Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 151–160

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 151–160

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् इत्यादि वचनों के अनुसार सवर्ण मातापिता के द्वारा उनकी इच्छा से निश्चित धनराशि देकर क्रय क्रिया हुआ पुत्र ' क्रीतपुत्र ' कहलाया है । ' यावद्वित्तं तावदात्मा ' इस श्रौतसद्धान्त के अनुसार इस क्रीत पुत्र के साथ क्रयकर्त्ता के भूतात्मा का वित्त द्वारा सम्बन्ध हो जाता है । इसी आधार पर राजर्षि हरिश्चन्द्र ने अपने वरुणयज्ञ में स्वपुत्ररक्षार्थ अजीगर्त्त को निश्चित धनराशि देकर शुनःशेप को अपना क्रीतपुत्र बना कर इससे वरुणप्रसाद प्राप्त किया था । ६ - स्वयंकृतः ( कृत्रिम: ) -किसी सवर्णवंश में कोई योग्य पुत्र विद्यमान है । माता - पिता उसके मर चुके हैं । ऐस मातृपितृविहीन सवर्णपुत्र को स्व - धन क्षेत्रादि के प्रलोभन द्वारा अपना पुत्र बना लेना ही ' कृत्रिम ' विधि है । ` पुत्रार्थी स्वयं अपनी कामना से इसे पुत्र बनाता है, अतएव ' कृत्रिमः स्यात् स्वयंकृतः ' ( या १३१ ) के अनुसार इस कृत्रिमपुत्र को ' स्वयंकृतः ' भी कहा जा सकता है । १० - स्वयंदत्तः ( दत्तात्मा एक सवर्ण मातापिता का पुत्र माता - पिता के निधन से, अथवा उनके भरणपोषणासामर्थ्य से, अथवा तो ओर किसी कारण से अनाथ बन जाता है । ऐसा अनाथ आश्रय खोजता हुआ सवर्ण-दम्पती के आश्रय में पहुँचता है । वहाँ पहुँच कर — ' मैं आज से आपका धर्मपुत्र हूँ, मुझे श्राश्रय दीजिये ' कहता हुआ पुत्रत्त्वेन शरण आ जाता है, वही ' दत्तात्मा तु स्वयं दत्त: ' ( या ० ८।१३१ ) के ' अनुसार ' दत्तात्मा ' कहलाया है । इसे ही लोक में ' पोष्यपुत्र ' भी कहा गया है । धर्म्मपुत्रवत् धर्म्म-पिता, धर्म्ममाता धर्म्मभ्राता, धर्मभगिनी, इत्यादि व्यवहार भी यहाँ प्रसिद्ध है । ११ - सहोढजः -१०. " गर्भे विन्नः सहोढजः " ( या ० १३१ ) । " या गर्भिणी संस्क्रियते, तस्यां जातः सहोढः पुत्रो भवति " ( वसिष्ठः ) इत्यादि के अनुसार गर्भिणी का पुत्र ( जो कि गर्भिणी बन कर ही विवाहित होकर पति के घर जाती है, उसका सवर्णपुत्र ) ' सहोज ' कहलाया है । यह पुत्र भी ' बीजाद्योनिर्बलीयसी ' इस मानव सिद्धान्त के अनुसार वोढा का ही पुत्र कहलाया है । -११ ---१०३

