Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 261–270

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 261–270

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् दूसरा नाम ' श्मशान ' नाम से भी प्रसिद्ध है । अपठित यथाजात लोग बोला करते हैं ' शम-शान ', एवं पठित संस्कारी मानव कहा करते हैं ' श्मशान ' । यथाजात नामोच्चारण का निर्वचन है-' शवान्न ', जिसका उपर्युक्त रूप से स्पष्टीकरण किया जा चुका है । अब संस्कृतप्रजा के द्वारा व्यवहृत ‘ श्मशान ' शब्द का निर्वचन करती हुई श्रुति कहती है- ' श्मशा नामक प्राणविशेष ( प्रेत भौम पार्थिव ) पितरों को अपना भोग्य अन्न बनाते रहते हैं । जिनके शरीर में से औपातिक कर्मात्मा निकल जाता है, उनका शवशरीर ( दाहकर्म न हो जाने की अवधि पर्यन्त औपपातिक कर्मात्मा के साथ सद्यः समुत्पन्न भौन पार्थिव पितरों से संयुक्त रहता है ) उन ' श्मशा ' नामक प्राणदेवों का भोग्य बना रहता है । यदि शरीर को जला नहीं दिया जाता है, तो शरीराकर्षण से आकर्षित यह औपपातिक भौम पितर तबतक उन ‘ श्मशाप्राणों ' के द्वारा क्षीरा बनते हुए बन्धनवेदना से आक्रान्त रहते हैं, जब तक कि शवशरीर चिर अवधि में स्वप्रभव प्राकृतिक पञ्चमहाभूतों में ( प्रतिसर्गविधि से ) विलीन नहीं हो जाते । इस पितरबन्ध ( शवानुगत दुःखभोगात्मक बन्ध ) से पितर को ( भौम हंसात्मानुगत भौम महान को ) उन्मुक्त करने के लिए ही शव को अग्नि में भस्मसात् कर दिया जाता है, जिसका तात्पर्य है शवशरीर सत्ता में ‘ श्मशा ' नामक प्राणदेवों के शनैर्भोगानुगत दुःखबन्धन से हंसात्मावच्छिन्न भौम महानात्मा को बन्धन से विमुक्त कर देना । क्योंकि इस शवदाहरूपकर्म से तत्सम्बन्धी दाहकर्मकर्त्ता ' शव ' को ही ' श्मशा ' का एक बार ही अग्निद्वारा अन्न बनाडालते हैं, अतएव यह कर्म श्मशान ' ' कहलाया है, जो परोक्ष भाषा में ' श्मशान ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जिसका तात्त्विक अर्थ है - " श्मशाप्राण का अन्नस्थान - शव " । श्रुति के इन अक्षरों पर अवधान दीजिये, भारतीय शवदाहप्रक्रिया की वैज्ञानिकता का रहस्यात्मक स्वरूप विज्ञात बन जायगा - " श्मशा उ हैव नाम पितृणामत्तारः । ते हामुष्मिँल्लोके -अकृतश्मशानस्य ( प्रकृंतशवदाहस्य ) साधुकृत्यामुत्पादयन्ति " इति । शमशान, और श्मशान, इन दोनों प्राकृत - संस्कृत शब्दों के निर्वचन के द्वारा ब्राह्मण-श्रुतिर्थ का समन्वय पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया गया । इसी सम्बन्ध में अब एक विशेष प्रासङ्गिक रहस्यात्मक प्राणतत्त्व की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित कराया जाता है । श्राद्धविज्ञाना-ग्रन्थार्गत ' श्रात्मविज्ञानोपेविषत् ' नामक प्रथमखण्ड में विज्ञानदृष्ट्या खण्डात्माओं का प्रतिपादन करते हुए ' हंसात्मा ' नामक एक पार्थिव उस आत्मा का स्वरूप विश्लेषण हुआ है, जिसे पार्थिव वायव्य प्राणात्मक बतलाया गया है । वहीं विस्तार से यह स्पष्ट हुआ कि, नवजात शिशु के त्रिःपार्थिव संवत्सरचक्र-परिभ्रमणात्मक भोगकाल से शिशु में घनताप्रवर्त्तक सौर हिरण्मयतेज परिपक्वरूप से अन्तर्यामिसम्बन्ध से प्रतिष्ठित हो जाता है, तो इसी अवस्था में इस वायव्य ( मातरिश्वा नासक घनता - पिण्डसम्पादक प्राण-वायुविशेष ) पार्थिव हंसात्मा की औपपातिकरूप से औपपातिक कर्मात्मा ( कर्म्मभोक्ता जीवात्मा भूतात्मा ). के साथ सम्बन्ध हो जाता है । पार्थिव आपोमयप्राण अपने सहज काल्वालीकृत - पिच्दमान अकाय - श्रवण-१६३

