Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 231–240
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 231–240
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् सोमप्रधान हैं, देवता सौर ज्योतिर्लक्षण इन्द्रात्मक बनते हुए इन्द्रप्रधान हैं । षण्मासात्मक उत्तरायण काल में सौर ज्योतिर्म्मय इन्द्रप्रमुख देवताओं का साम्राज्य है, इस काल में पार्थिव विवर्त्त देवप्राण का भोग्य बना रहता है । षण्मासात्मक दक्षिणायनकाल में चान्द्र सोममय पितरों का साम्राज्य है, इस काल में पार्थिव विवर्त्त पितृप्राण का भोग्य बना रहता है । उभय सम्पात स्थिता पृथिवी न देवभोग्या है, न पितृभोग्या है । अपि तु इस समय यह अपने आग्नेयरूप से पार्थिवप्रजा की भोग्या बनी रहती है । एकमात्र इसी प्राकृतिक स्थिति के आधार पर उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुव, तीनों को क्रमशः देव - पितर - मनुष्य - प्रजा में भुक्त माना गया है । उत्तरायणकाल में सौर आग्नेय देवताओं का उपचय है, सौम्य पितरों का अपचय है । दक्षिणायनकाल में पितरों का उपचय है, देवताओं का अपचय है । सौरप्राण का उत्तरायण में विकास है, पितर का संकोच है । पितरप्रारण का दक्षिण में विकास है, सौर प्रारण का संकोच है । उत्तर से दक्षिण की ओर आरोहण करना पितृप्राण का स्वभाव है, दक्षिण से उत्तर की ओर आरोहण करना देवप्राणका स्वभाव है । मध्य- समस्थिति पार्थिव ' मनु ' नामक अग्नि का स्वभाव है । स्वयं सम्वत्सरप्रजापति ही इन तीन स्वरूपों में परिणत हो रहे हैं । इन की देवस्थिति ' दक्षिणं जान्वाच्य ' है, पितृस्थिति ' सव्यं जान्वाच्य ' है, मानवस्थिति ' उपस्थं कृत्वा ' है । सम्वत्सरप्रजापति को ' महासुपर्ण ' माना गया है । दक्षिणगोल इन का दक्षिण हस्त पादा-त्मक दक्षिणपक्ष है, उत्तरगोल इन का वाम हस्त पादात्मक वामपक्ष है, मध्यस्थ विषुववृत्त मध्याङ्ग है । दक्षिणगोलस्थ मध्यम बिन्दु ही सूर्योत्तरायणकाल का उपक्रम है । यहीं इस देवप्राण की उपक्रम-रूपा मूलप्रतिष्ठा है । क्योंकि दक्षिणस्थ सौर प्रारण दरिण जानू है, वह यहाँ ( दक्षिणपरमक्रान्ति ) पर प्रतिष्ठित है, अतएव इस देवस्थिति के लिए ' दक्षिणं जान्वाच्य ' कहना श्रन्वर्थ बन रहा है । ६६ अङ्ग ुल परिमाणात्मक, २७ अवान्तरतमसूत्रात्मक, ६ श्रवान्तरतरसूत्रात्मक, ३ अवान्तरसूत्रात्मक यज्ञसूत्र इस स्थिति में प्रजापति के वामस्कन्धोपलक्षित उत्तरपरमक्रान्ति से सम्बद्ध है । दक्षिण परमक्रान्तिस्थ, अतएव ' दक्षिणं जान्वाच्य ' वाला देवप्रारण इस स्थिति में उत्तरायण का अनुगामी बनता हुआ अवश्य ही उत्तर ( वाम ) सूत्र से युक्त है, यही इस की यज्ञोपवीतता है जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन गीता-विज्ञान माष्यभूमिका - अन्तरङ्गपरीक्षात्मक द्वितीयखण्ड के ' ग ' विभाग में ' संस्कारविज्ञान ' प्रकरण से सर्वात्मना गतार्थ है । इन देवताओं उत्तर से दक्षिण की ओर आते ' हुए दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हुए सोम की आहुति होती रहती है । इसी अग्निसोमसमन्वय का नाम ' यज्ञ ' है, यही इनका अन्न है । सोम अमृत है । इस अमृतसोमाहुतिरूप यज्ञात्मक अन्न से ही देवता अमृतसम्पत्ति के अनुगामी बने हुए हैं । वृष्टि होने पर वृक्षों के पत्तों में जो एक प्रकार का उल्लास ( विकास ) आ जाता है, भोजनोत्तर १६१
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श्राद्धविज्ञान मनुष्य में जो एक प्रकार की स्फूर्त्ति आ जाती है, वही ' ऊर्क ' रस है । इट् ( अन्न ) ही ' ऊर्क ' रस है । इद् ( अन्न ) ही ऊर्क ू का प्रवर्त्तक है । भूतबल पशुबल है, प्राणबल ऊर्फ बल है । सोमाहुति से देवता इसी ऊर्ग बललक्षण ज्योतिर्मय विकास से युक्त हो रहे हैं । इस विकास का एकमात्र कारण है-' यज्ञान ' | जिस प्रकार पितरों का अन्न ' स्वधा ' कहलाया है, तथैव देवताओं का यह यज्ञान्न ' स्वाहा ' नाम से व्यवहृत हुआ है | अन्न का अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रारण में प्रतिष्ठित हो जाना स्वधा ' ' भाव