Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 141–150
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 141–150
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ४ ५ १ २ २ ३ ७२ ७२ ५ ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् १ ६ ५ ६ ३ ४ १ ४ ५ [ १३६ ] कल्पना की गई । मेषवृषादि अनेक नक्षत्रों के स्तूप रूप हैं, अतएव इस विभाग को राशि शब्द से व्यवहृत करना न्यायसङ्गत होता है । इन १२ राशियों के साथ २७ नक्षत्रों का भोग होता है ६ - ६-६ इस क्रम से क्रमशः ४–४–४ इन राशियों का विभाजन हुआ है । २७ नक्षत्रावच्छिन्न १२ राशियों में से दो - दो राशियों के साथ एक - एक ऋतु का भोग माना जाता है । भगवान् शुमाली दक्षिणगोल के परमक्रान्तिरूप मकरवृत्त ( जो कि मकरवृत्त विज्ञान भाषा में गायत्रीछन्द नाम से प्रसिद्ध है ) पर पहुँच कर जब उत्तर की ओर अपना रुख करते हैं तो यह काल उत्तरायण नाम से व्यवहृतं किया जाता है । इस उत्तरायण काल में सात अहोरात्र वृत्तों में से मध्यस्थ विष्वद्वृत्त के दोनों ओर ( उत्तर - दक्षिण ) ३० - ३० अंश का ( सम्भूय ६० अंश का ) जो संवत्सर का अंशभूत काल परिमाण है, वही वसन्त नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्येक राशि ३० अंश की होती है । ऐसी दशा में एक ऋतु में ६० अंश के हिसाब से २ राशियों का भोग सिद्ध हो जाता है । इस षष्ट्यंशात्मक वसन्त के आगे विषुवत् से उत्तर की ओर का षष्ट्यंशात्मक ( ६० ) २ ३ काल ग्रीष्म है । वसन्त के दक्षिण भाग की ओर षष्ट्यंशात्मक काल ( ६० ) वर्षा है । ग्रीष्म के उत्तर भाग की ओर का षष्ट्यंशात्मक काल शरत् है । वर्षा के दक्षिण भाग की ओर का षष्ट्यंशात्मक ( ६० ) काल हेमन्त है । शरत् के सर्वान्त की ओर के उत्तर भाग में षष्ट्यंशात्मक ( ६० ) काल शिशिर है । इस प्रकार विषुवत् को मध्य मान कर मध्य, उत्तर, दक्षिण, उत्तर, दक्षिण, उत्तर इस क्रम से १२ राशियों में ६ ऋतुएँ विभक्त हो जाती हैं । ऋतु विभाग के अतिरिक्त ब्राह्मणग्रन्थों में पञ्चर्तुविभाग को भी महत्त्व दिया गया । यही नहीं, यज्ञकर्म में तो प्रायः पञ्चर्तु पक्ष को ही प्रधान माना है । इन पाँच ज्ञानुगत पञ्चतु विभाग - ऋतुनों का अभिप्लव स्तोम के साथ सम्बन्ध है । अभिप्लव स्तोम का प्रकृत में निरूपण नहीं किया जा सकता । यहाँ केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि उत्तरगोल में जिस दिन दक्षिणायन काल का प्रवेश होता है, उस दिन से आरम्भ कर ७२ दिन का काल खण्ड किंवा संवत्सरखण्ड वर्षा है । आगे इसी क्रम से काल खण्ड ७२ ७२ क्रम से शरत् हेमन्त शिशिर -वसन्त- ग्रीष्म ऋतुओं में विभक्त हैं । इस पञ्चर्तु पक्ष में " हेमन्त शिशिरयोः समासेन " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार हेमन्त एवं शिशिर दोनों को एक ऋतु मान लिया जाता है । मध्य में वर्षा है । इसके एक ओर वसन्त- ग्रीष्म ये दो अग्निप्रधान ऋतुएँ हैं, एक चोर शरत् - हेमन्तयुक्ता शिशिर दो सोमप्रधान ऋतुएँ हैं । मध्य की वर्षा में अग्नि - सोम दोनों की समानता है अतएवं इस ऋतु को वर्षा ( वर्षोपलक्षितपूर्ण ) ऋतु माना जाता है । जैसा कि अनुपद में ही स्पष्टं होने वाला है । इस प्रकार पाँचों ऋतुओं के ७२ १ ७२ २ इन पाँच द्वासप्ततियों का यदि संकलन किया जाता है - तो ३६० ( तीन सौ साठ )
