Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 131–140
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 131–140
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड aaan प्राकृतिकाः - सप्त - दिव्यपितरः वैभ्राजाः दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् पितरः-अन्न प्रग्निष्वात्ताः १ १ ( दक्षिणा: ) विभ्राजमाना श्रमूर्त्ताः मध्यमाः भृगवः भार्गवाः भृगुः प्रतिष्ठा वा सोमपथाः २ २ बर्हिषदः ( मध्यमाः ) सोमपा श्रमूर्त्ताः मध्यमाः आङ्गि प्राङ्गि- भृगुःप्रतिष्ठा रसाः रसाः वा ३ सोमसदः ( उत्तराः ) सनातनाः सन्तानका अमूर्त्ताः मध्यमाः प्रात्रेयाः प्रात्रेयाः भृगुःप्रतिष्ठा वा प्राङ्गिरसः ४ १ हविर्भुजः * १ मारीचा: मूर्तिमन्तः पराः पोहा रसाः प्राङ्गि-अङ्गिरा -प्रतिष्ठा वा पौलस्त्याः ५ २ श्राज्यपाः * २ तेजस्विनः मूर्तिमन्तः पराः काईमा पौलस्त्या: अङ्गिरा-प्रतिष्ठा वा काव्या ६ ३ सोमपाः * ३ ज्योतिर्भासाः मूर्तिमन्तः पराः वैराजा काव्याः अङ्गिरा-प्रतिष्ठा वा ७ १ सुकालिनः * ४ मानसाः मूर्तिमन्तः प्रवराः वसिष्ठः वसिष्ठः वसिष्ठः प्रतिष्ठा अनुभय पितरः पितरः-अन्नाद इस पिण्डपितृयज्ञादि श्रीतकर्मो में उपयुक्त होने वाले दिव्यपितर सात ही समझने चाहिएँ । साथ ही में यह समझ लेना चाहिए कि अग्नि -- यम- सोम ये तीन तत्त्व ही अग्निष्वात्तादि सातों पितरों के देवता हैं । श्रग्निष्वात्ता का अग्नि से सम्बन्ध है । सोमसदों का सोम से सम्बन्ध है, एवं बर्हिषदों का यम से सम्बन्ध है । इसी प्रकार हविर्भुजों का श्रग्नि रो, सोमपा पितरों का सोम से, एवं श्राज्यपाओं का यम से सम्बन्ध है । इन ६ नों पितरों का दिव्य विभूति से सम्बन्ध है । सातवाँ सुकाली पितर देवभूति से शून्य है । इसमें केवल पार्थिव पूषाप्रारण की ही प्रधानता है अतएव सुकाली को शुद्रपितर कहा जाता है, जैसा कि आगे आने वाली प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् में स्पष्ट हो जायगा । * १ – ऐन्द्राणां क्षत्रियाणां पितरो हविर्भुजः । * २ - वैश्वदेवानां वैश्यानां पितरः प्राज्यपाः । * ३ – आग्नेयानां ब्राह्मणानां पितरः सोमपाः । * ४ - पौष्णानां शूद्राणां पितरः सुकालिनः । [ १२६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् www . अग्नि- सोम - यम इन तीन देवताओं को हमने पितरों की प्रधानभित्ति माना है । सोम अन्न है, अनि अन्नाद है अन्नादाग्नि के गर्भ में प्रविष्ट असोम अन्नाद से श्रात्मब्रह्म की सप्तपुरुषता-परिगृहीत होता हुआ " प्रत्तैवाख्यायते नाद्यम् " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार अन्नाद ही रह जाता है । यम - वायु को हमने आङ्गिरस बतलाया है । अङ्गिरा की अवस्थाविशेष ही अग्नि है । ऐसी अवस्था में आङ्गिरस वायुरूप यम का प्रन्ना-दाग्नि में अन्तर्भाव मान लेने में कोई क्षति नहीं होती । इस प्रकार अग्नि - यम- सोम तीनों अग्नि से गृहीत माने जा सकते हैं । इस प्राङ्गिरस अग्नि की अग्नि वायु आदित्य ये तीन अवस्थाएँ हैं । तल्लोकों में प्रति-ये