Part II Pitra Swarup Vigyanopanistha part 2 — पृष्ठ 81–90

पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २ · पृष्ठ 81–90

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितर विज्ञानोपनिषत् अग्नि अन्नाद है, सोम अन्न है । अन्नात्मक सोम अन्नादात्मक अग्नि का सखा ( मित्र - सहचारी ) अवश्य है, परन्तु अग्नि की अपेक्षा इसका ओक ( स्थान - पोजीशन-अग्नि - सोम को अभिन्नता - रुतबा ) नीचा है । इसी अभिप्राय से न्योका कहा गया है । अग्नि-षोम दोनों संयुक्त देवता कहलाते हैं । अप् - वायु- सोम तीनों भार्गव -तत्त्व प्रधि की ओर से क्रमशः संकुचित होते हुए हृदय की ओर अपना रुख रखते हैं । उत्तरोत्तर हृदय की ओर आते हुए इन तीनों स्नेह लक्षण तत्त्वों के संकोच की वृद्धि होती रहती है । जब तक तीनों को पृथक् - पृथक् प्रतिष्ठित होने के लिए प्रदेश मिलता रहा है, तब तक तो इनमें संघर्ष उत्पन्न नहीं होता । परन्तु यह तीनों सौम्यतत्त्व जब प्रदेश भावरहित संकुचित होते - होते हृदय स्थान पर आ जाते हैं तो स्थानाभाव के कारण तीनों में संघर्ष हो पड़ता है । इस संघर्ष से किंवा घर्षण से तत्काल तीनों की समुच्चयावस्था विपरीतगति का आश्रय लेती हुई अग्निरूप में परिणत हो जाती है । घर्षण बल से उत्तेजनाभाव का उदय होता है, इस उत्तेजना बल कों ही सहोबल कहा जाता है । सहोबल ही " साहस ” का प्रवर्त्तक माना गया है । इसी सहोबल से अग्नि का जन्म होता श्रतएव अग्नि को " सहोजा " कहा जाता है । घर्षण प्रक्रिया ही अग्नि की जननी है । हस्त घर्षण से ऊष्मा उत्पन्न होती देखी जाती है । संकोच की चरम सीमा ही विकास की जननी है । भृगुत्रयी की जननी है । प्रधि से केन्द्र में आ कर अवकाश न पाने के कारण संघर्ष में आकर विपरीत गति का आश्रय लेता हुआ वही भृगु, अङ्गिरा रूप में परिणत हो जाता है । विशकलनधर्म्मा अग्नि क्रमशः विशकलित होता हुआ हृदय से प्रधि की ओर जाता है । जहाँ तक विकास की सीमा है वहाँ तक तो अग्नि विशकलित होता रहता है परन्तु विकास की चरम सीमा पर पहुँच कर विकास की मृत्यु हो जाती है, फलतः वही विकास चरम सीमा पर पहुँच कर संकोच रूप से परिणत हो जाता है । अग्नित्रयी की यह संकोचावस्था ही सोम है । प्रधि से हृदय की ओर गति होने लगती है । इस प्रकार अवस्था तारतम्य से अग्नि - सोम बना करता है । सोम, अग्निस्वरूप में परिणत हुआ करता है । हृदय से प्रधि की प्रोर अग्नि का उद्ग्राभ है । से हृदय पर्यंत अग्नि का निग्राभ है । एवमेव प्रधि से हृदयपर्यन्त सोम का उद्ग्राभ है, हृदय से प्रधि- पर्यन्त सोम का निग्राभ | अग्नि - सोम के उद्ग्राभ - निग्राम ( चढ़ाव उतार ) की विषमता ही अग्नि-सोम की मित्रता का प्रधान कारण है । यही वैषभ्य दोनों के जीवन का एवं दोनों की मित्रता का जनक बन रहा है । हृदय किंवा ( वस्तु के ) अन्तः पृष्ठ से ( जो कि अन्तः पृष्ठ विज्ञान भाषा में किंवा स्पृश्यपृष्ठ स्पृश्यपिण्ड नाम से व्यवहृत हुआ है ) प्रधिपर्यन्त एक स्थिर वाङ्मय मण्डल । यही मण्डल " महिमा " “ साहस्री ” – “ पुनःपद ” – “ विभूति " - बहिर्मण्डल- दृश्यमण्डल आदि विविध नामों से प्रसिद्ध है । उक्त अग्नि - सोम की किंवा भृगु -अङ्गिरा की गमनागमनरूपा - स्पर्धा इसी महिमामण्डल में हुआ करती है । जिस प्रकार वस्तुपिण्ड का एक निश्चित हृदय ( केन्द्र ) है, एवमेव महिमामण्डल का भी एक स्वतन्त्र केन्द्र बनता है । यही महिमामयी केन्द्रशक्ति " उद्गीथप्रजापति " " सप्तदश प्रजापति " " ग्राहवनीय " आदि [ ७६ ]

