Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 41–50
पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 41–50
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् में क्या करना? इसका समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि " इस दिन ऐसी वस्तु खानी चाहिए, जिसे देवता न खाते हों । " ऐसी स्थिति में अशनाया के शान्त होने पर पितरप्राण इसके आत्मा में प्रि नहीं होता, एवं अतिथि मर्यादा का उल्लंघन भी नहीं होता । " यही " व्रतोपायनकर्म " है । इससे प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि पितर प्राण विशेष है, न कि जीवित पितर पितामहादि । ३३ – “ अनपहृतपाप्मानः पितरः " ( शत ० २।१।३।४ ) " पितर श्रनपहृत पाप्मा है । " अग्न्याधान किस समय करना? इस विषय का निर्णय करते हुए श्रुति ने कहा है कि उत्तरायणकाल में हो अग्न्याधान करना चाहिए । कारण देवता अपहृत पाप्मा हैं, अमृत भावापन्न है । दक्षिणायन काल में अग्न्याधान नही करना चाहिए । कारण पितर मर्त्यभावापन्न होने से अपहृत पाप्मा ( मृत्युरूप पाप्मा से युक्त ) है । यदि यजमान इस काल में अग्न्याधान करेगा तो वह यजमान नियत आयु से पहिले ही मर जायगा । इस प्रकार श्रुति ने स्पष्ट शब्दों में पितर का प्रेतात्मा के साथ ही सम्बन्ध माना है । www ३४ -- “ य एवापूर्यतेऽर्धमासः स देवाः योऽपक्षीयते स पितरः " ( शत ० २।१।३।१ ). " श्रापूर्यमाण पक्ष ( शुक्ल पक्ष ) देव रूप है, प्रपक्षीयमान पक्ष ( कृष्ण पक्ष ) पितर है । " अग्नि-सोम की समष्टिरूप संवत्सर देव - पितृमूर्ति है । वसन्त - ग्रीष्म - वर्षारूप श्रापूर्यमाण अयन षण्मासात्मक उत्तरायण काल ) देव प्रधान है, शरत् - हेमन्त - शिशिर रूप प्रपक्षीयमान श्रयन ( षण्मासात्मक दक्षिणायन काल ) पितर प्रधान है । शुक्ल पक्ष देवमय है, कृष्ण पक्ष पितरमूर्ति है । ग्रह: काल ( दिन ) देवमय है, रात्रि पितर है । केवल दिन में भी पूर्वाह भाग देवमय है, अपराह, काल पितरमय है । इस प्रकार महादशा -दशा - अन्तर दशा — प्रत्यन्तर दशा — प्राण दशा - श्रादि की तरह यह देव पितर प्राण पर्व - पर्व में व्याप्त है । क्या जीवित पितादि ही उक्त काल पर्वों में व्याप्त है? ३५ – “ पितृदेवत्यो वै कूपः खातः " ( शत ० ३ | ६ | १ | १३ ) " कूप एवं खड्डे पितृ देवत्य हैं । " पाठकों को स्मरण होगा कि हमने पूर्व में प्रकाश का देवता के साथ, अन्धकार का असुरों के साथ सम्बन्ध बतलाया । पितर इन दोनों की सन्धि में है । अतएव यह प्रकाशिताप्रकाशित रूप होने से छायामय है । छाया में घोर अन्धकार भी नहीं है, आतपरूप प्रकाश भी [ ३६ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् नहीं है । छाया में पितर प्राण की ही प्रधानता है, अतएव पितृकर्म में पात्र अधोमुख कर दिये जाते हैं । कूप एवं खातों में छाया की प्रधानता है, अतएव इन्हें पितृ देवत्य कहा गया है । www ३६ – “ अथ या रोहिणी. श्येताक्षी सा पितृदेवत्या, यमिदं पितृभ्यो घ्नन्ति " ( शत ० २/४ | २ | ) " जो रोहिणी ( लाल ) श्येताक्षी गौ है, वह पितृदेवत्या है, जिसको कि पितरों के लिए ( श्राद्ध-कर्ममें ) मारते हैं । " पितरों के लिए श्राद्धकर्म में मांसबलि का विधान है, यह उक्त श्रुति से सिद्ध है । रक्त और श्वेत दो वर्ण पितरों से सम्बन्ध रखते