Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 271–280

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 271–280

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ३ ) - अनुभव पितरः- अनुभवविधाः - पुकालिनः - शूद्रपितरः - अवैध कम्र्मानुगता लौकिकाः । * सर्वसमष्टि: -( १ ) - १ - सोमपाः १- ( २ ) -२ - आज्यपाः ( ३ ) - ३ - हविर्भुजः X -- अन्नादपितरः - श्रौता: - चान्द्राः - नित्याः शान्ताः ( ४ ) - १ - बहिषदः - सप्त वै पितरः १२- ( ५ ) -२- सोमसदः ( ६ ) -३ - अग्निष्वात्ताः -- अन्न पितरः - श्रौतस्मार्त्ताः पार्थिवाः - श्रपपातिका: रौद्राः सर्वे ३ -- ( ७ ) -१ - सुकालिनः - अनुभयपितरः - लौकिकाः - विमूढाः - उत्पातरूपाः घोराः -X ( १ ) पूर्वपरिलेखों को अवधानपूर्वक लक्ष्य बनाइए, एवं तीनों पितृसंस्थाओं का यथावत् समन्वय कीजिए, तभी प्रतिज्ञात महासङ्गीत का यथानुरूप समन्वय हो सकेगा । नित्य - चान्द्र - शान्त - अन्नादपितरों आनृण्य प्राप्त करने के लिए, प्रजोत्पादन, सपिण्डीकरण, एवं पिण्डपितृयज्ञेतिकर्त्तव्यतानुगत पार्वण, क्षयाह, महालयादि नित्य श्राद्धकर्म्म, इन तीन ऋणमोचनोपायों का अनुगमन करना पड़ता है । ( २ ) अनित्य- पार्थिव - रौद्र अन्नपितरों से आत्मत्राण प्राप्त करने के लिए गयास्थान में स्मा-विधिपूर्वक ( कि स्मार्त्तविधि महाहविर्यागात्मिका काम्या श्रौतविधि के आधार पर सुव्यवस्थित है ) श्मशानपरिक्रमापूर्वक श्रद्धापूर्वक गया श्राद्ध, तत्तद्विशेष कामनाओं की पूर्ति के लिए विहित वृद्धिश्राद्ध, तत्तत्त् विशेष- विवाहादिमाङ्गलिकावसरों पर गृहदेवियों के द्वारा अनुष्ठेय रात्रिजागरणात्मक वागाहुति-प्रधान * ( लोकगीतप्रधान ) क्षीरान्नादियुत अन्न - वस्त्रादिद्वारा युक्त श्रद्धात्मककर्म्म, इन तीन ऋणमो-चनोपायों का अनुगमन आम्नायानुमोदित माना गया है । * " पितरो वाक्यमिच्छन्ति, भावमिच्छन्ति देवताः " । ' २-३

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श्राद्धविज्ञान ३ ) - लौकिक - विमूढ़ - पार्थिव - घोर अनुभयपितरों से परित्राण प्राप्त करने के लिए तपितरों के प्रतीकभूत चतुष्पथानुगत ग्रामदेवता - भूतदेवता -- भूतसत्त्वों को मान्यतापूर्वक सम्मानित किया जाता है । ( १ ) अन्नादपितरों के विरष्टसंधान के लिए वेदवित् ब्राह्मण को श्राद्धान्न से सन्तर्पित किया -जाता है । ( २ ) - अन्न पितरों की सन्तुष्टि के लिए तत्प्रतीकरूप अविवाहित पारिवारिक कुमार को पट्टा -रोहणसम्मान ( पाटे बैठाना ) - श्वेतवस्त्रप्रदान- तीरान्नादि श्वेतभोजनप्रदान आदि से सत् - कृत किया जाता है | एवं कृष्ण त्रिगत इन अनित्य तमोगुणप्रधान पितरों की अवान्तर मलीमस शक्तियों के सन्तर्पण के लिए रात्रिजागरण ( रातीजगा ) के दूसरे दिन विधवा स्त्री को वस्त्र - भोजनादि से सम्मानित किया जाता है । तथैव शुक्लरात्रिगत - चन्द्रिकाभुक्त सत्त्वगुणप्रधान पितरों की अवान्तर निर्मल शक्तियों के सन्तर्पण के लिए रात्रिजागरणान्तर सधवा पुत्रवती स्त्री को तदनुरूप वस्त्र भोजनादि से सस्कृत किया जाता है । ( ३ ) - अनुभय घोरपितरलक्षण भूतसत्त्वों के सन्तर्पण के लिए तत्प्रतीक-स्थानस्थित ( चतुष्पथ - चौराहा स्थित ) ग्रामदेवताओं के लिए, घोररवानुगत श्वान - काकों के