है, एवं बहिर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित होना ' स्वाहा ' भाव है, जैसाकि इन शब्द - निर्वचनों से ही स्पष्ट हो रहा है । देवता सावित्राग्निप्रधान हैं । अग्नि का तेजोमय अङ्गिरा से सम्बन्ध है, आगत आहुत अन्न का विकलन कर देना इसका स्वभाव है । अग्नि में आहुत सोम श्रग्नि के इसी विशकलन स्वभाव से अग्नि में अन्तर्यामि सम्बन्ध से प्रतिष्ठित न होकर केवल बहिर्य्यामि सम्बन्ध से चारों ओर व्याप्त हो जाता है । इसी आधार पर देवताओं के सम्बन्ध में निगम प्रसिद्ध है कि - ' नं वै देवा अश्नन्ति, न पिबन्ति एतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ” ( ब्राह्वराश्रुतिः ) । इसी आधार लोक में भी यह किंवदन्ती प्रचलित है कि – ' देवता खाते पीते नहीं हैं, अपितु वे तो वासना के भूखे हैं " । -----देवान की इसी उक्त बहिरङ्गव्याप्ति को लक्ष्य में रखते हुए ऋषियोंनें इसे ' स्वाहा ' शब्द से व्यवहृत किया है । ' स्वमात्मानमन्नादं - होति बहिर्व्याप्नोति, न तु तत्रात्मरूपेणान्तर्य्यामसन्च-न्धेन प्रविशति ' निर्वचन ही स्वाहा शब्द का तत्त्वार्थ है । अन्न में एक प्रकार का मृत्युलक्षण बल है । उस बल से देवता इसी स्वाहा सम्बन्ध से पृथक् रहते हैं, अतएवं इनके लिए ' अमृतत्वं वः, ऊर्ध्वः ' कहना चरितार्थ होता है । अपिच असङ्ग तत्त्व अमृत है, ससंग तत्त्व मृत्यु है । अध्यात्मसंस्था में आत्मा, तदनुगत विज्ञान ( बुद्धि ), दोनों असङ्ग होने से अमृत हैं । एवं ' सूर्य्य आत्मा जगस्तस्थुषश्च ” – धियो यो नः प्रचोदयात् " से आत्मा - बुद्धि- दोनों सूर्य्याश हैं । इस आध्यात्मिक सौरप्राणदृष्टि से भी ' अमृतत्त्वं वः ' कहना अन्वर्थ बनता है । अद्यतन लक्षण षण्मासात्मक सौर उत्तरायणकाल ही ' ह: ' है, इस ज्योतिर्म्मय अहोमण्डल में ही देवता प्रतिष्ठित हैं । अतएव ' सूय्यों वो ज्योतिः ' कहा गया है । इस प्रकार चन्द्रनाड़ी वृत्तात्मक यज्ञोपवीत से युक्त, दक्षिणक्रान्तिप्रतिष्ठा से युक्त सौरदेवता यज्ञान्न,. अमृतत्त्व, उ., सूर्य्यज्योति, इन भोगसम्पत्तियों से युक्त हो रहे हैं । इसि प्राकृतिक स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति ने कहा है-१ - " ततो देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जान्वाच्य उपासीदन् । तानब्रवीत्-tas, अमृतत्वं वः, सूर्यो वो ज्योतिः ” । इति । मासात्मक दक्षिणायनकाल में सौम्य पितर प्रारण का साम्राज्य है । इस पितृस्थिति से सम्बद्ध सम्वत्सरप्रजापति का यज्ञसूत्र उत्तरगोलस्थ दक्षिणायन बिन्दु से उपलक्षित जगतीछन्द की ओर १६२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत त रहता हुआ प्रजापति के दक्षिणस्कन्ध पर प्रतिष्ठित है । यही पितरप्राण की प्राचीनावीतिता है । इसी आधार पर दक्षिणायनकालावच्छिन्न, अतएव पितृमूर्त्ति इस प्रजापति को अवश्य ही प्राचीनावीती कहा जा सकता है । दक्षिणायनकालोपलक्षित सौम्य पितरों की सोमप्रतिष्ठा ( उपक्रमरूपा ) उत्तरपरम-क्रान्ति है । इसी आधार पर ' सत्र्यं जान्वाच्य ' कहा गया है । इस प्राचीनावीती- सव्यं जान्वाच्यावस्थायुक्त पितर का सजातीय चान्द्रकक्षा से सम्बन्ध है । चान्द्रकंक्षा का शुक्ल - कृष्णपक्षात्मक मास इनका अहो --रात्र है । प्रत्येक मास की अमावास्या इनका मध्याह्न है, जैसाकि पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । अमा-वास्या में विधूर्ध्वभागस्थ सौम्य पितर सौरदेवताओं से भुक्त होते हुए क्षीणपिण्ड हैं । उधर अधोभागा-वस्थित अक्षीणसोम के पार्थिव सम्बन्ध से तदनुगता श्रद्धानाड़ी भी पुष्ट है । इसी के द्वारा सन्तति में प्रतिष्ठित स्वपिण्डरसों का स्वधारूप से पितर ग्रहण किया करते हैं । इसी स्वाभाविक स्थिति को लक्ष्य में रख कर ' मासि मासि वोऽशनम् ' कहा गया है । जिस प्रकार बहिरङ्गसम्बन्धानुगत देवान्न स्वाहा कहलाया है, तथैव अन्तर्याम - सम्बन्ध से पितरों का अन स्वधा ' ' कहलाया है । पितर सौम्य होने से संकोचधर्म्मा हैं, स्नेहधर्म्मा हैं । इनमें जो पिण्डसोम आहुत होता है, वह स्वयं भी स्नेहधर्म्मा है । इसी स्नेहगुण के कारण यह आहुतिगृहीता में - सन्बन्ध से प्रतिष्ठित होता हुआ आत्मधारक बनता है । ' स्वमात्मानं धत्ते ' से ही यह अन्न ' स्वधा ' कहलाया है । मनोमय श्रद्धांसूत्र ही स्वधारूप पिण्डरस का गमन मार्ग है, अतएव इनके लिए ' मनोजवो वः ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । चान्द्रज्योति ही इनका अन्नभोगकाल है, अतएव इनके लिए ' चन्द्रमा वो ज्योतिः ' कहा गया है । चान्द्रपितर प्रारण की इसी स्वाभाविक स्थिति का विश्लेषण करते हुए श्रुति ने कहा है-२२ – “ प्रथैनं पितरः प्राचीनवीतिनः सव्यं जान्वाच्य उपासीदन् । तानब्रवीत्--मासि मासि वो अशनं, स्वधा वः, मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिः " । सम्वत्सरप्रजापति का षण्मासात्मक उत्तरायणभाग देवसृष्टि की, षण्मासात्मक दक्षिणायन भाग पितृसृष्टि की प्रतिष्ठा बनता है । एवं मध्यस्थ विषुवभाग पार्थिवसृष्टि की प्रतिष्ठा बनता है । देव-सृष्टि का मूलाधार सूर्य्य है, पितृसृष्टि का मूलाधार चन्द्रमा है, एवं अस्मदादि पार्थिवसृष्टि की मूला-धिष्ठात्री पृथिवी है । पृथिवी का मध्यस्थ विषुव से सम्बन्ध है, चन्द्रमा का सौम्य दक्षिणायनरूप दक्षिण-पक्ष से सम्बन्ध है, एवं सूर्य का ऐन्द्र उत्तरायणरूप वामपक्ष से सम्बन्ध है । उत्तरायणानुगत देवदृष्ट्या प्रजापतिसूत्र उपवीत है, दक्षिणायनानुगत पितृदृष्टि से प्रजापतिसूत्र अवीत है । एवं मध्यस्थ विषुवत् दृष्टि से यही प्रजापतिसूत्र निवीत, किंवा ' प्रावृत ' है । वामस्कन्ध स्थित सूत्र उपवीत है, दक्षिणस्कन्ध-स्थित सूत्र वीत है, एवं मध्य में माला की भाँति स्थित सूत्र निवीत, किंवा प्रावृत है । प्रावृतस्थित्य-वच्छिन्न प्रजापति ही पार्थिवसृष्टि के प्रवर्त्तक बनते हैं । यही मध्यस्थ विषव हमारा मेरुदण्ड बनता १६३
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श्राद्धविज्ञान है, जिसका दक्षिण पार्श्व दक्षिण गोल है, उत्तर पार्श्व उत्तरगोल है । वामस्कन्ध से दक्षिण कटिपर्यन्त उत्तरायण भाग है, दक्षिण स्कन्ध से वामकटिपर्य्यन्त दक्षिणायन भाग है । अर्द्ध विष्वद्वृत्तात्मक श्रद्धा-काश पुरुषसृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है, एवं अर्द्धवृत्तात्मक अद्धकाश स्त्रीसृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । दोनों के दाम्पत्य से ही पूर्णप्राजापत्य विभूति होती है, जिसका फल प्रजासम्पत्ति माना गया है, जोकि प्रजा इसका प्रातिविक बल है । 1 सौरप्राण की उत्तर - दक्षिण क्रान्ति २४ - २४ अशों तक व्याप्त है । इस प्रकार क्रान्तिभाव गायत्री सम्बन्ध से २४ पर विश्रान्त है । श्रतएव तदनुरूप पुरुष की पशु ( फँसलियाँ ) भी २४ ही होतीं हैं । क्रान्ति की चरम सीमा पर पहुँच कर सूर्य्य इतः - उतः मुड़ जाता है । ठीक वही स्थिति पशु की है । इस प्रकार विष्वद्वृत्तावच्छिन्न खगोलीय सम्वत्सरप्रजापति की जैसी स्थिति है, ठीक वैसी ही स्थिति मनुष्यप्रजा की है । पृथिवी सम्बन्ध से, किंवा पार्थिव स्वाक्षपरिभ्रमण सम्बन्ध से इस का अनकाल चतुर्विंशति होरात्मक अहोरात्र है । विषुवद् दृष्ट्या ये प्रावृत हैं । दाम्पत्य - दृष्ट्या प्रज । इनकी प्रातित्विक सम्पत्ति है । ‘ यत् किञ्चार्वाचीनमादित्यात्, सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् ' ( शत ० १० | ५ | ६ | ) से मृत्यु इनका स्वाभाविक धर्म है । पार्थिवप्रजात्त्वेन अग्नि इन का ज्योतिर्मण्डल है । मानवप्रजा की इस स्वाभाविक स्थिति का ही स्पष्टीकरण करते हुए आख्यानश्रुति ने कहा है-प्रक १३– “ अथैनं. मनुष्याः प्रावृताः ( समसूत्रयुक्ताः ) उपस्थं कृत्वा उपासीदन् । तान-चवीत् + - सायं प्रातर्वोऽशनं, प्रजा वः, मृत्युर्वः, अग्निर्वो ज्योतिः ” । आख्यान का ' ४-५-६ ' एतत् संख्याक उत्तरांश पूर्वोक्त अर्थ से ही गतार्थ है । इस आख्यान रहस्य से हमारी कितनी एक ऐसी शङ्काओं का निराकरण हो जाता है, जिन्हें आगे कर ' श्राद्ध ' जैसे are करनेक कुशङ्काओं को अवसर मिल जाना आज सम्भव बन गया है । प्राणविद्यामूलक श्राद्धकर्म्म-Fi; ब्राह्मग्रन्थोक्त