Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 171–180
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 171–180
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् सूर्य्य तो भूपिण्डोपलक्षिता पृथिवी से २१ वें अहर्गण की दूरी पर अवस्थित है । परन्तु आश्चर्य है कि, पृथिवी ( भूपिण्ड ) पर रहने वाले मनुष्य ( द्विजाति ) यज्ञकर्म में आहवनीय कुण्ड में सोमाहुति डालते हैं, पुरोडाश की आहुति देते हैं । और यह सोमरस, तथा पुरोडाशपिण्ड विदूर स्थित सूर्य्यसंस्था में पहुँचता हुआ तत्रस्थ प्राणदेवताओं की तृप्ति का कारण बन जाता है । जिज्ञासा स्वाभाविक है कि, यहाँ दी हुई वहाँ रहने वाले प्राणदेवताओं की तृप्ति का कारण कैसे बनी? । वेदरहस्यविश्ले-. पक भगवान् मनु इसी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहते हैं-अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टिरन्नं ततः प्रजाः ॥ - मनुः ३ | ७६ | अग्नीषोमात्मक यज्ञ से ही प्रजा उत्पन्न हुई है । यह यज्ञ ' नित्य, वैध, ' भेद से दो भागों में विभक्त माना गया है । नित्ययज्ञ से विश्व का सञ्चालन हो रहा है । वैधयज्ञ केवल वैय्यक्तिक संस्था का उपकारक है । जिस नियम से प्राकृतिक नित्ययज्ञ का वितान हो रहा है, यदि उसी नियम से वैधयज्ञ ( पुरुषप्रयत्नसाध्ययज्ञ ) का वितान किया जाता है, तो अवश्यमेव इस वैधयज्ञ से इष्टसिद्धि हो जाती है । प्राकृतिक यज्ञ में सूर्य आहवनीय है, प्रविधी गार्हपत्य है, अग्नि होता है, वायु अध्वर्यु है, आदित्य उद्गाता है, चन्द्रमा ब्रह्मा है, सम्वत्सरप्रजापति यजमान हैं, पार्थिव उखा यजमानपत्नी है, दिक्सोम आहुतिद्रव्य है, ऋक - यजुः - सामतत्त्वत्रयी वेदमन्त्र हैं । इन सब के समन्वय से आधिदैविक यज्ञ का सञ्चालन हो रहा है । ठीक इसी यज्ञ के अनुरूप यज्ञवितान करना ‘ सम्यक् - यज्ञ ' है । प्रकृतिविरुद्ध कल्पना के द्वारा वायुशुद्धि आदि काल्पनिक फलों की चर्वणा से यथेच्छ करना असम्यक् - यज्ञ है । और ऐसा अवैध मानुषंकल्पनातिरञ्जित वेदभक्तों का ॐ वैदिक सामीप्य - विदूर व्यवस्था वाङमय ४८ गणों पर ही व्यवस्थित हुई है । कौन ग्रोपग्रह किस ग्रहोपग्रह से कितना, समीप, एवं कितना विदूर है?, प्रश्नों का समाधान अहर्गण -.. मण्डलात्मक वाङमय ‘ वषट्कार ' पर ही अवलम्बित है । इस व्यवस्था के अनुपात से ' एकविंशो वा इत आदित्य ' ( शत ० ) के अनुसार सूर्य भूपिण्ड से २१ वें अहर्गण पर प्रतिष्ठित हैं । वर्त्तमान क्षणिकविज्ञानवादी प्रतं च्य जगत् ने मीलों के अनुपात से जो सामीप्य - विदूर - व्यवस्था व्यवस्थित कर रक्खी है, वह अनन्ताकाशमाध्यम से अपूर्ण ही कही जायगी । उनका कहना है, ' सूर्य पृथिवी से ६ करोड़ मील दूर है ' । यह ठीक है कि, अहर्गणानुगत परिमाण - समतुलन से तथाकथित मील -परिमाणानुपात समतुलित है । तथापि प्राकृतिक प्राण समतुलनानुपात से मील, अथवा तो क्रोश ( कोस ) व्यवस्था का कोई महत्त्व नहीं माना जा सकता । १२३
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श्राद्धविज्ञान के अनुसार समृद्धिनाश का ही कारण यज्ञोद्घोष - ' व्यृद्ध ं वै तद् यज्ञस्य, यन्मानुषम् ' ( शतपथना आहुति - वहनकर्त्ता ० ) अग्निदेवता के द्वारा आदित्य में है । सम्यक् ( यथाविधि ) हुत आहुति ही प्राकृतिक पहुँचती है । स्थानीय है । इस आह-मानुषयज्ञ में आहवनीय सूर्य्यस्थानीय है, गार्हपत्य पृथिवी आहवनीय । सामिधेनी मन्त्रों से समिद्ध वनीय समिद्ध अग्नि में मन्त्रद्वारा आहुति डाली जाती है यहीं रह जाता है । प्रारण-अग्निदिव्याग्नि है, सौराग्निसजातीय है । हुत आहुति का भूतभाग बन जाता है । तृप्त देवता यज्ञ-भाग प्राणाग्निद्वारा द्य लोकस्थ सौर देवताओं की तृप्ति का कारण हैं । इस पारस्परिक आदान-कर्त्ता के आध्यात्मिक प्राणदेवताओं की तृप्ति का कारण बन जाते है । इसी स्वाभाविक रहस्य का प्रदान से प्राकृतिक मण्डल हमारे लिए अनुकूल बना रहता स्पष्टीकरण करते हुए पूर्णपुरुष यज्ञेश्वर ने कहा है-सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ॥ अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ १ ॥
