Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 161–170
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 161–170
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् है । बीजीपुरुष का इसी के वृद्धातिवृद्धपितामह का प्रतिवृद्धप्रपौत्र है । बीजीपुरुष का पितामह इसी के 1. वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का वृद्धप्रपौत्र है । बीजीपुरुष का प्रपितामह इसी के वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का प्रपौत्र है । बोज पुरुष का वृद्धप्रपितामह इसी के वृद्धप्रपितामह का पौत्र है । बीजीपुरुष का प्रतिवृद्ध-प्रपितामह इसी के वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का पुत्र है । बीजीपुरुष का वृद्धातिवृद्धप्रपितामह इसी के अतिवृद्ध. प्रपितामह स्थानीरं पुत्र का बीजीपुरुष है, इस प्रकार सात पुरुषपरम्परा में सापिण्ड्य सम्बन्ध. समाप्त है ( १ ) वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः-( २ ) अतिवृद्धप्रपितामहः - ( ७ ) वीजीपुरुषः -- ( ६ ) पुत्रः ( ३ ) वृद्धप्रपितामह: -- ( ५ ) पौत्रः ( ४ ) प्रपितामह: -- ( ४ ) प्रपौत्र: ( ५ ) पितामह. -- ( ३ ) वृद्धप्रपौत्रः ( ६ ) पिता-- ( २ ) अतिवृद्धप्रपौत्रः ( ७ ) बीजीपुरुष: - ( १ ) वृद्धातिवृद्धप्रपौत्रः वृद्धातिवृद्धप्रपितामह से आरम्भ कर ६ ठे बीजीपुरुष के पितापर्य्यन्त ६ परपुरुषों में प्रत्येक में ५६ ऋण, २ = धनरूप से ८४ कला प्रतिष्ठित हैं । इनमें से २८ धनकलाओं को छोड़िए । ५६ कलाओं में से केवल उन ऋणकलाओं को लक्ष्य बनाइए, जिनका ऋणभार सातवें बीजीपुरुष पर है । वृद्धातिवृद्धप्रपितामह की ५६ कलाओं में से केवल १ ऋणकला का भार बीजीपुरुष पर हैं । इसी प्रकार अतिवृद्धप्रपितामह की ५६ में से केवल ३ का, वृद्धप्रपितामह की ५६ में से केवल ६ का, प्रपितामह की ५६ में से केवल १० का पितामह की ५६ में से केवल १५ का, तथा पिता की ५६ में से • केवल २१ का, इस प्रकार सम्भूय ५६ कला का भार इस पर है । इनमें से ३५ इसने प्रजोत्पादन के द्वारा पुत्र को समर्पित कर दीं, शेष २१ कला इस में आत्मधेयरूप से प्रतिष्ठित रह गईं, जिनका १, २, ३, ४, ५, ६, रूप से पूर्व में विभाजन बतलाया जा चुका है । बीजीपुरुष शरीर निधनानन्तर जब पितृलोक में जाता है, तो अपने में प्रतिष्ठित इसका पितृऋण तत्तन् प्र ेत पिता- पितामहादि पितरों में प्रकृत्या संयुक्त हो जाता है । १ कला वृद्धातिवृद्धप्रपितामह में, २ कला अतिवृद्धप्रपितामह में, ३ कला वृद्धप्रपितामह में, ४ कला प्रपितामह में, ५ कला पितामह में, ११३
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श्राद्धविज्ञान एवं ६ कला पिता में प्रत्यर्पित हो जातीं हैं । ' यदि बीजीपुरुष है, तो इनका ऋणात्मक धन इसी में सुरक्षित रहता है । जब स्वपिता - पितामहादि से पहिले मर ' जाता उस समय इन्हें मिल जाता है । इस प्रकार ये पवत्त्व को प्राप्त हो जाते हैं, तो इस प्रत्यर्पणपद्धति से उन्हें मिल जाता है, और इस स्थिति ३५ कलाओं में से शेष रहा २१ कल ऋण पितृऋरण से सर्वथा उन्मुक्त हो जाता है । साथ ही इस ऋणमुक्ति में आकर यह प्रेत बीजीपुरुष ५६ कल अपने अर्जित धन