पिडपितृयज्ञ कुछ एक ऐसी परिभाषाओं का स्पष्टीकरण कर रहा है, जिनसे - परिचय प्राप्त करने के अनन्तर श्रद्धालुधर्ग को यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि, अवश्य ही पितृप्राण चान्द्रसंस्था से सम्बन्ध रखने वाला प्राणविशेष है, एवं यही प्रजोत्पादन कर्म की ( महानात्माद्वारा ) प्रतिष्ठा बनता है । प्राकृतिक पितृप्राणतत्त्व के साथ महानात्मरूप से प्रतिष्ठित पुत्रादि के प्रतपितर प्रति अमावास्या को क्षीणकाय रहते हैं । साथ ही इस तिथि में चान्द्र अधोभाग के सोमानुगमन से पुत्रादि को श्रद्धासूत्र पुष्ट रहता है, जिस का चान्द्रोर्ध्वभागस्थ स्वप्र तपिण्डों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । इस श्रद्धासूत्रद्वारा भौतिक पिण्डदान से अवश्यमेव उन्हें तृप्त किया जाता है । यह तृप्ति ' पिता- पिता-मह प्रपितामह ' इन तीन पिण्डभाक् पितरों से सम्बन्ध रखती है । शेष वृद्ध - अतिवृद्ध वृद्धातिवृद्ध, नामक ' तीनों लेपभाक् पितर इन के साथ ही पिण्डगत लेपांश से तृप्त हो जाते हैं । यथाविधि पिण्डदान करने १६४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् वाला पुत्र - ' अथ अवजिघ्रति प्रत्यवधाय पिण्डान् ' ( शतपथब्राह्मण के अनुसार परम श्रद्धा से पडों को सूँघता है । इस के इस व्यापार से पिण्डप्रारण इस के आध्यात्मिक श्रद्धासूत्र ' अन्तर्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित हो जाता है । श्रद्धासूत्र में प्रतिष्ठित पिण्डप्राण लक्षीभूत चान्द्रलोकस्थ प्रेतपितरों की तृप्ति का वश्यमेव स्वधान्न बन जाता है । पुत्र के सूँघने के अनन्तर पिण्डतत्त्व शून्य हो जाता है । इसे पशुको खिला दिया जाता है । अवश्यमेव इस प्राकृतिक वैज्ञानिक प्रक्रिया से पिण्डगत सौम्यप्राण, जो कि सौम्य पितरों की; किंवा सौम्य पितृपिण्डों की सजातीय सम्बन्धेन तृप्ति का साधन है, पुत्र के श्रद्धासूत्र में प्रतिष्ठित हो जाता है, एवं तद्द्द्वारा उन की स्वधा बन जाता है । यह निर्विवाद है कि, प्राण-तत्त्व भारशून्य है, साथ ही इन्द्रियातीत भी । इस के निकल जाने से भूतभार कम नहीं होता, आजाने से भूतभार बढ़ नहीं जाता । साथ ही इस का आगमन - विनिर्गमन भी रूप - रस- गन्धस्पर्श - शब्द- तन्मात्रा युक्त इन्द्रियों से अतीत है । क्योंकि प्रारं स्वयं तन्मात्रातीत है । + लौकिक दृष्टान्त लीजिए । बासी भोजन में वह स्वाद नहीं रहता, जो सद्योभोजन में होता है । कारण - अमृतमात्रा का विनिर्गमन । प्रत्येक अन्न में दधि, मधु, घृत, अमृत, ये चार रस रहते हैं । दधि पार्थिवरस है, घृत आन्तरिच्यरस है, मधु सौररस है, अमृत पारमेष्ठ्य सौम्यरस है । आरसी भूतप्रधाना है, अतएव इस का अनुभव इन्द्रियों से हो जाता है । सौम्य अमृतरस प्राणात्मक है, अतएव इस का अनुभव केवल इन्द्रियातीत अतीन्द्रिय प्रज्ञान मन को होता है । प्राणात्मक इसी रस का हम ' स्वाद ' ( जायका ) शब्द से अभिनय किया करते हैं । इन्द्र-प्राण का यह सौम्य रस प्रिय अन्न है । ' इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते ' ( शत ० ४ | ६ | ३ | ३ | ) न्याय से प्रत्येक क्षेत्र में एक चतुर्थांश इन्द्र की प्रतिष्ठा रहती है । इसी वायु के सम्पर्क से तद्गत इन्द्र अन्न-गत सौम्य रस का शोषण कर लेता है । तप्त ( उप ) भोजन में जो स्वाद है, वह ठंढे में नहीं । ज्यों ज्यों 1 कालातिक्रमण होता जाता है, अन्नगत सौम्य रस इन्द्रद्वारा निकलता जाता है, त्यों त्यों ही अन्न स्वादु बनता जाता है | सगरा रात्रि के वारुण विष के समावेश से तो यह सर्वथा ही नीरस बन जाता है | अतएव यातयाम ( गतरस ) अन्न तो सर्वथा ही अग्राह्य माना गया है । विशुद्ध वृत - तैल से पक्व पदार्थों में कुछ समय पर्य्यन्त ( जबतक घृततैलमात्रा सुरक्षित रहती है ) रस का विनिर्गमन नहीं होता । अतएव तन-समय पर्य्यन्त ( अन्नजाति के अनुसार २-४-६-८ दिनों पर्यन्त ) खाद्य सामग्री दूषित नहीं होने पाती । क्या यही है कि, सौम्य प्रारण के निकल जाने से भोजन अस्वादु हो जाता है । धारोष्ण दूध में जो रसमात्रा है. वह कालान्तर में नहीं रहती । क्या इस स्वादु - पाकरस ओजस्य धातुवर्द्धक - सौम्य--प्राणका निर्गमन आँखों से देखा जा सकता है?, क्या इसके निकल जाने से खाद्यभार कम होता देखा गया है? नहीं, तो पिण्डप्राण के सम्बन्ध में ही यह कुशङ्का क्यों? | मधुमक्षिका पुष्पगत प्राणात्मक मधुरस का शोषण कर लेती है । परन्तु न आप देखते, न हम । न पुष्पों का भार ही कम होता । ठीक यही परिस्थिति यहाँ समझिए । ' अतीन्द्रियानसंवेद्यान्न तांस्तर्केण योजयेत् ' ही श्रेयः-पन्था है । १६५