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श्राद्धविज्ञान अनावर - रूप से सौर हिरण्मयी चितिलक्षणा उस घनता से असम्बद्ध है, जिसकी प्रतीक दन्तपंक्ति मानी गई है । पार्थिव यह पिब्दमान - घनतावियुक्त - लथप्राण ही - ' पूषा ' कहलाया है । घनता के अभाव के कारण ही इसके लिए ' अदन्तकः पूषा ' ( शत ० | १ | ७ | ४ | ७ ) यह निगम प्रतिष्ठित हुआ है । जबतक पाता । शिशुशरीर अदन्तक ( बिना दाँत का ) रहता है, तबतक इसमें घनतानुबन्धी हंसात्मा व्यक्त नहीं हो दन्तोत्पत्ति सहकाल में इसका व्यक्तीभाव आरम्भ होता है, एवं दन्तनिर्माण समाप्ति पर हंसात्मा इसी सर्वात्मना व्यक्त हो जाता है । शरीरनिधनान्तर यह हंसात्मा पार्थिव शवशरीर की सत्तापर्यन्त शवशरीर को केन्द्र बनाए रहता है तबतक, जबतक कि इसे भस्मसात् नहीं कर दिया जाता । शवदाह के अभाव में हंसात्मा जीवनकालवत् सर्वत्र वायव्यं वातावरण में पक्षीवत् विचरण करता हुआ इसी शरीर में विश्राम लिया करता है, जैसे कि पक्षी प्रातः अपने कुलाय ( घोंसले ) से निकल कर कणलोभ- में प्रविष्ट शान्ति के लिए अहः काल में इतस्ततः विचरण करता रहता हुआ सायं पुनः अपने उसी कुलाय स्वपीतिलक्षणा हो जाता है । पक्षी थक कर स्वकुलाय में विश्राममात्र ग्रहण करता है, मानव की भाँति सुषुप्त अवस्था ( घोर निद्रा ) की अनुगति पक्षी में नहीं होती । ठीक यही अवस्था पक्षिस्वरूप समतुलित किया हंसात्मा की मानी गई है । अतएव पुराणपुरुष ने इसे ' गरुड़ ' ( पतिविशेष ) नाम से व्यवहृत है, जिसके प्राकृतिक गतिभावों का ' गरुडपुराण ' में विस्तार से उपबृंहण हुआ है, जिन प्रेतात्मानुगता गरुड़गतियों का विशद वैज्ञानिक स्वरूप इसी ग्रन्थ की अन्तिम ' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' में होने वाला है । मूलसंहिता में यही गरुड़ात्मा ' भोक्ता सुपर्ण ' कहलाया है । तद्व्याख्यानभूत ब्राह्मणग्रन्थः । उपनिषदों नें इसी का ' सौपर्णक आख्यान ' रूप से सुपर्णचितिप्रकरण में विस्तार से विश्लेषण किया है इसी में यही सुपर्णात्मा ' हंसात्मा ' नाम से उपवर्णित हुआ है । सुप्रसिद्ध पौराणिक ' कद्र विनताख्यान ' सुपर्णविज्ञान पर अवलम्बित है, जिस की घोषणा हुई है ब्राह्मणग्रन्थों में ' सोमापहरणविज्ञान ' प्रसङ्ग में इस रूप से कि-" एतद्ध सौर्णमाख्यानमाख्यानविद श्राचक्षते " - शतपथब्राह्मण ( ३।६।२ ब्रा ० ) तथा ऐतरेय ब्राह्मण जो हंसात्मा दन्तोद्भवानन्तर व्यक्त होता है, जो कम्मरमा के सो जानेपर जाग्रत रहता हुआ अपने इस शरीर कुलाय का संरक्षण किया करता है, जिस जाग्रत हंसात्मा के अनुग्रह से प्रेरणा करने से में अमुकामुक अज्ञात भयाशङ्काओं से मानवीय कम्र्मात्मा जाग्रत बनता हुआ भय से स्वत्राण समर्थ बन जाता है, इसी एवंविध हंसात्मा का स्वरूप दिग्दर्शन कराते हुए उपनुषच्छु तिने कहा है-तदेते श्लोका भवन्ति — स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्य - ' सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ' ॥ शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एक हंसः ॥ १ ॥

