Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 181–190

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 181–190

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ऋणमोचनोपायोपनिषत्

१ – अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।

` दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥

२ – न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं विचमोहेन मूढम् ॥

लोको, नास्ति पर, इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे

३ – श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।

वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चय्यों ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥

४ - न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।

अनन्यप्रोको गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमनुप्रमाणात् ॥

५ – नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्र ेष्ठ! यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ - कठोपनिषत् १ । २।५-० । श्रद्धासूत्रानुगत - श्राद्धकर्म्म-पाञ्चभौतिक शरीर से आत्मा एक पृथक् तत्त्व है, पहिले तो इस प्रकार का आत्मबोध ही कठिन | आत्मा स्थूलशरीर की विच्युति के अनन्तर अङ्ग ुष्ठमात्र प्रतिवाहिक शरीर धारण कर यामीयातना के भोगार्थ लोकान्तर में जाता है, इसके साथ चन्द्रलोक पर्य्यन्त उत्क्रान्त महानात्माका सम-न्वय रहता है, चन्द्रलोक प्राप्त होने पर महानत्मा तो वहीं रह जाता है, भूनाला लोकान्तरानुगमन करता है, इन सब र्त न्द्रिय भावों का परिज्ञान प्राप्त कर लेना और भी कठिन । इन सब समस्याओं से सर्वसाधारण के वचने का एकमात्र उपाय है- ' शात्र पर विश्वास, आप्तवचनों पर अनन्य श्रद्धा । हाँ, यदि कर्म्म करते हुए स्वजिज्ञासापूर्ति के नाते हम इन विषयों का स्वाध्याय - मनन करते रहेंगे, तो अवश्य ही कालान्तर में श्रद्धादा हो जायगा । प्रकृत सन्दर्भ से बतलाना यही अभी है कि, परोक्ष श्रद्धासूत्र ही श्राद्धान्नप्राप्ति का अन्यतम द्वार है । इसी श्रद्धासूत्र के आधार पर पिण्डगत प्राणों से चान्द्रलोकस्थ पितरों के अपूर्ण पिण्डों को तृप्त किया जाता है, अतएव यह कर्म ' श्राद्ध ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जैसा कि आगे जा कर स्पष्ट होने वाला है । सन्ततिनिरोधक पितृदोष-उस र चन्द्रलोकस्थ प्रतपिण्डों से, इस ओर तदुवंशोत्पन्न पुत्र के पिण्ड से बद्ध श्रद्धासूत्र सदा एकरस रहता है, अथवा इसमें परिवर्तन भी सम्भव है?, यह प्रश्न उपस्थित होता है । प्रसङ्गोपात्त इस का भी निर्णय कर लीजिए । “ चन्द्रलोकस्थ प्रतपितर ही स्वसहोदान से स्व-१३३

