार " श्रग्निष्वाताः " नाम से प्रसिद्ध होते हैं । आर्द्र जलादि में आहुत होने वाले अन्नपितर " जलादिषु प्राद्र पदार्थेषु सीदन्ति, मुक्ता सन्तास्तिष्ठन्ति " इस निर्वचन के अनुसार सोमसद् नाम से व्यवहृत होते हैं । प्रोषधि वनस्पति आदि प्रनुष्णशीत किंवा शीतोष्ण हैं । इनमें आहुत होने वाले प्रन्नपितर " अनुष्णशीत पदार्थेषु सीदन्ति तत्र भुक्तास्तिष्ठन्ति " इस निर्वचन के अनुसार बर्हिषद् नाम से प्रसिद्ध हैं । अनुष्णशीत पदार्थों के लिए संकेत भाषानुसार " बहि " शब्द प्रयुक्त है व इन्हें बर्हिषद् कहना न्यायसङ्गत हो जाता है । अन्नरूप होने से उक्त तीनों पितरों को सौम्यासः कहा जाता है । अग्निपदार्थ उष्णपदार्थ आग्नेय हैं, सोमप्रधान शीत पदार्थ सौम्य हैं, एवं उभयप्रधान अनुष्णशीत पदार्थ याम्य हैं । तीनों में से सौम्यपितर अन्न रूप से उक्त तीनों अन्नादों में आहुत हो कर तीनों पदार्थों की रक्षा करने में समर्थ होते हैं । - १ - अग्निष्वात्ताः - उष्णद्रव्यैर्युक्ताः- - आग्नेयाः पितरः १ – सौम्यासः | २ – सोम सद् — शीत द्रव्यैर्युक्ताः सौम्याः पितरः ८३ – बर्हिषद् ः- + अनुष्णशीतद्रव्यैर्युक्ताः → याम्याः पितरः + अन्नपितरः दूसरा विभाग अन्नाद पितरों का है । प्रत्येक पदार्थ प्राजापत्य संस्था से सम्बन्ध रखने के कारण प्रतिक्षण वित्रस्त होता रहता है । यदि यह विसर्गभाव न हो तो पदार्थ कभी जीर्ण श्रङ्गिरसः पितरः- होता हुआ नष्ट ही न हो । सम्भूति के साथ विनाश का, उत्पत्ति के साथ लय का, स्थिति के साथ गति का आदान के साथ विसर्ग का नित्य सम्बन्ध है । भौतिक पदार्थ घन -- तरल - विरल भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । संकेत भाषानुसार घन प्रदार्थ हवि नाम से, तरल पदार्थ श्राज्य नाम से, एवं विरल पदार्थ सोम नाम से व्यवहृत होते हैं । घन पदार्थों की मात्रा खाने वाले पितर “ हविर्भुज ” नाम से प्रसिद्ध हैं । तरल पदार्थों को खाने वाले पितर " श्राज्यपाः ” नाम से व्यवहृत हुए हैं । विरल पदार्थों के भोक्ता पितर " सोमपाः " नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । यही तीनों कहीं - कहीं हविष्मतः-श्राज्यवन्तः - सोमवन्तः इन नामों से भी पुकारे गए है । हवि घन पदार्थ हैं, इसका पान नहीं होता, अपितु भोजन होता है । अतएव हवि खाने वाले पितरों को हविर्भुजः कहना ही उचित है । आाज्य ( घृत ) एवं * दिव्य पितरः - पराः ऋतु पितरः -- मध्यमाः प्रेतपितरः - प्रवराः १२४ ]