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१२- अपविद्ध: -श्राद्धविज्ञान " उत्सृष्टो गृह्यते यस्तु सोऽपविद्धो भवेत् सुतः " ( या ८ । १३२ । ) के अनुसार माता - पिता की निर्दयता से घर से निकाला हुआ पुत्र गृहीता का पुत्र बनकर ' अपविद्ध ' कहलाया है । -१२-इस प्रकार धर्मशास्त्र ने १२ पुत्रों का उल्लेख किया है । वसिष्ठ की दृष्टि में स्वयंकृत-रूप कृत्रिमपुत्र, तथा • स्वयं दत्तलक्षण दत्तात्मा, दोनों अभिन्न हैं । इन मतानुसार शूद्रापुत्र १० वाँ होता है । इन में से औरसपुत्र को छोड़ कर शेष ११ पुत्र तन्तुवितानलक्षण सापिण्ड्यभाव के रक्षक है, अथवा नहीं?, यह मीमांस्य विषय है । प्रकृत में तो इस पुत्रभेदसन्दर्भ से यही कहना है कि, धर्माचार्यो की दृष्टि में श्रानृण्यभाव के लिए प्रजोत्पादन एक आवश्यक कर्म है, जिसका स्वयं श्रोताचायों ने भी बड़े आटोप के साथ समर्थन किया है । पुत्रोत्पादन के सम्बन्ध में स्वयं श्रुति ने जो फलसन्दर्भ हमारे सम्मुख रक्खा है, वह भी प्रसङ्गतः जान लेना सामयिक ही मान लिया जायगा । प्रजोत्पादनादेश-१ - " अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम् । इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकाम! " — ऋक्सं ० १० । १८३ । १ ।. पुरुषसृष्टि के मूलाधाररूप तन्तुवितान के द्रष्टा महर्षि प्राजापत्य पुरुष को सम्बोधन करते हुए, पुत्रोत्पादन कर्म को इस के लिए आवश्यक मानते हुए आदेश दे रहे हैं कि - " हे पुरुष! हे पुत्रकाम! मैनें अपने विज्ञानचक्षु से यह देख लिया है कि, तू अपने शुक्रस्थ महानात्मा से चेकि-तान ( कर्म्मक्रियमाण ) है । उसी महानात्मा के ( अपने पिता के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा के ' प्रज-रूप तप ( भ्यन्तर व्यापार ) से, किंवा महानात्मानुगत पितृसहः के दानलक्षण तप से उत्पन्न हुआ है, एवं उसी तप से ( महानात्मगत तन्तुवितान से ) तू इस पृथिवी पर ( तन्तुसम्पत्ति ले कर ) व्याप्त हुआ है 1 । ऐसी दशा में मेरा यह आदेश है कि ( उस तपोरूप तन्तु की रक्षा के लिए, वितान के लिए ) इस पृथिवी पर प्रजा, और सम्पत्ति से रममाण बनता हुआ प्रजा उत्पन्न कर ” । २ – अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम् । उप मामुच्चा युवतिर्वभूयाः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकामे! ” ऋक्सं ० १० | १८३ । २ ) । * एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ) १०४

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् शुक्राहुति क्षेत्रभूता पत्नी को सम्बोधन करते हुए ऋषि कहते हैं कि, " हे स्त्री! -पुत्रकामे! मैनें यह जान लिया है कि, ऋतुकाल में तू पुरुष के साथ दाम्पत्यभाव की इच्छा रखती है । ' मैं चाहता हूँ कि, तू तरुणी बने, एवं इस दाम्पत्यभाव से प्रजा उत्पन्न करे, ( इस प्रकार तुम दोनों प्रजा-तन्तु का वितान करो । यही तुम्हारे महानात्मा का तप है, इसी तप के द्वारा तुम्हारे तन्तु विश्व में व्याप्त होंगे ) । ” -अहं गर्भमदधामोषधीषु, अहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः । जानयं पृथिव्यां अहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान " - ऋक्सं ० १० / १२ः | " लो at a fear: ' ( शत ० १३३८ | १ | २० ) के अनुसार पितृप्राणमय चान्द्रसोम से उत्पन्न ही सर्वप्रथम पितृप्राण प्रतिष्ठित होता है । यही भावी संतति का प्रथम ओषधी में गर्भाधान है । ओषधि ( अन्न ) द्वारा यह पुरुष में गर्भीभूत होता है, जैसाकि – ' पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भी भवति ' ( ऐ ० आ ० ) इत्यादिरूप से पूर्वप्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । पुरुष के द्वारा शुक्राहुतिरूप में परिणत तन्तु कालान्तर में विश्वगर्म की वस्तु बन जाता है । इसी तन्तुसमष्टि के द्वारा परम्परया आहुत हुआ यह धन पुत्र - पौत्रादि अन्य पुत्रों का उपादान बनता है " । * ऋक्संहितापठित उक्त तीन मन्त्रों से मन्त्रर्षि की ओर से जिस प्रजोत्पादनकर्म का आदेश हुआ है, ऋब्राह्मण ने उसी आदेश का बड़े विस्तार के साथ उपबृंहण करते हुए पुत्रसन्तति की वश्यकता का समर्थन किया है । सुप्रसिद्ध ' हरिश्चन्द्राख्यान ' के द्वारा ही भगवान् ऐतरेय ने उन फलश्रुतियों का स्पष्टीकरण किया है, जिनका स्मृतिग्रन्थों में यत्र - तत्र समर्थन प्राप्त होता है । कथानक योंवित हुआ है-पुत्र माहात्म्य प्रदर्शक वैदिक आख्यान-“ इक्ष्वाकुवंशोद्भव, अतएव ' ऐच्वाक ' नाम से प्रसिद्ध, वेधस के पुत्र, अतएव वैधस नाम से व्यवहृत सत्यवादी राजर्षि हरिश्चन्द्र एक सुप्रसिद्ध धर्मात्मा राजा हो गए हैं । आपके यद्यपि १०० पत्नियाँ थीं, परन्तु दुर्भाग्य से पुत्र एक से भी प्राप्त नहीं हुआ । सुप्रसिद्ध पर्वत तथा नारद महर्षि सदा आपके ही समीप पुरोहित के रूप से निवास करते थे । एकबार हरिश्चन्द्र ने नारद महर्षि को लक्ष्य बनाते हुए: उनसे प्रश्न किया कि-१०५