लिए, . चिल्लों के लिए माषद्रव्य ( उर्द के बड़े आदि ) वा बलिविधान - दीपचतुष्टयी विधान ( चौमुखा दीया ) विहित है । इस समन्वयात्मक दृष्टिकोण को श्रद्धापूर्वक मूलाधार बनाते हुए अब दो शब्दों में प्रक्रान्त मध्यस्थ ( २ ) अन्न पितरों के उस परिवार के स्वरूप का भी उपवर्णन कर लीजिए, जिसका मूल श्रौत महा- ' हवियोग बन रहा है ।. प्रथम अन्नाद पितरों ( चान्द्रपितरों ) का भी परिवार है, सामान्य परिवार ही नहीं, बहुत बड़ा परिवार है, इतना बड़ा परिवार कि, जिस का विस्तार देख कर आप आश्चर्यविभोर हो जायँगे । तभी तो चान्द्रपितर को ' महान ' कहा गया है लोकसूत्र है कि, ' सो बड़ा जिस का परिवार बड़ा ' । चान्द्र-पितर स्वमहद्योनिरुप से लोकसृष्टि में जहाँ चतुरशीतिलक्ष ( ८४०००८ ) योनिरूप परिवार का अधि ठता है, वहाँ दाम्पत्यानुगत पारिवारिक सपिण्डता के अनुबन्ध से इस सापिण्ड्यभावप्रवन्त क चन्द्रपितर का द्वन्द्वात्मक ( दाम्पत्यभावात्मक ) परिवार शत - सहस्र परिवारों में फैला हुआ है, जिस का संक्षिप्त स्वरूप परिचय ऋणमोचनोपायोपनिषत् नामक प्रक्रान्त प्रकरण से आगे आने वाले ' आशौच-विज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रकरण में कराया जाने वाला है । यही तो इस चान्द्रपितरमहान् की महत्ता -बढ़ाना है । प्रकृत के गया श्राद्ध परिच्छेद में तो हमें द्वितीय मध्यस्थ अन्नपितरों ( पार्थिव पितरों ) के परिवार की ओर ही पारिवारिक मङ्गलकामनेच्छु श्रद्धालुओंों का ध्यान आकर्षित करना है, जिस पार्थिव पितरपरिवार के आधार पर पूर्वकथित ' गया श्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध, श्रद्धात्मककर्म्म ये तीन आत्मत्राणा-बन्धी श्रद्धानुबन्धी कर्म्म व्यवस्थित हुए हैं । ' पितरों का परिवार ' इस वाक्य में - ' पितर ' और ' परिवार ' ये दो शब्द अपना स्वतन्त्र मौलिक इतिहास रखते हैं । ' पितर ' शब्देतिहास जहाँ ' कार खेतिहास ' है, वहाँ ' परिवार ' शब्दे. २०४

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् तिहास ‘ कार्य्येतिहास ' है । मूलेतिहास प्रथमेतिहास है, तूलेतिहास द्वितीयेतिहास है । कार्य्यं का मूल ही ‘ पितर ' है, मूल का तूलरूप ही ' परिवार ' है । जिस तूलरूप से मूलदम्पती ( मातापिता ) चारों ओर से वेष्टित होते हुए केन्द्रभाव में परिणत हो जाते हैं, वही तूलभाव ' परिब्रियते अनेन ' निर्वचन से ' परि-. वार ' कहलाया है । इस परिवार के मूलपितर कौन, अन्नात्मक ( सोमात्मक ) पितरों का परिवार कौन, जिस से मूलपितर केन्द्रीभूत बन कर अपती ' पितर ' अभिधा को अन्वर्थ बना रहा है?, प्रश्न है । समाधान कीजिए संख्यातः सिद्ध अव्यक्तज्ञान ( सांख्यज्ञान ) परम्परा का आश्रय लेते हुए । जिस प्रकार भारतीय वैशेषिकदर्शन पार्थिवसम्वत्सरचक्रानुगत पञ्च महाभूतों की विशेषता को मूल बनाता हुआ वैकारिक - भौतिकसर्ग की तत्त्वमीमांसा अपना मुख्य प्रतिपाद्य विषय बनाता है, तथैव भारतीय सांख्यदर्शन चान्द्रसम्वत्सरचक्रानुगत त्रिगुणभावापन्न तन्मात्रभावों को मूल बनाता हुआ प्राकृतिक अव्यक्त सर्ग की तत्त्वमीमांसा अपना मुख्य प्रतिपाद्य मान रहा है । इस तत्त्वगणनात्मक संख्यानभाव से अनुप्राणित, अतएव ' संख्यातः सिद्धं ज्ञानं सांख्यम् ' निर्वचनानुसार ' सांख्यदर्शन ' नाम से प्रसिद्ध कपिलदर्शन ने जिस प्राकृतिक सर्ग की तत्त्वमीमांसा ( आचरणात्मिका आचारमीमांसा नहीं ) की है, सांख्यसम्मत वह प्राकृतसर्ग ही ' पितरपरिवार ' की मूलभूमिका मानी जायगी, एवं इसी तत्त्वमीमांसादृष्टि से इस परिवार का स्वरूप दिग्दर्शन मीमांस्य माना जायगा । " सम्वत्सरो वै सोमः पितृमान् " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १ | ६ | ८ | २ ) “ पितृलोकः सोमः " ( धौषीतकिब्राह्मण १६ । ५ । ) " पितृदेवत्यो वै सोमः " ( शत ० २ । ४ । २ । १२ ) “ सोमप्रयाजा हि पितरः " ( तै ० ब्रा ० । ६ । ६ । ५ ) इत्यादि निगम वचनों के अनुसार भास्वरसोममय ( तेजोमय-सोममूत्ति ) चान्द्रसम्वत्सरप्रजापति ही स्वसोमभाव से प्राकृतसर्ग का भूलप्रभव बनता हुआ ' पितर ' ( मूलपितर ) है, जिस के परिवार का हमें श्रद्धापूर्वक अन्वेषण करना है । चान्द्राकाश यहाँ पिता है, चान्द्राकाशसंलग्ना पार्थिव महिमा यहाँ माता है । यही वह प्राकृतिक दाम्पत्यभाव है, जिस के द्वारा चान्द्रसम्वत्सरात्मक द्यावापृथिव्यमण्डल में सांख्यसम्मत चतुद्दशविध भूतसर्ग प्रतिष्ठित है । ' स्तम्ब- से * सर्ग ' ( वृक्षादिसर्ग ) से आरम्भ कर ' ब्रह्मसर्ग ' ( देवयोनिसर्ग के अन्तिमसर्ग ) पर्यन्त पार्थिवधरातल चान्द्रमण्डल पर्य्यन्त व्याप्त ( १४ चौदह प्रकार का ) भूतसर्ग ही तथाकथित मूल चान्द्र पितर ( द्यावापृथिव्य -मूलदम्पतीलक्षण पितर ) की प्रजा, किंवा ' पितरों का परिवार ' है, जिस परिवार का सत्वविशालसर्ग, रजोविशालसर्ग, तमोविशालसर्ग, भेद से तीन भागों में वर्गीकरण हुआ है । चान्द्र महानात्मनिबन्धन त्रिगुणतत्त्वमीमांसक सांख्य ने निरिन्द्रिय ( जड़ - अचेतन श्रोषधिवनस्पति - धातूपधातु आदि लक्षण ) जड़ - अचेतन सर्ग को ' तमोविशालसर्ग ' कहा है, वही वहाँ का ' स्तम्ब ' ( मलसर्ग - आदिसर्ग ) है । पार्थिव धरातल पर इतस्ततः विचरणशील सेन्द्रियसर्ग ( चेतनसर्ग ) ही वहाँ ' रजोविशालसर्ग ' है, जिसे ' मध्य सर्ग ' भी कहा गया है, जिस के अवान्तर मुख्य क्रमसिद्ध ' कृमि - कीट- पक्षी - पशु - मनुष्य ' ये पाँच

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श्राद्धविज्ञान विभाग प्रसिद्ध हैं । चन्द्रमानुगत पार्थिवधरातल से आरम्भ कर महन्मूत्तिं चन्द्रमापर्य्यन्त क्रमसंस्थानरूप से व्याप्त २८ इन्द्रियों से युक्त देवयोनिसर्ग ही ' सत्त्वविशालसर्ग ' है, जिसे ' ऊर्ध्वसर्ग ' भी कहा गया है, जिस के अवान्तर मुख्य विभाग क्रमसंस्थानरूप से ' यक्ष - राक्षस - पिशाच - गन्धर्व - पितर- इन्द्र-• प्रजापति - ब्रह्म ' - इन आठ अभिधाओं से तत्र संगृहीत हैं । रात्रि, एवं चन्द्रिका ही इन की आवास-भूमि है । यही ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्तः - चतुद्द शविधो भूतसर्गः ' है । यहाँ यह सर्वात्मना अवधेय है कि, सांख्याभिमत चन्द्रानुगत इस प्राकृतसर्ग में संगृहीत पितर- इन्द्र - प्रजापति - ब्रह्म - चारों केवल चन्द्रानु-बन्धी ही हैं । चान्द्र भास्वर प्रजातन्तुप्रवर्त्त के पितर, आत्मानुगत इन्द्रतत्त्व, पारमेष्ठ्य प्रजापतितत्त्व, स्वा-यम्भुव ब्रह्मतत्त्व आदि अन्य सौरादि सर्ग: नबन्धन सर्गाधिष्ठाता उन पितर- इन्द्रादि से सांख्यानुगत पितर - इन्द्रादि का सर्वथा पार्थक्य है । चान्द्रसर्गानुगत पितर- इन्द्रादि भूतसर्गप्रवर्त्तक भूतप्रधान बनते हुए जहाँ मर्त्य हैं, वहाँ सौरादि अन्नाद पितर- इन्द्रादि प्राणसर्गात्मक देवसर्गप्रधान बनते हुए अमृत हैं, जिन का भूतवादी - त्रिगुणवादी सांख्य ने अपनी तत्त्वमीमांसा में स्पर्श भी नही किया हैं । एक प्रासङ्गिक नितान्त धेय दृष्टिकोण और मीमांस्य -सांख्य ने मनुष्य को मध्यसर्ग मानते हुए इसे रजोविशालसर्ग ( रजोगुणप्रधान ) कहा है । एवं इस मान्यता के साथ उसने कृमि कीटादि की गणना में मनुष्यसर्ग का परिगणन माना है । सांख्य की इस मान्यता का हम समादर करेंगे — मनुष्य की ' शरीरदृष्टिप्रधान भूतदृष्टि ' के आधार पर | शरीरात्माधिकरण - आत्मवादी यथाजात आत्मबोधवञ्चित मनुष्य वास्तव में पशुवत् भूतसर्गात्मक ही है । आत्मबोधानुगता वेदान्तनिष्ठा ( वेदान्तदर्शन - उपनिषनिष्ठा ) की दृष्टि से आत्मबोधानुगत मनुष्य का स्थान न केवल चान्द्रभूतसर्ग से ही श्रेष्ठ है, अपितु स्वयम्भू से आरम्भ कर पृथिवी पर्य्यन्त के समस्त विश्व -सर्ग के समतुलन में मानव श्रेष्ठ है, श्रेष्ठतर है, श्रेष्ठतम है, जैसा कि पुराणपुरुष की निम्नलिखित रह-स्वाणी से प्रतिध्वनित है-" गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि-न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित् " - महाभारत मान्यता है सिद्धिवादी तान्त्रिकों की ऐसी कि, मानव अमुकामुक दीक्षानुगत तन्त्र - प्रकारों के अनुगमन से देववर्गवत् सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है, जिन सिद्वियों का योगात्मक प्रकार योगदर्शन में बड़े आटोप से उपवर्णित माना गया है योगव्यासक्त समाधिपरायण सिद्धों की मान्यता में । अष्ट-सिद्धि, नवतुष्टि, ये १७ ऋद्धियाँ पूर्वोक्त अष्टविध यक्षराक्षस पिशाचादि देवयोनियों में सहज हैं, जिन्हें मानव तन्त्र पद्धति के द्वारा, किंवा योगमार्गद्वारा प्राप्त कर यक्ष - राक्षस - पिशाचादिवत् सिद्ध बन सकता है, जिस सिद्धि के अन्वेषण में आज का मानव यत्र तत्र अन्वेषण- परायण बनता हुआ स्वात्मबोधपथ से २०६

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् एकान्ततः लक्ष्यच्युत हो गया है । सिद्धियाँ नगण्य हैं परिपूर्ण मानव के आत्मबोध - समतुलन से, जो कि मानव प्रजापति विश्वेश्वरके नेदिष्ठ बनता हुआ - - ' ' पूर्णमदः पूर्णमिदम् ' को अन्वर्थ बना रहा है । ब्रह्मविद्यात्मिका देवविद्या के प्रवर्त्तक भारतीय नैगमिक मानव ( महर्षि ) के " ब्रह्मविद्यया ह वै सर्व भविष्यन्तो मनुष्याः ” इस नैगमिक उद्घोष के सम्मुख, सहज सिद्धियों के सम्मुख, निगमानुगता आम्नायमूला सिद्धियों के समतुलन में सांख्यसर्गाभिनिविष्ट - कृमि कीटादिसर्व समतुलित - रजोगुणा-· सक्तव्यासक्तमना यथाजात मनुष्य की सिद्धि कामना सिद्धिप्रदाता असुर - राक्षसादि भावापन्न चान्द्र-देवता, तद्व्यामोहक सिद्धिमार्ग के उपदेशक, सब कुछ सर्वात्मना हतप्रभ हैं, जैसा कि ' भारतीय हिन्दू-मानव की भावुकता ' नाम स्वतन्त्र निबन्धान्तर्गत ' मानवस्वरूपमीमांसा ' नामक परिच्छेद में विस्तार से प्रतिपादित है | अभिनन्दन कर रहे हैं हम भी उन सिद्धिकामुकों की मान्यता का निम्न लिखित शब्दों में- 1 प्रकृतेगु सम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्म्मसु । तान कृत्स्नविदो मन्दान - कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥ - गीता ३ । २६ । प्रकृतमनुसरामः । ‘ आ ब्रह्मभुवनाल्लोका पुनरावर्त्तिनः ' ( गीता ८ । १६ ) से लोकसंग्रह-धिया संगृहीत पूर्वदिग्दर्शित चतुर्दशविध भूतसर्ग ही चान्द्रदाम्पत्यात्मक मूल पितर का चान्द्रपरिवार है, यही अन्नात्मक पितरों का १४ प्रकार का परिवार है, जिस की मध्यस्थता से ही हम प्रतिज्ञात महा-सङ्गीत का समन्वय करने के लिए समुत्सुक हैं । २०७

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*** ( १४ ) ब्रह्म ( १ ) ( १३ ) प्रजापति: ( २ ) ( १२ ) इन्द्र: ( ३ ) ( ११ ) पितर: ( ४ ) १ - ( १० ) गन्धर्वः ( ५ ) ( ६ ) पिशाच: ( ६ ) ( ८ ) राक्षस: ( ७ ) ( ७ ) यक्षः ( = ) * ( ६ ) मनुष्य: ( १ ) ( ५ ) पशु: ( २ ) ( ४ ) पंक्षी ( ३ ) ( ३ ) कीट: ( ४ ) ( २ ) कृमि: ( ५ ) • * I श्राद्धविज्ञान - देवसर्ग: ( सत्त्वविशालः ) ऊर्ध्व सर्गः - अनुविधः भूतसर्गः ) मर्त्यः - ( : - चतुर्दशविधो द्यावापृथिव्य -चान्द्रसर्गः ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्तः - तिक्सर्ग: ( रजोविशालः ) मध्य सर्गः पञ्चविधः अनेकविध isc येकविधः २०६ सांख्यदर्शनानुगतश्चतुर्दशविधो भूतसर्गः ( चतुर्दशविधाः ध्यन्नपितरः मर्त्याः ) मूलसर्गः -( १ ) स्तम्बः ( श्रोषधिवनस्पतयः ) ( १ ) ( - भूतसर्गः ( तमोविशालः ) -चान्द्रसर्गानुगत देवसर्गानुबन्धी ब्रह्म - प्रजाप्रति आदि देवसर्गानुगत प्राणसर्गानुबन्धी - ब्रह्म - प्रज़ा-निगमवचन इसी पति आदि प्राणदेवों से पृथक् तत्त्व है, यह कहा जा चुका है । निम्न लिखित कतिपय कथन को प्रमाणित कर रहें हैं । देखिए!

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) -- चन्द्रमा वै ' ब्रह्म ' ( ऐत ० ना ० २।४१ ) । ( २ ) - असो वै चन्द्र: ' प्रजापतिः ' ( शत ० ६ २ २ १६ । ) । ( ३ ) - यन्मनः स ' इन्द्र: ' ( गोपथ ब्रा ० ७ । ४ । ११ । ) । तद्यन्मनश्चन्द्रमाः सः ( जै ० उ ० ब्रा ० ११२६ । ५ । ) । ( ४ ) - सोमप्रयाजा हि ' पितरः ' ( तै ० प्रा ० 7 । ६: ६ । ५ । ) । — ब्रह्म ( ८ ) - प्रजापति: ( ७ ) — इन्द्रः ( ६ ) - पितरः ( ५ ) - गन्धर्वः ( ४ ) ( तै ० ना ० ३ | ४ | ५ | ) | - पिशाचः ( ३ ) ( ५ ) - चन्द्रमा ' गन्धर्वः ' ( शत ० ६ । ४ । १ ॥ ) । ( ६ ) - यातुधानेभ्य. कण्डकाकारं - ' पिशाचेभ्यः ' विदलाकारम् - अथ यः कामयेत पिशाचान- गुणीभूतान् । सत्त्वविशाल सर्गः - अष्टविधः ( ८ ) ( सा ० वि ० ३७ ३ । ) । ( 0 ) — ' Taifa ' à qrar afau: ( dao aro IEIR ) - राक्षसः ( २ ) ( - आत्रेयश्चन्द्रमाः ) । ( ८ ) - अन्नं वै रूपम् ( नाम च ) ( शत ० ६ २१।१२ ) । - सोमो राजा अन्नं चन्द्रमाः - ( शत ० ८ | ३ | ३ | ११ | ) - नामरूपे वे ' यते ' ( शत ० ११ | २ | ३ | ३ | ) | - यक्षः ( १ ) ॥ ) ५।१५ पू ० ( गोपथब्राह्मण " सर्व्वम् वै " चन्द्रमा , -- चान्द्रः भूतसर्गः - त्रह्मादिस्मम्बपर्य्यन्तः-शविधः चतुद्द - यक्षं भवति रूपमेव ( शत ० ११ | २ | ३ | ४ | ) | ( ६ ) - चन्द्रमा ' मनुष्यलोकः ' ( जै ० उ ० ३ | १३ | १२ | ) । ( १० ) - असौ वै चन्द्रः ' पशु: ' ( शत ० ६ २ २ १७१ ) । ( ११ ) -यो ( पक्षी ) वै सुपर्ण: ' ( कौ ० २८ | ४ | ) | - चन्द्रमा सुपर्णो धावते दिवि - ( यजुः सं ) । ( १२ ) - चन्द्र ं प्राप्य - '- ' कीटाः पतङ्गाः ' ( शत ० १४६ ११६ । ( १३ ) - मनः ( चन्द्रमाः ) प्रजापतिः । आ ' कृमिभ्यः ' - तत्तेऽन्नम् ( बृ ० आ ० ६।