Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 91–100

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 91–100

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प्रजातन्तुवितान भक्ति का हृदय से अभिनन्दन करते हुए, साथ ही यह भी समझते हुए कि, यदि बतलाये गए संहिता - प्रमाणों से कहीं उन अभिनिविष्टों का कल्पित सिद्धान्त उच्छिन्न होता हुआ उन्हें प्रतीत होगा, तो वे तदुविषयक संहिता - प्रमाणों को भी प्रक्षिप्त कहने में अपने चिराभ्यस्त अभ्यास का ही अनुगमन करेंगे, केवल कर्त्तव्यबुद्धि से प्रजातन्तुवितानात्मक कुछ एक प्रमाण उद्धृत कर दिए जाते हैं । इस प्रमाणवाद का यह फल अवश्यंभावी है कि, जो मुग्ध जिज्ञामु इन शास्त्रतत्त्वानभिज्ञ-आडम्बरप्रिय - कुतर्कशिरोमणि - वेदभक्तों के अशास्त्रीय वाग्जाल के व्यामोह में पड़ कर शास्त्रीय कम्र्मों की उपेक्षा कर बैठते हैं, वे अवश्यमेव अपना पथ प्रशस्त बना सकेंगे । “ जीवित पिता पितामहादि अवश्य पितर हैं, इन का श्रद्धा से पूजन करना भी शास्त्रसम्मत है " इस निष्ठा को सर्वथा सुरक्षित रखते हुए " श्राद्धकर्मफलभोक्ता पितर प्रेत पितर हैं, पुत्रादि के द्वारा प्रदत्त पिण्ड - प्राण उन परलोकगत प्रेतात्माओं की तृप्ति का कारण बनता है ", इस सिद्धान्त के उपोद्बलक प्रमाण ' पितणां पितरोपनिषत् ' में बतलाए जा चुके हैं । प्रकृत में केवल प्रजातन्तुवितानात्मक सापि -ड्यभाव से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक प्रमाणों की ही मीमांसा की जायगी । शुक्रस्थित ८४ कल पितृसहों में पूर्वप्रदर्शित ' पितरः - सूनवः ' - ' आत्मघेयः - तन्यः ' विभागों से सम्बन्ध रखने वाले ऋण धन भावों के आधार पर विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि, महानात्मगत ' पितृसहः सूत्र ' एक महासूत्र है, उलझा हुआ धांगा है । जिस प्रकार एक तन्तुवाय ( कपड़ा बुनने वाला जुलाहा ) ताने बाने लगाकर सूत्र विन्यास से कपड़ा बुनता है, ठीक उसी रूप से महदवच्छिन्न अन्तर्यामी इन सहः सूत्रों से प्रजारूप वस्त्र का निर्माण कर रहे हैं । कपड़े में जो सीधे धागे होते हैं, उन्हें ' ताना ' कहा जाता है, एवं आड़े धागे ' बाना ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ताने पर बाना होने से ही वस्त्र का स्वरूप सम्पन्न होता है । एवं इन तानों बानों के उपक्रम में एक खूटा गड़ा रहता है, जहाँ से जुलाहा यह वितानप्रक्रिया आरम्भ करता है । बीजी नामक मूलपुरुष खूटा है, महदवच्छिन्न अन्तर्यामी जुलाहा है, पुत्र - पौत्रादि में ऋजुभाव से वितत होने वाला तन्य भाग ' ताना ' है, तन्य पर प्रतिष्ठित रहने वाला आत्मधेयभाग ' बाना ' है । यही प्रजातन्तुवितान - लक्षण वस्त्र है, जोकि - परामुक्ति के सम्बन्ध में निर्बल माना गया है । पितृसूत्र-रूपा पुत्र - पौत्रादि की एषणा कभी परामुक्ति का कारण नहीं बन सकती । इसके लिए तो -“ तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते यनाय । यदा चवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । II तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ”. के अनुसार समानप्रत्ययप्रवाहरूपं बुद्धियोगात्मक ज्ञानयोग ( आत्मबोध ) ही अपेक्षित है । स्वनामधन्य सन्त कबीर ने इसी भावना से प्रजातन्तुवितानरूपा पुत्रैषरणा को मुक्तिपथ में निर्बल साधन मानते हुए अपनी निम्म लिखित भाषासूक्ति से प्रकट किया है-५५

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श्राद्धविज्ञान " ताना दम का ताना रे-तू तो बड़ा जुलाहा रे दास कबीरा बुनने लागा निकला धागा कच्चा । ताना ० । " चान्द्रसुषुम्णा नाड़ी के द्वारा आगत चान्द्ररस से १० मास में निष्पन्न यह एक पितृपट को विशुद्ध मुख्य पुत्रैषा से जहाँ बन्धन का कारण बनता है, वहाँ यही पट निष्कामभावानुगत सृष्टिप्रक्रिया - आश्रयदाता बनाता हुआ स्वयमपि स्वस्वरूप से शुद्ध पूत बना रहता है, एवं वंशधरों के लिए भी निर्मल में बना रहता है । कबीर की एक अन्य सूक्ति से पितृपट के इसी स्वरूप का निम्न लिखित शब्दों विश्लेषण हुआ है -भीनी भीनी बीनी चदरिया-का का ताना, काहे कै भरनी-कौन तार से बीनी चदरिया || १ ||

