Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 281–290

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 281 का मूल पृष्ठ
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् वैध - अवैध चतुर्दश पत्नियों में समन्वित समझना चाहिये, जिन्हें पूर्व में ' साम्राज्ञी ' कहा गया है, जो संगीतभाषा में ' महाराणी ' कहलाई हैं । ब्रह्मादि - मानवान्त प्रथम सप्तक का सप्त वैध पत्नीवर्ग ' साम्राज्ञी ' कहलाएगा, एवं पिशाचादि स्तम्बान्त द्वितीय सप्तक का अवैध उपपत्नीवर्ग निगमभाषा में ' निऋ ' ति ' कहलाएगा, तन्त्रभाषा में ' धूमावती ' ' कहलाएगा, लोकभाषा में ' विधवा ' कहलाएगा । इन लोकमान्यताओं का मूल सर्वात्मना निगमशास्त्र ही बना हुआ है । कहाँ, कैसे?, अन्वेष्टव्यम् । अन्वेषण कीजिए श्रद्धापूर्वक, स्थानुगता विधि को मूल बना कर, अश्रद्धानुगता ' निषेधभाषा ' ( नहीं है, नहीं मानते ) को सर्वात्मना विस्मृत करते हुए । तदैव महती सम्भूतिः । अन्यथा तु महती विनष्टिः । तथोपवर्णित चान्द्र- द्यावापृथिव्य - पितरपरिवार की सामान्य संज्ञा है - ' पितर ', जिनका - पूर्व विश्लेषणानुसार सप्त - सप्त भेद से शुक्ल - कृष्णरात्रियों ( शुक्लकृष्णपक्षात्मक चान्द्रमासमण्डल ) में ही आवास निवास है, जैसा कि निम्नलिखित निगमवचनों से प्रमाणित है । ( १ ) - तमसः पितृलोकादादित्यं ज्योतिरभ्यायन्ति ( शत ० १३ । ६ । ४ । ६ । ) । ( २ ) - रात्रिः पितरः ( शत ० २।१।३।१ । ) । ( ३ ) - तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्यः ( परोक्षाः ) ( शत ० २ । ४ । २ । २ । ) । १ ) - स्वधा वः, मनोजवो वः, चन्द्रमा वो ज्योतिः ( शत ० २ । ४ । २ । २ । ) । * ( ५ ) - ये यज्वानो गृहमेधिनो पितरोऽग्निष्वात्ताः ( तै ० ब्रा ० १२६ | ६ | ६ | ) । * ( ६ ) - मर्त्याः पितरः ( गृहमेधिनोऽयज्वानः ) - ( शत ० २ ११३ । ४ । ) । ( ७ ) - सर्वतः पितरः ( शत ० २।६।१।११ । ) । * ( ८ ) गृहाणां हि पितर ईशते ( शत ० २२६ | १ | ४२ | ) औपपातिक सौम्य पितर का प्रतीक जहाँ पारिवारिक अविवाहित असंस्कृत ( यज्ञोपवीत संस्कार जिस का नहीं हो गया हो, वैसा ) कुमार है, वहाँ पितृस्वसा की प्रतीक सधवा पुत्रवती स्त्री, * उक्त निगमानुबन्धी ' पितर ' वे श्रपपातिक मर्त्य - श्रयज्वान ( जिनके लिए पिण्डपितृयज्ञवत् आहुति नहीं दी जाती ) पितर हैं, जो चतुद्दशविध चान्द्र मर्त्य भूतसर्ग से सम्बन्धित हैं | सापिण्ड्या -, नुगत पितर यज्वान हैं, अहरनुगत हैं, अमृतभावापन्न हैं, जो मर्च्य रात्रिपितरों से सर्वथा विभिन्न हैं ' जैसा कि - " तृतीये हि लोके पितरः " ( ० ० ६५ ) - " गृहाणां ह पितर ईते " ( शत०-२४.२ २४ - " देवा वा एते पितरः " ( कौ ५६ । ) - " एतद्ध वै पितरो मनुष्यलोकेऽन्वाभक्ता भवन्ति यदेषां प्रजा भवति " ( शत ० १३ | १६ | ) " तद्यदमृतं सोमः सः ( सोमः पितरः ) " ( शत ० ६ | ५ | ( १८ ) इत्यादि निगम वचनों से प्रमाणित है । २१३

