Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 61–70

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 61–70

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं पितृपितरविज्ञानोपनिषत् भृङ्गिरा यही दोनों तत्त्व क्रमशः पितर देवता की प्रतिष्ठा हैं । भार्गव सौम्य प्रारण पितृ तत्त्व की प्रतिष्ठा है, आङ्गिरस आग्नेय तत्त्व देवतत्त्व की विकास भूमि पितर प्रारण प्रतिष्ठात्मक तत्त्व- है । यजु क्ना वाक् भाषा धान रूप से भार्गव प्राण का जनक है, प्रारण भाग प्रधान रूप से आङ्गिरस प्राण का प्रवर्त्तक है । दूसरे शब्दों में अङ्गिरागभित भृगु - सोम पितरप्राण का प्रभव है, एवं भृगु गर्भित अङ्गिरोऽग्नि देव प्रारण का जनक है । पितर भृगुप्रधान होते हुए सौम्य हैं, देवता अङ्गिरा प्रधान बनते हुए आग्नेय हैं । इसकार यजु के यतु भाग को हम देव - प्रारण की मूल प्रतिष्ठा बतला सकते हैं, कारण वही तो वाग् द्वारा बात्मक अङ्गिरारूप में परिणत होता है । एवं ' जू ' रूप वाक् भाग को पितर प्राण की मूल प्रतिष्ठा कहा जा सकता है । दूसरे शब्दों में प्राण - प्रधान वाङ्मय अग्नि देवसृष्टि का कारण है एवं वाक् प्रधान प्राणगर्भित सोम पितृ - सृष्टि का प्रारम्भक है । प्रारण मन के लिए हित है, वाक् उपहिता है । अर्थात् प्राण मन पर साक्षात् रूप से प्रतिष्ठित है, वाक्तत्त्व मन परम्परया प्रतिष्ठित है । ऐसी स्थिति में वाक् की अपेक्षा प्रारण का मन के प्रति सन्निकट रहना स्वतः सिद्ध है । इधर देवता को हमने प्राणमय बतलाया है । यही कारण है कि प्राण- प्रधान देव तत्त्व को अन्तरात्मा में प्रतिष्ठित करने के लिए प्रधानरूप से मन का ( भाव का ) आश्रय लेना ड़ता है । पितरतत्त्व वाङ्मय है, यह मन से विदूर पड़ता अतः इसे आत्मा में प्रतिष्ठित करने के लिए वाक् प्रपञ्च ( मन्त्रोच्चारणरूपा शब्दवाक् ) का आश्रय लेना ता । पितर वाक् से प्रसन्न हो जाते हैं । इसी विज्ञान के धार पर अभियुक्त कहते हैं--" पितरो वाक्यमिच्छन्ति भावमिच्छन्ति देवताः । " अब तक के कथन का निष्कर्ष यह हुआ कि षोडशीगर्भित यजुब्रह्म ही वागवच्छेदेन पितरप्राण का जनक है । सीधे शब्दों में वाङ्मय ऋषि ही पितरों का उपादान है— १ — ऋग्वेदः—— → वयोनाधः केन्द्रानुगत मुक्थच्छन्दः पृष्ठानुगतं पृष्ठ छन्दः - छन्दसी २ — सामवेदः -- वयोनाधः- --३ - - यत् वेदः -- यः-४ — जू - वेदः-: + वयः - गति लक्षणोवायुः - प्राणाः → स्थितिलक्षण आकाश: - वाक्- छन्दितं वस्तु - * -१ – स्नेह लक्षणे भृगुः-पितृप्राणप्रवर्त्तकः आप: सुब्रह्म ( अथर्ववेदः ) २ - तेजो लक्षणोऽङ्गिरा -देव प्राणप्रवर्त्तकः [ ५६ ] - ब्रह्म त्रयी

