Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 31–40
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 31–40
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् होकर न नीचे जाती न ऊपर जाती, जो प्राहुतियाँ नीचे शयन करती हैं, ( ये ही तीन आहुतियाँ हैं ) । " कि ताभिर्जयति " इति? " ( इन तीनों से क्या - क्या लाभ होता है? ) इस प्रश्न के समाधान में मुनि, कहते हैं— पहिली से देवलोक, दूसरी से मनुष्यलोक, तीसरी से पितृलोक प्राप्त होता है " । इन तीनों में देवलोक एवं मनुष्यलोक का तो सूर्य्य एवं पृथिवी रूप से हमें प्रत्यक्ष हो रहा है । परन्तु तीसरा पितृलोक विदित है । इसी तीसरे लोक का परिचय कराने के अभिप्राय से - अध इक्ही पितृलोकः " यह कहा गया है । पानी – सोम — इन्द्र ये तीनों तत्त्व क्रमशः असुर - पितर - देवता इन तीनों के अधिष्ठाता हैं । इन्द्रात्मक सौरलोक देवलोक है । यह सर्वथा प्रकाशित है । बात्मक पाताललोक असुरलोक है— यूयं प्रयात पातालम् " । यह सर्वथा अप्रकाशित है । सोमात्मक सान्ध्यलोक पितरलोक है । यहाँ न सर्वथा प्रकाश है, न एकान्ततः अन्धकार है । बिलकुल उजाला देवस्थान है, विलकुल अन्धेरा असुरस्थान है, पर्वत कन्दराओं जैसा प्रकाशाप्रकाश - मिश्रितस्थान पितरस्थान है । दूसरे शब्दों में ऊर्ध्वस्थान देव प्रधान है, अधःस्थान असुरप्रधान है । उभयात्मक स्थान पितरप्रधान है । इसी मिश्रणावस्था को सूचित करने के लिए श्रुति ने " अधः " न कह कर " अध इव " कहा है । - ** -१० - " अन्तरिक्षं तृतीयं पितृन यज्ञोऽगात् ” –ऐ ० ब्रा ० ७।५ । " यह यज्ञ तीसरे अन्तरिक्ष में ( रहने वाले ) पितरों की ओर गया । यहाँ अन्तरिक्ष शब्द द्यलोक का वाचक है । भूपिण्ड सूर्य्यपिण्ड के मध्य का अन्तरिक्ष पहिला द्यलोक है । संवत्सरात्मक सूर्य दूसरा द्य ुलोक है । एवं सूर्य्यं से ऊपर का परमेष्ठी तीसरा द्य ुलोक है । " तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम श्रासीत् " ( शत ० ४। १ ) के अनुसार इसी पारमेष्ठ्य लोक में सोम तत्त्व प्रतिष्ठित है । द्य ुलोक में रहने वाला सोमा-त्मक प्रारण ही पितर है । ११ - " श्रर्द्धमासा वै पितराऽग्निष्वात्ताः " तै ० ब्रा ० १ । ६ ॥ ३ । ' पक्षरूप अर्द्धमास श्रग्निष्वात्ता नामक पितर हैं ' । शुक्लपक्षों में सोमतत्त्व अग्निगर्भ में रहता है । दूसरे शब्दों में शुक्लपक्षगत सौम्य पितर अग्नि द्वारा खाए हुए रहते हैं, अतएव इन पाक्षिक पितरों को " अग्निष्वात्ता " कहा जाता है । -8-१२- " अथ ये दत्तेन पक्वेन लोकं जयन्ति ते पितरो बर्हिषदः " - शत ० २२६ । १।७ । [ २६ ]
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श्रद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwww wwww प्रमाणोपनिषद् " जो दिए हुए पक्व अन्न से लोक जीतते हैं, वे पितर बहिषत् हैं " । एक मास में चान्द्र - सोम का एक पिण्ड परिपक्व हो जाता है । अतएव मासात्मक पिण्डभागस्थ पितरों को बर्हिषत् कहा जाता है । केवल अग्नि से भी पिण्ड नहीं बनता, केवल सोम से भी पिण्ड नहीं बनता । शुक्लपक्ष प्रग्निप्रधान है, कृष्णपक्ष सोमप्रधान है । दोनों का समन्वित रूप ही मासात्मक पिण्ड है । पदार्थ विद्या के अनुसार पदार्थ उष्ण - शीत- श्रनुष्णाशीत भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । अग्नि उष्ण पदार्थ है, सोम शीत पदार्थ है, दोनों का समन्वित रूप दर्भ है । यही बहि है । बर्हि शब्द संकेत भाषा के अनुसार अनुष्णाशीतभाव का वाचक है । ऊष्माप्रधान सूर्य्य अग्नि है, शीतप्रधान शीतांशुचन्द्रमा सोम है, उभयप्रधान भूपिण्ड बहि है— " अयं वै लोको बहिः " ( शत ० १ ८ २ ११ ) - " श्रोषधयो वै बहिः " ( ऐ ० ब्रा ० ५।