हैं, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । www · ३७– “ सकृदु ह्य ेव पराञ्चः पितरः " - ( २ | ४ | २ | ε ) " पितर सकृत् हैं, पराङ्भाग से प्राक्रान्त हैं " । देवता और पितर दोनों ही प्रारणात्मक हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं, परन्तु दोनों प्राणों के व्यापार में अन्तर है । देवप्राण, प्राणदपानत् भाव से सम्बन्ध रखता है, एवं पितरप्रारण केवल अपानत् भाव से सम्बन्ध रखता है । कारण इसका यही है कि अग्नि, विकासशील है, सोम संकोचधर्म्मा है । विकास में गति - प्रगति दोनों भाव रहते हैं, गतिभाव अपानत् है, प्रगति भाव प्राणत् है । सौर - रश्मि में प्रातप छाया की सीमा में आप इन दोनों व्यापारों का साक्षात्-कार कर सकते हैं । संकोचभाव के कारण निम्नगतिरूप प्रगति भावात्मक सोम में केवल अपानत् व्या-पार ही होता है, यही पितर का सकृत् भाव एवं पराङ भाव है । प्राणदपानत् व्यापार में सन्धिभाव से तीन भावों का उदय हो जाता है । इसी आधार पर देवताओं को " त्रिसत्य " कहा जाता है । जहाँ त्रिसत्य देवताओं के लिए तीन बार आहुति दी जाती है, वहाँ सकृत् पितरों के लिए सकृत् ( एक बार ) ही प्राहुति दी जाती है । ३८– “ ऊमा वै पितरः प्रातः सवने, ऊर्जा माध्यन्दिने, काव्यास्तृतीय सवने " ( तै ० सं ० ४/४/७ ) " ऊमा नाम के पितर प्रातः सवन में, ऊर्जा नाम के पितर माध्यन्दिन सवन में, काव्य नाम के पितर सायं सवन में प्रतिष्ठित हैं " । दिव्य नान्दीमुख पितरों का सौर देव - प्रधान ऊमा पितरों के साथ, अन्तरिक्ष्य पार्वण पितरों का ऊर्जा पितरों के साथ एवं पार्थिव अश्रमुख पितरों का दिव्य पितरों के साथ सम्बन्ध है | [ ३७ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् wwwwww ३ ९ – “ एतद्ध नै पितरो मनुष्यलोका श्राभक्ता भवन्ति, यदेषां प्रजा भवति " ( शत ० १३।८।१।६ ) " इस प्रकार से पितर मनुष्य लोक में संयुक्त होते हैं जो कि इनकी प्रजा होती | तात्पर्य यही है कि पिता की शुक्राति द्वारा शुक्र में प्रतिष्ठित रहने वाला श्रष्टाविंशति कल ( २८ ) पितर पुत्र - पौत्र-प्रपौत्रादि में सात पीढ़ी तक वितत होता है । जिस मनुष्य के सन्तान नहीं होती, उस मनुष्य का पितर प्राण सदा के लिए चन्द्रमा में ही प्रतिष्ठित रहता है । उसका सम्बन्ध पृथिवी से टूट जाता है । परन्तु प्रजा द्वारा वह पृथिवी में ( अशात्मना ) अवश्य ही अन्नाभक्त रहता है । ४०– “ अथ यदेव प्रजामिच्छेत् तेन पितृभ्य ऋणं जायते । तद्धयेभ्य एतत् करोति, यदेषां सन्तताव्यवच्छिन्ना प्रजा भवति " । - ( शत ० १।७११1४ ) " जो मनुष्य प्रजा ( सन्तान ) की इच्छा करे, इससे पितरों के लिए ऋण हो जाता है । वही ( ऋण परिशोध ) यह इनके लिए करता है, जो कि इनकी प्रजा सन्तत श्रव्यवच्छिन्न होती है । तात्पर्य यही है कि पुत्र अपने पिता से जिस शुक्र को लेता है, इस आरम्भक शुक्र द्वारा पितर- प्रारण का यह कर्ज -दार बन जाता है, यही पितृऋण है । इससे मुक्त होने का उपाय है सन्तान वितान । प्रजोत्पत्ति ही पितृ-ऋरण से ' मुक्त होने का अन्यतम उपाय है, जैसा कि ऋणमोचनोवायोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । ४१ – ' स्वधो ( स्वधा - उ ) वै पितृ णामन्नम् " - ( शत ० १३।८।१।