की ७ कला शेष रह जातीं हैं । की दशा में इसके पास केवल यद्दी प्रत्यर्पण कर्म्म ' सपिण्डीकरण ' नाम पितृपिण्डों के निवाप हो जाने पर वे पिण्ड ' ७-६-५-४-३-२-११ से प्रसिद्ध है । कारण यही है कि, २८ कल प्रपौत्र - वृद्धप्रपौत्र - अतिवृद्धप्रपौत्र - वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र, इन ७ पुरुषों इस क्रम से बीजी, ततपुत्र, पौत्र-( अपने वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र का वृद्धातिवृद्ध प्रपितामह में विभक्त हो जाते हैं । सातवाँ बीजी जब इसका पुत्र जाता है, तो ६ कला का प्रत्यर्पण होता ) है चन्द्रलोक ७+ में केवल ७ कला लेकर पहुँचता है । हैं, १३ + १५ - १८ हो जातीं हैं । प्रपौत्र से ४ मिलतीं ६-१३ हो जातीं हैं । पौत्र से ५ मिलतीं ३ मिलतीं हैं, २२ + ३-२५ हो जातीं हैं । अतिवृद्धप्रपौत्र हैं, १८ + ४ - २२ हो जाती हैं । वृद्धप्रपौत्र से एवं वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र से १ कला मिलती है, २७ + १ - २८ से २ मिलतीं हैं, २५ + २-२७ हो जातीं हैं । वृद्धातिवृद्धप्रपितामह सहपिण्डात्मक बनता हुआ सापिण्ड्यरूप कला सम्पन्न हो जातीं हैं । यहाँ आकर सापिण्ड्य लक्षण पूर्णपिण्डत्व सातवीं सन्तति में प्रतिष्ठित में परिणत हो जाता है । क्योंकि इसी आधार पर ' पिण्डदः सप्तमस्त्वेषाम् - सापिण्ड्य साप्तपौरुषम् २ कला के प्रत्यर्पण पर अवलम्बित है, ' कहा जाता है । पुत्रादि द्वारा प्रत्यर्पित पितृधन से सात पुरुषों सम्पूर्णावयव बनता है । अपने पिण्ड की में से सातवें वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का पिण्ड प्रेतपुरुष पार्थिव आकर्षण से एकान्ततः मुक्त पूर्णता के अव्यवहितोत्तरकाल में ही यह सातवाँ स्बसंततिरूप से प्रतिष्ठित रहती है, तब तक इसे हो जाता है । जब तक एक भी कला पृथिवी पर वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र की उत्क्रान्ति के साथ साथ ही पार्थिवाकर्षण से आकर्षित रहना पड़ता है । क्योंकि उच्छिन्न हो जाता है, अतएव आकर्षण विमोक स्वाभाविक वृद्धातिवृद्धप्रपितामह का शेष १ भाग भी पृथिवी से पितर सौर संस्था में श्राता हुआ तदूद्वारा स्वप्रभव बन जाता है । चान्द्र संस्था से उन्मुक्त आकर त्रैगुण्यभाव से अतिमुक्त बन कर - न उसी पारमेष्ठ्य लोक चला जाता है । यहाँ तीत मुक्त - उन्मुक्त महानात्मा के लिये इस के अनन्तर स पृथिवी पुनरावर्त्तते, न स पुनरावत ' ते ' । इस त्रिगुणा-जाता । में कोई कर्म्म ( श्राद्धादि ) शेष नहीं रह froad यह निकला कि, अवर सातवें पुरुषके निधन से मात्रार्पण का बन्धन विमोक होता है । द्वारा पर सातवें पुरुष सातवेंने ३५ कलाओं के सुरक्षित रक्खीं थीं, वे इस प्रत्यर्पण विधिरूप सपिण्डीकरण से ऋणात्मक तत्तत् दान से जो २१ कलाएँ प्रेत पितरों में वापस ११४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् निहित हो जाती हैं । फलतः सपिण्डीकरण से यह २१ कल से आनृण्यभाव को प्राप्त हो जाता है । प्रजोत्पादनकर्म से ३५ का, निवनानन्तर प्रत्यर्पण से २१ का प्रतिशोध होता है । इस प्रकार प्रजोत्पादन, तथा सपिण्डीकरण, इन दो कम्र्मों से पुरुष अपनी जीवनदशा, चान्द्रस्थिति, इन