Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 191–200
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 191–200
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है ऋणमोचनोपायोपनिषन पक्ष ज्योतिर्मय है, वही पितरों के लिए तमोमयी रात्रि है । हमारे कृष्णपक्ष के १५ दिन पितरों का एक दिन है, हमारे शुक्लपक्ष के १५ दिन पितरों की एक रात है । कृष्ण - शुक्ला मी - द्वयी इस पक्षद्वया-त्मक पत्र अहोरात्र की विभाजिका है, जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट हो रहा है । पितर प्राण की सत्ता विधु के ऊर्ध्व भाग में बतलाई गई है । इस स्थिति के अनुसार अमा-वास्या तिथि में पितृप्राणमय चन्द्रोर्ध्वभाग सूर्य्य की ओर रहता है । इस तिथि में सौर अन्नादाग्नि ( सावित्रान्नि ) के मुख में प्रविष्ट ये चान्द्र पितर ' अन्न ' बन रहे हैं । अतएव इसे पितृहासकाल माना गया है । पितृप्राण की इस क्षयावस्था को लक्ष्य में रख कर ही ' अपक्षयभाजो वै पितरः ' ( शत ० १।५।४ ) यह निगम प्रतिष्ठित है । इस प्रकर अमा तिथि में सूर्य्यसम्बन्ध से पितर प्रारण यद्यपि क्षीणावस्थापन्न बन रहे हैं, परन्तु इन की सन्तति से सम्बन्ध रखने वाला अवारपारीण श्रद्धासूत्र पुष्ट है । कारण स्पष्ट है । अमावास्या में चन्द्रमा का अधोभागावस्थित सोम अतिशयमात्रा से पृथिवी की ओर रहा है । सौर देवताओं का अधिकार केवल उपरि भागस्थित पितृप्राणमय सोम पर ही है । फलतः कृष्णपक्ष में, विशेषतः अमावास्या में श्रद्धासूत्र का उपचय ( वृद्धि - पुष्टि ), तथा पितरप्राणों का अपचय ( ह्रास - क्षय ) दोनों भाव सिद्ध हो जाते हैं । अब चलिये पूर्णिमा की ओर । अनावास्या में चन्द्रमा का जो अधोभाग विशुद्ध कृष्ण सोमा-मकथा, वही अधोभाग चन्द्रमा के पृथिवी के इस ओर ( सूर्य्याविरुद्ध दिक् में ) आ जाने से सौर-रश्मियों के सम्बन्ध से प्रकाशित हो जाता है, जैसा कि " अत्राह गोरमन्त्रत, इत्था चन्द्रमसो गृहे " " ( ऋक्संहिता ) इत्यादि मन्त्रश्रुति से प्रमाणित है । दूसरे शब्दों में इसी स्थिति का यों भी अभिनय किया जा सकता है कि, अमावास्या में जो चान्द्र अधोभाग सौर देवाधिकार से पृथक् रहता है, पूर्णिमा में वही देवताओं के अधिकार में आ जाता है । पृथिवी की ओर आने वाली सोममात्रा इन प्राणदेवताओं के अनुग्रह से अवरुद्ध हो जाती है । श्रमावास्या में जहाँ देवता पितृसोम को अन्न बनाते हैं, वहाँ पूर्णिमा में वृत्रसोम इन का अन्न बन जाता है । क्योंकि पूर्णिमा में पृथिवी की ओर आने वाले वृत्रसोम का क्षय है । अतएव तद्रूप श्रद्धासूत्र का शुक्लपक्ष में, विशेषत: पूर्णिमा में क्षयभाव रहता है । फलतः शुक्लपक्ष में, विशेषतः पूर्णिमा में पितर प्रारण का उपचय, तथा श्रद्धासून का अपचय सिद्ध हो जाता है । जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट हो रहा है । अमा और पूर्णिमा-दर्शेन्दु - परिलेख में पाठक देखेंगे कि, अमावास्या तिथि में विधूध्वंभाग सूय्यं की ओर है, जिसमें कि पितर प्रतिष्ठित हैं, जिसे कि लोकपरिभाषा में ' प्रद्यौः ' कहा गया है । एवं विधु का अधः अर्द्ध प्रदेश पृथिवी की ओर है, जिस प्रदेश में सोमतत्त्व स्वस्वरूप से ( कृष्णरूप से ) प्रतिष्ठित है, “ तृतीया ह प्रद्यौः यस्यां पितर आसते " ( अथर्व ) १३७
