Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 241–250
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 241–250
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् देव - पितर - असुरभाव- समर्थकनिगमाः --- " अहरेव देवाः " ( शत ० २ १ । ३ । १ । ) देवाः ३ -- " अहर्देवाः सूर्य्य: ” ( शत ० १ । १ । २ । ११ ) । ( ज्योतिः ) ४ -- अहर्वे देवा अश्रयन्त " ( ऐ ० प्रा ० ४५ ), ६ -- " अमृता देवा: " १ – “ तिर इव वै पितरः " ( शत ० २ । ६ । १ । १६ ) ५ - " मृत्युर्वै तमश्छाया ” ( ऐ ० प्रा ० ७ । १२ । ) ६-- " मर्त्याः पितरः " ( शत ० २ । १ । ३ । ४। } - " नक्कमसुरान सृजत " ( ष ० प्रा ० ४ । ५ । ) २ - " रात्रीमसुरा अश्रयन्त " ( ऐ ० प्रा ० ४।५ । ) ३ - " अन्धो रात्रिः " ( तां ० ना ० ६ । १ । ७ ॥। ' असुराः ( तमः ) ४ - " तमः पाप्मा रात्रिः " ( गो ० ब्रा ० उ ० ५ । ३ । ) - " पराभूता असुरा: " ( शत ० ५ श्राद्धोपकरणों की सोमात्मकता-मृतात्मा ( महानात्मा ) १७१ प्रकाशः ( सिनीवाली ) छाया ( दर्श:) अन्धकारः ( कूहूः ) १ – “ तद्वै देवानां देवत्त्वं, यदस्मै ससृजानाय दिवेवास " ( शत ० ११।१।६।७ ) । ५- “ सं ज्योतिषा भूमेति, सं देवैरभूमेत्येवैतदाह " ( शत ० १ । ६ । ३ । १४ ) । २ - " ध इव हि पितृलोकः " ( शत ० १४ । ६ । १ । १० ) । पितरः ३- - " पितृदेवत्यो वै कूपः खातः " ( शत ० ३ । ६ । १ । १३ ) । ( छाया ) ४--- - " ह्रीका हि पितरः " ( तै ० ना ० १ । ३ । १० । ६ ) तृप्ति के लिए पुत्रादि के द्वारा पिण्डदान - ब्राह्मणभोजनादिरूप से होने वाला वैज्ञानिक कर्म्म ही श्राद्ध है । इस श्राद्धकर्म में काल, द्रव्य, मार्ग, प्राप्तिस्थान, प्राप्तिपात्र,
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श्राद्धविज्ञान आदि सभी सौम्य हैं । यही सजातीय सोमानुबन्ध इस श्राद्धकर्म की मूलप्रतिष्ठा है । चान्द्रलोकस्थ प्रेतपितर अनुयोगी हैं, भूलोकस्थ सन्ततिवर्ग प्रतियोगी है, कालादि श्रतिवाहिक है, प्रदत्त पिण्डादि स्वधान है, एवं ये चारों ही श्राद्धोपकरण सौम्य हैं । विधूर्ध्वभागस्थ पितर सौम्य हैं, इन पितरों में प्रति-ष्ठित आत्मघेयरूप पितृपिण्ड सौम्य हैं, जिस ( शरदऋतु में ) ये प्रतिष्ठित हैं, वह ऋतु सौम्या है । इस प्रकार पितर - पितृपिण्ड ( आत्मधेयपिण्ड ), ऋतु, तीनों अनुयोगी सौम्य हैं । पिता के २१ तन्य सौम्य -पिण्डों को ऋण लेकर उत्पन्न होने वाली अपत्य ( संतान ) सौम्य है, इसका अन्नमय मन सौम्य है, मन में प्रतिष्ठित श्रद्धास सौम्य है । इस प्रकार अपत्य, तन्मन, तच्छ्रद्धा, तीनों प्रतियोगी भी सौम्य हैं । वरुण जलातिशय में उत्पन्न चावलों का पिण्ड सौम्य है, अन्नपिएडगत वह प्रारणात्मक रस, वायु से उद्घृत होकर चान्द्रनाड़ी के द्वारा चन्द्रलोक में पहुँच कर