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्राणेन रक्षम्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ॥ सईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एक हंसः २ ॥ - बृहदारण्यकोपनिषत् ६ । ३ । ११ । १२ । ' हंसात्मा ' नामक पार्थिव वायव्य सुपर्णभावापन्न ( गायत्रीभावापन्न - अतएव हिरण्मयरूपेण उप-निषदों में उपवर्णित ) औपपातिक प्राणात्मा एक पैसा विशेष विलक्षण तत्त्व है, जिस की प्रतिमुक्ति एकमात्र प्राकृतिक प्रतिसञ्चरभाव पर ही अवलम्बित है । सौर सर्गान्तकाल ही इस हंसात्ममुक्ति का प्रवर्त्तक बना करता है । तदवधिदर्य्यन्त आकल्पान्त यह पार्थिव वायव्यधरातल में उच्चावचभावा-गति से सुख - दुःखानुभूति तारतम्य से विचरण किया करता है । यही अथर्ववेदव्याख्यात ' अथर्वा -4 सूत्रानुबन्धी आशौचप्रवर्त्तक आथर्वण आत्मा है, जिसे लक्ष्य बना कर विविध आथर्वण प्रयोग आवि-कृत हुए हैं, जिन्हें ब्राह्मणग्रन्थों में - ' कृत्यावल्गा ' नाम से व्यवहृत किया गया है । यही ' वल्गा ' तन्त्र-शास्त्र की कृत्याप्रयोगाधिष्ठात्री ' बगुलामुखी ' है । यदि शवदाह कर दिया जाता है, तो हंसात्मा कृत्या-प्रयोग का साधन कथमपि नहीं बन सकता । शव का दाह न करने से ' श्मशा ' नामक प्राणविशेष के आक्रमण से हंसात्मा बाल - स्त्री लक्षण सोमप्रधान शरीरों के माध्यम से कृत्याप्रयोगात्मक प्राथ-र्वण उन जघन्य प्र ेतकम्मों - प्रतसिद्धियों का परम्परया निमित्त बन जाता है, जो कृत्यात्मक आथर्वण. प्रयोग तमोगुणप्रधान बनते हुए परउत्पीड़क बनते हुए सर्वथा निन्द्य ही घोषित हुए हैं + । तमोगु णानुगत - परउत्पीडक निन्द्यकम्र्मानुगामी आथर्वणों की स्वार्थसिद्धि सम्भव न बन सके, इस सामान्य -लोकसंग्रहात्मक लोकसंरक्षण फल की दृष्टि से, स्वयं हंसात्मा ' श्मशा ' प्राण का यावत् शवशरीरसत्ता-वधिपर्यन्त भोक्ता बनता हुआ अप्राकृतिक बन्धन दुःख से आर्त्त न बना रहे, इस विशेष फलसिद्धि के लिए, और शानुगत मलीमस पूतिगन्ध से पूतिभावापन्न वातावरण लोक - ग्राम - नागरिक वातावरण को पूतियुक्त बनाता हुआ प्राकृतिक स्वास्थ्यविघातक न बन जाय, इस लौकिक फलदृष्टि से, अन्यान्य भी ज्ञात - अज्ञात अनेक फलों की दृष्टि से शवशरीर को अग्नि से संस्कृत करते हुए इसे भस्मावशेष बना देना ही विज्ञानसम्मत माना जायगा, जिस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का - - " श्मशा उ हैव नाम पितॄणां रः । ते हामुष्मिँल्लोके - कृतश्मशानस्य कृत्यामुपदम्भयन्ति । तेभ्य एतदन्न करोति ० " इत्यादि रूप से विश्लेषण हुआ है । शवशरीर के अन्यान्य भूत - भौतिक द्रव्य भस्मान्त बन गए, हंसात्मा बन्धन से विमुक्त हो गया, परन्तु | परन्तु इसलिए कहना पड़ रहा है कि, क्रव्यादग्नि स्नायु दन्त - दष्ट्रा आदि अमसोम-मय घनतम - निबिडतम - शवभूतों को भस्मसात् करने में असमर्थ बना रहता है । फलतः इन शवशरीर + " प्र ेतान् भूतगणाँश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः " ( गीता १७।४ । ) । १६५

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श्राद्धविज्ञान विमोक नहीं माना जा शेषभूत दन्तादि भागों के आकर्षण से हंसात्मा का यहाँ से करने आत्यन्तिक का एक मात्र उपाय है इन शवशेषों सकता । इस आपत्ति से हंसात्मा का आंशिक रूप से चारण - पवित्र सोमं का सम्बन्ध करा देना । यद्यपि के साथ ' अम्भ: ' नामक ब्राह्मणस्पत्य पारमेष्ठ्य पवमान सोम के आंशिक प्रतीक माने गए हैं । तुलसी - चन्दन- हिरण्यशकल आदि भौतिक द्रव्य इसी पावन चिता पर आरूढ करते हुए इन द्रव्यों को अतएव आस्तिक श्रद्धालु यथाशक्य यथाश्रद्वा शवशरीर को सोमप्रतीक के तथाकथिता आंशिकता पूर्ण दाहकर्म में समाविष्ट कर देते हैं । तथापि बिना प्रबलतम अम्भः का सगुण प्रतीक है । इसी नहीं हो पाती । परमपावन भागीरथ सलिलप्रवाह उसी पारमेष्ठ्य में प्रक्षेप अनिवार्य माना गया है । आस्थानुगता श्रद्धा के माध्यम से अस्यादि का इसी पावनधारा औपपातिक भौम गृह्यपितर, तथा — क्या अब औपपातिक हंसात्मा, तदभिन्न तत् सहकृत पूर्वोपवर्णित हो गया?, नेति होवाच । अनुशय एकहेलया विध शवदाहसंस्कार से सर्वात्मना बन्धन से विमुक्त से इसे निःशेष तो किया ही नहीं जा ही नहीं हट जाया करता । ' जातसंस्कारबाधायोगात् ' न्याय पुरुषार्थकम्मों का श्रद्धापूर्वक अनुगमन करना सकता, अपितु निर्बल बनाने के लिए भी अन्यान्य ना बना रहता है । बन्धन विमोक, एवं इन पितरों को हंसात्मा की बन्धनमुक्ति, औपपातिक भौम गृह्यपितरों का रखना, इन लक्ष्यों की सिद्धि के पारिवारिक मङ्गल - स्वस्ति- गोत्र वृद्धि कामना से सन्तुष्ट - तृप्त बनाए । स्वधर्म्मपत्नी को साथ लेकर अमुक लिए ने शास्त्र पुरुष और स्थानरूपं श्मशानक्षेत्र ( दाहक्षेत्र ) की परि-कुलस्त्रीवर्ग, ये दो क्षेत्र निर्णीत किए विशेष मुहूर्त्त में हंसात्मानुगत भौम पितर के शेषानुशय विधिपूर्वक गया श्राद्ध का श्रद्धापूर्वक अनु-` क्रमा कर ' गया ' नामक पावन स्थान - तीर्थ क्षेत्र - विशेष में से स्मार्त्त हंसात्मा निश्चयेन बन्धन विमुक्त ( मली-गमन करे, यह एक क्षेत्र की मीमांसा है । इस गया श्राद्ध जाता है, तत्सहयोगी औपपातिक भौम मस भावों से विमुक्त - शवानुगत तमोभाव से विनिर्मुक्त ) हो कर्म्मभोक्ता भूतात्मा - कम्र्मात्मा को कर्म्मबन्धन गृहपितर बन्धनविमुक्त ( श्लथबन्धन ) बनते हुए तदभिन्न हैं । अब शेष रह जाता है इन गृह्यपितरों से विमुक्त ( कर्म्मबन्धनश्लथ ) बनाने के निमित्त बन जाते का प्रश्न, जिससे तुष्ट - तृप्त बने रहते की सामयिक पर्वानुगति से सम्बन्धित सामयिक तुष्टि - तृप्ति इस लोकानुबन्धी- पारिवारिक मङ्गला-हुए गृह्यपितर पारिवारिक स्वस्ति - मंगल के कारण बने रहते लौकिक हैं । पितृकर्म का उत्तरदायित्त्व समर्पित नुब धी - पर्वानुगत पितृदोषनिवर्त्तकानुबन्धी लोकभावनापूर्ण ' तथा सोमप्रधान अविवाहित सौम्य पारिवारिक किया गया, मङ्गलाचारपरायणा सोमप्रधाना ' स्त्रियों को इस उत्तरदायित्त्व से सम्बन्धित किए गए । कुमारों को । स्त्री और अविवाहित बालक, ये दो ही, असमर्थ हैं कि, यह केवल भावनाजगत् का वयों, और किस लिए? का उत्तर देने में हम इसलिए आस्था, विश्वासानुगता विषय है । यहाँ केवल भावुकतापूर्णा श्रद्धा का ही साम्राज्य, है रहना । बुद्धिव्याख्यानुगता चाहिए । भावुकतापूर्ण गतानुगतिक निष्ठा का प्रवेश यहाँ आत्यन्तिकरूप से अवरुद्ध है, रहेगा पर्याप्त, किन्तु...... अस्मत् - सदृश भावुक के लिए यह समाधान ही यद्यपि १६६ 1