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् नामों से प्रसिद्ध है । सप्तदशस्तोमात्मक इस महिमा केन्द्र से अर्वाक् भाग में ( १७ से प्रारम्भ कर वस्तु पिण्ड के हृदयपर्य्यन्त भाग में ) विकासधर्म्मा अग्नि का साम्राज्य है, हृदयस्थान से ही अग्नि का प्रादुर्भाव होता है, एवं महिमामण्डल के १७ वें अहर्गण तक इसकी व्याप्ति रहती है । महिमा केन्द्र रूप १७ वें अहर्गण से पराक् भाग में ( १७ से प्रधि सीमा रूप ३३ वें अहर्गण पर्य्यन्त ) संकोच धर्म्मा सोम की प्रधानता है । इस प्रकार १७ वें से नीचे अग्नि का, १७ वें से ऊपर सोम का प्रभुत्व है । सत्रहवें स्थान में दोनों का समन्वय है । इसीलिए तो " यत्राग्नौ प्राहूयते सोमः " इस निर्वचन से इसे ग्राहवनीय कहा जाता है । सत्रहवें से नीचे अग्नि की प्रधानता है, १७ से ऊपर संकोच की प्रधानता है । स्वयं सप्तदश स्थान पर संकोच विकास दोनों का सामंजस्य है । यहां अग्नि - सोम दोनों बल समानावस्था से युक्त रहते हैं । दूसरे शब्दों में यहां अग्नि - सोम दोनों का नियमन हो रहा है । सोम की संकोचगति को अग्नि ने विष्टब्ध कर रक्खा है । संकोचविकास की यह स्तम्भनावस्था ही " यम " है । यद्यपि मध्यस्थ होने से यम में अग्नि - सोम दोनों की सत्ता का आभास होता है, परन्तु वस्तुतः यम में अग्नि की ही प्रधानता समझनी चाहिए । कारण इसका यही है कि यम अवसान का अधिष्ठाता है, एवं अवसान सोमप्रतिबन्धी अग्नि का ही अन्यतम धर्म है । अग्नितत्त्व सोमानुबन्धी, सोमप्रतिबन्धी भेद से दो भागों में विभक्त है । सोमानुबन्धी अग्नि यज्ञस्वरूप सम्पर्क बनता हुआ पदार्थों की जीवन - सत्ता का कारण । इस सोमानुबन्धी यज्ञाग्नि को अग्नि शब्द से व्यवहृत किया जाता है । " अग्निर्वैयज्ञः " के अनुसार अग्नि यज्ञ पर्याय हैं । सोमप्रतिबन्धी अग्नि आङ्गिरस वायु है । इसका एकमात्र कार्य्यं जीवनसत्ताविच्छेद करना है । वाय-व्याग्निप्रधान होने के कारण इसकी सत्ता अन्तरिक्ष में माननी पड़ती है । अन्तरिक्ष मध्य लोक है श्रतएव इसे मध्यस्थ कहा जा सकता है । मध्यवर्ती यह वायव्याग्निमूर्ति सोमप्रतिबन्धी यमतत्त्व अपने दक्षिण भाग से अग्नि का नियमन करता है, एवं उत्तर भाग की ओर से ऊपर की ओर सर्वतः वितत होता हुआ प्रधि - स्थान में जा कर सोम स्वरूप में परिणत हो जाता है एवं प्रविस्य सोम ऊपर की ओर से नीचे की ओर ( संकुचित होकर ) आता हुआ नाभिस्थान में जा कर अग्नि रूप में परिणत हो जाता है । अङ्गिरा ( अग्नि ) उत्तरोत्तर विशकलित होता हुआ प्रधि की ओर जाता है । विशकलन से यह उत्तरोत्तर सूक्ष्म हो जाता है । सूक्ष्म भाव ही अग्नि का" तीक्ष्णी श्रङ्गिरा - भृग- यम का पितृत्व- करण " है । इसी को तेजन ( तिज निशाने - निशानं तीक्ष्णीकरणम् ) कहते हैं । तेजनभाव के कारण ही इसे " तेज " कहते हैं एवं भार्गवसोम उत्तरोत्तर संकुचित होने कारण " स्नेहधर्मा ' है । तेज उष्ण है, स्नेह शीत है । उपर्युक्त मध्यपतित यम अनुष्णशीत है । यही ( अग्नि - यम- सोम, दूसरे शब्दों में अङ्गिरा - भृगु बम ) तीनां तत्त्व " पितर " नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं तीनों का स्वरूप बतलाती हुई मन्त्रश्रुति कहती है-अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सौम्यासः । एभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्तुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥ ( यजुर्वेद १६ | ५० ) [ ७७ ]

