Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 251–260
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 251–260
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ऋणमोचनीपायोपनिषत ५ - श्रद्धाभूतानि भूतानि पवित्राणि सदैव तु ॥ श्रद्धा तु माता भूतानां श्रद्धा श्राद्धेषु शष्यते || ( नन्दिपुराणम् ) ६ - विधिहीनममृष्टान्न मन्त्रहीनमदक्षिणम् । अश्रद्धया हुतं दत्त ं तद्व ' रक्षांसि भुञ्जते ॥ ( यमः ) ७- या बोध्यते बुद्धिः श्रद्धया शोध्यते मनः । श्रद्धा प्राप्यते ब्रह्म श्रद्धा पापविमोचनी । तस्माद श्रद्दधानस्य हविर्नाश्नन्ति देवताः || ( बौधायनः )
८ - श्रद्धान्वितेन मनसा यद्यत् किञ्चित् समाचरेत् ।
तचद् बहुफलं तस्य जायते लोकोद्वयोः ॥
६- श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।
देवद्वारा देवाः कथिता देवभाजिनः ॥ 4
१० - पितृश्रद्धाश्च पितरो दैत्यश्रद्धा दितेः सुताः ।
पाप श्रद्धास्तथा पापा विज्ञेया नरकङ्गमाः ॥
११ - तस्माच्छ्रद्धां समास्थाय ध धम्म समाचरेत् । पुण्यं बहुफलं तस्य श्रद्धामास्थाय यत् कृतम् || ( विष्णुधर्मोत्तर ) १२ - प्र ेतान् पितॄंश्च निर्द्दिश्य भोज्यं यत् प्रियमात्मनः । श्रद्धया दीयते यत्र तच्छ्राद्धं परिकल्पितम् ॥ ( श्राद्धकल्प ) १३- संस्कृतं व्यञ्जनाढ्य च पयोदधिघृतान्वितम् । श्रद्धया दीयते यस्मात् - श्राद्धं तेन निगद्यते ॥ ( बृहस्पतिः ) । इति - श्राद्धकर्म्मात्मकं तृतीयमानृएयं कर्म -३-X १८१
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श्राद्धविज्ञान ४ - श्रथ गया श्राद्धात्मकं चतुर्थ मानृण्यं कर्म-गया श्राद्धानुगत नृण्यविज्ञानोपक्रम -प्रजोत्पादन कर्म से स्वमहानात्मानुगत ५६ पितृऋणकलाओं की ३५ कलाओं से आनृण्य प्राप्त हुआ, सपिएडीकरण से शेष २१ कलाओं से आनृण्य प्राप्त हुआ, एवं पार्वणादि श्राद्धों से क्षीणपिण्ड-तृप्ति द्वारा आय प्राप्त हुआ । इस प्रकार चान्द्रलोकस्थ महानात्मा का जो ऋरण पुत्रादि पर था, इन तीन कर्मों से पुत्रादि सर्वथा अनृणी बन गए । अतएव प्रश्न होना स्वाभाविक है कि, स्थानविशेष ( गया - गयाजी ) में जा कर पितृपक्ष में, अथवा तो उपलब्ध अन्य अनुकूल मुहूर्त्त में जो ' गयाश्राद्ध ' नामक एक कर्म्मविशेष धर्म्मशास्त्रों में विहित है, उस का किस आत्ममुक्ति से सम्बन्ध है?, प्रकृत परिच्छेद इस प्रश्नसमाधि के लिए ही प्रयुक्त हुआ है । astri का यथास्थान विलयन -स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा, पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा, सौर विज्ञानात्मा, चान्द्र महानात्मा, पार्थिव भूतात्मा, इन्द्रियवर्ग, आदि की समष्टि ही ' अध्यात्मम् ' है । ' तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति - ( गच्छति ) सम्परिष्वक्तः ( भूतसूक्ष्मेभ्यः ) प्रश्ननिरूपणाभ्याम् " ( व्याससू ० ३ | १ | १ | ) के अनुसार भूतसूक्ष्मों से अङ गुष्ठ-मात्र वाहिक शरीर धारण कर पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर से जब भूतात्मा उत्क्रान्त होता है, तो अव्य-दि कलाएँ स्व - स्वप्रभव स्थानों में लीन हो जातीं हैं । अव्यक्तांश स्वयम्भू में अपीत हो जाता है, यज्ञांश परमेष्ठी में विलीन हो जाता है, विज्ञानात्मा परज्योति ( सूर्य्यज्योति 1 में उपसङ्गत हो जाता है, महानात्मा पूर्वकथनानुसार क्रम से चन्द्रोर्ध्वभाग में चला जाता है, वागिन्द्रिय त्रिवत्स्तोमावच्छिन्न पार्थिव अग्नि में, प्राणेन्द्रिय ( घ्राणेन्द्रिय ) पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न अन्तरिक्ष्य वायु में, चक्षुरिन्द्रिय एकविंशस्तोमावच्छिन्न दिव्य आदित्य में, संकल्पविकल्पात्मक भाव सोमात्मक इन्द्रियमन त्रिराव-स्तोमावच्छिन्न भास्वर