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् किन्तु एक स्थायुक्त श्रद्धा से सम्बन्ध रखने वाला धर्मानुगत कारणताबाद *, एवं दूसरी ओर केवल भावनापूर्ण श्रद्धाभास के द्वारा समाधान की पर्याप्तता की घोषणा, दोनों का समन्वय भारतीय प्राङ्गण में तो कथमपि सम्भव नहीं माना जा सकता । यहाँ की तो एकमात्र निकषा यही मानी जायगी, मानी जाती रही है कि-प्रत्यक्षं चानुमानश्च शास्त्रञ्च विविधागमम् || त्रयं सुविदितं कार्यं धर्म्मशुद्धिमभीप्सा ॥ १ ॥

धर्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राऽविरोधिना ॥ यस्तर्केणानुसंधते स धर्मं वेद नेतरः ॥ २ ॥

-मनुः १२११०५, १०६, । एतद्देशीय, किंवा इतरदेशीय मतवादों की भाँति भारतीय धर्म्म केवल मान्यता ( अन्धविश्वास-अन्धश्रद्धा ) का क्षेत्र नहीं है । वहाँ जैसे मतवाद के सम्बन्ध में कारणता की जिज्ञासा की भ्रान्ति भी दण्डविधान का कारण बन जाती है, यहाँ वैसी परम्परा अणुमात्र भी मान्य नहीं है । यहाँ की प्रत्येक आस्था, प्रत्येक श्रद्धा वही मान्य मानी और कही जायगी, जिसके मूल में निगमशास्त्रानुमोदित ( प्राकृ-तिक सर्गानुमोदित ) कारण- तात्त्विककारणानुगत तर्कवाद मूल में प्रतिष्ठित होगा । यही सहजसिद्ध भारतीय धर्मानुगत ( प्राकृतिक सनातनधर्मानुगत ) कारणतावाद भौम गृहपितरों की पर्वानुगता तुष्टि-तृप्ति की मान्यता से सम्बन्ध रखने वाले उस लोकानुबन्ध विशुद्ध भावना - श्रद्धानुगत उत्तरदायित्त्व के सम्वन्ध में भी समुपस्थित हो रहा है, जिसे केवल ' आम्नायसिद्ध मान्यता ' कह कर पूर्व में हम कारणता-वाद से संस्पृष्ट बनाए रखने के लिए अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त कर चुके हैं । इसी दिशा में सर्वात्मना आम्नायसिद्ध मानवधर्म्मशास्त्रसम्मत पूर्वोपात्त हेतुवाद ' किन्तु ' का जन्मदाता बनता हुआ इस दिशा में भी अपनी नैमिक आम्नाय से कारणतावाद की जिज्ञासा सर्वथा प्रणतभाव से अभिव्यक्त करने की धृष्टता करा रहा है । इस जिज्ञासा के समाधान पर ही स्त्र वर्ग, तथा अविवाहित कुमारवर्ग से सम्ब-न्धित भौम गृह्य पितर तुष्टि - तृप्तिलक्षण उत्तरदायित्त्व ' धर्मसीमा ' का अनुगामी बन सकता है, एवं तभी इसकी मान्यता सुरक्षित रह सकती है । ओमित्येतत् । क्या नैमिक मूल है तथाकथित मान्यता के समर्थन के लिए भी? । है, और अवश्य है । हमें तो वह मूल उपलब्ध हुआ नहीं? | आपने उपलब्धि के लिए अपने देशानुगत अभिनिवेश के * नाकारणं हि शास्त्रेऽस्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले! कारणाद्धर्म्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् ॥ - जाजलि के प्रति आर्षपुरुष भगवान् राम की उक्ति । १६७