पृष्ठ 83

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwww पितृणां पितरविज्ञानोपनिषत् दक्षिण भाग नीचा कहलाता है । इसमें हमने अङ्गिरा ( अग्नि ) की प्रधानता बताई है । उत्तर भाग ऊँचा कहलाता है । इसमें भृगुपितर ( सोम ) की सत्ता बतलाई गई है । दोनों के मध्य में मध्यस्थ तर है । यही प्रकृत के प्रवर- मध्यम पर पितर हैं । अङ्गिरा अवर पितर है । भृगु पर पितर है एवं यम मध्यम पितर है । इसी अभिप्राय से—– “ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ” यह अनुगम वचन हमारे सामने आता है । पाठकों को स्मरण होगा कि अङ्गिरा की हमने अग्नि - यम- प्रादित्य, एवं भृगु की प्रप् - वायु - सोम ये तीन अवस्थाएँ बताई हैं । साथ ही में यह भी आप न भूले होंगे कि मध्यस्थ अनुष्ण-तत्त्वा भव्यक्ति- शीत यम दोनों का अनुग्राहक है । ऐसी स्थिति में यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं रह जाती कि यमपितर तेजनधर्म तीन प्राङ्गिरस पितरों से, एवं स्नेहनधर्मा तीन भार्गव पितरों से युक्त होता हुआ " सप्तसंस्थ " बन जाता है । सप्त भावकृतैक इस सप्तसंस्थ पितर से ही पार्थिव प्रान्तरिक्ष्य - दिव्यभाव उत्पन्न होते हैं । त्रैलोक्य में उत्पन्न होने वाली प्रजा मात्र का उपादान यही पितरप्राण है । फलतः यह सिद्ध हो जाता है कि पार्थिव प्रान्तरिक्ष्य - दिव्य सारे भाव ( प्रत्येक ) सप्तभावा-पन्न, दूसरे शब्दों में सप्तसंस्थ होते हैं । प्रत्येक वस्तुपिण्ड में तीन प्राङ्गिरस पितर, तीन भार्गव पितर, एक यम पितर है । अङ्गिरा- भृगु यम की समुच्चित अवस्था ही प्रत्येक पदार्थ की अभिव्यक्ति है । अभिव्यक्तित्व ही तत्तत् पदार्थ का व्यक्तित्व है । व्यक्तित्व ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा है । व्यक्ति ही पदार्थ है । उक्त निदर्शन से यद्यपि अग्नि - यम - सोम इन तीन तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो जाती है, परन्तु " तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते " इस न्याय के अनुसार यम का इन्हीं तत्त्वद्वयी की व्यापकता - दोनों में ( अग्नि - सोम में ) अन्तर्भाव मान लिया जाता है । इस प्रकार अन्ततोगत्वा अग्निसोम ये दो ही तत्त्व रह जाते हैं । अग्निरूप यम की सत्ता दक्षिण में है अतएव दक्षिणदिक् याम्या कहलाती है । यमराज को दक्षिण दिशा का दिक्पाल माना गया है । यह यमाग्नि ऋतरूप है, वायुरूप है । अन्नादि का परिपाक करना इसका प्रधान कार्य । यही दक्षिण से निरन्तर उत्तर को जाया करता है । यही कारण है क्षेत्रस्य अन्त का दक्षिण की ओर का भाग पहिले परिपक्व होता है, जिसका कि क्षेत्र में जाकर साक्षात्कार किया जा सकता है । दक्षिण की ओर से ही अन्न का परिपाक प्रारम्भ होता है । इसी प्राधिदैविक नियम के अनुसार अध्यात्म संस्था में भी मेरु-दण्ड से दक्षिण भाग में अग्नि की ही प्रधानता रहती है । भुक्तान्न का परिपाक करने वाला वैश्वानराग्नि ( जठराग्नि ) दक्षिण भाग में प्रतिष्ठित रह कर ही अन्न का परिपाक करता है । सोमसत्ता उत्तर में है अतएव उत्तरादिक् सौम्या कहलाती है । प्रग्नितत्त्व वल का अधिष्ठाता है । बल से दक्षता ( कर्म्म सामर्थ्य - कर्म्म प्रवणता ) उत्पन्न होती है । दक्षबल के कारण ही यह दिक् दक्षिणादिक् कहलाती है । सोम निरन्तर उत्तर से दक्षिण की ओर जाया करता है । यह इसकी निर्गच्छ अवस्था है । सोम ही हमारा अन्न है । यदि एतत् प्रधानादिक् की और मस्तक करके शयन किया जाता है तो निर्गच्छत सोम [ ७८ 1