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श्राद्धविज्ञान " यं न्विमं पुत्रमिच्छन्ति ये विजानन्ति ये च नः । किंस्वित् पुत्रेण विन्दते तन्म आचच्च नारद! " । इस पुत्र से इन हैं?, इन प्रश्नों रक्खे | " हे महर्षे! क्या मूर्ख, क्या विद्वान्, सभी पुत्र की कामना किया करते हैं । पुत्रैषणा रखने वालों को क्या लाभ होता है?, क्यों ये पुत्र के लिए इतना प्रयास करते का समाधान कीजिए " । हरिश्चन्द्र ने प्रश्न किया एक, नारद ने १० उत्तर राजर्षि के सम्मुख नारद कहने लगे-- "

ऋणमस्मिन् संनयत्यमृतत्त्वं च गच्छति ।

पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चेञ्जीवितो मुखम् ॥

" पुत्रोत्पादन कर्ता बीजी पिता शुक्रस्थ महानात्मा में ऋणरूप से प्रतिष्ठित ५६ पितृसहों में से ३५ सहों का ऋण का उत्तरदायित्त्व पुत्र पर डालता हुआ नृणी बन जाता है । स्वयं अपनी २८ धनमात्राओं में से २१ का प्रदान करता हुआ पृथिवी पर स्वप्रतिष्ठा से अंशात्मना प्रतिष्ठित होता हुआ निधनानन्तर सात कल से चन्द्रलोक ( अमृतलोक - सोमलोक ) में अपत्यप्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित हो जाता है " । इस प्रकार श्रनृण्य, उभयलोकप्रतिष्ठा, ही पुत्रकामना का प्रथम फैल है । " प्रथातः संप्रत्तिर्यदा मन्ते, पुत्रमाह - त्वं ब्रह्म, त्वं यज्ञः, त्वं लोकः 1 । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते " इत्यादि वचनान्तर भी इसी फलश्रुति का समर्थन कर रहे हैं । -१. - " यावन्तः पृथिव्यां भोगा यावन्तो जातवेदसि । यावत प्राणिनां भूयान् पुत्रे पितुस्ततः ॥ " । " पृथिवी, जातवेदा नामक अग्नि, एवं पानी, इन तीनों में प्राणिवर्ग के लिए जितने भोग हैं, एक पिता के लिए उसके पुत्र में इन सब से अधिक भोगसामग्री विद्यमान हैं । स्थूलशरीर पार्थिव है, सूक्ष्मशरीर अर्थविज्ञानानुगत, अतएव जातवेदा नाम से प्रसिद्ध प्राणाग्नि है, एवं कारणशरीर ' पोमय महान है । तीनों शरीरों से अतिरिक्त प्राणी के लिए भोग्य ओर क्या बच रहता है । परन्तु एक पुत्र का महत्त्व इन तीनों से भी अधिक इसलिए है कि, स्थूल, सूक्ष्म शरीरों की प्रतिष्ठारूप पोमय महानात्मा की पूर्णता, श्रनृण्य, उभयलोक प्रतिष्ठा एकमात्र पुत्रोत्पादन पर ही निर्भर है । अतएव इसे पिता का सर्वश्रेष्ठ भोग ( आत्मवित्त ) कहा जा सकता है । "