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड W १ - ऋक् उक्थच्छन्दः २- साम - पृष्ठच्छन्दः} ३ - यत् - अग्निः ( गतिलक्षणो वेदाग्निः ). ४ - जू: - सोम ( स्थितिलक्षणोवेद सोमः ) ५ - भृगुः - पितृसोमः ( पितर प्राणप्रवर्त्तकः स्नेहलक्षण:). → ऋषिः + मन्त्रः ६ - अङ्गिराः - देवाग्निः ( देवप्राणतेजो लक्षण:) पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् + आधार: आधेयाः पितरः देवाः यजुर्ब्रह्म से उत्पन्न अब्ब्रह्म के भृगुप्रङ्गिरा दो विवर्त्त बतलाए हैं । यह दोनों तत्त्व अवस्थाभेद से पितृलक्षण पवित्र सोम--तीन - तीन भागों में विभक्त हो जाते हैं । भृगु की घन - तरल - विरल अवस्थाएँ क्रमशःआपः - वायु- सोम इन नामों से व्यवहृत हैं, तीनों अवस्थाएँ क्रमशः अग्नि - यम- आदित्य इन अवस्थाएँ हो जाती हैं । इन छत्रों में से प्राप्यप्राण एवं अङ्गिरा की नामों से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार आपोमय सुब्रह्म की ६ ee भागों में विभक्त हैं, यही नवतीर्नव असुर हैं । वायव्य प्रारण २७ भागों में विभक्त है, यही सप्तविंशति-गन्धर्व हैं । सौम्यप्राण ८ भागों में विभक्त हैं । यही अग्निष्वात्तादि आठ पितर हैं । इस सौम्यप्राण पर प्राप्य असुरप्राण का निरन्तर आक्रमण होता रहता है । परन्तु मध्यस्थ वायव्य प्रारण इस आक्रमण को व्यर्थ किया करता है । प्राप्यप्रारण वरुण प्रधान है । " यद्व वातो नाभिवाति तत् सर्वं वरुणदेवत्यम् ” इस श्री सिद्धान्त के अनुसार जिस वस्तु के साथ वायु का सम्बन्ध नहीं होता रहता वहाँ प्राप्यप्राणप्रधान वरुणप्राण का प्रवेश जाता । कारण इसका यही है कि वायु में चतुर्थांश इन्द्र रहता है, पानी में वरुण रहता है । वरुण और इन्द्र में अश्वमाहिष्य वैर ( सहजवैर ) है । फलतः वायु के न रहने पर इन्द्र के प्रभाव से वरुण को प्रविष्ट होने का अवसर मिल जाता है । वह वस्तु सड़ने लगती है । थोड़ी देर के लिए उस वस्तु को खुली हवा में रख दीजिए, यदि वरुण उस वस्तु में अन्तम सम्बन्ध से प्रविष्ट नहीं हुआ है तो इन्द्राक्रमण से वरुण पलायित हो जाएगा । वस्तुगत पवित्र सोमतत्त्व विकसित हो जायगा । सारा दोष नष्ट हो जायगा । पदार्थ को दुर्गन्ध से बचाना, उसे स्वस्वरूप से सुरक्षित रखना पारमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति सोम का अन्यतम कम है । पवित्र सोम के इसी पावक धर्मं का निरूपण करती हुई श्रुति

कहती है-पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभूर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।

तप्ततनूनं तदामो समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समासत ॥

[ ५७ J ( ऋक्संहिता | ८३ | १ )

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् इस विशाल अन्तरिक्षरूप समुद्र में सर्वत्र आप्य असुर प्राण भरा हुआ है । वह पदार्थगतसीम क नष्ट कर उसे दूषित करने की चेष्टा किया करता है, परन्तु-भृगु द्वारा विजातीय प्राण प्रवृत्ति - वायव्यप्रारण इसकी चेष्टा को व्यर्थ किया करता है । यही कारण है कि जब तक शरीर में वायव्ययप्राण ( श्वास - प्रश्वास ) का संचार रहता है तब तक शरीर पवित्र रहता है, इसमें वारुण दुर्गन्ध का प्रवेश नहीं हो पाता परन्तु जब वायव्य प्राण उत्क्रान्त हो जाता है तो प्राप्यवरुणप्राण को आक्रमण करने का अवसर मिल जाता है । इस आक्रमण से शरीरस्थ सोम नष्ट हो जाता है, फलतः थोड़े दिन पीछे ही सम्पूर्ण शरीर सड़ने लगता है । बतलाना यही है कि अप एवं सोम के मध्य में प्रतिष्ठित गन्धर्व नाम से प्रसिद्ध वायव्यप्रारण ही सोमतत्त्व को स्वस्वरूप में सुरक्षित रखता है इसी आधार पर गन्धर्व सोम - रक्षक कहा जाता है । ( द्रष्टव्य शतपथ ३।६।२।९ ) । इस प्रकार एक ही भृगु अवस्था भेद से अप् वायु- सोम द्वारा क्रमशः असुर - गन्धर्व - पितर इन तीन विजातीय प्राणों का प्रवर्तक बन जाता 1 इसी प्रकार एक ही अङ्गिरोऽग्नि पहिले अग्नि वायु - श्रादित्य इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । यही आठ वसु हैं । तरलावस्थापन्न वायु तरलता के तारतम्य अङ्गिरा के ३३ विवर्त्त- से ग्यारह अवान्तर अवस्था में परिणत हो जाता है । यही ११ रुद्र, हैं । विरलावस्थापन आदित्य विरलता के तारतम्य से बारह अवस्थाओं में परिणत हो जाता है । यही १२ आदित्य हैं । इन तीनों में दो सान्ध्यप्राणों का उदय और होता है । इस प्रकार ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ सान्ध्यप्रारण सम्भूय एक ही अङ्गिरोऽग्नि के ३३ भेद हो जाते हैं । यही सुप्रसिद्ध त्रयस्त्रशत् यज्ञिय देवता हैं । असुर संख्या में तिगुने ( ६६ ) हैं, अतएव देवासुरमय विश्व में दिव्य विभूति अल्प मात्रा में उपलब्ध होती है, आसुरी विभूति प्रभूत मात्रा में उपलब्ध होती है, दोनों की प्रतिस्पर्धा में प्रायः देवबल परास्त हो जाता है । यद्यपि पूर्व कथनानुसार बीजरूप से देव प्रारण की उत्पत्ति श्रापोमय सुब्रह्म मण्डल ( परमेष्ठी मण्डल ) में ही हो जाती है, परन्तु इसका ज्योतिभाव से पूर्ण विकास सूर्य्य में ही होता है । इस स्थिति से सौम्य -पितरप्राण इस आग्नेय देव - प्राण का जनक बन जाता है । कारण स्पष्ट है । देवता ज्योतिर्म्मय ( प्रकाश -स्वरूप ) है । इस ज्योति का अन्यतम अधिष्ठाता पितृप्राणमूर्ति पारमेष्ठ्य सोम ही है । " त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ " " प्रदधात् सूर्ये ज्योतिरिन्दुः " इत्यादि मन्त्र प्रमाणों के अनुसार दाह्यसोम ही दाहक सोराग्नि त होकर ज्योतिर्मय देवताओं का उपादान बनता है । ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि ऋषि से पितर उत्पन्न होते हैं, एवं पितरों से देवता उत्पन्न होते हैं एवं पितरगर्भित देवताओं से विश्व निर्माण होता है । भगवान् मनु ने भी इसी क्रम को प्रधानता दी है । [ ५८ ]