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतुतिरविज्ञानोपनिषत् अहोरात्र हो जाते हैं । यही एक संवत्सर का भोगकाल है । ऋतुओं का यह पञ्चविभाग प्रति पुरातन है । इसी आधार पर हमारे मरुधर प्रान्त ( मारवाड़ ) में " पून्यू पड़वा टाळे तो दिन बहत्तर गाळं ” ( अर्थात् यदि ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, एवं आषाढ कृष्णा प्रतिपत् इन दो दिनों में वर्षा नहीं होती है तो पूरे बहत्तर दिन तक पूर्ण वृष्टि होती है, यह किंवदन्ती प्रचलित है । प्रत्येक ऋतु में ७२ - ७२ दिन हैं । इस ७२ दिवसा-त्मक ऋतु में प्रस्ताव - उद्गीथ - निधन नाम से तीन - तीन सामों का उपभोग होता है । इन तीन सामों के कारण ७२ दिन के क्रमश: १६ -४० - ९ ६ ये तीन विभाग हो जाते हैं । प्रस्ताव साम स्थानीय प्रारम्भ के १६ दिन तत्तत् ऋतु का प्रातः सवन काल है । यह तत्तत् ऋतु की बाल्यावस्था है । यही प्रस्ताव नाम के साम का उपभोग होता है । उद्गीथ साम मध्य के ४० दिन तत्तत् ऋतु का माध्यंदिन सवन काल होता है । यह तत्तत् ऋतु की युवावस्था है । यहाँ तत्तत् ऋतु का पूर्ण विकास रहता है । यहीं उद्गीथ नाम के साम रस का उपभोग होता है । उद्गीथ ही सामों का परम रस कहा जाता है । ( द्रष्टव्य छान्दोग्य उपनिषद् हिन्दी विज्ञान भाष्य ) । निधन साम स्थानीय उत्तर के १६ दिन तत्तत् ऋतु का सायंसवन काल है । यह तत्तत् ऋतु की वृद्धावस्था है । यहीं निधन नाम के साम का उपभोग होता है । बाल्य - युवा-वृद्धावस्थापन्न प्रत्येक ऋतु उक्त प्रकार से १६ -४०-१६ भागों में विभक्त रहती हुई ७२ दिन तक अपनी जीवनसत्ता रखती है । प्रकारान्तर से विचार करिए । अग्नि - सोम सम्वन्ध से आपको शीत एवं उष्ण इन दो ऋतुओं की ही प्रधानता मिलेगी । इन दोनों में अग्नि की तीन अवस्थाओं का नाम षऋतु स्वरूप प्रदर्शन-वसन्त- ग्रीष्म - वर्षा है, एवं सोम की अवान्तर तीन अवस्थाएँ क्रमशः शरत्-हेमन्त शिशिर इन तीन भागों में विभक्त हैं । वसन्त अग्नि की बालावस्था है, ग्रीष्म अग्नि की युवावस्था है वर्षा अग्नि की वृद्धावस्था है । एवमेव शरत् सोम की बाल्यावस्था है, हेमन्त युवावस्था है, शिशिर वृद्धावस्था है । इस प्रकार छः ऋतुओं का उक्त दो ऋतुनों में भी अन्तर्भाव हो जाता इसी स्थिति में आप यों भी देख सकते हैं कि चैत्र - वैसाख - ज्येष्ठ - आपाढ ये चार मास ग्रीष्मर्तु हैं । श्रावण एवं भाद्रपद ये दो महीने शीतर्त्तु की सन्धि हैं | आश्विन - कार्त्तिक- मार्गशीर्ष पौष ये चार मास शीत हैं । माघ एवं फाल्गुण ग्रीष्म की सन्धि है, अतएव माघ शुक्ल पञ्चमी को ही ग्रीष्म के उपक्रम रूप वसन्त का प्रारम्भ दिन मान लिया जाता है । यही दोनों काल शीतकाल - उष्णकाल नाम से प्रसिद्ध हैं । ये ही दोनों शब्द निरुक्त क्रमानुसार प्रान्तीय भाषा ( मारवाड़ी ) शीतकालू - उष्णकालू रूप में परिणत होते हुए कमश: श्यालू ( शीतकालू - शीतकाल ) एवं उन्हालू ( उष्णकालू - उष्णकाल ) इन स्वरूपों में परिणत हो गए हैं । चार - चार मास की एक - एक ऋतु के हिसाब से संवत्सर की तीन ऋतुएँ मानना भी श्रुतिसम्मत - पक्ष है । चार मास ग्रीष्म के, चार मास वर्षा के चार मास शीत के, इस प्रकार तीन ऋतुएँ भी स्वभाव -इस विभाग के अनुसार वसन्त ऋतुओं में पहली ऋतु है एवं हेमन्त अन्तिम ऋतु मानी गई है । छठी शिशिर ऋतु का हेमन्त में ही अन्तर्भाव है । इसी अर्थ का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-" मुखं वा एततूनां यद् वसन्तः " ( तै ० ब्रा ० १ | १ | २ | ६ ) - " अन्त ऋतूनां हेमन्तः " ( शत ० १।