४ ) -" स्वधा ही पितरों का अन्न है " । स्वधा कोई विशेष अन्न नहीं है, अपितु जिस प्रकार तण्डुलान्न ( पुरोडाश ) देवता के सम्बन्ध से " स्वाहा " कहलाता है, एवमेव वही तण्डुलान्न ( पिण्ड ) पितरप्राण सम्बन्ध से “ स्वधा ” नाम से व्यवहृत होने लगता है । स्वाहान का वहिर्याग भाव से सम्बन्ध है, एवं स्वधान्न का अन्तर्याग भाव से सम्बन्ध है । इन सब अन्नों की वैज्ञानिक उपपत्ति प्रागे के प्रकरणों में बतलाई जाने वाली है । www ४२ – “ ह्रीकाः पितरः " -० ब्रा ० १ | ३ | १० | ६ ) [ ३८ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् wwww " पितर होक ( लज्जाशील ) हैं " । पिण्डपितृयज्ञ में अध्वर्यु दक्षिणाभिमुख बैठ कर पहिले पितरों के लिए पिण्डदान करता है । पिण्डदान करने के अव्यवहितोतरकाल में ही पिण्ड पर से दृष्टि हटा कर पाराङ्मुख बन जाता है । कारण इसका यही है कि पितर सौम्य हैं । सोमभाव ही लज्जा की प्रवासभूमि है । जिस प्रकार सोमगर्भित अग्नि पुरुष का उपादान बनता है एवमेव प्रग्निगर्भित सोम स्त्री का आरम्भक बनता है । पुरुष आग्नेय है, स्त्री - सौम्या है । इसी सोम की प्रधानता से स्त्री में पुरुष की अपेक्षा से लज्जाभाव अधिक मात्रा में होता है । इसी सौम्यभावमूलक लज्जाभाव को लक्ष्य में रख कर धर्म - शास्त्र में भोजन करती हुई स्त्री को देखने का निषेध है । आज पितर इस पिण्डान्न का भोजन करने वाले हैं । पितर सौम्य हैं, फलतः इनका लज्जाशीलत्व सिद्ध हो जाता है । wwww ४३ - " पितॄणां मघा: " -- ( तै ० ब्रा ० १ | ६ | १ | २ ) " पितरों का नक्षत्र मघा है । " मघा नक्षत्र और हस्त नक्षत्र का परस्पर में घनिष्ट सम्बन्ध है । आकाश में हस्त नक्षत्र दो प्रकार के हैं । एक तो पञ्चाङ्ग ुलि युक्त हस्त के आकार का है, दूसरा बाहू कें आकार का है । इसी को गजच्छाया कहा जाता है । मघा नक्षत्र पर जब सूर्य आता है, तभी इसके साथ गजच्छायारूप इस हस्ते नक्षत्र का योग होता है । यही श्राद्धकाल है । इस काल में पितरप्राण अधिक मात्रा में भूपिण्ड पर आता है । जिस समय सूर्य्य मघा नक्षत्र पर आवे, उस समय छत पर खड़े हो जाइए और आकाश के अद्भुत श्राश्वर्यप्रद दृश्यों पर दृष्टि डालिए । उसी दाह्य सौम्यप्राण की प्रधानता से इस काल में आकाश में से अनन्त ग्रग्निखण्ड ( तारे ) गिरा करते हैं । उपर्युक्त निगम वचनों से स्पष्ट हो जाता है कि पितर तत्त्व अवश्य ही किसी तत्त्व विशेष का वाचक है । वही तत्तत् स्थान विशेष के सम्बन्ध से एवं तत्तत् कर्म्म विशेष के सम्बन्ध से ऋतु - सोम - ऊमा-ऊर्जा आदि विविध नामों से व्यवहृत हो रहा है । इस प्रकरण में प्रधानरूप से हमें दिव्यपितर ऋतु पितर-प्रेतपितर इन तीन पितर- प्राणों का स्वरूप बतलाना है । " पितर शब्द केवल जीवित पिता पितामहादि काही वाचक नहीं है, विशेषतः जिन पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है, वे तो जीवित पित्तर कथमपि नहीं हो सकते, श्राद्ध सम्बन्धी पितर हमारी दृष्टि से परे की वस्तु है, उनका निवास लोकान्तर में है । उन्हीं की तृप्ति के लिए श्रद्धासूत्र द्वारा पिण्डदानादि श्राद्ध कर्म किए जाते हैं । " हमें उक्त प्रमाणों से केवल यही सिद्ध करता था । हमें विश्वास है कि इन प्रमाणों की मीमांसा करने के ग्रनन्तर " सनातन-धर्माभिमत मृतपितर श्राद्धकर्म पर विश्वास का कोई कारण शेष नहीं रह जायेगा । " जिन महानु-भावों को इसकी प्रामाणिकता में और भी अधिक जिज्ञासा हो उन्हें तत्तद्ब्राह्मणोक्त " पिण्डपितृयज्ञ " प्रकरण देखना चाहिए । कितने ही वेदाभिमानी प्रपने कल्पित सिद्धान्त की कल्पना का उच्छेद करने वाले पिण्डपितृयज्ञ ब्राह्मणों को प्रक्षिप्त मानते हैं । अतएव हमने मूल संहिता एवं पितृयज्ञातिरिक्त इतर ब्राह्मण वचनों द्वारा भी इस विषय की पुष्टि का प्रयास किया है । [ ३ ९