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श्राद्धविज्ञान • जो कि कृष्ण सोम ' वृत्र ' नाम से प्रसिद्ध है । पितरप्राणावच्छिन्न ऊर्ध्व भाग समसम्मुख स्थित सूर्य के रश्मित प्रारण देवताओं से युक्त है । दूसरे ब्दों में पितृसोमपिण्ड सौराग्नि- देवताओं से मुक्त है । इस मुक्ति से पितृपिण्ड निर्बल हैं, क्षीण हैं । इसी पिण्डमात्राक्षय से इस तिथि में इन में. अशनाया ( भूख ) जाग्रत रहती है । इस शनाया का प्रभाव उक्त श्रद्ध सूत्रद्वारा इन के उन पिण्डों पर पड़ता है, जो पिण्ड पृथिवी पर प्रतिष्ठित सन्तानों ऋणरूप न्युप्त हैं । विधुका अधो भाग क्योंकि देव-प्रभुक्ति से वहिर्भूत है, अतएव वह भाग ( वृत्रसोम ) पुष्ट है । इसी का पृथिवी पर, तंत्रस्थ प्रजा पर अनुग्रह है । फलतः अमा तिथि में सन्ततिगत श्रद्धासूत्र पुष्ट है । ऐसी स्थिति में इस दिन जो पिण्ड दानलक्षण श्राद्धकर्म किया जायगा, वह अवश्यमेव पुष्ट श्रद्धासूत्र के द्वारा ऊर्ध्वस्थित आशामुख अंश-नायायुक्त पितरों के क्षीणपिण्डों को आध्यायित करता हुआ उन्हें तृप्त कर सकेगा । पूर्णेन्दु परिलेख में पाठक ठीक इस से विपरीत स्थिति देखेंगे । पूर्णिमा तिथि में विधूर्ध्वभाग . सूर्य्य से विरुद्ध दिक् में है, जिस प्रद्यौः नामक ऊर्ध्व भाग में पितर प्रारण की प्रतिष्ठा बतलाई गई है । • एवं विधु का अध: अर्द्ध प्रदेश पृथिवी, तथा सूर्य्य, दोनों की ओर है । सूर्य्यसाम्मुख्य से यह अर्द्ध-भाग सौराग्नि- देवता से संश्लिष्ट है । फलतः अमावास्या में कृष्ण रहने वाला यह वृत्रसोम शुक्लरूप में परिणत हो रहा है, जिस शुक्लरूप ( चन्द्रिका ) का सूर्य्य - चन्द्रमा के मध्य में प्रतिष्ठित पृथिवी पर आगमन हो रहा है । पार्थिव प्रजा इसी सोम से युक्त है, जो शुक्ल सोम देवभुक्ति से क्षीण हो रहा है । इसी से श्रद्धासूत्र का पोषण होना था । यह आज क्योंकि क्षीण है, प्राणाग्निदेवता का अन्न बन रहा है । अतएवज का श्रद्धासूत्र ( स्नेहयुक्त चान्द्र श्रद्धा सूत्र ) भी क्षीण है । उधर ऊर्ध्वभागस्थ पितर आज सौरदेवभुक्ति से बहिर्भूत होते हुए तृप्त हैं । उन में शनाया का अभाव है । इस प्रकार जिन प्रेत-1 पितरों की तृप्ति के लिए पिण्डदान होता है, पूर्णिमा तिथि में वे भी तृप्त हैं, साथ ही जिस श्रद्धासूत्र के द्वारा पिडाहुति तत्र पहुँचती है, वह श्रद्धासूत्र भी क्षयधर्म से इस प्राप्ति कर्म में असमर्थ है । अत-एव यह तिथि श्राद्धकर्म के लिए अनुपयुक्त ही सिद्ध हो जाती है । T प्रति श्रमावास्या को होने वाला श्राद्ध कर्म पितृषट्कतृप्ति का कारण बनता है । सर्वपितृ-उद्देश्य से प्रत्येक मासपर्व में होने वाला यही अमाश्राद्ध ' पार्वणश्राद्ध ' नाम से व्यवहृत हुआ है । श्रद्धालु पुत्रादि के द्वारा कृत इस शास्त्रीय कर्म से प्रति श्रमावास्या में, प्रतिमास में इस के पितर तृप्त होते रहते हैं । अमावास्या को ही क्यों सर्वपितृश्राद्ध किया जाता है?, अमावास्या में पितर क्यों अतृप्त रहते हैं?, इत्यादि प्रश्न अब तक के प्रकरण से गतार्थ हो जाते हैं । हमारा बुद्धिक्षेत्र सचमुच इस प्रश्न का समाधान करने में अपने आप को सर्वथा कुण्ठित समझ रहा है कि, विशुद्ध प्राकृतिक सत्य-स्थिति से सम्बन्ध रखने वाला पिण्डदानलक्षण श्राद्धकर्म एक वेदभक्त की दृष्टि में ' जीवितपितृश्राद्ध ' १३८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत कैसेवन गया, जब कि स्वयं उसके मान्य ं वेद में विस्पष्ट शब्दों मे ' मृतपितृश्राद्ध ' विहित हुआ है । जो कि श्राद्धविधान ' पिण्डपितृयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । अमावास्या: ही पितृतृप्ति की प्रधान तिथि क्यों है?, इस प्रश्न का मौलिक समाधान करने वाला निम्न लिखित श्रौत आख्यान हमारे सम्मुख उप: स्थित हो रहा है-श्राख्यानद्वारा ' श्राद्धविज्ञान ' का स्पष्टीकरण-कथानक की सन्दर्भसङ्गति लगाने के लिए मान लीजिए, - " प्रजाकामुक प्रजापति ने ' प्रजात-न्तु मा व्यवच्छेत्सीः ' अपने इस आदेश को व्यावहारिकरूप से प्रजा के सामने रखने के लिए स्वयं प्रजा उत्पन्न की । प्रजापति से उत्पन्न यह प्रजा देवप्रजा, पितृप्रजा, असुर प्रजा, मनुष्यप्रजा, पशुप्रजा, इन पाँच श्रेणियों में विभक्त हुई । दूसरे शब्दों में स्वयं प्रजापति से ही पाँच प्रजा उत्पन्न हुई । " इस आख्यान - सन्दर्भसङ्गति से आगे श्रौत आख्यान यों आरम्भ होता है -( १ ) “ उत्पन्न प्रजा उत्पादक पिता प्रजापति की सेवा में उपस्थित हुई, और निवेदन करने लगी कि, भगवन्! आपने हमें उत्पन्न तो कर दिया । परन्तु अभी तक हमारी जीवनयात्रा - निर्वाह के लिए भोग्य सामग्री की व्यवस्था न हुई । हम आप से प्रार्थना करते हैं कि, हमारे लिए कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिसको आधार बना कर हम जीवित रह सकें । इस प्रकार भोग्यव्यवस्था के लिए सामू-हिक निवेदन कर आगे जाकर प्रत्येक ने व्यक्तिगत रूप से अपने मनोभाव प्रकट करना आरम्भ किया । इसी सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, असुरप्रजा पाँचों में आयु, संख्या, दोनों में ज्येष्ठ थे । साथ ही ये सब से पहिले उपस्थित हुए थे । बार बार उपस्थित हुए थे । परन्तु प्रजापति ' सूचीकटाहन्याय ' को आगे कर प्रत्येक बार इन्हें यह कह कर लौटा देते थे कि, तुम सब से बड़े हो, तुम्हें धैर्य रखना चाहिए । पहिले तुम से कनिष्ठप्रजा की व्यवस्था होगी, सर्वान्त में तुम्हारा सन्तोष किया जायगा । फलतः देवप्रजा का ही प्राथम्य सुरक्षित रहा । यज्ञोपवीत धारण कर, अपने दहिने जानू को भूपृष्ठ पर संलग्न कर देवप्रजा प्रजापति के सम्मुख उक्त निवेदन कर बैठ गई । प्रजापति ने इन सभ्यजान्वाच्योपतिष्ठन् देवताओं के लिए यह व्यवस्था की कि, “ यज्ञ तुम्हारा अन्न होगा, तुम सदा अमृतभावापन्न ( सोमामृताहुति से अजर अमर ) रहोगे । सदा ऊ - बल से युक्त रहोगे । एवं सूर्य तुम्हारा प्रकाश होगा । " देवता सन्तुष्ट होकर लौट गए । अनन्तर -प्राचीनावीती ( यज्ञसूत्र को दक्षिणस्कन्ध पर डाल कर ) बन कर बाएँ जानू को भूपृष्ठ पर संलग्न कर पितरप्रजा प्रजापति के सम्मुख उक्त निवेदन कर बैठ गई । पितरों को सम्बोधन करते हुए * ऊरू - जङ्घयोर्मध्यभागः । हाँटू - गोड़ा - गोड़ी - ति भाषायां प्रसिद्धः १३६
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श्राद्धविज्ञान प्रजापति ने इनके लिए यह व्यवस्था की कि, " महीने महीने में ( प्रतिमास में एक बार अमावस्या को ) तुम्हें अन्न मिलेगा, एवं तुम्हारे लिए ' स्वधा ' अन्न तृप्ति का कारण बनेगा । मनोजव ( श्रद्धामय मानस बल ) तुम्हारी प्रातिविक सम्पत्ति होगी । चन्द्रमा तुम्हारा प्रकाश होगा । " पितर भी सन्तुष्ट होकर लौट गए । अनन्तर -( 3 ) प्रावृत होकर ( गले में माला की भाँति यज्ञसूत्र धारण कर ) उपस्थभाव से ( श्रालथी पालथी मार कर ) मनुष्यप्रजा प्रजापति के सम्मुख उक्त निवेदन कर बैठ गई । इनके लिए प्रजापति ने यह व्यवस्था की कि, " एक अहोरात्र में दो बार सायं प्रातः तुम्हें अन्न मिलेगा । मृत्यु तुम्हारी प्रातिस्विक सम्पत्ति होगी । अग्नि तुम्हारा प्रकाश रहेगा । " मनुष्यप्रजा भी सन्तुष्ट होकर लौट गई । अनन्तर-( ४ ) अपने यथाजात स्वरूप से ही पशुप्रजा प्रजापति के सम्मुख उक्त निवेदन कर बैठ गई । प्रजापति ने इन्हें कोई सम्बोधन न कर अपने संकल्प से ही इनके लिए यह व्यवस्था बना दी कि, " तुम्हें जब भी कभी समय - असमय में कुछ खाने के लिए मिल जाय, खा लिया करो । तुम्हारे लिए कोई नियत समय नहीं है । ( श्रुत्यन्तर के अनुसार ) पार्थिव क्षारभाग तुम्हारी प्रातिस्विक सम्पत्ति होगी । मनुष्यप्रजा तुम्हारा प्रकाश होगा " । पशुप्रजा भी सन्तुष्ट होकर लौट गई । सर्वान्त में --( ५ ) उस सर्व ज्येष्ठ - बहुसंख्यक असुर प्रजा को अवसर मिला, जो उक्त चारों प्रजाओं से पहिले भी उपस्थित होने की धृष्टता कर चुकी थी, अनन्तर चारों के साथ भी जो उपस्थित होकर अपने आसुर -ध को व्यक्त कर रही थी, प्रजापति ने इनके लिए ' माया ' को तो अन्नस्थानीय बनाया, एवं तम ( अन्धकार ) को प्रकाशस्थानीय बनाया । अपनी ' माय ' ( अधैर्य ) वृत्ति के अनुग्रह से इन असुरोंनें रुष्ट प्रजापति से