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श्राद्धविज्ञान कारण कोई यत्न न करते हुए उसी प्रकार ' नोपलभ्यते ' कहने का दुःसाहस कर डाला, जैसे कि महान शब्दप्रयोग का आलोडन - विलोडन किए बिना ही यदृच्छाशब्दों के सम्बन्ध में प्राचीनों नें-' न सन्ति यदृच्छाः शब्दाः ' घोषणा कर डाली थी, एवं उसी समय भगवान् पतञ्जलि ( महाभाष्यकार ) नैमिक उदाहरणों के द्वारा ही ' ऊ ' - तेर ' आदि रूप से समाधान किया था । हाँ, तो आस्था श्रद्धा-पूर्वक आप भी इस सम्बन्ध में - ' उपलब्धौ यत्नः क्रियताम् ' । अवश्य ही आपको भी नैगमिक कारणवाद व्यक्त करने वाले नैगमिक उपलब्ध हो ही जायँगे । इस पर भी यदि आप अपना अभिनिवेश सुरक्षित रखना चाहेंगे, तो उस दशा में भी हम तो अपनी ओर से निराशा का लेश भी समावेश न होने देते हुए इस विधिभाव का ही अनुगमन करेंगे आपके कालानुगत अभ्युदय के लिए कि-इत्येवं श्र तिनीतिसम्प्लवजलै भूयोऽविराचालिते । येषां नास्पदमादधाति हृदये, ते शैलसाराशयाः ॥

किन्तु प्रस्तुतविपतपधियोऽप्युच्चैर्भवचिन्तकाः ।

Sara arora! tala कृपया ते भावनीया नराः ॥

- श्रीउद्यानाचार्य्यकृत न्यायकुसुमाञ्जलि अन्तिम ( ५ ) स्तबक प्रकृतमनुसरामः । साक मेधयाग - महेन्द्रयाग आदि विविध नामों से प्रसिद्ध एक विशेष फल-साधक याग ब्राह्मणग्रन्थों में ' महाहविय्र्याग ' नाम से उपवर्णित हुआ हैं । शतपथ में तो तीन ब्राह्मणों में ७८ कण्डिकाओं में इस यागरहस्य का प्रतिपादन हुआ है । वृत्रासुर ( प्रारणात्मक असुर ) का वध करते हुए इन्द्र को महेन्द्रपद से समलंकृत कराने वाली प्राकृतिक यज्ञप्रक्रिया ही इस ब्राहारणत्रयी में प्रतिपादित हुई है, जैसा कि - " महाहविषा वै देवा वृत्रं जघ्नुः, तेनो एव व्यजयन्त - येयमेषां विजितिः " ( शत ० २ | ५ | ४ | १ ) इत्यादि उपक्रमवचन से प्रमाणित है । जो द्विजाति अपने आध्यात्मिक आवरक वृत्रभावों को, तथा आधिदैविक वृत्रसमुदाय को परास्त कर सर्वविजयलाभ की कामना रखता हो, उसी के लिए ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या ' रूप से यह अनुष्ठेययज्ञ ब्राह्मणेतिकर्त्तव्यता में समा-विष्ट हुआ है । इस याग में आय अष्टाकपालपुरोडाश, सावित्र द्वादशकपालपुरोडाश, सारस्वतचरु, पौत्रणचरु, ऐन्द्रानद्वादशकपालपुरोडाश, माहेन्द्रचरु, वैश्वकर्म्म एक कपालपुरोडाश, पैत्रपट्क पॉल पुरोडाश, रौद्रएककपालपुरोडाश, आदि अनेक अवान्तर योगों की इतिकर्त्तव्यता उपपत्तिपूर्वक बड़े आटोप के साथ प्रतिपादित हुई है, जिन में से अन्त की पैत्र- रौद्र, इन दो इतिकर्त्तव्यताओं की ओर ही हमें कारण-जिज्ञासुओं का ध्यान आकर्षित करना है । ऋतुसम्बन्ध से महाहविर्याग में विहित पुरोडाश ( आहुतिद्रव्य ) कपाल होता है, अतएव इसे ' पैत्रषट्कपालपुरोडाश ' कहा गया है । प्रश्नाद, अन्न, अनुभय, भेद से १६ रु