इंगला पिंगला ताना भरनी ।

सुषमन तार से बीनी चदरिया ॥ २ ॥

आठ कँवल दल चरखा डोलै ।

पांच तत्त गुन तीनी चदरिया ॥ ३ ॥

ais को सियत मास दस लागे ।

ठोक ठोक के बीनी चदरिया ॥ ४ ॥

दास कबीर जतन से ओढी ।

ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया ॥ ४ ॥

हाँ, तो अब प्रतिज्ञात प्रमाणवाद की मीमांसा कीजिये । " पुरुष का शुक्र पितृप्राणमय है । का इस शुक्र में चन्द्रमा ऋतु के द्वारा पितृप्राण प्रतिष्ठित करते हैं " इस सम्बन्ध में प्रथम ब्राह्मण भाग प्रमाण देखिये । यद्यपि यह प्रमाण पूर्व में ' रेत - योनि - रेतोधा ' का विश्लेषण करते हुए उद्धृत हो चुका है । तथापि यहाँ अर्थदृष्टि सम्बन्ध से उसे पुनः उद्धृत कर देना आवश्यक मान लिया गया है-१ – “ विचक्षणाद् ऋतवो रेत भृतं पञ्चदशात् प्रसुतात् पित्र्यवतः । तन्मा पुंसि कर्त्तर्येरयध्वं पुंसा कर्त्रा मातरि मा निषिश्चः ॥

- स जायमान उपजायमानो द्वादश त्रयोदश उपमासः ।

द्वादश त्रयोदशेन पित्रा सं तद्विदेहं प्रतितद्विदेऽहम् ॥

farmin ५.६

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प्रजातन्तुवितान ३. ५. -- तन्म ऋतवो मर्त्यव आरभध्वं तेन सत्येन । तपसा ऋतुरस्मि आर्त्तवोऽत्म कोऽसि त्वमसि " ( कौ ० प्रा ० उप ० १ २ । ) । ४. - " सौ वै सोमो राजा विचक्षणश्चन्द्रमाः " ( कौ ० ना ० ७ १० ) । " रेतः सोमः " ( कौ ० ब्रा०- १३।७ । ) । : " " सम्पूर्ण पार्थिव पदार्थ चन्द्रमा से उत्पन्न हुए हैं । ' सौषुम्णश्चान्द्ररश्मिः ' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार सौरप्राण सुषुम्नाड़ी के द्वारा ( जो कि सुषुम्णानाड़ी दक्षवृत्त नामक चान्द्रपरिभ्रमणवृत्त की दोनों परधियों का स्पर्श करती हुई आगे व्याप्त रहती है ) पृथिवी पर श्राता रहता है । इसी नाड़ी के द्वारा नाक्षत्रिक प्राणों का आगमन होता है । ग्रह - नक्षत्र - सौर द्वादश श्रादित्य, आदि आधिदैविक प्राण सुषुम्णा के द्वारा पृथिवी पर आते अवश्य हैं, परन्तु मध्यस्था चान्द्र कक्षा के सम्बन्ध से इन प्राणों को पहिले चान्द्र मण्डल में भुक्त होना पड़ता है । यहाँ आकर चान्द्ररस से संश्लिष्ट होकर ही ये पार्थिव प्रजा के उपादान बनने पाते हैं । दूसरे शब्दों में इसी स्थिति का इन शब्दों में भी अभिनय किया जा सकता है कि, आगत विविध भावापन्न श्राधिदैविक प्राणों के समन्वय से नानाभाव में परिणत चान्द्ररस ही नानाभावापन्न पार्थिव पदार्थों का उपादान बनता है । इस विविध प्राण भोग सम्बन्ध से ही चन्द्रमा ' विचक्षण ' नाम से व्यवहृत हुआ है । विचक्षण चन्द्रमा को स्वसृष्टि - प्रक्रिया साफल्य के लिए ऋतु का आश्रय लेना पड़ता है । बिना ऋतु के वह उपादान कर्म में सर्वथा असमर्थ है । तत्तद्ऋतुप्रारण के समन्वय से ही चन्द्रमा तत्तत् पदार्थों का उपादान बनता है । ऋतुकाल में ही चन्द्रमा स्वसौम्य रेत का आधान करता है । चन्द्रमा में रहने वाला सौम्यप्रारण पितर है । तद्य क्त सोमरस ही रेतोरूप में परिणत होता हुआ पुरुष-सृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । अतएव उस के लिए ' पित्र्यवतः ' कहना सर्वथा अन्वर्थ बनता है । शुक्लपक्ष में चान्द्ररस इन्द्र द्वारा अभिभूत है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अतएव इस पक्ष की चान्द्ररस - सम्पत्ति से पार्थिवप्रजा वञ्चित रहती है । यदि अनुशय - उच्छिष्ट - रूप से शुक्लपक्ष में चान्द्ररस का आगमन मान भी लिया जाय, तब भी पितृसहोभाग का आगमन तो इस पक्ष में असम्भव ही है । पञ्चदशकलोपेत - कृष्णपक्षाधिष्ठाता - पितृप्राणयुक्त चान्द्रसोम ही ऋतु के समन्वय से अन्न में प्रतिष्ठित हो कर रेतोरूप में परिणत होता हुआ पुरुष प्रसूति का कारण बनता है । क्योंकि शुक्लपक्ष में चान्द्रसोम देवप्राण- प्रधान रहता है । स्वगत पितृभाग का विकास कृष्णपक्षीय चान्द्रसोम ही माना गया है । इसी रहस्य को सूचित करने के लिए - ' पञ्चदशात् प्रसूतात् पित्र्यवतः ' कहा गया है । पिता में प्रतिष्ठित होता है । उस रेत की मातृ-वह चान्द्ररेत रेतः सेक करने वाले मुझ शोणितगत योषिदग्नि में आहुति होकर प्रजारूप में परिणति होती है । चान्द्र सम्वत्सर त्रयोदश ५७