माया, तम, रूप जो भोग्य प्राप्त किया, उसका परिणाम यह हुआ कि, कालान्तर में इन्हीं भोग्यों से इस प्रजा का सर्वनाश हो गया । स्वरूपतः देवता, पितर, मनुष्य, पशु, यह प्रजाचतुष्टयी ही प्रजापति के यश को सुरक्षित रख सकी । ( ६ ) प्रजापति ने आरम्भ में उक्त चार प्रजाओं के लिए उक्तरूप से जो भोग्य व्यवस्था की थी, आज पर्यन्त प्रजापति की उसी व्यवस्था का अनुगमन हो रहा है । देवता मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते, पितर अतिक्रमण नहीं करते, पशु अतिक्रमण नहीं करते । हाँ, मनुष्यप्रजा अपने प्रज्ञापराध से अवश्य ही कभी कभी असुरप्रजा, तथा पशुप्रजा का अनुकरण करती हुई मर्यादा का अतिक्रमण कर जाती है । ( अतः चारों प्रजाओं में से एकमात्र मनुष्यप्रजा के लिए ही शास्त्रोपदेश प्रवृत्त हुआ है ) । श्रुति कहती है कि, अपनी इसी आसुरवृत्ति, तथा पशुवृत्ति से मनुष्य आवश्यकता से अधिक तुन्दिल ( स्थूलकाय - विपुलोदर ) बन जाते हैं । मनुष्यप्रजा में जिसे तुन्दिल देखो, विश्वास करो, वह पाप-कर्म से तुन्दि हुआ है । कभी ऐसा अर्थपरायण तुन्दिल मनुष्य सद्गति का अधिकारी नहीं बन सकता । क्योंकि यह आंसुर अनृतभाव ( मिथ्याभाषण, छल, विश्वासघात, आदि असत्यमार्ग ) के अनुगमन १४०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् से ही पीवर बना है । इसलिए मैं आदेश करती हूँ कि, प्रत्येक मनुष्य को प्राजापत्यमर्थ्यादा के अनुसार सन्मार्ग पर चलते हुए दिन रात के २४ घन्टों में केवल दो बार सायं प्रातः ही अशन करना चाहिए । जो मनुष्य इस मर्यादारहस्य को समझता हुआ इस नियम का अनुगमन करता है, वह पूर्णायु का अधिकारी बनता है । साथ ही ' इदमित्थमेव करिष्ये, नान्यथा ' इस सत्यपूत प्रतिज्ञात्मक नियमानुं -गमन से ऐसे मनुष्य की वाणी में सत्य प्रतिष्ठित हो जाता है । यह जिसके लिए अपने मुख से जो कुछ कह देता है, वही हो जाता है । यही वाग्वल ब्राह्मतेज है, ( जिसके बल पर ब्राह्मण की वाणी में सत्यप्रतिष्ठित रहता है ) । जो इस प्राजापत्यव्रत को निभाने में समर्थ है, वह भी इस ब्राह्मतेज से युक्त हो जाता है " । श्रुति के शब्दों में ही आख्यान पर दृष्टि डालिए -( १ ) — " प्रजापतिर्वैभूतान्युपासीदन् । प्रजा वै भूतानि । वि नो धेहि, यथा जीवामः इति । ततो देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जान्वाच्य - उपासीदन् । तानब्रवीत् — यज्ञो वोऽन्नम्, अमृतत्वं वः, ऊर्वः, सूर्यो वो ज्योतिः, इति । " ( २ ) - " अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः " सव्यं जान्वाच्य - उपासीदन् । तानब्रवीत् - मासि मासि asia, स्वधावः मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिः, इति । ” ( ३ ) – “ अथैनं मनुष्याः प्रावृताः, उपस्थं कृत्वा - उपासीदन् । तानब्रवीत् - सायं प्रातर्वोऽशनम्, प्रजा वः, मृत्युर्वः, अग्निव ज्योतिः, इति ” । ( ४ ) — " अथैनं पशव उपासीदन् । तेभ्यः स्वैषमेव चकार - पदैव यूयं कदाच लभध्यै, यदि काले यद्यनकाले, अथैवाश्थ, इति । तस्मादेते यदैव कदा च लभन्ते, यदि काले, यद्यना-काले, थैवाश्नन्ति " ५ ) – “ अथ हैनं शश्वदप्यसुरा उपसेदुः इत्याहुः । तेभ्यस्तमश्च, मायां च प्रददौ 1 । अस्ति-हैवासुरमाया, इतीव । पराभूता ह त्येव ताः प्रजाः " | ( ६ ) – “ ता इमाः प्रजास्तथैवोपजीवन्ति, यथैवाभ्यः प्रजापतिर्व्यदधात् । नैव देवा श्रतिक्रामन्ति, न पितरः, न पशवः । मनुष्या एवैकेऽतिक्रामन्ति । तस्माद्यो मनुष्याणां मेद्यति, विहू-छति हि । न ह्यनाय च भवति । अनृतं हि कृत्वा मेद्यति 1 । तस्मादु सायं प्रातराश्येव स्यात् । स यो हैवं विद्वान् सायंप्रातराशी भवति, सर्वं हैवायुरेति । यदु ह किंच वाचा व्याहरति, तदु भवति । एतद्धि देवसत्यं गोपायति । तद्वैतत् तेजो नाम ब्राह्मण, ( ब्राह्मणं - ब्राह्म - नाम तेजः ), य एतस्य व्रतं शक्नोति चरितुम् " । - शत ० ना ० २ कां । ४ अ ० | २० | १ कं ० से ६ कं ० पर्यन्त |