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् पितर का त्रेधा वर्गीकरण प्राकृतिक माना गया है, जैसा कि श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ' पितृस्वरूपविज्ञानोप-निषत् ' नामक द्वितीय खण्ड में विस्तार से निरूपित है । पुत्रादि वंशजों की श्रद्धानाड़ी ( चान्द्रनाड़ी ) के द्वारा जिन चान्द्र महानात्मरूप पितरों को एकोद्दिष्टादि - महालयादि श्राद्धकर्म्म द्वारा तुष्ट है, उन चान्द्र पितरों की यजनप्रक्रिया का, इतिकर्त्तव्यता का प्रधानरूप से ' पिण्डपितृयज्ञ तृप्त ' किया जाता निरूपण हुआ है | चन्द्रलोकस्थ महानात्मलक्षण परलोकगत चान्द्रपितर का अर्थ है - पिण्डपितृयज्ञा- ब्राह्मण में धिष्ठाता यजमान के चन्द्रलोकगत पिता- पितामह प्रपितामहादि षपितर । इनके निमित्त ही वोऽशनम् ' रूप से प्रति श्रामावास्या को, क्षयाहतिथि को एवं महालय श्राद्धपक्षानुगत गजच्छायायोग ' मासि मासि-में यजमान ( पुत्रं ) श्रद्धापूर्वक ऋत्विजों के सहयोग से आहुतिरन्न प्रदान करता है । ये चान्द्रपितर दृष्टिकोण से ' अन्नादपितर ' माने गए हैं । नद्रव्यात्मक आहुतिरन्न के भोक्ता पितर ' हविभ्रु ' इस क ' हैं, तरलद्रव्यात्मक आहुतिद्रव्य के भोक्ता पितर ' श्राज्यपा ' हैं, एवं विरलद्रव्यात्मक आहुतिद्रव्य के भोक्ता पितर ' सोमपा ' हैं । हवि खाया जाता है, आज्य ( घृत ) और सोम का पान किया जाता है हविद्रर्व्यात्मक नियत पैत्र आहुतिद्रव्य में हवि, घृत, और अन्नगत सोम, तीनों द्रव्य समाविष्ट । इस प्रकार सोम - घृत - हविर्लक्षण एक ही हविद्रव्याहुति से तीनों अन्नादपितरों की तृप्ति हो जाती हैं है ॥ पितरों में से आदि के तीन पितर ' हविर्भु'कू ' ( हविद्रव्य की घन आहुति लेने वाले ) नामक पितर हैं, ये ही तत्त्वतः मुख्य हैं । हविः प्राधान्य से ही इन्हें श्राद्धकर्म्म परिभाषा में ' पिण्डभाज अन्नाद-: ' कहा गया है । इनके सन्तर्पण से ही हविद्रव्यभुक्त आज्य - सोमरूप लेपद्रव्य से शेष तीनों वृद्धप्रपिता-महादि पितर तृप्त हो जाते हैं । इनमें वृद्धप्रपितामह - अतिवृद्धप्रपितामह को तो ' आज्यपा ' नामक पितर कहा जायगा । एवं वृद्धातिवृद्ध प्रपितामह को ' सोमपा ' नामक अन्नादपितर माना अन्नाद-जायगा । पिण्ड -पितृयज्ञ में ऋतुकाल में प्रतिष्ठित षड़विध इन चान्द्र सौम्य महानात्मानुगत नित्य- सपिण्डताप्रवर्त्तक पितरों को ही आहुतिद्वारां तृप्त किया जाता है, और यह अन्नप्रदान कर्म्म सप्तमवंशज पर्य्यन्त नियमित रूप से प्रक्रान्त रहता है । आदि के तीन जहाँ ' पिण्डभाज: ' हैं, वहाँ अन्त के तीन लेपानुशय के भोग के कारण ' लेपभाजः ' कहलाए हैं । ज्य - सोमाहुति ग्रहरणता ही इस अन्तत्रयी की लेपभाजनता है। पिण्डपितृयज्ञ में ऋतुसाक्षीभूत इसी चान्द्र प्रेतपितृषट्क की इतिकर्त्तव्यता प्रधान मानी गई है, कि निम्न लिखित कतिपय तद्ब्राह्मणवचनों से स्पष्ट ही प्रमाणित हो रहा है । देखिए! जैसा " स जुहोति - अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा, सोमाय पितृमते स्वाहा । सकृदेव पराञ्चः पितरः । तस्मात् सकृदुल्लिखति । परस्तादुल्मुकं निदधाति । श्रदपात्रमादाय -अत्र-नेजयति - असाववनेनिच्वेति - यजमानस्य पितरं - पितामहं - प्रपितामहम् । ( अवने-जनं - जलाञ्जलिसमर्पणम् ) । अत्र पितरो मादयध्वं यथाभाग मावृषायध्वमिति । यथाभागमश्नीतेत्येवैतदाह ( अन्नादा भवन्तः, तस्मात् हविद्रव्यमश्नीत - इत्येव तदाह ) । १६६

