Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 201–210

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 201–210

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् उक्त चारों संस्थाओं में सौरज्योति, तथा पारमेष्ठ्य सोमरूप से ज्योतिर्म्मय देवता, तथा सोम मय पितर, दोनों का विपर्य्यय से भोग हो रहा हैं । ज्योतिर्भाग ज्योतिर्म्मय देवताओं के लिए अहः है, यही सोममय पितरों के लिए रात्रि है । एवमेव सोमभाग सौम्य पितरों के लिए अहः है, यही ज्यो. तिर्म्मय देवताओं के लिए रात्रि है । और यह अहोरात्रमाग उदयास्त से सम्बन्ध न रख अद्यतन-अद्यतन भावों से सम्बन्ध रख रहा है । पहिले मानुष अहोरात्र को ही लीजिए । ( १ ) रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे पर्य्यन्त ऐन्द्र मित्रप्राण का साम्राज्य है, यही मैत्र पूर्व-कपाल है, यही अद्यतन - लक्षण अहः है, यही देवताओं का अहः, तथा पितरों की रात्रि है । दिन के १२ बजे से रात्रि के १२ बजे पर्यन्त आप्य वरुणप्राण का साम्राज्य है, यही वारुण पश्चिमकपाल है, यही अनतत रात्रि है, यही पितरों का श्रह, तथा देवताओं की रात्रि है । इसी आधार पर पूर्वाह्न देवकाल माना गया है, अपराह्न पितृकाल माना गया है । पूर्वाह्न में देवप्राण का उपचय है, देव का अपचय है । देवापचय - लक्षण ( अपक्षयलक्षण ) इसी अपराण में पितर 1 का. उपचय है । अतएव पितर अपक्षयभाजः ( देवापचयकाल में प्रतिष्ठित ) कहलाए हैं । ( २ ) यही अवस्था पैत्र अहोरात्र की है । जिस प्रकार मानुष अहोरात्र की विभाजिका दक्षिणो-तरवृत्तात्मिका उर्वशी है, जो कि मध्यरात्रि - मध्याह्न को काटती हुई पूर्व - पश्चिम कपाल के द्वारा अद्यतन अद्यतन की अधिष्ठात्री बन रही है, एवमेव दक्षिणोत्तरदिक् से सम्बन्ध रखने वाली याम्योत्तर. रेखा ही पत्र अहोरात्र की विभाजिका बनी हुई है । शुक्लाक्ष्मी से कृष्णाष्टमी पर्य्यन्त, जिस के मध्य में पूर्णिमा है, ऐन्द्र मित्रप्राण का साम्राज्य है, यही मैत्र पूर्वकपाल है, यही अद्यतन - लक्षण अहः है । शुक्ला मी मैत्र देवताओं का प्रातःकाल है, पूर्णिमा मध्याह्न है, कृष्णाष्टमी सायंकाल है । त्रिषवणा-म यही अद्यतन देवताओं का अहः, तथा पितरों की रात्रि है । कृष्णाष्टमी से आरम्भ कर शुक्ला-ष्मी पन्त, जिसके मध्य में श्रमावास्या है, आप्य वारुणप्राण का साम्राज्य है, यही वारुण पश्चिम कपाल है, यही अनद्यतनलक्षणा रात्रि है | कृष्णाष्टमी पितरों का प्रातः काल है, अमावास्या मध्याह है, शुक्लाष्टमी सायंकाल है । त्रिःपर्वात्मक यही अद्यतन पितरों का अहः, तथा देवताओं की रात्रि है । ( ३ ) तीसरा दैव अहोरात्र है । वही याम्योत्तर रेखा यहाँ भी कपालद्वय की विभाजिका बन ' रही है । उत्तरदिकस्थ परमक्रान्तिबिन्दु से सम्बद्ध कर्कवृत्त से आरम्भ कर दक्षिणदिकस्थ परम-क्रान्तिबिन्दु से सम्बद्ध मकरवृत्त पर्य्यन्त इस रेखा की व्याप्ति है । उत्तरगोल के मध्य से दक्षिण-गोल के मध्य पर्यन्त व्याप्त इस रेखा से पूर्व - पश्चिम कपाल भेद हो रहा है । पूर्वादिक से अनुगत आधा उत्तरगोल, आधा दक्षिण गोल, यह अर्द्धगोल ऐन्द्रमित्रप्राण से युक्त है, यही मैत्र पूर्व कपाल है यही अद्यवन लक्षण अहः है, यही देवताओं का अहः, तथा पितरों की रात्रि है । एवमेव पश्चिमादिक_ १४४