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ॥ परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ २ ॥
॥ इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः दानप्रदायैो यो भुङ्क्त े स्तेन एव सः ॥ ३ ॥
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । ४ ॥ यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म्मसमुद्भवः ॥ ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ॥ तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता ३ अ ० । भूपिण्ड से निकल कर पार्थिव प्राणाग्नि ' अङ्गिरा ' नाम से प्रसिद्ध है । यह अङ्गिरोऽग्नि ' नाम से करता है । सौर प्रारणाग्नि ' आदित्य रथन्तर साममार्ग से निरन्तर द्युलोक की ओर जाया रहता है, पृथिवी पर प्रतिफलित होकर वापस प्रसिद्ध है । यह सूर्य्य से निकल कर पृथिवी पर आता वाले सौर प्राणाग्नि का पार्थिव अङ्गि-घु दिव्याग्निधम्र्मा लोक की ओर लौट जाता है । द्यु से पृथिवी पर आने बन सम्बन्ध हो जाता है । फलतः पार्थिव अङ्गिरा रोऽग्नि के साथ अन्तर्य्याम पञ्चदश- एकविंश- स्तोमभेद से वसु-जाता है । यही दिव्याग्निधर्मा पार्थिव श्रङ्गिरा पार्थिव पार्थिव त्रिवृत् श्रङ्गिरा के इसी ऊर्ध्वगमन को लक्ष्य में-रुद्र - आदित्यरूप में परिणत हो जाता है । त्रिमूत्ति रख कर श्रुति ने कहा है-१२४
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ऋणमोचनोपायपनिषत्
इत एत उदारुहन दिवस्पृष्टान्यारुहन् ।
प्र भूर्जयो यथापथि द्यामङ्गिरसो ययुः ॥
- अथर्व सहिता १ = | ११ | ऊर्ध्वगमन से पहले अङ्गिरोऽग्नि ' मृग ' नाम से व्यवहृत हुआ है । पाथिव काष्ठादि भूतों में सुप्त अङ्गिरा मृग्यमाण होने से ' मृग ' है । जब मनुष्य अपने यज्ञ में इस सुप्त अङ्गिरा को इध्म-काष्ठ प्रज्वलन कर्म्म से इद्ध, एवं सामिधेनी मन्त्रद्वारा दिव्य सौराग्नि के प्रवेश से समिद्ध कर देते हैं, तो वहीं अतन्द्र बन कर अध्वर्यु के द्वारा हुत भूताहुति के प्राणरूप हव्य भाग का वहन करता हुआ द्यु -लोक में चला जाता है । इस प्रकार द्युलोक की घोर जाते हुए अङ्गिरा नामक प्राणाग्नि के द्वारा ही प्रदत्त आहुति द्रव्य का प्राणांश द्युलोकस्थ देवताओं की तृप्ति का कारण बनता है । ' अग्नौ प्रास्ता-हुतिः सम्यक् - आदित्यमुपतिष्ठते ' का यही तात्पर्य है, जिस का निम्न लिखित श्रुति से समर्थन हुआ है.
शेषे वनेषु मात्रोः सन्त्वा मर्चास इन्धते ।
द्रव्यं वहसि हविष्कृदादिद्द वेषु राजसे ॥
- सामसंहिता पूर्व ० १।११ पार्थिव सम्वत्सरचक्र को आसुर - आक्रमण से निकालने के कारण ' दूत ' नाम से प्रसिद्ध, ब्रह्मवर्त्त होने से ' ब्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध, देवताओं तथा पार्थिव मनुष्यों के भरण करने से ' भारत ' नाम से प्रसिद्ध, प्रतिकलित ' अश्व ' मूर्ति सौर तेज से युक्त होकर देवताओं के लिए हविर्वहन करने से ' अश्व ' नाम से प्रसिद्ध इस प्राणाग्नि का - - " अग्नि दूतं वृणीमहे " - " हाँ स ब्राह्मण भारत " - " अश्वो न देववाहनः " इत्यादि रूप से यशोगान हुआ है । हम आहुति देने वाल को देखते हैं, जिस भूताग्नि में आहुति दी जाती है, उसे देखते हैं, जो पुरोडाशादि द्रव्य इस भूतारिन में आहुत किये जाते हैं, उन्हें देखते हैं । परन्तु आहुति ले जाने वाला प्राणाग्नि, प्राणा-ग्नि के द्वारा ले जाया गया आहुतिद्रव्य का प्राणात्मक अंश, प्राणतत्त्वाहुतिग्राहक