श्रद्धानुगत प्रेतपितरों की तृप्ति का कारण बनता है, सौम्य है । इस दृष्टि से अक्षत, तत्पिण्ड, पिण्डरस, तीनों स्वधान्नसम्पत्तियाँ भी सौम्य ही हैं । सूर्येन्दुसङ्गमरूपा दर्शात्मिका अमावास्या ( पार्थिव अधोभागात्मक चान्द्ररसदृष्ट्या ) सौम्या है, चन्द्रमां से पृथिवी पर्यन्त व्याप्त चान्द्ररश्मियाँ सौम्या हैं । भूपृष्ट से सूर्य्यपर्य्यन्त एति - प्रति भावरूपेण व्याप्त . गायत्रीछन्द द्वारा चान्द्रलोकस्थ पितृसहों में, ' एति ' व्यापार से, चान्द्रपितृसहों से आरम्भ कर सन्तति-महानात्मा के तन्य सहों में ' प्रेति ' व्यापार से व्याप्त चान्द्ररश्मियाँ सौम्य हैं । इस प्रकार अमातिथि, चान्द्ररश्मि, सहांस्यनुगता चान्द्ररश्मि, तीनों की समष्टिरूप तिवाहिक सम्पत्ति भी सौम्या है । फलतः प्रतियोगितः, अनुयोगितः, श्रतिवाहिकतः, निवापतः, चारों दृष्टियों से श्राद्धोपकरण सौम्य बन रहे हैं । १ १ -- अपत्यसन्तानः सौम्यः २ - तस्येदं मनः सौम्यम् ३- मनोऽनुगता श्रद्धा सौम्या - - इति - प्रतियोगितः सौम्यभावाः । ६ १ तण्डुलानि सौम्यानि २ २ --- पिण्डा: सौम्याः ३ -- चन्द्ररश्मिगतोऽन्नरसः सौम्यः १ --- पितरः सौम्या: - इति - निवापतः सौम्यभावाः । ३ २ - आत्मधेयपिण्डाः सौम्याः ३ - ऋतुः सौम्या १७२ - इति - अनुयोगितः सौम्यभावाः ।
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१ - दर्शतिथिः सौम्या ऋणमोचनोपायोपनिषत् ४ २ - चान्द्ररश्मयः सौम्याः ३ - सहोऽनुगता रश्मयः सौम्याः प्रेतात्मतृप्तिवतक श्राद्धकर्म-: - इति श्रतिवाहिकतः सौम्यभावाः जिस प्रकार आङ्गिरस आग्नेय भावों का तेजोमयी मानसी श्रद्धा के द्वारा आदान होता है, एवमेव इन चारों भार्गव सौम्य भावों का स्नेहमयी मानसी श्रद्धा के द्वारा पितरों में प्रदान हो जाता है । विद्या-मिका वंशदीक्षा से दीक्षित सच्छिष्य मनोगर्भिता बुद्धिदृष्टि से आग्नेय है, इस की मनोगर्भिता बुद्धि आग्नेयी है, मनोगर्भिता बुद्धि में प्रतिष्ठित तेजोमयी श्रद्धा आग्नेयी है । तीनों की समष्टि प्रतियोगिनी आग्नेयी सम्पत् है । त्रयीविद्याराशि आग्नेयी है, तदभिन्न वेदशास्त्र आग्नेय है, वेदशास्त्राधारेण उत्पन्न संस्कार आग्नेय है । तीनों की समष्टि निवापत: आग्नेयी सम्पद् है । शुक्ल द्वितीया तिथि श्रग्नेयी है, गुरु से शिष्य पर्य्यन्त - शिष्य से गुरूपर्य्यन्त व्याप्त बुद्धिसूत्र आग्नेय है, गुरु की तेजोमयी आग्नेयी गायत्री से सम्बद्ध बुद्धिरश्मियाँ आग्नेयी हैं । तीनों की समष्टि अतिवाहिकतः श्राग्नेयी सम्पत् है । प्रवृद्ध विज्ञानदृष्ट्या गुरू आग्नेय है, गुरुगत विद्यात्मक संस्कार आग्नेय है, वेदाध्ययानुकूला पूर्वाह्नकालो-पलक्षिता ऋतु आयी है । तीनों की समष्टि अनुयोगित: आग्नेयी सम्पत् है । इन चारों आग्नेय परिग्रहों के प्रचय से