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श्राद्धविज्ञान ' अनुगत आधा दक्षिण गोल, आधा उत्तरगोल, यह अर्द्ध गोल आय वारुप प्रारण से युक्त है, यही. वारुण पश्चिम कपाल है, यही अनद्यतनलक्षणा रात्रि है, यही पितरों का अहः, तथा देवताओं की रात्रि है । -( ४ ) चौथा ब्राह्म - अहोरात्र है । ब्राह्म अहोरात्र की मूलप्रतिष्ठारूप ऋषितत्त्वगर्भित पोमय परमेष्ठी से ' भृगु - अङ्गिरा ' नाम की दो धाराओं का विनिर्गम बतलाया गया है । विशुद्ध भार्गव सोमधारा स्नेहधारा है, सोमगर्भिता, अतएव ज्योतिर्मयी अङ्गिराधारा ' तेजोधारा ' है । तेजोधारालक्षण ज्योति-मय अग्नितत्त्व ही अहः है, एवं इसका उपक्रम परमेष्ठी में ही हो जाता है । रात्रि में जिन १४ मन्वन्तरों का भोग होता है, उनमें से सातवें रात्रिमन्वन्तर के समाप्त होने पर, जो कि श्रंद्ध रात्रि की अवसान भूमि है, इस अहः का उपक्रम हो जाता है, एवं अहः कालोपलक्षित सृष्टि के १४ मन्वन्तरों में से सातवें वैवस्वत मनवन्तर ( जोकि वर्त्तमान में प्रक्रान्त है ) के अवसान पर इस अहर्विकास का अवसान है । इस प्रकार लयोपलक्षिता रात्रि के सप्तम मन्वन्तरोपलक्षित मध्यभागावसान से प्रारम्भ कर • सृष्ट्य पलक्षित ह: के सप्तम मन्वतरोपलक्षित मध्याह्नपर्यन्त ऐन्द्रमित्र का साम्राज्य सिद्ध हो जाता है, यही मैत्र पूर्व कपाल है, यही अद्यतनलक्षण अहः है । पारमेष्ठ्य मित्रतन्वोदयलक्षण काल देवताओं का प्रातः काल है, सूर्योत्पत्तिलक्षण उदयकाल देवताओं का मध्याह्न है, वैवस्वत मन्वन्तरावसानोपलक्षित मध्याह्नकाल देवताओं का सायंकाल है । त्रिभावात्मक यही अद्यतन देवताओं आ अहः, तथा पितरों की रात्रि है । ( १ ) विशुद्व भार्गव सोमधारालक्षण तमोमय सोमतत्त्व ही रात्रि है, एवं इस का उपक्रम सौर सृष्टिकाल के मध्याह्न से ही हो जाता है । सृष्टिकालोपलक्षित सूर्य्यसत्ताकाल के १४ मन्वन्तरों में से सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के समाप्त हो जाने पर, जो कि मध्याह्न की अवसानभूमि है, इस रात्रितत्त्व .का उपक्रम हो जाता है, एवं रात्रिकालोपलक्षित लय के १४ मन्वन्तरों में से सातवें मन्वन्तर वन पर इस रात्रिविकास का अवसान है । इस प्रकार सृष्ट्यु पलक्षित ग्रह के सप्तम मन्व-न्तरोपलक्षित मध्याह्नावसानसे आरम्भ कर लयोपलक्षित रात्रि के सप्तम मन्वन्तरोपलक्षित मध्यरात्रिपर्यन्त आयवरुण का साम्राज्य सिद्ध हो जाता है, यही वारुण पश्चिम कपाल है, यही अनद्यतनलक्षण रात्रि है । सौर वरुणतत्त्वोदय लक्षण काल पितरों का प्रातः काल है, सूर्य्यावसानलक्षण सूर्यास्तकाल पितरों का मध्याह्न है, एवं रात्रिगत १४ मन्वन्तरों में से सप्तम मन्वन्तराव सानोपलक्षित मध्यरात्रिकाल पितरों का सायंकाल है । त्रिभावात्मक यही अद्यतन पितरों का श्रहः, तथा देवताओं की रात्रि है । विपर्य्ययात्मक उक्त भोग के अतिरिक्त उदयास्त लक्षण भोग सार्वजनीन है । सूर्योदय से सूरत पर्यन्त हः है, सूर्यास्त से सूर्योदय पर्यन्त रात्रि है, यही मानुष अहोरात्र है । श्रहः देवता-प्रधान है, रात्रि पितरप्रधाना है । अहः पितरों की रात्रि है, रात्रि पितरों का अहः है । रात्रि देव-ताओं की रात्रि है, अहः देवताओं का अहः है । यही उदयास्तमनानुगत मानुष अहोरात्र है । * इसी आधार पर पितरों के लिए रात्रिजागरण ( रातीजगा ) प्रधान माना गया है । १४८