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श्राद्धविज्ञान तथा विधवा पुत्रवती स्त्री मानी गई है । रात्रि जागरणानन्तर दूसरे दिन क्षीरान्नादि से उस कुमार का, एवं इन दोनों स्त्रियों का वस्त्र - भोजनादि द्वारा सम्मान किया जाता है । प्रान्तीय लोकगीत -: परिभाषानुसार तथाविध कुमार ' कँवारा छोरा ' है, तथाविध दोनों स्त्रियाँ ' गोरणी ' ( गोस्थानीया शुक्लस्वसा सप्तक - प्रतीकभूता पुत्रवती सधवा, कृष्णस्वसासप्तक - प्रतीकभूता अपुत्रा विधवा ) क्रमशः ' उजली, मैली ' कहलाई हैं । इस लोकाम्नाय को आप तब मान्यता प्रदान करेंगे, जब कि निगमशास्त्रमें भी कहीं ऐसा विधान विहित हुआ हो । ठीक है । निगममहर्षि आप की यह जिज्ञासा पूरी करें, यही कामना है | हमने तो इस सम्बन्ध में यह आम्नायमूल सुन रक्खा है निगमतत्त्व याख्याता आचायों. से कि-' राज ' पद प्राप्तिमाधक ' राजसूयब्राह्मण ' की इतिकर्तव्यता का अनुगमन करता हुआ शास्ता. क्षत्रिय राज्यतन्त्र सञ्चालक सेनानी - पुरोहित - सूयमान - राजमहिषी ( पट्टराज्ञी ) - सूत - आदि १४ रत्नों को अपने अनुगत बनाने के लिए इनके आवास स्थानों में स्वयं ऋत्विजों के साथ जा जा कर क्रमशः ' अग्नये अनीकवते अष्टाकपालं पुरोडाशम् ' - ' बार्हस्पत्यं चरुम् ' इत्यादि विभिन्न होमों का अनु-ष्टान करता है । इस रत्नहोमानन्तर दूसरे दिन राज्यलक्ष्मी - राज्यश्री की महती प्रतिबन्धिका कृष्ण-भावापन्ना निर्ऋति से राज्यश्री को सुरक्षित रखने के लिए ' नैऋतं चरु ' निर्वपति ' । इस नैर्ऋत चरु-निर्वाक की प्रतीक मानी गई है - ' परिवृत्ती ' । अपुत्रा स्त्री ही परिवृत्ती है । वास्तव में यह कर्म में, अभ्युदयसाधक कर्म में प्रवृत्त कराने की अपेक्षा निवृत्त कराती हुई ' परिवृत्ती ' है । यही इस का भाव है । इस प्रतीक के अतिरिक्त कृष्णवर्णप्रधान ब्रीही, कृष्णा गौ, नखामद्वारा कृष्णत्रीही का वितुषीकरण- आदि सब कृष्णभाव - मलीमसभाव निर्ऋति के ही प्रतीक हैं । क्या श्रुति का एवंविध प्रतीक भाव पूर्वोक्त लोकाम्नाय का मूल नहीं बन सकता?, मनन कीजिए श्रुति के लोकाम्नायमूलक निम्नलिखित अक्षरों का -' अथ श्वोभूते परिवृत्यै गृहान् परेत्य नैऋ तं चरु निर्वपति 1 । या वा अपुत्रा-सा परिवृत्ती । स कृष्णानां ब्रीहीणां नखैर्निर्भिद्य तण्डुलान ऋतं चरु श्रप-यति । या वा अपुत्रा, सा निऋ तिगृहीता । तदेवैतच्छमयति । तथो हैनं सूयमानं ( राजानं ) नि तिर्न गृह्णाति । तस्य दक्षिणा कृष्णा गौः परिमृर्णी पर्यारिणी सापि निऋतिगृहीता " इत्यादि । - शतपथ राजसूयब्राह्मण ५ । ३ । १ । १३ । मलीमसभाग - प्रवर्ग्यभाग- उच्छिष्टभाग - परित्यक्तभाग- ऊसरभाग-- रूक्षभाग आदि आदि.. समृद्धिविरोधी सम्पूर्णभाव निर्ऋति के ही प्रतीक माने गए हैं । इसी आधार पर तन्त्रशास्त्रानुगता २१४