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श्राद्धकर्म्मानुगत श्रौतपरिभाषा विज्ञान-श्राद्धविज्ञान है । दर्शनानुगता वस्तुस्थिति वास्तव में यह है कि, आज वेदों की प्राणविद्या सर्वथा विलुप्त सर्वथा विस्मृत है । भूतदृष्टि के निग्रह से, एवं प्रचलित जड़ भूतवाद के अनुग्रह से प्राणदृष्टि प्र ेत- पितरों के समर्थक वचन अतएव कभी ' पितर ' का अर्थ जीवित पितरादि किया जाता है, और का जब अनर्थ किया जाता है, अथवा उपलब्ध होते हैं, तो या तो षोढ़ासङ्गति की उपेक्षा कर उन प्रकरणों । कभी ' देव ' का अर्थ विद्वान् किया जाता तो सुलभ साधनभूत प्रक्षेप - शब्द का आश्रय ले लिया जाता है ये शुश्र वाँसोऽनूचा-है, जब कि - ' देवा हैव देवाः ' रुपसे श्रु तिने प्राणात्मक देवतत्त्वका पार्थक्य तथा प्रमाणित - ' अथ किया है । वेदमन्त्र . नास्ते ब्राह्मणा देवा: ' इत्यादिरूप से विद्वान् देवताओं का सर्वथा से द्युलोक में जाती है, स्पष्ट शब्दों में यह सिद्ध कर रहे हैं कि, श्राहवनीयाग्नि में हुत आहुति प्रारणरूप होता हुआ एवं इसके आकर्षण से यजमान का भूतात्मा मानुष - आयुर्भोगानन्तर यजुः देवस्वरूप साममन्त्रों में परिणित से तत्त्वात्मिका ऋक्-लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है । ऋत्विजों के द्वारा प्रयुक्त ऋक् उत्पन्न होता है, यजुः - सामत्रयीद्वारा यजमान का एक पूर्व ऋकू - यजुः साममय देवमूर्त्ति दिव्यसंस्कार इयादि से प्रमा-जिसे यज्ञपरिभाषा में ‘ देवात्मा ' कहा जाता है, जैसा कि- “ दैवोऽस्यात्मा, मानुषोऽन्यः " ) से अन्त-णित है । त्रयीसंस्कार से संस्कृत आहुतिमय यह दैवात्मा यजमान क्योंकि के मानुषात्मा ऋत्विजों ( के भूतात्मा कर्म्म से इस नवीन र्याम सम्बन्ध से बद्ध होता हुआ द्यु लोक में प्रतिष्ठित होता है । है । इनके इस अनुशय आत्मा का उदय होता है, अतएव उनका आत्मानुशय भी इसमें प्रतिष्ठित ही ऋत्विजों रहता को दक्षिणा दी जाती को इस दैवात्मा से पृथक कर इसे केवल अपनी सम्पत्ति बनाने के लिए अन्त में दक्षिणा - होम होता है | बिना दक्षिणा का यज्ञ परानुशय से हत ( अपूर्ण ) रहता है । इसीलिए अवश्य ही दक्षिणाप्राण है । मुझे परलोक में पूर्ण फल मिले, इस उद्देश्य से होने वाला दक्षिणा यज्ञातिशयरूप - होम देवात्मप्राण स्वर्ग से इस के दैवात्मा के साथ युक्त हो जाता है । इस प्रकार आगे आगे में जाता है । निम्न लिखित में जाता है, इसके साथ दक्षिणाप्राण जाता है, तदनुगत यजमानामा स्वर्ग के लिए पर्याप्त प्रमाण बन श्रुति विस्पष्ट शब्दों में इस स्थिति का स्पष्टीकरण करती हुई यह सिद्ध करने लोक से दूसरे लोक के रही है कि, पार्थिव भौतिक माध्यमों के द्वारा इन्द्रियातीत प्राणों का एक है, अतएव सर्वथा साथ सम्बन्ध हो जाना सर्वथा प्राकृतिक है, युक्ति - तर्क - विज्ञान- प्रमाणानुमोदित आस्थेय, एवं ' श्रद्धय है । " ता वाऽएता: - ऋत्विजामेव दक्षिणाः । अन्यं वाऽएत एतस्यात्मानं -संस्कुर्वन्ति एवं ऋङमयं यजुम्र्म्मयं साममयं आहुतिमयम् । सोऽस्यामुष्मिंल्लोकात्मा भवति । तद्य मामजीनन्त इति, तस्माह- गाई-त्विग्भ्य एव दक्षिणा दद्यात्, नानृत्विग्भ्यः । अथ प्रतिपरेत्य १६६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् पत्यं दक्षिणानि जुहोति । ' देवलोके मेऽप्यसत् ' इति वै यजते, या यजते । सोऽस्यैष यज्ञो देवलोक मेवाभिप्रति, तदनूची दक्षिणा - यां ददाति - सैति, दक्षिणा मन्वारभ्य यजमानः " ( यजमानस्य भूतात्मा दैवात्मना यज्ञरूपेणाकर्षितः ) ( शत ० ४ कां ० ३ ४ ५, ६, ) । जिस प्रकार