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् उचित था कि शास्त्रीय प्रश्न मीमांसा - प्रमाणवाद को यहीं समाप्त कर निरूपणीय विषय का ग्रारम्भ किया जाता । परन्तु सर्वक्षा ग्रप्रस्तुत होने पर भी हम उन ऋषिसन्तानों के सम्बन्ध में प्रसंगागत अपने शोकोच्छवास प्रकट करना चाहते हैं, जो कि अहर्निश वेद का डिण्डिमघोष करती हुई भी वैदिक साहित्य के मर्म्मार्थ से स्वयं पथभ्रष्ट होती हुई अबोध किन्तु श्रद्धालु मनुष्यों को भी इन वेदसिद्ध साथ ही में अत्यावश्यक कर्म्मो से पथभ्रष्ट बनाती हुई हमारी अन्तर्वेदना का कारण बन रही हैं । सनातनधर्मी मृत पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं, प्रार्यसमाजी जीवित पितरों का श्राद्ध करते हैं । केवल इतिकर्त्तव्यता में अन्तर है । दोनों की ही दशा आज दयनीय बन रही है । पहिले सनातनधम्मियों को ही लीजिए । मृत पितर श्राद्ध को सर्वथा वैदिक मानता हुआ भी सनातन धर्मी जगत् आज इस सम्बन्ध में सर्वथा अन्धभक्त एवं पद्धति से एकान्ततः विमुख है । दूसरे शब्दों में यों कहा जा सकता है कि श्राद्ध मानने वाले एवं करने वाले यह धर्माभिमानी श्राद्ध न मानने वालों से अधिक लक्ष्यच्युत एवं प्रायश्चित्त के भागी हैं । आज इनकी दृष्टि में ' यदेव विद्यया श्रद्धयोपनिषदा करोति तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ' इस श्री प्रदेश का कोई मूल्य नहीं है । यह मान लेने एवं कहने में हम जरा भी संकोच नहीं करते कि वर्तमान युग में श्राद्ध पर जो अनास्था देखी जाती है, मृतपितर श्राद्ध को अवैदिक बतलाया जा रहा है, इसका एकमात्र कारण उपपत्ति ज्ञान शून्य इन धामिकों की धर्म्मविशृङ्खलता ही है । इधर हमारे विद्वत् समाज की मनोवृत्तिएँ कैसी हैं, यह भी देखिए । जयपुर से प्रकाशित होने वाले संस्कृत साहित्य सम्मेलन के मुखपत्र संस्कृतरत्नाकर नाम के मासिक पत्र में तत्प्रकाशक श्रद्धेय म ० म ० श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी जी ने एक बार " शास्त्रीयः प्रश्न: विद्वान्स महाभागा निर्णयन्तुक इमे पितरः? इति " इत्यादि रूप से पितृस्वरूप जिज्ञासा प्रकट की थी । लेखक पूज्य शर्मा जी की महत्ता से परिचित है । इसे यह विश्वास है कि यदि शर्मा जी चाहते तो वे स्वयं हो उक्त प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान भी कर सकते थे, परन्तु ऐसा न कर केवल प्रश्नरूप से उक्त विषय को उपस्थित करने का उनका एकमात्र यही अभिप्राय था कि विद्वत् समाज में इस प्रश्न की चर्चा छिड़े; प्रश्नोत्तर परम्परा से धामिक जनता में इस विषय का पूर्ण प्रसार हो । परन्तु दुःखं के साथ लिखना पड़ता है कि साधारण से साधारण कर्म्म के सम्बन्ध में भी पूर्ण मीमांसा कर तद्द्द्वारा निश्चित सिद्धान्त पर पहुंचने वाला भारतीय विद्वत् समाज " यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्म वेदनेतरः " इस मानव सिद्धान्त के प्रथम द्रष्टा भारतीय