पृष्ठ 64

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृ । पितरविज्ञानोपनिषत् ww प्रकरण के प्रारम्भ में कहा जा चुका है कि मैथुनी सृष्टि ही वास्तव में संसृष्टिलक्षण सृष्टि है । इस सृष्टि का मूल प्रवर्तक प्रारण सौम्यप्रारण ही है । सम्पूर्ण प्रजा दाम्पत्य भावमूलक विराट् - पुरुष - का मूल यही है । सौम्य प्रारण के इसी सर्वप्रभवत्व को लक्ष्य में रख कर महर्षियों ने इसे " पितर " शब्द से सम्बोधित किया है । पूर्व कथनानुसार ऋक्साम वयोनाध हैं । यजुर्ब्रह्म यत्- जू भेद से द्विब्रह्म है । इस प्रकार त्रयी - ब्रह्म यत् - जू कें कारण चतुर्धा विभक्त हो जाता है । उधर षड्ब्रह्म षट्कल है । चतुष्कल त्रयीब्रह्म अग्नि है । षट्कल सुब्रह्म सोम है, नारी है | समष्टि दशकल विराट् पुरुष है । दूसरे शब्दों में चतुष्कल पुरुष षट्कल स्त्री के समन्वय से ही विराट् पुरुष का स्वरूप सम्पन्न होता है-१ ---- ऋक् उक्थ छन्द. २- साम - पृष्ठछन्द..... विराट् – पुरुष - ** -३ — यत् - प्राण ( मौलिकवेदाग्निर्देवप्राणप्रवर्त्तको गतिशीलोऋषिनामाख्यः ) ४ – जूः - वाक् ( प्रतिष्ठासोमः पितृप्राणप्रवर्त्तकः स्थितिशीलोमन्त्रनामाख्यः ) ५ - प्रापः -- असुरप्रवर्त्तकाः ६ - वायु — गन्धर्वप्रवर्त्तकः ७ --- सोमः - पितृप्रवर्त्तकः - ** -८- अग्निः -- वसुप्रवर्त्तकः ६ - यमः – रुद्र प्रवर्त्तकः १० - प्रादित्य - प्रादित्यप्रवर्त्तकः - ** -+ स्नेहलक्षणो भृगुः + तेजोलक्षणोऽङ्गिराः [ ५६ ] सुब्रह्म