मनोयोगद्वारा गुरुप्रदत्ता विद्या का जिस प्रकार शिष्य में प्रधान हो जाता है, तथैव पूर्वोक्त चारों सौम्य भावों के प्रचय से निप्पन्न सोमतत्त्व पुत्र के श्रद्धामय मनोयोग से अवश्य ही प्रेतात्मतृप्ति का कारण बन जाता है । श्राद्धकर्मभेदमीमांसा -यह श्राद्धकर्म पार्वण, एकोद्दिष्ट, महालय, आदि भेद से विविध श्रेणियों में विभक्त है । प्रतिमास की पर्वात्मका अमावास्या तिथि के अपराह्नकाल में पिता- पितामह प्रपितामह की तृप्ति के लिए होने वाला पर्वात्मक मासिक श्राद्ध ' पार्वणश्राद्ध ' है + । प्रतपितर की निधन वार्षिक तिथि को होने वाला श्राद्ध'एकोद्दिष्ट श्राद्ध ' है, जिसे कि वृद्धिनिमित्तकश्राद्ध भी कहा गया है । महानात्मरूप सौम्य + " अमावस्यां यत् क्रियते तत् पार्वणमुदाहृतम् । क्रियते पर्वणि वायचं - पार्वणमुदाहृतम् || ". - भविष्यपुराण * पूर्वाह्न मातृकं श्राद्धमपराह्न तु पैतृकम् ( पार्वणम् ) । एकोद्दिष्टं तु मध्याह्न प्रावृ द्विनिमित्तकम् ( काम्यमिदम् ) || " - ब्रह्मपुराण १७३
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श्राद्धविज्ञान पितरों की आवासभूमिरूप चान्द्रमण्डल ही ' महालय ' ( महानात्मरूप पितरों का आलयस्थान ) है | सौर आश्विनीयकृष्णपक्ष में ( गजच्छायानुगत कालात्मक इन १५ दिवसों में ) महालयस्थ सौम्यपतर amar रूप से तत्तद्वंशधरों के श्रद्धात्मक मन में ( चन्द्रश्रद्धानाड़ी के द्वारा ) प्रतिष्ठित हो जाते हैं । इस गजच्छाया से सम्बन्ध रखने वाला कन्यागत महालय श्राद्धपक्षीय श्राद्ध ' महालय श्राद्ध है । वर्ष में १५ दिन के लिए चन्द्रलोकस्थ पितरप्रारण गजच्छाया के द्वारा स्वस्वरूप से दीए रहते हैं । इस पक्ष में इन के लिए अवश्यमेव श्राद्धानुगमन अपेक्षित है । पञ्चाङ्ग लिस्वरूप हस्त नक्षत्र से भिन्न एक बाहू के आकार का पञ्च नक्षत्रात्मक हस्त नक्षत्र ओर है । इस का आकार हाथी की सूंड जैसा है । इसीलिए यह ' ' राज ' भी कहलाया है । भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी से इस गजच्छायायोग का आरम्भ माना गया है ÷ । इसी योग में श्रद्धासूत्र के मूलप्रभव ' श्रतु ' तत्त्व का पूर्ण रूप से हमारे मनोराज्य में प्रधान होता है । कैसे?, और क्यों?, के समाधान के लिए निम्न लिखित प्राप्त प्रमाण ही शरणीकरणीय है -" सविता वा कामयत- ' तू ' मे देवा दधीरन् सविता स्याम् ' इति । स एतं सवित्रे हस्ताय पुरोडाशं द्वादशकपालं निरवक्त्याशनां ब्रीहीणाम् । ततो वै तस्मै ' ' देवत, सविताऽभवत् । ' श्रत् ' ह वा अस्मै मनुभ्या दधते, सविता समानानां भवति य एतेन हविषा यजते " । श्राद्धकर्मानुगता - कालमीमांसा-जिस दिन से उक्त गजच्छाया - लक्षण योग आरम्भ होता है, उस दिन से पितर प्राण ( सौम्यप्राण ) • भूमण्डल की ओर आने लगता है 1 । कार्त्तिक कृष्ण अमावास्या को ये पितर पराङमुख होते हैं । इस x. “ येयं दीपान्विता राजन्! ख्याता पञ्चदशी भुवि । तस्यां दद्यान्नचेद्दत्तं पितॄणां वै महालये ॥ ” - भविष्यपुराण “ देन्दुः पितृदैवत्ये हंसश्चैव करे स्थितः । याम्या तिथिर्भवेत् सा हि गजच्छाया प्रकीर्त्तिता ।
कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां मघास्त्रिन्दुः करे रविः ।
यदा, तदा गजच्छाया श्राद्धे पुण्यैरवाप्यते ॥
योगो मघात्रयोदश्यां कुञ्जरच्छायसंज्ञितः ।
भवेन्मधायां संस्थे च शशिन्यर्के करे स्थितः ॥
अमावास्यां गते सोमे छाया या प्राङमुखी भवेत् । गजच्छाया तु सा प्रोक्ता तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत् ॥ " १७४ - संग्रहः
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ऋणमोचनोपायोपनिपत् सौम्य विद्युत के विकास से पूरे आश्विनमास में, विशेषतः गजच्छाया - भोगकाल में चाकाशचरित्र द्रव्य होता है । सर्वत्र उल्का, नक्षत्रादि पात के दृश्य अतिशय रूप से उपलब्ध होते हैं । इन्ही सब प्राकृतिक पितृ - स्थितियों के आधार पर इस कन्याराशिगत महालय श्राद्ध का विधान हुआ है । मरणानन्तर होने वाले षोडश श्राद्ध, प्रतिमास में होने वाला पार्वणश्राद्ध, निधनतिथि को होने वाला तयाहश्राद्ध, महालयश्राद्धपक्ष में होने वाला एकोदिषु श्राद्ध 9 आदि सब श्राद्ध कर्मों का एकमात्र तात्पर्य है - मरणानन्तर चन्द्रलोक में जाते हुए प्रेतात्मा के महत् पिण्ड में वलाधान करते हुए उसे सुखपूर्वक गमनानुगत बनाना, एवं चन्द्रलोक में पहुँचे हुए तत्तन् तिथि -समय - विशेषों में क्षीणपिण्ड बने हुए महत् पिण्ड को तृप्त करते रहना । फल है - पितृतृप्ति, गोत्रवृद्धि, जैसा कि प्रकरणोपसंहार में स्पष्ट होने वाला है । यही ' श्राद्ध ' नामक तीसरा श्रानृण्य कर्म है, जिस के आधार पर प्रथम द्वितीय नृण्यकर्म प्रतिष्ठित हैं । गजच्छायोपलक्षित हस्तनक्षत्रवत मघा - पूर्वफल्गुनी - उत्तरफल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, इन - ६ नक्षत्रों के साथ भी पितर प्राण का घनिष्ठ सम्बन्ध माना गया है । इन में भी मघानक्षत्र पितर प्राण का प्रधान प्रवर्त्त के माना गया है । इन सब परोक्ष विषयों के लिए ऋषिक्षिणा श्रुति ही हमारे लिए अन्य प्रमाणानपेक्ष स्वतः प्रमाण हैं । महर्षि तित्तिरि कहते हैं -१ - उपहूताः पितरो ये मघासु मनोजवसः सुकृतः सुकृत्याः । ते नो नक्षत्रे हवमागमिष्ठाः स्वधाभिर्यज्ञं प्रयतं जुषन्ताम् ॥
२-. ये अग्निदग्धा येनग्निदग्धा येऽमुं लोकं पितरः क्षियन्ति ।
यांश्च विद्म याँ उं च न प्रविद्म मघासु यज्ञं सुकृतं जुषन्ताम् ॥