विद्वान् उक्त प्रश्न के सम्बन्ध में आज तक कोई सन्तोषप्रद उत्तर न दे सके । विद्वानों की ओर से कोई समाधान न होता, तब भी सन्तोष था । परन्तु दुःखमिश्रित आश्चर्य तो हमें तब हुआ जब कि काजड़ा संस्कृत पाठशाला के अध्यापक श्री रामधन जी ने शर्मा जी के प्रश्न को ही अशास्त्रीय मानने की घोषणा कर दी । प्रविज्ञेय विश्वातीत परात्पर के स्वरूप लक्षरण को सर्वथा श्रचिन्त्य एवं अप्रतर्क्स मानते हुए ऋषियों ने जहाँ " यतो वाचो निवर्त्तन्ते श्रप्राप्य मनसा सह " यह उद्गार प्रकट किए हैं, उसी प्रचिन्त्य भाव के लिए प्राप्त पुरुषों ने - " अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् " यह कहा है, वहाँ विश्वसीमान्तर्गत, अतएव सर्वथा ज्ञेय, सर्वथा मीमांस्य उन पितरों के [ ४० 1
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् सम्बन्ध में भी महानुभाव पण्डित जी ने उक्त श्लोक का उद्धरण देते हुए अपनी दिव्य स्मृति का परिचय दिया है । इस प्रकार —- " शकास्तत् पदं गन्तुन्ततो निन्दां प्रकुर्वते " " मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी: " इन किंवदन्तियों को चरितार्थ करने का सौभाग्य प्राप्त किया है । और आगे चलिए । काशी ' के सुप्रसिद्ध विद्वान् श्री रामभवनोपाध्याय महोदय ने तो प्रश्न की भाषा में ही दोष बतलाया है । अवच्छेदकावच्छिन्न परम्परा का आश्रय लेते हुए श्रीमानों ने व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह निर्णय करने का अनुग्रह किया है कि शर्मा जी को प्रश्न करना ही नहीं आता । उनका प्रश्न विचार व्युत्पत्ति दृष्ट्या सर्वथा अशुद्ध है, प्रथम तो भारतमूर्द्धन्य शर्मा जी की युक्तिवादपूर्ण विद्वत्ता ही उक्त आक्षेप को निर्मूल बना देती है । यदि अभ्युपगमवाद से प्रश्न भाषा अशुद्ध भी मान ली जाय तब भी हम उन्हीं से यह आशा कर सकते थे कि माननीय पण्डित जी यथेच्छ प्रवच्छेदकावच्छिन्न भावों का समावेश करना चाहतें, कर लेते, प्रश्न को सुधार लेते, परन्तु उत्तर देने का तो करते । क्या प्रश्नकर्ता को कुछ उलटी-सीधी मनमानी सुनाने मात्र से ही उनका कर्तव्य समाप्त हो गया? हमने तो सोचा था कि पण्डित जी का यह गर्ज्जन अवश्य ही कभी वृष्टि करेगा । आज उस घटना को लगभग चार वर्ष हो गए, परन्तु आज तक इस सम्बन्ध में आपने अपने उदार विचार प्रकट करने की आवश्यकता न समझी । सम्भव है आपने ऐसे साधारण विषय की चर्चा उठाना अपने स्वरूप के प्रयोग्य समझा हो । इस प्रकार यहाँ भी " शेषं कोपेन पूरयेत् " यह वाक्य अन्वर्थ बना । ५ शास्त्रीय प्रश्न - प्रतिवचन मीमांसा-आगे जा कर भारतीय विद्वत् समाज की ओर से सर्वथा निराश होकर शर्मा जी ने स्वयं ही " शास्त्रीय प्रश्न प्रति वचनम् " शीर्षक से श्री रामभवनोपाध्याय महोदय के शुष्क तर्काभास जाल को सम्यक् रूप से छिन्न - भिन्न करते हुए स्वयं ही पितृविषयिणी जिज्ञासा को शान्त करने का उपक्रम किया था, परन्तु दुःख के साथ लिखना पड़ता है— कि इधर दो - तीन वर्षों से आप मंदाग्नि रोग से पीड़ित होने के कारण अब तक अपना संकल्प पूर्ण नहीं कर सके हैं । इसी अवसर में आपने इस सम्बन्ध में कुछ लिखने की आज्ञा प्रदान की थी, परन्तु रत्नाकर के अल्प आयतन में मैं अपने विचारों का समावेश करने में असमर्थ था । फलतः शर्मा जी की उसी आज्ञा को शिरोधार्य कर लेखक ने यह