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितृणांपितरविज्ञानोपनिपत् के बलवदाकर्षण से प्राकर्षित शारीर - सोममात्रा के निकल जाने की संभावना है । इससे जीवन में हानि हो सकती है । इसी आधार पर " नोदीचीना - शिराः शयीत " ( शतपथ ३ | १ | १ | ७ ) के अनुसार श्रुति ने उत्तर की ओर मस्तक करके शयन करने का निषेध किया है । दक्षिण से उत्तर की ओर आ कर सोमतत्त्व - से युक्त होने वाला अग्निरूप यमतत्त्व शिवभाव में परिणत हो जाता है । विशुद्ध यम जहाँ अवसान का अधिष्ठाता है, सोमयुक्त वही यम शिवरूप में परिणत हो कर जीवन का हेतु बन जाता है । सोम ही इस शिव की शक्ति है । अग्नि तेज है, सोम रस है । अग्नि घोर तनू है, सोम. शक्तिकारी तनू है । सम्पूर्णं शिव - शक्तिमय है, अग्निसोममय है । अग्निसोम की इसी व्यापकता का निरूपण करते हुए महर्षि जाबाल कहते हैं—

अग्निराख्यायते रौद्री, घोरा या तैजसी तनूः ।

शक्तिः सोमोऽमृतमयो, रसशक्तिकरी तनूः ॥ १ ॥

अमृतं यत् प्रतिष्ठा सा, तेजो विद्याकला स्वयम् ।

स्थूल सूक्ष्मेषु भूतेषु स एव रस- तेजसी ॥ २ ॥

द्विविधा तेजसोवृत्तिः सूर्यात्मा चानलात्मिका ।

तथैव रसशक्तिश्व सोमात्मा च जलात्मिका ॥ ३ ॥

वैद्युतादिमयं तेजो मधुरादिमयो रसः ।

तेजो रस विभेदैस्तु वृत्तमेतच्चराचरम् ॥४ ॥

अग्नेरमृत - निष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते 1 अतएव हविः क्लृप्तम् श्रग्नीषोमात्मकं जगत् ॥५ ॥

ऊर्ध्वशक्तिमयः सोमः अधः शक्तिमयोऽनलः ।

ताभ्यां सम्पुरितमात्मा शश्वद् विश्वमिदं जगत् ॥ ६ ॥

अग्नेरूर्ध्वं भवत्येषा यावत् सौम्यं परामृतम् ।

यावदग्न्यात्मं सौम्यतं विसृजत्यधः ॥ ७ ॥

अतएव हि कालाग्नेरधस्ताच्छक्तिरूर्ध्वगा ।

सोमस्यादहनंश्चोर्ध्वस्याधस्तात् पतनं भवेत् ॥ ८ ॥

आधार शक्त्यावधृतः कालाग्निरयमूर्ध्वगः ।

तथैव निम्नगः सोमः शिवशक्ति पदास्पदः ॥९ ॥

शिवस्योर्ध्वमयी शक्तिरधः शक्तिमयः शिवः ।

तदित्थं शिवशक्तिभ्यां नाव्याप्तामिह किञ्चन ॥१० ॥

( जाबालोपनिषद्, २ ब्राह्मण ) [ ७६ ]