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श्राद्धविज्ञान षट्कृत्वो नमस्करोति । गृहाणां ह पितर ईशते । एषा उ एतस्य आशीः कर्म्मणः । rato ति प्रत्यवधाय पिण्डान् । स यजमानभागः " - शत ० २।४।२ द्वितीयब्राह्मण । करते हैं, वे दूसरा विभाग ' पितर का है । जो पितर अन्य प्राणविशेषों के भोग्यान्न बना ही ' अन्नपितर ' कहलाए हैं, जिनके ' अग्निष्वात्ता, सोमषत्, बर्हिपत् ' ये तीन श्रेणिविभाग प्रसिद्ध पूर्व के हैं । ये तीनों हीं पार्थिव पितर हैं । पार्थिव भूतप्रारण ही ' श्मशा ' प्राणविशेष माना गया है, जिसका ' शमशान ' तथा ' श्मशान ' शब्द निर्वचनों के द्वारा स्पष्टीकरण किया जा चुका है । श्मशामक अर्थिव भागों भूतप्राण में भूतों की ' उष्ण - शीत- अनुष्णाशीत ' इन तीन अवस्थाओं ( जातियों ) के सम्बन्ध से तीन के विभक्त हो जाते हैं । भूतभेदत्रयी ही श्मशाप्राणभेदत्रयी का कारण बनती है । अतएव श्मशाप्राण लिए श्रुति में ' श्मशा उ वै नाम पितृणामचारः ' ( शतः १३ | १ | १ | ) इत्यादिरूप ' अग्नि से ' बहुवचन कहलाया प्रयुक्त हुआ है । उष्णभूतानुंगत श्मशा नामक पार्थिव भूतप्राण संकेतपरिभाषापेक्षया है, शीतभूतानुगत श्मशाप्राण ' सोम ' कहलाया है, एवं अनुष्णाशीतानुगत श्मशाप्राण ' बर्हि ' कहलाया है | अग्निश्मशा के द्वारा भुक्त पार्थिव पितर ' अग्निष्वात्ता ' कहलाए हैं, सोमश्मशा के द्वारा भुक्त पितर ' सोमषत् ' कहलाए हैं, एवं बर्हिश्मशा के द्वारा भुक्त पितर ' बर्हिपत् ' कहलाए हैं । श्मशाप्रारणानुबन्धी ये तीनों अन्न पितर भौम पितर हैं, औपपातिक पितर हैं, जिनका श्मशाप्राणावासरूप श्मशानस्थल में हीं व्यक्तीभाव होता है । अतएव इन्हें ' श्मशानवासीभूत ' ( भौतिक पितर ) कहा जा सकता है, जो स्व-व्यक्तीभावाधारभूत शवदाहसंस्कार के न होने से श्मशा के भोग्य से बचे रहते हुए कृत्यात्मक आथर्वण-प्रयोगों की सफलता ( श्मशानानुगता भूत - प्र ेतसिद्धि ) के निमित्त बन जाया करते हैं, जैसा कि पूर्व मैं तन्नामनिर्वचनप्रसङ्ग में स्पष्ट किया जा चुका है । यह अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना है कि, चान्द्र अन्नादपितर हों, अथवा तो पार्थिव पूर्वोपवति पितर हों, ऋतुलक्षण ( ऋतुसमष्टिरूप ) चान्द्र सम्वत्सर का मूलाधारत्त्व दोनों क्षेत्रों समान है । साथ ही शवानुगत महदनुशयभोग सम्बन्ध से चान्द्रपितर भी पिता पितामहादिरूपेण संस्थ हैं, एवं भौम पितर भी तदनुशयानुगति से षट्संस्थ ही हैं । चान्द्र महानात्मानुगता अनुशय-सम्बद्धा षट्संस्थता दोनों में समान है । किन्तु अन्नादात्मक षट्संस्थ पितर जहाँ चन्द्रमण्डलानुगत बनते हुए प्राकृतिक हैं, नित्य हैं, वहाँ अन्नात्मक षट्संस्थ पितर पार्थिवमण्डल में हीं ( किन्तु रात्रि में हीं, अथवा तो चन्द्रिका में हीं ) विचरण करते हुए वैकारिक हैं, औपपातिक हैं, क्षणे तुष्टाः- क्षणे रुाः हैं । इसलिए कि इन भौम पितरों के पार्थिव परिवारों के साक्षी - नियन्ता इनके स्वरूप के जान्धितम क्षणे -तुष्टाः - क्षणे रुष्टाः पार्थिव रुद्र ही बने रहते हैं, जिनका तन्त्रशास्त्र ने श्मशानवासी भूतप्रेतगणोपसेवित-भूतेश - भूतनाथरूप से यशोगान कर अपने को पावन बनाया है । भूताधिपति - पार्थिवाग्नेय प्राण ही तो २००

