Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 151–160

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड AllW टिक् दक्षिरमा ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् ( शीताल ) सूर्य: ( L ) दक्षिणा दिक् सोम शीत उत्तरा दिक् -[ १४६ ]

पृष्ठ 152

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड दिः ळ् SASA ऋतु पितरविज्ञानोपनिषत् SATARATRI सूखी ] १४ ू [

पृष्ठ 153

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड [ १४८ ] दि TI ऋतु पितरविज्ञानोपनिषत् ww

पृष्ठ 154

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड रेवती पूर्व भाइपर + शिशिर सदस ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् SASTER wwwwwwwww इति - पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि ऋतुपितरविज्ञानोपनिषत् समाप्ता [ १४ ९ ]

पृष्ठ 155

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Wolddoddler अथ पितरस्वरूप विज्ञानोपनिषदि प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् पञ्चमी [ ५. ] यद्यपि पूर्व प्रकरण से पितृस्वरूप गतार्थ हो जाता है तथापि विषय की गहनता हमें इसके लिए बाध्य करती है कि प्रेत- पितरों के स्वरूप निरूपण से पहिले... लोकानुगत पितृस्वरूप परिचय-सिंहावलोकन न्याय से संक्षेपतः पुनः एक बार पितरप्राण के सामान्य स्वरूप की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाय । पूर्व की पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् दिव्यपितर विज्ञानोपनिषत् ऋतु पितर विज्ञानोपनिषत् इन तीनों उपनिषदों में प्रकीर्णक ( फुटकर ) रूप से पितरप्राण का स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया गया है । इस प्रकरण में पूर्वप्रतिपादित उन प्रकीर्णक विषयों का संग्रह किया जा रहा है । पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् प्रकरण के आरम्भ में हमने पर - मध्यम- अवर भेद से तीन प्रकार के पितर बतलाए हैं । एवं इन्हीं तीनों को क्रमशः नान्दीमुख - पार्वरण - प्र ेत नामों से व्यवहृत किया है । इन तीनों में नान्दीमुख-पितर द्युलोक में प्रधान रूप से प्रतिष्ठित हैं अतएव इन्हें दिव्यपितर कहा जाता हैं । पार्वण पितरों की मूल, प्रतिष्ठा अन्तरिक्ष है । अन्तरिक्ष ऋतवायु प्रधान है, अतएव इन प्रान्तरिक्ष्य पितरों को ऋतुपितर कहा. जाता है । ये दोनों प्राधिकारिक पितर हैं । नित्य पितर हैं । सृष्टि सञ्चालन करना इनका मुख्य कर्म्म है । पूर्व के दोनों प्रकरणों में क्रमशः इन्हीं तीनों नित्य पितरों का निरूपण हुआ है । अश्रमुख नाम से प्रसिद्ध तीसरे " प्रेतपितर " हैं । इनकी मूल प्रतिष्ठा पृथिवीलोक है । ये ही कर्म्मपितर हैं । कर्मानुसार " कर्मभोक्ता जीवात्मा को तत्तत् योनियों में आना पड़ता है । शरीर से निकलने वाला महत् सोमावच्छिन्न यह पितर प्राण इससे ऊपर की ओर जाता है अतएव " प्र- इतः " के अनुसार प्रेत शब्द से व्यवहृत किया । जाता है । यह प्रेतपितर जब तक पार्थिव कक्षा के भीतर रहता है, तब तक तो इसकी स्थिति विपरीत [ १५१ ]