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श्राद्धविज्ञान सन्तानों के आरम्भ ( उपादान ) बनें हैं । उन प्रतपितरों के कुछ सहांसि तो आत्मघेयरूप से उन्हीं में प्रतिष्ठित रहते हैं । एवं शेषांश तन्यरूप से पृथिवी पर प्रतिष्ठित रहते हैं । इन आत्मधेय तन्य,. नामक दोनों पिण्डों को एक सूत्र में सम्बद्ध रखने वाला श्रद्धासूत्र दोनों का परस्पर उपकार्य्य-उपकारक सम्बन्ध सुरक्षित रखता है " यह उक्तप्राय है । यह सम्बन्धसूत्र इतर किसी प्रारणाक्रमण से न नष्ट किया जा सकता, न क्षीण किया जा सकता । यह सदा स्वस्वरूप से अनुच्छित्तिधर्मा बना रहता है । केवल पिण्डद सातवें पुरुष की उत्क्रान्ति ( मृत्यु ) ही एक पुरुष ( वृद्धातिवृद्धप्रपितामह ) के श्रद्धास्त्रोत्क्रान्ति का कारण बनती है । यदि इससे बीच में ( सपिण्ड सप्तक में ) किसी दृष्ट से सूत्रोच्छेद हो जाता है, तो इससे प्रतपितरों का तो अनिष्ट होता ही है, साथ ही उन का वंशज भी सन्तानन्तु - वितान से वञ्चित हो जाता है । इसी श्रद्धासूत्र के द्वारा चान्द्रपितर वंशज के शुक्र में प्रति-ष्ठित स्वपिण्डभावों को सबल बनाए रखते हैं । सूत्रविच्छित्ति पर बजाधान अवरुद्ध हो जाता है । सन्तति अवरोध के आठ दोषों में से यहीं एक ' पितृदोष ' है । -श्रद्धा के तारतम्य श्रद्धासूत्र में तारतम्य-उक्त श्रद्धासूत्र का उच्छेद अन्य से तो सम्भव नहीं है । हाँ, यदि पुत्र महोदय यह पातक करना चाहें, तो उन्हें अवश्य इस जघन्यकर्म में सफलता मिल सकती है । जिस पुत्र का मानस क्षेत्र परशिक्षा, कुसंग, काल, वातावरण, अन्नव्यतिक्रम, आदि दोषों के आवरण से आवृत हो जाता है, उसका क्षेत्र पितृ - अनुगत श्रद्धासूत्र से वञ्चित हो जाता है । विजातीय- घातक अन्तराय श्रद्धासूत्र का आत्यन्तिकरूप से अभिभव कर डालते हैं और यही अभिभव श्रद्धोच्छेद कहलाया है । परिणाम इस श्रद्धासूत्राभिभव का यह होता है कि, इसकी प्र ेत पितर, परलोक स्वर्ग, आदि किसी पर श्रद्धा नहीं रह जाती । सत्यत्त्वधारक श्रद्धान के तिरोभाव से श्रद्धासूत्र उच्छिन्न हो जाता है । ऐसे विच्छिन्न सूत्री, सूत्रविच्छेदक, भाग्यहीन, कुलकलङ्क, श्रद्धाशून्य पुत्रद्वारा प्रदत्त पिण्ड चान्द्र पितरों की कोई तृप्ति नहीं कर सकता । श्रद्धासूत्र ही तो पिण्डप्राण का अतिवहन करने वाला ऋजुमार्ग है । जब वह टूट गया, तो पिण्डप्राप्ति कैसी । बिना श्रद्धासूत्र - सहयोग का श्राद्ध श्राद्ध नही, श्रश्राद्ध है । ऐसा श्रश्राद्धलक्षण श्राद्ध गोत्रवर्द्धक नहीं, अपितु वंशविनाशक है । कहना न होगा कि, श्राद्ध की प्रामा-किता का समर्थन करने वाले कतिपय ( विशेषतः ) सनातनधर्मावलम्बी महोदयों की वर्त्तमान दुर-• वस्था इसी अभिशाप का प्रतिफल है । जो नहीं करते, उनका अनिष्ट तो मर्थ्यादित है । परन्तु जो करने का बहाना कर श्रद्धा को गर्भ में रखते हैं, उनका अनिष्ट तो अमर्यादित है । अतिथि को न बुलाना वैसा हानिप्रद नहीं, किन्तु बुला कर उसे निराश लौटा देना अर्थपरम्परा को सादर निमन्त्रित करना है । अस्तु, इस फलाफल का विचार आगे होने वाला है । अभी इस सम्बन्ध में ही है कि, ' केवल पुत्र ( कुपुत्र ) के श्राद्ध न करने से, तथा अश्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से तो श्रद्धासूत्र उच्छिन्न हो जाता है, एवं यथाविधि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से श्रद्धासूत्र अविच्छिन्न बना रहता है । इस प्रकार पुत्र की श्रद्धा के तारतम्य से श्रद्धासूत्र में तारतम्य हो जाता है । १३४

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पिदुणांसायङ्कालः शुक्लाष्टमी पत्र - अहोरात्र परिलेख: -शुक्लपक्षः रात्रेः पिन्ट → अहोरात्र विभाजि मध्यरात्रः पूर्णिमा दि तिः / अमावास्या मधान्ह कृष्णाः पक्षः पिन्हणां अहः कृष्णाष्ट कालः प्रातः पिन्हणां

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श्र पाणाप पपात् परिलेख: ,,, सूर्य्यः चन्द्रमा पुत्र सोमः कृष्णाः, अच्चम > पितृसोमरयापचय: ' कृष्णासीमस्योपचयः उपचितानि श्रद्धा सूत्रायिि . न्युप्त पिण्डो पेताः प्रजा : श्रद्धापुष्टिः उपाचितसोमसम्बन्धात्

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। पितृप्राणोपचय - श्रद्धापचयात्मकः-परिलेख: -चन्द्रमाः पूरीन्दुः अपचितसोमसम्बन्धात् श्रवाकासः श्रद्धा सूर्य्यः पिण्डो पेताः प्रजाः अन्तम : शुक्ल वृत्रसोमः सूत्राणि श्रद्धा अपनि The hikin पितृसोम: अन्नमाः पितृसमस्योपचयः