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1 मासात्मक है । इस एक चान्द्र सम्वत्सर में गर्भ पूर्णावयव बनता है । चान्द्रभाग की दृष्टि: से यह पुरुष पितृप्राणमूर्ति है, ऋतुदृष्टि से ऋतुरूप है, शोणितदृष्टि से आर्त्तवरूप है । प्रकृत श्रौत वचन विस्पष्ट शब्दों में इसी चान्द्रसृष्टिप्राधान्य का समर्थन कर रहे हैं । ' चन्द्रमा के द्वारा पितृप्रारण का शुक्र में समावेश हुआ, वही सहोरूप चान्द्र भाग ऋण धन द्वारा प्रजातन्तुरूप में परिणत हुआ ' इस सिद्धान्त की रक्षा के लिए इस से बढ़ कर और क्या प्रमाण होगा । अब उन संहिता - प्रमाणों की मीमांसा अपेक्षित है, जो विस्पष्ट शब्दों में ' पितरः - सूनवः - श्रात्मधेयाः, तन्याः ', रूप से बीजी द्वारा प्रजातन्तु-वितान का समर्थन कर रहे हैं । ' सापिण्डच ' साप्तपौरुषम् ' की मौलिक उपपत्ति का विश्लेषण करते हुए महर्षि दीर्घतमा कहते हैं-१ - को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था विभर्त्ति । भूम्या सुरात्मा क्वस्वित् को विद्वांसमुपगात् प्रष्टुमेतत् ॥

-- पाकः पृच्छामि मनसाविजानन् देवानामेना निहिता पदानि ।

वत्से बष्कयेधि सप्ततन्तून् वितत्निरे काय श्रोतवा उ ॥

३ - चिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ।

वि यस्तस्तम्भ पडिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ॥

- ऋक्सं ० १ । १६४ । ४, ५, ६, मं ० ।

- माता पितरमृत वभाज धीत्य मनसा सं हि जन्मे ।

साबीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नभस्वन्त इदुपवाकमीयुः ॥

- ऋक्सं १ । १६४ । = । Y - स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे घुस ग्राहुः पदक्षण्वान्नविचेतदन्धः पुत्रः स ईमाचिकेत यस्ता विजानात् स पितुष्पितासत् ॥

६ - वः परेण पर एनावरेण पदा वत्सं विभ्रती गौरुदस्थात् ।

साद्रीची कंस्विदर्थं परागात् क्वाचित्सूते न हि यूथे श्रन्तः ॥

. - अवः परेण पितरं यो अस्यानुवेद पर एनावरेण ।

कवीयमानः क इह प्रवोचद्ददेवं मनः कुतो ग्रधिप्रजातम् ॥

I

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-ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः ।

इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति ॥

- ऋक्सं ० १ । १६४ । १६, १७, १८, १६, मं ० । वेदसिद्ध सामान्य परिभाषानुसार ' विज्ञान ' प्रतिपादक मन्त्रों के आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, तीनों पक्षों में अर्थ होते हैं, जैसाकि - ब्राह्मण प्रन्थोक्त ' इति नु - अधिदैवतम् ' – इतिन्व-ध्यात्मम्'– ' इति नु - अधिभूतम् ' इत्यादि वचनों से भी प्रमाणित है । इसी सामान्य नियम के अनुसार उक्त मन्त्रों का भी आधिदैविक - सौरमण्डल, आधिभौतिक पार्थिवविवर्त्त, आध्यात्मिक शारीर प्रपञ्च, तीनों के साथ समन्वय हो रहा है । सर्वश्री सायणाचार्य ने विशेषतः आधिद विक अर्थ का ही समादर किया है, जोकि समादर यज्ञेतिकर्त्त व्यता की दृष्टि से किसी सीमापर्यन्त मान्य कहा जा सकता है । वैध यज्ञकर्म पार्थिव विवत के आधार पर वितत हैं, पार्थिव यज्ञ श्रधिदैविक सौरयज्ञ के आधार पर वितत हैं, जैसाकि - " य " देवा अकुर्वंस्तत्करवाणि, देवाननु विधा वै मनुष्याः, देवानामिदवो महत्तदावृणीमहे, अविदाम देवान् स्वज्र्ज्योतिः " इत्यादि बचनों से प्रमाणित हैं । इसी यज्ञमूलता को सिद्ध करने के लिए आचार्य ने प्रायः आधिदैविक अर्थ का ही श्राश्रय लिया है । उदाहरण के लिए उक्त मन्त्र समष्टि में से द्वितीय ' पाकः पृच्छामि ' इत्यादि मन्त्र के भाष्य पर ही दृष्टि डालिए । “ विशुद्धहृदय- दम्भशून्य- मैं अपने मन से ( इस गभीरतत्त्व को ) न जानता हुआ ( जिज्ञासा रूप से ) प्रश्न करना हूँ कि, ये जो देवताओं के स्थान हैं, वे अत्यन्त निगूढ़ होने से संशयास्पद हैं । एक हायनात्मक इस आदित्य में सप्तसंस्थ सोमतन्तुओं को जानकर यजमान पिरोते हैं । अथवा सप्त-संस्थारूप तिर्यक् तन्तुसन्तान के लिए सात छन्दों का वितान करते हैं । " भाध्यकार का अभि प्राय यही है कि - " सूर्य में पारमेष्ठ्य सोम निरन्तर आहुत हो रहा है । इसी सोमाहुति से प्राकृ-तिक ( आधिदैविक ) सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोमयज्ञ का वितान हो रहा है, जिस के आधार पर यज्ञ-कर्त्ता यजमान वैध ज्योतिष्टोम यज्ञ का वितान करने में समर्थ होते हैं । सात संस्थाओं में विभक्त ज्योतिष्टोम ही सौर देवताओं के निगूढ पद हैं । अथवा जिन गायत्र्यादि सात छन्दों के आधार पर सौरप्राणदेवता यज्ञवितान करने में समर्थ होते हैं, वे छन्द ही देवताओं के निगूढ पद हैं " । उस आध्यात्मिक अर्थ की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसका ' सापिण्ड्य-विज्ञान ' से सम्बन्ध है । १ - को ददर्श ०. - ' प्रजातन्तुवितान ' के आलोडन - विलोडन से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, प्रत्येक पुरुष की उत्त्पत्ति उसके पिता के २१ सहोभागों के ऋण से हुई है । पुरुषोपलक्षित औप-५६