सोमात्मक चान्द्रतेज में, श्रोत्रेन्द्रिय त्रयस्त्रिंशस्तोमावच्छिन्न दिक्सोम में अपीत हो जाते हैं | वायव्य हंसात्मा ( जो कि दन्तोत्पत्ति - सहकाल में छाया पुरुषरूप से शरीर में प्रविष्ठु होता है ) अपने वायुधरातल में चला जाता है । रह जाता है एकाकी भूतात्मा, जिसे कर्मभोगार्थ लोकान्तर शुभ - शुभकर्मभोग के लिए चला जाना है, जैसा कि आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । कर्म्मभोक्ता, किंवा शुभाशुभफलभोक्ता भूतात्मा की इसी अवस्था का स्पष्टीकरण करती हुई बृहदारण्यक श्रुर्ति कहती है-“ यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्य - अग्नि ( प्रति ) वागप्येति, वातं प्राणः, चक्षुरादित्यं मनचन्द्र ', दिशः श्रोत्रं, पृथिवीं शरीरं, आकाशमात्मा ( श्रव्यक्तात्मा ), ओषधीर्लोमानि वनस्पतीन् केशाः, अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते । क्वायं तदा पुरुषो भवति " १, इति । हर सोम्य १८२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् हस्तं, भागाऽऽवामेवैतस्य वेदिष्यावो न नावेतत् सजन इति । तौ होत्क्रम्य मन्त्रयाञ्चक्राते । तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुः । यत् प्रशशंसतुः, -कर्म हैव तत् प्रशशंसतुः - पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा -भवति, पापः पापेन - इति । ततो ह जारत्कारव- उपरराम " । [ -भाग - बृहदारण्यकोपनिषत् ३।२।१३ । इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, ' ये वै के चास्माल्लोकात् प्रयन्ति, चन्द्र-ममेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ( कौ ० ब्रा उप ० ११२ ) के अनुसार चन्द्रलोक में जाते हुए सौम्य सहोमूर्त्ति महानात्मा के साथ एक बार कम्र्मात्मा को भी अवश्य ही चन्द्रलोक में जाना पड़ता है, चाहे वह पुण्यातिशय से युक्त हो, अथवा तो पापातिशय से । दोनों के चन्द्रलोक में ( १३ मांसात्मक एक चान्द्र-सम्वत्सरकाल में ) पहुँचने के अनन्तर महानात्मा तो चन्द्रमा में ही रह जाता है, एवं प्रतिवाहिक शरीरावच्छिन्न कर्मात्मा स्वकम्र्मानुसार उत्तर - दक्षिण, दोनों अयनों में से किसी एक मार्ग ' का ( कर्म-भोग के लिए ) आश्रय ले लेता है । चन्द्रमा ही कर्म्मगति का विभाजक बनता है, अतएव इसे ' द्वार ' कहना अर्थ बनता है । - ' गया ' प्राणस्वरूपविज्ञान-' सङ्गोऽयं पुरुषः, न सज्जते, न व्यथते, न रिष्यति ' के अनुसार सौर विज्ञ सर्वथा असङ्ग है | मानसग्रन्थिविमोक के अव्यवहितोत्तरक्षण में यह एक निमेषमात्र में सौरविज्ञानघन में विलीन हो जाता है । इसके सम्बन्ध में प्रेतात्मा के पुत्रादि के लिए कोई कर्त्तव्यकर्म शेष नहीं रह जाता । चन्द्रलोकस्थ महानात्मा से आनृण्य प्राप्त करने के लिए, तथा उसे बन्धन विमुक्त करने के लिए प्रजोत्पादन - सपिण्डीकरण, तथा श्राद्ध करना पड़ता है । इस कर्म्मत्रयी से चान्द्र महानात्मा मुक्त हो जाता है । अब शेष रह जाता है - कर्मभोक्ता कम्र्मात्मा, जिसे कर्म्मभोग - सामर्थ्य के लिए कुछ एक नवीन साधन जुटाने पड़ते हैं । भोगायतन, भोगसाधन, आदि के बिना भोक्तात्मा कर्मभोग में सर्वथा असमर्थ है । शरीर .भोगायतन है । स्थूलशरीररूप भोगायतन - ' पृथिवीं शरीरम् ' - ' भस्मान्तं शरीरम् ' इत्यादि के अनुसार यहीं भस्मीभूत हो जाता है । इस क्षतिपूर्ति के लिए इसे पूर्व भूतसूक्ष्मों से अपूर्व प्र ेतशरीर धारण करना पड़ता है, जोकि भूतसूक्ष्मात्मक प्र ेतशरीर - ' आतिवाहिकशरीर ' नाम से भी व्यवहृत हुआ है । इन्द्रियवर्ग, प्रज्ञान ( इन्द्रियसञ्चालक मन ), विज्ञान ( प्रज्ञानसञ्चालिका बुद्धि ), ये भोगसाधन हैं । महा-नात्मा चित् - प्रतिष्ठारूप होने से कम्र्मात्मा की प्रतिष्ठा है । इस प्रकार जब तक शरीर, इन्द्रियवर्ग, मन, बुद्धि, महान, इन पाँचों सम्पत्तियों का वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञमूर्त्ति कर्मात्मा को सहयोग प्राप्त नहीं हो १८३