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् निति - प्रतीकभूता धूमावती नाम की महाविद्या का यशोगान हुआ है इन शब्दों में - " विधवा - विरल-द्वजा - धूतहस्ता - शूर्पहस्ता- उन्मुक्तकेशा - कागध्वजरथारूढा - इत्यादि ( वह विधवा है, दाँत उसके छितरे हैं, हस्त उसके अशुभ मुद्रा से कम्पित हैं, छाजला उसके हाथ में है, रथ उस का भग्न है, का उ के रथ की ध्वजा है — इत्यादि ) । नक्षत्रों में मूलनक्षत्र निर्ऋति का प्रतीक है ( तै ० ना ० १ । ५! १४ ) । पृथिवी का ऊसरग्रदेश ( जहाँ कृषि नहीं हो सकती ), बड़ी बड़ी दरा, बंजड़ भूप्रदेश, आदि पार्थिवप्रदेश निर्ऋति के प्रतीक हैं । श्वान - काक- गृद्ध आदि अशुभ प्राणी इसी के प्रतीक हैं । रिक्तघट - छाणा-छक्का - आदि इसी के प्रतीक हैं । उष्णीशशून्य मस्तक, मलयुक्त शरीर, जीर्णवस्त्रादि इसी के प्रतीक हैं । निष्कर्षतः पिशाच - राक्षसादि - निबन्धन सम्पूर्ण मलीमसभाव निर्ऋति ' के ही प्रतीक हैं-' पाप्मा वै निर्ऋतिः ' ( शत ० ७ | २ | १ | १ | ) | उन आम्नायप्रमाणाभिनिविष्टों को सन्तुष्ट होना ही चाहिए इस निर्ऋतिस्वरूपातिथ्य से । पिशाचादि - स्तम्बान्त सप्त मलीमस भ्रातृवर्ग की सप्त मलीमस स्वसृवर्ग की प्रतीक निर्ऋति लक्षणा ( दरिद्रा - ज्येष्ठा - मूलानुगता - धूमावती - अलक्ष्मी भावापन्ना ) विधवा नारी ( मैली गोरणी ) के नैमिक आम्नाय प्रामाण्य के सम्बन्ध में निर्ऋतिचरु - यागानुगता अपुत्रा परिवृत्ती का स्वरूप विश्ले-षण किया गया । अब प्रश्न उपस्थित हुआ ब्रह्मादि मनुष्यान्त सप्त सात्त्विक भ्रातृवर्ग की सप्तसत्त्व-भावापन्ना स्वसाओं की प्रतीकभूता सधवा नारी ( ऊजली गोरणी ) के नैगमिक आम्नाय प्रामाण्य के सम्बन्ध में । पतिपुत्रयुक्ता संघवा - सौभाग्यवती वीरा पत्नी ही इस आम्नाय का आधार है । चिह्नप्रतीक-रूप से दरिद्रा की प्रतिद्वन्द्विनी लक्ष्मी, नक्षत्र प्रतीकरूप से ज्येष्ठा नक्षत्र की प्रतिद्वन्द्विनी रोहिणी, तन्त्रानुगता धूमावती की प्रतिद्वन्द्विनी कमला, इन सब मङ्गलभावों की प्रतीकभूता नारी - सधवानारी वास्तव में सत्त्वभावापन्ना सप्त स्वसाओं की प्रतीक बन रही है, जो पैत्रसर्ग से सर्वात्मना समतुलित है | लक्ष्य बनाइए निम्न लिखित श्रौत वचनों को इस आम्नाय - प्रामाण्य के समर्थन के लिए-( १ ) श्रिया वा एतद्र पं - यत् पत्न्यः ( तै ० ३ । ६ । ४ । ७–८ | ७ ( * ) श्री सोमः ( शत ४ । १ । ३ । ६ । ) ( २ ) गृहा चै पत्न्यै प्रतिष्ठा ( शत ० ३ । ३ । १ । १० । ) ( * ) गृहाणां हि पितर ईशते ( शत ० २२६ | १ | ४२ | ) ( ३ ) अन्तभाजो वै पत्न्यः ( कौ ० १६ । ७ । ) । ( * ) श्रन्तभाजो वै पितरः ( कौ ०१६ ॥ ) । क्रमप्राप्त ' कुमार ' से सम्बन्धित आम्नाय - प्रामाण्य का भी नैगमिक समर्थन प्राप्त कर लीजिए । सधवा पत्नी, विधवानारी, कुमार, तीनों इस रात्रिजागरणानुगत औपपातिक पितर के प्रतीक २१५

