Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 51–60

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 51–60

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषद् " ब्रह्म वेदं सर्वम ” इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार ऋषि, पितर, असुर, देवता, गन्धर्व, सू, चन्द्रमा पृथिवी, आकाश, वायु, तेज, जल, औषधि, वनस्पति, नद, नदी, सर, समुद्र, ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, श्रष्टविधदेवयोनिएँ, मनुष्य, पशु, पक्षि, कृमि, कीट भेद भिन्न तिर्यक् योनिएँ, रस- उपरस, धातु- उपधातु, विष- उपविष, इत्यादि इत्यादि सम्पूर्ण विश्व - प्रपञ्च उस एक ही ब्रह्म की विभूति है । " एकं वा इदं विबभूव सर्वम् " के अनुसार वह एक ही ब्रह्म - तत्त्व नाना भाव में परिणत हो रहा है । ऐसी अवस्था में “ यौगिक पितर तत्त्व का उपादान कौन है? " इस उपर्युक्त प्रश्न का " ब्रह्म तत्व ही पितर प्राण का जनक है " यह सामान्य उत्तर हो सकता है । यदि विशेष दृष्टि से विचार किया जाता तो निम्नलिखित विशेष उत्तर हमारे सामने आता है । पितर स्वरूप - परिचय से पहिले इनके प्रभव - तत्त्व का स्वरूप जानना आवश्यक है । पितर- प्राण कहाँ से, किससे, किस समय क्यों उत्पन्न हुए? इन चारों प्रश्नों का समाधान ही प्रकृत में अपेक्षित है । जो ब्रह्म-तत्त्व सबका प्रभव है, उसके श्रनिरुक्त, निरुक्त भेद से दो विवर्त्त हैं । सर्वगुणसम्पन्न प्रतएव सर्वधर्मोपपन्न ब्रह्मनिरुक्त निर्वचनीय ( ) है । सर्वगुणशून्य अतएव सर्वधर्मशून्य, निर्गुण, निष्फल, निरञ्जन ब्रह्म अनि-रुक्त ( अनिर्वचनीय ) है । निरुपाधिक अनिर्वचनीय शुद्ध ब्रह्म रसमान है, यह वाङमय से प्रतीत है ग्रतएव सर्वथा वाक्प्रपञ्च स्वरूप शास्त्र से अनधिकृत है, उसको न जानना ही उसका जानना है, " नेति-नेति " ही उस अलक्षरण का लक्षण है । जब कि वहाँ शब्द - शास्त्र की गति ही नहीं तो फिर उसके स्वरूप परिचय के सम्बन्ध में " नेति नेति " के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है । यह प्रशास्त्रीय ब्रह्म कार्यकारण मर्यादा से सर्वथा अतीत है । फलतः श्रनिरुक्त ब्रह्म का पितृकारणता के साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है । ऐसी अवस्था में इसकी चर्चा को यहीं समाप्त कर निरुक्त ब्रह्म की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । निरुक्त ब्रह्म विश्व - विश्वचर - विश्वातीत — इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो कर ही सर्वप्रभव बनता है । सर्वबल विशिष्ट अनिरुक्त, व्यापक ब्रह्मतत्त्व का जो भाग मायावच्छेद से सीमित बनता हुआ अक्षरात्मक हृदयबल ( कामना ) की प्रेरणा से क्षर द्वारा विकार भावों का जनक बनता हुआ विकारावच्छेदेन सृष्टिस्वरूप में परिणत हो जाता है । ब्रह्म का विकार क्षर प्रधान, प्रतएव वैकारिक वह सृष्ट भाग ही " विश्व " कहलाता है । यहाँ आत्मा प्रविष्ट रहता है अतएव " विशति यत्रात्मा " इस निर्वचन के अनुसार ब्रह्म के इस सृष्टरूप को " विश्व " कहा जाता है । " ता सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् " अपने क्षर - भाग से विकार द्वारा उत्पन्न अपने इस सृष्टरूप में स्रष्टा प्रक्षर प्रविष्ट हो जाता है । अक्षरा-वच्छेदेन सृष्ट में प्रविष्ट वही ब्रह्म " विश्वचर " है । विशुद्ध व्यय की अपेक्षा से कार्यकारणातीत वही ब्रह्म " विश्वातीत " है इस प्रकार अमृतात्मा की एक - अव्यय, दो अक्षर तीन - क्षर, यह तीन प्रधान कलाएँ ही १ २ ३ क्रमशः विश्वातीत, विश्वचर, विश्व इन तीन स्वरूपों में परिगत हो रही हैं । अमृतात्व विज्ञानोपनिषत्वेत्ता विद्वानों को यह स्मरण होगा कि उस प्रकरण में हमने गायी सर्वबल विशिष्टरसरूप