पृष्ठ 65

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् M प्रकरण के आरम्भ में हमने निरुक्त ब्रह्म की अमृत- सत्य यज्ञ इन तीन संस्थाओं का दिग्दर्शन कराया है एवं वहीं यह भी कहा गया है कि उक्त तीनों कलाओं में अमृत - सत्य - यज्ञ त्रयी - मीमांसा - से मध्य की सत्यकला ब्रह्म एवं देव भेद से दो भागों में विभक्त है । इन तीनों ब्रह्मसत्य- देव सत्य - यज्ञात्माओं का पूर्व प्रतिपादित त्रयी-ब्रह्म - सुब्रह्म के साथ ही सम्बन्ध समझना चाहिए । ऋक्सामावच्छिन्न अग्निसोममूर्ति ( वेदाग्नि एवं प्रतिष्ठा-लक्षण सोममूत्ति ) यजुब्रह्म ब्रह्मसत्य है एवं अग्निसोममूर्ति भृग्वङ्गिरोमय स्नेहतेजोमूत्तिं सुब्रह्म देवसत्य है । शुद्ध आत्मतत्त्व इन दोनों सत्यों से पृथक् है, उसे ही हमने " अमृत " शब्द से व्यवहृत किया है । आत्मतत्त्व के ब्रह्म देव भेद भिन्न इन्हीं दोनों मीमांस्य भादों को लक्ष्य में रख कर तलवकार श्रुति कहती है-" यदस्य ( विशुद्धात्मनः ) त्वं ( ब्रह्मसत्य भागः ) यदस्य च देवेषु ( देवसत्ये ) मीमांस्यमेव मन्ये विदितम् ” ( के ० २।१ ) सत्य के अतिरिक्त यज्ञ भाग और है, यह पाञ्चभौतिकप्रपञ्च की प्रतिष्ठा है । इस प्रकार प्राधि-दैविक संस्थाधिष्ठाता विश्वव्यापक विश्वात्मा विश्वचर ईश्वर प्रजापति में अमृत - ब्रह्म - देव - यज्ञ इन चार कलाओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । जीव प्रजापति इसी का ग्रंश है । सुतरां इसमें भी चारों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन चारों में से अमृततत्त्व सदा एकरस रहता है । वह सर्वत्र समान है, कृमि, कीट, विष्ठा, ऋषि, पितर सब में समान रूप से व्याप्त है । वह सर्वथा प्रसंस्करणीय एवं स्वत: संस्कृत है । उस पर शुभाशुभ कर्म का कोई लेप नहीं होता । उसके लिए कोई संस्कार अपेक्षित नहीं है । बाकी बचे हुए ब्रह्म - देव - यज्ञ तीनों के अंश जीवात्मा के प्रज्ञापराध से जीव संस्था में आकर दूषित बन जाते हैं । " गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी " इस सर्वसम्मत सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति से उत्पन्न वस्तुमात्र दोषाक्रान्त रहती है । इस दोष भाव के कारण वस्तुस्वरूप अपनी गुण सम्पत्ति से हीन प्रायः रहता है । यही हीनता तत्तत् वस्तु के संस्का विश्वविवर्त— १ २ ३ अतिशय भाव ( विकास भाव ) की बाधिका है । इस प्रकार दोष, दोषजनितहीनता, हीनताप्रयुक्त प्रति-शया भाव, इन तीन भावों से प्राकृतिक पदार्थ नित्य प्राक्रान्त रहता है । अध्यात्म संस्था में रहने वाली १ २ ३ इन्हीं तीनों विप्रतिपत्तियों को हटाने के लिए क्रमशः दोषमार्जन, हीनाङ्गपूत्ति, अतिशयाधान लक्षण तीन प्रकार के संस्कार किए जाते हैं । दूसरे शब्दों में एक ही संस्कार के ये तीन अवयव हैं । उदाहरण के लिए कार्पास ( कपास ) तीनों से युक्त है । इसके बिनौले निकाल कर शुद्ध तूल ( रूई ) रूप में परिणत कर देना पहिला दोषमार्ज्जन संस्कार है । तूल को वस्त्र रूप में परिणत कर देना प्रतिशयाधान है, एवं घुण्डी बटन वगैरह लगाना हीनाङ्गपूत्ति है । निदर्शन मात्र है । वस्तुमात्र को उपयोग में लाने के लिए उक्त तीनों संस्कार परम अपेक्षित है । अध्यात्म में ब्रह्म - देव - सत्य ये तीन कलाएँ बतलाई हैं । तीनों का ही संस्कार [ ६० ]