२--- " शश्वत् पुत्रेण पितरोऽत्यायन बहुलं तमः ।

आत्मा हि जज्ञ आत्मनः स इरावत्यतितारिणी " ॥

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् " स्वप्रभवभूत चान्द्रलोक में प्रतिष्ठित सहः प्रारणात्मक पितर स्वांशभूत पुत्रद्वारा प्रदत्त पिण्ड से प्रति कन्यालय श्राद्धपक्ष में चान्द्रज्योतिर्लक्षरण बलप्राप्त करते हुए अपूर्णतालक्षण तम को हटाते रहते हैं । इस बलप्राप्ति का कारण यही है कि, पुत्र स्वयं पिता का अंश है । इसका उस पितर के साथ चन्द्र-नाड़ी द्वारा अविच्छिन्न सम्बन्ध वना रहता है । इसी सम्बन्ध सूत्र द्वारा पुत्रप्रदत्त रस तत् - पिता-पितामहादि पितरों में बलाधान का कारण बनता है । इसके अतिरिक्त पुत्रप्रदत्त वैतरणीदान से चन्द्रलोक में जाते हुए पितर ' इरावती ' नाम की व्योम नदी का सन्तरण करने में समर्थ होते हैं । " -३

४ - " किं नु मलं किमजिनं किमु श्मश्र णि किं तपः ।

पुत्रं ब्रह्माण इच्छध्वं स वै लोकोऽवदावदः " ॥

" मलोपलक्षित गृहस्थाश्रम, अजिनोपलक्षित ब्रह्मचर्याश्रम, श्मश्रुपलक्षित वानप्रस्थाश्रम, तथा तप उपलक्षित सन्यासाश्रम, ये चार आश्रम व्यक्तिप्रतिष्ठा के व्यक्तिविकास के कारण माने गए हैं । साधक ब्रह्मचर्याश्रम के द्वारा साध्य गृहस्थाश्रम से द्विजाति अपनी आध्यात्मिक कर्मकला को पूर्ण बनाता है । एवं साधक वानप्रस्थाश्रम द्वारा साध्य संन्यासाश्रम से ज्ञानकला को पूर्ण बनाता है । इस प्रकार श्राश्रमचतुष्टयी के अनुगमन से यह पूर्ण बन जाता है । यही इसका अपवादरहित परमपुरुषार्थ है, अनन्य भयलोक प्रतिष्ठा है । परन्तु सापिण्ड्यविज्ञानवेत्ताओं का इस सम्बन्ध में यह निर्णय है कि, बिना पुत्र के चारों आश्रम व्यर्थ हैं । पुत्र परम्परा के बिना चारों का कोई महत्त्व नहीं । पुत्र ही वस्तुतः अपवाद रहित लोकप्रतिष्ठा है । बिना इसके पूर्णता असम्भव है । "

R -- " न ह प्राणः शरणं ह वासी रूपं हिरण्यं पशवो विवाहाः ।

सखा ह जाया कृपणं ह दुहिता ज्योतिर्ह पुत्रः परमे व्योमन् " ॥

" अन्नोर्कप्राणानामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञः ' के अनुसार भुक्तान्न शारीराग्नि में हुत हो कर पहिले बलप्रद ' ऊकु ' नामक रस विशेष में परिणत होता है, अनन्तर ऊकूरस श्रप्रवर्तक प्राण-रूप में परिणत होता है । यही अन्नात्मक, किंवा प्रारणात्मक आध्यात्मिक यज्ञ शरीर की अन्तःप्रतिष्ठा ( जीवन ) का कारण है । वस्त्र शरीर की बाह्यप्रतिष्ठा के कारण हैं । अलङ्कार सौन्दर्य के कारण हैं । गो - श्व- आदि पशु बहिर्वित्तस्थानीया जाया की भाँति बाह्यभोग के कारण हैं । विवाहसम्ब-न्धेन परिणीता जाया जीवनसङ्गिनी है । इस प्रकार लोकयात्रा में केवल कन्या को छोड़ कर अन्न, वस्त्र, हिरण्य, पशु, जाया, सभी सुख के साधन हैं । परन्तु पुत्रसुख की तुलना में ये सब सुख वर-कक्षा में हीं प्रतिष्ठित माने जायँगे । कारण यही है कि, अन्नादिसुख केवल ऐहलौकिक सुख हैं । उधर १०७

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श्राद्धविज्ञान पुत्र ऐहलौकिक सुख साधन के साथ साथ चान्द्राकाशलक्षण पारलौकिक सुख का भी साधन बन रहा है, मन्त्रार्थ स्पष्ट किया जा चुका है । जैसा कि -'अमृतत्त्वं च गच्छति ' इत्यादि से प्रथम