परात्पर को विश्वातीत, षोडशीपुरुष नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा को विश्वचर एवं सावरणसाज्ञ्जन विकार कूट को विश्व [ ४६ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषद्. कहा था परन्तु इस प्रकरण में कुछ और ही कहा जाता है । इसमें परस्पर विरोध का कोई अवसर नहीं है । मायामय महाविश्व की अपेक्षा से तो परात्पर अमृतात्मा विकार संघ ही क्रमशः विश्वातीत विश्वचर-विश्व हैं परन्तु वैकारिक विश्व की अपेक्षा से क्षर प्रधान कार्यरूप वैकारिक भाव ही विश्व है । उपर्युक्त निरुक्त ब्रह्म के स्वरूप परिचय से पाठकों को विदित हुआ होगा कि अव्यय क्षरसम्पत्ति से ग्रनुगृहीत वेद - ति अक्षर ब्रह्म ही सृष्टिकर्त्ता है । यही सृष्टि का आदि प्रारम्भक है । बिना अव्यय एवं क्षर के सहयोग के अक्षरब्रह्म सृष्टि निर्माण में असमर्थ है अतएव आगे चल कर समष्टिरूप षोडशीप्रजापति को ही सृष्टिकर्त्ता मान लिया जाता है । क्षर का क्षरत्व, अक्षर का अक्षरत्व, अव्यय की प्राण एवं वाक् कला पर निर्भर है । अव्यय के प्राण - भाग से अक्षर में कर्तृत्व शक्ति का विकास होता है । अव्यय के वाक्-भाग से क्षर में उपादान भाव का उदय होता है, इसीलिए " प्रभवः प्रलय स्थानं निधानं बीजमव्ययम " के अनुसार अव्यय को सर्वेसर्वा मान लिया गया है । सृष्टि निर्माण कामना से वही अपने आपको अक्षर द्वारा त्रयीब्रह्म, सुब्रह्म भेद से दो भागों में विभक्त कर डालता है । जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । ब्रह्मापेक्षया अव्ययानुगृहित वही अक्षर त्रयीब्रह्म है । विष्णु की अपेक्षा से वही अक्षर सुब्रह्म है । ब्रह्म सत्याग्नि है । यही पुरुष है । सुब्रह्म ऋतसोन है । यही स्त्री है । दोनों के याज्ञिक समन्वय से सारी सृष्टिएँ होती हैं । इसी विश्वेश्वर विश्वविशिष्ट पोडशी प्रजापति का स्वरूप बतलाती हुई मन्त्रश्रुति कहती है--यस्मादन्यो न परोऽस्ति जातो य आबभूव भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषिसचते सषोडशी || ( यजुर्वेद ) उक्त मन्त्र के तीन पाद तो क्रमशः विश्वातीत अव्यय, विश्वचर अक्षर, विश्वरूपक्षर का निरूपण करते हैं एवं चतुर्थ पाद समष्टिरूप प्रजापति का निरूपण करता है । " पर " अव्यय का प्रातिस्विक नाम १ है । " जिससे अन्य कोई दूसरा पर ( अव्यय ) अाज त प्रकट नहीं हुआ । " यह वाक्य विश्वातीत व्य २ का समर्थक है । ' जो भुवनों में प्रविष्ट हो गया, सर्वत्र व्याप्त हो गया " यह वाक्य विश्वचर अक्षर का ३ उपोद्बलक है । " वह प्रजापति अपनी ( विश्वरूप ) प्रजा से संयुक्त हो रहा है " यह वाक्य विश्वमूतिक्षर का ग्राहक है एवं " तीन ज्योतियों से ( श्रव्यय - अक्षर - क्षर से ) वह षोडशी सर्वत्र व्याप्त हो रहा है " यह वाक्य समष्टि रूप से षोडशी प्रजापति का अभिभावक बन रहा है । स्वयं परात्पर " ज्योतिषां ज्योतिः " है । वह अनिर्वचनीय है, अतएव उसका दिग्दर्शन स्वतन्त्र रूप से न करा कर " सचते स षोडशी " इस प्रकार समष्टि रूप से ही करा दिया है । " श्रात्म - प्राण पशूनामेकत्रसमवेतत्वं प्रजापतित्वम् " प्रजापति का यही लक्षण है । दूसरे शब्दों में आत्मप्रारणपशुत्व ही प्रजापति शब्द का अवच्छेदक है । श्रात्मा उक्थ है, प्रारण अर्क है, पशु शिति ( अन्न ) [ ४७ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषद् हैं । अथवा प्रकारान्तर से प्रजापति का निर्वचन कीजिए । “ अमृत सत्य यज्ञसंस्थात्वं प्रजापतित्वम् ” के अनुसार अमृत -सत्य - यज्ञ तीन संस्थाओं की समष्टि प्रजापति है । समष्टि आत्मा है, व्यष्टि अमृतसत्ययज्ञ है । बहिरंग प्रकृति से संस्पृष्ट किन्तु अन्तरंग प्रकृतियुक्त शुद्ध षोडशीपुरुष अमृत है । दूसरे शब्दों में क्षराक्षर गर्भित परात्पर