३ - पितरो वा अकामयन्त - पितृलोके ऋध्नुयामेति । त एतं पितृभ्यो मघाभ्यः पुरोडाशं पटकपालं निरवपत् ॥ - तैत्तिरीयत्राह्मण सर्वान्त में -श्राद्धकर्म्म, और ब्राह्मणभोजन-कुछ एक ऐसे कुतर्क शेष रह जाते हैं, जिनका समाधान करना सर्वथा अप्राकृत है । क्यों कि — जिन की ओर से इस वैज्ञानिक - वेदशास्त्रसिद्ध - श्राद्धकर्म के प्रति जैसे कुतर्क उपस्थित होते हैं, उन व्यक्तियों का, तथा उनके कुतर्कों का लोक- वेदोभयदृष्टि से उभयथा कुछ भी महत्त्व नहीं है । हमें तो आश्चर्य केवल यह देख - सुन कर होता है कि, अतीन्द्रियप्राणविद्या का आविष्कार करने वाले इस देश का ऐसा बौद्धिक - पतन कैसे, और क्यों होगया । जिस देशने पिण्ड में ब्रह्माण्ड के दर्शन किए, जिस देशने विश्वातीत परात्पर जैसे असीम तत्त्व का स्पर्श कर डाला, जिस देशने प्राण - समन्वयमूला यज्ञ--- १७५
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श्राद्धविज्ञान विद्या के आधार पर ' ब्रह्मविद्यया ह वै सर्वं भविष्यन्तो मन्यन्ते ' यह उद्घोष किया, उसी - देश की, उसी ऋषिसन्तति की कृपा से आज उसी देश का तत्त्ववाद इस प्रकार उपहासास्पद बन जायगा, यह कौन जानता था । महाआश्चर्य उस वेदनिष्ठा पर महा आश्चर्य उन वेदभक्तों की निष्ठा पर जो वेदतत्त्ववाद से संस्पृष्ट रहते हुए भी एकहेलया वैदिक कम्मों को अवैदिक कह कर प्रायश्चित्त के भागी रहे हैं । वेदवित् शरीर में सर्वदेवमूर्त्ति सान्तपन अनि प्रतिष्ठित रहता है । जिस प्रकार -आहवनीयकुण्डसमिद्ध अनि सामिधेनी - मन्त्रप्रभाव से अलौकिक बनता हुआ द्युलोक में हव्यवाहन करने में समर्थ है, एवमेव ब्राह्मण का अभि भी इस कर्म में पूर्ण समर्थ है । पुत्रद्वारा श्रद्धा दत्त स्वधान्न ब्राह्मण के द्वारा पितृतृप्ति का अवश्यमेव कारण बनता है, इस अलौकिक रहस्य को किसी भी कुतर्क से वृत नहीं किया जासकता, जबकि साक्षात् वेदमन्त्र इस का समर्थन कर रहे हैं । देखिए १ - " इममोदनं निदधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्ग्यम् । २-स मे मा क्षेष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा मे अस्तु || " ( अथर्वसं ० ४ | ३४ | ८ | ) | - " न ब्राह्मणो हिंसितव्योऽग्निः प्रियतनोखि । सोमो स्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः ॥ ” ( अथर्व ५।१८।६ । ) । ३ – “ इदं मे ज्योतिरमृतं हिरण्यं पक्वं क्षेत्रात् कामदुघा म एषा । इदं धनं निदधे ब्राह्मणेषु कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः ॥ " ( अथर्व ११ १ २ । ) । ४ - " ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्वा सर्वांल्लोकान्संमुश्नुते । ऋतं ह्यस्यमार्पितमपि ब्रह्माथ तपः ॥ ” ( अथर्व १० । १० । ३३ । ) । श्वान, काक, आदि भी श्राद्धकर्म में बलि के पात्र बनते हैं । परलोक जाते हुए पितर प्राण पर याम्यश्याव - शबल नामक श्वा - प्रारणों का आक्रमण होता है । इन्हीं प्राणों की श्वानप्राणी में प्रधानता है । इस भूतात्मक श्वानतृप्ति से वह प्रारणात्मक श्वान तृप्त होता हुआ पितर के लिए अहिं-सक बन जाता है, जैसा कि निम्न लिखित श्रौतस्मार्त्त प्रमारणों से प्रमाणित है । १ - प्रतिद्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा । अधा पितृन्त्सुविदत्राँ अपीहि यमेन ये सधमादं मदन्ति । २ - यौ ते श्वानौ यमरक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदी नृचक्षसा । 3 ताभ्यां राजन् परिघेानं स्वस्त्यस्मा अनमीवं च धे हि । ( अथर्व १८ । २ । ११ । १२ ) । १७६ 1
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ३. - श्यामश्च त्वा ना शबलश्च प्रषितौ यमस्य यो पथिरक्षी श्वानौ । र्वाहि मा विदीयो मात्र तिष्ठः पराङ मनाः ॥ ( अथर्व ८। १ । १ ) । ४ - द्वौ श्वानौ श्याव - शबलौ नैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्यामन्न ं प्रयच्छामि स्यातावेतावहिंसकौ ॥ ( स्मृतिः ) पितृपिण्डमूर्त्ति चान्द्रसोमात्मक महानात्मा, सौम्य पितरप्राण, सौम्या श्रद्धा, सोममय स्वधा अन्न, इत्यादि सम्पत्तियों का स्वयं वेद में बड़े आटोप के साथ प्रतिपादन हुआ है । प्रमाणनिष्ठा के नाते उनमें से कुछ एक वचन यहाँ भी उद्धृत कर देना अप्रासङ्गिक न होगा । महानू - १ - स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः । धियो वाजाय हिन् तु " ( ऋक् संहिता १ । २७ । ११। ) । " क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातृर्जनयत् स्वधाभिः । aari स्थान् महान् कविर्निश्चरति स्वधावान् - ऋकसं ० १ । ६।५।४ ३ – “ नि वेवेति पलितों दूत स्वन्तर्महाँश्चरति रोचनेन । वपू ंषि बिभ्रदभिनो विचष्टे महदेवानामसुरत्वमेकम् ॥ ” ( ऋक्सं ० ३ । ५५ । ६ ) ४ -- “ पवमान स्वविंदो जायमानोऽभवो महान् । इन्द्रो विश्वाँ अभीदसि " ( ऋक्सं ० ६ । ५६ । ४ । ) । ५ - " महाँ असि सोम ज्येष्ट उग्राणामिन्द ओजिष्ठः । युध्वा सञ्चवज्जिगेथ " ( ऋक्सं ० । ६६ १६ ) ।
६ - " भद्रा वस्त्रा समन्यावसानो महान् कविर्निवचनानि शंसन् ।
or area चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ ॥ 19
( ऋक्सं ० ६।६७।२ । ) । - " पवस्त्र सोम महान् समुद्रः पिता । देवानां विश्वामि धाम " ( ऋकू सं ० १ । १०६ । ४ । ) । - " तद्वै स प्राणोऽभवत्- महान् भूत्वा प्रजापतिः । भुजो भुजिष्या वित्वा यत् प्राणान् प्राणयत् पुरि " ॥ ( शतः ७-५-१-२१ ) । x १७७