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श्राद्धविज्ञान. पितरप्रजा के प्रसङ्ग में उपात्त प्रकृत ब्राह्मणश्रुति का समन्वय करने से पहिले ' प्रजापति ' स्वरूप की ही दो शब्दों में मीमांसा कर लीजिए । तत्त्ववेत्ता वैज्ञानिकों ने प्रजापति का एक ऐसा सामान्य लक्षण किया है, जिस का षोडशीपुरुष, अव्यक्तपुरुष, व्यक्तपुरुष, सम्वत्सर, अग्नि, वायु, आदित्य, आदि व्यष्टिलक्षण यच्चयावत् प्राजापत्यसंस्थाओं के साथ समन्वय हो रहा है । और वह लक्षण यह है-" आत्म - प्राण - पशु- समष्टिः प्रजापतिः " पहिले षोडशीप्रजापति के साथ ही लक्षण समन्वय कीजिए । पञ्चकल अव्ययपुरुष, पञ्च कल अक्षरपुरुष, पञ्चकल क्षरपुरुष, निष्कल परात्पर, इन १६ कलाओं की समष्टि ही षोडशीपुरुष है । पोड़शीपुरुष का अव्यय भाग आत्मा है, यही वस्तुतः पुरुष है । अक्षर भाग ' प्राण ' है, यही पराप्रकृति नामक अन्तरङ्गप्रकृति है । तर भाग ' पशु ' है, यही अपराप्रकृति नामक बहिरङ्गप्रकृति है । यही आत्म - प्राण - पशुसमष्टिलक्षण षोडशीप्रजापति है, जिस के लिए – ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्व यदिदं किञ्च ' ( शतपथ ) यह निगम प्रसिद्ध है । प्रजापति की आत्मा ( अव्यय ) अमृतलक्षण रस, मृत्युलक्षण बल, के समन्वय से अमृत-मृत्यु है । इसकी मृतकला का अनुग्रह पराप्रकृतिरूप अक्षर नामक प्राणकला पर होता है, एवं मृत्युकला का अनुग्रह अपराप्रकृतिरूप क्षरनामक पशुकला पर होता है । अमृतकला ज्ञानप्रधाना ( रस-प्रधाना ) है, मृत्युकला कर्मप्रधाना ( बलप्रधाना ) है । फलतः अक्षर ज्ञानप्रधान बन रहा है, तर कर्म-प्रधान बन रहा है । ज्ञान - कर्म्ममय अक्षराक्षराधारभूत उभयमूर्त्ति त्रिमूर्त्ति त्रिपुरुष - पुरुषात्मक षोडशी ही प्रजापति हैं । ' अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ' ( शतपथ ) के अनुसार यह अक्षररूप से अमृतभावापन्न है, एवं तररूप से मर्त्यभावापन्न है । ज्ञानप्रधान अमृताक्षर अव्यक्त है, कर्म्मप्रधान मर्त्यक्षर व्यक्त है । अव्यक्त के आधार पर ही व्यक्त प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में अव्यक्त ही क्षर का आधार बन कर व्यक्तरूप में परिणत हो रहा है । अव्यय के ज्ञानभाग से उपकृत अव्यक्त ज्ञानसृष्टि का प्रवत्त के बनता है, एवं अव्यय के कर्म्मभाग से उपकृत व्यक्त तर कर्म्मसृष्टि का प्रवत्त के बनता है । पुरुष से अव्यक्त, अव्यक्त से व्यक्त, व्यक्त से कर्म्मवितान, किंवा कर्म्मसृष्टि, यह परम्परा है । इस परम्परा से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, आत्मा से प्रारण का, प्रारण से पशु का, पशु से कर्म का विकास हुआ है । इसी दृष्टि से सृष्टि-धारा ' मानसी, गुणमयी, वैकारिकी ' भेद से तीन प्रवाहों में प्रवाहित हो रही है, जिन्हें क्रमश पुरुष-प्रकृति - विकृति - सृष्टि भी कहा जा सकता है । पुरुष से होने वाली अव्यक्तरूपा ज्ञानगर्भित - प्राणात्मिका सृष्टि ही ऋषिसृष्टि ' ' है । यह सृष्टित्त्वेन यद्यपि प्रजा है, परन्तु संसृष्टिलक्षण मिथुनभाव से प्रतिक्रान्त - भाव - प्राधान्य से ज्ञानतन्तु-