३।१३ ) । [ १३७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतु पितरविज्ञानोपनिषद सिद्ध हैं । ग्रीष्म में अग्नि का साम्राज्य है । शीत में सोम का आधिपत्य है । मध्य की वर्षा में दोनों का समन्वय है, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है । इसी आधार पर वर्षा को सर्वर्तु कहा जाता है - " वर्षा हि सर्व ऋतवः " । यही कारण है कि जो वर्ष शब्द संवत्सर रूप षड्ऋतु समष्टि के लिए प्रयुक्त हुआ है, वही वर्ष शब्द इस ऋतु से भी सम्बद्ध माना गया है । इसी श्राधार पर संगीतज्ञ वर्षा में सब ऋतुओं के गायन का विधान करते हैं । इसी प्रकार मलिम्लुच मास के समन्वय से एक संवत्सर की ७ ऋतुएँ भी मानना न्यायसङ्गत है । इस तरह ६- ३-२-७-५ आदि भेद से अपेक्षया ऋतुओं के अनेक विभाग हो जाते हैं । इन्हीं ऋतु विभागों को लक्ष्य में रख कर निम्नलिखित श्रुतिएँ हमारे सामने आती हैं— १ – " त्रयो वा ऋतवः संवत्सरस्य " ( शत ० ३।४।४।१७ ) । २ – “ विंशतिशतं ( १२० ) वा ऋतोरहानि " ( कौ ० ११।७ ) । ३– “ पञ्चवाऽऋतवः सम्वत्सरस्य " ( शत ० ३।१।४।५ ) । ४- - " पञ्चर्त्तवो हेमन्त शिशिरयो समासेन " ( ऐत ० १।१ ) । ५ - " षड्वा ऋतवः संवत्सरस्य ' ( शत ० १ । २।५।१२ ) । ६ – " सप्तर्त्तवः सम्वत्सरस्य " ( शत ० ६ । ६ । १ ।१४ ) । पूर्व प्रतिपादित ऋतुभेद दिग्दर्शन से प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि ऋतुओं के विविध स्वरूप अग्निसोम के उद्ग्राभ निग्राभ लक्षण तारतम्य से ही निष्पन्न होते हैं । उद्याभ निग्राभ— उदाहरण के लिए ऋतु स्वरूप पर डालिए । एक अहोरात्र में २४ होरा हैं । पूर्व में हमने अहोरात्र में सावित्राग्नि का उपचयापचय बतलाया 1 इन २४ होरात्रों में दिन के १२ होरा में से १० होरा में सावित्राग्नि के अंशों का उपचय ( आवाप ) होता है, एवं रात्रि के १२ होरा में से १० होरा में सावित्राग्नि के अंशों का प्रपचय ( उद्वाप ) होता है । शेष के अहोरात्र के ४ होरा में रहने वाले सावित्राग्नि एवं गायत्राग्नि की पूरी मात्रा शिशिर ऋतु में शीर्ण हो जाती है अतएव अग्निमात्रा से सर्वथा शीर्ण यह काल " पुनः पुनरतिशयेन शीर्णा भवन्ति यस्मिन् कालेऽग्निकरणः स कालो शिशिरः " इस लक्षण के अनुसार शिशिर १ नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । इसके अनन्तर पूर्व प्रदर्शित क्रमानुसार उत्तर के ६० अंशों से युक्त सावित्राग्नि के अंश क्रमशः वायु में व्याप्त होने लगते हैं अतएव अग्निकणनिवासोपलक्षित यह काल " यस्मिन्कालेऽग्निकरणाः पदार्थेषु वसन्ता भवन्ति स कालो वसन्तः ” २ इस निर्वचन के अनुसार वसन्त नाम से व्यवहृत होता है । आगे के ६० अंशों से युक्त वायुधरातल में व्याप्त अग्नि आगे जा कर प्रवृद्ध होता हुआ विशेष रूप से पार्थिव पदार्थों को पकड़ता है अतएव प्रवृद्धाग्न्यवच्छिन्न