दो स्थितियों के द्वारा ऋणरूप से प्राप्त ५६ कलाओं से उऋण हो जाता है । इस की जो अपनी कमाई की आत्मवेयरूप ७ कला हैं, उन की पूर्णता इस के पुत्र पौत्रादि सप्तक पर ही निर्भर है । वृद्धातिवृद्रप्रपितामहानुगतं - एकम् ( १ ) अतिवृद्वप्रपितामहानुगते - -द्वे ( २ सहः - - प्रत्यर्पयति सप्तमः सहसी 29 सहांसि " सहांसि 99 वृद्धप्रपितामहानुगतानि -- - त्रीरिण ( ३ ) प्रपितामहानुगतानि - चत्वारि ( ४ ) पितामहानुगतानि पञ्च ( ५ ) सहांसि पितुरनुगतानि षट् ( ६ ) सहांसि २१ तदिदं सपिण्डीकरणं नाम द्वितीयमानृण्यं कर्म सप्तमः पिण्डदः 29 97 इति — सपिण्डीकरणेनानृण्यं द्वितीयं कम्म ११५
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श्राद्धविज्ञान अथ श्राद्धेनानृण्यं तृतीयं कर्म श्राद्धकर्मानुगत श्रनृयविज्ञानोपक्रम -जिस बीजी पुरुष ने १६ में से शेष बचीं हुई २१ कलाएँ स्व - पिता- पितामहादि में चन्द्र-लोक में पहुँच कर प्रत्यर्पित कीं थीं, उस बीजी पुरुष का ' वृद्धातिवृद्धप्रपितामह ' नामक चान्द्रलोकस्थ सातवाँ परपुरुष बीजी के प्रत्यर्पणलक्षण, सपिण्डीकरण से पूर्णकलाओं से युक्त होता हुआ पार्थिव बन्धन से विमुक्त हो जाता है । शेष पितर ( प्रतिवृद्धप्रपितामहादि ) अब भी पूर्णता के अभाव से पार्थिव आकर्षण सूत्र से बद्ध रहते हैं । बीजी पुरुष के चन्द्रलोकगमन ( निधन ) से पहिले चान्द्रलोकस्थ पिता - पितामहादि में निम्न लिखित सहः पिण्ड रहते हैं -६ - ( ७ ) वृद्धातिवृद्धप्रपितामहे-५ - ( ६ ) अतिवृद्धप्रपितामहे-४ - ( ५ ) वृद्धप्रपितामहे-३ - ( ४ ) प्रपितामहे -२- ( ३ ) पितामहे -- २८ सहांसि - तद्युक्तश्चन्द्रस्थो वृद्धप्रपितामहपिण्डः - २५ सहांसि - तद्युक्तश्चन्द्रस्थोऽतिवृद्धप्रपितामहपिण्ड: -- २१ सहांसि - तद्युक्तश्चन्द्रस्थो वृद्धप्रपितामहपिण्डः -१८ सहांसि - तद्युक्तचन्द्रस्थः प्रपितामहपिण्डः -१३ सहांसि - तद्युक्तश्चन्द्रस्थः पितामहपिण्डः १ - ( २ ) पितरि - --- ७ सहांसि - तद्युक्तश्चन्द्रस्थ: पितृपिण्ड: कारण स्पष्ट है । ' वृद्धातिवृद्ध प्रपितामह ' के चान्द्रलोक में पहुँचने पर स्वधनात्मक २८ सहों में से केवल ७ बचे थे, शेष २१ का इसने अपने पुत्रोत्पादन में ऋणदान कर डाला था । आगे जाकर इस ओर की ५ प्रजाओं से क्रमशः बीजी के प्रतिवृद्धप्रपितामह ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्रपिता-मह के पुत्र ) से ६ सहभाग, बीजी के वृद्धप्रपितामह ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्रपितामह के पौत्र ) से ५ सहो भाग, बीजी के प्रपितामह ( बीजी के वृद्धातिबृद्धप्र ० के प्रपौत्र ) से ४ कलाएँ, बीजी के पितामह ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्र ० के वृद्धप्रपौत्र ) से ३ कलाएँ, एवं बीजी के पिता ( बीजी के वृद्धातिवृद्धप्र०-वृद्धप्रपौत्र ) से २ कलाएँ इन के निधनानन्तर वापस मिल जातीं हैं । इस प्रकार ७ आत्मगत धन भाग, ' ६ - -४-३२-१ ये २० आत्मधन इन ५ अवर प्रजाओं से, सम्भूय बीजी ( जोकि वृद्धाति-वृद्धप्रपितामह का वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र है, जिस में कि वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र को १ कला न्युप्त है ) के निधन पहिले पहिले चान्द्रलोकस्थ वृद्धातिवृद्धप्रपितामह में २७ सहोभागों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसी प्रकार ' प्रतिवृद्धप्रपितामह ' की २८ कलाओं में से २१ तो तत् पुत्र में न्युप्त हैं । फलतः चान्द्रलोकस्थ इस में भी आत्मधन की ७ कला ही शेष हैं । आगे जाकर अवरक्षानुगत ४ ११६