- पतिर्जायां प्रविशति गर्भो भूत्वा स मातरम् ।

तस्यां पुनर्नवो भूत्त्वा दशमे मासि जायते ॥

" स्मरण रखना चाहिए कि, पुत्र पिता का साक्षात् रूपान्तर है । मनुष्य का यह स्वभाव है कि, वह विश्व में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया करता है । उस की निर्बलता मानिए, अथवा प्राकृतिक स्वभाव कहिए, मनुष्य अपनी दृष्टि में अपने आप को अन्यों की अपेक्षा बड़ा - बुद्धिमान् समझता है । साथ ही अन्य पुरुषों की उत्कृष्टता से ईर्ष्या रखता है । परन्तु पुत्र के प्रति सर्वथा विपरीत भावना रहती है । पुत्र ज्यों ज्यों पिता से उत्कृष्ट होता जायगा, त्यों त्यों पिता का अन्तरात्मा विकसित होता जायगा । क्यों?, क्यों नहीं यहाँ उक्त प्राकृतिक नियम युक्त होता? | उत्तर स्पष्ट है । अन्य के प्रति ईर्ष्या बतलाई गई है । पुत्र तो स्वयं इस का आत्मा है । पिता ही पुत्र है । पुत्र की यशः श्रीवृद्धि पिता की ही यशः श्रीवृद्धि है । अपने पुरुषाकार से पिता अपनी स्त्री का जहाँ पति है, वहाँ रेतोरूपाकार से यही अपनी स्त्री का पुत्र बनता है । पुरुषाकार की दृष्टि से जाया अपने पति की पत्नी है, किन्तु रेतोरूपाकार की दृष्टि से वही अपने पति की माता है । स्वयं पिता रेतोरूप से आहुत हो कर दशमासानन्तर पुत्र रूप से धरातल पर प्रतिष्ठित होता है । ' आत्मनस्तु कामाय ० ' सिद्धान्तानुसार हम स्वयं अपने लिए अतिशयरूप से प्रिय हैं । पुत्र हमारा ' ही रूपान्तर है । श्रतएव आत्मवत् प्रिय है । भला ऐसे पुत्र की आवश्यकता कौन स्वी-कार न करेगा । " ६

- " तज्जाया जाया भवति यदस्यां जायते पुनः ।

आभृतिरेषा भृतिर्बीजमेतन्निधीयते " ॥

" एक योग्य पति अपनी पत्नी को ' जाया ' समझता है, आभूति मानता है, भूति कहता है । • पति को स्मरण रखना चाहिए कि, उस का यह समझना, मानना, कहना एकमात्र पुत्रोत्पत्ति पर ही * लोकगीतों से प्रसवानन्तर मङ्गलगान होता है । उसमें - ' थे तो ' जाया ' छ लाडन पूत ' यह वाक्य आता है | ' हे पुत्रवती! तुमने प्रिय पुत्र उत्पन्न किया है, अतएव तुम सचमुच ' जाया ' हो, यही इसका तात्पर्य है । यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, लोकगीतसाहित्य में केवल इसी अवसर पर पुत्रवती के लिए ही ' जाया ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । १०८