पृष्ठ 66

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणांपितरविज्ञानोपनिषत् अपेक्षित है । फलतः आध्यात्मिक संस्कार तीन भागों में विभक्त हो जाते हैं । यज्ञात्मक शरीर स्थूल भूतों की शुद्धि के लिए स्नान - उबटन तैलमद्दन आदि जो लौकिक संस्कार किए जाते हैं, वे सब भूत संस्कार हैं । इनसे यज्ञमय स्थूल शरीर संस्कृत बनता है । गर्भ संस्कार, ८ अनुव्रत संस्कार, ये १६ ब्राह्म संस्कार हैं । इनसे कारण शरीर स्थानीय ब्रह्म सत्य भाग सुसंस्कृत बनता है । ये सोलहों संस्कार स्मार्त्त हैं । इनके अतिरिक्त सप्तपाकयज्ञ, सप्तहविर्यज्ञ, सप्तसोमयज्ञ इत्यादि ३२ संस्कार- दैवसंस्कार हैं । इन से सूक्ष्मशरीर-स्थानीय देवसत्य भाग सुसंस्कृत बनता है । ये ३२ संस्कार श्रौतसंस्कार कहलाते हैं । ब्रह्मसत्य, कारणशरीर की, देवसत्य सूक्ष्मशरीर की एवं यज्ञतत्त्व स्थूलशरीर की मूलप्रतिष्ठा है । श्रौत ब्राह्म - संस्कार, स्मार्त - दैव-संस्कार लौकिक भूत - संस्कार इन त्रिविध संस्कारों से द्विजाति का स्वरूप विकसित होता । बिना इन संस्कारों के द्विज, द्विजबन्धु हैं । और तो और भगवान व्यास तो इन द्विजबन्धुत्रों को वेदाध्ययन का अधिकार भी नहीं देते । उधर संस्कारों से संस्कृत द्विज की साक्षात् ब्रह्म से तुलना करते हुए अभियुक्त कहते हैं-संस्कारैः संस्कृतः पूर्वैरुत्तरैरपि संस्कृतः । नित्यमष्टगुणैर्युक्तो ब्राह्मणो ब्रह्मलौकिकम् । ब्राह्म ' पदमवाप्नोति यस्मान्नच्यवते पुनः ॥ -- ( शङ्खस्मृतिः ) १ – श्रमृतात्मा - सर्वथाविशुद्धः संस्कार मर्य्यादयाविरहितः सर्वत्र समः । २ – ब्रह्मसत्यात्मा — कारण शरीरंमनोमयम् + द्विब्रह्म -- ब्राह्मसंस्काराःस्मार्त्ता —१६ ३ – देवसत्यात्मा – सूक्ष्मशरीरंप्राणमयम् + षड्ब्रह्म – दैवसंस्काराः श्रौताः – ३२ ४ – यज्ञात्मा — स्थूलशरीरंवाङ्मयम् + उभयोः समष्टिः भूतसंस्कारलौकिकाः ब्रह्मसत्यात्मा यजुर्म्मय है एवं यही यत्रूप ब्रह्मप्रारण ऋषि है । देवसत्य में भृगुङ्गिरा भेद से पितर देवता इन दोनों का समावेश । इस प्रकार अध्यात्मसंस्था ऋषि - पितृ - देव वर्गत्रयी- के प्रति ऋषि - पितर देवता इन तीनों की उपादान कारणता सिद्ध हो जाती है । उत्पन्न होने वाले प्राणीमात्र आधिदैविकमण्डलस्थ उक्त तीनों प्राणों के अ ंशों को ले कर ही उत्पन्न होते हैं । जब तक वे इन प्राकृतिक तत्त्वों को अपना उपादान नहीं बना लेते तब तक उनकी उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है । उत्पन्न होने के अनन्तर भी तत्तत् विशेष कम्मों द्वारा जीवात्मा ( केवल मनुष्य ) ऋष्यादि मात्रात्रों को आत्मसात् कर सकता है । परन्तु उत्पन्न होने के लिए पहिले उपर्युक्त तत्त्वों का ऋण लेना आवश्यक हो जाता है । स्वयंभू से यह ऋषि-प्राण ले कर ऋषिऋण से ऋरणी बनता है, सूर्य्य से देवप्रारण लेता हुआ देव ऋण से ऋणी बनता है एवं [ ६ ९ ]

पृष्ठ 67

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् wwwwwwwwwww पिता के शुक्र द्वारा पारमेष्ठ्य सौम्य प्राणमय पितृप्रारण ले कर पितृऋरण से ऋणी बनता है । इस प्रकार ऋषिऋरण - देवऋरण - पितृऋरण भेद से इन तीन ऋणों का भार हो जाता है । जब तक इन तीन ऋणों का परिशोध नहीं कर डालता तब तक इसका प्रात्मा कथमपि मुक्त नहीं हो सकता । इनके परिशोध के उपाय हैं ब्रह्मचर्यपूर्वकवेदाध्ययन, यजन, पुत्रोत्पत्ति । ब्रह्मचर्य्य ( ज्ञानचर्या - अध्ययनाध्यापन ) ऋषि ऋण का शोधक है । यज्ञकर्म्म देवऋण का परिशोधक है एवं पुत्रोत्पत्ति पितृऋण का अपाकरण करती है । जैसा कि आगे आने वाली " ऋणमोचनोपायोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । इसी ऋण-विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-“ जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभि गवान् जायते ब्रह्मचर्येण - ऋषिभ्यः, यज्ञेन-देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः । एष वा प्रनृणी यः पुत्री, यज्वा, ब्रह्मचारी च " इस श्रुति में ब्राह्मण शब्द चारों वर्णों का उपलक्षण है । हाँ, चारों के ब्रह्म. यज्ञ. प्रजा में अन्तर ब्राह्म - जगत् — है । उदाहरण के लिए शूद्र को ही लीजिए । पुराणश्रवण शूद्र का ब्रह्मचर्य्यं है, द्विजाति सेवा शूद्र का यज्ञ है, प्रजोत्पत्ति में समानता है— न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्म्मभिर्वर्णतां गतम् ॥ - ( महाभारत ) इस व्याससिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण विश्व ब्राह्म है । ब्राह्मण ही इतर तीनों वर्गों की योनि है । आगे जा कर तत्तदाधिकारिक कर्म्मविशेषों की सिद्धि के लिए, एवं तत्तत् संस्कारों की सिद्धि के लिए ऋषियों ने स्वतः सिद्ध वर्णव्यवस्था का नियमन किया है । ब्राह्मण वर्ग सबका मूल है । इसी अभिप्राय से उक्त श्रुति ने द्विजाति के स्थान में केवल ब्राह्मण शब्द के उल्लेख करने में कोई हानि नहीं समझी है । उक्त सन्दर्भ से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि पिवृत्तत्त्व परमेष्ठीलोक से उत्पन्न हुआ । ऋषिप्रारण इन पितरों के पितर ( जनक ) हैं । दूसरे शब्दों में पितरों के देवता ऋषि हैं: सृष्टिकामना से होने वाला विक्षोभ ही इनकी उत्पत्ति का द्वार है एवं मैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने के लिए ही यह पितृ-प्रारण प्रादुर्भूत हुआ है । इस प्रकार उक्त प्रकरण से पितृविषयक प्रारम्भ के सब प्रश्नों का संक्षेपतः समाधान हो जाता है । पितरों के पितर कौन है? यह प्रश्न सरल है परन्तु उत्तर गुहानिहित है । उक्त प्रकरण से इस प्रश्न का सम्यक् समाधान नहीं होता, इसके लिए अभी विशेष वक्तव्य प्राकृतिक पितृप्रारण मीमांसा - है । आशा है विषय की दुरूहता को लक्ष्य में रख कर आवश्यकतानुसार होने वाले पुनरुक्तिदोष को पाठक क्षम्य मानेंगे । [ ६२ ]