पृष्ठ 85

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् महर्षि जाबाल ने अग्नि एवं सोम के दो रूप बतलाए हैं । यह द्वौतभाव ऋत सत्य भावमूलक ही समझना चाहिए | अग्नि एवं सोम दोनों ही ऋत सत्य के सम्बन्ध से दो - दो भागों में विभक्त हैं, ऋताग्नि वायुरूप है, इसकी स्थिति दक्षिणदिक् में है । सत्याग्नि सूर्य्यपिण्ड है, इसकी सत्ता पूर्वादिक में है । ऋत-सोम रसात्मक है, इसकी सत्ता उत्तर में है । सत्यसोम ग्रापोमय चन्द्रपिण्ड है, इसकी प्रतिष्ठा पश्चिमादिक् मानी जाती है, जैसा कि निम्नलिखित परिलेख से स्पष्ट हो जाता है— कोण ईशान वसाम - -उत्तरादिक w Jakeretle श्रमत्याग्नेिः पूर्वादिक KKKK [ ८० ८ आग्नेयकोण ल ] दक्षिणार्दिक .

पृष्ठ 86

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितरविज्ञानोपनिषत् वस्तुपिण्ड के हृदय से निकल कर प्रधिभाग पर्य्यन्त वितत रहने वाले प्राणाग्नि की घन - तरल-विरल अवस्था भेद से अग्नि - यम- प्रादित्य ये तीन अवस्थाएँ अग्नि - विभूति स्वरूप परिचय- बतलाई हैं । इन तीनों में से क्रम प्राप्त घनावस्थापन अग्नि पर सर्वप्रथम दृष्टि डालिए । घनावस्थापन्न इस घनाग्नि की घनता में भी तारतम्य है । इस तारतम्य से घनाग्नि की आठ अवस्थाएँ हो जाती हैं । घनाग्नि की व्याप्ति त्रिवृत्-स्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक ( स्तोम्य त्रिलोकी नाम से प्रसिद्ध पार्थिव त्रिलोकी का पृथिवीलोक ) पर्य्यन्त मानी गई है | स्वयं अग्नि क्षत्र है, इसकी अवान्तर आठ अवस्थाएँ विट् ( प्रजा ) हैं । अग्नि की यही आठ अवस्थाएँ, आठ वसु देवता हैं । सम्पूर्ण पार्थिव प्रपञ्च इन्हीं आठों अग्निपर्वों में निवास करता ( बस्ता है ) अतएव इन्हें वसु कहा जाता है । इन्हीं आठों का नाम निर्देश करता हुआ " मार्य सर्वस्व " पुराण कहता है— १ २ ३ ४ ५ ६ ध्र वो - धरश्व - सोमश्च - प्रापश्चैवो निलोऽनलः ७ ८ प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसर्वोऽष्टौ प्रकीत्तिताः ॥ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ब्राह्मणश्रुति के अनुसार यही आठों अग्नि- पृथिवी - वायु - अन्तरिक्ष- प्रादित्य- द्यौ - चन्द्रमा - नक्षत्र इन नामों से प्रसिद्ध हैं । अनल अग्नि है, घर पृथिवी है, अतएव यह धरा नाम से प्रसिद्ध है । अनिल वायु है, आपः अन्तरिक्ष है, प्रभास आदित्य है, ध्रुव बौ है, सोम चन्द्रमा है, प्रत्यूष नक्षत्र हैं । इन्हीं आठों का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-" अग्निश्च --- पृथिवी च । वायुश्चान्तरिक्षं च । श्रादित्यश्च द्यौश्च । चन्द्रमा च नक्षत्राणि च एते वसवः । एतेषुहीदं वसु सर्वं हितम् " ( शत ० ११ । ६ । ३।६ ) इति । नौ - चौदह - इक्कीस - तैंतीस भेद से पार्थिवलोक चार भागों में विभक्त है । इन चारों को क्रमशः • पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौ - नक्षत्र इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । नक्षत्र आपोमय हैं अतएव कहीं - कहीं नक्षत्र को " अस्ति वै चतुर्थी देवलोक प्रापः " इत्यादि के अनुसार प्रापः भी कह दिया गया है । इन चारों लोकों के सञ्चालक क्रमशः अग्नि - वायु - आदित्य - चन्द्रमा ये चार लोकी हैं, लोकाध्यक्ष हैं । लोकाध्यक्षयुक्त चारों लोक ही सब की प्रवासभूमि हैं, वासभूमि हैं, अतएव इन आठों को हम अवश्य ही " वसु " कहने के लिए तय्यार हैं । पृथिवी - अन्तरिक्ष - द्यौ - प्रापः इन चारों का परस्पर तानूनप्त्र होता है । चारों का चारों में मिल जाना ही तानूनप्त्र है । इन चारों में मूल पृथिवी है । प्राठों रूप एक ही अग्नि के हैं, अग्नि त्रिवृत् स्थानीय है, अतएव पृथिवीयुक्त उक्त आठों को पार्थिव देवता ही मान लिया जाता है । इन [ ] ८१