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प्रमोचनोपायोपनिपन निर्भर है । ' अस्यां रेतोरूपेण जायते ' ही जाया शब्द का निर्वचन है । बिना पुत्र के जाया को जाया समझना - व्यर्थ है । ‘ भवत्यस्यां पुत्ररूपेण पतिः ' यह भूति शब्द का निर्वचन की है, सार्थकता एवं - ' रेतो- भी रुपेण - ' ' - गत्य भवति पुत्ररूपेण पतिः ' यह आभूति शब्द का निर्वचन है । इन पुत्रोत्पादन पर ही अवलम्बित है । " - " देवाश्चैतामृपयश्च तेजः समभरन् महत् । देवा मनुष्यानब्रुवन्नपा वो जननी पुनः " " " प्रकरणारम्भ में ' ऋण ' का परिचय कराते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि, आपोमय पार मेष्ठ्य महान् के गर्भ में इस ओर के सौर देवतत्त्व का, उस ओर के स्वायम्भुव ऋषितत्त्व का समावेश है, स्वयं महान् पितृतत्त्व प्रधान है । इस प्रकार शुक्रस्थ महानात्मा ज्ञानतन्तुप्रवर्त्तक ऋषि, यज्ञतन्तुप्रवर्त्त के देव, दोनों तत्त्वों से युक्त हो कर ही स्वपितृतत्त्व से प्रजातन्तुवितान में समर्थ होता है । यह । इस महान् की महत्ता है । सामान्य मनुष्य समझते होंगे कि, पुत्रोत्पादन से केवल पितृ-ऋण से ही मुक्ति होती है । परन्तु उन्हें यह नहीं भुला देना चाहिए कि, पितृऋण के साथ साथ आगत ऋषि, देवमात्रा द्वारा यही पुत्र इन दोनों का भी आंशिकरूप से परिशोध कर देता है । पुत्र द्वारा न केवल पितृवंश का ही वितान होता, अपितु ज्ञानधारा, यज्ञधारा भी परम्परया प्रवाहित रहती है । पुरुष के शुक्र में प्रतिष्ठित त्रिमूर्त्ति इसी महानात्मा को लक्ष्य में रखते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि, हे मनुष्यो! यही स्त्री तुम्हारी जननी है । अर्थात् इसे पुत्रोत्पादन द्वारा जननी बनाते हुए ही तुम ऋत्री का परिशोध कर सकते हो । " ६ - " नापुत्रस्य लोकोऽस्ति इति तत् सर्वे पशवो विदुः । . तस्मात्तु पुत्रो मातरं स्वसारं चाधिरोहति ” । “ मानव प्रजा पुत्र को उभय लोकप्रतिष्ठा का कारण समझे, इस में कौन सा क्या आश्चर्य है, जब कि पशु प्रजा को भी ( जिसे अपूर्ण प्रज्ञ कहा जाता है ) पुत्र का माहात्म्य प्रकृत्या विदित है । एक-मात्र इसी पुत्रैषणा से प्रेरित हो कर इन का दाम्पत्यभाव प्रक्रान्त है । पशु - पक्षी - कृमि - कीट- सभी वसन्तति के प्रति कैसे आकर्षित हैं? इस प्रश्न समाधि के लिए गोष्ठान पर जाइए, जहाँ गाय अपने नवजात वत्स को चाटती है, वत्स माता को चाटता है । चिड़ियाओं के घोंसलों पर दृष्टि डालिए, किस लाड़ - प्यार से पालन - पोषण होता है । इस प्रकार प्राणिमात्र स्वभावतः पुत्र की ओर १०६

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श्राद्धविज्ञान आकर्षित हैं । बिना पूत्र के घर अंधेरा है, बाहर अंधेरा है, सर्वत्र अंधेरा है । ' ना पुत्रस्य लोकोऽस्ति सर्वथा सत्य उद्घोष है । "

१० - एष पन्था उरुगायः सुशेवो यं पुत्रिण आक्रमन्ते विशोकाः ।

तं पश्यन्ति पशवो वयांसि च तस्मात्त मात्रापि मिथुनी भवन्ति " ॥

" पुत्र - पौत्रादि रूप से प्रजातन्तु वितान कर स्वप्रभवरूप चान्द्रलोक की ओर जाने वाले प्रोत-पिता - पितामहादि का यह दिव्यलोक वैज्ञानिकों के द्वारा उपस्तुत है, सुख की प्रवासभूमि है । किन पितरों के लिए?, जो शोकरहित हैं । कौन पितर शोक रहित हैं?, जो ' पुत्रिण: ' हैं । कौन से पितृलोक का यशोगान होता है?, जिन में ऐसे पुत्री, अतएव विशोक पितर जाते हैं । किन पितरों के लिए वह लोक सुशेव ( सुष्ठु रूपेण - सुखरूपेण निवास योग्य ) है?, जिन्होंने प्रजातन्तु का वितान किया है । ऐसे लोक की प्राप्ति के लिए क्या एक पूर्णप्रज्ञ मनुष्य अपनी पत्नी के साथ दाम्पत्य सम्बन्ध नहीं करेगा, जब कि केवल पुत्रप्रेम के नाते अपूर्णप्रज्ञ पशु अपनी जननी तक से मिथुन भाव को प्राप्त होते जाते हैं " । .१०. इस प्रकार राजर्षि के एक प्रश्न पर ब्रह्मर्षि ने १० समाधान कर अन्त में राजर्षि को आदेश दिया कि, हरिश्चन्द्र! तुम्हें पुत्रप्राप्त्यर्थ वरुणयज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए । आदेशा-नुसार राजर्षिने वरुणसव का अनुगमन किया । फलस्वरूप कालान्तर में ' रोहित ' नामक पुत्र ने पिता के पुत्रभाव जनित क्षोभ को शान्त किया " ( ऐ ७ ब्रा ३३ । २ ) इन्हीं सब फलश्रुतियों का एक ही मन्त्र में संग्रह करते हुए वेदमहर्षि ने कहा है-" ताई बद्धन्ति मास्य पौंस्यं नि मातरा नयति रेतसे भुजे । दधाति पुत्रोऽवरं परं पितुर्नाम तृतीयमधिरोचने दिवः ” ॥ - ऋक्सं ० ९ । १५५ । ३ । ऐहलौकिक दृष्टि से पुत्रोत्पादन का क्या फल है?, इस प्रश्न के सम्बन्ध में हमें विशेष वक्तव्य नहीं है । प्रकृत सन्दर्भ से हमारा लक्ष्य एकमात्र पारलौकिक दृष्टि से सम्बद्ध आनृण्य कर्म है । यदि पुरुष के पुत्र उत्पन्न न हो, तो दो प्रकार से इस की महत् संस्था का पतन है । पर-परया ऋणरूप से प्राप्त ५६ पितृसहों में से ३५ कलाओं का ऋणपरिशोध पुत्र के अभाव में असम्भव है, यही महानात्मा का प्रथम पतन है । इस के अतिरिक्त २ पितृसहः इस में स्वतन्त्ररूप से धन-रूपेण प्रतिष्ठित होते हैं । पुत्र के अभाव में भी पूर्व प्रकरणोक्त कारणान्तरों से २८ में से २१ का व्यय 20-