सौरप्राणदेवता, देवताओं का प्रतिष्ठारूप प्राणात्मक द्युलोक, सभी हमारे लिए अप्रत्यक्ष हैं । कारण है एकमात्र प्राण ' ' का प्राणत्त्व | ' दैवतानि च भूतानि च ' ( शतपथब्राह्मण ) के अनुसार प्रत्येक भौतिक पदार्थ ' प्राण, भूत ' भेद से दो भागों में विभक्त है । विनश्वर क्षरभाग भूतभाग है, एवं यही हमारी दृष्टि का विषय बनता है । अविनश्वर अत्तरभाग प्राणभाग है, यह हमारे लिए सर्वथा अप्रत्यक्ष है । तर-कूटरूप दृश्य भूतभाग की प्रतिष्ठा अक्षररूप प्राणतत्त्व ही माना गया है, जैसा कि - ' चरः सर्वाणि
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श्राद्धविज्ञान भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ' इत्यादि से प्रमाणित है । अदृश्य सुसूक्ष्म अक्षरप्रारण ही दृश्य-स्थूल - भूत की प्रतिष्ठा है । जब तक भूत में प्राण प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक भूत की स्वरूपरक्षा है । जर्जरित वस्तुभूत के लिए किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि - ' अब इसमें दम नहीं रहा ' । यह ' दम ' शब्द-. वाच्य तत्त्व वही प्राणतत्त्व है । क्या किसी प्रत्यक्षाभिमानी ने ' दम ' को अपनी आँखों से देखा है? + शक्ति ( फोर्स ) ही दम हैं, दम ही प्राण है । शक्तिमान् दृष्टि का विषय बनता है । स्वयं शक्ति स्वप्राणधर्म से इन्द्रियातीत है, परन्तु सर्वलोकानुभवसिद्ध सत्तात्मक तत्त्व है । ' रूप - रस- गन्ध-स्पर्श - शब्द ' ये पाँचों भूत के धर्म हैं । अतएव रूपादि पञ्चतन्मात्रायुक्त इन्द्रियवर्ग तद्य क्त भूतभागों काही प्रत्यक्ष करने में समर्थ हैं । प्राणतत्त्व - '- ' रूपरसगन्धस्पर्शशब्दशून्यः, अधामच्छदः ' लक्षण पञ्चतन्मात्रा से भी अतीत है, साथ ही भूतवत् यह स्थान का अवरोध भी नहीं करता ( जगह नहीं रोकता " । एतद्धमविच्छिन्न प्राणतत्त्व ही वैदिक परिभाषा में ' देवता ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जिसके कि - ऋषि, पितर, असुर, देव, गन्धर्व, पशु, आदि असंख्य विवर्त्त माने गए हैं । आहुति का भूत भाग नहीं जाता, प्रारणभाग जाता है । भूताग्नि आहुति नहीं ले जाता, प्राणाग्नि आहुति ले जाते हैं । सौर भूतभाग में आहुतिप्राण प्रतिष्ठित नहीं होता, अपितु सौरप्राण ( देवता ) में प्रतिष्ठित होता है । ऐसी दशा में यह प्राणविवर्त्त क्योंकर दृष्टि का विषय बन सकता है । फिर भी इसके आदान - प्रदान - तृप्ति आदि भावों पर श्रद्धा विश्वास करना पड़ता है, करना चाहिए । और उन लोगों को तो अवश्य ही करना चाहिए, जो वेदप्रामाण्य के प्रति अपना अनन्य स्नेह प्रकट किया करते हैं । प्राकृतिक प्राणदेवता के साथ पार्थिव प्रारणदेवता सजातीयत्त्वेन बद्ध हैं । पार्थिव प्राणदेवता समिन्धन कर्म के द्वारा आहवनीयाग्नि से बद्ध हैं । श्राहवनीयाग्नि स्वप्रतिष्ठ श्राहुतिप्रारण से सम्बद्ध है । हुतिभूत के साथ - ' यावद्वित्तं तावदात्मा ' न्याय से यज्ञकर्ता का आध्यात्मिक प्राणतत्त्वबद्ध है । इस पारम्परिक बन्धनसूत्र से यज्ञकर्ता यजमान का मानुषात्मा शरीर - निधनानन्तर स्वर्लोकस्थ देवमण्डली में प्रतिष्ठित हो जाता है । पार्थिव दितिमण्डलोपलक्षित तमोभाव से निकल कर सौर अदिति मण्डलोप-लक्षित ज्योतिर्भाव से संयुक्त हो जाता है । यही यज्ञकर्म का प्रधान फल है, जिसका निम्न लिखित
शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम ।
दिवं पृथिव्या अध्यारुहामाविदाम देवान्त्स्वज्योतिः ॥
आहुतिद्रव्य भौतिक है । इस द्रव्य के साथ यज्ञकर्त्ता के जाता, तब तक ' यावद्वित्तं तावदात्मा ' चरितार्थ नहीं हो सकता । - यजुःसं ० ८५२ । प्रारण का सम्बन्ध जब तक नहीं प्राण का प्रारण के साथ सम्बन्ध