आङ्गिरस तेजोमय श्रद्धासूत्र के द्वारा दवात्मा, दक्षिणाप्रारण, आहुति, आदि द्युलोक प्रतिष्ठित होते हुए देवतृप्ति के कारण बनते हैं, एवमेव भार्गव स्नेहमय श्रद्धासूत्र के द्वारा पितरप्राण अवश्य ही पिण्डप्राण से तृप्त होते हैं । पिण्डप्रधानलक्षण, पितृप्राणपूरक यही पितृकर्म्म ब्राह्मणग्रन्थों में ' पिण्डपितृयज्ञ ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जिसे आधार बना कर हमारा स्मार्त्त पार्वणश्राद्धकर्म्म प्रतिष्ठित है । पिण्डपितृयज्ञ में जिन पितरों का पिण्डदान से यजन बतलाया गया है, वे पितर जीवित पिता - पितामहादि नहीं है । अपितु चान्द्रलोकस्थ सौम्यप्राणात्मक पितर हैं, जिनके लिए -' मासि मासि वो ऽशनम् ' यह व्यवस्था हुई है । इसी सौम्यभाव के कारण अमावास्या तिथि में ही इनका जन होता है । पूर्व - अपरविद्धा श्रमावास्या में नहीं, अपितु ' दर्श ' नाम की सूर्येन्दुसङ्गमरूपा अमावास्या में । इस की जो उपपत्ति बतलाई गई है, वह प्रमाणित कर रही है कि, यह पिण्डपितृयजन प्राणपितर से ही सम्बद्ध है । सूर्येन्दुसङ्गमरूपा अपराह्नद्वयव्यापिनी अमा दर्श है । अर्थात् तिथिक्षय न होने पर पूर्व ( चतुर्दशी ), उत्तर ( प्रतिपत् ) से विद्धा पूर्णा श्रमा ही दर्श नाम की अमावास्या है । चतुर्दशीविद्धा श्रमावास्या ' सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली ' के अनुसार ' सिनीवाली ' कहलाई है । चान्द्रकिरण - सम्बन्ध में - मात्र प्रमाण से यह प्रकाशित है । अतएव ' बालमात्रादु श्वेता ' निर्वाचन से इसे सिनीवाली कहना अन्वर्थ बनता है | प्रतिपविद्धा श्रमावास्या ' सा नष्टेन्दुकला कुहूः ' के अनुसार ' कुहू ' नाम से प्रसिद्ध है | चतुर्दशीमा के एक हो जाने से चन्द्रकिरण का दर्शन है, एवं श्रमा प्रतिपत के एक हो जाने से एक चन्द्रकला का क्षय है । ऐसी तिथिक्षयरूपा पूर्वोत्तरविद्धा दोनों श्रमावास्या प्रकाशयुक्ता बनती हुई " अक्षीण ( प्रकाशयुक्त ) है । इसी प्रकाश सम्बन्ध से इन्हें देवपत्नी माना गया है, जैसा कि निम्न लिखित निरुक्त वचन से प्रमाणित है-“ सिनीवाली कुहूरिति देवपत्न्याविति नैरुक्ताः । या पूर्वा ( चतुद्द शीविद्धा ) अमा-वास्या, सा सिनीवाली । या उत्तरा ( प्रतिपद् द्विद्धा ), सा कुहूः " इति विज्ञायते ". - या ० नि ० दे ० का ० ११ । ३२ । सिनीवाली, कुहू, दोनों में देवप्राण का सम्बन्ध है । अतएव इन अमावास्याओं में यदि पिण्डपितृयज्ञ किया जायगा, तो आग्नेय देवप्राण, तथा सौम्य पितरप्राण, दोनों में क्षोभलक्षण १६७
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श्राद्धविज्ञान क्षरणा उभयथा अविद्धा • समद ( कलह ) हो जायगा, पिण्डयज्ञ अपूर्ण रह जायगा । श्रतः चाहिए पूर्णामावास्याल । इस प्रकार पिण्डपितृयज्ञ के सूर्येन्दुसङ्गमरूपा दर्श नाम की अमा में ही यह करर्म होना ही हमारा ध्यान आकर्षित कर लिए दर्श की व्यवस्था करती हुई ब्राह्मणश्रुति प्रारणात्मक पितरों की ओर रही है । देखिए -“ तद्वा एतत् मासि मास्येव पितृभ्यो ददतः । यदैवेष ( चन्द्रमा ) न पुरस्तान्न । स पश्चात् एतां दह, अथैभ्यो ददाति । एष वै सोमो राजा देवानामन्न यच्चन्द्रमाः -रात्रिं क्षीयते । तस्मिन् क्षीणे ददाति तथैभ्योऽसमदं करोति । यदक्षीणे दद्यात् समदं हं कुर्य्याद्देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च । तस्माद्यदेवैष न पुरस्तान्न पश्चाद्ददृशे, थेभ्यो ददाति " ( शतपथब्राह्मण् ) श्रात्यन्तिकरूप से क्षीरा दर्श अमावास्या में सौर प्रारणदेवताओं के सम्बन्ध से पितर प्राण से क्षीण है, फलतः है, उधर श्रद्धासूत्र अक्षीण है । सिनीवाली, कुहू में पितरप्राणांशिकरूप से पिण्डद्वारा तृप्त करने के लिए क्षीणपितृ-श्रद्धासूत्र क्षीण है । क्षीण पितरों को अक्षीण श्रद्धासूत्र है । तीनों अमाओं में से प्राणात्मिका अक्षीणश्रद्धाभावप्रवर्त्तिका दर्श- श्रमा ही उपयुक्त है, यही उपपत्ति तात्पर्य है । दर्श अमा को पिण्डपितृ-दर्श मा काही ग्रहण क्यों किया गया?, इस प्रश्न को यही होता है । पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न, भेदसे