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' होना अनिवार्य है । फलतः शरीरनिधनानन्तर यह अपने धन की केवल सात कलाएँ ले कर वापस लौटता है । पुत्राभाव से अपनी २१ कलाओं की प्राप्ति इस के लिए असम्भव हो जाती है ही । परिणामस्वरूप यह कभी पूर्ण तालक्षण सापिण्ड्यभाव को प्राप्त नहीं होता । यही महानात्मा का दूसरा पतन है । इस पतन से बचने के लिए, साथ ही प्रधानतया पितृधन की ३५ कलाओं के आनृण्यके लिए प्रजोत्पादन कर्म आवश्यकरूप से अपेक्षित है । एवं यही प्रथम कर्म है । इति प्रथमं प्रजोत्पादनात्मकमानृएयं कर्म १ x २ - सपिण्डीकरणात्मकं द्वितीयमानृण्यं कर्म-सपिण्डीकरणानुगत नृण्य विज्ञानोपक्रम -पुरुष के पर ६ पुरुषों से इसे जो ऋण मिला था, उसे ' आत्मधेय -तन्य ' भेद से दो भागों में विभक्त करते हुए पूर्व परिच्छेद में यह स्पष्ट किया गया है कि, वृद्धातिवृद्धप्रपितामह से ऋणरूप से इसे जो १ कला मिली है, वह तो आत्मघेयरूप से ही इस बीजी में ही प्रतिष्ठित रह जात है । इसका ( वितानमात्रा के अभाव से ) पुत्रादि में तनन नहीं होता, अतएव इस एक सातवें पर-पुरुष की कला में तन्य विभाग नहीं होता. अब शेष रहते हैं ५ परपुरुष । अतिवृद्धप्रपितामह से ३ कला मिली है, इसके आत्मधेय, तन्यरूप से २ - १ ये दो विभाग हो जाते हैं । २ मधे बीजी में, १ तन्य बीजीपुत्र में भुक्त हो जाता है । वृद्धप्रपितामह से ६ कला मिलती हैं, इसके आत्मधेय, तन्यरूप से ३- ३ ये दो विभाग हो जाते हैं । ३ आत्मधेय बीजी में, ३ तन्य बीजीपुत्र में, भुक्त हो जाते हैं । प्रपितामह से १० कला मिलतीं हैं, इसके आत्मधेय तन्यरूप से ४-६ ये दो विभाग हो ' जाते हैं । ४ आत्मधेय बीजी में, ६ तन्य बीजीपुत्र में भुक्त हो जाते हैं । पितामह से १५ कला-५ आत्मधेय बीजी में, आत्मधेय, तन्यरूप से मिलती हैं, इसके आत्मधेय तन्यरूप से ५-१० ये दो विभाग हो जाते हैं । १० तन्य बीज पुत्र में भुक्त हो जाते हैं । पिता से २१ कला मिलतीं हैं, इसके ६-१५ ये दो विभाग हो जाते हैं । ६ आत्मधेय बीजी में,. १५ तन्य बीजीपुत्र में मुक्त हो जाते हैं । इस प्रकार 3–६–३–४–3, इन ६ पुरुषों से ऋणरूप से प्राप्त - - - - १५-२६ इन ५६ पितृ-कलाओं में से –i – 3 --- ये २१ कला तो आत्मवेयरूप से सातवें ( किंवा प्रथम ) बींजी , पुरुष मैं प्रतिष्ठित रह जातीं हैं, एवं ३-१-६-१०-१ये ३५ कला बीजी के शुक्र द्वारा बीजीपुत्र में भुक्त हो जातीं हैं । इस प्रकार पुत्रोत्पादन का फल यह होता है कि, ५६ ऋणों में से ३५ ऋणकलाओं का भार बीजी पुरुष अपने पुत्र पर डाल कर स्वयं इन उपकलाओं से अनृणी वन जाता है । यही प्रजोत्पादनलक्षण