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श्राद्धविज्ञान जाता, तब तक यह भोग करने में सर्वथा असमर्थ है । उधर पूर्वोक्त बृहदारण्यकश्रुति के अनुसार स्थूल-शरीर के निधन के साथ साथ ही ये सम्पूर्ण साधन स्व - स्वप्रभवों में विलीन हो जाते हैं । इसे भोगानुगत बनाने के लिए ही अपूर्व भूतसूक्ष्मरूप सूक्ष्मशरीर का, अपूर्व सौरतेजो द्वारा विज्ञान ( क्षेत्रज्ञ - बुद्धि ) का, अपूर्व चान्द्र सोमद्वारा प्रज्ञान का, एवं चान्द्र पितृसोमद्वारा अपूर्व महान् का, इन्द्रिय भागों का आगमन और होता है । इस प्रकार आगन्तुक महान, क्षेत्रज्ञ, मन, इन्द्रिय, शरीर, इन पाँचों से युक्त हो कर ही यह भूतात्मा भोक्तात्मा रूप में परिणत होता है । भूतसम्पृक्त महान् -क्षेत्रज्ञ दोनों इसे व्याप्त कर लेते हैं । आत्मा की प्राज्ञकला के आकर्षण से प्रज्ञानमन, तथा इन्द्रियों का सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार ' निधनानन्तर कुछ क्षणों के लिए, किंवा तत्काल ही कर्मात्मा अन्य महान् क्षेत्रज्ञ - प्रज्ञान- इन्द्रिय, इन चार भोगसाधनों से, तथा भूतसूक्ष्मात्मक भोगायतन से युक्त होता हुआ ' भोक्तात्मा ' बन जाता है । भोक्तात्मा के इसी स्वरूप को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति स्मृति ने कहा है-१ - आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।
“ आत्म - न्द्रिय - मनो - युक्त ' ' भोक्त ' त्याहुर्मनीषिणः ॥
--कठोपनिषत ११३ ३,४, - " तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च । उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः " - मनुस्मृतिः १२/१४ | मन, इन्द्रिय, बुद्धि, ये तीनों भोगसाधन, तथा भूतसूक्ष्मात्मक भोगायतन, ये चारों विव एकमात्र चान्द्ररसमूर्त्ति आगन्तुक महानात्मा पर अवलम्बित हैं । आगन्तुक यही अपूर्व महत् - प्राण ' गया: ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यदि कम्मरमा केवल वैश्वानर- तैजस - मूर्त्ति ही होता, तो अन्तःसंज्ञ वृक्षादि मूलजीवों की भाँति स्थूलप्रपञ्चोपशमानन्तर यह भी कर्म्मबन्धन का अनुगामी न बनता । परन्तु इस के स्वरूप ' में ' प्राज्ञ ' भाग का भी समावेश है । प्राज्ञ में प्रज्ञा - प्रारण, ये दो तत्त्व हैं । प्रज्ञाभाग सौम्य है । इसी के आकर्षण से आगन्तुक महान् प्रारण का इस के साथ ग्रन्थिबन्धन हो जाता है । महान् प्राण के आते ही चान्द्रमन - सौरीबुद्धि - इन्द्रियवर्ग - भूतसूक्ष्मों का औपपातिक रूप से आगमन हो जाता है । इस प्रकार गयप्राणात्मक इस आगन्तुक महान् के अनुग्रह से ही भूतात्मा इतर भोगसाधन, एवं भोगायतन से युक्त होता हुआ भोक्तात्मा बन रहा है, यही इसके कर्म्मबन्धनात्मक कर्मभोग का बीज है । जिस प्रकार पुत्रादि पूर्वोक्त प्रजोत्पादनादि तीन कम्मों से प्रेत चान्द्र महानात्मा की मुक्ति के कारण बनते हैं, तथैव क्या पुत्रादि इस कम्र्मात्मा को भी कर्म्मबन्धन से विमुक्त कर सकते है?, यह प्रश्न है । १८४
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ऋणमोचनोपायोपनिष 1. गयाप्राणात्मक आगन्तुक महानात्मा-निष्कर्ष यही हुआ कि, गयाप्राणात्मक आगन्तुक महानात्मा के ( जिसका आगमन प्रकृत सिद्ध है ) सम्बन्ध से कर्म्मबन्धन में बद्ध कम्र्मात्मा को गया - बन्धन से पृथक कर परम्परया कम्र्मात्मा मुक्त श्राद्धकर्म ही गयाप्राणों के सम्बन्ध से ' गया श्राद्ध ' कह-करने के लिए विहित पिण्डदानादिलक्षण लाया है । गया श्राद्ध का लक्ष्य आगन्तुक महान् है । अतृप्त यह महान् भी तत् कर्मात्मवंशजों पर परम्परया M अपना