तीनों देवता हैं । तीनों के साथ क्रमश: वसु - रुद्र - प्रादित्य देवतात्रों का सम्बन्ध है । वसुदेवता अग्निप्रमुख हैं, रुद्र देवता वायु प्रमुख हैं, आदित्य देवता आदित्य ( इन्द्र ) प्रमुख हैं । अग्नि की वसुरुद्र आदित्यावस्था ही पितरप्राण की देवता हैं । इन्हीं तीनों गणदेवतानों से पितरप्राण प्राप्यायित होता है, अतएव वसु - रुद्र - प्रादित्य को श्राद्धदेवता माना गया है, जैसा कि आगे के प्रकरणों में स्पष्ट हो जायगा । पूर्व में हमने अग्निष्वात्ता - बहिषत् - सोमसत् इन तीनों पितरों के क्रमशः भृगु – अङ्गिरा - अत्रि ये तीन ऋषि बतलाए हैं । कहीं - कहीं प्रग्निष्वात्ता के ऋषि अथर्वा भी माने गए । अथर्वा श्राङ्गिरस हैं । ऐसी स्थिति में अथर्वा का अङ्गिरा में ही प्रन्तभवि हो जाता है, फलतः तीन ही ऋषि रह जाते हैं । हिरण्यगर्भ ( केन्द्रस्थ मनोमय असुरतत्त्व ) से मनु का विकास हुआ, मनु से पितर प्रारण प्रवर्त्तक भृगु - मङ्गिरा - श्रत्रि- पुलस्त्य - पुलह - मरीचि - वसिष्ठ ये सात ऋषिप्रारण प्रादुर्भूत हुए । इनसे अग्नि-वातादि सात दिव्य पितर प्रादुर्भूत हुए । इन सातों से अस्मदादि प्रजावर्ग का विकास हुआ । इस १ २ सृष्टिधारा क्रम की अपेक्षा हम ( प्रजा ) पुत्र हैं । अग्निष्वात्तादि सातों दिव्य पितर पिता हैं । मरीच्यादि ३ ४ ५ सातों ऋषि पितामह हैं । मनु तत्व प्रपितामह है । हिरण्यगर्भ प्रजापति वृद्धप्रपितामह है । विशुद्ध अक्षर ६ ७ प्रतिवृद्ध प्रपितामह है । सर्वमूलभूत अव्यय पुरुष वृद्धातिवृद्धप्रपितामह है । " सा काष्ठा सा परागतिः " ( कठोपनिषत् १।३।१ ९ ) । इस प्रकार एक ही पुराणपुरुष सात अवस्थाओं में परिणत हो कर उक्त संतान क्रम का स्वरूप सम्पादक बन रहा है । एक अव्यय पुरुष की सपिण्डता सात धाराम्रों में वितत है— " सापिण्ड्यं साप्त ' पौरुषम् ” । १ - अव्ययः -२- अक्षरः -[ १ - षोडशीप्रजापतिः - पुराणपुरुष- - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः २ – विशुद्धः - अक्षर पुरुष: -( ३ - हृदयावाच्छिन्नास्त्रिकलोऽक्षरः प्रतिवृद्ध प्रपितामहः + वृद्धप्रपितामहः ४ — मनुः ५ - हिरण्यगर्भः ६— अक्षरः ७- श्रव्ययः १ – पुत्राः २- पितरः ३ – ऋषयः [ १२७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ३ - क्षरः--४ -- हृदयावाच्छिन्नो मनोमयोभावः प्रपितामहः ५ - हृदयादुत्थिताः सप्त प्राणः -- → पितामहः दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् www ६ – विभिन्न ऋषि प्राणयोगादुत्पन्ना सप्त संसर्गजाः प्राणाः पिता ७- पार्थिवी प्रजा- → पुत्र: उपर्युक्त सप्त दिव्य पितरों के सम्बन्ध में एक विप्रतिपत्ति उठाई जा सकती है । वह यही है कि पुराण ने सात के स्थान में ८ दिव्यपितर माने हैं । जैसा कि • विरोधाभास एवं तन्निराकरण-निम्नलिखित वचन से स्पष्ट हो जाता है-१ २ ३ ४ ५ कव्यवालो s-5- नलः - सोमो - यमश्च - वार्य्यमास्तथा ॥ ६ ७ अग्निष्वात्ता - बर्हिषदः सोमपाः - पितृदेवताः ॥१ ॥