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( २ ) मोत्तर प्रतिपत् से आरम्भ कर पूर्णिमापर्यन्त अहः है, पूर्णिमोत्तर प्रतिपत से आरम्भ करमापर्यन्त रात्रि है, यही पैत्र अहोरात्र है । शुक्लपक्षात्मक यह अहः देवताप्रधान है, कृष्ण-पक्षात्मिका रात्रि पितृप्रधाना है । शुक्लपक्षात्मक अहः पितरों की रात्रि है, कृष्णपक्षात्मिका रात्रि पितरों का श्रह: है | एवं कृष्णपक्षात्मिका रात्रि देवताओं की रात्रि है, शुक्लपक्षात्मक ' अहः ' देवताओं का अहः है । यही उदयास्तमनानुगत पत्र अहोरात्र है । ( ३ ) वसन्तसम्पात से आरम्भ कर शरत्सम्पातारम्भ - पर्यन्त ह: है, शरत्सम्पात से आरम्भ कर वसन्तसम्पातारम्भ - पर्यन्त रात्रि है, यही दैव अहोरात्र है । उत्तरगोलात्मक अहः देवता-प्रधान है, दक्षिणगोलात्मिका रात्रि पितृप्रधाना है । उत्तरगोलात्मक अहः पितरों की रात्रि है, एवं दक्षिण गोलात्मिका रात्रि पितरों का अहः है । दूसरे शब्दों में उत्तर गोलात्मक अहः देवताओं का अहः है, पितरों की रात्रि है । एवं दक्षिण गोलात्मिका रात्रि देवताओं की रात्रि है, पितरों का अहः है । यही उद्यास्तमनानुगत दैव अहोरात्र है । ( ४ ) सूर्य्योत्पत्ति से प्रारम्भ कर सूर्यलय से पूर्वक्षण पर्य्यन्त अहः है, सूर्यलय से आरम्भ कर सूर्योत्पत्ति से पूर्वक्षण पर्यन्त रात्रि है । सृष्टिकालात्मक अहः देवताप्रधान है लय-. कलात्मिका रात्रि पितृप्रधाना है । सृष्टिकालात्मक अहः पितरों की रात्रि है, एवं लयकालात्मिका रात्रि पितरों का ( परमेष्ठीका ) अहः है । दूसरे शब्दों में सृष्टिकालात्मक अहः देवताओं का अहः है, पितरों की रात्रि है । एवं लयकालात्मिका रात्रि देवताओं की रात्रि है, पितरों का अहः है । यही उदयास्तमना-गोत्र है । इस प्रकार शास्त्रीय परमार्थदृष्टि से युक्त अद्यतन - अनद्यतन कालभेद से, तथा लौकिक व्य-. वहारदृष्टि से युक्त उदय अस्तकाल भेद से मानुष पैत्र - देव - ब्राह्म, चारों अहोरात्रों के दो दो विवर्त्त · हो जाते है । सर्वत्र ज्योतिर्मय अग्निभोगकाल ' अह: ' है, इस में ज्योतिर्मय देवप्राण का साम्राज्य है, तमोमय सोमभोगकाल ' रात्रि ' है, इस में सौम्य पितृप्राण का साम्राज्य है । दोनों विवन्त्तों में से अद्य - तनानद्यतनानुगता अहोरात्रचतुष्टयी में प्रकृत ब्राह्मणाख्यान के साथ मानुष- पैत्र - देव - इन तीन अहोरात्रों का ही सम्बन्ध है । अहोरात्र परिभाषा के स्पष्टीकरण के बिना आख्यान रहस्य का विश्ले-षण असम्भव था, अतएव अप्राकृत होने पर भी इस का दिग्दर्शन कराना आवश्यक समझा गया । अब प्रकृतानुसरण से पहले सुविधा के लिए प्रतिपादित अहोरात्र विवत का परिलेखों से स्पष्टीकरण कर दिया जाता है । १४६