निबन्ध लिखने का निश्चय किया है । प्राक्कथन में जिन कारणों का उल्लेख किया है, उनमें से एक यह भी मुख्य कारण समझना चाहिए । इस इतिवृत्त से बतलाना हमें यह था कि पितृ श्राद्ध के सम्बन्ध में न केवल पितृश्राद्ध के सम्बन्ध में ही अपितु समस्त कर्म्मकलाप के सम्बन्ध में सनातनधर्मी विद्वान् अपनी कितनी गति रखते हैं । जब विद्वानों की यह दशा है तो साधारण जिज्ञासु अपना सन्तोष न होता देख कर यदि इन शास्त्रीय कम्मों पर अविश्वास करते चले जायें तो कोई प्राश्वर्य नहीं है । हमारा तो यह विश्वास है कि विद्वानों की इसी [ ४१ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषद मनोवृत्ति ने आर्य समाज को जन्म दिया है । इन्हीं धार्मिक महानुभावों की उदासीनता ने इन मतानुयायी महाशयों को उच्छृङ्खल बना रखा है । यह तो हुई मृतपितृ श्राद्धानुयायी सनातनधर्मियों की गुणगाथा । अब जीवितपितृ श्राद्धानुयायी महाशयों पर भी एक दृष्टि डालिए । आर्यसमाज का अपना कोई सिद्धान्त नहीं है । " सनातनधर्म्मा जो कुछ मानते हैं, वह सब अवैदिक होने से अमान्य है " यही इनका सर्वप्रिय सिद्धान्त है । " हम कुछ नहीं मानते, तुम जो कुछ मानते हो वह गलत है " यही इनका अमोघशस्त्र है । यदि इन्हें अपने कल्पित सिद्धांत का कहीं विरोध प्रतीत होता है तो उसके परिहार के लिए - " यह प्रकरण प्रक्षिप्त है । ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए पीछे से कल्पित विषयों का समादेश कर डाला है " यह उत्तर रखते हैं । सनातन-धर्मी जानते नहीं परन्तु मानते हैं । जो अन्ध श्रद्धा शास्त्र की रक्षा कर ले, वह उस सत्य श्रद्धा से कहीं बढ़ कर आदरणीय है जो कि कर्म्म कलाप को ही विलुप्त कर देती है । यदि सनातनधर्धी नहीं समझते तब भी " यह शास्त्र का वचन है, इसे मानने में ही हमारा कल्याण है " यह मनोवृत्ति रखते हैं । इनकी इसी मनोवृत्ति से प्रबल नाधातों को सह कर भी शास्त्र आज तक जीवित रह सका है । यदि इनकी भी—-" यह हमारी समझ में नहीं आया, इसलिए नहीं मानते । यह अंश केवल कल्पना है, प्रक्षिप्त भाग है " यही मनोवृत्ति होती तो सारा शास्त्र प्रक्षिप्त के झंझावात से अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता । आज आर्य समाज सनातन धर्म की प्रत्येक प्रज्ञा का यथाशक्ति तिरस्कार करने में ही अपने आपको कृतकृत्य समझते हैं, सबको अवैदिक बतलाते हैं । धार्मिक जगत् विधम्मियों का सामना कर सकता है, परन्तु जो शास्त्र उसमें भी शास्त्र - मूर्द्धन्य वेद का ही सहारा लेकर उत्पय का आश्रय लेता है. थोड़ी देर के लिए भोली जनता इस धोखे में ग्रा कर पय - भ्रष्ट बन जाती है । आर्यसमाज मे यही किया । वेद का नाम लेकर ही उसने शास्त्रीय कर्म्मो का ग्रीवानिकृन्तन किया । उधर वेद के सम्बन्ध में हमारे विद्वान् भी महाशया ( महा - शया ) बन रहे हैं । आर्य समाज की सफलता का यह दूसरा कारण हुआ । वेद - सिद्ध श्राद्ध के सम्बन्ध में इन महाशयों का क्या सिद्धान्त है? यह भी सुनिए । पितृतर्पण का उल्लेख करते हुए श्री स्वामी दयानन्द जी लिखते हैं-" पिता- पितामह - प्रपितामह - माता - पितामही - प्रपितामही - पत्नी - सम्बन्धी - सगोत्री प्रादि को अत्यन्त श्रद्धा से उत्तम अन्न, वस्त्र, सुन्दर यान आदि दे कर अच्छे प्रकार से जो तृप्त करना है, अर्थात् जिस - जिस कर्म से उनका