पृष्ठ 68

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् अपोमय परमेष्ठि में पितरप्रारण - देवप्राण दोनों का विकास होता है, इन दोनों में पितर- प्राण के देवता ऋषि हैं, दूसरे शब्दों में पितर प्रारण के जनक ऋषि हैं एवं देवप्राण का जनक पितरप्राण है, यह पूर्व में कहा जा चुका है । अब क्रमप्राप्त नित्य प्राकृतिक पितरों का स्वरूप पाठकों के सम्मुख उप-स्थित किया जाता है । पितृयज्ञ द्वारा ( जो कि यज्ञ ब्राह्मणग्रन्थों में पिण्डपितृयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध है ) जो पितृ - तत्त्व यज्ञकर्त्ता यजमान के शुक्र में प्रतिष्ठित हो कर सन्तानसूत्र को वंशपरम्परा रूप से सुरक्षित रखता है, वही पितृ - तत्त्व विज्ञानभाषा में " सह " नाम से व्यवहृत हुआ है । प्रकृत में सहोबलरूप, किंवा सहोबल प्रदाता उन्हीं नित्य प्राकृतिक पितरों का निरूपण अपेक्षित है । पृथिवीन्तरिक्ष भेद से स्तौम्य त्रिलोकी तीन भागों में विभक्त है जैसा कि " प्राणात्माविज्ञानो-पनिषत् " में विस्तार से बतलाया जा चुका है । लोकत्रय भेद से त्रिधा विभक्त वे नित्य - पितर क्रमशः पर - मध्यम - अवर नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं तीनों का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः । -सुं य ईयुरवृकाऋतज्ञास्तेनोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ – ( ऋक् सं. १० । १५ । १ ) मन्त्रपठित “ असुं य ईयुः ” “ सौम्यासः " " ऋतज्ञाः ” " हवेषु " इन विशेषणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए | पितर सौम्य हैं, साथ ही में ऋततत्त्व की पहिचान के कारण " ऋतज्ञ " नाम से प्रसिद्ध हैं । सौम्यासः ” एवं “ ऋतज्ञाः " का तात्पर्य यही है कि पारमेष्ठ्य भार्गव सोम ही पितृप्राण की आधारभूमि है । दूसरे शब्दों में पारमेष्ठ्य सोम - प्राण ही पितर हैं । यह पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व— ऋतमेव परमेष्ठि ऋतं नात्येति किञ्चन । ऋते समुद्र आहित ऋते भूमिरियंश्रिता ॥ ( तै ० स ० १।५।५।१ ) इस श्री सिद्धान्त के अनुसार ऋत है । सौम्य प्राण ऋत प्रधान है अतएव इसे " ऋतज्ञ " कहना अन्वर्थ होता है । प्रकारान्तर से यों समझिए । अङ्गिराप्रधान देवता सत्यमूर्ति अग्नि के सम्बन्ध से जैसे " सत्यसंहिता: " कहलाते हैं एवमेव भृगुप्रधान पितर ऋतमूर्ति सोम के सम्बन्ध से " ऋतसंहिताः " कहला सकते हैं । मन्त्र ने पितर को प्राणप्रद कहा है । वास्तव में बात यथार्थ है । " अन्नमयं हि सौम्यमनः, आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक् ( छा ० उ ० ) इस औपनिषत् सिद्धान्त के अनुसार प्राणतत्त्व की प्रतिष्ठा प्रप्तत्त्व ही है । प्राण की नग्नता पानी से ही हटती है " आपो वा अनग्नता " सचमुच पानी से प्राण विकसित होता है । स्नान करने से भी प्राणाग्नि प्रज्ज्वलित हो जाता है । भोजन के प्रारम्भ में प्राणा-चार्यों ने हस्तपादइन्द्रियादि के साथ जल का सम्बन्ध कराना आवश्यक समझा है । अप उपस्पर्श से तत्तत् इन्द्रिय प्राणाग्नि प्रदीप्त हो जाता है । प्राणाग्नि को प्रदीप्त करने के लिए ही धर्माचार्यों ने भोजन - यज्ञ के प्राद्यन्त में अमृतोपस्तरण अमृतापिधान रूप ग्राचमन का विधान किया है । पानी ही प्राण की वर्तनी [ ६३ ]