प्रतिष्ठ उक्थरूप अव्ययपुरुष अमृत । प्रारण - श्राप वाक् श्रन्न - अन्नाद नाम से प्रसिद्ध पञ्चप्राण, ३३ देवता अर्क हैं । इन पाँचों अर्को से युक्त वही अमृतत्तत्त्व सत्य नाम से व्यवहृत होने लगता है । यह अर्कप्राण पञ्च प्रकृति एवं स्तौम्य देवता रूप विकृति भेद से दो भागों में विभक्त हैं । प्राण - प्राप - वागादि पञ्चत्रकृतिसमष्टि " ब्रह्मसत्य " है । स्तौम्य त्रिलोकी में प्रतिष्ठित अग्नि वायु - इन्द्र कृत आत्मा वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूर्ति त्रैलोक्याधिष्ठाता तत्त्व " देवसत्य " है । देवत्रयी रूप देवसत्य पञ्चब्रह्मरूप ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है । पञ्चप्रकृतिरूप ब्रह्मसत्यविशिष्ट देवसत्य उपनिषदों में जहाँ " अपरब्रह्म " नाम से व्यवहृत हुआ है, वहाँ ब्रह्मदेवसत्य गर्भित अमृतात्मा " परब्रह्म " नाम से प्रसिद्ध है । यही परब्रह्म " ओङ्कार ” है, जिसका कि दिग्दर्शन पूर्व की प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् में कराया जा चुका है । अस्मदादि पशुओं से युक्त हो कर वही तत्त्व " यज्ञ " कहलाने लगता है । ( अर्द्ध मात्र ) - १ - षोडशी पुरुषः ( अकारः ) - १ - पञ्चप्रकृतिविशिष्ट--षोडशीपुरुषः ( उकारः ) - २ - १० प्र ० वि ० वि ० दे ० वि ० पुरुषः ( मकार: ) -- ३ - पशु विशिष्ट: - अमृत-ब्रह्म - देव - सत्यः आत्मा - अमृतम् -- प्राणाः - ब्रह्मसत्यः - प्राणाः - देव सत्य: - पशवः - यज्ञः -] अवरब्रह्म परब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म-परावर ——अपर परंचापरञ्चब्रह्मयज्ञ सत्यकाम एतद्वै ओङ्कारः १ – पुरुषात्मा-- आत्मा — उक्थम्} -क्षराक्षरगर्भितऽव्ययपुरुषः ( १ - ब्रह्म सत्यात्मा - प्राणाः - अर्क: २-२ -श्रव्ययक्षरगर्भितोंऽक्षरपुरुषः . २ - देवसत्यात्मा - प्राणाः- ~ —अर्कः ३. - यज्ञात्मा - प्रशवः प्रशितिः -प्रव्ययाक्षरगर्भितः क्षरपुरुषः [ ४८ ]

पृष्ठ 54

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श्राद्ध विज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् अक्षरप्रधान कारणरूप प्रकृतिभाव ही विश्वचर हैं, एवं श्रव्ययप्रधान कार्यकारणातीत पुरुषभाव ही विश्वातीत हैं । परात्परं की विश्वातीतता विश्वसीमा से सम्बन्ध रखती है, मायी अव्यय पुरुष को विश्वातीतता असंगभाव से सम्बन्ध रखती है । दूसरे शब्दों में विश्व में प्रविष्ट रहता हुआ भी अव्यय पाप्माची से सर्वथा निर्लिप्त रहता है- " न करोति न लिप्यते ", अतः इसे विश्वातीत कहा जाता है । केवल माया-बले ही विश्वातीत परात्पर एवं विश्वप्रविष्टें अव्यय का व्यवच्छेदक हैं । अन्यथा दोनों एक वस्तु हैं । अमृतात्मा का विश्वचरत्व सर्वव्याप्ति भाव से सम्बन्ध रखता है, केवल अक्षर का विश्वरत्व कारणता से सम्बन्ध रखता । अक्षर ही विश्व का प्रतिमा है । वैज्ञानिकों ने आत्मा का वैस्य यदुक्थं सत् ब्रह्म सत् साम स्यात् स तस्यात्मा " यह लक्षण किया है । मिट्टी घट का उक्थ ( प्रभव ) हैं । मिट्टी से उत्पन्न घट मिट्टी पर ही प्रतिष्ठित रहता है, अतः मिट्टी ही घंटे का ब्रह्म ( आलम्बन ) है; एवं अन्ततोगत्वा घट मिट्टी में ही विलीन हो जाता है अतः मिट्टी ही घट का साम ( अवसान - भूमि - परायण ) हैं भेत एवं उक्थ ब्रह्मसामलक्षरण मिट्टी ही घट का आत्मा है । इसी प्रकार ' तयाऽऽक्षरा द्विविधाः सौम्यभावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ' " प्रव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रतीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके " " मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तिना " " सूयते स चराचरम् " " श्रव्यक्तादीनिभूतानि व्यक्त मध्यानि भारत । श्रव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना " " प्रकृतिः कर्त्रीः पुरुषस्तुपुष्करपलाशव निर्लेपः " इत्यादि श्रौत - स्मार्त्त प्रमाणों के अनुसार प्रकृति नाम से प्रसिद्ध अव्यक्त ही अपने मर्त्य भाग से विश्व का उक्थ— ब्रह्म साम बनता हुआ विश्वात्मा किंवा विश्वचर है । तीसरे विश्व विवर्त्त में दोनों पक्ष समान हैं । प्रकारान्तर से सृष्टि के विवर्त - भाव की समतुलित विचित्रता देखिए । निष्फल अव्ययात्मा ही प्रधान आत्मा है । यही सृष्टि विवर्त्तसमतुलन वेद रूप में परिणत हो कर पितर प्रारण का उपादानं बनता है । इस उपादानता के लिए आत्मा को अनेक रूप धारण करने पड़ते हैं । आत्मा के वे विविध रूप कौन से हैं जिनके आधार पर प्रसङ्ग आत्मा को ससङ्ग पितरों का उपादान बनना पड़ता है? यह विचारणीय है । सबसे पहिला आत्मरूप " श्वावेसीयसमन " है । यही बल तारतम्य से आरम्भ में श्रानन्द - विज्ञान-प्राण - वाक् इन चार चितियों से युक्त होता है, जैसा कि आत्मविज्ञानोपनिषत् की अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इन पाँच कलाओं में से ग्रानन्द - विज्ञान का एक विभाग है, यही विद्यात्मा है । प्राणवाक् का एक स्वतन्त्र भाग है, यही कर्मात्मा है । मध्यस्थ मन कामात्मा बनता हुआ दोनों का भागीदार है । इस पक्ष में मन प्रधान आलम्बन है, इसके एक ओर आनन्द - विज्ञान चित है एक और प्राणवाक् चित है । अथवा आनन्द को सर्वान्तरतम मानिए | आनन्द मूल कला है । इस पर पहिले क्रमशः विज्ञान मन का चयन है, मन पर क्रमशः प्राणवाक् का चयन है । तैत्तिरीय उपनिषत् कोशब्रह्म का निरूपण करते हुए इसी क्रम को प्रधान माना है । पश्च कल इस अव्ययात्मा से बल सम्बन्ध से पञ्चकल अक्षर का उदय होता है । आनन्द ब्रह्म की प्रतिष्ठा हैं, विज्ञान विष्णु की, मन इन्द्र की प्राण की, वाक् सोम की प्रतिष्ठा है । मध्यस्थ इन्द्र के एक ओर ब्रह्मा विष्णु की एक और अग्नि- सोम की चिति होती है । अथवा ब्रह्मा पर विष्णु इन्द्र की क्रमशः चिति होती है, इन पर अग्नि - सोम की क्रमशः चिति होती है । जैसा एवं जो कला संस्थान क्रम अव्यय का है वैसा ही एव वही क्रम अक्षर का है । अव्ययावच्छिन्न अक्षर से पञ्चकल क्षर का विकास होता है । [ ४ ९ ]

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अक्षरात्मां श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् आनन्दगभितब्रह्मा प्राण की विकास - भूमि है, विज्ञानगर्भित विष्णु प्रापः की, मनोमयइन्द्र वाक् की, प्राणमयप्रति अन्नाद की, वाङ्मयसोम अन्न की विकास भूमि है । यहाँ भी एक दृष्टि से मध्य में वाक् हैं, इस पर एक ओर से प्रारण आप चित है, एक ओर से अन्नाद - अन्न चित है । अथवा प्रारण मूल भित्ति है, इस पर आपः वाक् क्रमशः चित हैं, इन पर अन्नाद अन्न क्रमशः चित हैं । अव्यय, मन, अक्षरेन्द्र, क्षर वा तीनों अभिन्न हैं । अव्ययानन्द, अक्षर ब्रह्म, क्षर प्रारण तीनों अभिन्न हैं । अव्यय विज्ञान, अक्षर विष्णु, क्षर आप तीनों अभिन्न हैं । अव्यय प्रारण, अक्षरअग्नि, क्षर अन्नाद तीनों अभिन्न हैं । अव्यय वाक् अक्षरसोम, क्षरग्रन्न तीनों अभिन्न हैं । फलतः अव्यय - अक्षर - क्षर तीनों एक ही आत्मा के तीन विवर्त्त हैं । अव्ययात्मा उस एक आत्मा का आलम्बन रूप पर ब्रह्म रूप है । अक्षरात्मा निमित्त कारण भूत परमब्रह्म है, क्षरात्मा उपादान कारण भूत महद्ब्रह्म है । निम्नलिखित श्रौत वचन उक्तार्थ का ही स्पष्टीकरण - करते हैं-: अव्ययात्मा " अन्ना प्रजाः प्रजायन्ते, अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । ” २ - प्राणो हि भूतानामायुः तस्मात् सर्वायुषमुच्यते । ". वाक् + प्राणः ३ - " प्राणमयात् श्रन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । " ४ - " मनोमयात् अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । " ५ - विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमय: । ". → मनः + विज्ञानम् - + प्रानन्दः - ** -१ - " आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । " ब्रह्मा ( आनन्दमय:) २— “ विश्वा भुवनानि वेद ” ( ऋ ० सं ० ३।