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श्राद्धविज्ञान बनते हुए भोजन वस्त्रादि द्वारा सम्मान्य हैं, यह कहा जा चुका है । उभवविध स्त्रियाँ जहाँ उभयविध स्वर्ग की नानुमोदिता प्रतीक हैं, वहाँ उभयविध भ्रातृवर्ग का प्रतीक माना गया है पारिवारिक विवाहित कुमार ( घर का कँवारा लड़का ) । इसलिए कि चतुर्दशविध भूतसर्गात्मक भ्रातृवर्ग रुद्रात्मक है | एवं रुद्रभाव की साक्षात् प्रतिमा मानी गई है ' कुमार ' । बालक जैसे क्षणे तुष्ट -क्षणे रुष्ट है, तथैव रुद्र भी । तभी तो यजुः संहिता में इसके लिए ' उभयतो नमस्कार ' विहित हुआ है । अग्निचयनविद्या में जहाँ प्रजासर्ग का स्वरूप प्रतिपादित हुआ है, वहाँ रुद्ररूप से ही उत्पन्न शिशु का स्वरूपविश्लेषण. हुआ है ( देखिए - शत ० ६ | १ | १ | प्रथम ब्राह्मण ) । इसी आधार पर रुद्र का नवमरूपात्मक कुमार ' रुद्रपुत्र ' माना गया है ( ऋक् सं ० २१ ) । ' यदरोदीत् तस्मात् - स कुमारः - रुद्र: ' ( शत ० ६ | १ | ३८ | १० | ) श्रुति स्पष्ट ही कुमार का रुद्रत्त्व प्रमाणित कर रही है । नक्षत्रों में रुद्र का प्रतीक कृत्तिका नक्षत्र है, जिसके षट्तारका ' षट्कुमार ' कहलाए हैं । ऋतुओं में षऋतुसमष्टि रुद्र का प्रतीक है । अतएव षड्-ऋतु समष्टि को ' षट्कुमार ' माना गया है - ( महाभारत - आदिपर्व - ३ | १४४ | ) | “ तानीमानि भूतानि -( ऋतवः ) च भूतानाच पति: ( रुद्रः ) सम्वत्सरे उपसि रेतोऽसिञ्चत् । स सम्वत्सरे कुमारो -ऽजायत । सोऽरोदीत् । तस्मात् - रुद्रः ( कुमारः ) " ( शत ० ६ | १ | ३ | १० | ) स्पष्ट है । रुद्र पितृसमष्टि-रूप ( चतुद्दशविधपितृसर्गसमष्टिरूप ) है, x पितर षड्ॠतुरूप है, मनोमय है, सोमप्रधान है । कुमार इन सब पैत्रसर्गों का समष्ट्यात्मक प्रतीक है । अतएव इसे प्रतीकविधा से सम्मानित करना श्राम्नाया-मोदित बन रहा है । " चान्द्ररुद्रात्मक चतुर्दशविध दूतसर्ग ' भ्रातृवर्ग ' है, तत्पत्नियाँ साम्राज्ञी हैं, तत्- अवान्तर प्रारण-शक्तियाँ १४ भागों में विभक्त हैं, और ये ' स्वसा ' ( बहिनें ) हैं " इस भ्रातृभगिनी सम्बन्ध से सर्वथा fare से नैमिक मूल अभी तक समुपस्थित नहीं कर सके हम करते भी कहाँ से, जब कि यह - केवल हमारे श्रद्धान का क्षेत्र है । मान्यता ही तो है ऐसी हमारी । किन्तु श्रद्धाशून्य अभिनिविष्ट तो ऐसी ' अन्ध ' मान्यताओं के समर्थक नहीं बन सकते । वस्तुगत्यातु पितृकर्म्म लोकानुबन्ध मान्यतानुगामी रात्रि जागरणात्मक -महासङ्गीतात्मक ( लोकगीतात्मक ) बनता हुआ न श्रोत्र रखता, न चक्षु रखता । न हम इस अन्धश्रद्धा क्षेत्र में ( पितृश्रद्धा क्षेत्र में ) कुछ तर्क वितर्क सुनना चाहते, न ऐसी व्याख्यात्मिका बुद्धिष्ट का ही अनुगमन करना चाहते । यही नहीं, हम तो इस दिशा में साभिनिवेश यह मान्यता अभिव्यक्त करने में भी अपनी श्रद्धा किंवा अन्धश्रद्धा को गौरवान्वित ही अनुभूत कर रहे हैं कि, जैसे * ' षड्वा ऋतवः पितरः ( शत ० ६ ४ ३ ६ ) - ' मनः पितरः ' ( शत ० १४।४।३।१३ ) -' सोमयाजा हि पितरः ' ( तै ० ब्रा ० ११६६५ ) ' पितृदेवत्यो हि सोमः ' ( शत ० २।४।२।१२ ) -' यद्रुद्रश्चन्द्रमास्तेन ' ( कौ ० ६७ ) ' तस्मात् स कुमारो रुद्र: ' ( शत ० ६ | १ | ३ | १० | ) इत्यादि । २१६