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१ २ श्राद्धविज्ञान १ - श्रद्यतनानद्यतनानुगता - अहोरात्रचतुष्टयी-. १ - मानुषमहोरात्रम् — पार्थिवं - स्वाक्षपरिभ्रमणात्मकं दैनंदिन गतौ प्रतिष्ठितम्-अद्यतनः -- १ - मध्यरात्रेरुत्तरक्षणतः - मन्याह्नस्य पूर्वक्षणपर्य्यन्तम् १ - १२ - हदेवानां रात्रिः पितॄणाम् अनद्यतनः – २ – मध्याह्नस्योत्तरक्षरणतः - मध्यरात्रेः पूर्वक्षणपर्यन्तम् १ - १२ - रात्रिर्देवानां, अहः पितॄणाम् २ - पैत्रमहोरात्रम् -चान्द्र - दक्षपरिभ्रमणात्मकं - मासिकगतौ प्रतिष्ठितम् -अद्यतन: - १ - शुक्लाष्टम्या उत्तरक्षणतः - कृष्णाष्टम्याः पूर्व क्षणपर्यन्तम्- - हर्दे वानां, रात्रिःपितॄणाम् ' अनद्यतन: - २ - कृष्णाष्टम्या उत्तरक्षरणतः - शुक्लाष्टम्याः पूर्वक्षणपर्य्यन्तम्- - रात्रिर्देवानां अहः पितॄणाम् ३ – दैवमहोरात्रम् — सौरं - क्रान्तिवृत्त परिभ्रमणात्मकं - सम्वत्सरगतौ प्रतिष्ठितम्-अद्यतन: - १ - चैत्रकृष्णामोत्तरप्रतिपदातः - आश्विन पूर्णिमापर्यन्तम्- अहर्देवानाम्, रात्रिः पितॄणाम् । अनघतनः - २ - आश्विन पूर्णिमोत्तरप्रतिपदतः - चैत्रकृष्णामापर्यन्तम्- - रात्रिर्देवानाम्, अहः पितृणाम् । अथवा-अद्यतनः १ - दक्षिणपरमक्रान्तेरुत्तरक्षणतः - उत्तरपरमक्रान्तेः पूर्व क्षणापर्यन्तम्- अहर्देवानां रात्रिः पितॄणाम ' अनद्यतनः २ - उत्तरपरमक्रान्तेरुत्तरक्षणतः - दक्षिणपरमक्रान्तेः पूर्वक्षण पर्यन्तम्- रात्रिदेवानाम्, अहः पितृणाम् ४ – ब्राह्माहोरात्रम् -पारमेष्ठ्य - दर्शपूर्णमासपरिभ्रमणात्मकं सञ्चरप्रतिसञ्चरगतौ प्रतिष्ठितम् — अद्यतनः – १ – शुक्लेन्द्रसाव रारभ्य - - शुक्लवैवस्वतमनुपर्यन्तम्- अहर्देवानाम, रात्रिः पितॄणाम् अनद्यतन: - - २ - कृष्णेन्द्र सावर्णेरारभ्य - - कृष्णवैवस्वतमनुपर्य्यन्तम्- - रात्रिर्देवानां, अहः पितृणाम् X--