४४ १० ) विष्णुः ( विज्ञानमयः ) ३ – “ यन्मनः स इन्द्रः " ( गो ०३०४ | ११ ) -४ – " प्राणी वा अग्निः " ( ० ६/४/१/६८ ). ५ – " वागितिचन्द्रमाः " ( जै ० उ ० ३ | १३ | १२ ) + इन्द्र: ( मनोमयः ) --अग्निः ( प्राणमयः ) —— + सोमः ( वाङ्मयः ) --[ ५० ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड क्षरात्मा wwww ( १ - " प्रारण उ वै ब्रह्म " ( शत ० ८ | ४ | १२/३ ) -२ – “ आपो वा यज्ञ: ” ( विष्णुः ) ( शत ० ३ | १ | ४ / १५ ) ३– “ अथ य इन्द्रस्सा वाक् " ( जै ० उ ० १।३३।२ ) ४ - " अन्नादोऽग्निः " ( शत ० २ | १ | ४ | २८ ) पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् + प्राणः ( श्रानन्द ब्रह्ममयः ) आप: ( विज्ञान विष्णुमयः ) - वाक् ( मन इन्द्रमयः ) + अन्नादः ( प्राणाग्निमयः ) ५ – “ अन्नं वै चन्द्रमाः ' ( तै ० ३।२।३।४ ) -+ अन्नम् ( वाक् सोममयः ) मनः – सर्वालम्बनम् १ आनन्दः - सर्वालम्बनम् तत्र आनन्दविज्ञानेचिते तत्र प्राणवाचोचितौ इन्द्रः - सर्वालम्बनम् २ तत्र ब्रह्माविचितौ तत्र अग्नीषोमो चितौ तत्र विज्ञानमनसी अनुस्यूते तत्र प्राण - वाचौ अनुस्यूतौ ब्रह्मा - सर्वालम्बनम् तत्र इन्द्र विष्णू अनुत तत्र अग्नीषोमी अनुस्यूती वाक् — सर्वालम्बनम् तत्र ३ प्राणः — सर्वालम्बनम् अब प्राणौ चितौ तत्र अन्नान्नादी चितौ [ ५१ ] तत्र अब्वाची - अनुस्यूतौ तत्र अन्नान्नादौ- अनुस्यूतौ

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् यदिदमव्ययमन: -यश्चायमिन्द्राक्षरः-* याचेयंवाक् क्षरमयीः एकं तत् योऽयमव्ययानन्दः —-- -- → योऽयमक्षरब्रह्मा-→ योऽयमक्षरप्राणः एकं तत् यदिदमव्ययविज्ञानम् - योऽयमक्षर विष्णु: --याश्चेमाक्षरापः → एकं तत् योऽयमव्ययप्राणः योऽयमक्षराग्निः -- → योऽयंक्षरान्नादः एकं तत् योऽयमव्ययवाक्-→ योऽयमक्षरसोमः -→ यदिदंक्षरान्नम् एक तत् अव्ययात्मापरब्रह्म अक्षरात्मापरमब्रह्म क्षरात्मामद्ब्रह्म पाठकों को उक्त श्रात्मविवत्त से यह विदित हुआ होगा कि मन - इन्द्र - वाक् तीनों समान धारा से सम्बन्ध रखते हैं । मन अव्यय है, इन्द्र अक्षर है, वाक् क्षर है । यही वाक् वेद - त्रयी की मूल प्रतिष्ठा है । इसी आधार पर " वाग्विवृताश्ववेदाः " यह कहा जाता है । षोडशीपुरुष वेद रूप में परिणत होकर ही पितर - प्राण का प्रारम्भक बनता है जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । पितर- प्राण का मूल कौन है? इस प्रश्न का ' वेदावच्छिन्न वेदमूत्ति षोडशीपुरुष पितर प्रारण का प्रारम्भक है ' यही समाधान है ॥ विश्वात्मा प्रजापति त्रयीब्रह्म एवं सुब्रह्म के समन्वय से ही विश्वनिर्माण में समर्थ होता है, यह कहा जा चुका है । ऋक् साम - यजुः तत्त्वों की समष्टि " त्रयीब्रह्म " है । लेखात्मिका पुरविभूति - मैथुनी सृष्टि धारा में उत्पन्न होने वालों में सर्वप्रथम यही ब्रह्म प्रकट होता है, अतएव इसे " प्रथमज ब्रह्म " कहा जाता है । ( शत ० ६ । १ । १।