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ऋणमोचनोपायोपनिषत हम हैं, वैसे ही हमारे पितर हैं । यदि हमारे कान - आँख नहीं हैं, हम यदि बधिर और अन्ध हैं, तो हमारे पितर भी तथाविध ही होंगे । रात्रिजागरणात्मक यह भौतिक पितृकर्म्म शरीरानुबन्धप्रधान है । यहाँ मनोऽनुवर्त्तिनी श्रोत्रेन्द्रिय, तथा चतुरिन्द्रिय से अनुगत श्रुति - दृष्टि का समावेश करना सहज मूल-स्वरूप का विरोध ही करना है । वे आजाय, उन्हें हम तृप्त करदें, इससे हमारा मन भर जाय, बस भूत निबन्धना पितृकर्मेतिकर्त्तव्यता यहीं समाप्त है । ' शृण्वन्तः पश्यन्तः ' भावानुगता बुद्धिगम्य व्याख्या का प्रवेश इस पितृश्रद्धाक्षेत्र में एकान्ततः वर्ज्य उपेक्षणीय ही माना जायगा । तभी तो महासङ्गीत की भाषा - भोमियाजी धाानें दीखोजी, बहरा ह्मानें दीखोजी ' ( हे भौम पार्थिव पितरो! हम उपा-स्याओं के लिए तो आप भी हमारी भाँति श्रुति - दृष्टि से कोई सम्बन्ध न रखते हुए केवल श्रद्धा के ही ? अनुगामी हैं ) यह भाव अभिव्यक्त हुआ है, जिसकी मीमांसा तत्रैव षष्ठ महासङ्गीत की पावन स्मृति के अवान्तर विकल्पात्मक महासङ्गीत में समन्वित होगी । किन्तु आप तो - ' अक्षरवन्तः कर्णवन्तः सखायः ' जो हैं । आप तो सुनना भी चाहेंगे, सुन कर देखना भी चाहेंगे । तदन्तर भी श्रद्धाक्षेत्र से आप अभिनिवेशानुग्रह से सर्वथा बहिष्कृत ही रहेंगे । सुन लेंगे, देख लेंगे, समझ भी लेंगे, अपने अन्तःकरण में | किन्तु सर्वथा घातक - नितान्त कल्पित-व्यक्तिप्रतिष्ठा के व्यामोहन से न तो कुछ मानेंगे हीं, ओर न कुछ करेंगे हीं । अस्तु इस दिशा में भी इच्छा न रखते हुए हम तो अपना कर्त्तव्यपालन कर ही लेते हैं । आप - ' यथेच्छसि तथा कुरु । कथनमात्र के लिए ' अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः ' भक्त, घोषणामात्र के लिए वेदानुगामी, परप्रता-रणामात्र के लिए यज्ञपथानुसारी उन अभिनिविष्ट निगमभक्तों का ध्यान इस दिशा में हम पूर्वप्रति-ज्ञात ' महाहवियोगात्मक काम्ययाग के कुछ एक प्रासङ्गिक विशेष स्थलों की ओर आकर्षित कर देना हीं पर्याप्त मान रहे हैं । जो संग्राम में शवशरीर का परित्याग कर प्रतभाव ( प्र ेतयोनि - भौमयोनि ) में परिणत हो गए हैं, वे ही ' पितर ' महाहविर्वाग में संग्रहीत हैं ( शत ० २ । ५ । ६ । १ । ) । इस महा-विर्यागाङ्गभूत इस प्रेतपितृयजनकर्म्म [ काम्यकर्म ] से यजनकर्त्ता के नृशंशधर्म से, अथवा तो प्रकृत्या मारे जाकर - मरकर प्रेतपितर बनते हुए इसे उत्पीडित किया करते हैं, वह क्षतिपूर्ति हो जाती है । यही इस काय पितृकर्म का फल है ( शत २ । ५ । ६ । ३ । ) । इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए इस कर्म्म में ( अन्नात्मक ) ‘ सोमवत् ' नामक पितरों के लिए षड्ऋतु के सम्बन्ध से ( तथा षपितृपरम्पराके षट् अनुशय के सम्बन्ध से ) ' षट्कपालपुरोडाश ' का निर्वाप होता है । ' बर्हिषत् ' नामक अन्नपितरों के लिए आधे पिसे हुए ' धान ' का सम्पादन होता है । एवं ' अग्निष्वात्ता ' नामक अन्नपितरों के लिए नूतनप्रसूता ( प्रथमप्रसूता पहलून ) ‘ निवानी ' गौ के दुग्ध में सकृदुपमथित एकशलाका से सम्पन्न ' मन्थः ' -- द्रव्य - इस ' मन्थ शब्द के इतिहास में पुराणपुरुषद्वारा ( भगवान् व्यास ) प्रतिपादित ' समुद्र मन्थनारूक ' रहस्यपूर्ण ‘ सृष्टि - इतिहास ' गर्भीभूत है । समुद्रमन्थन से उत्पन्न चतुर्द्दश रत्नों में से २१७