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7-ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रजाओं से इसे क्रमशः बीजी के वृद्धप्रपितामह ( बीजी के प्रतिवृद्धप्रपितामह के पुत्र ) ६ सहो-भाग, बीजी के प्रपितामह से ( बीजी के अतिवृद्धप्रपितामह के पौत्र ) से ५ सहभाग, बीजी के पितामह ( बीजी के अतिवृद्धप्रपितामह के प्रपौत्र ) से ४ सहो भाग, एवं बीजी के पिता ( बीजी के अतिवृद्धप्रपिता-मह के वृद्धप्रपौत्र ) से ३ सहभाग " इन के निधनानन्तर और वापस मिल जाते हैं । इस प्रकार ७ आत्मगत धन भाग, ६-५-४-३, ये १८ सहभाग श्रवर प्रजाचतुष्टयी से प्रत्यर्पित, सम्भूय बीजी ( जोकि अतिवृद्धप्रपितामह का अतिवृद्धप्रपौत्र है, जिस में कि अतिवृद्धप्रपितामह की २ कला न्युप्त हैं ) के निधन से पहिले पहिले चान्द्रलोकस्थ प्रतिवृद्धप्रपितामह में २५ सहोभागों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसी प्रकार ' वृद्धप्रपितामह ' की २८ कलाओं में से = १ तो तन पुत्र में न्युप्त हैं । फलतः चन्द्रलोकस्थ इस में भी आत्मवन की ७ कलाएँ हीं शेष माननीं पड़तीं हैं । आगे जाकर र कक्षानुगत ३ प्रजाओं से इसे क्रमशः बीजी के प्रपितामह ( बीजी के वृद्धप्रपितामह के पुत्र ) से ६. सहो बीजी के पितामह ( बीजी के वृद्धप्रपितामह के पौत्र ) से ५ सहभाग, एवं बीजी के पिता ( बीजी के भाग, वृद्ध पितामह के प्रपौत्र ) से ४ सहोभाग इन के निधनानन्तर और वापस मिल जाते हैं । इस प्रकार ७ आत्मगत धनभाग, ६ - ५-४ ये १५ सहोभाग अवर प्रजात्रयी से प्रत्यर्पित, सम्भूय बीजी ( जो-कि वृद्धप्रपितामह का वृद्धप्रपौत्र है, जिस में कि वृद्धप्रपितामह ३ कला न्युप्त हैं ) के निधन से पहिले पहिले चान्द्रलोकस्थ वृद्धप्रपितामह में २१ सहोभागों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसी प्रकार ' प्रपितामह ' की २८ कलाओं से २२ तो तत् पुत्र में न्युप्त हैं । फलतः शेष कला ७ हीं सिद्ध हो जातीं हैं । आगे जाकर अवर-चन्द्रलोकस्थ इस में भी आत्मधन की कक्षानुगत २ प्रजाओं से इसे क्रमशः बीजी के पितामह ( बीजी के प्रपितामह के पुत्र ) से ६ सहो-भाग, एवं बीजी के पिता ( बीजी के प्रपितामह के पौत्र ) से ५ सहोभाग इन के निधनानन्तर और वापस मिल जाते हैं । इस प्रकार ७ आत्मगत धनभाग, ६-५, ये ११ सहभाग अवर प्रजात्रयी से प्रत्यर्पित, सम्भूय बीजी ( जो कि प्रपितामह का प्रपौत्र है, जिस में कि प्रपितामह की ४ कला युप्त हैं ) के निधन से पहिले पहिले चान्द्रलोकस्थ प्रपितामह में १८ सहोभागों की सत्ता सिद्ध ह जाती है । इसी प्रकार ' पितामह ' की २८ में से २१ पुत्र में न्युप्त हैं, ७ धनरूपेण आत्मधेय हैं । आगे जाकर वरकक्षानुगत बीजी के पिता ( बीजी के पितामह के पुत्र ) से इसमें ६ सहभाग और प्रत्यर्पित होते हैं । सम्भूय बीजी ( जोकि पितामह का पौत्र है, जिस में पितामह की ५ कला न्युप्त हैं ) के निधन से पहिले पहिले चान्द्रलोकस्थ पितामह में १३ सहो भागों की सत्ता सिद्ध हो जाती हैं । इसी प्रकार ' पिता ' की २८ में से २१ तो तत् पुत्र बीजी में न्युप्त हैं । बीजी के निधन ११७