वैदिक दृष्टि के अनुसार इस संख्या में कोई विरोध नहीं है । कारण स्पष्ट है । कव्य, अग्नि का ही विशेषण है एवं यम, अर्थमा का विशेषण है । इस प्रकार कव्यवाट् एवं अर्थमा का क्रमशः अग्नि-यम में अन्तर्भाव मान लेने से कोई आपत्ति नहीं होती । हाँ आपत्ति है " कव्यवाल: " इस पाठ पर । यद्यपि निरुक्त परिभावानुसार स्वर - द्वय मध्यस्थ डकार दुःस्पष्ट होता हुआ लकाररूप में परिणत हो सकता है । ऐसी अवस्था में कव्यवाड़ का कव्यवाल बनना यथाकथञ्चित् सम्भव है । परन्तु इसका अकारान्त हो जाता ( कव्वाल बन जाना ) सर्वथा - असंभव ही है । अस्तु प्रकृत में केवल यही कहना है कि कव्यवाट् किंवा कव्यवाल का अग्नि में, एवं अर्थमा का यम में अन्तर्भाव हो जाता है, इस प्रकार पुराणमतानुसार ६ ही पितर रह जाते है, एवं श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सुकाली को मिलाकर ७ पितर हो जाते हैं । वैदिक तत्त्वों के आधार पर उपबृंहित पुराणशास्त्र का वास्तविक मर्म न समझते हुए कुछ एक अज्ञ महानुभावों ने पुराणपाठों को बिगाड़ कर उनमें मनमाना बना कर जो प्रार्य्य संस्कृति का विनाश किया है, वह उनका अक्षम्य अपराध है । ऐसे कुछ वचनों की ओर नीरक्षीर विवेकी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है-अग्निवत्ता बर्हिषद श्राज्यपाः सोमपाः स्मृताः रश्मिपा उपहूताश्च तथैवायन्तु नः ॥ १ ॥
तथा स्वादु सदश्चान्ये स्मृता नान्दीमुखानृप ।
एते पितृगणाः ख्यातास्ते च देवसमुद्भवाः ॥२ ॥
श्रदित्या वसवो रुद्रा नासत्यावश्विनावपि ।
सन्तर्पयन्ति ते वैतान् मुक्त्वा नान्दीमुखात् पितृन् ॥३ ॥
[ १२८ ] ( स्कन्दपुराण - नागखण्ड ) ।
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् उक्त वचनों से पाठकों को पता लगेगा कि पुराण ने अग्निष्वात्तादि से अतिरिक्त रश्मिपाः-उपहूताः — प्रायन्तुनः– स्वादुषदः ये चार पितर बतलाए हैं । पुराणों के अन्य स्थलों में एवं श्रौत ग्रन्थों में कहीं भी उक्त चारों पितरों का उल्लेख नहीं मिलता । ऐसी अवस्था में उक्त वचनों को सिवाय प्रक्षिप्त मानने के अन्य गति नहीं है । उपहूताः एवं प्रायन्तुनः पितरों के कोई स्वतन्त्र नाम नहीं हैं अपितु " उपहूताः पितरः सौम्यासः " " प्रायन्तु नः पितरः सौम्यासः " ( हमारे सौम्य पितर इस पिण्ड पितृयज्ञ में पधारें ) इत्यादि मन्त्रों में अग्निष्वात्तादि शास्त्रसम्मत पितरों के आह्वान के लिए ही " उपहूताः-आयन्तु नः " ये पद प्रयुक्त हुए हैं । इसी प्रकार रश्मिपाः - स्वादुषदः नाम के भी कोई स्वतन्त्र पितर नहीं हैं अपितु ये भी पितरों के विशेषण ही हैं । प्रर्थानभिज्ञ संशोधकों ने उपहूताः प्रादि को भी स्वतन्त्र । पितर मान कर शास्त्र का कैसा उपकार किया है? यह पाठक स्वयं विचार करें । नन्दपुराण में अग्निष्वात्ता, बर्हिषदः, काव्य, सुकाली, यम भेद से पाँच प्रकार के पितर माने गए हैं । इनमें हविर्भुक् ही यमपितर हैं । सुस्वधा आदि प्राज्यापादि पितरों के ही नामान्तर है । हारीत-स्मृति में निम्नलिखित रूप से पितरों का उल्लेख मिलता है— सोमोयमोऽङ्गिराश्चैव सोमपा पितरस्तथा बर्हिषदोऽग्निष्वात्ताश्च हुतादः षड्विधोगरणः ॥ १ ॥