पृष्ठ 69

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwww ( पात्री ) है बिना पानी के प्राणतत्त्व सचमुच नग्न है, स्वस्वरूप से अप्रतिष्ठित है । इसी प्राण की स्वरूप रक्षा के लिए प्रत्येक दैनिक - मासिक - वार्षिक कम्मों में स्थान - स्थान पर " अप उपस्पृश्य - अप उपस्पृश्य " यह विधान उपलब्ध होता है । " प्राणाग्नय एवैतत् पुरेऽस्मिन् जागत्ति " ( पिप्पलादोपनिषत् ) के अनुसार शरीरगत प्राण अग्निमूर्ति है । अग्नि अन्नाद है । एवं अन्न ही अन्नादाग्नि की प्रतिष्ठा हैं । उधर पितृ-प्राण सौम्य होने से अन्नाद प्राणाग्नि का अन्न है । जब तक इस सोमरूप पितृतत्त्व का इस प्राणाग्नि के साथ सम्बन्ध रहता है, तभी तक यह प्राण - तत्त्व स्व - स्वरूप से प्रतिष्ठित रहता हैं । इस दृष्टि से भी हमें सौम्य प्रारणात्मक पितर को आग्नेय प्राण का रक्षक मानने के लिए तय्यार हैं । आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि शास्त्रज्ञान से सर्वथा अपरिचित लौकिक मनुष्य भी अपनी व्यवहार भाषा में पितृतत्त्व का प्राणाग्नि के साथ सम्बन्ध बतलाया करते हैं । जिस मनुष्य का प्राणाग्नि शिथिल रहता हैं, वह उदा-सीन रहता है, आलसी बना रहता है, ग्रकर्म्मण्य बना रहता है । इसका एकमात्र कारण यही है कि प्रारण को प्रदीप्त करने वाला इसका पितृप्रारण मूर्च्छित रहता है । ऐसे व्यक्ति के लिए लोक में " अरे! यह तो आजकल ऐसा सुस्त हो रहा है, जैसे इसके घर के मर गए हों, बाप दादे मर गए हों, यह व्यवहार देखा जाता है । वास्तव में उक्त व्यक्ति के शुक्र में प्रतिष्ठित पिता पितामहादि के द्वारा ( श्रद्धा सूत्र के आधार पर ) आया हुआ प्राणप्रद पितृमूर्ति सहभाग प्रतिमूच्छित रहता है । सहोमूर्ति - प्राणप्रद - पितर के इसी स्वरूप - धर्मं को लक्ष्य में रखकर " प्रसु य ईयुः " यह कहा है । सौम्यभाव शान्त है, क्रूरता से रहित है अतएव सौम्य पितरों को " अवकाः " कहा है । यजुर्वेद के वाक् - भाग से ही पितरों का विकास हुआ है, जैसा कि पूर्व प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । वाङ्मय इस पितृप्रारण को आत्मसात् करने का एकमात्र उपाय है यथाविधि वाक् प्रयोग । पितृकर्म में प्राहुति ( पिण्ड ) भाग गौण है । वाक् भाग ( मन्त्रोच्चारण ) प्रधान है " पितरो वाक्यमिच्छन्ति " पितरों के इसी वाग्धर्म्म को बतलाने के लिए " हवेषु " कहा है । १ २ ३ जिस प्रकार प्रारणप्रधान देवतत्त्व अग्नि - वायु - प्रादित्य भेद से तीन भागों में विभक्त होते हुए पर - मध्यम - प्रवर पितर १ १ २ ३ क्रमशः पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ इन तीन लोकों में प्रतिष्ठित है, एव-२ ३ मैव वाक् प्रधान पितृतत्त्व अवर - मध्यम - पर भेंद से तीन भागों में विभक्त होता हुआ क्रमशः पृथिवी-अन्तरिक्ष- द्यौ इन तीनों लोकों में प्रतिष्ठित हो रहा है । यह तीनों पितर, किंवा एक ही पितृ - तत्त्व की १ २ ३ तीन अवस्थाएँ क्रमशः प्रेतपितर - ऋतु पितर- दिव्यपितर इन नामों से प्रसिद्ध हैं । द्युलोक में प्रतिष्ठित पर पितर दिव्यपितर हैं । द्यलोक स्वर्ग है । स्वर्ग आनन्द प्रधान है अतएव इन स्वर्गीय दिव्यंपितरों को " नान्दीमुख " दिव्य पितर कहा जाता है । ऋतु - पितर ऋतवायुलोक ( अन्तरिक्ष ) में प्रतिष्ठित हैं । अन्त-रिक्ष रूप मध्यलोक में प्रतिष्ठित प्रतएव मध्यम नाम से प्रसिद्ध यह ऋतुपितर पार्वणपितर नाम से प्रसिद्ध हैं । प्रेतपितर पृथिवीलोक में प्रतिष्ठित हैं । पृथिवीलोक आवरण प्रधान होने से दुःख प्रधान है । प्रवर-लोक स्थानीय अतएव अवर नाम से यह प्रेतपितर " अन मुख " नाम से प्रख्यात हैं । पितरप्राण का शरीर [ ६४ ]