पृष्ठ 286

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श्राद्धविज्ञान सम्पन्न किया जाता है । जिन पितरों को ( शवदाह के समय ) रूद्रमूर्त्ति ' श्मशा ' नामक क्रव्यादाग्नि स्वाद-पूर्वक अपना बनाता है, वे अन्नपितर ही ' अग्निष्वात्ता ' कहलाए हैं । यही इन पितरों का स्वरूप-परिचय है ( शत ० २ । ६ । १ । ४, ५, ६, ७, ८, ) । पितर अपने सहज सौम्यरूप से ( सोमधर्म से ) दक्षिणदिशा का ही अनुगमन किया करते हैं । अतएव षट्कपालोपधानकर्म्म दक्षिणदिगनुगत ही किया जाता है । ये प्रेततिर हैं, मर्त्य हैं, मृत्युमय हैं । सोम उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर आया करता है । व ' नोदीची नशिराः शयीत इत्यादि रूप से श्रुति ने उत्तरदिशा की ओर मस्तक रख कर शयन करना सर्वथा निषिद्ध माना है । ( ये प्रतपितर अमर्यादित हैं, सर्वथा ऋतभावापन्न हैं, अत-एव इनकी निश्चित दिशा - पूर्व - पश्चिमादि नहीं है । पितु ) अवान्तर दिशाएँ - इतस्ततः के कोण - हीं इन का विचरण प्रदेश है | अतः इनके लिए अवान्तर दिशाओं को ही सीमा बनाया जाता है । इत्यादि प्रकारों से अन्त में षट्नमस्कारपूर्वक यह महाहविर्थ्यागाङ्गभूत काम्य पितृकम्मे समाप्त होता है ( ब्राह्मण-शेष प्रकरण २ । ६ । १ । उक्त ब्राह्मण से आगे के षष्ठ अध्याय के द्वितीय ब्राह्मण में ' रुद्रयागात्मक ' काम्यकर्म का विधान हुआ है, जो पितृकर्म का अङ्गभूत माना गया हैं । उत्पन्न अनुत्पन्न पारिवारिक प्रजा इस पितृ-कर्म से पितृ - अधिष्ठाता रुद्र के कारण उत्पीडित न बन जाय, इस काम्यभाव की संसिद्धि के लिए ही रुद्रयाग विहित हुआ है । इसी के सम्बन्ध में प्रक्रान्त महाहविर्यागानुबन्धी पितृकर्म्माङ्गभूत रुद्रयाग की कर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है कि - " रुद्रयाग से यजमानप्रजा अनमीवा ( शरीरदोषरहित ), एवं किल्विष ( मनोदोषरहित ) बन जाती है । जिन असंख्यात रुद्रों का - ' असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( यजुःसं ० ) इत्यादि असंख्य - संख्यानुगतिपूर्वक उपवर्णन आता है, यह असंख्य भाव रुद्र के महिभारूप हैं । मूलरूप तो रुद्र का एक ही है, जैसा कि - ' एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ' इत्यादि मन्त्रश्रुति से स्पष्ट है । अतएव रुद्र के लिए ' एककपालपुरोडाश ' का ही निर्वाप होता है । ' चन्द्रमा ' भी अपना एक विशेषस्थान रखता है । ' चन्द्रमा ' उस अव- पार्थिव त्रिप्राणप्रधान समुद्र के मन्थन से उत्पन्न आत्रेय सोम का वह पिण्ड है, जिसे हम इस पयोरूप ( दुग्धरूप ) अवका ' नवनीत ' ( मक्खन ) कह सकते हैं । मन्थनादुत्पन्न होने से ही चन्द्रमा नवनीत समतुलित बनता हुआ ' मन्थ ' है, जिसे परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में ' मन्थी ' कहा गया है, जैसा कि - " चन्द्रमा वैं मन्थी " ( शत ० ४ | | | १ | ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । चान्द्रसोम ' मन्थ ' है, इधर प्रतपितर पार्थिव अर्णवसमुद्रात्मक पार्थिव अन्तरिक्ष में विचरण करते हुए चान्द्रसोममय ही हैं । अतएव गोरूप-पृथिवी की प्रतीकभूता ' निवानी ' गाय के दुग्ध से मन्थनप्रक्रिया के द्वारा निम्मित नवनीतरूप द्रव्य भी ' मन्थ ' ही कहलाया है । २८