चन्द्रमा ऋतवश्चैव मृतं योऽग्निर्दहत्यपि ।
पहूताः प्राक् सोमा अनीजानाश्च ब्राह्मणः ॥२ ॥
इनमें से चन्द्रमादि सोमानुबन्धी पितर हैं । ऋतादि का प्राज्यपा में अन्तर्भाव है । काली पितर ही अनजान पितर हैं । इस प्रकार पुराण स्मृत्यन्तरोक्त इतर पितरों का पूर्वप्रतिपादित ६ दिव्यपितरों में ही अन्तर्भाव हो जाता है । ज्योति - सोम - श्रापः इन तीनों तत्त्वों से क्रमश: देवता - पितर - असुर तत्त्वों का आविर्भाव होता प्रकरणोपसंहार-है | ज्योति इन्द्रतत्त्व है, सोम भृगुतत्त्व है, आप: वरुणतत्त्व है । प्रकाश देवता है । घोर अन्धकार असुर है । छाया ( प्रकाश एवं अन्धकार की सन्धि ) पितर है । सौर प्रकाश सावित्र नाम से प्रसिद्ध है । जिसे प्रातप ( धूप ) कहा जाता है वही सावित्र दिव्य तेज है | इसमें इन्द्र प्रमुख देवप्राण प्रतिष्ठित रहता है, रात्रि में असुर प्रारण का साम्राज्य है, किन्तु छाया में ( जो कि छाया गायत्रतेज युक्त है ) पितरप्राण प्रतिष्ठित रहता है । प्रतिफलित सौर तेज से ही गायत्री का स्वरूप सम्पन्न होता है । धूप नहीं है किन्तु प्रकाश है, यह सूर्य्यरश्मियों के प्रतिफलन की ही महिमा है । इसी छायामय प्रकाश को गायत्री कहा जाता है क्योंकि इसी में पितरप्राण प्रतिष्ठित है, अतएव पितृकर्म में गायत्री देवता को प्रधानता दी जाती है, इसीलिए पितृकर्म में दोने ग्रोंधे कर दिए जाते [ १२६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् हैं । भूपिण्ड का प्रकाशयुक्त दृश्यभाग देवप्राणयुक्त है, अधोभाग असुरमय है, परन्तु यदि कहीं गर्त्त है तो उसमें रहने वाला प्राण पितर है । पितर के इन्हीं स्वरूपधर्मों को लक्ष्य में रख कर निम्नलिखित श्रौत -वचन हमारे सामने आते हैं-१ - " तत्तमसः पितृलोकादादित्यं ज्योतिरभ्यायन्ति " ( शत ० १३८।४।७ ) । २ - " तिर इव वै पितरः " ( शत ० २ | ६ | १ | १ ९ ) । ३ – " अपक्षय भाजो वै पितरः " ( कौ ० ५/६ ) । ४ - " पितृदेवत्यो वै कूपः खातः " ( शत ० ३ । ६ । १।१३ ) । ५ - " पराञ्च उ वै पितरः " ( कौ ० ५।६ ) । इति पितरविज्ञानोपनिषदि दिव्यपितरविज्ञानोपषित् समाप्ता [ १३० ]
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अथ पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि ऋतु पितरविज्ञानोपनिषत् चतुर्थी [ ४ ] पितर शब्द का सामान्य अर्थ है, पदार्थों को उत्पन्न कर उनका पालन ( रक्षण ) करना । इस सामान्य परिभाषा के अनुसार ऋतुओं को भी पितर माना जा सकता है । तत्तद्द्तुनों ऋतु पितरस्वरूप जिज्ञासा - में तत्तस्तुओं से ही तत्तत् पदार्थ उत्पन्न होते हैं । जिस पदार्थ की ऋतु ( मौसम ) नहीं होती, वह उस समय उत्पन्न नहीं होता । षड्ऋतुसमष्टि ही संवत्सर है, ऋतुमूर्ति संवत्सर ही पार्थिव पदार्थों का जनयिता है अतएव संवत्सर को प्रजापति कहा जाता है । इस प्रकरण में ऋतुलक्षण पितर का ही स्वरूप बतलाया जायगा । ऋतुपितर का क्या स्वरूप है? इस प्रश्न के समाधान से पहिले ऋतु का स्वरूप वेदप्रेमियों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है । " पितृणां पितर " का स्वरूप बतलाते हुए उसी प्रकरण में अग्नि और सोम की ऋत सत्य भेद से दो - दो अवस्थाएँ बतलाई गई । साथ ही में वहीं यह भी कहा गया है कि दिग्विभाग प्रदर्शन - ऋतसोम वायुरूप है, इसकी सत्ता उत्तर में है अतएव उत्तर को सौम्यादिक् कहा जाता है । ऋताग्नि वायुरूप है, इसकी सत्ता दक्षिण में है, अतएव दक्षिण को याम्यादिक कहा जाता है । उधर सत्यसोम प्रत्यक्षदृष्ट चन्द्रपिण्डात्मक है, यह अपनी मूल प्रतिष्ठा पश्चिम में रखता है । सत्याग्नि प्रत्यक्षदृष्ट सूर्य्य पिण्डात्मक है, यह पूर्वादिक में प्रतिष्ठित है । हमारी ऋतु का सम्बन्ध ऋतअग्नि एवं ऋतसोम के साथ समझना चाहिए । दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहरूप से जाने वाले योनिस्वरूप वायव्य ऋताग्नि में उत्तर से दक्षिण ऋतु और ऋत्विक् की ओर प्रवाह रूप में जाने वाला रेतःस्वरूप वायव्य ऋतसोम निरन्तर आहुत होता रहता है । इस ऋताग्निसोम के समन्वय से जो एक अपूर्व भाव उत्पन्न होता है वही ऋग्नि एवं ऋतसोम के सम्बन्ध से ऋतु नाम से व्यवहृत होता है । दक्षिणाक्रीत होता-श्रध्वर्यु - उद्गाता - ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध यज्ञकर्ता ऋताग्नि में ऋतसोम की आहुति देकर ही यज्ञात्मा सम्पन्न करते हैं अतएव ( ऋतुसम्बन्ध से ही ) इन्हें ऋत्विक् नाम से व्यवहृत किया जाता है । [ १३१ ]
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खण्ड. श्राद्धविज्ञान द्वितीय : निरायतनाग्निः ) वायव्योवायुमूर्ति ३ – १ – ऋताग्निः ( भचक्र उदिया [ १३२ } ऋतुपितरविज्ञानोपनिषत् www दक्षिणा दिक् - → उत्तरादिक् दक्षिणा दिन मूत्तिः पूर्वादिक् सूर्य्य पिण्डात्मकः सूर्य्य साय तनाग्निः ) -१ - २ - सत्याग्निः ( पश्चिमादिक् --- → चन्द्रपिण्डात्मकश्चतुर्मूर्तिः ( सायतनसोमः ) २--२ -- सत्यसोमः ---- + सोमः ) + वायव्योवायुमूत्तिः ४–२ – ऋतसोमः ( निरायतन
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतुपितर विज्ञानोपनिषद् उपर्युक्त ऋताग्नि ही यज्ञस्वरूपसमर्पक होता हुआ यज्ञाग्नि नाम से प्रसिद्ध है । इस ऋताग्नि रूप की गायत्राग्नि - सावित्राग्नि - नाक्षत्रिकाग्नि भेद से तीन अवस्थाएँ हो जाती दशविध प्रग्निविवर्त— हैं । इनमें तीसरे नाक्षत्रिकारिन की. ( प्रान्तरिक्ष्य आठ नाक्षत्रिक सर्पों के कारण ) अवान्तर आठ अवस्थाएँ हो जाती । इस प्रकार तीन के स्थान में अग्नि की दस अवस्थाएँ हो जाती हैं । याज्ञिक परिभाषा के अनुसार ये ही तीनों अवस्थाएँ क्रमशः गार्हपत्याग्नि- श्राहवनीयाग्नि- धिष्ण्याग्नि नाम से प्रसिद्ध हैं । हम कह चुके हैं कि ऋतु से ही संवत्सर यज्ञ का स्वरूप निर्माण होता है । ऋताग्नि सोमात्मक यह संवत्सरयज्ञ विभूति सम्बन्ध से सम्पूर्ण त्रैलोक्य ( स्तौम्य त्रैलोक्य ) में व्याप्त है । त्रिवृत्पञ्चदश- एकविशस्तोमरूप पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौ इन तीनों लोकों में ऋताग्नि वायुरूप से व्याप्त है । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न प्रातः सवनाधिष्ठाता पार्थिव अग्नि गायत्र ( गार्हपत्य ) है । पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न माध्यंदिनसवनाधिष्ठाता प्रान्तरिक्ष्याग्नि ( वायु ) नक्षत्र सम्बन्ध से नाक्षत्रिक ( धिष्ण्य ) नाम से प्रसिद्ध है, एवं एकविंशस्तोमावच्छिन्न, सायंसवनाधिष्ठाता दिव्य-लोकस्थ अग्नि ( आदित्य ) सविता प्राण के सम्बन्ध से सावित्र ( ग्राहवनीय ) नाम से प्रसिद्ध है । पूर्वोक्त दशविध ऋताग्नि में आहुत होने वाला सोम त्रिंशद्विध ( ३० प्रकार का ) है । १ - दिक् सोम, १ – ब्रह्मणस्पति सोम, १ – चन्द्रसोम ( भास्वरसोम ), २७ – गन्धर्व त्रिंशद्विधसोमतत्त्व — सोम भेद से एक ही सोमतत्त्व ३० अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । दशविध अग्नि, एवं त्रिंशद्विध सोम दोनों का आवपन वायु है । वायु सम्बन्ध से ही इन दोनों को ऋत कहा गया है । उक्त तीनों अग्नियों में से पार्थिव गायत्राग्नि का दिक्सोम के साथ सम्बन्ध है एवं नाक्षत्रिक प्रान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि का गन्धर्वसोम के साथ सम्बन्ध है । चन्द्रसोम का नाक्षत्रिक अग्नि के साथ भी सम्बन्ध है एवं औषधिरूप से पार्थिव अग्नि के साथ भी सम्बन्ध है— १ – गायत्राग्निः — एकविधः – पार्थिवः - दिक्सोमेन, चन्द्रसोमेन त्र सम्बद्धः । २ — नाक्षात्रिकाग्निः - प्रष्टविधः – प्रान्तरिक्ष्यः - गन्धर्व सोमेन, चन्द्रसोमेन च सम्बन्धः । ३ – सावित्राग्निः — एक विधः – दिव्यः — ब्रह्मणस्पति सोमेन सम्बन्धः । प्रयोजिका धर्मत्रयी-इन त्रिविध युग्मों में से गायत्राग्नि और दिक्सोम का युग्म सदा एकरूप रहता है । सदा - सर्वत्र दोनों समभाव से व्याप्त रहते हैं । अतएव इन दोनों से पदार्थों में कोई विशेष तारतम्य उत्पन्न नहीं होता । धिष्ण्याग्नि एवं गन्धर्व सोस का युग्म सदा विभिन्न करता रहता है । ग्रतएव प्रतिसंवत्सर में इन दोनों अग्नि - सोमों के तारतम्य मार्ग का ही अनुसरण * सर्वतः आधार को प्रवपन कहा जाता है, एवं एकत: आधार को आयतन कहा जाता है । उदाहरण के लिए पृथिवी हमारा प्रयतन है, आकाश आवपन है । वायुतत्त्व अग्निसोम के चारों ओर से वेष्टित रहता है, अतएव इस वायु को हम अवश्य ही प्रवपन शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । [ १३३ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डे wwwwww ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् । wwwwwwwwww से प्रतिक्षण पदार्थों में वैलक्षण्य उत्पन्न हुआ करता है । प्रातःकाल हमारा मन दूसरी भावना से युक्त रहता है, मध्याह्न में चित्तवृति भिन्न प्रकार की ही रहती है, सायंकाल मानसवृत्तियों का और ही स्वरूप रहता है, रात्रि की अवस्था कुछ और ही । यह है स्थूल अनुमान । यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाता है तो हमें मानना पड़ेगा कि उक्त मानस वृत्तियों का भावपरिवर्तन क्षण - क्षण में परिवर्तित होता रहता है । इसीलिए तो पदार्थों में ( जड़ - चेतनात्मक उभयविध पदार्थों में ) प्रतिक्षरण