२८ ) । भूपिण्ड वास्तव में न गरम है, न ठंडा । इनमें से प्राग्नेय पदार्थों के आरम्भक वे ही पितर प्रग्निष्वात्ता नाम से, सौम्य पदार्थों में रहने वाले ' सोमसत् ' नाम से, एवं उभयात्मक पदार्थों में रहने वाले पितर उक्त परिभाषानुसार बर्हिषत् नाम से प्रसिद्ध है । मासपिण्ड उभयात्मक है, अतः मासात्मक पितरों को हम अवश्य ही बहिष कह सकते हैं । पिण्ड ही " पक्व " पदार्थ कहलाता है । पूर्वश्रुति ने पक्व शब्द से भी इसी पिण्डभाव की ओर संकेत किया है । अपि च " मासा वै पितरो बर्हिषद: " ( तै ० ब्रा ० १२६ ८ ३ ) इत्यादि रूप से स्पष्ट श्रुतसोमसमन्वित, श्रतएव पिण्डात्मक मासों को बर्हिषत् शब्द से व्यवहृत किया है । १३ – “ ये वा अयज्वानो गृहमेधिनः, ते पितरोऽग्निष्वात्ताः " ० ११६१ । " घर में रहने वाले ( प्रतएव ) जो पितर श्रयज्वान हैं, वे पितर अग्निष्वात्ता हैं " । भूपिण्ड से सम्बन्ध रखने वाले अग्निगर्भ में प्रतिष्ठित सौम्य पितर अग्निष्वात्ता हैं । " यथाग्निगर्भा पृथिवी तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिता " ( यजुः संहिता... ) के अनुसार भूपिण्ड अग्निमय है । भूपिण्ड स्वरूप सम्पादक अन्नादग्निभूरूप गृह ( घर ) का अधिष्ठाता होने से " गृहपति " " गृहमेधी " ( मेघृ संगमने ) इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यही अन्नादाग्नि अन्नरूप सोम को खाने की शक्ति रखता है, जैसा कि पूर्व की प्राणात्म-पनिषत् में कहा जा चुका है । दिव्य पितर प्रारण का - ( जो कि अहोरात्र - मास - अयन - संवत्सर भेद से अनेक भागों में विभक्त है ) प्राध्यात्मिक पितर प्राण के साथ योग कराना ही पितृयाग, किंवा पिण्डपितृ-यज्ञ है | यज्ञ का प्रधान सम्बन्ध दिव्य पितरों के साथ ही है! अतएव मासात्मक बर्हिषत् पितरों को, तथा सम्वत्सरिक पितरों को ही - " संवत्सरो वै सौमः पितृमान् " " संवत्सरमेव तद्यजति " " पितृन् बहिषदों जति " " येवै यज्वानस्ते पितरो बर्हिषदः " ( तै ० ब्रा ० १ | ६ || ५ - ६ ) इत्यादि रूप से “ यज्वान " कहा जाता है । पार्थिव पितर तो हम पार्थिव प्राणियों में अपने आप ही सङ्गत रहते हैं । शरीररूप गृह के यही पति हैं । साथ ही में ये अग्नि द्वारा भुक्त होने से " अग्निष्वासा " नाम से भी प्रसिद्ध हैं । प्रतएव श्रुति ने इनको " अयज्वानः " ' कहा है । जो बुद्धिमान् श्रनग्निष्वात्तादि शब्दों से जीवित पितादि का ग्रहण करते हैं, उनके मतानुसार तो क्रोधी इन श्रग्निष्वात्ता पितरों का कोई सत्कार नहीं करना चाहिए । [ २७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड **** --- ** -- ** -[ २८ ] प्रमाणोपनिषत् www - शत ० २।६।१।७ । - ( शत ० २।१।३।३१ 1 ) १४ – “ यानग्निरेव दहन्त्स्वदयति ते पितरोऽग्निष्वात्ताः " -“ जिन पितरों को अग्नि ही बड़े स्वाद से खाता है, वे पितर अग्निष्वात्ता हैं " । शरीरस्थ पितर-प्राण शारीर श्रामाद्यात् अग्नि द्वारा भुक्त हैं, दाहकाल में क्रव्यादाग्नि द्वारा प्रेतात्म - शरीर के पितर भुक्त हैं । दोनों अवस्थाओं से युक्त गृहमेधी अयज्वा पितर ही अग्निवाता हैं । १५ – “ तन्मध्येऽग्नि समादधाति । पुरस्ताद्वै देवाः प्रत्यञ्चो मनुष्यानभ्युपावृत्ताः । तस्मात् - तेभ्यः प्राङ् तिष्ठन् जुहोति, सर्वतः पितरः । अवान्तर दिशो वै पितरः सर्वत इवहीमा अवान्तरदिशः " - ( शत ० २।