पृष्ठ 156

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् रहती है । ऐसी दशा में पार्थिव आकर्षण की प्रधानता से इसे दुःख होता है । इसी दुःखावस्था को लक्ष्य में रख कर इसे अश्रु मुख कहा जाता है । यही प्रेतपितर अन्तरिक्ष में जा कर पार्थिव आकर्षण से विमुक्तप्राय होता हुआ, समस्थिति में परिणत होता हुआ, श्रान्तरिक्ष्य ऋतुपितरों से संश्लिष्ट होता हुआ तद्रूप में परिणत हो कर " पार्वण पितर " नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । शुभ कर्म ( इष्ट - प्रापूर्त - दत्त रूप विद्या निरपेक्ष प्रवृत्ति सत्कर्म्म ) के बल से अन्ततः द्युलोक में जाता हुआ, वहाँ रहने वाले नान्दीमुख पितरों से युक्त होता हुआ तद्रूप बन कर यह प्रेतपितर भी नान्दीमुख नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । यहाँ का पार्थिव आकर्षण एक प्रकार से सर्वथा श्लथ हो जाता है । इस प्राकर्षण जनित दुःख से विमुक्त हो कर यह सुखी बन जाता है । इस प्रकार सांस्कारिक कर्म्मबल के तारतम्य से एक ही प्रेतपितर लोकत्रय भेद से प्रेत--पार्वण - नान्दीमुख इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । १ - नान्दीमुखाः-- प्रेतपितरः दिव्यावस्थापन्नाः २ - पार्वणः-प्रेतपितरः-- + अन्तरिक्ष्याः ३ – प्रश्रुमुखा: -→ प्रेतपितरः पार्थिवाः उक्त कथन से यह भली भाँति सिद्ध हो जाता है कि नान्दीमुख एवं पार्वण ये दोनों पितर तो अाधिकारिक एवं काम्मिक भेद से दो - दो प्रकार के हैं. एवं प्रेतपितर प्राधिकारिक, कामिक पितर- केवल कर्म्मप्रधान हैं । प्रेतावस्था अवर अवस्था है, पार्वणावस्था मध्यमावस्था है, नान्दीमुखावस्था पर अवस्था है । प्रकारान्तर से देखिए । तीन ही प्राधिकारिक पितर हैं एवं तीन ही काम्मिक पितर । साथ ही में अग्नि - यम- सोम भेद से प्रत्येक पितर की अवान्तर तीन - तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । द्युलोक में भी अग्नि - यम- सोम ये तत्त्व प्रतिष्ठित हैं, अन्तरिक्ष भी अग्नि - यम- सोममय है । पृथिवी भी अग्नि - यम-सोम से शून्य नहीं है । द्युलोकस्थ अग्नि सावित्र है, दिव्य यमः शुचि हैं, दिव्य सोम ब्रह्मणस्पति है । आन्तरिक्ष्य अग्नि नाक्षत्रिक ( धिष्ण्य ) है, आन्तरिक्ष्य यम पावक है एवं आन्तरिक्ष्य सोम गन्धर्व नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव अग्नि गायत्र है, पार्थिव यम पावन है एवं पार्थिव सोम ( चान्द्रसोम गर्भित ) दिक्सोम नाम से प्रसिद्ध है । त्रिविध दिव्य नान्दीमुख पितरों की गति पृथिवी की ओर हुआ करती है । ऋतुति राख्य आन्तरिक्ष्य त्रिविध पार्वण पितरों की गति ( वायुप्रधान होने से ) सदा तिर्य्यक होती है एवं पार्थिव त्रिविध प्रमुख पितरों की गति द्युलोक की ओर हुआ करती है । पार्थिव गायत्राग्नि सदा ऊपर की ओर ही जाया करता है । भूकेन्द्र से निकल कर द्य मण्डल की ओर जाने वाला यही गायत्राग्नि सोमापहरण कर स्वस्वरूप की रक्षा करने में समर्थ होता है । विशुद्ध रूप से गायत्राग्नि ऊपर की ओर जाता है एवं सोममय बन कर वापस लौटता है । गमन भाव " एति " है, आगमन भाव " प्रेति " है । एति प्रेति ही गायत्राग्नि का प्रधानकर्म है । गायत्राग्नि के इसी स्वरूप धर्म को लक्ष्य में रख कर ब्राह्मण श्रुति कहती है-[ १५२ ]