विलक्षणता का उदय होता है । यह धिष्ण्याग्नि एवं गन्धर्वसोम युक्त चान्द्रसोम के तारतम्य का ही फल है । शेष रहता है - सावित्राग्नि, एवं ब्रह्मणस्पति सोम । इन तीनों का उद्ग्राभ ( चढ़ाव ) निग्राभ ( उतार ) श्रहोरात्र ( दिनरात ) से सम्बन्ध रखता है । ग्रहःकाल में सावित्राग्नि का उद्ग्राभ रहता है, रात्रिकाल में सावित्राग्नि का अपचय ( ह्रास ) रहता है । रात्रिकाल में ब्रह्मणस्पति सोम का उपचय ( वृद्धि ) रहता है, दिन में इसका अपचय रहता है । इस प्रकार इन तीन युग्मों से पदार्थों में १ – सर्वदासमान स्थिति, २ – प्रतिक्षरण -परिवर्तन, ३ – प्रहोरात्र में उपचयापचय, यह धर्म उत्पन्न हो जाते हैं । पदार्थों में जो एक अपरिवर्तनीय भाव देखा जाता है, वह एक स्थिर धर्म इसका प्रयोजक दिक्चान्द्रसो मगर्भित पार्थिव अग्नि है । पार्थिव अग्नि धनावस्थापन्न है, अतएव आकर्षणबल प्रधान है । इसी गुरुत्व से स्थिर धर्म का उदय होता है । गन्धर्व - चान्द्रसोमगर्भित प्रान्तरिक्ष्य नाक्षत्रिक अग्नि तरल होता हुआ वायुरूप है । वायुतत्त्व सदागति है, प्रतिक्षण विचाली है । अतः इसके सम्बन्ध में प्रतिक्षण विलक्षणता का उदय होना स्वाभाविक है । सावित्राग्नि अहोरात्र से सम्बन्ध रखता है । फलतः दिन रात में होने वाले उपचयापचय भाव का इस युग्म के साथ सम्बन्ध हो जाना स्वाभाविक कोटि में आ जाता है । १ - गायत्राग्नियुक्तो दिक्सोमः स्थिर धर्मप्रयोजकः पार्थिवः २- धिष्ण्याग्नियुक्तोगंधर्व सोमश्चन्द्रादयः- + प्रतिक्षण वैलक्षण्य प्रयोजकः प्रान्तरिक्ष्यः ३ - सावित्राग्नियुक्तो ब्रह्मणस्पतिसोमः - अहोरात्रत्रिउपचयापचय भा. प्र. दिव्यः * -यह तो हुई सामान्य तारतम्य की कथा । अब विशेष तारतम्य पर दृष्टि डालिए । " पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते " इत्यादि रूप से उपवरित, अम्भः नाम के तोय का प्रवर्तक ऋतुसर्ग मीमांसा - पवित्र सोम पारमेष्ठ्य है । सूर्य्यमण्डल से ऊपर तृतीय नाम से प्रसिद्ध परमेष्ठी मण्डल में इसकी सत्ता है । वहाँ से यह पवित्र ब्रह्मणस्पति सोम सावित्राग्निमय सूर्य्यं में निरन्तर प्राहुत होता रहता है । अग्निसोमात्मक इसी नित्य अग्निहोत्र के लिए - " सूर्थ्य हि वा अग्निहोत्रम् " ( शतपथ ) यह कहा जाता है । सूर्थ्य के चारों ओर क्रान्तिवृत्त नाम से प्रसिद्ध नियत मार्ग पर भूपिण्ड परिक्रमा लगाया करता है । इस परिक्रमा से सूर्य में – दक्षिणायन - उत्तरायण भेद से दो भाव उत्पन्न हो जाते हैं । जब भूपिण्ड उत्तरगोल में आता है तो सूर्य्य पृथिवी के अधोभाग में दिखलाई देने लगता है, एवं जब पृथिवी दक्षिणगोल में आती है तो सूर्य्य पृथिवी के ऊर्ध्वभाग में दिखलाई पड़ता [ १३४ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwm ऋतु पितरविज्ञानोपनिषत् है । दक्षिणगोलस्थ सूर्योपलक्षित संवत्सर भाग में पृथिवी सूर्य्यं के ऊपर रहती है । ऐसी परिस्थिति में पृथिवीपरमेष्ठीमण्डल के निकट रहती है, सोममात्रा अधिक मात्रा से पृथिवी पर प्राती है, यही शीत ऋतु है । परन्तु जब पृथिवी