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ऋणमोचनोपायोपनिषत प्राकृतिक हेतु के द्वारा श्रद्धांसूत्र की हास - वृद्धि-एक दूसरा हेतु ओर । प्रकृति भी आंशिकरूप से इस श्रद्धासूत्र में उच्चावचभाव उत्पन्न करती रहती है । श्रद्धासूत्र चान्द्ररस - ( सोम ) - मय बतलाया गया है । दूसरे शब्दों में चन्द्रमा ही इसका प्रभव है । चान्द्र केन्द्र ही इसकी मूलप्रतिष्ठा ( खूँटा ) है | श्रद्धाप्रभव चन्द्रमा यदि सदा एकरस रहता, तब तो तत्कार्य्यभूत श्रद्धारस भी सदा एकरस ही बना रहता । परन्तु देखते हैं कि, चन्द्रमा कभी समानस्थिति में नहीं रहता । अपने इसी परिणामी भाव से चन्द्रमा ' चन्द्रमा ' कहलाया है । भूपिण्ड के चारों ओर ' दत्तवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध स्वकता पर चन्द्रमा परिक्रमा लगाता है । अह-र्गणों से सम्बद्ध ‘२२ -२३ - २४ ' इन ' स्वरसाम ' नामक तीन गणों के सम्बन्ध से यह चान्द्रपरिभ्रमण पै अवर, मध्यम, पर, भेद से तीन अवस्थाओं में विभक्त हो जाता है । २२ वें स्वरसाम के सम्बन्ध से भूपिण्ड के नियत अवरस्थान में घूमता है, २३ वें स्वरसाम के सम्बन्ध से यह भूपिण्ड के नियत मध्यमस्थान में घूमता है, एवं २४ वें स्वरसाम के सम्बन्ध से परस्थान में घूमता है । अवरस्थानस्थिता चन्द्रच्छाया से खग्रासात्मक सूर्य्यग्रहण होता है, मध्यमस्थानस्थिता चन्द्रच्छाया से सर्वग्रास होता है, एवं परस्थानस्थित चन्द्रच्छाया से कटकग्रास होता है । त्रिस्थानात्मिका गतित्रयी हो चन्द्रमा का पहिला विपरिणामभाव है । स्वनक्षत्रों को साथ लिए हुए चन्द्रमा पृथिवी, सूर्य्य, अयन, तीनों की परिक्रमा लगाता है । पार्थिव परिभ्रमण २७ दिन ७ घन्टा ४३ मिनिट में समाप्त होता है । यही एक चान्द्रमास है । इस चान्द्रमास के सम्बन्ध से चान्द्रसम्वत्सर के ३३३ दिन हो जाते हैं । दूसरे शब्दों में नक्षत्रसम्बन्धेन चन्द्रसम्वत्सर ३३३ दिन कां हो जाता है । गवामयनादि सत्रों का एतदिन संख्याक चान्द्रसम्वत्सर से ही सम्बन्ध माना गया है । पृथिवीवत् पृथिवी के साथ साथ सूर्य के चारों ओर भी चन्द्रमा का परि-भ्रमण स्वतः सिद्ध है । अश्विनीनक्षत्र से चला हुआ चन्द्रमा उसी अश्विनी पर ३५४ वें दिन आता है । इस प्रकार सूर्य - सम्बन्धेन चान्द्रसम्वत्सर ३५४ दिन का हो जाता है । तीसरी अयन परिक्रमा २५ हजार वर्षों में समाप्त होती है । यही गतित्रयरूप दूसरा विपरिणाम है । पार्थिव परिभ्रमणात्मक मासिक परिभ्रमण में भी चन्द्रमा सम नहीं रहता । श्रमोत्तर प्रति-पत् से आरम्भ कर अमा पर्य्यन्त प्रत्येक तिथि में चान्द्रज्योत्स्ना का पार्थिव भोग सर्वथा विभिन्न है । इसी परणाम भाव के कारण ' चन्द्रः सन् मस्यति ' निर्वचन से इसे ' चन्द्रमाः ' कहना अन्वर्थ बन रहा है । परिवर्त्तनशील तत्त्व ' मस्यति ' निर्वचन से ' मा ' है । चन्द्र बनता हुआ यह मस्यति है, अतएव यह चन्द्रमा: है । सान्त ' मास ' शब्द चन्द्रमा का पर्याय माना गया है । महीने का वाचक मास शब्द अकारान्त है | ' मासः ( चन्द्रस्य ) श्रयं भोगकालो मासः ' में प्रथम ' मासः ' षष्ठी का एक वचन है, द्वितीय ' मासः ' प्रथमा का एक वचन है । वक्तव्य यही है कि तिथिरूप से इस के ३० विप-रिणाम हो जाते हैं । २१३५