यह काल --१ --- बार - बार प्रतिमात्रा से अग्निकरण जिस काल में सर्वथा शीर्ण हो जाते हैं, वही काल किंवा कालोपलक्षित ऋतु " शिशिर " कहलाती है । २ - जिस काल में अग्निकरण पदार्थों में बसने लगते हैं, वही काल, किंवा तत्कालोपलक्षित ऋतु वसन्त कहलाती है । [ १३८ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतुपितर विज्ञानोपनिषत् " यस्मिन् कालेऽग्निरतिशयेन पदार्थान् ग्रसति, गृह्णाति स कालो ग्रीष्मः " " नितरां दहत्यग्निर्यस्मिन् कालेऽग्निः पदार्थान् स कालो निदाघः " इत्यादि निर्वचनों के अनुसार ग्रीष्म एवं निदाघ ३ शब्दों से व्यवहृत होने लगता है । अग्नि में जा कर अग्नि और भी अधिक प्रवृद्ध होता है । यह अग्नि के उद्ग्राभ की चरम अवस्था है । अग्नि अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर " अग्नेरापः ” इस सिद्धान्त के अनुसार पानी के रूप में परिणत हो जाता है अतएव ग्रीष्म ऋतु के अव्यवहितोत्तर काल में ही वर्षा ऋतु का आगमन होता है । अग्नि के अतिशय मात्रा से उरु होने के कारण ही तदुपलक्षित काल को " यस्मिन् कालेऽग्निरतिशयेनोरू इति स कालो वर्षाः ", इस निर्वचन के अनुसार वर्षा १ नाम से प्रसिद्ध है अथवा प्रग्नि से ताड़ित होकर प्रतिमूच्छित होने वाला पार्थिव अग्नि ही भूपिण्ड की ओर आता हुआ अब्रूप में परिणत होता है, इसलिए भी इस ऋतु को — “ अग्निभिः प्रत्याहता अग्नयः प्रतिमूच्छिता आपो भूत्वा पृथिवीमभिवर्षन्ति सिञ्चति इति तदुपलक्षितः कालो वर्षा: २ ", इस निर्वचन के अनुसार वर्षा शब्द से व्यवहृत करना न्याय प्राप्त है । इस प्रकार वसन्तो भवन्ति, अतिशयेनग्रासन्ति, अतिशयेनउरवः, इन निर्वचनों से वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा भेद से एक अग्नि का उद्ग्राभ ( चढाव ) तीन भागों में परिणत हो रहा है । वर्षा अग्नि के उद्ग्राभ की चरमसीमा है । इसके अनन्तर क्रमशः अग्नि का निग्राभ होने लगता है । जिस प्रकार वसन्त आदि में अग्नि का क्रमश: उपचय होता है, ठीक इसके वितरीत शरदादि आगे की तीन ऋतुओं में क्रमश: अग्नि का अपचय ( ह्रास ) होने लगता है । अग्निकरणों के शीर्ण हो जाने से वायु की जो प्रथम अवस्था रहती है तदुपलक्षित काल ही " यस्मिन् काले पदार्थानामग्निकरणाः शीर्णा भवन्ति स काल शरत् ३ ", इस निर्वचन के अनुसार शरत् नाम से व्यवहृत होता है । आगे जा कर अग्नि-३ – जिस काल में अग्निकरण विशेष रूप से पदार्थों को ग्रहण कर लेते हैं, वही काल ग्रीष्म नाम से व्यवहृत होता है । इस काल में अग्नि विशेष रूप से पदार्थों को जलाने लगता है, अतएव इसे ( ग्रीष्म ) को निदाघ नाम से भी व्यवहृत किया जा सकता है । * " जिस काल में अग्नि अतिशय मात्रा से उरु ( विपुल - प्रवृद्धतम ) बन जाता है वही काल वर्षा कहलाता है । " १- पाणिनीय व्याकरण के अनुसार ' उरु ' शब्द को ' वर्ष ' प्रदेश हो जाता है । २ – प्रग्नियों के परस्पर प्रत्याघात से मूच्छित अग्नि ही अबू ( पानी ) बन कर बरसने के कारण वर्षा कहा जाता है! ३ - जिस काल में अग्निकरण पदार्थों में से शीर्ण हो जाते हैं, वही काल किंवा ऋतु शरद् कहलाती है । [ १३६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् wwwwwwwww . करण और भी अधिक मात्रा