उत्तरभाग में आ जाती है तो यह परमेष्ठी से बहुत दूर हट जाती है, ऐसे समय में पृथिवी पर सोममात्रा अत्यल्प मात्रा में प्राती है, यही ग्रीष्म ऋतु है । यह सांवत्सरिकतारतम्य, किंवा शीत- ग्रीष्म- तारतम्य सावित्राग्नि, एवं ब्रह्मणस्पति सोम से सम्बन्ध रखता है । गन्धर्वसोम नक्षत्र भेद से भिन्न - भिन्न स्वरूप धारण कर लेता | अतएव नक्षत्र सम्बन्धी श्राश्विन-कात्तिकादि तत्तन्मासों में तत्तन्नक्षत्रों के सामीप्य एवं विदूर भाव से सोमाग्नि का तारतम्य हुआ करता है | जिस नक्षत्र पर पृथिवी रहती है, वह उस महीने की पूर्णिमा है । वह महिना उसी नक्षत्र के नाम से व्यवहृत होता है । नक्षत्र सन्निधिकालात्मिका पूर्णिमा तिथि में धिष्ण्य अग्नि की प्रधानता रहती है, एवं अमावस्या तिथि में चन्द्रसोम गर्भित गन्धर्व सोम का साम्राज्य रहता है । इस प्रकार पूर्णिमा प्रभा भेद से प्रत्येक मास में अग्नि - सोम का तारतम्य दो अवस्थाओं में परिणत रहता है । ग्रागे जा कर चन्द्रसोम की अपेक्षा से प्रतिपक्ष में अग्नि- सोम का तारतम्य हो जाता है । अन्ततोगत्वा यह तारतम्य प्रतिक्षण में भुक्त हो जाता है । पहिला क्षरण ऋताग्निप्रधान है तो दूसरा क्षण ऋतसोमप्रधान है । इस निदर्शन से यह सिद्ध हो जाता है कि सब ऋतुस्रों में सब ऋतुओं का, दूसरे शब्दों में प्रत्येक ऋतु में इतर सब ऋतुओं का स्वरूप अनुप्रविष्ट ' रहता है । महाकालपुरुषात्मक संवत्सर ऋतुमूर्ति है । उत्तरायण दक्षिणायन भाग सर्वर्तुमूर्ति हैं । मास - पक्ष - अहोरात्र - मुहूर्त - घटिका - होरा - क्षण प्रत्येक सर्व मूत्ति हैं । ऋतु के इसी व्यापक स्वरूप को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-“ ऋतवो वा असृज्यन्त । ते सृष्टा नानैवासन् । तेऽब्रुवन् न वा इत्थं सन्तः शक्ष्यामः प्रजनयितुम् । रूपैः समायामेति । त एकैकमृतुरूपैः समायन् । तष्मादे-कैकस्मिन् ऋतौ सर्वेषां ऋतूनां रूपम् " ( शत ० ८।४।२।४ ) । इस प्रकार उक्त कथन से यद्यपि प्रत्येक क्षण में सब ऋतुओंों का भाग सिद्ध हो जाता है, तथापि ऋतु सम्बन्धी राशि चक्र - जैसे सूक्ष्मान्तर दशा में भी उपयुक्त होने वाली ग्रहदशाओं का प्रायु - रूप से स्थूल - दशा - विभाग माना जाता है, एवमेव ऋतुओं की भी वसन्त - ग्रीष्मादिरूप से स्थूल व्यवस्था मानना आवश्यक हो जाता है । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी एवं एकविंशस्तोमावच्छिन्ना द्यौ के संयोगजनित तारतम्य की अपेक्षा से ही वसन्तादि ६ विभाग उत्पन्न होते हैं । एक संवत्सर मण्डल में ( जो कि ज्योतिश्चक्र परिभाषानुसार खगोल नाम से प्रसिद्ध है ) १ – मेष, २ – वृष, ३ – मिथुन, ४ – कर्क, ५ – सिंह, ६ – कन्या, ७ – बुला, ८ - - वृश्चिक, 8 – धनु, १० – मकर, ११ – कुम्भ, १२ – मीन इन १२ राशियों की सत्ता मानी जाती है | खगोलीय ( क्रान्तिवृत्तावच्छिन्नसंध्याकाशस्थ ) सम्पूर्ण नक्षत्रों को १२ विभागों में कल्पित मान कर तत्तद्विभागावच्छिन्न तत्तन्नक्षत्रराशि ( समूह ) की मेष, ( भेड़ ), वृष ( बैल ) प्रादि काल्पनिक चित्रों की [ १३५ ]