७ इस प्रथमज ब्रह्म का ऋक्साम भाग अनावश्क है, यजुः भाग आवरक है, घामच्छद है, जगह रोकने वाला है । ऋक्साम इस धामच्छद यजुः को सीमित कर देते हैं । सीमा - भाव सम्पादन करने वाला तत्त्व ही " छादनात् " व्युत्पत्ति से छन्द कहलाता है । ऋग्वेद उक्थ छन्द है, सामवेद पृष्ठ छन्द है । तात्पर्य यह है किं वस्तुतत्त्व यजु: है । इसका केन्द्र भाग उक्थ है, इसकी सीमा ऋग्वेद से सम्बन्ध रखती है अतएव ऋक् छन्द को उक्थ छन्द कहा जाता है । वस्तु का ऊपरी भाग पृष्ठ है, इसकी सीमा साम से निष्पन्न होती है अतएव सामछन्द को पृष्ठछन्द कहा जाता है । अव्ययक्षरगर्भित अक्षरमूर्ति यजुर्ब्रह्म यद्यपि स्वस्वरूप से असीम है, तथापि उक्थ - पृष्ठात्मक ऋक्साम छन्द से छन्दित होता हुआ यह ससीम बन जाता है । सीमा-भाव एक प्रकार की लेखा ( रेखा - कार ) है । लेखा किंवा रेखा ही एक प्रकार का " र " है । लेखात्मक किंवा छन्दोमय इस पुर से परिगृहीत वह यजुर्ब्रह्म " पुरिशेते " इस निर्वचन से " पुरुष " नाम से व्यवहृत होने लगता है । ऋक् “ महदुक्थ " है, साम " महाव्रत " है, यजुः " अग्नि " है, यही पुरुष है । यजुर्ब्रह्म के लेखात्मक इसी पुररूप परिच्छेद का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है— [ ५२ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwww " परिवाजपतिः कविः परित्वाग्ने पुरं वयं त्वमग्ने द्युभिः " ( यजु ० सं ० ) " अग्निमेवास्माऽएतदुपस्तुत्य वर्म्म करोति परिवीतिभिः । परीव हि पुरः । आग्नेयीभिः । अग्निपुरामेवास्माऽएतत् करोति । तस्मादु हैतत् पुरां परमं रूपं यत् त्रिपुरम् । स वै वर्षीयसा वर्षीयसा छन्दसा परां परां लेखां वरीयसीं करोति । तस्मात् पुरां परा - परा वरीयसा लेखा भवन्ति । लेखा - हि पुरः । " ( शत ० ६।३।१।२५ ) यजु तत्त्व “ वय ” है, ऋक् साम इस यजु को चारों ओर से बद्ध रखने वाला " वयोनाथ " है, वय, वयोनाध की समष्टि है । " वयुन " - " सर्वमिदं वयुनम् " यह व्यापक सिद्धान्त है । इनमें भी - " ऋक्सामे-यजुरपीतः " ( शतपथ कां ० १० ) के अनुसार यजु पुरुष ही मुख्य है । इसी विज्ञान के आधार पर " पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् " ( यजुः सं ० ३१।१।२ ) यह कहा गया है । उपर्युक्त त्रयीब्रह्म में से ऋक्साम को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए, केवल यजुः पुरुष पर दृष्टि डालिए । यत्- जू, इन दो विरुद्ध तत्त्वों का समुचित रूप ही " यज्जू " है । त्रयीब्रह्म का वैभव - गति तत्त्व ' यत् ' है, यही प्रारण किंवा वायु है । स्थिति तत्त्व " जू " है, यही वाक् किंवा आकाश है । श्राकाशात्मिका यही वाक् स्वायंभुवी - सत्या -अनादिनिधना - पौरुषेया वेदमयी वाक् है । इसी से आगे की सम्पूर्ण सृष्टिएँ होती हैं जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । प्राण वायु रूप ' यत्'- - कं ब्रह्म है, वाङ्मय प्रकाशात्मक " जू " खं ब्रह्म है । दोनों नित्य अविनाभूत हैं, दूसरे शब्दों में तादात्म्यापन्न हैं । दोनों के इसी तादात्म्य - भाव को लक्ष्य में रख कर सामश्रुति कहती है- हैं— " प्राणो ब्रह्म । कं ब्रह्म - खं ब्रह्म ेति । यद्वाव कं तदेव खम् । यदेव खं तदेव कम् । प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः । " ( छा ० उ ० ४।१० ) प्राणात्मक वायु सत्याग्नि तत्त्व है, प्रकाशरूपवाक् सोमतत्त्व है । दोनों की समष्टि अर्द्धनारीश्वर शिव है । यही अग्नीषोमब्रह्म है । इन दोनों में से ब्रह्माग्नि रूप प्राण तत्त्व ही " ऋषि " है । इस ऋषि-प्राण के सम्बन्ध में— “ प्राणाः वा ऋषयः । ते यदस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा प्ररिषंस्तस्मात्ऋषयः ” ( शत ० ६ । १ । १ । १ ) यह वचन प्रसिद्ध है । ब्रह्मविद्यामयी सोमात्मिका विश्वव्यापिनी वाक् इस ऋषि - प्राण के साथ मन्त्रणा करती है, संयुक्त होती है, अतएव इस वाक् को " मन्त्र " कहा जाता है । इस मन्त्रात्मिका वाक् के साथ सर्वप्रथम प्राणरूप इसी ऋषि का सम्बन्ध होता है । इसी विज्ञान के आधार पर " ऋषयो-मन्त्रद्रष्टारः " यह कहा जाता है । ऋषि मन्त्रद्रष्टा हैं इसका यही अभिप्राय है कि असत् प्रारण