में हीन हो जाते हैं । यही ऋतु " यस्मिन् कालेऽग्निकरणा हीनतां गता भवन्ति स कालो हेमन्तः १ ", इस निर्वचन के अनुसार हेमन्त नाम से व्यवहृत होती है । अन्ततोगत्वा अग्निभाग सर्वथा निःशेष हो जाता है यही ऋतु " यस्मिन् कालेऽग्निकरणाः पुनपुनरतिशयेन शीर्णा भवन्ति स कालः शिशिरः २ ",. इस निर्वचन के अनुसार शिशिर नाम से व्यवहृत होता है । सोम अमृततत्त्व है, अतएव इसे नित्य माना जाता है । इधर अग्नि को ( वशकलनधर्म्मा होने से ) मरणधर्मा माना जाता है । परिवर्तन यग्नि का ही सम्भव है, प्रमृत सोम का नहीं । यही कारण है कि ऋतु सम्बन्ध में अग्नि का ही उपचय-अपचय बतलाया गया है, इसीलिए ऋतुविज्ञानाचार्यों ने छत्रों ऋतुओं को अग्नि शब्द से व्यवहृत करने में कोई आपत्ति नहीं समझी है । " अग्नयो वा ऋतवः " ( शत ० ६ | २ | १ | ३६ ) इसी श्रौत ऋतु विज्ञान का निरूपण करते हुए अभियुक्त कहते हैं—
शीत मासाश्चत्वारो द्वौमासौ सन्धिरुत्तरौ ।
उष्ण मासाश्चत्वारो द्वौमासौ सन्धिरुत्तरौ ॥२ ॥
चतुरश्चतुरो मासात् स्वात्यमासमकालतः । शीतोष्ण वर्षाकालाख्याः सम्भवन्त्यृतवस्त्रयः ॥३ ॥
शीतकालो वत्सरार्द्ध याम्यगोलस्थ सूर्य्यकम् ।
उष्णकालो वत्सरार्द्ध सौम्यगोलस्थ सूर्य्यकम् ॥३ ॥
ज्येष्ठा सन्नात्वमावास्या ज्येष्ठासन्ना च पूर्णिमा ।
आभ्यां चन्द्रमसः कालो वत्सरे कल्पते द्विधा ॥४ ॥
एक एव ऋताग्निर्वा सोमतो हासवृद्धितः ।
ऋतुराख्यायतेषोढा ऋताः सोमाग्नि वायवः ॥ ५ ॥
१ वसन्तः स " वसन्तः " स्युर्व्ययशेषा यदाग्नयः । २ " ग्रीष्मः " स यत्र गृह्णीयुर्भूतान्यन्तर्बीहि बलात् ॥ ६ ॥
३
वरीयांसोऽग्नयो “ वर्षा " स्त्रय उद्ग्राभलक्षरणाः ।
उत्तरा ग्रग्नि निग्राभ लक्षरण ऋतवस्त्रयः ॥७ ॥
१ - जिस ऋतु में अग्निकरण अधिक मात्रा से हीन हो जाते हैं, वही काल हेमन्त है । २ - जिस काल में अग्निकरण निःशेष रूप से शीर्ण हो जाते है, वही काल, शिशिर कहलाता है । [ १४० ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतुपितरविज्ञानोपनिषत् www ४ " शरत् " स प्रायादधिकं शीर्य्यन्ते तेऽग्नयो यतः । ५ स " हेमन्तो " हासिमन्तो वायौ यत्राग्रयो बहिः ॥ ८ ॥
यत्राग्नयोऽतिशयतः शीर्णाः स्युः “ शिशिर " स्तु सः ।
इत्थं वायौ सोमतोऽग्निर्वर्द्धतेऽपि च हीयते ॥ ९ ॥
( श्री गुरुप्रणीत- पितृ समीक्षा ) । उक्त सन्दर्भ का निष्कर्ष यही हुआ कि ऋतअग्नि ऋतसोम की मिलितावस्था का नाम ऋतु है अग्निसोममयी यह ऋतुसमष्टि ही जगत् का उत्पादन कारण बनती है । तत्तद् ऋतु में तत्तत् पदार्थों का दर्शपूर्णमास हुआ करता है । शरद् ऋतु तेजोमूर्ति घृत का पूर्णमास है, हेमन्तादि में घृत का दर्श ( अवसान ) काल है । वसन्त में मधु का पूर्णमान है, ग्रीष्मादि में इसी का दर्श है । हेमन्त में दधि का पूर्णमास है, वसन्तादि में इसका दर्श है । शरद् में अमृत ( सोम ) का पूर्ण मास है, वसन्तादि में इसका दर्श है । इस प्रकार उत्पन्न होने वाले पदार्थमात्र के लिए दर्श- पूर्णमास भेद से ऋतुव्यवस्था सर्वथा नियत है । जिस पदार्थ की जब ऋतु आती है तभी वह पदार्थ उत्पन्न होता है । अऋतु ( समय ) में यदि उसकी उत्पत्ति हो जाती है तो वह लोक - संस्था के लिए अनिष्टकर बन जाता है । हमारा ( श्रस्मदुपलक्षित जड़-चेतनोभयविध पदार्थ मात्र का ) उपादान ऋतुतत्त्व ही है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर उपनिषत् श्रुति कहती है-“ विचक्षरणाद् रेतो ऋतव प्राभृतं पञ्चदशात् प्रसूतात् पित्र्यवतस्तन्मा पुंसि कर्त्तर्येरयध्वम् ।.... तन्मऋतवो अमर्त्यव भरध्वम् ।........ ऋतुरास्मि, प्रार्त्तवोऽस्मि " इति । ( कौ ० उ ० १ ० । ३ खं ० ) । ' ऋतुकाले प्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं ' भवति ( गर्भोपनिषत् ) इत्यादि श्रुत्यन्तर भी उक्त अर्थ का ही समर्थन करता है । स्त्री के शोणित में जब ऋतु भाव का विकास होता ऋतुकालानुगत सृष्टि विवर्त - है तो वह स्त्री ऋतुमती कहलाती । ऋतु का पूर्ण विकास काल ही गर्भाधान - काल माना गया है । इस प्रकार जब ऋताग्निसोममय ऋतु-तत्त्व ही सब पदार्थों का उपादान है तो ऐसी दशा में सोमगुणक ऋताग्नि को, किंवा अग्निगुणक ऋतसोम को " पितर " शब्द की पूर्वोक्त व्याप्ति के अनुसार अवश्य ही " पिसर " शब्द से व्यवहृत किया जा सकता है । यद्यपि उक्त कथनानुसार छत्रों ऋतुनों को ही पितर शब्द से सम्बोधित किया जा सकता है, तथापि यदि सूक्ष्म विचार किया जाता है तो सोम - प्रधान शरत् - हेमन्त– ऋतुपितृ स्वरूप परिचय शिशिर इन तीन ऋतुओं को ही प्रधानरूप से पितर मानना युक्तियुक्त होता है । पितर- प्राण सौम्य हैं, किंवा सौम्यप्रारण ही पितर हैं । शरदादि तीनों में सौम्य प्राण की ही प्रधानता है । यह अग्नि का प्रपचय काल है अतएव इन सौम्यऋतु पितरों के [ १४१ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड w ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् लिए — " अपक्षय भाजो वै पितरः " ( कौ ० ५।६ ) यह कहा जाता है । उधर वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा इन तीन ऋतुनों में देवप्राणस्वरूपसमर्पक अग्नि की प्रधानता है अतएव वसन्तादि तीनों ऋतुओं को हम देव शब्द से सम्बोधित कर सकते हैं । इसी प्रकार ऋताग्निप्रधान उत्तरायणकाल दिव्य है, ऋतसोमप्रधान दक्षिणायन काल पित्र्य है । अग्निप्रधान शुक्लपक्ष दिव्य है, सोमप्रधान कृष्णपक्ष पित्र्य है । अग्निमय ग्रहःकाल दिव्य है, सोममय रात्रिकाल पित्र्य है । अहःकाल में भी अग्न्यादान पूर्वाह्न काल दिव्य है, अग्निविसर्ग रूप अपराह्न काल पित्र्य है । आगे जा कर अग्निसोम के उपचयापचय की सूक्ष्म व्याप्ति से यह देव - पितर व्यवस्था क्षरणों तक अनुधावन करने में समर्थ हो जाती है, जैसा कि पूर्व में ऋतु की सर्वता बतलाते हु विस्तार से प्रतिपादन हो चुका है । इसी ऋतु पितरविज्ञान की उपनिषत् ( मूल सिद्धान्त ) को लक्ष्य में रख 1 कर अग्न्याधेय श्रुति कहती है-" वसन्तो ग्रीष्मो वर्षाः - ते देवा ऋतवः । शदद्धेमन्तः शिशिरः- ते पितरः । य एवापूर्थ्यतेऽर्द्धमासः, स देवाः । योऽपक्षीयते स पितरः । अहरेव देवाः, रात्रिः पितरः पुनरह्णः पूर्वाह्णे देवाः, अपराह्णः पितरः । यत्रोदगावर्त्तते देवेषु ह भवति । अथ यत्र दक्षिणावर्त्तते, पितृषु हि भवति । । अमृता देवाः, अपहतपाप्मानो देवाः । मर्त्याः पितरः, अनपहतपाप्मानः पितरः " इति । ( शत ० २।३।१।