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# ऋणमोचनोपायोपनिषत् सुकर है । परन्तु विजातीय भूतो के साथ सम्बन्ध हो जाना दुष्कर है । पहिले इस विप्रतिपत्ति का समाधान उस प्राजापत्यसृष्टि से कराना चाहिए, जो प्रारण - भूत के समन्वय से प्रजासर्गमयी बन रही है । वैज्ञानिक समाधान करते हैं कि, भूतसृष्टि मैथुनी सृष्टि है । एवं मैथुनी सृष्टि में आपोमय परमेष्ठी के आप्यतत्त्व का सहयोग है । सरिर - इरारूप सलिललक्षण आपोभूत ही भूतसृष्टि का प्रवर्त्तक है । आप्यप्राण ने स्वस्नेहधर्म से इतर प्राणों का इस भूतसर्ग के साथ समन्वय कर रक्खा है । श्राप्य प्रारण ही एक वैसा मध्यस्थ द्वार है, जिसके द्वारा विज्ञातीय भूतों में विजातीय प्राणों का सन्धान हो जाता है । यही कारण है कि भारतीय धर्मशास्त्रविहित प्रत्येक कार्य में पानी ही संकल्प के द्वारा मूलप्रतिष्ठा बनता है, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन शतपथ विज्ञानभाष्यान्तर्गत ' ' अपां प्रणयन ' नामक प्रकरण दृष्टव्य है । प्राण का प्राण के साथ, किंवा प्राण का भूत के साथ अपतत्त्व से ही सम्बन्ध सम्भव है, एकमात्र इसी दृष्टि से प्रारण को आपोमय माना गया है, जैसा कि - ' आपोमयः प्राणः ' इत्यादि वचन प्रमाणित है । बिना पानी के प्राण नग्न है, अव्यवस्थित है, अपरिमित है, अतएव परिमित भूत-सम्बन्ध से वञ्चित है । प्रारण कहता है - में नग्न हूँ । ऋषिपूछते हैं कि - कातेऽनग्नता ' ' प्राण उत्तर देता है - ' आपो वा अनग्नता ' । प्राणाग्नि का भूतान्न के साथ अन्तर्य्यामि सम्बन्ध करने के लिए ही तो अन्नयज्ञ ( भोजन ) के उपक्रमोपसंहार में अमृतापिधान, अमृतोपस्तरण, रूप से त्रिवार आचमन करने का विधान हुआ है । भूतों में प्राणों का समन्वय एकमात्र आध्यतत्त्व द्वारा ही सम्भव है । इसी आप्यतत्त्व को वैज्ञानिकों नें - ' श्रद्धा वा आप: ' रूप से ' श्रद्धा ' नाम से व्यवहृत किया है, जिसका कि अनुपद में ही विश्लेषण होने वाला है । इस श्रद्धातत्त्व का आगमन अन्न के द्वारा होता है | अन्नद्वारा आगत आप्य श्रद्धातत्त्व अन्नमय मन में प्रतिष्ठित होता है । मनोमयी श्रद्धा ही ' प्राणबन्धनं हि सोम्य | मनः के अनुसार भूत के साथ प्राणबन्धन का कारण बनती है । इस प्रकार यज्ञकर्त्ता की मानस श्रद्धाही इसके अग्नित्रयमूत्ति भूतात्मानुगत देवताओं का आहुतिभूत के साथ सम्बन्ध कराती है । श्रद्धा से विहित आहुति बन्धन ही आध्यात्मिक स्वप्राण की प्रतिष्ठा का कारण है । यजमान के हृद्य मन से आरम्भ कर सूर्यकेन्द्र पर्यन्त श्रद्धासूत्र वितत है । इसी के आधार पर यजमान आहुति देता है, इसी के आधार से प्राणाग्नि आहुतिप्रारण ले जाता है, इसी पर प्रतिष्ठित द्युलोकस्थ देवता आहुतिप्रारण से तृप्त होते हैं, इसीसूत्र के द्वारा पार्थिव यजमान पर उनका अनुग्रह होता है । इस प्रकार यज्ञात्मक सम्पूर्ण भूतसर्ग श्रद्धामय बन रहा है । श्रद्धातत्त्व की इसी सर्वव्याप्ति को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि ने कहा है १ - श्रद्धयाग्निः समिध्यते, श्रद्धया हूयते हविः । श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥ ( ऋक् सं ० १०।१५१।११. ) । -श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते । श्रद्धां हृदयाकृत्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥ ( ऋक्सं ० १०।१५१।५ । ) ।