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enterta पष्टि से विचार कीजिए । श्रमोत्तर प्रतिपत् से आरम्भ कर पूर्णिमा - पर्यन्त शुक्ल-पक्ष है । एवं पूर्णिमोत्तर प्रतिपत् से आरम्भ करं श्रमापर्यन्त कृष्णपक्ष है । शुक्लपक्ष क्षीण हो में जाता इन्द्रज्येष्ठ है । सौर प्राणदेवता चान्द्रसोम खाया करते हैं । यहाँ तक कि, पूर्णिमा को यह सर्वथा सम्पूर्ण चान्द्रसोम प्राणदेवताओं के अधिकार में चला जाता है । अतएव यह सत्यनारायण ( सत्यात्मक इस सूर्य्यनारायण ) की तिथि ( देवतिथि ) मानी गई है । जिसे लोक में पूर्णचन्द्र कहा जाता है, वह दृष्टि से क्षीणचन्द्रमा है । इसी पक्षसोम को लक्ष्य में रखते हुए ' एष वै सोमो राजा देवानामन्न पृथिवी पर यच्चन्द्रमाः ' ( शतपथब्रा ० ) यह कहा गया है । कृष्णपक्ष में चान्द्रसोग प्रभूतमात्रा का भूपिण्ड से पर आगमन श्राता है । यहाँ तक कि, अमावास्या तिथि में तो सर्वतोऽधिकरूप से सोममात्रा होता है । पृथिवी, सूर्य्य, का जैसे स्वाक्षपरिभ्रमण पूर्वक भ्रमण सिद्ध है, वैसे चन्द्रमा का ओर स्वाक्षभ्रमण परिक्रमा न हो कर केवल दक्षभ्रमण ही होता है । चन्द्रमा एकरूप से ही भूपिण्ड के चारों आ जाता है, तो लगाता है । जब चन्द्रमा घूमता हुआ पृथिवी, तथा सूर्य्य के मध्य में सनसम्मुख है, जिस के अमावास्या होती है । ' दर्शः सूर्येन्दुसङ्गमः ' के अनुसार यहीं दर्शतिथि चन्द्रमा कहलाई , तथा सूर्य के मध्य में आधार पर देवयज्ञाङ्गभूता दर्शेष्टि प्रतिष्ठित है । एवं जिस तिथि में प्रति पृथिवी आ जाती है, वह तिथि पूर्णिमा ' नाम से प्रसिद्ध है, जिस के आधार पर पौर्णमासेष्टि भाग सर्वथा ष्ठित है । चन्द्रमा का क्योंकि स्वाक्षपरिभ्रमण नहीं है, श्रतएव इस के ऊर्ध्व, अधः, अधोभाग नियत रहते हैं । चन्द्रमा के इस नियत ऊर्ध्व भाग में पितर प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं नियत सुप्रतिष्ठित रहते हैं । संवरणशील तमोमय यही चान्द्र अधः प्राण ' वृत्र ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के सम्बन्ध से चन्द्रमा वृत्र नाम से प्रसिद्ध है । ( देखिए शत: ३ | १ | १ ) । ' इन्द्रो ह यत्र वृत्राय आ-वज्र ' प्रजहार, सोऽबलीयान् मन्यमानः पराः परावतो जगाम " ( शत ० ११६१५ ) इत्यादि से वध ख्यान के अनुसार पूर्णिमा तिथि को सौर इन्द्रद्वारा इस चान्द्रवृत्र का प्रात्यन्तिक रूप प्रतिष्ठित हो जाता है । तमोमय वृत्रप्रारण का साम्राज्य नष्ट हो जाता है, ज्योतिर्मय इन्द्र का साम्राज्य हो जाता है । क्योंकि पूर्णिमा तिथि में अधोभाग प्रकाशित रहता है, ऊर्ध्वभाग अप्रकाशित रहता है, aa भागस्थ पितर इस तिथि में सर्वथा अन्धकार में रहते हैं । अतएव यह पूर्णिमा पितरों की मध्यरात्रि मानी गई है । ठीक इस के विपरीत श्रमावास्या में सूर्य्यसङ्गम से चन्द्रमा का ऊर्ध्व भाग का प्रकाशित रहता है, अतएवं यह तिथि पितरों का मध्याह माना गया है । कृष्णपक्ष की अष्टमी पितरों प्रातःकाल है, शुक्ल पक्ष की अष्टमी पितरों का सायंकाल है । इस प्रकार ' मासेन स्यादहोरात्रः पैत्रः ' - कृष्णपक्ष भेद से चन्द्रोर्ध्वभागांव स्थित पितरों का के अनुसार पक्षद्वयात्मक एक मानुष मास शुक्ल है । हमारे लिए जो एक अहोरात्र बन रहा है । प्रकाशोपलक्षित काल अहः है, तमोमय काल रात्रि कृष्णपक्ष तमोमय है, वही पितरों के लिए प्रकाशोपलक्षित अहःकाल है । एवं हमारे लिए जो शुक्ल १३६