२-४ ) । शरदादि भेद भिन्न इन ऋतुपितरों के सम्बन्ध में ब्राह्मण ग्रन्थों में भिन्न - भिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ उपलब्ध होती हैं । उन सबका एकमात्र लक्ष्य ऋपितर ही है, जैसा कि तत्तद्वचनों से स्पष्ट हो जाता है । १ – “ देवा वृत्रं जघ्नुः ते नो व्यजयन्त । अथ यानेवैषामस्मिन् सङग्रामेऽघ्नन्, पितृयज्ञेन समैरयन्त । पितरो वै त श्रासन । तस्मात् पितृयज्ञो नाम । तद् वसन्तो ग्रीष्मो वर्षाः, एते ते ये व्यजन्त । शरद्धेमन्तः शिशिरः, एत उ ते यत् समैरयन्त " १ - * देवताओं ने वृत्र को मार डाला । उन लोगों ने हमारे ऊपर विजय प्राप्त कर लिया । अनन्तर इनमें से जिन पितरों को इस संग्राम में ( देवताओं ने ) मार डाला, उन्हें पितृयज्ञ से पुन: प्रेरित किया । ( जिन्हें पुनः प्रेरित किया ) वे पितर ही तो थे । इसीलिए ( देवताओं का यह कर्म्म ) पितृयज्ञ नाम से प्रसिद्ध हुआ । ( ६ ऋतुनों में से देवरूप ) वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा ये तीनों ही वे हैं जिन्होने कि ( वृत्र पर ) विजय प्राप्त की थी । शरत् - हेमन्त शिशिर ये तीनों वे ही पितर हैं जिन्हें कि ( पितृयज्ञ से ) प्रेरित किया था । [ १४२ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतुपित रविज्ञानोपनिषत् २ -- " तद्ये सोमेनेजानाः, ते पितरः सोमवन्तः " ( शत ० २२६ । १ । ७ ) । ३– “ स पितृभ्यः सोमवदभ्य षट्कपालं पुरोडाशंनिर्वपति " ( शत ० २।६।१।४ ) । ४ - " सोमार्य वा पितृमते षट्कपालं पुरोडाशं निर्वपति " ५ – “ षड्वा ऋतवः पितरः " ( शत ० १३ | ८ | १ | २० ) । - " यहतवः पितरः प्रजापति पितरं पितृयज्ञेन यजन्त तत् पितृयज्ञस्य पितृयज्ञत्वम् " ( तै ० ब्रा ० १।४।१०।८ ) । ७ - " ऋतवः खलु देवाः पितरः । ऋतूनेव देवान् पितृन् प्रीणाति । तान् प्रीतान् मनुष्याः पितरोऽनुप्रपिपर्ते " ( तै ० ना ० १ । ३ । १० । ५ ) । - " अथ ये दत्तेन पक्वेन लोकं जयन्ति, ते पितरो बर्हिषदः " ( शत ० २।६।१।७ ) । - " प्रथ ये ततो नान्यतरच्चन, यानग्निरेव दहन् स्वदयति, ते पितरोऽग्नि-ष्वात्ताः ” ( शत ० २।६।१।७ ) । १० - " पितृ लोकः सोमः " ( कौ ० १६।५ ) | फल्गुनी नक्षत्र से प्रारम्भ कर श्राषाढा नक्षत्र पर्यन्त वसन्त - ग्रीष्म इन दो ऋतुओं का भोग होता है । इन दोनों की सत्ता दक्षिण में है । ये ऋतुएँ अग्निप्रधान हैं । विज्ञान भाषानुसार दक्षिण भाग नीचा कहलाता है, अतएव ये ऋतुपितर " अपरपितर " कहलाते हैं । प्राषाढा नक्षत्र से प्रारम्भ कर कृत्तिका नक्षत्र २ * —जो कि सोम से यजन करने योग्य ( पितर ) हैं वे ही सोमवन्त पितर हैं । ३ — वह अध्वर्यु सोमवान् पितरों के लिए षट्कपाल पुरोडाश का निर्वाप करता है । ४ - पितृमान् सोम के लिए षट्कपाल पुरोडाश का निर्वाण करता है । ५ - छः ऋतुएँ ही पितर हैं । ६ - ऋतु पितरों ने पितृयज्ञ से जो पितरप्रजापति का यजन किया यही तो पितृयज्ञ का पितृयज्ञत्व है । ७ — ऋतु ही पितृदेवतामय हैं । ( पितृयज्ञ से ) ॠतुरूप पितर देवताओं को ही तृप्त करता है । पितरों को तृप्त होते देख कर ( पितरों के तृप्त हो जाने पर ) इन पितरों का अनुगमन करने वाले मनुष्य तृप्त होते हैं । ८ — जो दत्त पक्व द्रव्य से लोक विजय करते हैं. वे ही पितर बर्हिषद हैं । . – जिन्हें अग्नि ही जलता हुआ अपना स्वादु द्रव्य बनाता है, वे पितर अग्निष्वात्ता हैं । १० – पितरों की आवास भूमि सोम है । [ १४३ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ऋतु पितरविज्ञानोपनिषत् पर्य्यन्त वर्षा - शरद् इन दो ऋतु ऋतुपितरों को " मध्यम पितर " का भोग होता है कहा जाता है ॥ ये दोनों ऋतु यमप्रधान हैं । मध्यस्य होने से इन कृत्तिका नक्षत्र से आरम्भ कर फल्गुनी नक्षत्र पर्य्यन्त हेमन्त शिशिर इन दो ऋतुस्रों का भोग होता है । ये दोनों सोमप्रधान हैं । सोम की सत्ता उक्थरूप से उत्तर में है । उत्तर स्थान पर स्थान ऊँचा स्थान कहलाता है एव यह ऋतु पितर परपितर नाम से प्रसिद्ध है । श्राधिदैविक मण्डलस्थ ये ही त्रिविध पितर क्रमशः पिता-पितामह प्रपितामह हैं । १ - १ - वसन्तः २ – २ – ग्रीष्मः --३ – १ – वर्षाः ४ - २ -- शरत् --५ – १ – हेमन्तः ६ - २ - शिशिरः } → दक्षिणस्थोऽग्निः - श्रग्निष्वात्ताः पितरः - श्रवराः -- " पिता " → मध्यस्थो यमः - बर्हिषदः पितरः - मध्यमाः - " पितामहः " → उत्तरस्थः सोमः सोमसदः पितरः -- परा: - " प्रपितामहः " ** -उक्त छनों ऋतुपितरों का मूलाधार सातवाँ सम्वत्सर प्रजापति है । यही इन पितरों का परम एवं आदि पितर है । इसी अभिप्राय से इसके लिए " संवत्सरो वै सोमः ऋतु पित्र्यनुगता सप्तपुरुषता- पितृमान " ( तै ० प्रा ० ११६८२ ) यह कहा जाता है । पाठकों को स्मरण होगा कि पूर्व की " दिव्य पितर विज्ञानोपनिषत् " में हमने श्रव्यय-अक्षरादि भेद से सातों पितरों की क्रमिक व्यवस्था बतलाई है । ठीक इसी प्रकार ऋतुपितरों के सम्बन्ध में १ २ भी सापिण्ड्य प्रवर्त्तक सातों पितरों का क्रमशः प्रवस्थान समझना चाहिए । वसन्त ऋतु पुत्र है, ग्रीष्म पिता ३ ४ ५ ६ है, वर्षा पितामह है, शरत् प्रपितामह है, हेमन्त वृद्धप्रपितामह है, शिशिर प्रतिवृद्धप्रपितामह है, एवं सर्वा-७ लम्बन संवत्सर वृद्धातिवृद्धप्रपितामह है । जैसा कि निम्नलिखित परिलेखों से स्पष्ट हो जाता है— १ - " संवत्सरो वै सोमः पितृमान् " २ - " मासा वै पितरो वहिषवः " ३ - " अर्द्धमासा वै पितरोऽग्निष्वात्ताः " - * * -+ प्रपितामहः पराः पितामह: -+ मध्यमाः -पुत्रः + अवराः [ १४४ ]
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ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् wwwww. श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड १ - ' ग्रहोरात्रे – ग्रग्नीषोमी – दिवस: " -wwwwwm २ - " पूर्वापरपक्षौ - अग्नीषोमी - मासः -३ - " उदग्रदक्षिणायने — अग्नी मी संवत्सरः " - स पिता + स पितामहः + प्रपितामहः १ - १ - संवत्सरः ( प्रग्नीषोममूत्तिः ) -वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः २ - १ - शिशिरः ( अग्निगर्भित सोमः ) -प्रतिवृद्धप्रपितामहः ३- २ - हेमन्त: ( अग्निगर्भित सोमः ) -४-३- शरत् ( अग्निगर्भित सोमः ) प्रपितामहः ५- ४ - वर्षा: ( सोम सधर्माग्निः ) -पितामहः ६ - ५ - ग्रीष्म: ( सोम गर्भितोऽग्निः ) पिता ७-६ -- वसन्तः ( सोम गर्भितोऽग्निः ) -पुत्रः १ – १ – वसन्तः-२ -- २ - ग्रीष्म: -३ – ३ – वर्षाः ४ – १ – शरत्-५ - २ हेमन्त: -६- ३ - शिशिरः → सोमपाः पितरः → श्राज्यपाः पितरः + हविर्भुजः पितरः + सोमसदः पितरः बहिपदः पितरः ' अग्निष्वात्ताः पितरः इति " वसन्तादि षड्ऋतुभ्यो नमः ” [ १४५ ] साप्तपौरुषम् सापिण्ड्