१।१४ ) । - मनुष्यः ( ५ ) - पशुः ( ४ ) - पक्षी ( ३ ) - कीट: ( २ ) - कृमि: ( १ ) • रजोविशोलसर्गः - पञ्चविधः ( ५) * त ० सर्गः ( १ ) ( १४ ) - तदेतन्निदानेन यत् ' स्तम्ब ' यजुः । ( शत ० १ । २ । ४ । १२ । ) । * -स्तम्वः ( १ ) * “ नैनं रक्षो, न पिशाचो हिनस्ति, न जम्भको, नाप्यसुरो, न यक्षः । न सूचिका तस्य कुले -S स्य जायते, इरामणि बैल्वं यो बिभति " । - शाङ्खायनारण्यक १२।५ । २०६

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श्राद्धविज्ञान पितृमूत्ति द्यावापृथिव्य चान्द्र - सम्वत्सरप्रजापति ही ' पितर ' है, ब्रह्मादि स्तम्बपय्यन्त १४ प्रकार के भूत ही ( भूतप्रजा – “ प्रजा वै भूतानि ” ( शत ० २२४ | २ | १ | ) प्रजा पति के चौदह पुत्र हैं । सभी दाम्पत्यभाव से युक्त बनते हुए अपने अपने प्रातिश्विक ब्राह्म - प्राजापत्य - ऐन्द्र- पैत्रादि परिवारों के अधिष्ठाता बन रहे हैं, जिन सब का स्वरूप परिचय स्वतन्त्रनिबन्ध - सापेक्ष ही है 1 । पितरों के इस महा-महनीय भूतपरिवार की सामान्यसंज्ञा चान्द्रसोम के सम्बन्ध से होगी ' पितर ' । तभी तो इस भूतसर्ग -समष्टि को ' पितरपरिवार ' कहना अन्वर्थ बनता है । परिवार ध्यक्ष चान्द्रपितर पार्थिवाग्निसमतुलन-दृष्टया ' रुद्र ' कहलाया है । ' रुद्र ' नामक पार्थिवाग्न्यनुगत चन्द्रमा, किंवा चान्द्रमहपितर इसी महत-भाव से ' महादेव ' कहलाया है, जैसाकि निम्न लिखित श्रुति से प्रमाणित है -" प्रजापतिस्तं रुद्रं श्रब्रवीत् - ' महान् देवोसी ' ति । तद्यदस्य तन्नामाकरोत् चन्द्रमा-स्तद्रूपमभवत् । प्रजापतिर्वै चन्द्रमाः । प्रजापतिर्वै महान् देवः " । - शतपथ ६ । १ । ३१६ ।: जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण में - जिसमें कि नैगमिक वचनों का बड़ा ही रहस्यात्मक स्वरूप-विश्लेषण हुआ है - इस पितरमूर्त्ति चान्द्र महान् का आध्यात्मिक स्वरूप विश्लेषण हुआ है, जिसे आत्मबोधानुशीलनपरायण परिपूर्णपथारूढ सहज मानव के लक्ष्य से यहाँ प्रसङ्गधिया उद्धृत कर दिया जाता है, जिस की रहस्यपूर्णा व्याख्या अर्ध्यात्मजगत् में ही अन्वेष्टव्य है-" तद्ध शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणञ्च ( काक्षसेनिम् ) ब्राह्मणः परिवेविष्यमाणा-उपाववाज । तौह बिभिक्षे । तं ह नाऽऽदद्राते को वा को वेति मन्यमानौ । तौ होपजगौ-" महात्मनश्चतुरो देव एकः कस्य जगार भुवनस्य गोपाः । तं कापेय न विजानन्त्येकेऽभिप्रतारिन बहुधा निविष्टम् ॥ ” स होवाचाऽभिप्रतामं वा प्रपद्य प्रतिब्र हिति । इति । त्वया वा अयम्प्रत्युच्य इति । तं प्रत्युवाच -" आत्मा देवानामुत मर्त्यानां हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुः । महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यददन्तमत्ति ॥ " इति । " महात्मनश्चतुरो देव एक इति । वाग्वा अग्निः ( पार्थिव: ) । स महात्मा देव: । स यत्र स्वपिति तद्वाचं प्राणो गिरति । मनश्चन्द्रमास्स महात्मा ( महाना-२१०