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ऋणमोचनोपायोपनिषत प्रवर्त्तिका इस ऋषिसृष्टि को सृष्टि ही मान लिया गया है । यही कारण है कि, अव्यक्तात्मक स्वयम्भू से सरबन्ध रखने वाली इस ऋषिसृष्टि को ब्राह्मणश्रुति ने प्रजा - मर्यादा से पृथक कर दिया है । आगे का देवादिप्रजापञ्चक तथा व्यक्त लोक, सब का मूल यही ऋषिसर्ग है, जिसे स्मृति ने भी मानस सर्ग मानते हुए व्ययसर्ग ही माना है । देखिए – महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता एषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ( गीता १० । ६ । ) ज्ञानन्तु अव्यक्त ऋषितत्त्व त्रयीरूप से व्यक्त आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है, जैसा कि ऋणस्वरूपपरिचय में स्पष्ट किया जा चुका है । ऋषिप्राणगर्भित यह परमेष्ठी ही ब्राह्मणोक्त प्रजापञ्चक का उपादान बनता है । अतएव ब्राह्मणश्रुति के प्रजापति शब्द से श्रव्यक्त - ज्ञान-मूर्त्ति - ऋषितत्त्वगर्भित व्यक्त कर्ममूर्त्ति - आपोमय परमेष्ठी प्रजापति का ही ग्रहण करना न्यायसङ्गत बनता है । पोमय परमेष्ठी का भार्गव अपतत्त्व असुरसृष्टि का प्रवतक है, भार्गव सोमतत्त्व पितृ-सृष्टि का प्रवर्त्तक है, आङ्गिरस वायु पशुसृष्टि का प्रवर्तक है, एवं आङ्गिरस अग्नि मनुष्यसृष्टि का प्रवर्त्तक है । इसमें सौम्या पितृसृष्टि का दूसरा अधिष्ठान ( प्रवर्ग्य सम्बन्ध ले ) सोयमय चन्द्रमा है । . इस प्रकार पार्थिव विवर्त्त की दृष्टि से सूर्योपलक्षित द्युलोक, चन्द्रमोपलक्षित अन्तरिक्ष लोक, वैश्वा-लक्षित पृथिवीलोक, इन तीनों को क्रमशः देवलोक, पितृलोक, मनुष्यलोक, कहा जा सकता है । सूर्य्यतः परमस्थान में स्थित, अतएव ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध पारमेष्ठ्य पितृलोक, तथा परमेष्ठी से भी ऊपर प्रतिष्ठित स्वायम्भुव ऋषिलोक, इन दोनों लोकों की समष्टि चौथा ' ब्रह्मलोक ' है, ' यद् गत्वा ननिते ' । लोकत्रयी का एक विभाग है, ब्रह्मलोक का स्वतन्त्र विभाग है । इस प्रकार सम्भूय चार लोक हो जाते हैं । तीनों लोक मनुष्यप्रजा के लिए अद्धा ( प्रकट ) हैं, चौथा आपोमय पारमेष्ठ्य लोक श्रद्धा है, जैसा कि - " अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः " ( शतपथब्रा ० ) - " को हि तद्व ेद ० " इत्यादि वचनों से प्रमाणित है । प्रजासम्पत्ति के द्वारा मनुष्य मनुष्यलोक में अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करता है, विद्यानिरपेक्ष सत्कर्म्म ( इष्ट - आपूर्त्त - दत्त ) से पितृलोकावाप्ति होती है, एवं विद्यासापेक्षसत्कर्म ( यज्ञ - तप - दान ) से देवलोकावाप्ति होती है । एवं निष्कामकर्म्मलक्षण बुद्धियोगानुगमन से ब्रह्मलोकावाप्ति होती है, जैसाकि ' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । प्रकृत में इस सृष्टिप्रपञ्च से यही बताना है कि, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, भेद से तीनों लोक सम्वत्सरचक्र से ही सम्बन्ध रखते हैं । एक ही सम्वत्सरचक्र में तीनों लोक भुक्त हैं । एवं उक्त ब्राह्मणाख्यान इन्हीं साम्वत्सरिक लोकों को लक्ष्य में रखकर प्रवृत्त हुआ है । निम्न लिखित वचन इसी लोकत्रयी का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-१ - " अथ त्रयो वाव लोकाः - मनुष्यलोकः, पितृलोकः, देवलोकः, इति । सोऽयं 8073
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श्राद्धविज्ञान ... मनुष्यलोकः पुत्रेणैष जय्यः, नान्येन कर्म्मणा । कर्मणा पितृलोकः । विद्यया देवलोक । देवलीको वै लोकानां श्रेष्ठः, तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति " - शत ० १४ कां ० । ४ २ । ३ बा ० । २४ कं ० । - " इमऽउ लोकाः सम्वत्सरः " ( शतः ६ । २ । १ । १७ । ) ३ - " एऽ उ वा लोकाः - यदहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः सम्वत्सरः " इति । - शत ० १० । २ । ६ । ७ । सम्बत्सरात्मिका लोकत्रयी में प्रतिष्ठित प्रजात्रयी की स्थिति के यथावत् समन्वय से उक्त ब्राह्मण - आख्यान का रहस्यार्थ गतार्थ बन जाता है । अतः उस स्थिति की ओर ही पाठकों का ध्यान है । पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य्य, तीनों के क्रमशः अक्ष, दक्ष, क्रान्ति, नामक तीन वृत्त माने गए हैं । भूपिण्ड अक्ष पर परिक्रमा लगाता है, यही इस का ' स्वाक्षपरिभ्रमण ' है, इसी से ' दैनं-दिनगृति ' का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, यही स्वाक्षगति अहोरात्र की जननी है । स्वाक्ष पर एक अहोरात्र में पूरी परिक्रमा करता हुआ भूपिण्ड ( आधुनिक ज्योतिर्विदों के मतानुसार सूर्य ) के ( पृथिवी के ) चारों ओर परिक्रमा लगाता रहता है । जिस वृत्त पर यह पार्थिव, किंवा सौर परिभ्रमण होता है, वही ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । इस परिभ्रमण से ' साम्वत्सरिकगति ' का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, यही क्रान्तिगति दक्षिणोत्तर अयनों की विभाजिका है । चन्द्रमा भूपिण्ड को केन्द्र बनाता हुआ एक मास में मूपिण्ड के चारों ओर अपने दक्षवृत्त पर परिक्रमा लगा लेता है । इस चान्द्रपरिभ्रमण से ' मासिकगति ' का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, यही दगति शुक्लकृष्णपक्षों की विभाजिका है । निष्कर्षतः अहोरात्र का सम्बन्ध स्वाक्षपरिभ्रमणानुगता पृथिवी से है, शुक्लकृष्णपक्षों का सम्बन्ध दक्ष भ्रमरणानुगत चन्द्रमा से है, एवं उत्तर - दक्षिणायनों का सम्बन्ध क्रान्तिपरिभ्रमणानुगता पृथिवी ( किंवा सूर्य ) से है । तीनों गतियों में क्रमशः पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य्य, की प्रधानता है । तीनों गतियों से तीनों विवर्त्त क्रमशः हः, मास, वर्ष, के अधिष्ठाता बन रहे हैं । अहोरात्र का तात्त्विक स्वरूप क्या | क्या द्वादश ( १२ ) होरायुक्त काल अहः, एवं द्वादश होरा-युक्त काल रात्रि है? | नहीं । वैज्ञानिक जगत् में अहोरात्र की परिभाषा कुछ ओर ही मानी गई है । ' स्वरहर्देवाः सूर्य्य: ' ( शत ० १ १ ) के अनुसार सौरप्रकाश - लक्षण अग्नि का नाम ही ' अह: ' है, antara सोम का ही नाम ' रात्रि ' है, ज्योतिर्लक्षण सौर मघवेन्द्र से युक्त अग्नितत्त्व ही अहः है, इन्द्र वियुक्त विशुद्ध कृष्णसोम ही ' रात्रि ' है । इस प्रकार अहः - रात्रि शब्द काल के वाचक न होकर तत्त्वों के ही वाचक हैं । इन्द्रगर्भित अग्नितत्त्वात्मक इस ग्रह का जितने काल में भोग होता है, उपलक्षरण विधि से आगे जाकर वह अहर्भोगात्मक काल भी ' अहः ' कहलाने लग गया है । इसी दृष्टि को प्रधान मान कर अहोरात्र - विवर्त्त का समन्वय कीजिए । १५४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् भूपिड का जो ( अदिति ) भाग सौरप्रकाश से युक्त रहता है, वह अहस्तत्त्व है । क्योंकि इसका भोग द्वादश होरा पर्य्यन्त होता है, अतएव द्वादश होरात्मक यह अहोरूप काल भी ' अहः ' कहलाने लग गया है । एवमेव भूपिण्ड का जो ( दिति ) भाग सौरप्रकाश से वियुक्त रहता है, उसमें कृष्णसोमात्मक रात्रितत्त्व प्रतिष्ठित है । क्योंकि इसका भोग द्वादश होरापर्य्यन्त होता है, अतएवं द्वादश होरात्मक यह रात्रिमय काल भी रात्रि कहलाने लग गया है । स्वाक्षपरिभ्रमण के कारण १२ घन्टों प तो भूपिण्ड में ज्योतिर्लक्षण अग्निरूप अहः का भोग होता है, एवं १२ ही घन्टों पर्यन्त कृष्णलक्षण सोमात्मक तत्त्वका भोग होता है । अतएव पार्थिव अहोरात्रकाल १२ - १२ होरा का मान लिया गया है । जिस प्रकार भूपिण्ड परिभ्रमणाधार अक्षवृत्त का आधा भाग ज्योति, आधा भाग कृष्णसोम से ' युक्त रहता है, एवमेव चान्द्रपरिभ्रमणाधार दक्षवृत्त का श्राधा भाग तो सौरज्योति से युक्त रहता है, एवं आधा भाग कृष्णसोम से युक्त रहता है । ज्योतिर्लक्षण इस दक्षवृत्तावच्छिन्न हस्तत्त्वका भोग क्योंकि १५ अहोरात्रों में होता है, अतएव यह अहस्तत्त्व पञ्चदश अहोरात्रात्मक माना गया है । कृष्ण-सोमलक्षण रात्रि का भोग १५ अहोरात्रों में होता है, अतएव यह चान्द्र रात्रितत्त्व पञ्चदशाहोरा-नात्मक माना गया है । दूसरे शब्दों में पञ्चदशाहोरात्रावच्छिन्न चान्द्र ज्योतिर्भाग हस्तत्त्व है, एवं पञ्चदशाहोरात्रावच्छिन्न चान्द्र