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ऋण मोचनोपायोपनिषत् वह ' श्मशाप्राणदेवता ' ( स्मशानदेवता ) है, जिसे पितरों का ( अनरूप भौम पिंतरों का ) ' त्ता ' कहा गया है । यही क्रव्यादाग्निरूप से अन्नपितरों को स्वभोगसीमा में अन्तर्मुक्त करता हुआ अपना एक स्वतन्त्र ' पितृपरिवार ' सम्पादित कर लेता है । भौमपितृपरिवार रुद्र के नियन्त्रण से ही नियन्त्रित रहते हैं, मर्यादित बने रहते हैं । अतएव पितरों के साथ साथ " इनके सञ्चालक - श्रधिपति - जान्धितम - रुद्र देवता का भी सम्मान करना अनिवार्य बन जाता है । न केवल पार्थिवाग्निरूप रुद्रदेवता का ही सम्मान, अपितु इनके साथ साथ इनकी अवान्तर शक्तियों का भी सम्मान अनिवार्य बन जाता है, जैसा कि अनु-पढ़ में ही स्पष्ट किया जाने वाला है । अभी इस सम्बन्ध में वक्तव्य केवल यही है कि, विन्नपितर भी अन्नादपितरवत् ऋतुमर्यादा से, तथा षट् पितृप्राणमूर्त्ति चान्द्रपितरानुशयसम्बन्ध से पिता - पितामह -प्रपितामहादिरूप से षट्संस्थ ही हैं । पट्संस्थता दोनों में समान हैं । विशेषता दोनों में चन्द्रलोका-नुगता, भूलोकानुगता दोनों को पृथक् पृथक् प्रातिश्विक है । गृह्य वे भी हैं, गृह्य ये भी हैं । किन्तु वे तत्तन्नियत कालों में ही तद्वंशधरों के गृहों में श्रद्धानाड़ी के द्वारा सर्वथा नियतमार्ग से नियत समय से आते हैं, अनन्तर उस अवधि के भीतर भीतर स्वलोकात्मक चन्द्रलोक में परावर्तित हो जाते हैं, वे ' नित्यपितर ' कहलाए हैं, जिन से सम्बन्ध रखने वाले पार्वणादि श्राद्ध भी ' नित्यश्राद्ध ' कहलाए हैं । इधर ये भौमं पितर अनियमित कालों में तंदू शधरों के गृहों में श्रद्धा श्रश्रद्धा से उभयथा सर्वथा अनियतमार्ग़ से अनियमित समय पर आते रहते हैं, इसी पार्थिव गृहस्थान में अनियमितरूप से उभयतः - अमूल - श्रासुर - राक्षस - प्रारणवत् वायव्यशरीर से विचरण किया करते हैं, इस अनियमितता a. कारण ही पपातिक पार्थिव पितर ' अनित्यपितर ' हैं, जिन से सम्बन्ध रखने वाला पारिवारिक अनियमित काम्यमंगलाचारानुवन्धी अनियमित श्राद्ध भी ' अनित्यश्राद्ध ' ही कहलाया है । " ये ' काम्यपितर ' हैं, तदनुगत श्राद्ध ही ' काम्यश्राद्ध ' है, जिसे निबन्धग्रन्थों में ' वृद्धिश्राद्ध ' भी कहा है । महाहविर्य्याग एक काम्ययाग है, माहेन्द्रपदप्राप्तिपूर्वक शत्रुपराभव ही इस काम्ययाग का फल है । अत-एव काम्य महाहवियोग में ही इन अग्निष्वात्तादिलक्षण अन्नपितरों के ( काम्यपितरों के ) यजन का समावेश हुआ है । इन सब पारस्परिक विशेषताओं को अवधानपूर्वक लक्ष्य बनाते हुए ही इन उभय-विध ( अन्नाद्, तथा अन्न ) पितरों का स्वरूप समन्वय करना चाहिए । तीसरा विभाग ' प्रनुभयपितृवर्ग ' का है, जिसे ' सुकालीपितर ' कहा गया है, एवं जिन्हें ' शूद्रपितर ' माना गया है । द्विजातिप्रजातिरिक्त शूद्र प्रजा, किंवा शूद्रसधर्मा द्विजातिप्रजानुगत पारिवारिक व्यक्तियाँ हीं इनका अवैधविधि से यजन कर इन्हें यद्वातद्वारूपेण सन्तुष्ट करतीं रहतीं हैं । और यही त्रिविध पितरों का संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है, जैसाकि तालिकाओं से स्पष्ट है-* " यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिता " ( शत ० १४।६४२१ ) " अग्निर्वा रुद्रः । तस्यैते द्व े तन्वे घोरान्या च शिवान्या च " ( शत ० ४ । ३ । १ । १० ) । " मूलं वाऽइदमुभयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति ” ( शतः ३ | १ | ३ | १३ | ) | २०१

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श्राद्धविज्ञान ( १ ) नदपितरः - ( भोक्तारः ) - पिण्डपितृयज्ञानुगता नित्याचान्द्राः - शान्ताः षटूपितरः-चान्द्राः-नित्याः - अन्नादाः .... । ( ६ ) - वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः -- / सोमपाः ( २ ) ( ५ ) - अतिवृद्धप्रपितामहः --- श्राज्यपाः सोमपाः ( १ ) - लेपभाजश्चतुर्थाद्याः - श्राज्यपाः ( २ ) ( सोमाय पितुमते स्वाहा ) त्र्याज्यपाः ( १ ) ( ४ ) - वृद्धप्रपितामह: -( ३ ) ( ३ ) - प्रपितामहः ) -- हविर्भुजः ( २ ) ( २ ) - पितामह: -- हविर्भुजः । हविर्भुजः ( ३ ) - पिण्डभाजः ( ( १ ) ( १ ) -पित // -- हविर्भुजः ( अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा ) - पिण्डदस्तु सप्तमः - एषां यजमानः ( पुत्रः पिण्डपितृयज्ञानुष्ठाता ) ( शतपथब्राह्मणान्तर्गत- पिण्डपितृयज्ञानुष्ठाता ) -X -( २ ) - अन्न पितरः - ( भोग्याः ) - महाहवियगानुगता औपपातिकाः पार्थिवाः रौद्राः ( ३ ) – ( ६ ) -अनुशयात्मकः -- वृद्धातिवृद्धप्रपितामह: - बर्हिषदः } - वर्हिषदः ( १ ) (? ) - ( 8 ) 99 - प्रतिवृद्धप्रपितामहः / -- सोमसदः. -वृद्धप्रपितामहः --सोमसदः - सोमसदः ( २ ) - ( सोमायपितृमते -निर्वपतिः ) - अनित्या : - अन्नात्मकाः ( 3 ) - ( 3 ) -| ( 2 ) — ( 2 ) -( १ ) - ( १ ) -- प्रपितामहः, -अग्निष्वात्ताः - पितामहः, -अग्निष्वात्ताः -अग्निष्वात्ताः ( ३ ) " -पिता अग्निष्वात्ताः ( - पितृभ्यः सोमवद्भ्यो निर्वपति ) 19 - श्राद्धकर्ता सप्तमः - एषां - यजमानः ( पुत्रः - महाहविर्यागानुष्ठाता ) ( शतपथब्राह्मणान्तर्गते महाहवियोगे निरूपिताः ) X ---२०२