पृष्ठ 157

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् * 3 " स वाऽएति च प्रति चान्वाह । गायत्री मेवैतदर्वाचीं च पराचीं च युनक्ति । परांच्यह देवेभ्यो यज्ञं वहति, अर्वाची मनुष्यानवति " ( शत ० १।३।३ ) । गायत्री से सम्बन्ध रखने वाले इस प्रेतिभाव के कारण ही हम इस पार्थिव पितरप्राण को " प्रेत " शब्द से सम्बोधित कर सकते हैं । साथ ही में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गायत्र अग्नि का पार्थिव उषा के साथ सम्बन्ध है एवं इसी उषा के समन्वय से पृथिवी पर आया हुआ प्रतिफलित सौर तेज प्रश्व कहलाता है । " उषा वै प्रश्वस्थ मेध्यस्थ शिरः " इस औपनिषत् सिद्धान्त के अनुसार सौर अश्व का मुखभाग भूपृष्ठ से संलग्न उषा है, पृष्ठ भाग द्युलोक रहता है । इधर अधोमुखमयी अश्वात्मिका उषा से सम्बद्ध गायत्राग्निमय पार्थिव पितरों का मुख भी तो भूपिण्ड की ओर रहता है, पृष्ठभाग द्युलोक की ओर रहता है । लोक भाषा के अनुसार पार्थिव पितरों का मस्तक नीचे है, पैर ऊपर हैं । यह महादुः-खावस्था है । इसी स्वाभाविक स्थिति का अभिनय करने के लिए ही इन पार्थिव पितरों को " प्रश्र मुख " कहा गया है । इस प्रकार तीन - तीन भागों में विभक्त उक्त तीनों पितर ही क्रमशः पर - मध्यम - श्रवर नाम से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों पितर संस्थाओं में पितृप्राण की प्रतिष्ठा सोम तत्त्व ही है अतः सामान्य रूप से पितरों के लिए " पितरः सौम्यासः " यह कहा जाता है । अपनी - अपनी लोकसंस्था में रत्र रच पितर अपनी - अपनी संस्था की अग्निमय आग्नेय पितरों से स्थिति होती है । यममय याम्य पितरों का नाश भाव से सम्बन्ध है । अग्नि अन्नाद है, सोम अन्न है, यम अनुभव है अतएव ये तीनों पितर क्रमशः प्रन्नपितर - अन्नाद-पितर - श्रनुभयपितर नाम से प्रसिद्ध हैं । अग्निपितर अन्नाद है, सोमपितर अन्न है, यमपितर अनुभय है । वह पितरप्राण जो सौम्य होने से आग्नेय पदार्थों का अन्न बनता है, अन्न पितर है । इसकी प्रग्निष्वात्ता-सोमसत् - बर्हिषत् ये तीन अवान्तर अवस्थाएँ हैं । वह पितरप्राण जो प्राग्नेय होता हुआ सोमात्मक अन्न खाया करता है, अन्नाद पितर है । इसकी हविर्भुक् - आज्यपा - सोमपा ये तीन अवान्तर अवस्थाएँ हैं । वह पितरप्राण जो न किसी का अन्न बनता है, न किसी को अन्न बनाता है, अनुभय पितर है । यही याम्य पितर है । इस प्रकार ३ - अन्नपितर, ३ - अन्नाद पितर, १ - प्रनुभय पितर संभूय ७ - दिव्य पितर हो जाते हैं । यही सात संख्या आन्तरिक्ष्य ऋतुरूप पार्वण पितरों की है यही संख्या पार्थिव प्रश्रुमुख पितरों की है । इन तीनों में दिव्यपितर सोमप्रधान हैं, ऋतुपितर यमप्रधान हैं, अश्रुमुख पितर अग्नि प्रधान हैं । प्रत्येक की सात - सात अवस्थाएँ हो जाती हैं । इस प्रकार संभूय पितरंप्राण की २१ प्रवान्तर अवस्थाएँ हो जाती हैं । यह है नित्य प्राकृतिक सृष्टि प्रवर्तक अाधिकारिक पितरों का संक्षिप्त निदर्शन । C * वह ऋत्विक एति प्रेति बोलता है । ( इस एति - प्रेतिभाव से वह ऋत्विक् ) गायत्री को ही पृथिवी की ओर एवं द्युलोक की ओर मिलाता है । ऊपर की ओर जाती हुई गायत्री देवताओं के लिए यज्ञ वहन करती है एवं नीचे की ओर आती हुई ( दिव्य सोम की आहुति द्वारा ) मनुष्यों की रक्षा करती है । [ १५३ ]