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श्राद्धविज्ञान से पहिले पहिले इस प्रेतपिता में ७ सहोभागों की सत्ता सिद्ध हो जाती है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है । १ - वृद्धातिवृद्ध प्रपितामहे - २७ सहांसि -( १ ) ७ – सहांसि सहागतानि - - प्रतात्मा प्रथमो बीजी ६ – सहांसि - अतिवृद्धप्रपितामहतः ( पुत्रतः ) ( २ ) ( ३ ) ५-२ - सहांसि - वृद्धप्रपितामहतः प्रेतात्मा द्वितीय: ( पौत्रतः ) प्रेतात्मा तृतीयः ( प्रपौत्रतः ) प्रेतात्मा चतुर्थः ( वृद्धप्रपौत्रतः ) प्रेतात्मा पञ्चमः ( तिवृद्धप्रपौत्रतः ) प्र ेतात्मा षष्ठः ( ४ ) ४ - सहांसि - प्रपितामहतः ( ५ ) ३ – सहांसि - पितामहतः ( ६ ) २--सहांसि - पितुः सकाशात् २७ सहांसि सप्तमस्य बोजिनो निधनात् प्राक् - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहे २ - अतिवृद्ध प्रपितामहे — २५ सहांसि -( २ ) ७. -सहांसि सहागतानि -- प्र ेतात्मा द्वितीयो बीजी ( ३ ) ६ – सहांसि —– वृद्धप्रपितामहतः ( पुत्रतः ) प्रेतात्मा तृतीयः ( पौत्रतः ) प्रेतात्मा चतुर्थः ( प्रपौत्रतः ) प्रेतात्मा पञ्चमः ( ४ ) ५ - सहांसि - प्रपितामहतः ( ५ ) ४–-सहांसि - पितामहतः ( ६ ) ३ – सहांसि - पितुः सकाशात ( वृद्धप्रपौत्रतः ) प्रतात्मा षष्ठः २५ सहांसि सप्तमस्य बीजिनो निधनात् प्राक् - प्रतिवृद्धप्रपितामहे ३ बृद्धप्रपितामहे — २१ सहांसि -( ३ ) ७ - संहांसि सहागतानि - प्रेतात्मा तृतीयो बीजी ( ४ ) ६ - सहांसि - प्रपितामहतः ( पुत्रतः ) प्रेतात्मा चतुर्थः ( ५ ) ५ - सहांसि - पितामहतः ( पौत्रतः ) प्रेतात्मा पञ्चमः ( ६ ) ४ - सहांसि - पितुः सकाशात् ( प्रपौत्रतः ) प्रतात्मा षष्ठः २१ सहांसि सप्तमस्य बीजिनो निधनात् प्राक् - वृद्धप्रपितामहे -३-११८
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४ --- प्रपितामहे - १८ सहांसि-ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ४ ) ७ – सहांसि - सहागतानि - प्रेतात्मा चतुर्थो बीजी ( ५ ) ६ – सहांसि - पितामहुतः ( पुत्रतः ) प्र ेतात्मा पञ्चमः ( ६ ) ५ - सहांसि - पितुः सकाशान् ( पौत्रतः ) प्र ेतात्मा षष्ठः १८ सहांसि सप्तमस्य वीजिनो निधनात् प्राक् - प्रपितामहे ५ - पितामहे - १३ सहांसि -४-( ५ ) ७ - सहांसि - सहागताति - प्रेतात्मा पञ्चमो बीजी ( ६ ) ६ - सहांसि - पितुः सकाशात् ( पुत्रतः ) प्रेतात्मा षष्ठः १३ - सहांसि सप्तमस्य बीजिनो विधनात् प्राक - पितामहे ६ - पितरि - ७ सहांसि— ( ६ ) ७ -- सहांसि सहागतानि - प्र ेतात्मा षष्ठो बीजी ७ – सहांसि सप्तमस्य वीजिनो निधनात् प्राक् - पितरि ६--अत्र सातवें बीजीपुरुष की प्रेतावस्था का विचार कीजिए । इस ने भी नियमानुसार २१ तो पुत्र में न्यू कर दिए, इस प्रकार आत्मधन में से कुल ७ महोभाग लेकर यह चान्द्रलोक में पहुँचा । इन ७ के अतिरिक्त ५६ ऋणभागों में से बाकी बचे हुए २१ सहोभाग भी इस के