Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 71–80

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 71–80

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् www ऋषिमूर्ति प्रारणब्रह्म के मनप्रधान काम ( कामना ), प्राणप्रधान तप एवं वाक्प्रधान श्रम व्यापार से सर्वप्रथम ऋत - सत्य नामक दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं । " सहृदयं ब्रह्म की ऋत - सत्य - सृष्टि- सशरीरं सत्यम् ” “ अहृदयमशरीरं ऋतम् " ऋत - सत्य के यही स्वरूप-लक्षण हैं । जिस पदार्थ का नियत शरीर हो, साथ ही में वह सशरीरी पदार्थ अपना स्वतन्त्र केन्द्र रखता हुआा सहृदय हो, वही विज्ञान भाषा में सत्य कहलाएगा एवं जिस पदार्थ का न तो कोई नियत शरीर हो, न उसका कोई स्वतन्त्र हृदय हो, ऐसा अहृदय अशरीरी पदार्थ " ऋत " कहलाएगा । इन दोनों में ऋत तत्त्व स्वतः गतिशील है । स्वयं स्वस्वरूप से अप्रतिष्ठित रहता हुआ स्व - प्रतिष्ठा के लिए अन्य प्रतिष्ठा की अपेक्षा रखता है । दूसरा सत्य तत्त्व स्थितिप्रकृतिक है, यह स्वस्वरूप से गतिशून्य है । गति धर्म्मा अन्य पदार्थ के संयोग से इसमें गति -भाव उत्पन्न होता है । दूसरे शब्दों में सत्य - तत्त्व प्रातिश्विक रूप से अविचाली है, उसमें स्वयं गति नहीं है । अन्य की प्रेरणा से इसमें गति भाव का उदय होता है । उधर ऋत - तत्त्व एकान्ततः विचाली ही है । इसमें प्रातिस्विक रूप से स्थिति का प्रभाव है । अन्य की प्रेरणा से इसमें स्थिति - भाव का उदय होता है । " तत्तु समन्वयात् " इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार गतिस्थितिमूलक ऋतसत्य के समन्वय से ही सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है । उत्पन्न होने वाले प्रत्येक पदार्थ में ऋतसत्य दोनों का समन्वय है । दूसरे शब्दों में ऋतसत्य की ' समन्वितावस्था ही पदार्थ है । यही कारण है कि प्रत्येक पदार्थ में हमें उक्त दोनों विरुद्ध भावु प्रत्यक्ष रूप में उपलब्ध होते हैं । प्रति वस्तु परिवर्तनशील है, जो स्वरूप पहिले क्षण में था, पर क्षण में उसका अभाव है, जो अवस्था पर क्षण में है, तृतीय क्षण में उसका प्रभाव है । नदी के धारावेग के समान वस्तु-गत प्रत्यवयव परिवर्तनशील है । साथ ही में " स एवायं " यह स्थिति भी विद्यमान है । प्रत्येक वस्तु बनती हुई बिगड़ रही है, बिगड़ती हुई बन रही है, ठहरती हुई चल रही है, चलती हुई ठहरी हुई है । संभूति . और विनाश दोनों का एक विन्दु पर समन्वय है । यही तो ब्रह्म साक्षात्कार है । अमुक पदार्थ प्रतिष्ठित 1. है, अमुक पदार्थ प्रतिष्ठित है, इस भेद - मूलक व्यवहार का एकमात्र कारण स्थितिगति भाव का तारतम्य ही समझना चाहिए | वस्तुतस्तु ऐसा कोई प्रतिष्ठित पदार्थ नहीं है, जिसमें गतिरूपा अप्रतिष्ठा न हो, एवं ऐसा कोई प्रतिष्ठित पदार्थ नहीं जिसमें स्थितिरूपा प्रतिष्ठा न हो । जिन्हें आप सर्वथा स्थिर समझ रहे हैं, उन पदार्थों के प्रत्येक अवयव निरन्तर विस्रस्त हो रहे हैं । समष्टि रूप से स्थिर पदार्थ प्रतिष्ठित हैं, व्यष्टिरूप से विचाली हैं । एवमेव जिन्हें आप गतिशील समझ रहे हैं उनकी प्रतिष्ठा अवश्य ही स्थिति -तत्त्व है । गतितत्त्व क्रिया है, क्रिया क्षणिक है, क्षणस्थायिनी इस क्रिया के सञ्चार के लिए अवश्य ही एक अक्षण स्थिर तत्त्व अपेक्षित है । स्थिति तत्त्व को अपने मूल में रखे बिना गति - भाव उपपन्न ही नहीं हो सकता । शरीर के प्रत्येक अवयव ( धातु ) निरन्तर वित्रस्त होते रहते हैं, परन्तु समष्टि रूप से इसमें स्थिति तत्त्व भी विद्यमान है अतएव आयु के सौ वर्ष तक " स एवायं देवदत्तः " इस प्रकार की " वही " रूपा प्रत्यभिज्ञा बनी रहती है । एवमेव सर्वथा गतिशील वायु में भी आप स्थिति के दर्शन कर सकते हैं । गतिभाव के कारण पदार्थों के उत्पन्न होने पर भी उनका सर्वथा अभाव हो जाय, यह असम्भव है । देशकालरूप भेद से अवश्य ही उसकी स्थिति माननी पड़ेगी । केवल गतिभाव के कारण ही उन्हें एकान्ततः नास्तिकोटि में नहीं रक्खा जा सकता है । गति भी पदार्थ है । पदार्थ का प्रभाव मानना विज्ञान दृष्टि से असम्भव है । इसी स्थिति भाव को लक्ष्य में रख कर गीताचार्य कहते हैं— [ ६६ 1