पृष्ठ 158

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितर विज्ञानोपनिषत् १ - नान्दीमुखाः - - दिव्यपितरः सप्त " परासः " wwwww १ – १ – १ – अग्निष्वात्ताः २ – २ – २ – सोमसदः + अन्न पितरः - सोम्या: ( ब्रह्मणस्पति सोमः ) - परा ३—३—३ — बर्हिषदः ४ – ४ – १ – हविर्भुजः ५ – ५ – २ – आाज्यपाः ६ – ६-- ३ – सोमपाः > अन्नादपितरः- आग्नेयाः ( सावित्राग्निः ) - प्रवराः ७-७- १ - सुकालिनः ] प्रनुभय पितरः- याम्या: ( शुचिर्यम: ) -** 1 - मध्यमाः २ - ऋतु पितरः पार्वणाख्याः - प्रान्तरिक्ष्याः पितरः सप्त " मध्यमासः " ८ - १ - १ - अग्निष्वात्ताः ६- २ - २ - सोमसद: १० – ३ - ३ – बर्हिषदः • + प्रन्नपितरः - सौम्या: ( गन्धर्वश्चन्द्रसोमः ) - पराः - * -११ – ४ – १ – सुकालिनः ] + अनुभयपितरः - याम्या: ( पावकोयमः ). -मध्यमाः +++ १२ - ५ – १ – हविर्भुजः १३ – ६ – २ – श्राज्यपाः १४ – ७ – ३ – सोमपाः ५ - नाद पितरः - श्राग्नेयाः ( नाक्षत्रिकोऽग्निः ) - प्रवराः ** [ १५४ ] २-मध्यमाः श्रान्तरिक्ष्याः -पितरः ऋतु पार्वणा दिव्यपितरः -नान्दीमुखाः : परा . १

पृष्ठ 159

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितरविज्ञानोपनिषद ३ – प्रेतपितरः - श्रश्रुमुखाः पार्थिवाः सप्त " प्रवरासः " १५ – १ – १ – अग्निष्वात्ताः १६ – २ – २ – सोमसदः १७ – ३ – ३ - बर्हिषदः → प्रश्न पितरः - सौम्याः ( दिक्सोमः ) - पराः ** -पार्थिवाः – प्रभुमुखाः प्रेतपितरः-३ --अवराः १८ - ४ – १ – सुकालिनः * * ट १६ – ५ – १ – हविर्भुजः २० – ६ – २ – अाज्यपाः ∆ २१ – ७ – ३ – सोमपाः ] अनुभय पितरः- याम्याः ( पवमानो यमः ) - मध्यमाः → अन्नादपितरः - प्राग्नेयाः ( गायत्राग्निः ) - प्रवराः अग्नि - यम- सोम इन तीनों की हमने क्रमशः स्तौम्य त्रिलोकी के तीनों लोकों में सत्ता बतलाई है, परन्तु इसमें एक विशेष व्यवस्था है । अग्नि पार्थिव तत्त्व है, यम स्तौम्य पितृस्वरूप परिचय - प्रान्तरिक्ष्य तत्त्व है, सोम दिव्य तत्त्व है । सुतरां तीनों में क्रमशः अग्नि-सोम - यम इन तीनों तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । पार्थिव अग्नि पृथिवी में प्रधान बनता हुआ अपनी घन तरल विरल अवस्थाओं से सम्पूर्ण स्तौंम्य त्रिलोकी में व्याप्त हो रहा है । इन्हीं तीनों अग्नियों को क्रमशः गायत्राग्नि - नाक्षत्रिकाग्नि - सावित्राग्नि इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । इसी प्रकार लोक में प्रतिष्ठित रहने वाला सोम भी घन - तरल - विरल अवस्था भेद से त्रैलोक्य में व्याप्त हो रहा है । सोम की घनावस्था " अप् " है । इसका त्रिवृत् स्तोम ( ६ ) स्थानीय पार्थिव गायत्राग्नि से सम्बन्ध है । सोम की तरलावस्था " साम्ब सदाशिव " नाम का वायुतत्त्व है । इसका पञ्च-दशस्तोम ( १५ ) स्थानीय प्रान्तरिक्ष्य नाक्षत्रिकाग्नि से सम्बन्ध है विरलावस्थापन प्रतएव प्राणात्मक सोम, सोम नाम से ही व्यवहृत हुआ है । इसका एकविंशस्तोम ( २१ ) स्थानीय दिव्य सावित्राग्नि से सम्बन्ध है । शेष रहता है प्रान्तरिक्ष्य यम । यह भी अवस्थात्रयी के कारण तीन स्वरूप धारण कर लेता है । पार्थिव -घनावस्थापन्न यम - वायु पवमान है, इसका घन सोमावच्छिन्न पार्थिवघनाग्नि ( गायत्राग्नि ) के साथ सम्बन्ध है । आन्तरिक्ष्य तरलावस्थापन यम - वायु पावक है, इसका तरल सोमावच्छिन्न अन्तरिक्ष्य तरलाग्न ( नाक्षत्राग्नि ) के साथ सम्बन्ध है । द्य लोकस्थ विरलावस्थापन यम - वायु शुचि है, इसका विरलसोमा -वच्छिन्न दिव्य विरलाग्नि ( सावित्राग्नि ) के साथ सम्बन्ध है । इस प्रकार 8 अग्नि - यम- सोमों के निम्नलिखित रूप से तीन त्रिक् हो जाते हैं । [ १५५ ]