पृष्ठ 287

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् रुद्र आग्नेय तत्त्व है । अग्नि दक्षिण से चल कर उत्तर में उत्तर भाग में ही रक्खा जाता है । इस द्रव्य का प्रदान चतुष्पथ प्रतिष्ठित होता है । अतएव यह पुरोडाशद्रव्य जान्धितं प्रज्ञातमवसानं यच्चतुष्पथम् ' रूप ) चतुष्पथ केन्द्र ( चौराहे ) में होता है । ' एतद्ध वाऽस्य है । इसलिए यह कर्म चतुष्पथ में हो होता है रुद्र का विश्रामात्मक अवसान स्थान । रुद्राहुति - प्रदान के मन्त्र पर ध्यान दीजिये -स जुहोति - ' एष ते रुद्रभागः सह स्वस्रा अम्बिकया तं जुषस्व ब्राह्मणश्रुति कहती है -- ' अम्बिका ह वै नामास्य स्वसा । तया अस्यैष ' । मन्त्रव्याख्या करती हुई स्त्रिया सहभागः, तस्मात् ' त्र्यंबका ' नाम " | समन्वय कीजिये इस नैग़मिक सहभागः । तद्यदस्यैष आग्नेय तत्त्व, किन्तु चन्द्रसहयोग से ' अम्बा ' युक्त | ' चन्द्रमा अप्स्वन्तरा व्याख्या का । रुद्र मन्त्रवर्णनानुसार, एवं ' तर णिकिरणसङ्गादेष पानीयपिण्डः, दिनकरदिशि सुपर्णो धावते दिवि ' इत्यादि इत्यादि नव्य अर्वाचीन ज्योतिः सिद्धान्तानुसार चन्द्रमा आम चञ्चच्चन्द्रिकाभिश्चकास्ते ' विचरण करता है. एवं यह स्वयं भी आपोमय ( सोममय - भार्गव समुद्र में हो तो विचक्षणरूप से ) पिण्ड ही है । यह चान्द्र - प्राप्य ही ' अम्बा ', किंवा ' अम्बिका ' है, जिसे सोमभाव के कारण ' स्त्री शक्ति ' भी कहा जा सकता है, जैसा कि " श्री वैसोमः " ( शत ० ४। २ । ३ ६ ) - " त्रिया स्त्रियं समदधात् " ( श्रुतियों से प्रमाणित है । चान्द्ररुद्र सहवासिनी यह अम्बिकाशक्ति गोपथब्रा ० पू ० १ | ३४ | ) इत्यादि विवर्त्त ( महिमा ) भाव से चन्द्रपितर के पुत्र हैं । पुत्ररुद्र, कन्या अम्बिका ( पोमयीशक्ति ) चन्द्रकन्या है, रुद्र स्वयं सहचारी हैं । अतएव अम्बिकास्त्री ( कन्या ) युक्त रुद्र को ' स्त्र्यम्बक ', दोनों भ्रातृ - स्वसा ( भाई - बहिन ) कहा जाता है, जो कि ' स्त्र्यम्बक ' शब्द परोक्षमाषा में - ' त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पतिदेवनम् ' इत्यादि रूप यही मन्त्र महामृत्युञ्जयविधि का मूलाधार माना गया है । से त्र्यम्बक ' ' नाम से प्रसिद्ध है । स्य स्वसा ' रूप से रुद्रात्मक चतुर्दशविध भातृसर्ग, एवं स्पष्ट अम्बिकात्मक ही यहाँ आकर - ' अम्बिका ह वै नामा-स्वसृसर्ग की नैगमिकता उद्घोषपूर्वक प्रमाणित हो जाती है । ( अपशक्तिरूप ) चतुर्दश ही अन्यत् इसी सम्बन्ध में प्रासङ्गिक समन्वय, जिसका अनुपद तत्त्वसमन्वय में उपयोग होने वाला है । चतुष्पथ में आहुति देने के अनन्तर