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड m नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्व दर्शिभिः ॥ ( गीता २।१६ ) अस्तु इस दार्शनिक विषय को हम अधिक नहीं बढाना चाहते । परन्तु यह सर्वथा सत्य है कि प्रत्येक पदार्थ में अस्ति - नास्ति ( स्थिति - गति ) दोनों भावों का समावेश है । संभूति - विनाश दोनों का एकत्र समन्वय है । सम्भूति ' अस्ति मूला ' है, विनाश नास्तिमूला है । " सम्भूतिं च विनाश च यस्तद्व ेदोभयं सह ” ( ई ० उ ० ) यह पूर्ण परीक्षित सिद्धान्त है । इन दोनों तत्त्वों में से सम्भूतिमूल अस्तित्व की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित कराया जाता है । अस्ति ही प्रतिष्ठा तत्त्व है । नाम - रूप कम्र्मात्मक पदार्थ के साथ जब तक अस्ति तत्त्व का सम्बन्ध रहता है तभी तक वह स्व स्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । जिस सत्ता स्वरूप परिचय- दिन पदार्थ में से वह अस्तितत्त्व निकल जाता है उस दिन उसकी पूर्व प्रतिष्ठा उच्छिन्न हो जाती है । यह अस्ति रूप प्रतिष्ठा - तत्त्व सत्ता-विधृति - धृति भेद से तीन भागों में विभक्त है । प्रत्येक पदार्थ में इन तीनों अस्तिभावों का समावेश रहता है । वह अस्तिभाव जो पदार्थ का आत्मा बना हुआ है, जिसके रहने से पदार्थ पदार्थ है, जो अस्तिभाव अहमस्मि ( मैं हूँ ) इस व्यवहार की मूल प्रतिष्ठा है, वही अस्तिभाव " सत्ता " नाम से व्यवहृत हुआ है । यह सत्ता भाव उस सत् पदार्थ का मौलिक तत्त्व है । ' सतोभाव: ' ही सत्ता शब्द का निर्वचन है । ' सूर्योऽस्ति ' " घटो s स्ति " " पृथिव्यास्ति " " पुरुषोऽस्ति " इत्यादि व्यवहार श्रात्मप्रतिष्ठा लक्षण इसी सत्ताभाव पर अवलम्बित हैं । दूसरा है विधृतिरूप अस्तिभाव । " तस्माद्वा एतस्माद्वात्मन श्राकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्नि: अग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी पृथिव्या प्रोषधयः " ( तै ० उ ० ) इत्यादि श्रुति का तात्पर्य यही है कि आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ । . विघृति स्वरूप परिचय--श्राकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से प्राप: ( पानी ), प्राप: से पृथिवी, पृथिवी से प्रोषधिएँ उत्पन्न हुई । आत्मा एक प्रस्ति भाव है । प्राकाश - वायु अग्नि यादि भेदों से सर्वथा निरस्त यह विशुद्ध सत्ताभाव ही आत्मब्रह्म है । जैसा कि प्राप्तपुरुष कहते हैं—

प्रत्यस्ताशेष भेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् ।

वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥

यह मौलिक सत्तात्मक आत्मभाव अपने क्षर - भाग से आकाश द्रव्य को उत्पन्न कर " तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् " इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार उसमें आधार रूप से प्रविष्ट हो जाता है । क्षर की अपेक्षा से श्रात्मा भी द्रव्य - पु - मय है । यह बात्मा ( क्षर प्रधान भाग से ) स्वकार्यभूत श्राकाश में [ ६७ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwwwww समवाय सम्बन्ध से प्रविष्ट हो कर उसका आलम्बन बन जाता है । साधारण सम्बन्ध ( संयोग सम्बन्ध ) प्राविशत् है, समवाय सम्बन्ध अनुप्राविशत् है । आकाश इतर भूतों का विधर्त्ता है, परन्तु प्रकाश का विध कौन? उत्तर है क्षरप्रधान आत्मा । श्रात्मा में अव्यय - अक्षर - क्षर ये तीन धातु प्रतिष्ठित रहते हैं । दूसरे शब्दों में उक्त तीनों धातुओं की समष्टि ही श्रात्मा है । पूर्व में हमने प्रात्म - धृति लक्षण जिस सत्ताभाव का दिग्दर्शन कराया है, उसका आत्मा के अव्ययपर्व के साथ सम्बन्ध । सृष्टिसाक्षी अव्यय मन - प्राण-वाङ्मय है । मन - प्राण - वाक् की समुच्चित अवस्था ही सत्ता है । सत्ता रूप से अव्यय पुरुष सबका आलम्बन बनाहुआ । साथ ही में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वयं अव्यय पुरुष मनप्रधान है, अक्षरपुरुष प्राण - प्रधान है, क्षर पुरुष वाक्प्रधान है । वाक् प्रारणगर्भित मन प्रधान अव्यय विशुद्ध ज्ञानमूर्ति है, मन प्राणगर्भित वाक्प्रधान क्षर अर्थमूर्ति है एवं मध्यपतित, अतएव अव्ययक्षरधर्मावच्छिन्न मनोवाग्गभित प्राणप्रधान क्षरप्रधानरूप से क्रियामूर्ति रहता हुआ ही " त्रिमूर्ति " है । प्राण की प्रधानता से जहाँ अक्षर को क्रियामूर्ति माना जा सकता है, वहाँ ( मध्यपतित होने से ) अव्यय सम्बन्ध से इसे ज्ञानमूति एवं क्षर सम्बन्ध से अर्थमूर्ति भी कहा जा सकता है । सृष्टि, क्रिया की अपेक्षा रखती है । क्रिया, एकमात्र अक्षर का धर्म है अतएव अक्षर को ही, गीता भाषा के अनुसार अव्यक्त प्रकृति को ही, विश्व का निमित्त कारण माना जाता है । " तथाऽऽक्षराद्विविधाः सौम्यभावाः प्रजायन्ते तत्रचैवापियन्ति " ( मुण्डक ० उ ० ) के अनुसार अक्षर ही सृष्टि का मुख्य अधिष्ठाता है । यह प्राणमूर्ति है, अतएव इस प्रारण सम्बन्ध से वही अव्ययरूप अस्ति-भाव विधृतिरूप में परिणत हो जाता है । प्रत्येक भौतिक पदार्थ नियत्काल पर्यन्त अपनी जीवन सत्ता, रखता है । नियत काल समाप्त होने पर उसके भौतिक परमाणुओं का संघटन टूट जाता है । उस अवस्था में उस वस्तु के लिए हम " इस वस्तु का अब दम निकल गया " यह कहा करते हैं । यह " दम " वही प्राण-मूर्ति अक्षर पुरुष है । यह भौतिक परमाणु कूट ( समूह - ढेर - राशि ) को अपने प्राणसूत्र से एक सीमित एवं नियत आयतन में वृद्ध रखता है अतएव यह प्राणमूर्ति अक्षरतत्त्व " कूटस्थ " नाम से प्रसिद्ध है - कूटस्थोऽक्षर उच्यते । ” जिस दिन प्रारणबन्धन श्लथ हो जाता है, भूतकूट विशकलित हो जाता है । विश्व में सूर्य्य - चन्द्र पृथिवी - मनुष्य पशु - पक्षि आदि जितने भी भौतिक पिण्ड प्राप देखते हैं, विश्वास कीजिए सब में विधृतिरूप से कूटस्थ अक्षरपुरुष विद्यमान है । जब तक इनमें विधर्त्ता प्राणमूर्ति अक्षरपुरुष विद्यमान है, तब तक यह स्व - स्व कर्म्मभोग में विवश हैं । यही विधर्त्ता अक्षरपुरुष का शासन है । इसी शास्ता अक्षररूप अन्तर्थ्यामी की स्तुति करते हुए वेद महर्षि कहते हैं— " तस्य वा एतस्याक्षरस्य प्रशासने गागि सूर्य्या चन्द्रमसौ विधृतौतिष्ठतः " ( शत ० १४ | ६ || ) निष्कर्ष यही हुआ कि प्रत्येक पदार्थ में प्रात्मधृति से अतिरिक्त जो एक विधृति भाव देखा जाता है, वह अक्षररूप है । यही अव्ययास्ति का दूसरा रूप है । अव्यय सत्ता मनोमयी थी, अक्षर सत्ता प्राणमयी है । [ ६८ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् तीसरी है क्षर धातु । “ क्षरः सर्वाणि भूतानि " के अनुसार क्षर भूतमय है । एक भूत दूसरे भूत का आलम्बन बन रहा है । आकाशात्मक स्वयंभू परमेष्ठी की प्रतिष्ठा है, धृति स्वरूप परिचय - परमेष्ठी सूर्य्यं की, सूर्य्यं पृथिवी की पृथिवी चन्द्रमा एवं प्रस्मदादि पार्थिव प्रजा की प्रतिष्ठा है । वस्त्र की प्रतिष्ठा हमारा शरीर है । टेबिलपुस्तक की, अश्व मनुष्य की प्रतिष्ठा है । इसी प्राधाराधेय भावमूला प्रतिष्ठा को " धृति " कहा जाता है । यहाँ संयोग सम्बन्ध प्रधान है । दूसरे शब्दों में संयोग सम्बन्ध द्वारा एक द्रव्य में द्रव्यान्तर की जो प्रतिष्ठा है, | भूपिण्ड हमारी धृति है । इसकी धृति से हम ( हमारा शरीर ) प्रतिष्ठित हैं । जिस समय यह धृति हमारे शरीर से निकल जाती है, उसी क्षण आत्मा भय का सञ्चार हो जाता है । उदाहरण के लिए अपनी गति का निरीक्षण कीजिए । आप राजमार्ग ( सड़क ) से जा रहे हैं । मार्ग में किसी स्थान पर एक फुट के परिमाण से जमीन ढालू जाती है । यदि इस पर आप सावधानी से पैर रख कर चलते हैं तो भय का कोई अवसर नहीं है । इसका कारण यही है कि यहाँ आपकी दृष्टि धृति पर रहती है । परन्तु सावधानी से यदि दो इश्व दालू जमीन पर भी आपका पैर पड़ जाता है तो तत्काल आपका आत्मा कम्पित हो पड़ता है । कलेजा काँप उठता है, आत्मा में धक्का सा लगता है । कारण इसका यही है कि असावधानी के कारण तत्स्थान रूपा धृति का आपके साथ सम्बन्ध नहीं होने पाता । सावधानी से प्राप बड़े ऊँचे से कूद सकते हैं, असावधानी से जरा भी ऊँचाई से गिर पड़ना भय का कारण बन जाता है । प्रत्येक भूत को, एवं भौतिक पदार्थ को स्वगति की रक्षा के लिए यह क्षरात्मिका धृति प्रतिष्ठा अपेक्षित है । प्रति व्यय का रूप है । यही मनप्रधान अव्यय की दृष्टि से सत्ता है, प्राण - प्रधान अक्षर दृष्ट्या विधृति है, वाक्प्रधान क्षरदृष्ट्या धृति है । मन - प्राण - वाक् समष्टि को ही अस्ति कहा गया है एवं इसी को सृष्टि - साक्षी अव्यय माना गया है । इस प्रकार एक ही अव्ययास्ति अव्यय - अक्षर - क्षर