स्वत्त्व रखता है, यही स्वत्त्व इनका ऋण है । इस ऋण का श्रानृण्य एकमात्र गया श्राद्ध पर ही अवलम्बित है । इस दृष्टिकोण को विशेषरूप से लक्ष्य में रखना चाहिए कि, गयाश्राद्ध केवल कम्मात्मा-नुगत - तत् - सम्बद्ध आगन्तुक महतपितरों से आनृण्यप्राप्ति के लिए होता ही है । इससे स्वयं यह महा-नात्मा भी मुक्त हो जाता है, क्योंकि कम्र्मात्मपार्थक्य से इसका भी भूतादि बन्धन से पृथक हो जाना स्वाभाविक है । साथ ही महान् के सम्बन्धविच्छेद होते ही तत्सत्तानुगत भोगायतन- भोगसाधनों के विलीन हो जाने से कर्मात्मा भी बन्धन विमुक्त हो जाता है । इस प्रकार गया श्राद्धकर्ता आगन्तुक महपितरों से तो आनुष्य प्राप्त करता ही है, महन्मुक्ति का कारण तो बनता ही है, साथ ही परम्परया कम्मबन्धन विमोक का भी कारण बन जाता है । अतएव पार्वणश्राद्धादि नामक नित्यकाम्यश्राद्ध की अपेक्षा गया श्राद्ध का विशेष माहात्म्य माना गया है । गंयाश्राद्ध के बिना कम्र्मात्मानुगत पितर उसी श्रद्धासूत्र के द्वारा तद्वंशधरों के महत्- पिण्डों पर आघात किया करते हैं । फलतः पिण्डमहान् की भाँति ( गया श्राद्धाभाव में ) ये पितर भी सन्तति के निरोधक माने गए हैं । अतएव गया श्राद्ध भी गोत्रवृद्धि का कारण माना गया है । याप्राणात्मक आत्मा का क्लान्तिभाव-अतृप्तदशा में, साथ ही तदनुगत कम्र्मात्मा के आत्यन्तिकरूप से पापातिशय से युक्त रहने से यह आगन्तुक तर हीन- योनियों में प्रविष्ट रहते हुए क्लान्त बने रहते हैं । सर्पयोनि विशेषतः इनके लिए उपयुक्त बनती है । जब तक गयाश्राद्ध नहीं हो जाता, तब तक इन्हें ऐसी हीन योनियों में ही रहना पड़ता है | स्वप्न द्वारा ये योनियाँ कातरभाव से वंशधरों से श्राद्धान्न की लालसा व्यक्त किया करतीं हैं । न मिलने पर शान्तस्वभाव वाली योनियाँ तो वंशधरों का साक्षात् रूप से कोई अनिष्ट नहीं करतीं, किन्तु स्वभावा योनियाँ समय समय पर उद्बोधन के नाते कष्ट पहुँचाती रहतीं हैं । यही कष्ट ' पितरदोष ' किवा ' पितृदोष ' नाम से प्रसिद्ध है । भारतवर्ष की वे अशिक्षित कुलदेवियाँ, जिन्हें अशिक्षित कह कर ज्ञानाभिमानी पुरुष इनका उपहास किया करता है, पितृदोषनिवृत्ति के लिए चतुर्दशी की रात्रि में रात्रि-जागरण द्वारा पितृप्रसाद से कुलरक्षा किया करतीं हैं । सचमुच आज के इस अश्रद्धायुग में इन देवियों की अविच्छिन्ना श्रद्धाधारा के अनन्य अनुग्रह से ही हमारी आर्षसंस्कृति का शेष सुरक्षित है । इन देवियों के महासङ्गीतों में हमें वे तत्त्व उपलब्ध हैं, जिनकी मूलधारा साक्षात् रूपेण वेदशास्त्र से प्रवाहित है । दिग्दर्शन कराने का लोभ संवरण करना आर्षसंस्कृतिसंरक्षिका महामङ्गलपरायणा गृहदेवियों की आम्नाय. सिद्धा ( वेदसिद्धा ) मान्यता के साथ अन्याय ही माना जायगा । . - १८७
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श्राद्धविज्ञान मुग्ध प्रतपितरों की भोग्यसामग्री-पितर प्राण पारमेष्ठ्य हैं, यह कई बार विभिन्न दृष्टिकोणों से स्पष्ट किया जा चुका है । पारमेष्ठ्यमण्डल में सोमरक्षक. गन्धर्वप्राण अवस्थित है । यहीं असु - सरणशील अप्सरा - प्राण च का वै -साम्राज्य है । गन्ध - रूप, दोनों इन्हीं गन्धर्वाप्सरा प्राणों से सम्बद्ध हैं, जैसा कि ' गन्धेन रूपेण च गन्धर्वाप्सरसश्चरन्ति ' ( शत ६ । ४ । १४ ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है । गन्ध गन्धर्व से सम्बन्ध है, यह पारमेष्ठ्य पितृसोम का अनुगामी है, तदभिन्न है । अतएव ' सोमो -गन्धाय ' ( ता ० ना ० १ । ३ ॥ ) इत्यादि रूप से दोनों का अभिन्न सम्बन्ध मान लिया गया है । गन्ध का पितृप्राण के साथ विशेष आकर्षण क्यों है?, सुगन्धिद्रव्यानुगामी सौम्य बालकों पर पितृदोष क्यों विशेषतः आक्रमण करता है?, इस की यही उपनिषत् है । इसी आधार पर उन अशिक्षित देवियों के पावन मुख से उनकी प्रान्तीय लोकभाषा में यह किंवदन्ती व्यक्त होती रहती है कि - " अरे रात विरात तर फुलेल लगार कोड़ फिरतो फिरे छे । देख क्यूं हो गयो, तो लेखा से देखा पड़ जायला " ( " सुगन्धिद्रव्य से युक्त होकर रात्रि में इतरस्तत: कहाँ भटक रहा है । यदि कुछ ( पितृदोष ) हो गया, तो " ) - सूक्ति रात्रिव्याप्त चान्द्र गन्धर्व- - अप्सरा- पितृप्रारण हमें बहुत बड़ी आपत्ति का सामना करना पड़ेगा की सहजव्याप्ति की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रही है । सौम्य पितर प्राण की इसी गन्धर्वप्रियता को सूचित करने के लिए इन के महासङ्गीत ( लोकगीत ) में सर्व प्रथम गन्ध द्रव्य से ही पितरों की स्तुति आरम्भ होती है । बालक, तथा स्त्री, इन दो पर ही पितर प्राण का विशेष आक्रमण होता है । कारण स्पष्ट है । १६ वर्ष पर्यन्त चान्द्रकला की अपूर्णता से बालक सोमप्रधान रहता है, एवं स्त्रीसृष्टि तो प्रकृत्या सौम्या है । अहर्गत सौर अग्नि है । जहाँ पुरुषसृष्टि का आरम्भक बनता है, वहाँ रात्रिगत चान्द्रसोम स्त्रीसृष्टि का अधिष्ठाता बनता गन्ध सम्बन्ध " सौम्य पितर गन्धर्वजाति में प्रविष्ट हैं ' योषित्कामा वै गन्धर्वाः ' ( शत०३-२-४-३ ) ' स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः ' ( ऐ ० प्रा ० १ । २७ ) इत्यादि के अनुसार स्त्रीगत सौम्य प्रारण की ओर इन का विशेष आकर्षण है, जैसा कि - ' पतञ्जलस्य काप्यस्य आसीद हिता गन्धर्वगृहीता ' ( शत ० १४ । ६ । ३ । १ ) इत्यादि ब्राह्मण आख्यान द्वारा विस्तार से प्रतिपादित है । अपने इसी सौम्य भाव से इनके लोकगीतों में पितर प्रारण ( पित्तर बाला भोला ( सौन्या ) ' रूप से उपवणित है । पारमेष्ठ्य गौतत्व ही गौपशु का उपादान है, इन में भी विशेषतः श्वेत- धूम्रा गौ में पारमेष्ठ्य पितृत्त्व का विशे-षतः प्राधान्य है । यही अथर्ववेद में उपवर्णिता ' वशा ' नाम की गौ हैं, जिस के साथ पितरप्राण का सजातीय सम्बन्ध है । इसी गोदुग्ध से अक्षत द्वारा ( क्षीरान्न ) रात्रिजागरण में पितरों को तृप्त किया जाता है।रों का मन से सम्बन्ध है, मानस श्रद्धासूत्र ही इन का गमनागमन द्वार है । अतएव -' थां जीम्यां से म्हारो मन भर जाय ' सूक्ति विनिःसृत है । जलाञ्जलि सम्बन्ध से ' भर ' का उल्लेख १८५
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् है । इस प्रकार इन कुलदेवियों के महासङ्गीतमय ( लोकगीतमय ) कुलाचार की आम्नाय ( परम्परा ) ने ही आगन्तुक भौम गृह्य पितरों के पितृदोषात्मक आक्रमण से हमारे पारिवारिक स्वस्तिभाव का संरक्षण कर रक्खा है । प्रसङ्गोपात्त दृष्टि डालिए इस प्रासङ्गिक महासङ्गीत् पर, महासङ्गीत के शब्द शब्द पर, प्रत्येक अक्षर पर । धन्य बन जायेंगे आप इस प्रासङ्गिक महासङ्गीत के श्रवण - मनन - निदिध्यासन से | श्रूयताम्! श्रुत्त्वा चाप्यवधार्यताम्!! कुलस्त्रियों के प्रासङ्गिक महासङ्गीत की पावनस्मृति– श्रौतस्मार्त्त - प्रमाणानुमोदित प्राकृतिक तत्त्व त्र्याख्यान का सम्बन्ध माना गया है - निगम-संस्कारानुगता विद्याबुद्धि के साथ | अब तक ' आनृण्यविज्ञानोपनिषत् के सम्बन्ध में प्रजोत्पादनात्मक आनृण्यकर्म्म, सपिण्डीकरणात्मक आनृण्यकर्म्म, श्राद्धात्मक आनृण्यकर्म्म, एवं गया श्राद्धात्मक आनृण्य-कर्म, जिन इन चार प्रकार के आनृण्यकम्मों का स्वरूप परिचय श्रद्धालु पाठकों के सम्मुख विद्या-बुद्धिसमन्वित जिस नैगमिक - व्याख्या के माध्यम से समुपस्थित हुआ है, उन्हीं के सम्मुख सर्वथा शरीरानुबन्धी मनोराज्य से समतुलित प्रासङ्गिक उस श्राम्नायसिद्ध महासङ्गीत के सम्बन्ध में, उस की पावन स्मृति के सम्बन्ध में निवेदन करने का लोभसंवरण करना महासङ्गीत - श्रवण - मनन - निदिध्या-सन से सर्वात्मना प्रभावित इस गृहमेधी के मनस्तन्त्र के लिए कठिन ही प्रमाणित हो रहा है, जिसे महद्भाग्य से गृहस्थानुबन्धी स्मार्त्त मङ्गलाचार - मङ्गलमहोत्सवों ( पुत्रजनन - पुत्र विवाह - कन्याविवाह-अमाश्राद्ध - अमाजागरण - रात्रि जागरण - रतजगा - रातीजगा - आदि महोत्सवों ) से सम्बन्ध रखने वाले महासङ्गीतों ( लोकगीतों ) के प्रासङ्गिक श्रवण के द्वारा अपने मानस संस्कारों को पावन करने का सु-अवसर यदा कदा उपलब्ध होता रहता है । उसी पावनस्मृति के आधार पर उस महासङ्गीत के सम्ब-.न्ध में जैसा जो कुछ स्खजनरूप से प्रासङ्गिकधिया स्मृत हो पड़ा है, उन वर्त्तमान गृहमेधियों के सामयिक उद्बोधन व्याज से यहाँ ( जिन्होंनें युगवम्र्मानुगत भावात के निग्रहानुग्रह से स्वस्त्ययन-संरक्षक, महामङ्गतविधायक लोकगीतनिबन्धन महासङ्गीतों की उपेक्षा कर अपने आप को, अपने गृहस्थ को, पारिवारिक जीवन को सर्वात्मना दीनहीन -सा, हतश्री -सा, भाग्यहीन -सा, अमङ्गल - सा, रूक्ष कर्कश - सा, अमङ्गल वेशभूषायुक्त - सा बना लिया हैं ) - दो शब्दों में संस्मरण कर लिया जाता है । ऐसी मान्यता है इस पावनस्मृति के संस्मरण के सम्बन्ध में हमारी कि, अवश्य ही यह संस्मरण स्वस्त्ययन-कर्म की सर्वात्मना उपेक्षा कर देने वाले हमारे वर्त्तमान पारिवारिक जीवन को इस साययिक उद्-बोधन के द्वारा हमें महामाङ्गलिक स्व व्ययन की ओर आकर्षित कर सकेगा, निश्चयेन कर सकेगा । प्रसङ्गप्रक्रान्त है केवल पितृकर्मानुबन्धी गया श्राद्ध का, जिसकी मूलप्रतिष्ठा प्रमाणित हुआ पूर्वपरिच्छेदों में कर्मभोक्ता कम्मरमा से अनुप्राणित श्रपपातिक महानात्मा । धर्मसम्मत वृषा - योषाप्राणात्मक शुक्र - शोणित के सहज दाम्पत्य सम्बन्ध से औपपातिकरूप से ही व्यक्त होने वाला १८६
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श्राद्धविज्ञान कर्म्मभोक्ता कर्मात्मा जिस प्रकार औपपातिक है, तथैव इस कम्मतिला के साथ अन्य प्रतिवाहिक सम्पत्तियों की भाँति ( शरीर निधनान्तर ) औपपातिक रूप से ही पार्थिव अत्रिप्राणानुबन्धी प्रवर्ग्य पार्थिव ( भौम ) महतसोम के द्वारा एक स्वतन्त्र महानात्मा का सम्बन्ध भी समन्वित हो जाता है, जो यह औपपातिक भौम महानात्मा उस चान्द्र महानात्मा से सर्वथा पृथकू तत्त्व है, जिस चान्द्र महानात्मा का कर्मात्मा के शरीरत्यागानन्तर ही चन्द्रलोक में प्रतिष्ठापन हो जाता है, जैसा कि पूर्व की सापिण्ड्यविज्ञानो-पनि स्पष्ट किया जा चुका है । यह महानात्मा पार्थिव त्रिप्राण के प्रवर्ग्य सोम से कृतरूप बनता हुआ ' भौम ' है, ओर इस दृष्टिकोण से दोनों के स्वरूप में महान विभेद है । इस मौलिक विभेद को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें महासङ्गीतानुबन्धनी पावनस्मृति का प्रासङ्गिक दिग्दर्शन कराना है । पुत्र - पौत्रादि के द्वारा सहजभाव से स्व स्व निधनान्तर प्रत्यर्पित पिण्डद्वारा निष्पन्न सापिण्ड्य, तथा एकोद्दिष्ट - महालयादि श्राद्धकम्मों का आधार बनता है - चन्द्रलोकस्थित ' चान्द्र सहज महानात्मा ' | एवं गयाश्राद्ध का लक्ष्य बनता है इसी पार्थिव चन्द्र में इतस्ततः दन्द्रम्यमाण कर्मात्मानुगत पार्थिवकक्षा-train पातक महानात्मा ' | अमुक मुहूर्त्त में, किंवा अमुक विशेषमुहूर्त्त ( आश्विनपक्षा-नुगत ) में स्थानविशेष में ( गयातीर्थ में ) श्रद्धापूर्वक विहित गया श्राद्धकम्मं ही इस भौम महानात्मा के बन्धविमो का कारण बनता है, जिस गयाश्राद्धकर्म का उत्तरदायित्त्व श्रपपातिक कर्मात्मा को व्यक्त करने वाले ' दाम्पत्यभाव ' माध्यम से व्यक्तीभूत कम्र्मात्मा से सम्बद्ध पुत्र और पुत्रवधूरूप दाम्पत्य भाव पर ही अवलम्बित माना गया है । श्रद्धालु पुत्र अपनी श्रद्धाशीला पत्नी के साथ सर्वप्रथम पिता - पितामह प्रपितामहादि के शरीरदाहस्थान ( श्मशान ) की अमुक नियत विधिविधान के साथ परिक्रमा करता है, एवं यहाँ से गयास्थान की ओर प्रस्थान कर तत्र विधिपूर्वक गया श्राद्ध की इतिकर्त्त-व्यता पूरी करता है, जिस इतिकर्त्तव्यता की साङ्गोपाङ्गपूर्ति का विशेष फल माना गया है, औपपातिक " महानात्मा का बन्धनविमोक, एवं तत्सम्बद्ध औपपातिक कम्र्मात्मा के प्रारब्ध बन्धन का शैथिल्य " । औपपातिक कम्र्मात्मानुगत सद्यः व्यक्त यह औपपातिक भौम महानात्मा ही ' गृहपितर ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । यद्यपि चान्द्रलोकस्थ सापिण्ड्यभावानुगत पिता - पितामहादिरूप चान्द्र महानात्मलक्षरण प्रतपितर भी चान्द्र श्रद्धानाड़ी के द्वारा तद्वंशधर पुत्र - पौत्रादि के शुक्रस्थित चान्द्र महानात्मा के साथ ( सप्तपुरुषनिबन्धना सपिण्डता से पूर्व पूर्व ) सहज सम्बन्ध स्थापित रखते हुए ' गृहपितर ' ही माने जायँगे । किन्तु इन चान्द्र पितरों का वास्तविक गृह चान्द्रमण्डल ही माना जायगा । पुत्रादि के पार्थिव गृहों में इनका आगमन क्षयाहतिथि, महालयतिथि, आदि विशेष तिथियों में ही हुआ करता है । श्राद्धान्न से तृप्त ये चान्द्रपितर पुनः स्वगृहभूत चान्द्रलोक में ही परावतित हो जाते हैं, जिस परावर्त्तन प्रक्रिया का नैदानिकरूप ' उल्मुक प्रदर्शन ' माया गया है । इधर कम्र्मात्मानुबन्बी औपपातिक महानात्म १६०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत रूप सद्यः पितर पार्थिवकक्षाकर्षण से ही सदा आकर्षित रहते हुए गृहोपलक्षित पार्थिव तत्त्व बनते हुए वास्तव में ' गृहपितर ' अभिधा के अधिकारी बने रहते हैं । यद्यपि अमावास्यादि पर्वतिथियों से सम्बन्ध रखने वाली रात्रिजागरणरूपा इतिकर्त्तव्यता से, तथा पुत्रोत्पत्तिप्रसङ्ग विवाहप्रसङ्ग - आदि आदि तत्तद्-स्मार्त गृह्य मङ्गलाचारपर्वों पर विहिता रात्रि जागरणानुगता इतिकर्त्तव्यता से संतुष्ट होते हुए ये भौम पितर भी स्वनियत स्थानों में ही परावर्त्तित हो जाते हैं । किन्तु इन भौम पितरों का यह परावर्त्तन पार्थिव कक्षा से ही सम्बन्धित रहता है । उधर " गृहा वै गार्हपत्यः " ( शतपथब्रा ० १११११।१६ ) - “ अयं वै ( पृथिवी - ) लोको गृहपतिः " ( शत ० २ | ३ | ४ | ३६ | ) इत्यादि श्रौत प्रमाणों के अनुसार पृथिवी ' गृह-स्थान ' माना गया है । एवं इस दृष्टिकोण से पार्थिवकक्षानुगत इन औपपातिक - भौम - महानात्मरूप सौम्य पितरों को ही प्रधानरूप से ' गृहपितर ' कहना श्रन्वर्थ बनता है । अतएव इन भौम गृह्यपितरों को महासंगीत की आम्नायभाषा में ' घर के देवता - घर के पितर ' अभिधा से व्यवहृत किया गया है । इसी आधार पर इन्हीं भौम गृह्य पितरों के लक्ष्य से यह सिद्धान्त स्थापित हुआ है । निष्कर्षतः चान्द्र-पितरों का गृहत्त्व जहाँ तात्कालिक है, वहाँ भौम पार्थिव पितरों का गृहत्त्व ( पृथिवीनिवास ) निश्चित है । इन दोनों पितरों की गृह्यानुगता इसी सुसूक्ष्म व्यञ्जना को लक्ष्य बना कर ब्राह्मणश्रुति ने दोनों के लिए क्रमशः ' ह ' — ' हि ' भाव अभिव्यक्त किए हैं । ' ह ' सामान्य ( आगन्तुक निवास ) का सूचक है, एवं ' हि ' विशेष ( निश्चित निवास ) का सूचक है, जैसा कि निन्न लिखिता वचनद्वयी से यह विभेद स्पष्ट हो रहा है-wwwww ( १ ) – गृहाणां ' ह ' पितर ईशते ( शत ० २ । ४ । २ । २४ ) । ( २ ) - गृहाणां ' हि ' पितर ईशते ( २ । ६ । १ । ४२ ) । जिस प्रकार सौर देवप्राण के आनृत्य के लिए अनिष्टोमादि सप्तसंस्थ ' देवयज्ञ ' विहित है, तथैव चान्द्र पितरप्राण के आनृण्य के लिए ' पिण्डपितृयज्ञ ' विहित हुआ है । दोनों श्रौतयज्ञ हैं, ऋत्विग्विशेषों की सहायता से सम्पन्न होने वाले दोनों हीं महारम्भ श्रौतयज्ञ त्रैवर्णिक द्विजाति--पुरुष के उत्तरदायित्त्व से