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पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् सोम दोनों ही एक प्रकार से तरल हैं, अतः दोनों पान की सामग्री हैं, प्रतएव ग्राज्य - सोमाहुति से सम्बन्ध रखने वाले दोनों को क्रमशः श्राज्यपाः - सोमपाः कहना अवर्थ होता है । अन्न खाना अग्नि का काम है, अतएव अग्नि को अन्नाद कहा जाता है । उक्त तीनों पितर त्रिविध अन्नों के भोक्ता होने से ही अन्नादपितर नाम से व्यवहृत किए जा सकते हैं । अन्नादाग्नि साक्षात् अङ्गिरा है । अतएव इनके लिए - " अङ्गिरसो न पितरः " यह कहा जाता है । ( १ - हविर्भुज: -+ घनपदार्थ भोक्तारः २ - अङ्गिरसः २ २ – प्राज्यपाः-८ ३ - सोमपाः - तरल पदार्थ भोक्तारः + श्रन्नाद पितरः + विरल पदार्थ भोक्तारः तीसरी श्रेण है अनुभय पितरों की । जो पितृप्राण न किसी को खाता है, एवं न किसी से खाया. पितर: - जाता है, जिसका एकमात्र कामं पदार्थों में स्तम्भन भाव उत्पन्न करना है, वहु सुस्वधावा याम्य पितर ही अनुभव पितर नाम से प्रसिद्ध है । यही अनुभय पितर " सुकाला: " - " सुकालिनः " - " सुस्वधावा " इत्यादि विविध नामों से तत्तद्विशेषस्थलों में व्यवहृत हुआ है । इस प्रकार अन्न - अन्नाद - ग्रनुभय भेद भिन्न तीन दिव्य पितरों की ३-३-१ इस क्रम से सात अवस्थाएँ हो जाती हैं । इन्हीं सातों पितरप्राणों से देवप्रारण उत्पन्न होता है । देवप्राण के सप्त दिव्य पितरः- उत्पादक होने से ही इन्हें दिव्यक्तिर कहा जाता है । अपि च प्रकृतिमण्डल को ही श्राधिदैविक जगत् कहा जाता है । उक्त सातों पितर इसी जगत् के सञ्चालक हैं, इसलिए भी इन्हें दिव्यपितर कहना न्यायसंगत है । पूर्व की " पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् " में हमने ऋषिप्राण को " पितृणांपितरः " कहा है । ऋषि भेद से ही पितरप्राणों के भिन्न - भिन्न धर्म्म हो जाते हैं । अग्निष्वात्ता नाम के अन्न पितर भृगुऋषि से उत्पन्न होते हैं । बर्हिषत् नाम के अन्न पितर अङ्गिरा ऋषि उत्पन्न होते हैं । समष्टिरूप से इन तीनों से उत्पन्न होते हैं, एवं सोमसत् नाम अन्न पितर अत्रिमहर्षि से अन्न पितरों की प्रतिष्ठा भृगुऋषि ही है । हविर्भुक् नाम के अन्नाद पितर पुलह ऋषिप्रारण मिश्रित अङ्गिरा ऋषि से उत्पन्न हुए हैं, प्राज्यपाः नाम के अन्नाद पितरों के उत्पादक कन प्रारणगभितपुलस्त्य ऋषि हैं, सोमपा नाम के अन्नाद पितर विराट् प्रागगभित भृगु ऋषि से उत्पन्न हुए हैं । समष्टिरूप से इन तीनों अन्नाद पितरों की प्रतिष्ठा अङ्गिरा ऋषि ही है । शेष सुकाली नाम से अनुभय पितरों का उपादान वसिष्ठाण माना गया है । इस प्रकार समष्ट्यात्मक तीन दिव्यपितरों के उत्पादक भृगु - अङ्गिरां - वसिष्ठ १ २ ३ ४ ५ ७ ६ तीन ऋषि हैं । व्यष्ट्यात्मक सात दिव्यपितरों के भृगु - अङ्गिरा - प्रत्रि - अङ्गिरा - पुलस्त्य - भृगु - वसिष्ठ ये ऋषिप्राण उत्पादक बने हुए हैं, जैसा कि निम्नलिखित कोष्ठक से स्पष्ट हो जाता है ---[ १२५ ]