पृष्ठ 160

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २, पृष्ठ 160 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रेतपितरविज्ञानोपनिषत् www १ - दिव्याग्निः - + सावित्राग्निः-- ( विरलाग्निः - पार्थिवः ) १- २२ – दिव्ययम: -→ शुचिर्यमः – --( विरलवायुः - प्रान्तरिक्ष्यः ) ( ३ - दिव्यसोमः of - ( विरल सोमः - दिव्यः ) २+ - प्राणात्मको विरलसोमः → १ - प्रान्तरिक्ष्याग्निः—— नाक्षत्रिकाग्निः → + ( तरलाग्निः - पार्थिवः ) २ -- प्रान्तरिक्ष्य यमः पावकोयमः —— * ( तरलवायुः - प्रान्तरिक्ष्यः ) . ३ - प्रान्तरिक्ष्य सोमः सदाशिवः सोमः --- → * ( तरलसोमः - दिव्यः ) गायत्राग्निः - ( घनाग्निः - पार्थिवः ) पवमानोयमः + ( घनवायु:: - - प्रान्तरिक्ष्यः ) १ – पार्थिवाग्निः —— ३- २२ - पार्थिवयमः ( ३ – पार्थिवसोमः- - अब्सोमः -- ( घनसोमः - दिव्यः ) www सोम का स्वस्थान तृतीय द्य लोक स्थानीय परमेष्ठी है । पृथिवी से उत्कृष्ट अन्तरिक्षलोक स्थानीय प्रथम द्युलोक है । इससे उत्कृष्ट सूर्य्यलोक स्थानीय द्वितीय लोक है । एवं श्रयन्तु नः पितरः — सबसे प्रकृष्ट परमेष्ठि स्थानीय तृतीय द्यलोक है, प्रतएव इसे " प्रद्यौः " कहा जाता है । सोम की प्रधानता के कारण, दूसरे शब्दों में यहाँ सोम के पूर्ण रूप से विकसित रहने के कारण इस ' प्रद्यौ ' को पितरों का प्राति स्विक ( अपना ) लोक माना जाता है । जैसा कि " तृतीयाह प्रद्यौ यस्यां पितर श्रासते " ( यजुर्वेद ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । पितरप्राण के स्वाभाविक विकास के कारण ही इन पारमेष्ठ्य सौम्य पितरों को हम नान्दीमुख कहने के लिए तय्यार हैं । अन्तरिक्ष लोक में सोम का अभिभव हो जाता हैं । ऋतुरूप यम की प्रधानता हो जाती है । कारण स्पष्ट है । यम श्रान्तरिक्ष्य तत्त्व है । दूसरे शब्दों में अन्तरिक्ष यम का प्रातिविक लोक है, अतएव इसमें यम की प्रधानता स्वतः सिद्ध है, अतएव इन प्रान्तरिक्ष्य यमगर्भित सौम्य पितरों को मध्यम श्रेणि के पितर मानना न्याय-सङ्गत होगा यही ऋतु पितर किंवा पार्वणपितर है । पृथिवीलोक में श्राकर सोम नितान्त मूच्छित हो जाता [ १५६ ]