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड I क्ष १ घनावस्थापन्नः त्रिवृत्स्थानीयः पार्थिवाग्निः ५ ८ पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् 83 fa D अग्निः अनलः पृथिवी धरः अनिलः वायुः अन्तरिक्षम् आपः आदित्यः वसवः अष्टौ प्रभासः द्यौः ध्र ुवः सोमः चन्द्रमाः नक्षत्रारिण प्रत्यूषः श : -[ ८२ ] आठ के सम्बन्ध से छन्दोविज्ञान के अनुसार पार्थिव अग्नि को ( अष्टवसुरूप अष्टाक्षर गायत्री छन्द से छन्दित होने के कारण ) गायत्र नाम से व्यवहृत किया जाता है, एवं इसी अष्टाक्षर सम्बन्ध से पृथिवी को गायत्र - लोक कहा जाता है । अष्टधा विभक्त प्राङ्गिरसपार्थिव अग्नि की विभूतियों का यही संक्षिप्त निदर्शन है-वायु एवं आदित्य दोनों ग्रग्नि की अवस्था विशेष हैं । ब्राह्मण श्रुति में अग्नितत्त्व की रुद्र - वरुण-इन्द्र - मित्र - ब्रह्मा ये पाँच अवस्थाएँ मानी हैं । अग्नि की प्रदीपावस्था से आरम्भ वायुविभूति परिचय - कर उपशमनावस्था पर्यन्त श्रुति ने उक्त पाँचों अवस्थाओं का प्रत्यक्ष करवाया है । जिस समय प्रथम अग्नि को प्रज्वलित किया जाता है तो उस क्षण सहसा प्रबल वेग से ज्वाला निकल पड़ती है । ज्वाला निकलने से पूर्व फूत्कार करते - करते सहसा वेग से ज्वाला निकल पड़ती है । इस प्रथम ज्वाला के ताप में सूक्ष्मता रहती है । सन्ताप का अनुभव होता है । यह