भेद से सत्ता-विधृति - धृत्ति इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाती है । सत्ता स्वप्रतिष्ठा है । धृति परप्रतिष्ठा है । विि उभयप्रतिष्ठा है । सत्ता के उच्छेद में वस्तुविनाश है, विधृति की उत्क्रान्ति में वस्तु स्वरूप परिवर्तन है, धृतिनाश में भय है-मन प्रारणवाङ मूत्तिरव्ययपुरुषः - " प्रस्तिब्रह्म " -- - → मनप्रधानोज्ञानमूर्तिः — → मनः १ — अव्ययः २ — अक्षरः—— → प्राणप्रधानः क्रियामूर्तिः: + प्राणाः I > - संघातोऽस्तिभावः । ३ -क्षरः -- → + वाक्प्रधानोऽर्थ मूर्तिः----→ वाक् - * -श्रव्ययप्रधानावस्तुरूप समर्पिका । १ - सत्ता प्रात्मप्रतिष्ठा मनोमयी - स्वप्रतिष्ठा २ – विधृतिः प्राणप्रतिष्ठाप्राणमयी उभयप्रतिष्ठा अक्षर प्रधाना वस्तुस्वरूप रक्षिका । + ३— धृतिः → भूतप्रतिष्ठा वाङ्मयी — + परप्रतिष्ठा क्षरप्रधाना भूतालम्बन रूपा । [ ६६ ]

पृष्ठ 75

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् www इस प्रकार उपर्युक्त निदर्शन से यह सिद्ध हो जाता है कि एक ही अस्तिभाव आत्मपर्व भेद से तीन भागों में विभक्त हो जाता है । त्रेधा विभक्त प्रस्ति तत्त्व ही ग्रात्मा है, आत्मसत्य स्वरूप परिचय- आत्मा ही सत्यब्रह्म है । आत्मसत्य की सत्ता - विधृति - धृति इन तीनों पर्वो की समान व्याप्ति । इसी आधार पर, ग्रात्म - सत्य के आधार पर प्रतिष्ठित देवताओं के लिए “ त्रिः सत्ता वै देवाः " यह कहा जाता है । जिस तत्त्व की अपेक्षा से नाम - रूप-कम्मत्मिक पदार्थ में " अस्ति " यह बोध होता है, वही प्रतिष्ठाब्रह्म है, वही है, जो है— सत्य है । यह सत्य तत्त्व किंवा “ अस्तिब्रह्म " प्रारणमूर्ति अतएव ऋतरूप अक्षर तत्त्व के समन्वय से हरति- द्यति यच्छति इन तीन भावों से युक्त होता हुआ, हृदयरूप में परिणत हो जाता है । अन्नादान के लिए प्राण - मूर्ति उक्थ अक्षर से अशनाया सूत्र निकलता है । अशनाया सूत्र से आकर्षित अन्न अग्नि में आहुत होता है । अन्नाहरणावच्छिन्न वही प्राणाग्नि " हरि " है । अन्न सम्बन्धेन अन्तर्व्याप्नोति, अन्तर्विशति इस व्युत्पत्ति से " विष्णु ' ' कहलाता है । अन्नादग्नि में आया हुआ अन्न क्रमशः विस्रस्त होता रहता है । विस्रस्त्यवच्छिन्न वही प्राण प्रश-नाया को प्रदीप्त करता है । विस्रस्ति से कमी होती है । कमी से बुभुक्षा का नाभि - प्रधि - भाव सञ्चार होता है । विना अन्न के अग्नि क्षुब्ध हो जाता है, यही इसकी दीप्ति है, अतएव इस विस्रस्तिधर्म्मा उद्दीपक हृदयप्राण को " य ईन्धे, उद्दीपयति ” इस व्युत्पत्ति से इन्द्र कहा जाता है । प्रदान प्रगति है, विस्रस्ति गति है । दोनों का नियन्ता, दूसरे शब्दों में दोनों का भर्त्ता स्थिति प्रधान प्राण ही " बिर्भात सर्व, धारयति नियमयति " इस व्युत्पत्ति से भर्म्मन् कहा जाता है | नैरुक्त निर्वचन क्रमानुसार परोक्ष भाषा में यही भर्म्मन् र्ह, विपर्य्यास से " ब्रह्मा " कहलाता है । अक्षर को हमने प्राण - प्रधान होने से प्राणमूर्ति कहा है । साथ ही में प्राण को क्रियाशक्तिमय बतलाया गया है । क्रिया गति - तत्त्व | अक्षर का यही वास्तविक स्वरूप है । केवल गति - तत्त्व ही गति के तार-तय से हरति- द्यति यच्छति, इन तीन रूपों में परिणत हो जाता है । केन्द्र प्रतियोगिनी प्रधि ( परिधि -वस्तुसीमा ) अनुयोगिनी गति, “ गति " है । केन्द्रानुयोगिनी प्रधि- प्रतियोगिनी वही गति " प्रागति " है । प्रगति प्राहरण की अधिष्ठात्री है । गति निर्गमन की अधिष्ठात्री है । दोनों का समन्वित रूप ही स्थिति है | इन्द्राविष्णू गतिस्वभाव हैं, ब्रह्मा स्थितिस्वभाव है । उत्क्षेपण इन्द्र का धर्म है, प्रवक्षेपण विष्णु का धर्म । दोनों की प्रतिष्ठा रूप नियन्त्रण ब्रह्मा का धर्म है । कहने के लिए तीनों देवता पृथक् - पृथक् हैं । वस्तुतः एक ही तत्त्व के तीन विवर्तमान हैं । इसी आधार पर " एका मूतिस्त्रयोदेवा ब्रह्माविष्णुमहेश्वराः ” यह कहा जाता है । अक्षर तत्त्व को विधृति - प्रतिष्ठा बतलाया गया है । यही स्थितिमूल बनता हुआ " यम् " है, गति सम्पर्क बनता हुआ " द " है, प्रगति प्रधान बनता हुआ " हृ " है । एक ही प्रतिष्ठा ब्रह्म के हृ - द - यम् यह तीन रूप हैं । हृदय ( केन्द्र ) में यह हृ - द - य - रूप अक्षर तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । हृदय और अक्षर तत्त्व एक प्रकार से पर्य्याय हैं । एक ही अक्षर में हृ - द -- यम् ये तीन अक्षर हैं । इसी त्रिमूर्ति अक्षर की स्तुति करते हुए वेदविद् कहते हैं— " नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं प्राक्सृष्टेः केवलात्मने " [ ७० ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् हृदय में प्रतिष्ठित रहने वाला हृदयरूप अक्षर - तत्त्व - " सहृदयं सशरीरं सत्यम् " के अनुसार सत्य है । यह सत्य तत्त्व ऋतभाव के संसर्ग से प्रधि - नाभि इन दो भावों में परिणत हो जाता है । ऋततत्त्व अन्न है सत्य तत्त्व अन्नाद है । अन्नाद सत्य में ऋत अन्न निरन्तर प्राहुत होता रहता है । हृदय से प्राण रूप में परिणत होकर निकलने वाले प्रशनाया सूत्र से आकर्षित अन्न सोममय है । यह सोम ऋततत्त्व है । इस ऋत की नाभि वही हृदय है । आहुत ऋतान्न की प्रतिष्ठा हृदय स्थान ही है क्योंकि नाभि के चारों ओर सारे ऋत भाग नाभि से बद्ध हो कर प्रतिष्ठित रहते हैं । इस प्रकार नाभि - सूत्र के आधार पर प्रतिष्ठित यह ऋततत्त्व जितने प्रदेश में ( सत्य तत्त्व के आधार पर ) धृत रहता है, वह बहिः सीमा ही तत्तद् वस्तु की प्रधि कहलाती है । इस अधि भाग का यह हृदय ( नाभि ) स्पर्श किए रहता है अतएव " स्पृशति हृदयं " इस व्युत्पत्ति से इस प्रधि को " पृष्ठ " कहा जाता है । अथवा यह बहिः सीमा हृदयभाव का चारों ओर से स्पर्श करके ही स्व स्वरूप से प्रतिष्ठित रही है, इसलिए " हृदयं सर्वतः स्पृत्वा-तिष्ठति " इस व्युत्पत्ति से इसे प्रधि नाम से व्यवहृत किया जाता है । हृदय सत्यतत्त्व की साक्षात् प्रतिमा है । प्रधि ऋत की प्रतिमा । सम्पूर्ण सत्यभाव ऋत के गर्भ में रह कर ही अपने स्वरूप को प्रतिष्ठित रखने में समर्थ होता है । इसी आधार पर " ऋतेभूमिरियंश्रिता " यह कहा जाता है । साथ ही में सारे ऋत भाव हृदय रूप सत्य के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । ऋततत्त्व सत्य में प्रोतप्रोत हैं । दोनों परस्पर ओत - प्रोत हैं । दोनों में कौन पूर्वभावी है, कौन पश्चाद् भावी है? यह अचिन्त्य है । परन्तु यह अचिन्त्य भाव विश्व की अपेक्षा से ही सम्बन्ध रखता है । विश्व में सत्य - ऋत के पौर्वापर्य्यं विवेक सम्भव नहीं हैं परन्तु विश्व के मूल तत्त्व का अन्वेषण करने पर ऋततत्त्व को ही पूर्वज मानना पड़ता है । कारण स्पष्ट है । विश्व सहृदय होने से ससीम है । विश्वातीततत्त्व असीम है । उसमें सीमाभाव सम्पादक एवं सत्यस्वरूप समर्पक हृदय का अभाव है । वही मौलिक तत्त्व है । इसी आधार पर " ऋतं नात्येति किञ्चन " यह कहा जाता है । अस्तु विश्वातीत अवस्था में कुछ भी हो, विश्वदशा में ऋत - सत्य दोनों सहचारी हैं । " ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत " यह निश्चित सिद्धान्त है । ऋत - सत्य के इसी अविनाभाव सम्बन्ध को लक्ष्य में रख कर " ऋतं सत्येऽधायि सत्यंऋतेऽधायि " यह कहा गया है । ऋत बहिः सीमा है, सत्य अन्तः सीमा है । ऋत श्रात्मा का महतो महीयान् रूप है, सत्य अणोरणीयान् रूप है । बहिः सीमा प्रधि है, अन्तः सीमा नाभि है । इस प्रकार ऋत अन्न के सम्बन्ध से प्रत्येक पदार्थ में नाभि प्रधि ये दो भाव उत्पन्न हो जाते हैं । यद्यपि हम यह कह चुके हैं कि विश्वसीमा के भीतर ऋत सत्य के पौर्वापर्य का निर्णय करता कठिन है, तथापि स्थूल दृष्टि से विचार करने पर यह मान लेने में कोई सर्व प्रतिष्ठा तत्त्व आपत्ति नहीं होती कि जिस प्रकार मूलावस्था में ऋततत्त्व पूर्व है, सत्य पश्चाद्भावी है, ठीक इसके विपरीत मूलावस्था रूप विश्व में सत्य का स्थान प्रथम एवं मुख्य है, ऋत का स्थान द्वितीय एवं गौण है । सर्वप्रथम हृदयभाव उत्पन्न होता है । जब तक हृदय नहीं, तब तक प्रशनाया नहीं । बिना अशनाया के ऋतान्न का सम्बन्ध नहीं । अन्नाद अन्न के लिए नहीं है, अपितु अन्न अन्नाद के लिए है । भोक्ता भोग्य के लिए नहीं है, अपितु भोग्य भोक्ता के लिए है | जीवन भोजन के लिए नहीं है, अपितु भोजन जीवन के लिए है । भोक्ता प्राधार है, भोग्य आधेय है । [ ७१ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड १ २ ३ [ ७२ ] पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् ४ ५ आधेय आधार की अपेक्षा रखता है । अन्न स्वप्रतिष्ठा के लिए अन्नाद की अपेक्षा रखता है । इसी आधार पर हम कह सकतें हैं कि विश्व में सर्व प्रथम अन्नादमूर्ति हृदयरूप सत्यतत्त्व का ही विकास होता है अत-एव जहाँ विश्वातीत स्थिति को लक्ष्य में रख कर महर्षि " ऋतं नात्येति किञ्चन " यह कहते हैं, वहीं विश्वदृष्टि को लक्ष्य में रख कर " सत्ये सर्व प्रतिष्ठितम् " यह कहा जाता है । यह सत्यतत्त्व ( विश्वापेक्षया ) सर्वाग्रज है, अतएव " सर्वस्याग्रे समभवत् " इस व्युत्पत्ति के आधार पर इस अन्नाद - सत्य को " अग्रि " कहा जाता है । यही अग्रि परोक्षप्र सर्वाग्रज सत्य तत्व- देवताओं की परोक्ष भाषा के अनुसार आज अग्नि नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । अग्नितत्त्व की रक्षा के लिए ऋततत्त्व सुत होता है अतएव ' सत्यस्वरूपावताराय सूयते ' इस व्युत्पत्ति से इसे सोम कहा जाता है । प्रारम्भ में हमने अक्षर के ब्रह्मा विष्णु इन्द्र ये तीन रूप बतलाए हैं । विष्णुतव शुद्ध प्रगति है, इसका प्रधि से सम्बन्ध है । इन्द्रतत्त्व शुद्ध गति है, इसका नाभि से सम्बन्ध है । स्थितिमूर्ति ब्रह्मा एवं गतिमूर्ति इन्द्र दोनों के समन्वय से उपर्युक्त अग्नि नाम के सत्यब्रह्म का विकास होता है ब्रह्म ेन्द्र की समष्टि, दूसरे शब्दों में ब्रह्मगर्भित इन्द्र ( स्थिति गर्भिता गति ) ही अग्नि है । एवमेव स्थितिमूर्ति ब्रह्मा एवं प्रगतिमूर्ति विष्णु दोनों के समन्वय से सोम नाम के ऋतब्रह्म का विकास होता है । ब्रह्मा विष्णु की समष्टि दूसरे शब्दों में ब्रह्मगर्भित विष्णु ( स्थितिगर्भिता प्रगति ) ही सोम है । अग्निब्रह्म विकासधर्म्मा है सोमब्रह्म संकोचधर्म्मा है । वहिर्गतिगर्भिता प्रतिष्ठा ही विकास है । एक पुष्प पर दृष्टि डालिए । पुष्प की प्रत्येक पंखुड़िएँ बाहर निकल रही हैं । सभी पंखुड़ियों में गति है । परन्तु मूल प्रतिष्ठा से यह गतिबद्ध है अतएव बाहर की ओर निकलती हुई पंखुडिएँ पुष्पमूल को छोड़ कर उत्क्रान्त नहीं होने पाती । यही पुष्प का विकास है, यही पुष्प का खिलना है । ऐसी गति जो स्थितिगर्भ में प्रतिष्ठित रहे, वही विकास है । विकास स्थिति - गति का समुच्चित रूप है । यदि गति प्रतिष्ठा को ( स्थिति को ) सर्वथा छोड़ देती है तो विशुद्ध इन्द्र रह जाता है । आकाश में चमकने वाली विद्युत् में प्रतिष्ठा नहीं है, अतएव तत्क्षण विद्युत् उत्क्रान्त हो जाती है । यह इन्द्र के साक्षात् दर्शन हैं— ( देखिए केन ० ) यही गति, स्थितिगर्भिता बन कर विकासभाव को प्राप्त होती हुई अग्नि नाम से व्यवहृत होने लगती है । एवमेव शुद्ध प्रगति विष्णु है । यदि यह प्रगति स्थितिगर्भिता बन जाती है तो सोम का प्रादुर्भाव हो जाता है । अग्निब्रह्म गतिस्वभाव है, सोमब्रह्म स्थिति स्वभाव है । दूसरे शब्दों में प्राकुञ्चन भाव का सोम से सम्बन्ध है, प्रसारणभाव का अग्नि से सम्बन्ध है । तात्पर्य यही है कि पञ्चकोषात्मक अव्ययपुरुषानुगृहीत, ऋत का सत्यात्मक, सृष्टि प्रवर्त्तक, प्राणप्रधान प्रतएव गतिरूप एक ही अक्षर - तत्त्व गति - तारतम्य से [ गतिसमुच्चय ( स्थिति ), शुद्ध गति, शुद्ध प्रगति, स्थितिगर्भिता प्रगति, स्थितिगंभिता १ २ ३ ४ ५ गति तारतम्य से ] क्रमशः ब्रह्मा, - इन्द्र - विष्णु - सोम - अग्नि इन पाँच स्वरूपों में परिणत हो जाता है । इन पाँचों में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ये तीनों अक्षर हृद्य हैं । हृदय इन तीनों की आवास भूमि है । अग्नि - सोममयी प्रजा के इन तीनों हृद्य अक्षरों की समष्टि " प्रजापति " नाम से व्यवहृत होती है । इसी त्रिमूर्ति को " अन्तस्तिष्ठन् सन् नियमयति पदार्थ गतान् भावान् " इस व्युत्पत्ति से " अन्तर्यामी " नाम से व्यवहृत किया