आत्मा तृप्त और शरीर स्वस्थ रहे, उस - उस कर्म से प्रीतिपूर्वक उनकी सेवा करनी - वह श्राद्ध और तर्पण कहलाता है । " ( सत्यार्थप्रकाश ४ समुल्लास ) । * प्रकृति सिद्ध नित्यधर्म का अनुगमन करने वाले धार्मिक कहलाते हैं, एवं साधारण मनुष्य क कल्पना शक्ति से प्रवृत्त होने वाली सम्प्रदाय " सत " है । धर्म और मत में यही अन्तर है । सनातन धर्म्म धर्म्म है, आर्यसमाज समाज है, इसकी मूल प्रतिष्ठा मत है । [ ४२ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड प्रमाणोपनिषत् स्वामी जी ने " ये सोमे जगदीश्वरे पदार्थविद्यायां च सीदानी ते सोमसदः " इत्यादि रूप से सोमसद्, श्रग्निष्वात्ता, बषत्, सुकाली आदि पितरों की व्युत्पत्ति की है । प्रागे जाकर तत्तत्गुणक जीवित पितादि को तृप्त करने का आदेश दिया है ( द्रष्टव्य ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका, दयानन्द सरस्वती ) । पितृ तर्पण पञ्च - महायज्ञों के अन्तर्गत है, यह सर्वविदित एवं सर्वसम्मत है । यह पश्चयज्ञ न काम्य कर्म है, न नैमित्तिक, अपितु सन्ध्यादि की तरह नित्य कर्म है । ऐसी दशा में स्वामी जी के मतानुसार एक साधारण स्थिति के गृहस्थी को भी माता - पिता बाबा - पड़बाबा - अपनी स्त्री और सम्बन्धी, सम्बन्धी ही नहीं समान गोभी सबको नित्य प्रति भोजन कराना आवश्यक हो जाता है । क्यों कि नित्य विधियों के एक दिन के व्यवधान से भी प्रायश्चित का भागी होना पड़ता है । इनका तो प्रतिदिन करना परम आवश्यक है | यदि श्राद्ध का वस्तुतः यही स्वरूप है तो अर्थ शास्त्र की दृष्टि से श्राद्धकर्ता थोड़े ही समय में स्त्रयं श्राद्ध देवता बन सकता है । एक गृहस्थी के लिए उक्त विधान दैनिक रूप से कैसे सम्भव हो सकता है? यह स्वामी जी से ही पूछना चाहिए । इसी प्रकार ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में श्राद्ध तथा तर्पण का स्वरूप बताते हुए स्वामी महाशय कहते हैं— ....... " यत्तेषां श्रद्धया सेवनं क्रियते तच्छ्राद्धं वेदितव्यम् । तत्र विद्वत्सु विद्यमानेष्वेतत् कर्म्म संघटयते, नैव मृलकेषु । कुतः । तेषां प्राप्त्यभावेन सेवनाशक्यत्वात् । तदर्थ कृतकर्मणः प्राप्त्यभाव इति व्यर्थापत्तेश्च । ”. ( जो कि उनकी श्रद्धा से सेवा की जाती है उसी को श्राद्ध समझना चाहिए । इस परिस्थिति में विद्यमान विद्वानों में ही यह श्राद्धकर्म्म घटित होता है, मृतकों में नहीं । क्यों? उनकी प्राप्ति के प्रभाव के कारण उनकी सेवा नहीं बन सकती । साथ ही में उनके लिए किए हुए श्राद्धकर्म की उन्हें प्राप्त न होने से व्यर्थता भी है ) । स्वामी जी का अभिप्राय यही है कि मन्त्रों में-" मायन्तु नः पितरः सौम्यासः " " त्र पितरो मादयध्वम् " " उपहूता पितरः " ( सौम्य पितर प्रायें - इस स्थान में पितर रमरण करें - पितर बुला लिए गए हैं ) इत्यादि रूप से पितरों का आह्वान, ग्रासन - प्रदान आदि निर्दिष्ट है । बुलाना, ग्रासन देना, यह सब कर्म्म जीवित शरीरधारी पितरों के सम्बन्ध में ही बन सकते हैं । उन्हीं को ग्राहुति दी जा सकती है । पाठक विचार करें, इस कथन में कितना तथ्य है । निराकार परमेश्वर की उपासना ( आर्य्यसमाजियों के मतानुसार ) बन सकती है, वह निराकार हमारी सब कुछ सुन लेता है, उसके सम्बन्ध में हम सब कुछ कर सकते हैं किन्तु प्रारणात्मक मृत पितरों के लिए हम कुछ नहीं कर सकते । परलोक में जाने के बाद उनके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता । मानों, सूक्ष्म देवयोनिएँ कोई पदार्थ तत्त्व है ही नहीं । [ ४३ ]