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श्राद्धविज्ञान ३ - श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि । श्रद्धां सूर्य्यस्य निश्रुचि श्रद्धे श्रद्धापये ह नः ॥ ( ऋक्सं ० १० १५१।५ । ) । ४ - प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः । प्रियं भोगेषु यज्वा स्विदं उ उदितं कृधि ॥ ( ऋक्सं ० १२० १५१।२ ) । ५ - श्रद्धा देवानधि वस्ते ' श्रद्धा विश्वमिदं जगत् ' । द्धां कामस्य मातरं हविषा वर्द्धयामसि || ( तै ० ना ० ) । जिस प्रकार प्रारणात्मक, अतएव इन्द्रियातीत मनोमय श्रद्धासूत्र के द्वारा देवयज्ञकर्त्ता से प्रदत्त आहुति प्राणाग्नि के द्वारा सूर्य्यलोकस्थ देवप्रारण की तृप्ति का कारण बन जाती है, एवमेव उसी श्रद्धासूत्र के द्वारा पितृयज्ञकर्त्ता पुत्रादि के द्वारा प्रदत्त पिण्ड प्राणात्मना उसी प्राणाग्नि के द्वारा ( वस् - रुद्र-श्रादित्यात्मक अङ्गिराग्नि के द्वारा, जिसे पितृदेवता कहा गया है ) चन्द्रलोकस्थ प्रतपितृप्राण की तृप्ति का कारण बन जाता है, जिस प्राप्ति के आधार भूत श्रद्धातत्त्व का निम्नलिखित शब्दों में यशोगान. किया जा सकता है । ' ' श्रद्धा ' का तात्त्विक स्वरूपविज्ञान-' रेतः, श्रद्धा, यशः ' नामक चन्द्रमा के तीन मनोताओं की ओर लक्ष्य देना आवश्यक है । चान्द्ररस की घनावस्था ' रेतः ' है, तरलावस्था ' श्रद्धा ' है, विरलावस्था ' यश: ' है । तीनों तत्त्व ' सोना-नुबन्धी हैं । परमेष्ठी का प्रवर्ग्याशरूप चन्द्रमा तद्रूप श्रद्धातत्त्व से नित्य युक्त है । चान्द्रमण्डल में अभिव्याप्त यही श्रद्धात्मिका ' आप ' आदित्याग्नि के परिपाक से सोमरूप में परिणत हो जातीं हैं । विशुद्ध प्रथमावस्था श्रद्धा है, आदित्याग्निगर्भगता द्वितीयावस्था सोम है । पर्जन्याग्नि सम्बन्ध से सोम वृष्टिरूप में परिणत होता है । पार्थिवाग्नि में हुत वृष्टि औषधिरूप में परिणत होती है । पुरुषाग्नि मैं हु घोषधि शुक्ररूप में परिणत होती है । योषिदग्नि में आहुत शुक्र पुरुष ( अपत्य ) रूप में परिणत हो जाता है । इस प्रकार क्रमिकधारा से वही चान्द्र श्रद्धातत्त्व पाँचवी आहुति में पुरुषरूप में परिणत हो जाता है । श्रद्धा को पारमेष्ठ तत्त्व बतलाया गया है । साथ ही ' ऋणस्वरूपपरिचय ' में यह स्पष्ट • किया गया है कि, पारमेष्ठ्य अपतत्त्व भृगुः - श्रङ्गिरा भेद से दो अवस्थाओं में परिणत रहता है । भृगुमीपः पितृसृष्टि का मूल है, अङ्गिरामयी आप: देवसृष्टि की प्रतिष्ठा है । इस प्रकार स्नेह-लक्षण भृगु, तेजोलक्षण अङ्गिरा के भेद से पारमेष्ठ श्रद्धातत्त्व स्नेह - तेजो - नामक दो धाराओं में विभक्त हो जाता है । स्नेहमयी श्रद्धानाड़ी सजातीय सम्बन्धेन चान्द्रमण्डल से सम्बद्ध है, तेजोमयी १२८
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प्रे ऋणमोचनोपायोपनिषत् श्रद्धानाड़ी सजातीय सम्बन्ध से सौरमण्डल से सम्बद्ध है । सौरतेजोयुक्त तेजोमयी श्रद्धानाड़ी का मनोगर्भित बुद्धि के साथ सम्बन्ध है । चान्द्रस्नेहयुक्त स्नेहमयी श्रद्धानाड़ी का बुद्धिगर्भित मन के साथ सम्बन्ध है । सौर श्रद्वासूत्र देवयज्ञ की प्रतिष्ठा है, चान्द्र श्रद्धासूत्र पितृयज्ञ का प्रवर्त्तक है । इस प्रकार भृगु - अङ्गरा के भेद से एक ही श्रद्धातत्त्व सूर्य चन्द्रमा को अपना अधिष्ठान बनाता हुआ दो सृष्टियों का प्रवर्त्तक बन रहा है । जिनमें से चान्द्र श्रद्धानुगता पितृसृष्टि ही प्रक्रान्त प्रकृत प्रकरण का मुख्य लक्ष्य है । चान्द्र सोममय यह श्रद्धातत्त्व परम्परया शुक्र में प्रतिष्ठित होता हुआ चान्द्र सोममय मन का आधार बन रहा है । हमारा अन्नमय प्रज्ञान मन ' श्रद्धा ' रसमय है । यह श्रद्धारस यद्यपि स्वस्व -रूप से निर्धक है । तथापि आगे जाकर सात्त्विक - राजस - तामसादि गुणभेदभिन्न तत्तत् पार्थिवान्न-रसों के समन्वय से यह अनेक धम्मों से आक्रान्त हो जाता है । श्रद्धातत्त्व को दिव्य स्वरूप से क्षित रखने के लिए ही दिव्यभावोपेत सात्त्विक आहार - विहित हैं । सत्त्वगुणोपेता श्रद्धा ही वास्तव सुर-में श्रद्धा है । विपरीत श्रद्धा कुश्रद्धा, किंवा अश्रद्धा है । सत्यभावोपेत इस ' श्रद्धा ' शब्द का निर्वचन है-' श्रतो हीदं धानम् ' यह । सत्यतत्त्व ही ' श्रत् ' है । विद्यमान वस्तुतत्त्व में जो एक अन्य पदार्थ श्रभाव से प्रतिष्ठित रहता है, वही आश्रित ' सत्य ' है । अतएव ' तदन्यच्छ यते ' इस निर्वचन से वह ' तू ' कहलाया है । जिस आत्मप्रतिष्ठात्मक सत्तारस के आधार पर आत्मगत सत्यभाव अन्यत्र ( पदार्थों में ) समन्वित होता है, तू को धारण करने वाला वह रससूत्र ही ' श्रद्धा ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इस श्रद्धासूत्र के प्रभाव से उस पुरुष का आत्मा ' इदमित्थमेव नान्यथा ' इस भाव श्रद्धेय के साथ सम्बन्ध स्थापित करने में समर्थ हो जाता है । कहा गया है कि हमारा मन स्नेह-गुणान्विता श्रद्धा से आप्लावित है । श्रद्धामय यह मन जिस के साथ संलग्न हो जाता है, तन्मय बन जाता है, जैसाकि श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव स: ' ( श्रीम ० भ ० गीता ) - ( तं यथा यथोपासते, तथैव भवति ” ( छान्दोग्य उप ० ) इत्यादि प्रमाणों से प्रमाणित है । एक बार श्रद्धा के द्वारा श्रद्धालु का मन जिस के प्रति आत्मसमर्पण कर देता है, फिर उस श्रद्धेय में भले ही दोष रहें, श्रद्धालु उन पर प्रथम तो ध्यान ही नहीं देता, अथवा तो दोषों को भी गुण मान लेता है । इसी आधार पर दर्शनभाषा में श्रद्धा का निम्न लिखित लक्षण हुआ है -. " दोषदर्शनानुकूलवृत्तिप्रतिबन्धकवृत्तिधारणं श्रद्धा " इतना स्मरण रखिये कि, यदि हमारा श्रद्धासूत्र अन्नदोष, सङ्गदोष, शिक्षा ( पर शिक्षा ) दोष, श्रधर्मानुगमन, आदि से मलिन हो गया है, तो श्रद्धा पूर्वकथनानुसार अश्रद्धाभाव में परिणत हो जाती है । ऐसी श्रद्धात्मिकां श्रद्धा ही ' अन्धश्रद्धा ' कहलाई है, जो हमें सत्यपथ से, सत्यदर्शन से वञ्चित रखती है, एवं सत्यपथ में हमें अभिनिविष्ट कर देती है । इसी अन्धश्रद्धा के कारण .१२६
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श्राद्धविज्ञान हम अपने कल्पित सिद्धान्तों का अभिनिवेश पूर्वक अनुगमन करते हुए अपना भी सर्वनाश करा लेते हैं, साथ ही दूसरे मुग्ध - अज्ञ जनों को भी उत्पथोपासक बनाने का पाप करते रहते हैं । स्मरण रखिए, पलायित भी सम्पूर्ण विश्व वभव प्रयास के द्वारा फिर भी हमें मिल सकता है । परन्तु उत्क्रान्त श्रद्धा - विश्वास पुनः नहीं लौटा करते, जिन के बिना हम सर्वथा इन्द्रियमात्रपरायण पशुभाव में परिणत हो जाया करते हैं । इसलिए श्रद्धा ' च मा नो व्यगमत् ' यही हमारा जीवनत्रत होना चाहिए । बतलाया जा चुका है कि, श्रद्धा की प्रतिष्ठा अन्न के द्वारा होती है । यह अन्न " पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, कर्म्म, ज्ञान " भेद से – “ यत् सप्तान्नानि तपसाऽजनयत् पिता " इत्यादि औपनिषत् - सिद्धान्त के अनुसार सात भागों में विभक्त है । गुणत्रयभेदमूला योगमाया के अनुग्रह से सातों अन्न सत्त्व, रज, तमो भेद से तीन तीन श्रेणियों में विभक्त हैं । जिसे सामान्य मनुष्य अन्न ( जौ, गेहूँ आदि ) कहते हैं, वह पार्थिव अन्न है । मिट्टी ही जो गेहूँ रूप में परिणित होती है । सात्त्विक • वृत्या उपार्जित द्रव्य से क्रीत सात्त्विक जौ - चाँवल - मूँग आदि पार्थिव अन्न सात्त्विक हैं । रजोवृत्या उपार्जित द्रव्य से क्रीत राजस गेहूँ - तिल - मोठ- चरणक आदि पार्थिव अन्न राजस हैं । तमोवृत्या उपार्जित द्रव्य से क्रीत उर्द - लशुन - पलाण्डु - गृञ्जन - आदि पार्थिव अन्न तामस हैं । प्रवाहित - शुद्ध - पूतजल सात्त्विक . है, कूपादि जल राजस है, अव्ययीभूत- पूतियुक्त जल तामस है । प्रातःकाल का सौरतेज सात्त्विक है, मध्याह्न का सौर सात्त्विक - राजस है । सायंकाल का राजस - तामस है । एवं गतप्रकाश तामस हैं । इसी को असुरों का मुख्य अन्न माना गया है । ( देखिए शत ० १२५ ३ ) । प्रातःकाल का वायु सात्त्विक, मध्यान्ह का राजस, सायंकाल