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श्राद्धविज्ञान : - १ - " स्वधया परिहिता, श्रद्धया पयूढा, दीक्षया गुप्ता, प्रतिष्ठिता, लोको निधनम् " ( अथर्व १२ । ५ । ३ ) । २ – “ चन्द्रमाः - नक्षत्राणि - पितरः - एतन्निवनम् " ( जै ० उ ० ब्र ० १ । १६ । २ । ) ३ – “ प्रजापतिर्निधनम्पितृभ्यः प्रायच्छत् " ( जै ० उ ० उ ० १ । १३ । २ ) ४ - " अमावास्या निधनम् " ( वाः ३ । १ । ) । ५ – “ सा उदक्रामत् सा पितॄनागच्छत्, तां पितरोऽनत सा मासि समभवत् । तस्मात् पितृभ्यो मास्युपमास्त्रं ददति । पितृवाणंपन्यां जानाति य एवं वेद " ( अथर्व = । ३ । ४ ) । - " उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः, पितरः सोम्यासः । ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु - " ये चेह पितरो ये च नेह यांश्च विद्म याँ उ च प्रविद्म । ऋक् २ १०।१५ १। ) । त्वं वेत्थ पति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं वस्त्र | | ( ऋक् ० सं ० १० | १५ | १३ ) । " ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते । तेभिः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्त्रं कल्पयस्त्र " ॥ ( ऋक्सं ० १० | १५ | १४ | ) | ६ - " ग्रासीनो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाक्षुषे मर्त्याय । पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्त्रः प्र यच्छत त इहोर्ज दधात || ( ऋक्सं ० २० | १५ | ७ | )! १०- " यो अग्निः क्रव्यवाहनः पितॄन् यक्षदृतावृधः । प्रेदु हव्यानि वोचति देवेभ्यश्च पितृभ्य आ " ॥ ( ऋक्सं ० १०।१६।११ । ) । ११ - " धत पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषोऽसत् " ( यजुः सं ० २।३३।७ । १२ - " नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय, नमो वः पितरो Satara, नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो घोराय । नमो-वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः, पितरो नमो वः । गृहान्नः पितरो दत्त तो वः पितरो देष्मैतद्रः पितरो वास आधत " ( यजुः सं ० २ । ३२ । ) । X १७८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् त एते - पितृनिगमा भवन्ति, पितृप्राणस्वरूपपरिचायकाः--१ – “ मनुष्या वै जागरितं पितरः सुप्तम् " ( शत ० १२।६।२।२ । ) । २ - " तत्तमसः पितृलोकादादित्यं ज्योतिभ्यायन्ति " ( शतः १३८ २७ ] ) । ३ – “ तिर इव वै पितरो मनुध्येभ्यः " ( शत ० २२२२२२२११ ) । ४ - " अन्तर्हितो हि पितृलोको, मनुष्यलोकात् " ( तैः वाः ११६२८ । ६ । ) । ५ - इव हि पितृलोकः " ( शतः १४।६।२।१६ । ) । ६ - " पितृणां वा एषा दिक, यत् - दक्षिणा " ( प ० वा ० ३।१ । ) । ७ -- “ दक्षिणसंस्थो वै पितृयज्ञ: " ( कौ ० बाः ५/७ ) । - " अथ यत्र दक्षिणावर्त्तते, पितृषु तर्हि भवति, पितृस्ता भिगोपायति ” ( शत ०२ - " मासि पितृभ्यः क्रियते " ( तै ० ना ० ११४ । ६ । १ । ) । १० - " तृतीये वा इतो लोके पितरः " ( तै ० ब्रा ० १४३ | १० | ५ | ) | ११ - " इन्दव व हि पितरः, मन इव " ( ता ० वा ० ६।६।