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पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwww पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् www सूक्ष्मभूतों से निष्पन्न होता है । इस पितरयोनि का सांख्योक्त अष्टविध देवयोनियों में अन्तर्भाव है । भूलोकस्य सूक्ष्मशरीरावच्छिन्न प्रेतपितरों के पैर ऊपर रहते हैं, मस्तक नीचे रहता है । इसी दुःखावस्था के कारण इन्हें अश्रुमुख कहना चरितार्थ होता है । १ - पराः - दिव्य पितरः + नान्दीमुखा: दिव्यलोकस्थाः ( २१ द्यौः ) २ — मध्यमाः → ऋतुपितरः - पार्वणः प्रान्तरिक्ष्याः ( १५ अ ० ) ३ —– श्रवराः → प्रेतपितरः- → नश्रुमुखा: -पार्थिवा: ( e पृ ० ) ----सौम्यासः पितरः १ २ ३ उक्त तीनों पितरों की मूल प्रकृतिएँ क्रमशः प्रादित्य - वायु - प्रग्नि देवता हैं । इन तीनों मूल प्रकृतियों त्रिविध पितृप्रारण की मूल प्रकृति-१ २ ३ के कारण यह पितर सौम्म - याम्य - प्राग्नेय भेद से तीन भागों विभक्त हो जाते हैं । अग्नि - यम- सोम ये तीन देवता पितृ-तत्त्व के सहदेवता कहलाते हैं । प्रसङ्गोपात्त पहिले इन सह देवताओं का स्वरूप ही पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है । दृश्यमान प्रपञ्च पुरुष - प्रकृति - विकृति भेद से तीन भागों में विभक्त है । समष्टि रूप से, एवं व्यष्टि रूप से उभयथा पदार्थमात्र उक्त तीनों भावों से आक्रान्त है । इन तीनों में पुरुष ( षोडशी पुरुष नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा ) सर्वालम्बन बनता हुआ सर्वथा प्रसङ्ग है । दूसरे शब्दों में पुरुष केवल विश्वालम्बन है । प्रकृति विश्व की सञ्चालिका है । “ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः " " मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ” ( गी ० ।१० ) इत्यादि वचन प्रकृति के ही कर्तृत्व भाव का समर्थन करते हैं । पुरुष तत्त्व जहाँ अमृत नाम से प्रसिद्ध है, वहाँ प्रकृति एवं विकृति तत्त्व क्रमशः ब्रह्म - शुक्र नाम से व्यवहृत हुए हैं ( द्रष्टव्य कठ ० ) " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " " जन्माद्यस्य यतः " इत्यादि भिक्षु सूत्रों द्वारा जन्म - स्थिति - भंग के कारणभूत जिस ब्रह्मतत्त्व का उल्लेख हुआ है, वह यही प्रकृतितत्त्व है । यह प्रकृतिब्रह्म ( जिसे कि वाजसनेय ब्राह्मण ने ग्यारहवें काण्ड में सर्वब्रह्म नाम से भी व्यवहृत किया है ) प्राण - प्राप - वाक् श्रन्न-ग्रन्नाद भेद से पञ्चधा विभक्त है । यही पाँचों ब्रह्म उक्त मनप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी पुरुष ( अव्यय ) से अनुगृहीत हो कर काम - तप- श्रम इन तीन साधारण सृष्ट्यनुबन्धों के सहयोग से स्व - स्व सृष्टि के प्रवर्त्तक वनते हैं । इन पाँचों ब्रह्मों में से प्रकृत में प्राणब्रह्म ( प्राणप्रकृति ) ही हमारा प्रधान लक्ष्य है क्योंकि पितर सृष्टि का मूलारम्भक यही प्राणतत्त्व है जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में कहा जा चुका है । इसी प्राणब्रह्म को हमने विशुद्ध प्राणदृष्ट्या यजुर्ब्रह्म, ऋक्सामावच्छेदापेक्षया त्रयीब्रह्म सर्वोपादानापेक्षया ब्रह्मसत्य इत्यादि विविध नामों से व्यवहृत किया है । [ ६५ ]