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् त्मा ) देवः । स यत्र स्वपिति, तन्मनः प्राणो गिरति । चक्षुरादित्यस्स महात्मा देवः | सं यत्र स्वपिति, तच्चक्षुः प्राणो गिरति । श्रौत्रं दिशस्ता महात्मानो देवाः । स यत्र स्वपिति, तच्छत्रं प्राणो गिरति । तद्यन्महात्मानश्चतुरो देव एक इत्येतद्ध तत् । कस्स जगारेति । प्रजापतिर्वै कः ( अनिरुक्तः ) स हैतज्जगार । भुवनस्य गोपा इति । स उ वाव भुवनस्य गोपाः । तं कापेय विजानन्त्येके - इति । न ह्यतमेके विजानन्ति । अभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टमिति । बहुधा ह्यवैव निविष्टः- यत्प्राणः । आत्मा देवा-नामुत मर्त्यानामिति । आत्मा ह्येष देवानामुत मर्त्यानाम् । हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुरिति । न ह्येष सूनुः । सूनुरूपो ह्येष सन्न सूनुः । महान्तनस्य महिमानमाहु-रिति । महान्तं ह्य ेतस्य महिमानमाहुः । अनद्यमानो यददन्तमत्चीति । अनंद्यमानो ह्यषोऽदन्तमति । ( इनि न्वध्यात्मम् ) । देवो देव्या समध ( दाम्पत्यभावे परिणतः ) । तासां वा एतासां देवतानां द्वयो-द्वयोर्देवतयोर्नव - नवाक्षराणि सम्पद्यन्ते । एषोऽधिदेवतम् । एवं तस्मिन् सर्वमिदं सम्प्रोतं गन्धर्वाप्सरसः पशवो मनुष्याः " इति । ( जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण ) । से उपलक्षितचान्द्रसोमात्मक महत्पतर ( मर्त्यपितर ) पिता है, पार्थिव धरातल माता है, द्यौ पिता है, पृथिवी माता है, दोनों के दाम्पत्य से प्रसूत ब्रह्मादिस्तम्बपर्य्यन्त १४ रौद्र चान्द्र प्रजा-सर्ग है, यही ' भ्रातृसर्ग ' है. एवं इन से समतुलित द्यावापृथिव्य प्राणशक्तियाँ ' स्वसृसर्ग ' ( भगिनीसर्ग ) है । १४ भ्राता, १४ भगिनियाँ, सम्भूय २८ सन्ततियाँ ( भाईबहिन ) द्यावापृथिव्य चान्द्रसम्वत्सराकाश में ( इसी से उत्पन्न होकर ) विचरण कर रहीं हैं । सापिण्ड्यपितृवंश की भाँति इन भाई - बहनों के भी स्व-तन्त्रवंश वितत होते हैं, जं. भूतसर्ग का एक कौतूहलपूर्ण रहस्यात्मक विषय माना गया है । ब्रह्मादि-भ्रातृवर्ग से दाम्पत्यभावयुक्ता सर्ग पत्नियाँ ' साम्राज्ञी ' कहलाई ' हैं, जिन्हें लोकानुबन्धी महासंगीत में ' महाराणी ' कहा गया है । ब्रह्मादि भ्राताओं की प्राणशक्तिरूपा बहिनों में से कुछ एक तो दाम्पत्यभाव से ' युक्त होकर भूतसर्ग में सहयोग प्रदान करतीं है, एवं कुछ एक दाम्पत्यभाव से संस्पृष्ट बनीं रह कर भूतसर्ग में विघ्नपरम्परा का सर्जन किया करतीं हैं । चौदह भ्राताओं की चौदह बहिनों के इस दृष्टिको से ७-७ के दो श्रेणिविभाग हो जाते हैं । ब्रह्म - प्रजापति - इन्द्र - पितर- गन्धर्व्व - यक्ष- मनुष्य, इन सात भूतसर्गों की ( भ्राताओं की ) सात बहिनें तो शुक्लचन्द्रानुगता रात्रि को ( शुक्लपक्ष को ) अपना आवास बनाती हुई दाम्पत्यभाव से युक्त हैं, यही सप्तस्वसा - समष्टि ' शुक्लस्वस्वा ' कहलाई हैं । एवं पिशाच राक्षस-पशु - पक्षी - कीट - कृमि -स्तम्ब - इन सात भूतसर्गों की ( भ्राताओं की ) सात बहिनें कृष्णचन्द्रानुगता रात्रि ( कृष्णपक्ष ) को अपना आवास बनातीं हुई दाम्पत्यभाव से वञ्चित हैं, सर्गस्वरूपविघातिका निऋति-२११