यज्ञ करना, इस निश्चय के अनन्तर काल का प्रश्न उपस्थित से सम्बन्ध है, अप-अहः काल तीन भागों में विभक्त है । पूर्वाद्ध का अद्यतनलक्षण देवप्राणमय अहः का विष्वत् - से सम्बन्ध है । पूर्वा-राह का अनद्यतनलक्षणा पितृप्राणमयी रात्रि से सम्बन्ध है, मध्याह्न यह देवयजनकाल है । अप-हृकाल सौरप्राणप्रधान बनता हुआ उत्तरायण से अनुगत है, अतएव यह पितृयजनकाल है । एवं राहुकाल चान्द्रप्राणप्रधान बनता हुआ दक्षिणायन अनुगत है, अतएव, अतएव यह मनुष्ययजन-हुआ मध्यस्थ विष्वद् - वृत्त युक्त है मध्याह्नका पार्थिव प्राणप्रधान बनता ही उपयुक्त माना गया है । काल है । इस कालव्यवस्था के अनुसार पितर प्राण तृप्ति के लिए अपराह्नकाल . इसी कालत्रयी की व्यवस्था करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-स वा अपराह्नों ददाति । पूर्वाह्नो वै देवानां, मध्यन्दिनो मनुष्याणां, पितणाम् । तस्मादपराह्न ददाति । " अपराह्नः गाई-पहिले से नियत ' हविर्धानशकट ' में से पिण्डार्थ विद्रव्य का आहरण होता है । यह शकट के लिए यह प्राचीनावीती बन पत्यागार से पश्चिम भाग में प्रतिष्ठित रहता है । पिण्डार्थ हविद्रव्य लेने ही बतलाया गया है । कर दक्षिण दिशा की ओर बैठता है । कारण स्पष्ट है । पितरप्राण दक्षिणसंस्थ - " अपराह्न पिण्डपितृयज्ञः, चन्द्रादर्शनेऽमावास्यायाम् " ( का ० श्र ० सू ० ४। १ ।१ । ) १६८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् देवयज्ञ में गृहीत विद्रव्य का जहाँ तीन बार फलीकरण ( वितुषीकरण ) होता है, वहाँ इस पितृयज्ञ में एक बार ही फलीकरण होता है । सौर देवप्राण की गति प्राणत्- अपानत् भाव से सम्बन्ध रखती है । आगे बढ़ना प्राणत् है, पीछे हटना अपानत है, दोनों गतियों का नियमन केन्द्रबिन्दुलक्षणा स्थिति-रूपा व्याप्तगति से होता है । इस प्रकार प्राणन अपानन - व्यानन रूप से देवप्राण तीन गतिभाबों से युक्त है, जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है-" प्रायं गौः पृश्निरक्रमीदसन् मातरं पुरः पितरं च प्रयन्त्स्वः । अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानती व्यख्यन् महिषो दिवम् ॥ यजुः संहिता ३ | ६, ७ । अपि च- एति - प्रतिभावात्मिका गायत्री के सम्बन्ध से भी देवप्राण त्रिःसत्य माना गया है । इधर सौम्य पितरप्राण, जो कि ' प्र ेतभाव ' से ही युक्त है, केवल अपानन व्यापार का ही अनुगामी है । जो पितर एक बार चन्द्रलोक में चला जाता है, वह इसी प्रति - भाव से वापस नहीं लौटता । यही इस का सकृत् - भाव है । यहाँ से पराकू - चला जाना ही इन का सकृत् - व्यापार है । ऐसे सकृत् - धर्मा पितरों लिए गृहीत हविद्रव्य का ( अनुरूपता के लिए ) सकृत् ( एकबार ) ही फलीकरण अपेक्षित है । प्राची-नावती बनकर, दक्षिणसंस्थ हो कर हविग्रहण करना, एवं गृहीत हविद्रव्य का सकृत् - फलीकरण. करना प्राणपितर की ओर ही हमारा श्रद्धान करा रहा है-“ स जघनेन गार्हपत्यं - प्राचीनावीती भूत्वा दक्षिणासीन एतं गृह्णाति । सकृत् फली करोति । सकृदुह्येव पराञ्चः पितरः । तस्मात् सकृत् फलीकरोति ” । प्रदान काल में प्रदाता एक श्वास - प्रश्वास काल पर्यन्त अपना मुख ( दृष्टि ) दूसरी ओर कर लेता है । कारण स्पष्ट है । प्राणात्मक पितर मनुष्यों के लिए ' तिर इव ' है । पितरप्रारण की इसी स्वरूपरक्षा के नाते यह क्रिया विहित है । कर्म्म समाप्त्यनन्तर प्रदाता अपनी नीवी ( अधोवस्त्रबन्धन ) का स्पर्श करता हुआ ६ बार नमस्कार करता है । नीवी में पितर प्राण रहता है, अतएव नीवीबन्धन पितृदेवत्य कहलाया है । पिण्डप्राण प्रथम पॠतुरूप अन्तरिक्ष्य पितरों में प्रतिष्ठित रहता है, ऋतु-द्वारा चन्द्रलोकस्थ पितरों की तृप्ति का कारण बनता है । इसी प्राकृतिक पितृप्राण - स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति कहती है-" थ पराङ पर्यावर्त्तते । तिर इव वें पितरो मनुष्येभ्यः । तिर इवैतद् भवति अथ नीवीमुवृह्य नमस्करोति । पितृदेवत्या वै नीविः । षट् कृत्वो नमस्करोति । षड् वाऋतवः । ऋतवः पितरः । तस्मात् षट् कृत्वो नमस्करोति ” । १६६.