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: साय क्षण- मध्याहस्यपूर्व ( " निशासभ मध्यास्यात्तरक्षप्रम्उत्तरा अ | पूर्वकपालम अघतनानपतनानुगतान्यहोरात्राणे-१- मानुषं - अहोरात्रम्- • अद्यतनानघतनानुगतम् ( पार्थिवस ) सूर्य .मध्याह्नः ( प्रातरारम्भट्रयाम् ) ६ प्राची देवानां अहः पिन्टारणां रात्रिः अहः अघतनः | मैत्रमहः रात्रिः देवाना अहः पिन्दर M प्रतीची रात्रिः अनधतनः पश्चिमकपालम् रा : वारुणरात्रि निः > सायङ्कालारम्भ रात्रिः मध्य स पूर्वापरवृत्तम् रात्रिः द्राक्षाः रात्रिउत्तरक्षया मध्ययाम्योतरव निशावसान‍ प्रातः V ( मध्यरात्रि: पूर्वरा( अहोरात्र म अहः >

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याम्योत्तरवृतम् २- पैत्र- अहोरात्रम चान्द्रम् अद्यतनानद्यतनानुगतम् उत्तरा ११ १२-१२ ईशान । पाशम् पूर्वक अपतनः चन्द्रमान .4 १३ १३ m : मित्रमह १४. १४ १५ मध्याह्नः पूर्णिमा प्राया देवानी अहः पिल्हरणां रात्रिः अ हः. चन्द्रमाः पूर्णिमा ( पृथिवी १ अग्नय १८-१६ क्षणम इतर म्या शुक्ला म मित्रोदय सान निशावासनम् क्षण 30 वायव्य 11 ) सूय्यैः Ahaiblitie प्रताचा मिन्दर अहः देवानां : रात्रि रुशी रात्रि रा . त्रिः चन्द्रमाः अमावास्या १४ मध्यरात्रिः अमावास्या परवृत्तम् पूर्वा हैं: कृष्णाष्टमी चन्द्रमाः नेतृत | | दक्षिणा . Tinte po कृष्ण यना निशारम्भ कृष्णाष्टम्या उत्तर क्षणम १२ १० १३ Th ३

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दैवं - अहोरात्रम् अद्यतनानघतूनानुगतम् सौरम् 2- ग्रीष्मः ३ ज्येष्ठां ९ वसून्तः वैशाख : 2 - चैत्रः प्रतिपत अमोत चैत्र- ' मित्रोदम प्रातः निशामनाम ' चैत्र कृष्णा अमावास्या पूर्व कपालः अघतन : दक्षिणा क्षेत्र महः I पृथिवी अ ४ आसादः मध्याह्नः आषाढ़ शुक् पू प्रात्यो देवानां अहः पिन्दरात्रिः अं पृथिवी दयः हः श्रावणः : पद् भाद्र ३ वर्षाः फाल्गुनः १२ शिशिरः ६. ibilli ११ पौषः हेमन्तः ५-, अमावास्या कृष्णा पौष रात्रि मध्य दद्वानां रा प्रतीची त्रिः रात्रिः अहः पृथिवी ( : ॐ शीर्ष मार्ग -उत्तरा रात्रिः चारुणी । अनघतनः कपालः पश्चिम त्रिः पृथिवी वह कान्तिर्कः निशारम्भ अश्विन पूर्णिमान्तरा प्रतिमत् अश्चिम नम् : मित्रारुतम : साय पशीमा शरत् ४-पूर्वापरकृतम्

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