६ । १ । ११ ): " मध्य में अग्नि को प्रतिष्ठित करता है । पूर्व से पश्चिम की ओर देवता लोग मनुष्यों के समीप आए हैं । इसलिए इनके लिए पूर्वाभिमुख बैठ कर प्राहुति दी जाती है, एवं पितरों के लिए चारों श्रोर आहुति दी जाती है । प्रवान्तर दिशाएँ ही पितर हैं, चारों ओर ही प्रवान्तर, दिशाएँ हैं " । आप कहते हैं, जीवित पितरों को भोजन करायो, श्रुति कहती है पितरों के लिए अग्निकुण्ड में चारों ओर से आहुति दो । कहिए आपको प्रमाण समझें, अथवा श्रुति कथन का समादर करें? १६ - " तृतीये वा इतो लोके पितरः " – ( तै ० ब्रा ० १।३०।१०।५ । ) “ यहाँ से - तीसरे लोक में पितर हैं । " तीसरा लोक परमेष्ठी है, यहीं सोमलोक हैं, सौम्यप्राण ही पितर है, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है. । १७ – “ मासि मासि पितृभ्यः क्रियते " - ( तै ० ब्रा ० १ | ४ | १ | ११ ) " महिने महिने में पितरों के लिए ( श्राद्धकर्म ) किया जाता । " इस वचन का स्पष्टीकरण आगे देखिए । १८ - " प्रथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जान्वाच्योपसीदन् । तानब्रवीत्-मासि मासिवोऽशनम्, स्वधावः, मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिः "
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् " इसके अनन्तर प्राचीनावीती बन कर अपने वाम जानू को गिरा कर इसकी ओर बैठें । इन पितरों को उसने ( प्रजापति ने ) कहा महिने महिने में तुम्हारा भोजन होगा, स्वधा तुम्हारा श्रात्म-स्वरूप होगी मनोवेग तुम्हारा व्यापार होगा, चन्द्रमा तुम्हारी ज्योति होगी । " इस वचन का ब्राह्मण प्रतिपादित दायविभागाख्यान से सम्बन्ध है । इस आख्यान की वैज्ञानिक उपपत्ति आगे के प्रकरणों में स्पष्ट होगी । यहाँ विषय सङ्गति के लिए केवल शब्दार्थ जान लेना ही पर्य्याप्त होगा । चन्द्रमा पितर प्रारण की आवास भूमि कहलाती है । चन्द्रमा का अधोभाग सदा पृथिवी की ओर अनुगत रहता है, ऊर्ध्वभाग सदा परमेष्ठी के अनुगत रहता है । परमेष्ठी पितर की प्रभव भूमि है । इसके सम्बन्ध से चन्द्रमा के ऊर्ध्वभाग में ही पितर प्रारण की प्रधानता रहती है । - " विधूर्ध्वभागे पितरोवसन्ति । " पितर - प्राण- मूर्ति यह चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । इसी परिक्रमा से शुक्ल - कृष्ण पक्षों का उदय होता है । शुक्ल - पक्ष में सोम द्वारा तन्मय पितरों का सौर देवताओं के साथ भोग रहता है, अतएव इस पक्ष में पितर प्राण का हमारे साथ सम्बन्ध नहीं होने पाता । कृष्ण पक्ष में चान्द्रप्रारण भूपिण्ड पर प्राता है । इसमें भी अमावस्या को ( जबकि सूर्य्य चन्द्रमा का संगम होता है ) पितर प्रति मात्रा में यहाँ आता है – “ इहैव लोके प्रमा ( सह ) वसति तस्मादमावास्या नाम " । यही पितरों का मध्याह्न है, पूर्णिमा इन की अर्द्धरात्रि है । फलतः पितृश्राद्ध अमावस्या में ही विहित है । इस प्रकार श्राद्धान्न का इनके साथ मास-मास में ही सम्बन्ध होता है । क्या जीवित पितर महिने में एक बार खा कर जीवन धारण कर सकते हैं? पितर प्राण सोम प्रधान होने से ससंग है । यह अन्तर्यामि सम्बन्ध से ही शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव इन्हें " स्वधा ” कहा गया है । चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है, अतएव मनोजव इनका व्यापार माना गया है । चन्द्रमा ही इनकी वास्तव में ज्योति है ।