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान देवता- ( दरिद्रताप्रवर्त्तक नैऋतको स्थित विध्वंसक सर्वस्वापहारक घोरतम याम्यप्राणदेवता ) - सम-तुलता हैं, यही सप्त स्वसासमष्टि " कृष्णस्वस्वा " कहलाई हैं । महासङ्गीतात्मिका लोकभाषा में ब्रह्माद्य-नुगता शुक्लस्वस्वाओं को ' ऊजली सात भैंगाँ ' ( शुक्लसप्तस्वसा ) कहा जाता है, एवं पिशाचाद्य-गता कृष्णाओं को ' मैली सात भैंगाँ ' ( कृष्ण सप्तस्वसा ) कहा जाता है । यही स्थिति ब्रह्मादि-स्तम्बपर्यन्त वितत चतुर्दश भ्रातृवर्ग के साथ समतुलित है, जो ' ज्येष्ठभ्राता ' कहे जायँगे I । प्राकृतिकस चन्द्रद्यावापृथिव्य पितर से सर्वप्रथम ब्रह्मादि चतुर्दशभाव व्यक्त होते हैं, तदनन्तर इनकी स्वस्वरूप समतुलिता चतुर्दश प्राणशक्तियाँ अभिव्यक्त होतीं हैं । अतएव चतुद्दश भ्रातृवर्ग को ' ज्येष्ठ ' कहा जायगा, एवं चतुद्दश स्वसृवर्ग को ' कनिष्ठ ' माना जायगा । छोटी भगिनी लिए ही ' स्वसा ' शब्द नियत है, जो लोक में अपने ज्येष्ठ भ्राता की पत्नी ( भावज - भोजाई - भाभी ) की ननान्द्री | ( ननद- नणद -नणदोली - नणदल ) कहलाई है । सङ्गीतभाषा में इसी ज्येष्ठ - कनिष्ठ भावानुबन्ध से ब्रह्मादि ' तू पितरों को ' दादाभाई ' ( बड़ा भाई - ज्येष्ठ भ्राता ) कहा जाता है, और इस सम्बन्ध में ऐसी मान्यता है कुलदेवियों की कि, जब किसी पारिवारिक बालक, अथवा तो स्त्री पर पितृदोष का आक्रमण हो जाता है, तन्निराकरणार्थ जब ये देवियाँ रात्रिजागरणादि लोकानुष्ठानों के द्वारा सर्वप्रथम भगिनीवर्ग ( जोकि इनकी प्रान्तीयभाषा में - ' मावली ' नाम से प्रसिद्ध हैं ) को सन्तुष्ट कर इन से यह जानने का मान-सिक संकल्प इनके सम्मुख परोक्षरूप से श्रद्धापूर्वक अभिव्यक्त करतीं हैं, तो कबन्ध अथर्वा की भाँति पर-कायप्रवेश - द्वारा यह स्वसृवर्ग पितृदोषाक्रमण ( मूलदोषाक्रमण ) का कारण स्वयं बतला देतीं हैं । यदि वह कारण - स्वरूप इनकी अपनी सीमित प्राणशक्ति से बहिर्भूत रहता है, तो ये परकायप्रवेश द्वारा उस समय यह आश्वासन प्रदान कर अन्तहित हो जाती हैं कि - " हम दादाभाई - ( ज्येष्ठ भ्रातृवर्गात्मक ब्रह्मादि पितरों ) से पूछ कर तुम्हें इस दोषाक्रमण का कारण बतला सकेंगी " - " दादाभाई से पूछर थानें पाछे बतवला " - आदि प्रान्तीय प्रचलित व्यवहार वास्तव में बड़ा ही रहस्यपूर्ण माना जायगा, जिसे केवल पोथी का पंडित व्याख्या सहस्रों से भी तबतक इस लोकश्रद्धात्मक व्यवहारकाण्ड का श्रद्धापूर्वक समन्वय नहीं कर सकता, जब तक कि वह स्वयं इस महासंगीतभाषा का अनुगामी नहीं बन जाता । जैसा कि कहा गया है, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त चतुर्दशविध ज्येष्ठ भ्रातृवर्ग में भी ७-७ के दो ही सप्तक प्रधान हैं । ब्रह्म - प्रजापति - इन्द्र - पितर- गन्धर्व - यक्ष- मनुष्य, यह प्रथमसप्तक तो शुक्लचन्द्रा-गता रात्रि ( शुक्लपक्ष ) को अपना आवास बनाते हुए दाम्पत्यभावानुगति से विश्वसर्ग के संरक्षक बना रहता है, एवं पिशाच - राक्षस - पशु - पक्षी - कीट - कृमि -स्तम्ब, यह द्वितीय सप्तक कृष्णचन्द्रानुगता रात्रि ( कृष्णपक्ष ) को अपना आवास बनाते हुए नियत वैध दाम्पत्यभावानुगति से वञ्चित रहता हुआ अनियमित स्खलन प्रक्रियाओं को चरितार्थ करता हुआ विश्वसर्ग का विध्वंसक बना रहता हैं । दोनों भ्रातृसर्गसुप्तक दोनों स्वसृसर्गसप्तक से समतुलित हैं । ठीक यही समतुलनभाव भ्रातृसप्तक द्वय की २१२