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श्राद्धविज्ञान पातिक आत्मा जब भी ' जायमान उपजायमानः ' ( कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत ) के अनुसार धरा-तल पर जन्म लेगा, अवश्यमेव उसे पिता के शुक्रगत २१ कलात्मक सहोभाग का ऋण लेना पड़ेगा । अब इस सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित होता है कि, यह जन्मभाव यदि सादि - सान्त - प्रवाह है, तो इसका मूलपुरुष कौन? । अवश्य ही उस समय हमारी विचारशक्ति कुटित हो जाती है, जब हम ' प्रथमं जायमानं को ददर्श ' पर दृष्टि डालते हैं । पिता- पितामह प्रपितामहादि सैंकड़ों, असंख्य-परम्पराओं को सामने रखते जाइए, सर्वत्र प्रथमजन्म ग्रहण करने वाले का अभाव मिलेगा । और मिलेगी यही परिस्थिति कि, २१ बीजी से लेकर ही पुत्रादि का जन्म हुआ है । सब से पहिला बीजी कौन, जिसने किसी से पितृसह: उधार न लेकर स्वयं अपने से ही सापिण्डय वितान का उपक्रम किया? | सबसे पहिला पपातिक आत्मा कौन, जिसे ऋण लेने की आवश्यकता न हुई हो, अपितु अयोनिज-भाव से जो अपने आप ही उत्पन्न हो गया हो, एवं जिसने वंशपरम्परा का विधान आरम्भ किया हो? । सचमुच न तो आज तक इस पहेली का समाधान ही हुआ, एवं न कोई जिज्ञासु इस प्रश्न को लेकर आज तक किसी विद्वान् सेपूँछने ही गया - - ' ' क्वस्वित् को विद्वांसमुपगात् प्रष्टुमेतत् ' । ' स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया ' न्याय से सृष्टिमर्यादा में अन्तर्भूत तत्त्वों के कारण ही मीमांस्य मानें गए हैं । इन्द्रियातीत- विश्वातीत प्रतर्क्स - अनिर्देश्य विषयों की मीमांसा प्रतिप्रश्न है । सर्वप्रथम जीवसृष्टि का उपक्रम कैसे, कहाँ से, क्यों हुआ? ये सभी प्रश्न- मानवीय बुद्धि से परे कीवस्तु है । ' यो s स्याध्यक्षः, परमे व्योमन् सोऽङ्ग वेद यदि वा न वेद " ( तैत्तिरीयब्राह्मण ) के अनुसार अतिप्रश्न सर्वथा अचिन्त्य हैं । ' को ददर्श ० ' इत्यादिमन्त्र ने इसी अचिन्त्यभाव का समर्थन किया है । निम्न लिखित वचन भी इसी स्थिति का समर्थक बन रहा है--अचिन्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ सापिण्ड्यभाव काय्र्यात्मक विश्वप्रपञ्च में अन्तर्भूत है । इसका मूलकारण मूलप्रकृति है, जिसका विचार सर्वथा अचिन्त्य है । ' प्रथमं जायमानं को ददर्श ' का उत्तर है - ' मूलकारणं न कोऽपि ददर्श । इस अचिन्त्य मूल बीजी से ( जिसे हम प्रथम जायमान कहेंगे ) जिस सापिण्ड्यभाव का वितान उपक्रान्त हुआ, कार्य्यभूत उस सापिण्ड्य की मीमांसा अवश्य ही चिन्त्यभाव है, जिसके भूमि, सु, अ, आत्मा, ये चार श्रेणि - विभाग माने गये हैं । पुरुष को ' आत्मा, शरीर ', इन दो मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है । आत्मा से शुक्रमय वह महानात्मा अभिप्र ेत है, जो औपपातिकः-आत्मा की आश्रयभूमि बनता है । पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर इस आत्मा की भूमि ( आयतन ) है । इस भूमि ( शरीर ) का स्वरूप रक्षक असु ( प्राण ) है । प्राणाग्नि जब तक शारीर भूतों में अन्तम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक शरीर सरक्षित रहता है । प्राणाभि की स्वरूपरक्षा अक् ६०

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प्रजातन्तुवितान ( रुधिर ) पर अवलम्बित है । हृदय के द्वारा जब तक रक्त का संचार होता रहता है, तभी तक प्राणानि सुरक्षित रहता है । रुधिर के प्रभूतमात्रा में निकल जाने पर शरीरयष्टि निश्चेष्ट होती देखी गई है । रुधिर की स्वरूपरक्षा, किंवा रुधिर सञ्चरण प्रक्रिया की स्वरूपरक्षा आत्मा ( चेतना ) पर अवलम्बित है । इस प्रकार भूमि - असु - असृक्- आत्मा, इन चारों का पारस्परिक उपकाय्र्योपकारक सम्बन्ध बना हुआ है । इन चारों में भूमि ( शरीर ), और असृक् ( रुधिर ), ये दो तो भूतप्रधान हैं, स्थूल हैं, अतएव अस्थिमत् हैं । असु ( प्राण ), आत्मा ( महान् ) दो प्राणप्रधान हैं, सूक्ष्म हैं, अतएव अन-स्थिमत् हैं । आश्चर्य है कि, एक बिना हड्डी वाले ने हड्डो वाले का भार अपने ऊपर वहन कर रक्खा है । सूक्ष्मजगत् स्थूल की प्रतिष्ठा बन रहा है । प्राणात्मक महानात्मा ही रुधिरात्मक शरीर की प्रतिष्ठा बन रहा है । अशरीर महान् ही सापिण्ड्यभाव का प्रवर्त्तक बनता हुआ शरीरों में प्रतिष्ठारूप. से प्रतिष्ठित हो रहा है । निम्न लिखित उपनिषच्छु ति भी शुक्रस्थित महानात्मा के इसी अशरीर - अन-स्थाभाव का स्पष्टीकरण कर रही है-२- पाकः पृच्छामि ०