का तामस, रात्रि का घोर तामस है । शुद्ध - पूत अनुद्वेगकर आकाश ( शब्द ) साविक है, शासनयुक्त शब्द राजस है, क्रूर शब्द ताम्स है । शास्त्रविहितकर्म सात्विक है, विकर्म ( शास्त्र निषिद्ध ) राजस है, अकर्म ( निरर्थक कर्म्म, अविहिताप्रतिषिद्ध कर्म्म ) तामस है । परमार्थ ज्ञान सात्त्विक है, व्यावहारिक ज्ञान राजस है, मोहात्मक भ्रान्तिज्ञान तामस है । यदि गुणत्रय के अवान्तर तारतम्यों की मीमांसा की जाती है, तो इन के अवान्तर असंख्य भेद हो जाते हैं । शैशव अवस्था से सात्त्विक - ज्ञान - कर्म - पञ्चान्न के अनुगामी की श्रद्धा का स्वरूप कुछ ओर ही होगा, राजस - तामस सप्तान्नों के अनुगामियों की श्रद्धा का उक्थ विभिन्न ही प्रकार का होगा । इसी अन्नदोष से, आलस्यदोष से, वेदानभ्यास से, आज भारतीय प्रजा का श्रद्धासूत्र मलिन हो रहा है । आज पातक कन्मों में हमारी अनन्य श्रद्धा है, अभ्युदय पथ श्रश्रद्धेय बन रहा है । शास्त्र की प्रत्येक आज्ञा का तिरस्कार, पातक प्रत्येक कार्य्यं का ग्रहण ही जीवनव्रत वन रहा है । इसी श्रद्धासूत्रदोष से तत्प्रतिष्ठ आवश्यकतम श्राद्ध जैसा वैदिक कर्म्म भी वेदभक्तों के लिए भी श्रद्धय बन रहा है । मलिनप्राय श्रद्धासूत्र के पुनः नैर्मल्य के लिए ही उक्त सत्यश्रद्धा का स्व-रूप स्पष्ट किया गया है । १३०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् तत्त्वतः मनोऽवच्छिन्न वह चान्द्ररस ही श्रद्धा है, जो अन्य विषयों के साथ अध्यात्म का ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध करा देता है । अपनी भोग्यवस्तुओं के साथ, समान शील- व्यसन - प्राणियों के साथ इसी सूत्र से सम्बन्ध हुआ करता है । ' अमुक व्यक्ति हमारा सम्बन्धी है ' इस उभय-निष्ठ सम्बन्ध को सुरक्षित रखने वाला सूत्र यही श्रद्धा है, जो सापिण्ड्य - सोदक - सगोत्र- स्वजाति-आदि सम्बन्धों के तारतम्यों से प्रतिष्ठित रहता है । इन सर्वविध सम्बन्धों में सापिण्ड्यभाव - संरक्षक श्रद्धासम्बन्ध ही दृढतम माना गया है । शुक्रस्थ महानात्मा से युक्त इसी श्रद्धासूत्र के द्वारा चन्द्रलोकस्थ पितृपिण्डों का तत् पुत्रादि के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध बना रहता है । यही उभयनिष्ठ सम्बन्धसूत्र प्रक्रान्त इस श्राद्धकर्म की प्रतिष्ठा बनता है । एकविंशतिकलात्मक शरीरारम्भक पितृपिण्ड भी सोममय है, इधर श्रद्धासूत्र भी, चान्द्ररस प्रधान बनता हुआ सोममय ही है । इसी सजातीय श्रद्धासूत्र के आधार पर ( जो कि श्रद्धासूत्र सन्तान के महानात्मपिण्ड से आरम्भ कर चन्द्रस्थ तत् प्रतपिण्डपर्यन्त वितत है ) उन प्रतपिण्डों के कुछ सहभाग श्रात्मवेयरूप से उन्हीं में प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं कुछ सहोभाग तन्यरूप से सन्तानों में न्युप्त रहते हैं । एक ही पितृपिण्ड के दो विभिन्न भाग ( आत्मधेय और तन्य ) बिना किसी अभिन्न आधार के चन्द्रमा पृथिवी, दोनों पर एक ही काल में प्रतिष्ठित रहें, यह असम्भव है । मानना पड़ेगा कि अवश्य हो सर्वथा विदूरस्थित पिण्ड के दोनों भागों का कोई न कोई अभिन्न नियामकसूत्र है । चर्म्मचक्षुओं से सर्वथा परोक्ष वही सूत्र विज्ञानभाषा में ' श्रद्धा ' नामसे प्रसिद्ध हुआ है । श्रद्धामय श्रद्धासूत्र— परलोक में अनुधावन करना व्यर्थ है, जब कि इसी लोक में श्रद्धा का अनुमान द्वारा हमें साक्षात् हो रहा है । किसी व्यक्ति का कोई सम्बन्धी उस से कोसों दूर रहता है । वह किसी भया-नक रोग से सहसा आक्रान्त हो जाता है । उस विदूरस्थ सम्बन्धी के रोगाक्रान्त होते ही तदव्यव-हितोत्तरक्षण में हीं यहाँ रहने वाले सम्बन्धी के हृदय पर आघात हो पड़ता है, चित्त व्याकुल हो जाता है, वामाङ्ग ( पुरुष का, यदि स्त्री है तो दक्षिणाङ्ग ) स्फुरण