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड www पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwwwwww जाता है । यही तत्त्व नियति- सत्य नाम से प्रसिद्ध है | अग्निसोमसमष्टि " सूत्रात्मा " नाम से प्रसिद्ध है | प्रजापति एवं सूत्रात्मा की समष्टि ही " सर्वम् " है । पितर - ऋषि - देवता - मनुष्य - पशु - पक्षि आदि किसी भी प्रजा के मूलतत्त्व का यदि आप अन्वेषण करेंगे तो आपको उपर्युक्त पञ्चमूर्ति अक्षरतत्त्व का ही आश्रय लेना पड़ेगा । ऐसी स्थिति में किसी भी तत्त्व का स्वरूप परिचय कराने से पूर्व मूलभूत अक्षर का स्वरूपज्ञान नितान्त अपेक्षित हो जाता है । इसी अपेक्षाभाव को लक्ष्य में रखते हुए अप्राकृत होते हुए भी हमने इस प्रकरण में अक्षर का स्वरूप बतलाना आवश्यक समझा है । मूलतत्त्व का निरूपण समाप्त हुआ । अब प्रकृत विषय की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । सोही विश्व के स्वरूप समर्थक हैं । अग्नि को हमने प्रसरणशील कहा है । प्रसरणशील यह अग्नि नाभि से निकल कर केन्द्र प्रधि की ओर जाता हुआ क्रमशः चीय-श्रग्नित्रयी मीमांसा- मान होता है । इस चीयमान अग्नि की अमृत मर्त्य भेद से दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । मत्यग्नि भूताग्नि है, अमृताग्नि प्राणाग्नि है । प्राण को ही देवता कह जाता है । देवता एवं भूत, दोनों उसी हृद्यप्रजापति की सन्तान हैं । भूताग्नि याज्ञिक परिभाषा में " चित्याग्नि " नाम से प्रसिद्ध है । देवाग्नि ( प्राणाग्नि ) चितेनिधेय नाम से व्यवहृत होता है । भूताग्नि की ग्रुप् - फेन - मृत् - सिक़ता - शर्करा - अश्मा - प्रय - हिरण्य भेद से आठ चितिएँ हैं । इन आठों के समन्वय से वस्तुपिण्ड का स्वरूप निष्पन्न होता है । प्रष्टचिति के कारण ही यह भूताग्नि " गायत्र " नाम से प्रसिद्ध है । इसीलिए निरुक्त में “ अग्निर्भू स्यातः ” तथा यजुर्वेद में " यथाग्निगर्भा पृथिवी ” इत्यादि उद्धृत प्रमाणों के अनुसार भूपिण्ड अग्नि प्रधान है । उक्त आठ चितियों के कारण ही " या वै सा गायत्री आसीत्, इयं वैसा पृथिवी " ( शत ० १ । १ ) के अनुसार भूपिण्ड को " गायत्री " कहा जाता है । " अष्टाक्षरा वै गायत्री " के अनुसार आठ अक्षर ( प्रारण ) की समष्टि ही गायत्री है । इन्हीं आठ अर्थाक्षरों से पार्थिवाग्नि " गायत्र " कहलाता है । दूसरा है प्राणाग्नि । भूताग्नि से जहाँ वस्तुपिण्ड का स्वरूप निष्पन्न होता है, वहाँ प्राणाग्नि से वस्तुमहिमा का स्वरूप सम्पादन होता है । प्राणाग्नि भूकेन्द्र से निकल कर वर्तुलवृत्त बनाता हुआ ऊपर की ओर जाता है । जाते हुए इस प्राणाग्नि की चित्यपिण्ड के आधार पर क्रमिक चिति होती है । इसी -लिए " चितेमिधीयते " इस निर्वचन के अनुसार इस प्राणाग्नि में " चितेनिधेय " कहा जाता है । विस्रस्त होने वाले इस अग्नि को हमने विकासधर्म्मा कहा है । इसका प्रथम विकास अग्नि है, दूसरे शब्दों में विकास की मूलावस्था अग्नि है । द्वितीयावस्था वायु तृतीयावस्था आदित्य । यही तोनों अवस्थाएँ क्रमशः घन - तरल - विरल नाम से प्रसिद्ध है । हृदयस्थ प्रजापति अङ्गी है, यही वस्तुपिण्ड का आत्मा है । आत्मा को ही अङ्गी कहा जाता है । अक्षर का स्वरूप बतलाते हुए हमने कहा है कि हृद्य - प्रजापति का गतिरूप इन्द्र भाग ही स्थितिरूप ब्रह्मा से युक्त हो कर अग्निस्वरूप में परिणत होता है । यह अग्नितत्त्व प्रजापति का रस है । प्रतएव " तेजो रसो निरवर्त्ताग्निः " इत्यादि रूप से इस प्राणाग्नि को ' रसाग्नि ' कहा जाता है । प्राणतत्त्व को ही निम्नलिखित श्रुति ऋषि नाम से व्यवहृत करती है— [ ७३ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्डं wwwwww पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् " असद्वा इदमग्र आसीत् । तदाहु: कि तदसदासीत् - इति ऋषयो बाव तदग्रेसदासीत् - इति । तदाहुः — के ते ऋषय इति । प्राणा वा ऋषयः ” ( शत ० ६।१।१।१ ) विकासधर्म्मा यह ऋषिप्रारण अङ्गी ( मूलाग्नि ) का रसनमात्र है, अतएव वैज्ञानिकों ने इसे " अङ्गिरस " नाम से व्यवहृत किया है । इसी ग्रङ्गिरा की पूर्वोक्त अग्नि- वायु - प्रादित्य ये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । अङ्गिरा तीन हैं, अतएव इनके लिए " अङ्गिरसो नः पितरों " इत्यादि कहा जाता है । इस राग्नि की अग्नि प्रथम चिति है । वायु द्वितीय चिति है । आदित्य तृतीय चिति है । इन तीनों की दो सान्ध्य चितिएँ और हो जाती हैं । इस प्रकार सम्भूय पाँच चितिएँ हो जाती हैं । इसी आधार पर इस रसाग्नि के लिए " पञ्च चितिकोऽग्निः " यह कहा जाता है । निष्कर्ष यही हुआ कि हृद्य श्रङ्गी प्रजापति का अङ्गिरा भाग अवस्थात्रय के कारण क्रमशः अग्नि- वायु - प्रादित्य इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । ये तीनों एक ही अग्नि की तीन अवस्था मात्र हैं । सोमतत्त्व आकुञ्चनधर्म्मा है । अग्निचिति बहिर्मुखी थी, सोमचिति अन्तर्मुखी है । धि से केन्द्र की और इसकी चिति होती है । प्रातः सवन - माध्यंदिन सवन- सायं सवन इन तीन सोमत्रयी मीमांसा- सवनों के कारण इस सोम की भी अग्निवत् प्रापः - वायु- सोम ये तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । अपः घनावस्था है, वायु तरलावस्था है, सोम विरलावस्था है । संकोच की मूलावस्था सोम है, द्वितीयावस्था वायु है तृतीयावस्था प्राप: है । अग्निवत् इस सोम की भूत-प्रारण भेद से दो अवस्थाएँ हैं । भूतात्मक सोम, पिण्डाग्नि का स्वरूप समर्पक है, प्रारणात्मक सोम, महिमाग्नि की आधार भूमि है । यह भार्गव तत्त्व स्वसंकोचवृत्ति से उत्तरोत्तर वस्तु को भरता जाता है, दृढ़ करता जाता है, दूसरे शब्दों में वस्तु को परिपक्व बनाता है, अतएव इस ऋषि ( सौम्यप्राण ) को भृगु कहा जाता है— ( भ्रस्जपाके ) । इस प्रकार अग्निवत् सोम के भी तीन विवर्त हो जाते हैं । भू - विवर्त अग्निसममय है । अग्नि सोम के अवस्था भेद से पृथिवी में अग्नि - यम- प्रादित्य- अप् - वायु- सोम इन ६ तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । अग्न्यादि तीनों भाव नाभ्यारब्ध पर्यवसान हैं, हृदय प्रतियोगी-प्रध्यनुयोगी है । प्रबादि तीनों भाव प्रध्यारब्ध नाभ्यवसान हैं, प्रधिप्रतियोगी, हृदयानुयोगी है । यही पृथिवी का षाट्कौशिक रूप है । अग्नि - यम- श्रादित्य इन तीन श्रङ्गिरानों के साथ क्रमशः अप् - वायु - सोम इन तीन भार्गवों का निष्ट सम्बन्ध है | अग्नि, अप् सहयोगी है, यम, वायु सहयोगी है, प्रादित्य, -यम स्वरूप परिचय- सोम सहयोगी है । अग्नि ( ध्रुवाग्नि ) अप से सहयोग करके पृथिवी रूप में परिणत हो जाता है " अद्द्भ्यः पृथिवी " के अनुसार पृथिवी का उपादान तत्त्व है परन्तु " अपां संघातो विलयनं च तेजः संयोगात् " इस करणाद - दर्शन के अनुसार बिना अग्नि-सम्बन्ध पानी में कभी घनता उत्पन्न नहीं हो सकती । घनाग्नि के सम्बन्ध से ही पानी की अप - फेन मृदादि [ ७४ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड २ १ अग्निः यमः 1 वायुः आपः अन्तरिक्षम् पृथिवी त्रिवृत् स्तोमः पञ्चदश स्तोमः १५ € | १ | [ ७५ ] पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् ३ आदित्यः सोमः द्यौः एकविंश स्तोमः २१ ३ ( ऋ ० ५।४४।१५ ) ग्राठ अवस्थाएँ होती हैं । वस्तुतः अप् - फेन मृदादि पानी की आठ अवस्थाएँ नहीं है अपितु अग्नि की ही उक्त आठ अवस्थाएँ हैं । अग्निधनता के तारतम्य से प्रभाग पृथिवी ( प्रतिष्ठा ) रूप में परिणत होता है । यम का वायु के साथ सम्बन्ध है । प्राग्नेय वायु रुद्र | वायव्य अग्नि को ही रूद्र कहा जाता है । विशुद्ध वायव्याग्नि संताप का कारण बनता हुआ जहाँ रुद्र कहलाता है, " अम्बा " नाम से प्रसिद्ध पारमेष्ठ्य पानी के सम्बन्ध से वही रुद्राग्नि शान्त बनता हुआ " साम्ब सदाशिव " नाम से व्यवहृत होने लगता है । रुद्रमूर्ति यम, शिवमूर्ति वायु दोनों सहचारी हैं । इन दोनों के समन्वय से स्थिति एवं नाश इन दो विरुद्ध भावों का उदय होता है । रुद्र देवता जहाँ विनाश के अधिष्ठाता हैं, वहाँ शिवतत्त्व सम्भूति के प्रवर्त्तक हैं । तीसरे आदित्यतत्त्व का सम्बन्ध सोम के साथ है श्रादित्य से प्रकृत में द्यलोक स्थानीय मघवा इन्द्र ही अभिप्रेत है इन दोनों के समन्वय से ज्योति का उदय होता है । इस प्रकार अग्नि- अप् का यम - वायु का युग्म अन्तरिक्ष का, आदित्य सोम का युग्म द्युलोक का अधिष्ठाता है । यही इन छनों का दाम्पत्य भाव है-अग्नि - यम- श्रादित्यात्मिका अग्नित्रयी एवं अप - वायु सोमात्मिका भृगुत्रयी को हमने पृथक् - पृथक् तत्त्व बताया है । दूसरे शब्दों में दाहक दाह्य भेद से अग्नि - सोम को विजातीय पदार्थ माना है । परन्तु वास्तव में दोनों अभिन्न सखा हैं । एक ही तत्त्व की दो भिन्न अवस्थाओं का नाम अग्नि - सोम है । अग्नि - सोम की इसी अभिन्नता का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-" अग्निर्जागार तमृचः कामयन्ते अग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निजगार तमयं सोम ग्रह तवाहमस्मि सख्ये योकाः ॥