शरीरं शरीरेषु, अनवस्थेष्ववस्थितम् ।

महान्तं विमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥

-१-जिन वस्तुतत्त्वों के मूलकारण विश्वगर्भ में मुक्त होने से चिन्त्य हैं, उनके सम्बन्ध में परीक्षा प्रश्न से सम्बन्ध रखने बाले जल्प का, तथा असूया से सम्बन्ध रखने वाली वितण्डा का भी समादर किया जा सकता है । परन्तु जिसका कारण अचिन्त्य है, उस से सम्बद्ध वस्तुतत्त्वों के सम्बन्ध में जिज्ञासात्मक वादप्रश्न ही श्रेयस्कर है । ऐसा जिज्ञासात्मक प्रश्न ही वेदभाषा में ' पाकः प्रश्न ' कहलाया है । पूर्वमन्त्र - व्याख्या में स्पष्ट किया जा चुका है कि, ' प्रथमं जायमानं ' का प्रश्न अचिन्त्य है । इसी से सिद्ध हो जाता है कि, विश्वमर्यादा में भुक्त कार्यात्मक सापिण्ड्यभाव के सम्बन्ध में अवश्य ही मीमांसा की जा सकती है, परन्तु ' पाकेन मनसा ' । कुतर्कबुद्धि से होने वाले प्रश्न कभी ऐसे तत्त्वों के निर्णायक नहीं बन सकते । इसी प्रश्नमर्यादा को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि ने ' सप्ततन्तुवितान ' का स्वरूप हमारे सामने रक्खा है । देवताओं के निगूढ ( परोक्ष ) पदों के सम्बन्ध में उत्तरगर्भित प्रश्न हुआ है, जो कि बेदशास्त्र की एक स्वाभाविक शैली है । आध्यात्मिक संस्था के अध्यक्ष, प्रजातन्तु - वितानकर्त्ता महानात्मा ही देवताओं से निगूढ पद हैं । एक पद नहीं, अपितु ७ पद हैं । आग्नेय - सौम्य, भेद से देवता दो भागों में ६१

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श्राद्धविज्ञान विभक्त हैं । दोनों की समष्टि ' अग्नीषोमीयदेवता ' नाम से प्रसिद्ध है । महानात्मा के आरम्भक शुक्र शोणित बतलाए गए हैं । शुक्र सौम्य है, शोणित आग्नेय है । इस दृष्टि से उभयमूर्त्ति बना हुआ महानात्मा क्योंकि शुक्र में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव इस में सोम का प्राधान्य है । अग्निगर्भित सोम ही महानात्मा की प्रधान प्रतिष्ठा है । यह सोम सौम्य चान्द्रप्राण से युक्त है, जिसे ' पितृ-सहः ' कहा गया है, एवं जिस की २८ कला बतलाई गई हैं । श्रष्टाविंशतिकल अग्निगर्भित सोम-मूर्ति महानात्मा की २८ कलाओं का बीजी- पुत्र - पौत्रादिरूप से सात तन्तुओं में वितान हुआ है । प्रकृत मन्त्र इसी सप्ततन्तु वितान का विश्लेषण कर रहा है । ' asar ' शब्द का अर्थ है ' तरुण ' । संस्कृत साहित्य में जिस अर्थ में तरुण, युवा, अप-त्य, आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उसी अर्थ में वैदिक भाषा में ' बष्कय, वष्कयरण, बष्कयणी ' आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं । प्रजातन्तु को वितत करने की शक्ति ( प्रजननशक्ति ) वष्कय से ही सम्बन्ध रखती है । उसी में उत्पादन योग्यता प्रतिष्ठित रहती है । ऐसे बष्कय ( तरुण ) वत्स ( पुत्र ) में अपने आप में प्रतिष्ठित ( पितृतन्तुओं को ) पुन- सन्तत करने के लिए कविलोग ( बीजीपुरुष ) वितत किया करते हैं, जिनके वितानों में देवताओं के पद निहित रहते हैं । पिता अपने पुत्र में ' ओत वै - उ ' प्रयोजन के लिए सात तन्तुओं का वितान करता है । पिता स्वयं वितान नहीं करता, अपितु कविलोग वितान करते हैं । भार्गवतत्त्व ही कवि है । महा-नात्मा में प्रतिष्ठित सौम्यप्रारण भार्गव होने से ' कवि ' हैं । यह भी एक नहीं, २८ हैं । इसीलिए ' कवयः ' प्रयुक्त हुआ है । इन्हीं के द्वारा तो २१-१५-१० - इत्यादि क्रम से सात पीढ़ी पय्यन्त वितान हुआ है । केवल पुत्र मेंहीं वितान नहीं होता, अपितु परम्परया पुत्र - पौत्र - प्रपौत्रादि ७ पर्य्यन्त वितान होता है । इसीलिए ' उ ' का प्रयोग हुआ है । इसप्रकार बीजी पुरुष अपने सहोभागों का पुत्रद्वारा सातवीं पीढ़ी पर्यन्त वितान करता है । बीजी के देवपद इस तननप्रक्रिया से सात स्थानों में निगूढरूप से प्रति-ष्ठ रहते हैं । इस दृष्टि से सिद्ध होजाता है कि, प्रकृतमन्त्र सप्ततन्तुवितानात्मक सापिण्ड्यभाव का ही समर्थक बन रहा है । ३ – अचिकित्त्वान् ० मन्त्रार्थ स्पष्ट है । " मैं स्वयं इस विषय में ऊहापोह करने में असमर्थ, उहापोह करने में समर्थ विद्वानों से इसलिए इस विषय में कुछ जानना चाहता हूँ कि, मैं स्वयं इस विषय से अन-भिज्ञ हूँ । जानने का विषय यही है कि- जिस एकने ६ रजों को अपने में बद्ध कर रक्खा है, उस का क्या स्वरूप है? ( महानात्मा का क्या स्वरूप है? ) । तन्तुवितानकर्म्म में एक मूलप्रतिष्ठा होती है, जिसके आधार पर बद्ध तन्तु आगे वितत होते हैं । बीजी पुरुष का महानात्मा ही वैसा मूलस्तम्भ है । जिसे आधार बना कर पुत्र - पौत्र - प्रपौत्र - वृद्धप्रपौत्र - प्रतिवृद्धप्रपौत्र वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र, ये ६ रज आगे II