होने लगता है । ये सब उसी श्रद्धासूत्र के व्यापार हैं । विदूर देशस्थ स्नेही यदि अन्यदेशस्थ अपने स्नेही का स्मरण ( याद ) करता है, तो वितत श्रद्धासूत्र कम्पित हो पड़ता है । इस कम्पन से स्मृत स्नेही के हृदय पर आघात होता है । आहत हृदय मन पर, मन कायाग्नि पर, कायाग्नि श्वास वायु पर आघात करता है । जिस प्रकार पानी में प्रविष्ट वायु बुद्बुद उत्पन्न कर देता है, तथैव कम्पित श्रद्धासूत्र लहर पैदा कर देता है । वह वायुमयी तरङ्ग ही ' हिक्का ' ( हिचकी ) नाम से प्रसिद्ध है । यही कारण है कि, एक स्वस्थ - नीरोग व्यक्ति को यदि हिचकियाँ आने लगती हैं, तो कहा जाता है - ' आज कोई हमें याद १३१
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श्राद्धविज्ञान कर रहा है ' । तद् व्यक्ति का स्मरण करते ही नाम लेते ही हिक्का अवरुद्ध हो जाती है । यही श्रद्धासूत्र का लौकिक निदर्शन है । " आप अपने चर्मचक्षुओं से श्रद्धासूत्र का अवलोकन नहीं करते, इसलिए आप उसे नहीं मानते " यह तर्क नहीं कुतर्क है, विशुद्ध अभिनिवेश है, जो सर्वथा अविचिकित्स्य माना गया है । आप का उपास्य ईश्वर भी तो निराकारत्त्वेन अप्रत्यक्ष है, आत्मा भी तो अमूर्त है, मुक्ति भी तो इन्द्रियातीत तत्त्व है । सब का परित्याग कीजिए । परिमितज्ञानानुगत मनुष्य क्या कभी सर्वज्ञ बन सकता है?, फिर जिन्हें मनुष्य अल्पज्ञ - अल्पकाय समझता है, उन में भी वह ज्ञानशक्ति प्रतिष्ठित है, जिसकी ठहर सकता एक पिपीलिका ( चिऊँटी ) को देखिए । मनुष्य की अपेक्षा में ' मनुष्य नहीं 1 तुलना अल्पतम चिन्मात्रा से युक्त यह सुगुप्त स्थान स्थित पदार्थ के जिस गन्ध का परिचय प्राप्त कर लेती है, ज्ञानाभिमानी मनुष्य इस शक्ति से वञ्चित है । पुरुष जिस मार्ग से निकलता है, उस मार्ग में चान्द्रसोममयी श्रद्धा में प्रतिष्ठित अथर्वा नामक गन्धर्व प्राण अनुशयरूप से मिट्टी में व्याप्त हो जाता है । ' सरमा ' नामक जाति विशेष में उत्पन्न एक श्वान उस प्राण को पार्थिव गन्ध के तारतम्य से पहिचान कर गन्ता पुरुष का पता लगा लेता है । क्या आप हम भी ऐसा कर सकते हैं?, श्रद्वा-सूत्र के सम्बन्ध में भी हमारी यही अवस्था है । दो सम्बन्धियों का, किंवा अनेक सम्बन्धियों का परस्पर सम्बन्ध बनाए रखने वाला श्रद्धासूत्र प्राणधर्मत्वेन इन्द्रियातीत होने से यद्यपि हमारी ष्ट नहीं आता, तथापि अतीतानागतज्ञ - विदितवेदितव्य - अधिगतयाथातथ्य महर्षियोंनें अपनी आर्ष-दृष्टि से उस का विज्ञानचक्षु से साक्षात्कार किया है । उन्हीं की ओर से शब्द ( श्रुति ) द्वारा वह तत्त्व हमारे सम्मुख उपस्थित हुआ है । जैसा कि बतलाया गया है, ईश्वर, आत्मा, प्राण, आदि इन्द्रिया-तीत तत्त्वों सम्बन्ध में आप्तवाक्य ही एकमात्र श्रेयः पन्था है । चिरायता ज्वरन है, यह आँख से न देखने पर भी ' तत्रभवान् ' भिषग्वर के शब्दों पर विश्वास करना पड़ता है । यदि आप्तवाक्य - प्रामाण्य को आधार नहीं माना जायगा, तो पारलौकिक ' विषयों की कौन कहे, ऐहलौकिक व्यवहार की सुरक्षित न रक्खे जा सकेंगे । अपने अन्तर्जगत् में वस्तु-स्थिति का अनुभव करते हुए भी, व्यावहारिक जगत् में अनुभव में लाते हुए भी, कल्पित सिद्धान्त के अभिनिवेश में पड़ कर नित्यसिद्ध वैज्ञानिक कम्मों के प्रति उदासीनता रखना कौन सी बुद्धि-मानी है? ' इति त एव प्रष्टव्याः । पितृतत्त्व, तत्सम्बन्धी साम्पराय, पितृयज्ञ, ये सब तत्त्व सुसूक्ष्म हैं । सामान्य पुरुष इस रहस्य को नहीं जानता । आप्तोपदेश ही इस की प्रवृत्ति का मुख्य आधार . है । परीक्षक विद्वानों के द्वारा आदिष्ट इस आवश्यक पितृयज्ञ को कभी कुतर्क का अनुगामी नहीं बनाना चाहिए । यही आदेश करते हुए, साथ ही अभिनिविष्टों की दुर्गति का विश्लेषण करते हुए स्वयं ' यमराज ' कहते हैं-१३२