पृष्ठ 88

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड ' १ ३ I कहती है-" यत्र यत्रेतद् प्रदीप्ततरो भवति तहि हे भवति " २ ३ " अथ यत्रैतदङ्गाराचाकाश्यन्त इव तहि हैप भवति " ५ [ ८३ ] पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् २ ५ १ " रुद्र "19 २ " नरुतः ” ३ ४ + " मित्र: " ५ " ब्रह्म " ( शत ० २३ २ ) रुद्रदेव के साक्षात् दर्शन हैं । प्रथम ज्वालां के अनन्तर क्रमशः ज्वाला प्रवृद्ध होती है, ज्वाला - वेग बढ़ जाता है | इस प्रदीप्ततर अवस्था को ही वरुण कहा जाता है । ग्रान्तरिक्ष्य प्रगर्भित सोमसम्बन्ध से ही ज्वाला प्रवृद्ध होती है एवं वरुण प्रप्तत्त्व के अधिष्ठाता हैं प्रतएव अग्नि की इस द्वितीयावस्था को वरुण नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । जिस प्रकार दीपार्वी शान्त होने से कुछ पूर्व अपनी पूर्वावस्था की अपेक्षा अधिक प्रकाशशालिनी बन जाती है उसी प्रकार संशमनावस्था से पूर्व अपनी पूर्वावस्था की अपेक्षा यह अग्निज्वाला परम वेग से धगत् - धगत् शब्द करती हुई प्रज्वलित हो जाती है । इसी अवस्था का नाम " ईन्धे " इस निर्वचन के अनुसार इन्द्र है । अब अग्निज्वाला शान्त होने लगती है तो इसकी सातों अचिएँ इतस्ततः दिशा - प्रदिशाओं में फैलने लगती हैं, इससे अग्नि का संघटन टूट जाता है, अतएव इस अवस्था में अग्नि - बल शान्त हो जाता है । उग्रता जाती रहती है । ऐसा अग्नि सुहावना लगने लगता है । अग्नि की इसी चतुर्यावस्था को मित्र कहा जाता है । अब अग्निज्वाला सर्वथा शान्त हो जाती है तो इस अवस्था में केवल प्रदीप्त ( चमकते हुए ) अङ्गारे दहकते हैं । अग्नि की इसी अन्तिम अवस्था को ब्रह्म किंवा ब्रह्मा नाम से व्यवहृत किया जात । " ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा " ( शतपथ ६ | १ | १ ) के अनुसार आलम्बनतत्त्व को ही ब्रह्म कहा जाता है । अङ्गार ही उक्त चारों अवस्थाओं के उपादान थे, यही चारों की उपसंहार-भूमि बनती है अतः इस अवस्था को बिर्भात सर्व इस निर्वाचन के अनुसार अवश्य ही " ब्रह्म " शब्द से सम्बोधित कर सकते हैं । अग्निदेव की इन्हीं पाँचों अवस्थाओं का दिग्दर्शन कराती हुई वाजिश्रुति १ " तद्यत्रैतत् प्रथमं समिद्धो भवति - धूप्यत इव तहि है भवति " " अथ यत्रतत् प्रदीप्तो भवति, उच्चैर्धूमः परमया नृत्या बल्बलीति तर्हि हैष भवति ” → “ इन्द्रः ' ' ४. " अथ यत्रतत् प्रतितरामिव तिरश्रीवाचिः संशम्यो भवति, तर्हि हैष भवति ". अग्नि की उक्त पाँचों अवस्थाओं के जनक क्रमशः वायु - ग्रापः --तेज- सोन - प्राण ये पाँच तत्त्व हैं । वायु के ' समन्वय से अग्निरुद्रमूर्ति बन जाता है । प्रत्यक्ष में ही वायुरूप फूत्कार से ही रुद्ररूप ( धूमयुक्त ) प्रथम ग्रवस्था का उदय होता है । ऋप् के सम्बन्ध से वही अग्नि वरुण वन जाना है । तेज के सम्बन्ध में