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प्रजातन्तुवितान वितत होते हैं । सप्तपुरुषों में बीजी स्थिर धन होने से अस्थिर रजोमर्यादा से बहिर्भूतं मान लिया गया है । एवं स्थिर बीजी के आधार से प्रकान्त ६ पुरुष प्रक्रान्तिसम्बन्ध से ' रजांसि ' मान-लिए गए हैं । ४ - मातापितर ० बीजी के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा ६ रजो भागों के वैतानिक रूपों की मूलप्रतिष्ठा बनता है, यह पूर्वमन्त्र में कहा गया है । अब महानात्मा के आविर्भाव का इतिवृत्त बतलाया जाता है । माता ( पत्नी ) पिता ( पति ) के ऋतभाग को उस के शरीर से क्युत कर उसे अपने गर्भाशय में प्रतिष्ठित कर गर्भस्वरूप का आविर्भाव करने में समर्थ होती है । ' प्रजोत्पादनमहं करिष्ये ' इस प्राथमिक संकल्प से पुरुष ( पिता ) दाम्पत्य कर्म में प्रवृत्त होता है । स्त्री ( माता ) इस कर्म की अङ्गिनी बनती है । मिथुनभाव - प्रवृत्ति का प्रारम्भिक संकल्प ही प्रथम दाम्पत्यभाव है, मानस संयोग है । इसी के लिए - ' धीत्य मनसा सं हि जग्मे ' कहा गया है । इस प्राथमिक मानसिक संगम के अन न्तर दोनों का भौतिक ( शारीरिक ) सङ्गम होता है । मातृगत शोणित अग्निप्रधान होने से पितृगत सौम्य शुक का स्वभावतः आकर्षक है । इस मातृगत शोणिताग्नि के आकर्षण से पिता के शरीर में विद्युत् - संचार होता है । फलतः शुक्र में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है । क्षुब्ध शुरू इस प्रकार माता. के आकर्षण से पिता के शरीर से च्युत हो जाता है । पतत्त्व ही ऋत है, जिस के ' आपः - वायुः-सोमः ' भेद से तीन विवर्त्त माने गए हैं । शुक्र में आपोभाग प्रत्यक्ष है, एवयामरुत् नामक रेतोधा वायु अनुमेय है, २८ सौम्यप्राणावच्छिन्न सोमभाग प्रत्यक्ष है । इसी ऋतसम्पत्ति के कारण शुक्र को ' ऋत ' कहा गया है । दाम्पत्यभाव - कामुका वह स्त्री पुरुष - शरीर के साथ ऐक्य भाव में आती हुई शुक्रग्रहण-काल में कम्पित हो जाती है । यही इसका गर्भरसकाल ( शुक्रग्रहणकाल ) है । इस समय शुक्र शोणित का परस्पर प्रो - प्रोत भाव होता है, यही इस का ' नितरां ' विद्धकाल है । पुत्राधिक्य से पुरुष-सन्तान, स्त्री राधिक्य से कन्या सन्तान, उभयसाम्य से नपुंसक सन्तान, यथापरिस्थिति तीनों एक सन्तान गर्भीभूत हो जाती है । गर्भीभूत इन सन्तानों का पोषण मातृभुक्त अन्नद्वारा होता ' है, अतएव गर्भस्थ गर्मी की ' नमस्वान् ' ( अन्नवान् ( गर्भस्थ ) संज्ञा हो जाती है । ये नमस्वन्त तीनों में से एक सन्तति ) वाग्व्यवहार के योग्य हो जाते हैं । अर्थात् गर्भधारणानन्तर लोक में इन गर्भों के लिए - ' आशा है, लड़का लड़की होने वाला है ' इत्यादि लोकोक्तियाँ प्रचलित हो जातीं हैं । अथवा स्थूल - शुक्र- शोणित के मिथुनभाव में आना ही इस औपपातिक आत्मा का धामच्छद वाक्-तत्त्व से युक्त हो जाना है । निष्कर्ष यही हुआ कि, माता के शोणिताग्नि के आकर्षण से पिता के ऋतभाग ( शुक्र ) में विच्युति भाव का समावेश हो जाता है । वही शुक्राहुति मातृगर्भाशय में प्रविष्ट ६३