साथ चन्द्रसंस्था में गए । इन २१ में से उक्त ६ परपुरुषों के क्रमशः १ - २ - ३ - ४ - ५ - ६ ' इस क्रम से विभाग हैं । इसी क्रम से ये ६ ओं विभाग धनाधिकारी तत्तत् ६ परपुरुषों में प्रत्यर्पित हो जाते हैं । १ में २७ थे, उसने सातवें के द्वारा १ ले लिया, २८ हो गए । २ में २५ थे, उसने सातवें के द्वारा २ • लिए, २७ होगए । ३ में २१ थे, इसने सातवें के द्वारा ३लिए, २४ हो गए । ४ में १८ थे,. इसने सातवें के द्वारा ४ लिए २२ हो गए । ५ वें में १३ थे, इसने सातवें के द्वारा ५ लिए १८ हो गए ।. ६ ठे में ७ थे, इसने सातवें के द्वारा ६ लिए, १३ हो गए । इस प्रकार सातवें बीज के निधन से पहिले जिन ६ पुरुषों में '२७ -२५-२१-१८-१३-७१ क्रम से सहांसि थे, वे सातवें बीजी के निधन से त्रस्थ ' १ - २ - ३ - ४ - ५ - ६ ' इन प्रत्यर्पित सहोभागों से क्रमशः २८-२७-२४-२२-१८-१३ ' इन सहः संख्याओं में परिणत हो गए, जैसा कि अगले परिलेख से स्पष्ट है -
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१ ७ श्राद्धविज्ञान - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहे २८ सहांसि - पूर्णपिण्ड: - अतिवृद्धप्रपितामहे २७ सहांसि - अपूर्णः - वृद्धप्रपितामहे २५ सहांसि - अपूर्णः २ ३ ७ ४ ४ ५ ७ ५ ३ ४ ५ ६ ३ ४ ५ ६ ७ 6 १ २ ३ ४ ५ ६ is - प्रपितामहे २१ सहांसि - अपूर्णः -- पितामहे १८ सहांसि - अपूर्ण: - पितरि १३ सहांसि - अपूर्णः - बीजिनि - पूर्ण: - पिण्डद: सप्तमस्त्वेषाम् ' ७ २८ II २५ २२ १८ १३ ७ -सापिण्ड्य ' साप्तपौरुषम् तन्तुलक्षण श्राद्धकर्ता का स्वरूप परिचय -जो भी श्राद्ध करेगा, वह ' पुत्र ' नाम से व्यवहृत होगा, यह सामान्य परिभाषा लक्ष्य में रख कर ही विषय का समन्वय करना चाहिए । प्रजोत्पादन, सपिण्डीकरण, श्राद्ध, तीनों कम्मों की मूलोपनिषत् पृथक् पृथक् है । प्रजोत्पादन की मूलोपनिषत् ऋणरूप से शुक्र में प्रतिष्ठित ५६ पितर पिण्ड की ३५ कला हैं । सपिण्डीकरण की मूलोपनिषत् ५६ में से शेष रहे हुए २१ सहांसि हैं । एवं श्राद्धकर्म की मूलोपनिषत् २८ कल, अतएव मुक्त वृद्धातिवृद्धप्रपितामह ( जो कि श्राद्धकर्त्ता से संख्या में ८ वाँ होगा ) को छोड़कर शेष ६ पितर ( जिनके अंश संतानरूप से श्राद्धकर्त्ता पुत्र के शुक्रस्थित महानात्मा में प्रतिष्ठित हैं, जो कि श्राद्धकर्त्ता सातवीं पीढ़ी में प्रतिष्ठित है ) हैं । उक्त तालिका में श्रद्धालु पाठक देखेंगे कि, सातवीं सन्तति के स्वप्रभवलोक ( चन्द्रलोक ) गमन करने पर इस में प्रतिष्ठित ऋणात्मक अपनी एक १ कला लेकर इसका सातवाँ पुरुष ( वृद्धातिवृद्धप्रपितामह ) २८ कल बनता हुआ पूर्ण बन कर पार्थिव बन्धन से मुक्त हो जाता है । अब इस से आठवीं सन्तति में इसका कोई सहभाग पृथिवी पर नहीं है । अतएव इसके लिए श्राद्ध करना व्यर्थ है । शेष ६ पुरुषों के अंश सन्तति के द्वारा पृथिवी पर प्रतिष्ठित रहते हैं । दूसरे शब्दों में ऋणरूप से सन्तानों में प्रतिष्ठित तत्तत् पितृसोभाग उसी चान्द्रश्रद्धासूत्र के द्वारा तत्तत् सहः प्रदाता प्रतपितरों के पार्थिवाकर्षण बन्धन के कारण बनते हैं । तालिकाप्रदर्शित ७ प्रेतात्माओं को ' १-५-१ ' इन तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है । ' वृद्धातिवृद्धप्रपितामह ' नामक सातवाँ परपुरुष ' कृत्स्नपिण्ड ' है । मध्य के पाँच परपुरुष ' सिद्धपिण्ड -{ e सपिण्डतातु विनिवर्त्तते सप्तमे पुरुषे