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श्रद्धविज्ञान इस पिण्डपितृयज्ञ की आशी: ( फल ) क्या? इस प्रश्न का समाधान करती हुई अन्त में श्रुति कहती है कि, श्रद्धासूत्रद्वारा प्रदत्त पिण्डप्राण पिता- पितामहादि के पिण्डप्राणों को तृप्त करता है, न का इस सन्तति के प्रति आनृण्य है, यही इस श्राद्धकर्म का एक फल है । श्रद्धान से तृप्त पितर उसी श्रद्धासूत्रद्वारा स्वसन्तानगत पितृपिण्डों को सबल बनाते हुए इन के गृहस्थाश्रम को सुरक्षित रखते हैं, प्रजातन्तुवितान के कारण बनते हैं । अतएव यह नित्यकर्म ' काम्यनित्यकर्म ' माना गया है-" गृहान्नः पितरो दत्त " इति । गृहाणां ह पितर ईशते । एषा उ एतस्य - श्राशीः कर्मणः । r - जिघ्रति प्रत्यवधाय पिण्डान् ( स यजमानभागः ) । अग्नौ सकृ-दाच्छिन्नान्यभ्यादधति, पुनरुल्मुकमपिसृजति " ( शत ० २ । ४ । २ ब्रा ० ) । दर्श अमावास्या ही श्राद्धकाल है, पितर सकृत हैं, तिर इव हैं, नीवीबन्धन पितृ दैवत्य है, इन सब विधानों का मूलाधार पितरप्राणस्वरूप - परिचय है, जिसे न जानने के कारण ये शास्त्रीय भ्रान्त जनों की उपहास सामग्री बने हुए हैं । निबन्ध के द्वितीय खण्ड में पितर प्राण का विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है 1 । यहाँ उक्त श्रौत - वचन समन्वय की दृष्टि से दां शब्दों में इस का सिंहा-वलोकन कर प्रकृत परिच्छेद समाप्त किया जाता है । ज्योतिर्मय इन्द्रप्रमुख त्रयस्त्रिंशत् ( ३३ ) विध प्रारण ' देव ' है । तमोमय वृत्रप्रमुख नवतीनेष ( १६ ) विध प्यारण ' असुर ' है । एवं छायामय अग्निष्वात्ताप्रमुख अष्टविध सौम्य प्राण पितर है । सौम्य पितर प्रारण सान्ध्य प्राण होने से छायाप्रधान है । यही कारण है कि, श्राद्धादि पितृकर्म निराव-रण प्रान्त में न कर सावरण प्रान्त में ही किया जाता है । पितृकर्म में उल्मुक ग्रहण भी इसी आशय से हुआ है । पितरप्राण के मार्गप्रदर्शन की भावना से ही उल्मुक विधान हुआ है । बन्धन विमोक देव-प्राण का धर्म है, हदबन्धन सुरप्राण का धर्म है, एवं श्लथ बन्धन पितृप्राण का धर्म है । नीवी-बन्धन क्योंकि श्लथबन्धन है । एकमात्र इसी आधार पर नीवी पितृदेवत्या मान ली गई है । प्राण-त्रयी के इस स्वरूप का निम्न लिखित शब्दों से स्पष्टीकरण हो जाता है-' ज्योति, छाया, तम ' ये तीन स्थान क्रमशः देवता, पितर, असुर, प्राणों की आवासभूमि हैं । सूर्य्यप्रकाश ( धूप ) में देवप्राण प्रतिष्ठित है, रात्रि के निविडान्धकार में असुरप्राण प्रतिष्ठित है । एवं प्रकाश - तम की सन्धिरूपा छाया में पितर प्राण प्रतिष्ठित है । दूसरा उदाहरण लीजिए । भूगर्भ- जहाँ घोर अन्धकार है, कुछ नहीं दिखलाई पड़ता, वहाँ असुरप्राण का साम्राज्य हैं । भूपृष्ठ पर देवप्राण का साम्राज्य है । एवं कूप - गर्त्तादि में जहाँ छायामय प्रकाश है, जिस की सत्ता से तत्रस्थ वस्तु दिखलाई पड़ती है, पितर प्रारण का साम्राज्य है । देवता सर्वथा श्रद्धा ( प्रकट ) हैं, असुर सर्वथा श्रद्धा हैं, पितर उभय-धर्मा होने से ' तिर इव ' हैं । निम्न लिखित वचन तीनों के इसी ज्योति, तम, तिर, धम्र्म्मो का समर्थन कर रहे हैं-१७८ 1