१६–२० । ) । १२ - " ओषधिलोको वै पितरः " ( शत ० १३८ | १ | १० | ) । १३ - “ शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पितरः " ( शतः २२ ९ । ३ । १ । ) । १४ - " क्षत्रं वै यमः, विशः पितरः " ( शत ० ७ । १ । १ । ४ । ) । १५ - " अन्त भाजो वै पितरः " ( कौ ० प्रा ० १६ = । ) । १६ - " पितणां मघाः " ( तै ० १७ - " गृहाणां पितर ईशते " ० १५ १२ ) । ( शत ० २।४ । २२४ ) । १८ - " हरणभागा हि पितरः " ( तै ० प्रा ० १ । ३ । १० । ७ ) । १६ - " एतद्ध वै पितरो मनुष्यलोके आभक्ता भवन्ति, यदेषां प्रजा भवति "
( शत ० १३ । ८ । १ । ६ ) ।
२०- “ यत् पीतच्त्वं, तत् पितृणाम् " ( ष ० ब्रा ० ४ । १ ॥
२१ - " स्वधा वै पितॄणामंन्त्रम् " ( तै ० ना ० २ । ६ । ६ ५ 1 ) ): २२ - " पितरो नमस्या: " ( शत ० १ । ५ । २ । ३। ) । X १७६
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श्राद्धविज्ञान : " ( अथर्व ० १०/७/११. ) निष्कर्षतः - १ - " ऋतं च यत्र श्रद्धा चापो ब्रह्म समाहिता अथर्व ४।३४।७ ) * २ - “ शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः ” ( ३– “ यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा । १. गा ” ( अथर्व ५ । ७ । ५1 ) - इत्यादि मन्त्र श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्र बभ्रुर -वर्णन के अनुसार ऋत - श्रद्धा - आपोमय परमेष्ठीब्रह्म से सम्बद्ध । १ - " सरस्वति या सरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिदेवि पितृभिर्मदन्ती || ( अथर्व १८ । १ । ४३ ) । सहस्रार्धमिडो भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि सामात्मक चेन्द्रमा के ऊर्ध्व भाग में प्रतिष्ठित के अनुसार पारमेष्ठिनी सरस्वती वाकू से युक्त निधन पितरों को श्रद्धासूत्रद्वारा-च विष्णोः । १ - " हं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं: " ( अथर्व १८ । १ । ४५ ) । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठा है । मनोमयी भार्गव श्रद्धा हो क्योंकि इस कर्म्म ' अनुसार पिण्डसोम से तृप्त करना ही श्राद्धकर्म हुआ है । श्रद्धातत्त्व की कर्म श्रद्धा ' ' नाम से व्यवहृत की मूलप्रतिष्ठा है, अतएव यह तृतीय आनृत्य आचार्यों ने कहा है-इस मूलाधारता का विश्लेषण करते हुए स्मार्त्त १- श्राद्धे श्रद्धा यतो मूलं तेन श्राद्धं प्रकीर्त्तितम् । ) । तस्मिन् प्रक्रियमाणे तु न किञ्चिद् व्यर्थतां व्रजेत् ॥ ( नागरखण्डे २ - देशे काले च पात्रे च विधिना हविषा च यत् । ) तिलैर्दर्भैश्च मन्त्रश्च श्राद्ध स्यात् श्रद्धयान्वितम् ॥ ( बृहस्पतिः ३ - यात विधिवत् सम्यक् श्रद्धासमन्वितः । तत्पितणाञ्च भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ ( मनुः )
४ - श्रद्धा पवित्रं सर्वेषां पवित्राणां प्रकीर्त्तितमः ।
श्रद्ध धर्म परमं पावनञ्चैव सर्वदा ॥
| ३ | ) । * " देवाः पितरः, पितरो देवाः " ( ० ६ ११२३ १५०