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् संस्कार ' हैं । एवं सर्वान्त का परपुरुष ' अकृत्स्नपिण्ड ' है । सातवाँ परपुरुष अपनी पूर्ण ( २८ ) मात्रा से युक्त होता हुआ पूर्णपिण्ड है । मध्य के पाँचों यद्यपि पूर्णपिडात्मक नहीं हैं, तथापि अन्त के पितर की अपेक्षा इन में '२० -२५ - २१-१८-१३ ' क्रम से मांत्राधिक्य है, अतएव इन्हें ' सिद्धपिण्ड-संस्काराः ' कहा जा सकता है । परन्तु वृद्धातिवृद्धप्रपितामह को १ कला कर उसे पूर्ण पिण्डरूप में परिणत करने से ' पिण्डदः ' नाम से प्रसिद्ध सर्वान्त का पितर केवल सात मात्राओं से युक्त रहता हुआ सर्वथा पूर्ण बना रहता है । अतएव इसे ' अकृत्स्नपिण्ड ' कहा जा सकता है । सप्तकल इस प्र ेतात्मा के प स अपना जो २८ कल आत्मधन था, उस में से २१ भाग तो इस की सन्तानों में न्युप्त जानेहैं । पल्तः आत्मधन में से केवल ७ भाग ही बच पाते हैं । एवं जो ५६ कला इसे पितृ-ऋगारूप से प्राप्त होतीं हैं, अतएव जो पितृऋण ' पित्र्याचाप ' नाम से प्रसिद्ध है, इस की ३५ कला तो इसकी जीवित दशा में अपने आत्मनीन २१ के साथ ही प्रजोत्पादन में न्युप्त हो जातीं हैं । जो २१ रहते हैं, वे निधनान्तर तत्तत् परपितृपरम्पराओं में प्रत्यर्पित हो जाते हैं । फलतः सर्वान्त के प्रेतात्मा में केवल सात आत्मनीन कला ही रह जातीं हैं । वृद्धातिवृद्धप्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह, वृद्धप्रपितामह, प्रपितामह, पितामह, पिता, इन ६ प्रेतात्माओं में अपने समीप क्रमशः २७ - २५ - २२ - १८, १३, ७ ' इतने सहोभाग प्रतिष्ठित हैं । शेष १-३-६-१०-१५-२१ - इतनीं मात्राएँ सन्तानरूप से पृथिवी पर प्रतिष्ठित हैं । इनके ये भाग जबतक इन्हें नहीं मिल जाते, तबतक ये ६ अपूर्ण पिण्ड हैं, अकृत्स्न हैं, क्षीणकाय हैं । यह भी सिद्ध विषय है कि, उनके उक्त भागों से युक्त इनकी सन्तानें जब तक पाञ्चभौतिक शरीर के सम्बन्ध से पृथिवी पर जीवित हैं, तब तक इन कृत्स्नतासम्पादक कलाओं का प्रत्यर्पण असम्भव है । जीवित सन्तानों से प्रयर्पण सम्भव नहीं, बिना प्रत्यर्पण के पूर्णता सम्भव नहीं, बिना पूर्णता के क्षोभ की शान्ति सम्भव नहीं । परिणामतः स्व स्व पिण्डों की अपूर्णता से क्षुब्ध प्रेत- पितृषक प्रत्यर्पणकर्म से पहिले पहिले स्व स्व पिण्ड़ों के इच्छुक बने रहते हैं । इसी स्वपिण्ड - प्रत्यर्पणेच्छा के सम्बन्ध से इन्हें ' पिण्डलिप्स ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । प्रेतपितरों की यह पिण्डप्राप्तिलिप्सा केवल लिप्सा पर ही विश्राम नहीं कर लेती । अपितु सजातीयाकर्षण - सिद्धान्त के अनुसार वे पिण्डलिप्सू पितर तत्तत् सन्तानों के शुक्र ऋणरूप से न्युप्त तत्तत्पिण्डरसों का आदान करते हुत इन्हें क्षीण बनाते रहते हैं । इस क्षीणता का दुष्परिणाम सन्तानों को भोगना पड़ता है । प्रतपितरों के आकर्षण से सन्तानगत प्रजोत्पादक महानात्मा निर्बल हो जाता है । फलतः प्रजातन्तुवितानसूत्र निर्बल वन जाता है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि, उन चान्द्रलोकस्थ पिण्डलिप्सू पितरों की पिएडलिप्सा किसी भी उपायविशेष के द्वारा उसकी पुत्रादि सन्तान मरणान्त पूरी करती रहैं । फल इस इच्छापूर्ति का यह होगा कि, पिण्डलिप्सू पितर तृप्त होते १२१