वाक् - तत्त्व के प्रथम सम्बन्धी हैं | सम्पूर्ण विश्व प्रारणमयी, ऋषिंमयी मन्त्रवाक् में ही अन्तर्भूत है - " वाचीमा विश्वा [ ५३ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् भुवनान्यर्पिता । " कहीं - कहीं " ऋषिर्वेदमन्त्रः " इत्यादि रूप से ऋषि एवं मन्त्र को एक ही तत्त्व याना गया है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । दोनों का अविनाभाव ( तादात्म्य ) ही इस एकत्व प्रति-पादन का मूल है । ऋषि एवं मन्त्र रूप ' यज्जू ' ही देवताओं की परोक्ष भाषा में ' यजु " नाम से प्रसिद्ध है । ज़ू रूप आकाश धरातल में प्रतिष्ठित यत् रूप ऋषि नामक असत् प्रारण ही मौलिक तत्त्व है । इसी से यौगिक पितर - असुरादि तत्त्व उत्पन्न होते हैं । यत् रूप प्राणवायु कुर्वत् रूप है, क्रियाशील है, नित्य क्षुब्ध है । इसके व्यापार से आकाशात्मिका वाक् का एक प्रदेश अब रूप में परिणत होता है । वाक् तत्त्व ह आंशिक रूप से द्रुत हो कर पानी बन जाता है । स्वयं वाक् तत्त्व सत्य होने से व्याप्ति भाव से रहित था, परन्तु पानी की अवस्था में आ कर ऋतरूप में परिणत होता हुआ यही व्याप्तिभाव से युक्त हो जाता है, सबका संवरण कर लेता है, अतएव " प्राप्नोत् - प्रवृणोत् " इत्यादि निर्वचनों के अनुसार इसे प्राप - वाः इत्यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है । प्राप्ति लक्षण यह पानी उस सत्य वाक् की ही अवस्था विशेष है । इसी आधार पर - " सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव सासृज्यत " ( श ० ६ | १ | १ ) । यह कहा जाता है । यही तत्व सुब्रह्म है, यही चौथा प्रथर्ववेद है । गोपथ श्रुति ने इसे ही " स्वेद " " सुवेद ” " सुब्रह्म " इत्यादि नामों से व्यवहृत किया है ( द्रष्टव्य गो. बा. पू. १1१1१ ) । जिस प्रकार यजुब्रह्म में यत् - जू ( गति - स्थिति ) ये दो तत्त्व हैं एवमेव यह सुब्रह्म भी स्नेह - तेज भेद से दो भागों में विभक्त है । स्नेह तत्त्व भृगु है तेज तत्त्व अङ्गिरा है । स्नेह लक्षण भृगुतत्त्व सोम है, तेजो लक्षण अङ्गिरातत्त्व श्रग्नि है । यजुर्ब्रह्म भी अग्निसोममय था, यह सुब्रह्म भी अग्निसोममय है । अन्तर दोनों में केवल यही है कि यजुरूप अग्नि - सोम गति- स्थिति लक्षण है, एवं सुब्रह्मात्मक अग्नि- सोम तेज - स्नेह लक्षण है । स्थिति - गति रूप अग्नि- सोममय यजुर्ब्रह्म से स्नेह - तेज रूप अग्निसोममय सुब्रह्म उत्पन्न होता है । स्नेह लक्षण सोम का स्थिति लक्षण जू भाग से सम्बन्ध है, तेजो लक्षण अग्नि का गति लक्षण यत् भाव से सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि वाक् से उत्पन्न होने वाले अप् तत्त्व में वागविनाभूत प्राण भी अनुस्यूत रहता है । प्राणाग्नि में वाक् - सोम है, वाक् - सोम में प्राणाग्नि है । प्राणाग्निगर्भित वाक्तत्त्व सोम है । वाक् – सोम गर्भित प्राण अग्नि है । इसी द्वौ विध्य से अप् - तत्त्व की दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । प्राणाग्नि गर्भित स्थितिलक्षण वाक् सोम से स्नेहलक्षण भृगु - सोम का विकास होता है, एवं वाक् - सोम गर्भित गति लक्षण प्राणाग्नि से तेजो लक्षण अङ्गिरोऽग्नि की उत्पत्ति होती है । पाठकों को यह स्मरण रखना चाहिए कि सृष्टि संसृष्टि लक्षण है । दो अथवा अनेक तत्त्वों का रासायनिक मिश्रण ( जो कि मिश्रण याज्ञिक परिभाषा के अनुसार चिति सम्बन्ध - अन्तय्यमसम्बन्ध - ग्रन्थिसम्बन्धयाग इत्यादि नामों से व्यवहृत हुआ है ) ही संसृष्टि है । जुह्म -तत्त्व सर्वथा प्रसंग है । इससे संसृष्टि प्राणात्मक है, प्रारण प्रधान है । प्राण - त मूला मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती । मैथुनी सृष्टि का मूल उपक्रम आपोमय सुब्रह्म ही है । प्रजा - सृष्टि का मूल प्रभव स्नेहतेजो लक्षण यही सुब्रह्म है । यद्यपि त्रयीब्रह्मात्मक यजुर्ब्रह्म में भी स्नेहलक्षण वाक् - तत्त्व प्रतिष्ठित है, एवं सुब्रह्म में भी तेजोलक्षण अङ्गिरा तत्त्व प्रतिष्ठित है । ऐसी दशा में यजु को भी वाक-पेक्षया संसृष्टि लक्षण माना जा सकता है, एवं सुब्रह्म को भी अङ्गिरा की अपेक्षा से असंग कहा जा सकता है, तथापि यजु में यत् - प्रारण की ही प्रधानता के कारण, एवं सुब्रह्म में स्नेहलक्षण भृगु की ही प्रधानता के कारण यजु को प्रसंग ही माना गया है । प्राण - वाक् दोनों के रहने पर भी असंग प्राण की [ ५४ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् w प्रधानता से यजुर्ब्रह्म प्राणमूर्ति माना गया है । स्नेह - तेज दोनों के रहने पर भी ससंग प्रापः की प्रधानता से सुब्रह्म को श्रापोमूर्ति ही माना गया है । एक विशेषता और । यजु में यद्यपि प्राण - वाक् भेद से अग्नि - सोम दोनों हैं, परन्तु प्रधानता प्राणाग्नि की है, अतः यत् - जू रूप ( अग्नि - सोम रूप ) यजु को केवल अग्नि ही मान लिया गया है । एवमेव सुब्रह्म में भी यद्यपि अङ्गिरा - भृगु भेद से अग्नि - सोम दोनों हैं, परन्तु प्रधानता अप्रू तत्त्व की है, अतः अङ्गिरा भृगु रूप ( अग्नि - सोमरूप ) सुब्रह्म को केवल सोमं रूप ही मान लिया गया है । यजुर्ब्रह्म ब्रह्माग्नि है, सत्याग्नि है, पुरुष है | सुब्रह्म सोम है, स्त्री है । इसी ग्राम सुब्रह्म रूप रेत की उस अग्निमय ब्रह्म में मातरिश्वा द्वारा आहुति होती है । इसी से प्रजोत्पत्ति होती है । कहना यही है कि यजुर्ब्रह्म को ( जो कि यजुर्ब्रह्म विज्ञान भाषा में स्वयंभू नाम से प्रसिद्ध है ) प्रजा - सृष्टि के उपादानभूत शुक्र - सम्पत्ति के लिए सर्वप्रथम इसी अप् तत्त्व को उत्पन्न करना पड़ता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान मनु कहते हैं— सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुविविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादा तासु बीजमवासृजत् ॥ ( मनुः ) स्वयम्भू ब्रह्म का शरीर त्रयीमय है । त्रयी के यजुभाग का प्रारणगर्भित भाग ही इसका स्वभाग है । यही पानी बना है, इसी आधार पर " स्वात् " कहा गया है । " तत् सृष्ट्वा ब्रह्म की स्वात् विभूति - तदेवानुप्राविशम् " इस सिद्धान्त के अनुसार त्रयीब्रह्म आपोमय सुब्रह्म को - उत्पन्न कर इसमें प्रविष्ट हो जाता है, इसी से प्राण्डसृष्टि का स्वरूप निष्पन्न होता है । प्रत्येकण्ड ( अण्डे ) में गर्भ में गर्मी रहती है, चारों ओर पानी रहता है । यही स्थिति यहाँ है । गर्भ में ब्रह्माग्निप्रधान त्रयीब्रह्म है । चारों ओर ग्रापोमय सुब्रह्म व्याप्त है । इसी आधार पर इस ब्रह्मपुर को ब्रह्माण्ड ( ब्रह्म का अण्डा ) कहा जाता है । जैसा कि - " स त्रय्याविद्यया सहापः प्राविशत् तत ग्राण्डसमवर्तत " ( शत ० ६ | १ | १ ) इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । सृष्टिमूलभूत शुक्रमूत्ति स्नेह तेज लक्षण भृग्वाङ्गिरोमय इसी अप् ब्रह्म का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं— आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वाङ्गिरोमयम् । अन्तरते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥ ( अथर्ववेद ) 1 संसृष्टि लक्षण सृष्टब्रह्म ( विश्व ) में इन दो के अतिरिक्त तीसरे तत्त्व का अभाव है । इसी अभि-प्राय से महर्षि कौषीतकि ने " द्वयं वा इदं सर्व स्नेहश्चैव तेजश्च । तदुभयमहोरात्राभ्यां व्याप्तम् " ( कौषी ० १७।६ ) यह कहा है | * इस विषय का विशद् विवेचन ईषोपनिषद् हिन्दी - विज्ञान - भाष्य, द्वितीय खण्ड के " अनेजदेकं मनसो जवीयः " इत्यादि मन्त्र व्याख्यान में देखना चाहिए । [ ५५ ]