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 160 का मूल पृष्ठ
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( ७ ) १ - वृद्धातिवृद्धप्रपितामह: --( ६ ) २ - अतिवृद्धप्रपितामह:-) ( ५ ) ३ - वृद्धप्रपितामहः --( ४ ) ४ - प्रपितामह: --( ३ ) ५ - पितामह: -( २ ) ६ -- पिता--( १ ) ७ - बीजीपुरुषः-पितृतन्तु का ताना बाना -श्राद्धविज्ञान -कलो-५६ प्रजोत्पादन तत्पुत्रेऽर्पितानीति वीजिन्यात्मघेयरूपेण भाव्यम वीजिन्यागतानि शुक्रद्वारा तदिदमानृण्यं : मात्रया च ।: नान्यथेति २१ मात्रया बीजिन , षट्पुरुषेभ्य ३५ , परेभ्यः ऋणानि सम्भवति मात्रयानृण्यं प्रतिष्ठितानि ३५ तदित्थं पेतानि कर्म्मणैव पितृऋणानि आत्मधेयाः तन्याः संकलनम् ( १ ) १. I. ( ६ ) ( १० ) .१०-४-( १५ ) १० -१५. ५. ( २१ ) ६. १५ -२१ २१ ३५ ५६ बीजनि तत्पुत्रे वीजी पुरुष ने ५६ ऋणकलाओं में से प्रजोत्पादन द्वारा ३५ कलाओं से तो आनृण्य प्राप्त २१ कर लिया । परन्तु अभी इस के पास उहीं ५६ ऋणकलाओं में से ३५ से शेष बचीं हुई कलाएँ सुरक्षित हैं । इन आत्मधेयलक्षण २१ ऋणकलाओं से अनृणी बनने का क्या उपाय को ?, सपिण्डीकरणकर्म इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है । आत्मवेयरूप से २१ ऋणकलाओं शुक्रस्थ महानात्मा में प्रतिष्ठित रखने वाले इस बीजी पुरुष को थोड़ी देर के लिए इसी पाञ्च-भौतिक शरीर में इसी भूपृष्ठ पर जीवनयात्रा का निर्वाह करने दीजिए, और इस के उन ६ पर-पुरुषों का विचार कीजिए, जो अपनी ऋणमात्राएँ दे दे कर शरीरत्यागानन्तर स्वप्रभव चान्द्रलोक में • जाकर प्रतिष्ठित हो गए हैं । साथ ही यह भी स्मरण रखिए कि 9 ५६-२८ वाले ८४ के चक्र से सभी पुरुष नित्ययुक्त हैं । सभी ने अपनी ५६ ऋणकलाओं में से ३५ पुत्रों में दीं हैं, २१ स्वयं में रक्खीं हैं । एवं २८ कलाओं में से २१ पुत्रों में दी है, ७ स्वयं में रक्खीं हैं । पितृन्तुओं का कैसा पूर्व ताना - बाना है । बीजीपुरुष को लक्ष्य बना कर केवल एक सप्तक ( एक सापिण्ड्य ) का विचार करते हुए हर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, बीजीपुरुष अपने वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र की प्रथम आनृण्यकर्म है, जिसका पूर्वपरिच्छेद में स्पष्टीकरण किया जा चुका है, एवं सन्दर्भ सङ्गति दृष्टि से जिसका यहाँ भी सिंहावलोकन कर लिया गया है ।