सम्बद्ध हैं । यह उत्तरदायित्त्व पुरुषद्वारा देवयज्ञवत् अहः काल में ही निष्ठा-पूर्वक सम्पन्न किया जाता है । पिण्डपितृयज्ञ में आहवनीय - गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि- अन्वाहार्यपचन - वेदि-फलीकरण - हविद्रव्यसम्पादन - आहुतिप्रदान - आदि आदि सम्पूर्ण वे सब यज्ञानुबन्धिनीं इतिकर्त्तव्य. ताएँ, पितृप्राणधर्मानुगता विशेषप्रक्रिया के साथ बिहित हैं, जिन इतिकर्त्तव्यताओं का देवयज्ञ के साथ सम्बन्ध माना गया है, जैसा कि - " अन्वाहार्यपचनं दक्षिणा तिष्ठन् वहति । सकृत्फलीकरोति-सकृदुह्येव पराञ्चः पितरः । तं श्रपयति । याज्यं प्रत्यानयति । स जुहोति अग्नये कव्यवाह नाय, सोमाय पितृमते । पुरस्तादुल्मुकं निदधाति । तत्र जपति- ' अत्र पितरो मादयध्वम् ' । षट् १६१
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श्राद्धविज्ञान कृत्वो नमस्करोति । गृहान्नः पितरो दत्तेति । गृहाणां ह पितरः- ( चान्द्राः ) ईशते " इत्यादि रूप से ब्राह्मणग्रन्थप्रतिपादित पिण्डपितृयज्ञ में विस्तार से प्रतिपादित है ( देखिए शतपथब्राह्मण २ काण्ड ४ अध्याय, ‘ ' पिण्डपितृयज्ञ ' नामक द्वितीय ब्राह्मण ) । स्पष्ट ही चान्द्रमहानात्मानुबन्धी पितरों से सम्ब-न्धित पिण्डपितृयज्ञ का देवयज्ञ से समतुलन प्रमाणित हो रहा है । देवयज्ञवत् सर्वात्मना श्रौतधर्म्मा-त्मक यह पितृयज्ञ मन्त्रविधिपूर्वक द्विजातिपुरुषकर्तृत्त्व से ही अनुप्रमाणित है । यहाँ भावनामूला भावुकता का यतूकिञ्चित् भी समावेश नहीं है । ' दुष्टः शब्दः - स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ' के अनुसार देवयज्ञवत् इस पितृयज्ञ में भी मन्त्रोच्चारण प्रकार का अणुमात्र भी रख न इष्ट के स्थान में अनिष्ट का जनक बन जाया करता है । क्रव्यादाग्नि से विधिपूर्वक ( द्विजातिप्रजा का ), अथवा तो शमशान ( शमशान्न - शवान्न ) रूप से श्मशानाग्नि के द्वारा अविधिपूर्वक यथाजात ( शूद्रादि ) प्रजा का क्रमशः दाहसंस्कार एवं दाहक सम्पन्न होता है, जिस का निम्न लिखित ब्राह्मण श्रुति के द्वारा स्वरूप विश्लेषण हुआ है । अवधा पूर्वक दृष्टि डालिए श्रुति के शब्दों पर, जिन के द्वारा एक विशेष प्रासङ्गिकः ' पितृतत्त्व ' की ओर हमें का ध्यान आकर्षित करना है -“ अथास्मै श्मशानं कुर्वन्ति । यो वै कश्च म्रियते स शवः । तस्मा ( तस्मै ) एत-दन्नं करोति । तस्माच्छवान्नम् । ' शवान्नम् ' ह वै तत् - ' शमशानम् ' इत्याचक्षते परोक्षम् । ' श्मशा ' उ हैव नाम पितृणामचारः 1 । ते ह - श्रमुष्मिँल्लोकेऽकृतश्मशानस्य साधुकृत्यामुपदम्भयन्ति । तेभ्य एतदन्नः करोति । तस्मात् - ' श्मशानम् ' । श्मशान ह वै तत्- ' श्मशानम् ' इत्याचक्षते परोक्षम् " ( शत ० १३ । = । १ । १ । ) । तात्पर्य्य उक्त ब्राह्मण वचन का स्पष्ट है । लोक में शवदाहस्थान ' शमशान ' ( श्मशान ) नाम से प्रसिद्ध है । श्रुति ने दो प्रकार से इस नाम का तात्त्विक निर्वाचन किया है । श्रुति कहती है कि, इस कम्र्मात्मशून्य शव ( मुर्दे ) के लिए ( इस के सम्बन्धी ) ' श्मशान ' कर्म का अनुगमन करते हैं । जो व्यक्ति मर जाता है, औपपातिक कम्र्मात्मा जिस व्यक्ति के पाञ्चभौतिक शरीर का जीर्णवस्त्रवत् परित्याग कर देता है, उस व्यक्ति के कम्र्मात्मा का वह आत्मशून्य शरीर ही ) ' शव ' कह लाया है । इस दाहकर्म से तत्सम्बन्धी इस शव के लिए ही अव्यवस्था का अनुगमन करते हैं, अर्थात् इस को दाहाग्निरूप क्रव्यादाग्नि का अन्न बनाते हैं, अतएव यह दाहकर्म ' शवान्न ' ( शव को क्रव्यादाग्नि कान बनाने वाला कर्म्म ) कहलाया है । ' शवान्न ' शब्द ही देवताओं की सहज परोक्षभाषा में ' शमशान ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । और यही ' शमशान ' शब्द का एक निर्वचन है । १६२