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श्राद्धविज्ञान रहेंगे, तृप्त पितर पुत्रादि के महानात्मा को श्राप्यायित करते रहेंगे, पारस्परिक आदान प्रदान से प्रजातन्तु वितान भी होता रहेगा, परम्परया प्रत्यर्पण के द्वारा प्रतबन्धन विमोक भी होता रहेगा । निष्कर्षत: -" पिण्डलिप्स चान्द्रलोकस्थ इस पितृपट्क की तृप्ति के लिए पुत्रादि के द्वारा पिण्ड-दानात्मक जो वैज्ञानिक कर्म किया जाता है, वही ' श्राद्ध ' नाम से व्यवहृत हुआ है " देवयज्ञस्वरूपमीमांसा— प्रजोत्पादनकर्म्म जहाँ पितृऋण की ३५ कलाओं से पुत्रोत्पादक को अनृणी बनाता है, वहाँ पिण्डदानलक्षण श्राद्धकर्म से श्राद्धकर्त्ता चान्द्रलोकस्थ क्षीणपिण्ड, अतएव पिण्डलिप्सू प्रेतपितृपटक को तृप्त करता हुआ अपने एक आवश्यक कर्त्तव्य से अनृणी बन जाता है । तीनों में इस श्राद्धकर्म को इसलिए महत्त्वपूर्ण माना जायगा कि, इस कर्म से सदा प्रेतात्मा तृप्त होते रहते हैं । तृप्त प्र ेत पितर-पुत्रादिगत पितृप्राण को आप्यायित करते रहते हैं । आप्यायित शुक्रस्थित पितृप्रारण गोत्रवृद्धिलक्षण प्रजा-वितान में समर्थ बने रहते हैं । उनकी तृप्ति, हमारी वंशरक्षा, ही इस कर्म्म का सर्वोत्कृष्ट फल है । प्रजो-त्पादन एवं सपिण्डीकरण, दोनों नृण्यकर्म वंशवितान पर अवलम्बित हैं । वंशवितान सबल पितृसंह: पर अवलम्बित है । पितृसाबल्य प्रतपितृतृप्ति पर अबलम्बित है । एवं प्रतपितृतृप्ति एकमात्र श्राद्धकर्म्म पर ही लम्बित है । अतएव द्विजातिवर्ग के लिए यह पितृकर्म देवकर्म्म से भी उत्कृष्ट माना गया है, जो कि आवश्यकतम, सर्वोत्कृष्ट श्राद्धकर्म दुर्भाग्य से आज श्रद्धा का विषय बनता हुआ ' लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ' को अन्वर्थ बना रहा है । " भूपिण्ड से चन्द्रलोक बड़ी दूर, पुत्रादि पृथिवी पर, प्रेतात्मा चन्द्रलोक में । ऐसी दशा में पुत्रादिद्वारा प्रदत्त पिण्ड से उनकी तृप्ति हो जाती है, इस कथन पर इसलिए विश्वास नहीं किया जा सकता कि, न तो पिण्ड को हम अपनी आँखों से चन्द्रलोक में जाता हुआ ही देखते, न प्रेतात्मा ही हमारी दृष्टि के विषय | कहना पड़ेगा कि पिण्डदानात्मक श्राद्धकर्म केवल ब्राह्मणों की स्वार्थलीला है । " ये हैं उन आस्तिकों के उद्गार, जो आज भारतवर्ष में ' वेदधम्र्मानुयायी ' कहे सुने जाते हैं । अस्तु, कौन क्या कहता है? इस अप्रियचर्चा को तूलरूप देना व्यर्थ है । हमारा इस सम्बन्ध में अपना कर्त्तव्य केवल यही है कि, वितण्डावाद में न पड़ कर श्रद्धालुप्रजावर्ग की अनुकूलजिज्ञासा, अनुकूल तर्क के समाधान के लिए दो शब्दों में यह स्पष्टीकरण कर दिया जाय कि, अमुकरूप से पुत्रादिद्वारा प्रदत्त fres मार्ग से चन्द्रलोक में जाता हुआ अमुकरूप से चन्द्रलोकस्थ प्र ेतात्माओं की तृप्ति का कारण बन जाता है । पार्थिवोपग्रहभूत चन्द्रमा तो फिर भी पृथिवी के सन्निकट है, परन्तु बृहतीमध्यस्थ १२२