१ ९ – “ स यत्रोदावर्त्तते - देवेषु तहि भवति, देवांस्तर्ह्य भिगोपायति ।
अथ यत्र दक्षिणावर्तते - पितृषु तहि भवति, पितं स्तह्यं भिगोपायति ॥
- ( शत ० २।१।३।३ ) " जब ( दृश्यमण्डल के अनुसार ) परिक्रमा लगाते - लगाते सूर्य उत्तरायणानुगामी बनता है, उस काल में वह देवमण्डल में प्रतिष्ठित होता है, उस काल में यह देवतात्रों की रक्षा करता है । अनन्तर जब यह दक्षिणायन की ओर लौटता है तो उस समय यह पितरों में प्रतिष्ठित रहता है, एवं उस दक्षिणायन काल में पितरों की रक्षा करता है " यदि पितर सौम्य हैं, तो देवता श्राग्नेय हैं । दक्षिणायन काल में पितर - प्राण का प्रभुत्व रहता है, एवं उत्तरायणकाल में देव - प्रारण का साम्राज्य रहता है । उक्त श्रुति का स्पष्टीकरण पितृनिरूपण में होने वाला है । " २० – “ पितृलोकः सोमः " -( कौ ० ब्रा ० १६।५ ) [ २ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www प्रमाणोपनिषत् " पितृलोक सोम ( मय ) है " । परमेष्ठी एवं चन्द्रमा यह दोनों ही पितृलोक हैं । इत दोनों में से परमेष्ठी में ब्रह्मणस्पति नाम का पवित्र सोम प्रतिष्ठित है, यही श्रोत्रेन्द्रिय का अधिष्ठाता है । चन्द्रमा में भास्वरसोम प्रतिष्ठित है, यही मन का अधिष्ठाता है । २१ – “ सम्वत्सरो वै सोमः पितृमान् ” - तं ० ब्रा ० ( १।६।८।२ ) सम्वत्सरात्मक सोम पितरप्रारयुक्त होने से पितृमान् है " । पूर्व में हमने बतलाया है कि, सोम ऋततत्व है, प्रति सत्यतत्त्व । ऋत पूर्वावस्था है, सत्य उत्तरावस्था है । ऋत आधार है, सत्य आधेय है । " ऋते भूमिरियं श्रिता " । यद्यपि आधे सम्वत्सर में सोम की, एवं आधे सम्वत्सर में अग्नि की प्रधा नता है, परन्तु श्राधारापेक्षया सम्पूर्ण सम्वत्सर में सोम की व्याप्ति मान ली जाती है । इसी आधार पर सोम को सम्वत्सरमूर्ति मानते हुए इसे पितृमान बतलाया है । २२ – “ षड्वा ऋतवः पितरः - * -- ( शत ० ६/४/३/८ ) " वसन्त- बीष्म वर्षाव ६ ऋतुएँ पितर हैं " । " अग्नीषोमात्मकं जगत् " इस श्रोत सिद्धान्त के अनु-सार सम्पूर्ण विश्व अग्नि- सोममय है । यह अग्निसोम ६ ऋतुओं में विभक्त है । बसन्त - ग्रीष्म - वर्षा – ये तीन ऋतुएँ अग्निप्रधान हैं, शरत् - हेमन्त शिशिर ये तीन सोम प्रधान हैं । षड्ऋतुसमष्टि ही विश्व की उत्पादिका होने से " पितर " स्थानीय है । यहाँ पितर शब्द उत्पादक भाव से सम्बन्ध रखता है, यही तात्पर्य है । इस विषय का विशद विवेचन " ऋतु पितृ विज्ञानोपनिषत् " में होने वाला है । २३ – “ प्रोषधिलोको वै पितरः " - ( शत ० १३।८।१।२० ) “ प्रोषधिलोक पितर है ” । “ प्रोषध्यः फलपाकान्ताः " के अनुसार जिस मूल जीव के मूल का फल आने पर नाश हो जाय, वही प्रोधि है । जो गेहूं - चावल उर्द - मूंग आदि अन्नों की यही दशा है । इन सबके पौधे एक बार फल देकर नष्ट हो जाते हैं । इन प्रोषधियों में सोम की प्रधानता रहती है । कारण इनका निर्माण चान्द्रसोम से होता है । अतएव चन्द्रमा को “ प्रोषधीनां पतिः " कहा जाता है । प्रोष-धियों में अग्निगर्भ में रहता है, सोम से इनका शरीर बनता है, अतएव " श्रोषं ( ऊष्मभावं श्रग्नि ) धत्ते " इस निर्वचन से इन्हें प्रोषधी कहा जाता है । ' प्रोषधी ' ही परोक्ष भाषा में ' औषधि ' है । सौम्यप्रारण ही पितर है । भूपिण्ड में पितरप्राण औषधियों में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव श्रुति ने औषधि को पितृलोक माना है । [ ३० ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwww www २४ – “ यह तवः पितरः प्रजापति पितरं पितृयज्ञेनायजन्त तत् पितृयज्ञस्य पितृत्वम् ” ।