कृष्णसोमभाग रात्रितत्त्व है । पार्थिव अहोरात्र की दृष्टि से चान्द्र अहोरात्र-तत्त्व १५-१५ - अहोरात्र का है, यही तात्पर्य है । हमारे १५ अहोरात्र चन्द्रमा का एक अहः है, जिसे हम अपनी दृष्टि से पञ्चदश अहोरात्रात्मक शुक्लपक्ष कहा करते हैं । एवं १५ अहोरात्र चन्द्रमा की एक . रात्रि है, जिसे पञ्चदश अहोरात्रात्मक कृष्णपक्ष कहा जाता है । क्रमप्राप्त सौर सम्वत्सरचक्र पर दृष्टि डालिए । षण्मासोपलक्षित उत्तरायण काल में ( पूरे ६ महीने पर्यन्त ) सौर ज्योतिर्मय हस्तत्त्व व्याप्त है, एवं षण्मासोपलक्षित दक्षिणायनकाल में कृष्ण सोमात्मक रात्रितत्त्व व्याप्त है । इस प्रकार षण्मासावच्छिन्न उत्तरायणकाल अहस्तत्त्वभोग से एक रात्रि है । हमारी दृष्टि से ६ महीनों की समष्टि वहाँ एक दिन है, एवं ६ महीनों की समष्टि एक रात है । चोर आगे बढ़िए । जिस समय सूर्य उत्पन्न हुआ था, तब से आरम्भ कर जिस दिन सूर्य पुनः अव्यक्तावस्था में परिणत होगा, इतने समय पर्यन्त ज्योतिर्म्मय प्रहस्तत्त्व की सत्ता है । अनन्तर इतने ही समय पर्य्यन्त विशुद्ध कृष्ण ( पारमेष्ठय ) सोम की सत्ता रहेगी । यह सूर्य्यसत्तात्मक ज्योतिर्भाग-ही है, एवं सूर्याभावात्मक कृष्णसोमतत्त्व ही रात्रि है । इस ग्रह का सृष्टिकाल में भोग है, रात्रि का प्रलयकाल में भोग है । अहःकाल व्यक्तात्मक अहरागम है, रात्रिकाल अव्यक्तात्मक राज्यागम है । इसी महा - अहोरात्र को लक्ष्य में रख कर भगवान् ने कहा है--१४५
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अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ ( गीता ) । यही अहोरात्र ब्राह्म अहोरात्र है, जिस का पूर्वोक्त ऋषिसर्गानुगत ब्रह्मलोक से सम्बन्ध है, जिसे श्रद्धा चतुर्थ पोलोक भी कहा गया है । ब्राह्म अहोरात्र का सृष्टिकालोपलक्षित लोग यही स्मरण अहः ' पुण्याह ' ( पवित्र दिन ) कहलाया है, जिस का अपने प्रत्येक कर्म्म- संकल्प में आस्तिक इसी ब्रह्मलोक. किया करते हैं । ब्राह्मलोक ' ब्रह्मा ' नामक ' ऋषिप्राणसमष्टि का लोक है, ब्राह्म अहोरात्र देवलोक है । से सम्बद्ध है । सृष्टि ब्रह्मा का एक दिन है, प्रलय ब्रह्मा की एक रात्रि है । सौरसम्वत्सर पितृलोक है । उत्तरायण काल देवताओं का एक दिन है, दक्षिणायनकाल एक रात्रि है । चान्द्रमण्डल के सम्बन्ध -कृष्णपक्ष पितरों का एक दिन है, शुक्लपक्ष पितरों की एक रात्रि है । चन्द्रिकानुगत देवप्रारण होरात्मक अहः से शुक्लपक्ष एक दिन है, कृष्णपक्ष एक रात्रि है । पृथिवी मनुष्यलोक है । द्वादश मानुष मनुष्यों का एक दिन है, द्वादशहोरात्सिका रात्रि एक रात्रि है । इस प्रकार हमारा एक अहोरात्र एक-अहोरात्र है । हमारे ३० अहोरात्र पितरों का एक अहोरात्र है । हमारे ३६० अहोरात्र देवताओं, तमोमय का अहोरात्र है । सौरसृष्टिप्रलयकाल ब्रह्मा का एक अहोरात्र है । इस प्रकार ज्योतिर्मय अग्नि सोमभेद से अहोरात्रतत्त्वं चार भागों में विभक्त हो रहा है । अहोरात्र निबन्धना कालच तुष्टयी-१ २ १ - श्रादित्यावच्छिन्नो ज्योतिर्मयोऽग्निः - श्रहः - द्वादशाहोरात्मकम् २- दित्यवच्छिन्नस्तमोमयः सोमः रात्रि - द्वादशहोरात्मिका I १- शुक्लपक्षावच्छिन्न ज्योतिः - अहः - पञ्चदशाहोरात्रातकम् २ - कृष्णपक्षावच्छिन्नः सोमः - - रात्रिः - पञ्चदशहोरात्रात्मिका १ - उत्तरायणवच्छिन्न ज्योतिः - श्रहः -- परमासात्मकम् ३ ४ २ - दक्षिणायनावच्छिन्नः सोमः --रात्रिः-- परमासात्मिका १ - सृष्ट्यवच्छिन्न ज्योतिः - अहः - सूर्य्यसत्तात्मकम् २ - प्रलयावच्छिन्नः सोमः --रात्रिः - सूर्य्यलयात्मिका - मानुषं अहोरात्रम् ( च.विशतिहोरात्मकम् ) - पत्र अहोरात्रम् ( त्रिंशददोरात्रात्मकम् -मासात्मकं वा ) - दैवमहोरात्रम् ( ३६० अहोरात्रात्मक-वर्षात्मकं वा ) - ब्राह्माहोरात्रम् ( सृष्टि - जयात्मकम् १४६