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwwm प्रमाणोपनिषत् wwwwwwm मृतपितरश्राद्ध की अवैदिकता उद्घोषित करते हुए उक्त महानुभाव कहा करते हैं कि मूल वेद ( संहिता ) में एवं तद्व्याख्या रूप ब्राह्मण भाग में न तो कहीं श्राद्ध शब्द ही है, न कहीं श्राद्ध पद्धति ही उपलब्ध होती है । आपत्ति यथार्थ है । हाँ तो कृपानाथ! यह बतला दीजिए कि जब श्राद्ध शब्द ही वेद में नहीं है तो आपका अभिमत श्राद्ध कैसे वैदिक हुआ? मृत पितरों न सही, जीवित पितरों का श्राद्ध तो आप मानते हैं । बतलाइए, आपके श्राद्ध शब्द का आधार संहिता का कौनसा मन्त्र है? यज्ञोपवीत शब्द संहिता में नहीं है, न यज्ञोपवीत संस्कार की पद्धति ही है । छोड़ दीजिए, आप तो वेदभक्त बनने का दम भरते हुए अन्त्यज अन्त्यावसाइयों तक को इस पवित्र संस्कार से संस्कृत करते हैं । साथ ही में मृत पितर-श्राद्ध के उपोद्बलक वचन एवं ब्राह्मण भाग में पिण्डपितृयज्ञ नाम से पद्धति भी उपलब्ध होती है, आप इससे भी वश्चित हैं । तस्कर शब्द वेद में है, चोटी करना श्रावश्यक है । कितना श्रम? कैसा अज्ञान? कितना अभिनिवेश!!! प्रमाणोपनिषत् का उपसंहार करते हुए हम उन प्रार्य विद्वानों से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि वे प्रमाणोपनिषत् प्रकरणोपसंहार-कृपया स्थिर बुद्धि से इस सम्बन्ध में विचार करें । " मतावेश ही सत्यमार्ग का महा प्रतिबन्धक है " यह उन्हें अपने लक्ष्य में रखना. चाहिए । भूल देखना भूल नहीं है, परन्तु भूल देखने में भूल न हो, यह भी नहीं भूलना चाहिए । " प्रमाणोपनिषत् समाप्त हुई, अब क्रम प्राप्त " पितृणां पितर विज्ञानोप-निषत् " नाम का द्वितीय प्रकरण आपके सामने आता है । इति — पितरस्वरूपविज्ञानोपनिषदि प्रमाणोपनिषत् समाप्ताः [ ४४ ]
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अथ पितर स्वरूप विज्ञानोपनिषदि पितृणां पितर विज्ञानोपनिषद् द्वितीया [ २ ]
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितृ णामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥
इस दूसरी पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषद् में पितर तत्त्व का स्वरूप बतलाना है । यह तत्त्व सम्पूर्णं पितृस्वरूप थिज्ञानोपनिषत् में अमृतात्म ब्रह्म का सिंहावलोकन प्रजा का उत्पादक होने से ही " पितर " कहलाता है । यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि प्रजोत्पादक यह पितृतत्त्व मौलिक है अथवा यौगिक है? दूसरे शब्दों में सबका आदि प्रवर्तक यही है अथवा इसकाभी प्रवर्तक कोई दूसरा तत्त्व है? इस प्रकरण में इसी प्रश्न का समाधान करना 1 हमें पितरों के पितरों का स्वरूप बतलाना है । इसके लिए पूर्व की अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् को लक्ष्य में रखना चाहिए । पितर यौगिकतत्त्व है, यज्ञ है । यौगिक तत्त्व की मूल प्रतिष्ठा मौलिक तत्त्व है । यही ब्रह्म है । यही अमृतात्मा है । यही षोडशीपुरुष है । फलतः यौगिक पितर - तत्त्व के सम्यक् परिज्ञान के लिए उस मौलिक अमृतात्म ब्रह्म का सिंहावलोकन आवश्यक हो जाता है । [ ४५ ]