पृष्ठ 89

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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् wwwww वही अग्नि इन्द्रावस्था में परिणत हो जाता है । सोम के सम्बन्ध से वही अग्नि मित्ररूप में परिणत हो जाता है । तथा प्राण सम्बन्ध से वही सर्वान्त में ब्रह्मरूप में परिणत हो जाता है । अग्निः समिद्धः एवाग्निर्बहुधा एक १ - रुद्रः ----→ वायुसंयुक्तोऽग्निर्वायुमूत्तिः । २ — वरुणः—— → अप् - संयुक्तोऽग्निरमूत्तिः । ३ — इन्द्रः ~~~ → तेज संयुक्तोऽग्निस्तेजोमूत्तिः । ४ – मित्रः → + सोमसंयुक्तोऽग्निः सोममूर्त्तिः । ५- ब्रह्मा -- - प्रारण संयुक्तोऽग्निः प्राणमूर्त्तिः । उपर्युक्त पाँचों अवस्थाओं में से प्रकृत में केवल रुद्रावस्था ही अपेक्षित है । ऐसा अग्नि जिसके साथ वायु सम्पृक्त हो गया हो, दूसरे शब्दों में अग्नि की वह तरलावस्था जो कि घनावस्था को छोड़ कर वायु-रूप में परिणत हो गई है रुद्धद्रवरण भाव के कारण रुद्र नाम से प्रसिद्ध है । घन भाग रुद्ध है । रुद्ध भाग का द्रुत हो जाना ही रुद्र है, यही वायु है । केन्द्र से निकल कर प्रधि की ओर जाता हुआ अग्नि कुछ दूर तक ( त्रिवृतस्तोम पर्यन्त ) तो घन रहता है, रुद्ध ( अवरुद्ध ) रहता है । आगे जा कर पञ्चदशस्तोम स्थानीय विपुल प्रदेश पा कर अपनी रुद्धावस्था से च्युत होता हुआ वही अग्नि वायु रूप में परिणत हो जाता है । वायु अग्नि की ही द्वितीयावस्था है । ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड वेग से बहने वाला सन्तापधर्मा वायु ही ( जो ब्राह्मणग्रन्थों में सान्तपन नाम से भी व्यवहृत हुआ है ) साक्षात् रुद्र है । अग्नि ही इसका मूल है । इसी आधार पर " अग्निर्वारुद्र: " इस कथन में कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती । वायुमय अग्नि ही ( जिसे राजस्थान ' लू ' नाम से व्यवहृत करता है, मिथिला प्रान्त जिसे " रौद " नाम से सम्बोधित करता है ) रुद्र का प्रधान स्वरूप है । वायुमय होने से ही रुद्र को अन्तरिक्षायतन माना जाता है । जिस प्रकार घनावस्थ अग्नि की घनता के तारतम्य से पूर्व प्रदर्शित क्रमानुसार आठ ग्रवस्थाएँ होती हैं, एवमेव तरलता के तारतम्य से इस वायुमय रुद्र की ११ अवस्थाएँ होती हैं । अग्नि की आठ अवस्थाओं का मूल कारण जैसे अष्टाक्षर गायत्री छन्द था, एवमेव रुद्र की ११ अवस्थाओं का मूल कारण एका-दशाक्षर त्रिष्टुप् छन्द है । त्रिष्टुप् का अन्तरिक्ष से ही सम्बन्ध माना गया है । आठ वसु जैसे विट् ( प्रजा ) थे, समष्टिरूप अग्नि जैसे क्षेत्र था, एवमेव ११ रुद्र विट् रूप हैं, समष्टि रूप एक रुद्र ( जिसकी ग्यारह अवस्थाएँ ) हैं, क्षत्र रुद्र है । विट् रूप की अवान्तर असंख्य विभूतियों को लक्ष्य में रख कर जहाँ " सहस्राण सहस्रशो ये रुद्रा: " ( तै ० सं ० ४।५ | ११ | १ ) यह कहा जाता है, क्षत्र रुद्र के एकत्व को लक्ष्य में रख कर " एको रुद्रो न द्वितीयायावतस्थे " यह कहा गया । रुद्र के इन्हीं क्षत्र एवं विट् दोनों रूपों को लक्ष्य में रख कर संचिति यज्ञ प्रकरण में " नमस्ते रुद्र मन्येवे " इत्यादि मन्त्र का व्याख्यान करती हुई वाजि श्रुति कहती है-[ ८४ ]

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पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री २, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान द्वितीय खण्ड wwwwwww " स एष क्षत्रं देवः यः स शतशीर्षा समभवत् । विश इम इतरे ये विप्रुभ्यः समभवन् । ” पितॄणां पितर विज्ञानोपनिषत् शंत ० ७ | १।१।१५ ) उक्त वि रुद्र ( अधिदैवत संस्था में ) निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध है -तरलावस्थापन्नः – पञ्चदशस्तोम स्थानीयः वायुमयोऽग्निरुद्रः राक्ष * वि. १ विरूपाक्षः रैवतः हरः ५ बहुरूपः त्र्यम्बकः ६ भूतेश: ७ जयन्तः द पिनाकी & अपराजितः १० अजएकपात् ११ अपपतनः - त्रम् * शः + -रुद्राः एकादश पुराणशास्त्र जहाँ ब्रह्मा - विष्णु - महेश इस त्रिदेववाद को प्रधानता देता है वहाँ श्रोतसिद्धान्त के अनुसार ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि- सोम भेद से पञ्चदेववाद को ही मुख्य स्थान दिया जाता है । इस [ ८५ ]