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान हो त्यरूप ' परिणत होती है । यही अपत्य महानात्मा की प्रतिष्ठा बनता है, जिसमें कि सपि -एडता प्रवर्त्तक २८ कल पितृसह: पिएड सुरक्षित हैं । ५ – स्त्रियः सतीस्ताँ उ ० ४ ---अनतत्त्व वृषा है, यही पुरुष है, । सोमतत्त्व योषा है, यही स्त्री है । पुरुष का शरीर भूताभिधान होने से वृषा है, अतएव शरीरदृष्ट्या पुरुष पुरुष है । स्त्री का शरीर भूतसोमप्रधान होने से योषा है, अतएव शरीरदृष्ट्या स्त्री स्त्री है । पुरुष का शरीर आग्नेय है, अतएव वह पुरुष है । स्त्री का शरीर सौम्य है, अतएव वह स्त्री है । एवं इस भूतानि भूतसोम से सम्बद्ध शरीरों की दृष्टि से पुरुष को पुरुष कहना, स्त्री को स्त्री कहना यथार्थ है । परन्तु प्रतिष्ठामि तथा प्रतिष्ठासोम की दृष्टि से जब विचार किया जाता है, तो मानना पड़ता है कि, पुरुष वास्तव में स्त्री है, एवं स्त्री वास्तव में पुरुष है । पुरुष के आग्नेय शरीर की प्रतिष्ठा शुक्र माना गया है । शुक्रसत्ता ही पुरुष सत्ता का कारण है । शुक्र सौम्य है । सोम उक्त परिभाषानुसार योषास्थानीय बनता हुआ स्त्री तत्व है । क्योंकि सौम्य स्त्रीतत्त्व शुक्ररूप से पुरुष की प्रतिष्ठा है, अतएव इस शुक्रप्रतिष्ठादृष्टि से आग्नेयशरीरावच्छिन्न पुरुष को पुरुष न कह कर स्त्री ही कहा जायगा । उधर स्त्री के सौम्य शरीर की प्रतिष्ठा शोणित माना गया है । शोणित आग्नेय है । अनि उक्त परिभाषानुसार वृषास्थानीय बनता हुआ पुरुषतत्त्व है । क्योंकि आग्नेय पुरुषतत्व शोणितरूप से स्त्री की प्रतिष्ठा है, अतएव इस शोणितप्रतिष्ठादृष्टि से सौम्यशरीरावच्छिन्ना स्त्री को स्त्री न कह कर पुरुष ही कहा जायगा । विशेषतः - महानात्मजनक दारपत्यभाव की दृष्टि से तो यही व्यवहार समीचीन माना जायगा । क्योंकि पुरुषशरीर - स्त्रीशरीर के मिथुनभाव से गर्भस्थिति नहीं होती । अपितु पूर्वमन्त्रकथनानुसार आग्नेय पुरुष के सौम्यशुक्र, तथा सौम्या स्त्री के आग्नेय शोणित के समन्वय से ही गर्भस्थिति होती है । इस प्रजनन कर्म की दृष्टि से पुरुष शुक्रावच्छेदेन स्त्री है, जिसे शरीरदृष्ट्या हम पुरष कहा करते हैं । स्त्री शोणितावच्छेदेन पुरुष है, जिसे शरीरदृष्ट्या हम स्त्री कहा करते हैं । इसी मध्यम दृष्टि को लक्ष्य में रख कर ऋषि ने कहा है- " स्त्रियः सतीस्ताँ उ में पुस आहुः " । जिस प्रकार ने पुरुषशरीर, तथा सौम्य स्त्रीशरीररूप पुरुष - स्त्री का प्रथम युग्म ' गर्भ-स्थिति का कारण नहीं है, एवमेव पुरुष का सौम्यशुक्र रूप स्त्रीतत्त्व, स्त्री का आग्नेय शोणित रूप पुरुषतत्त्व, स्त्री - पुरुष का ( जिसे लोकव्यवहार में शरीरहड़या पुरुष स्त्री का ) युग्म कहा जाता है, वस्तु-गत्या इस द्वितीय युग्म से भी गर्भस्थिति नहीं होती । अपितु एक तीसरे ही ' योषा - वृषा ' के युग्म से प्रजननकर्म्म सम्पन्न होता है, जिसे श्रुति ने ' कविपुत्र ' कहा है । शुक्र सौम्य है, इस दृष्टि से पुरुष स्त्री है, यह मान लिया । परन्तु सौम्य शुक्र गर्भ में प्रतिष्ठित रहने वाला ' पु'भ्रूण ' आग्नेय. ६४