— - ( तै ० ब्रा ० १ । ४ । १०15 ) प्रमाणोपनिषत् " जो कि पितररूप ऋतुस्रों ने पिता प्रजापति को पितृयज्ञ से युक्त किया, वही पितृयज्ञ का पितृत्व ( पितरप्राणमयत्व ) है " । व्यष्टिरूप से वही संवत्सर प्रजापति " पितर ": है । समष्टिरूप से वही " पितर " है । समष्टिरूप संवत्सर एक है, व्यष्टिरूप संवत्सर ६ हैं, यह ६ ऋतुएँ हैं । संवत्सररूप पिता प्रजापति पार्थिव प्रजा निर्माण में वित्रस्त ( खर्च ) होता रहता है । यह कमी इन्हीं ऋतुस्रों द्वारा पूरी होती रहती है । पार्थिव औषधियों के रस उन्हीं ऋतुस्रों से सम्पन्न होते हैं, निधन काल में इन्हीं ऋतुनों के द्वारा ओषधिरस संवत्सर में सञ्चित होते रहते हैं । सञ्चित होने वाला सौम्यरस पितरप्राणमय ही तो है । पितर- संवत्सर यज्ञ ही पितृयज्ञ है । इस पितृयज्ञात्मक संवत्सर से यदि पितरप्राणमयरस प्रजा निर्माण में खर्च ही होता रहता तो एक दिन इस पितृयज्ञ का पितृत्व ( पितरप्राणमयत्व ) उच्छिन्न हो जाता । परन्तु ऋतुओं द्वारा स्रस्त पितृभाग का संधान होता रहता है, कमी पूरी होती रहती है, यही तो इस पितृयज्ञ के पितृत्व - भाव की प्रतिष्ठा का मुख्य कारण है । २५ – “ यमो वैवस्वतो राजेत्याह तस्य पितरो विशाः । त इमप्रासतइति स्थविरा उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति, यजूंषि वेद सोऽयमिति " । ( शत ० १३ | ४ | ३ | ६ ) " यम देवता वैवस्वत राजा है " यह कहा है, पितर इस यम की प्रजा है । वह यह बैठे हुए हैं जो कि रि ( पुराने ) पितर ( यज्ञ में ) संगत है । इन्हीं को ( लक्ष्य में रखकर अध्वर्यु ने ) " यमो वै: " इत्यादि कहा है । यजुर्वेद इस स्थविर पितर - तत्त्व को जानता है कि वह यह है " । जिस प्रकार मनुवैवस्वत राजा है, मनुष्य इसकी प्रजा है, ऋग्वेद इनका वेद ( परिचायक ) मनुष्यों का ज्ञाता है । १२ आदित्यों में से | वरुण नाम का श्रादित्य विशेष राजा है, गन्धर्व इसकी प्रजा है, अथर्ववेद इनका ज्ञाता है, विष्णुदेवता सम्बन्धी सोम राजा है, अप्सराएँ इसकी प्रजा हैं, श्राङ्गिरसवेद इनका ज्ञाता है, अर्बुद नाम से प्रसिद्ध काद्रवेय ( सुपर्णंगायत्री ) राजा है, सर्प इसकी प्रजा हैं, सर्पविद्या इनका वेद | कुबेरश्रवरण राजा है, राक्षस इसकी प्रजा है, “ देवयजन विद्या " ( भूतविद्या ) इनका वेद है । धान्वप्रसित इनका राजा है, असुर इनकी प्रजा है, " माया " इनका वेद है । मत्स्य साम्मद राजा है, जलचर इसकी प्रजा हैं, " इतिहासवेद " इनका वेद है । तावैपश्यत राजा है, पक्षि इसकी प्रजा हैं, " पुराण " इनका वेद है । धर्मेन्द्र राजा है, देवता इसकी प्रजा हैं, सामवेद इनका वेद है । इसी प्रकार यमवैवस्वत राजा है, पितर इसकी प्रजा है, यजुर्वेद इनका वेद है । [ ३ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www प्रमाणोपनिषत् राजा ( क्षत्रम् ) प्रजा ( विश: ) वेदः ( वीर्य्यः ) श्रहानि १ - मनुर्वैवस्वतः -मनुष्याः ऋग्वेद: -प्रथमम् २- यमो वैवस्वतः --पितरः यजुर्वेद: -द्वितीयम् ३ - वरुण श्रादित्यः - गन्धर्वाः अथर्ववेद: -तृतीयम् ४ - सोमो वैष्णवः -अप्सरसः प्राङ्गिरसवेद: -चतुर्थम् ५ - अर्बुदः काद्रवेयः -सर्पाः—-सर्पवेद: पञ्चमम् ६ - कुबेरो वैश्रवण: - रक्षांसि -देवयजनवेदः षष्ठम् ७ - प्रसितो धान्वः -- ~ असुराः मायावेद: -सप्तमम् ८- मत्स्यः साम्मदः— उदकेचराः इतिहासवेद: -अष्टमम् E- तार्क्ष्यो वैपश्यतः-वयांसि ---पुराणवेद: -नवमम् १० - धर्म इन्द्रः - ~ -देवा: -- + सामवेदः दशमम् स एष विराट्प्रजापतिर्देशहोता वा दशाहयज्ञः सर्वेश्वरः सर्वेषां प्रतिष्ठा । जिन पितरों का वेद यजु: है, दूसरे शब्दों में जिनका परिचायक यजुर्वेद है, श्रुति ने उन्हें ( स्थ-विर ) शब्द से सम्बोधित किया है । सौम्य पितरशारण का सम्बन्ध परमेष्ठी के साथ है, यह विज्ञ पाठकों को विदित है । परमेष्ठी प्रप्प्रकृतिक है । इसका विकास प्राणप्रकृति स्वयम्भू से होता है । अव्यक्त स्वयम्भू त्रयी वेदमय है । इसका यजुभाग यत् - जू भेद से प्राण - वाग्रूप है । प्राणव्यापार से यजु का यत् रूप वाक् भाग ही अंशात्मना अबूरूप में परिणत होता है - " सोऽपोऽसृजतवाच एव लोकात् वागेव साऽसृज्यत " ( शत ० ६।१।१ ' ' ) | यजुवाक् से उत्पन्न यह अप्तत्व भृगु अङ्गिरात्मक है — " ग्रापोभृग्वङि गरो रूपम् ” ( अथर्व. ) भृगु की अवस्था विशेष ही सोम है । तन्मय - प्राण ही पितर हैं । इस प्रकार परम्परया यजुरूपा वाक् का पितरप्राण का प्रभवत्व सिद्ध हो जाता है । यजुवाकू ही पितर का आत्मा है, इसी आधार पर " पितरो वाक्यमिच्छन्ति " यह कहा जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है कि " पितरों का वेद यजु है, यजु ही ( यजु का स्वरूप वाक् भाग ही ) पितृ - तत्व का यथार्थ में परिज्ञाता है " । [ ३२ ]
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श्राद्धविज्ञान दितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् २६ – शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पितरः " - ( शत ० २।१।३।१ ) “ शरत् - हेमन्त - शिशिर ( यह तीन ऋतुएँ ) पितर हैं " । इस वचन का अर्थ पूर्व से गतार्थ है । संवत्सर की अवयवभूता ६ ऋतुओं में अग्नि और सोम का उद्ग्राभ ( चढ़ाव ) निग्राम ( उतार ) है शरदादि तीन ऋतुओं में सोम का उद्ग्राभ एवं अग्नि का निद्ग्राभ है, वसन्तादि तीन ऋतुओं में सोम का निग्राभ एवं अग्नि का उद्ग्राभ है । ग्राग्नेय प्राण ही देवता है, अतएव तत् प्रधान वसन्तादि तीन ऋतुनों को देवता कहा जाता है - " वसन्तोश्रीष्मोवर्षाः ते देवाऋतवः " सौम्य - त्राण पितर हैं, अतएव तत् प्रधान शरदादि ऋतुओं को श्रुति ने पितर कहा है । " षड्वाऋतवः पितरः " इस पूर्व श्रुति में पितर शब्द उपादान भाव से सम्बन्ध रखता है, जैसाकि उक्त श्रुत्यर्थं निरूपण में कहा जा चुका है, एवं प्रकृत श्रुति में उपात्त पितर शब्द का सौम्यप्राण से सम्बन्ध है । man २७ – “ ऋतवः खलुवै देवाः पितरः । ऋतूनेव देवान् पितृन् प्रीणाति । तान् प्रीतान् मनुष्याः पितरोऽनु प्रपिपत्ते । " ( तै ० ब्रा ० १।३।१०।५ ) " ( शरदादि तीनों ) ऋतुएँ ही देवरूप पितर हैं । ऋतुरूप देवताओं को ही तृप्त करता है । इन ( दिव्य ) पितरों के तृप्त होने पर इनका अनुगमन करते हुए मनुष्य तृप्त होते हैं । " दिव्य एवं मनुष्य भेद से पितर दो प्रकार के हैं । प्राकृतिक नित्यमाधिदैविक पितर दिव्य पितर हैं यही पितृलांक के अधिष्ठाता हैं । मनुष्य शरीर के उत्क्रान्त कर्मात्मा के साथ उत्क्रान्त होने वाला पितरप्राणयुक्त महानात्मा ( प्रेतात्मा ) मनुष्य पितर है । यह उन दिव्य पितरों की प्रजा है । पितृलोक में पहुँचने के अनन्तर यह प्रेतपितर, किंवा मनुष्य पितर उन ऋतुरूप दिव्य पितरों में अन्वाभक्त ( संगत ) हो जाते हैं । इनका १ २ ३ स्वरूप भी शरदादि ऋतुनों के प्राण से युक्त हो जाता है, फलतः शरत् - हेमन्त शिशिर यह तीन ही तो १ २ ३ दिव्य पितर हो जाते हैं, एवं शरत् - हेमन्त - शिशिर इन तीनों से कृत शरीरी प्रेत- पितर भी त्रिपर्वा बन जाता है । संभूय ६ ऋतु पितर हो जाते हैं इनमें तीन दिव्य पितरों के लिए तो आरम्भ में तीन आहुतिएँ दी जाती हैं, एवं तीन प्रेत- पितरों के लिए अनन्तर तीन पिण्ड दिए जाते हैं । दिव्य पितर आहुति - भाजन है, प्रेत- पितर पिण्ड - भाजन है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" देवान् वै पितृन् प्रीतान मनुष्याः पितरोऽनुप्रपिपत्तेः । तिस्त्र प्राहुतिर्जुहोति, त्रिनिदधाति, षट् सम्पद्येत षड्वा ऋतवः । " ( तै ० १ । ३ । १० । ५ ) पाठकों को ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ ६ ऋतुत्रों से शरत् - हेमन्त - शिशिर इन तीन ऋतुस्रों का युग्म ही अभिप्रेत है । तात्पर्य यही है कि वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा - शरत् - हेमन्त - शिशिर इन ६ ऋतुस्रों का [ ३३ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् प्रकृत में कोई सम्बन्ध नहीं है । यहाँ शरदादि तीन ऋतुत्रों का युग्म ही " षड्वा ऋतवः " से अभिप्रेत है । क्योंकि यही ऋतुएँ सोम प्रधान होने से पितर प्राणयुक्त हैं । पाठकों को यह विदित हुआ होगा कि श्रुति ने पितर शब्द से अभिप्राय परलोक गत प्रेतात्मा का ही ग्रहण किया है, साथ ही में यह भी स्पष्ट है कि इनकी तृप्ति के लिए पिण्डदान का विस्पष्टतम विधान है, फिर भी जो वेदभक्त पिण्डदान लक्षण श्राद्ध को अवैदिक बतलाने का साहस करते हैं, उनका वेद कौनसा है? यह अविज्ञात है । ww 1 २८ – निधनम्पितृभ्यः ( प्रायच्छत् ), तस्मादु ते निधनसंस्था: " ( जं ० उ ० १।१२।२ ) ( प्रजापति ने दाय विभाग करते समय ) निधन ( मृत्युभाव ) पितरों को सौंपा, श्रतएव वे निधन संस्थ हैं । " जीवात्मा ( तयुक्त महानात्मा ) परलोक में जाने पर ही " पितर " नाम से प्रसिद्ध होता है, उक्त श्रुति इसी अर्थ का समर्थन करती है । wwwwww २ ९ – " वनिवेषां तस्मिन्त्संग्रामेऽनस्तान् पितृयज्ञेन समैरयन्त, श्रासन् । तस्मात् पितृयज्ञो नाम " ( शत ० २।६।१ ) पितरो वैत " जिनको उस संग्राम में मार डाला था, उन्हें पितृ यज्ञ से ( पितृ कम्मं से ) पुनः संगत किया, संग्राम में मारे गए वे ( परलोकगत ) प्राणी पितर ही थे । ( इन्हीं के सम्बन्ध से यह यज्ञ ) कहलाया । " यह श्रुति भी मृतात्माओं को ही पितर मानती हुई, उनका पितृयज्ञ में सम्बन्ध बतलाती है । ३० - " अपक्षयभाजो वै पितरः " ( कौ ० ब्रा....... ) " पितर अपक्षयभाज । " क्षयभाव पितृप्रारण का स्वरूपधर्म है । सोम - तत्व ही अन्न है । सोम सदा अग्नि का अन्न रहता है । दूसरे शब्दों में सौमान्न सदा क्षयभाव से प्राक्रान्त रहता है । यही सोम पितरों का आत्मा है, फलतः पितरों का अपक्षय भाजनत्व सिद्ध हो जाता है । अपिच शरीर महानात्मा की पितर संज्ञा मरने के पश्चात् ही होती है, यही पितर का क्षयभाव है । इस दृष्टि से भी इन्हें अपक्षय भाजन माना जा सकता है । श्रुति ने क्षयभाजन कह कर अपक्षयभाज कहा है । ' अप् ' शब्द निम्न गति का सूचक है । जिस प्रकार अग्नितत्त्व हृदय से प्रधि की ओर ( उत्तरोत्तर विशकलित होता हुआ ) जाता रहता है, एवमेव सोम - तत्त्व उत्तरोत्तर संकुचित होता हुआ प्रधि से केन्द्र की ओर प्राता रहता है । यही सोम का प्रभाव है । अभावापन्न सोम नीचे आता हुआ, ऊपर जाते हुए अग्नि में प्राहुत होता हुआ स्वस्वरूप से क्षीण होता जाता है । यही इसका अपक्षय भाव है । तयुक्त पितर का यही अपक्षय भागत्व है । [ ३४ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् ३१ – “ तस्मै ( चन्द्रमसे ) पूर्वाह खो देवा अशनमभिहरन्ति मध्यन्दिने मनुष्याः, अपराह्णे पितरः " ( शत ० १ | ६ | ३ | १२ ) " उस ( चन्द्रमा ) के लिए पूर्वाह में देवता भोजन इकट्ठा करते हैं, मध्यन्दिन में मनुष्य एवं अपराह में पितर ( अन्न संभरण करते हैं ) । " प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवत्, सायंसवन भेद से सौर हर्यज्ञ तीन भागों में विभक्त है । इन तीन सवनों का विभाजक मध्य का विषुववृत्त है । यह विश्वद् रेखा अद्यतन - अनद्यतन की विभाजिका है । यही वृत्त " मव्याह्नरेखा " नाम से प्रसिद्ध है । इसी से मित्र- वरुण – कपाल का स्वरूप सम्पन्न होता है । रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक का ग्रद्ध-कपाल मित्रमण्डल है, दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे तक का अद्ध कपाल वरुण मण्डल है । मित्र मण्डल पूर्व कपाल है, तदवच्छिन्न काल अद्यतन है । वरुणमण्डल पश्चिम कपाल है, तदवच्छिन्न काल अनद्यतन है । इससे बतलाना यही है कि मध्याह्न रेखा ही विषुवत् है । इससे पहिले का काल पूर्वाह्ण है, पीछे का काल अपराह्ण है । स्वयं विषुव काल मध्याह्न है । पूर्वाह्न में अग्नि की प्रधानता है, अपराह्न में सोम का प्रभुत्व है, विषुव में अग्निसोम की समानता है । सोमगर्भित अग्नितत्व देवता हैं, अग्निगर्भित सोमतत्त्व पितर है, अग्निसोमसमष्टि मनुष्य है । इसी शाधार पर पूर्वा देवकाल है, अपरा पितृकाल है, मध्याह्न मानुष काल है । भौम औषधिरस पूर्वाह्न में देवताओं द्वारा चन्द्रमा में चित होता है, मध्याह्न में मनुष्यों द्वारा अपराहरा में पितरों द्वारा चन्द्रमा की क्षतिपूर्ति होती है । इसी नित्य सिद्ध स्थिति के अनुसार श्राद्ध कर्म्म अपराहरण में ही किया जाता है । ३२ -- " यदि नाश्नाति पितृ देवत्यो भवति " ( शत ० ११ । १।७।२ ) " इष्टि की इच्छा रखने वाले यजमान को अमावस्या के दिन उपवास करना पड़ता है । यह दिन " उपवसथाह " कहलाता है । प्रतिपत् को यजमान इष्टि करने वाला है । इसी संकल्प से प्राण - देवता यजमान के गृहपति अग्नि के समीप व्याप्त हो जाते हैं । इस प्रकार यजन से पहिले ही दिन देवता इसके घर में आ जाते हैं । ऐसी अवस्था में यह श्रावश्यक हो जाता है कि जब तक इन अतिथि देवताओं को हुति न दे दी जाय तब तक यजमान कुछ न खाय । इसीलिए इसे उपवास करना पड़ता है । इस पर श्रुति ने पूर्वपक्ष उठाया है कि यदि अतिथि मर्यादा को लक्ष्य में रख कर यजमान कुछ नहीं खाता है तो देवमर्थ्यादा का पालन तो हो जाता है, परन्तु पितृमर्थ्यादा का उल्लंघन हो जाता है । आज अमावस्था है । चान्द्रोमा भूपिण्ड पर व्याप्त है । तद् द्वारा पितरप्राण सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । यदि यजमान कुछ नहीं खाता है तो, “ अशानाया " ( भूख ) सूत्र से प्राकर्षित पितर प्राण अध्यात्म में प्रविष्ट हो जाता है । ऐसी अवस्था में इसका यह देव कर्म्म " पितृ कर्म्म " वन जाता है । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए कुछ भोजन करना आवश्यक है । परन्तु भोजन से देवमर्थ्यादा का विरोध होता है । ऐसी अवस्था [ ३५ ]