में ही प्रतिपाद्य महासङ्गीत के उसे ' आखूत्कर ' ( मूषकबिल ) में प्रक्षिप्त कर दिया जाता है इस मन्त्रोच्चारण के साथ जो शेष बच रहता है, कि- ' एष ते रुद्रभाग-खुस्ते पशुः ' इति । यह शेषभाग उस देवता ( रुद्र ) का उच्छिष्ट है, जो पशु इसे खा जायँगे तो, उनका संहार हो जायगा । अतएव इस संहारक संहारक है । यदि अन्य बनाया जाता है, जो आखुप्राणी ( मूषक ) अपनी वज्रसमा दन्तावली द्रव्य को ' ख ' के ही अनुग विघातक ही माने गए हैं । क्या आखु ( मूषक ) रुद्र का पशु है? से संहारक बनते हुए भूतसर्ग के | * रुद्रसहचारी क्षेत्रपाल - भैरव आदि का स्मार्त बलिविधान जिसका मूल भी यही नैगमिक आम्नाय है । चतुष्पथस्थान में विहित है, २१६

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श्राद्धविज्ञान श्रन्तरिक्ष्य के हैं, जिसका कारण है एकादशाक्षर मूलरुद्र तूलरूपात्मक ११ विवर्त्त हो जाते त्रिष्टुप्छन्द, जो अन्तरिक्ष का छन्द माना गया है । इनमें प्रथम मूलस्थ रुद्र ' गणपति ' है, अन्तिम उपसंहारस्थानीय रुद्र ‘ महावीर ' है । जिनकी तृप्ति के लिए ' धर्म्मयाग ' नामक ' प्रवर्ग्ययाग ' किया जाता है, जिसे ' महावीरयाग ' भी कहा गया है । प्रवर्ग्यसम्बन्ध से जिसे ' छिन्नशीर्षयाग ' भी माना गया है । सुप्रसिद्ध पौराणिक हयग्रीवाख्यान का तात्विक रहस्य इस छिन्नशीर्षयागरहस्य पर ही अवलम्बित है । भगवान् मारुति ( हनूमान ) इसी रुद्रात्मक महावीर के अंशावतार हैं । अतएव इन्हें नैगमिक महावीरा-त्मक रुद्र का लौकिक प्रतीक मान लिया गया है, लोगानुगता महासंगीतनिबन्धना रात्रिजागरणरूपा पितृकर्म्मपरम्परा में । मूल गणपतिरुद्र इस लोकमान्यता में भूगर्भानुबन्ध से ' भौम ' पितर हैं, महावीररुद्र लोकमान्यता में ' बालाजीपितर ' हैं । भोमियाजी, और बालाजी, दोनों भी मङ्गलगीतों के द्वारा इसी नायाधारपर उपस्तुत हुए हैं । * क्षीरान्नभोजनद्रव्य - श्वेतवस्त्र - पीतवस्त्र - सुगन्धितद्रव्य - दीप आदि सामग्री - सम्भारपूर्वक रात्रि जागरण के द्वारा तथाकथित - निगमाम्नायानुमोदित भौम- पार्थिव - औपपातिक पितरों के ( पिशाचादि स्तम्बान्त सप्तक के ) आक्रमण से परिवार सन्त्राण के लिए, एवं ब्रह्मादि - मानवान्त सप्तक के अनुग्रह से परिवार को संयुक्त करने के लिए ही कुलदेवियों के द्वारा महासंगीतात्मक महामन्त्रात्मक सामगान के माध्यम से लोककुलाचारानुबन्धी पितृपूजनकर्म विहित हुआ है, जिसकी पावनगाथा का संस्मरण हुआ है इस भावुक को उन देवियों के महासंगीतश्रवरण के आधार पर ही । यह है उस ' पितरपरिवार ' का संक्षिप्त नैगमिक स्वरूप परिचय, जिसके आधार पर कुल-देवियों के महासङ्गीत ( लोकगीतों ) में अपनी उन की भाषा में उनकी प्रातिश्विक मान्यता के आधार पर पितरपरिवारानुबन्धी पारिवारिक भावों का नामकरण हुआ है । पार्थिव प्रेत भौमपितरों का आधार-भूत पार्थिव धरातल का प्रतीक ( जिस पर पार्थिव पितर प्रतिष्ठित रहते हैं ) - ' काष्ठपट्ट ' ( लकड़ी का पाटा ) है । इसी आधार पर यह कर्म उनकी भाषा में ' पितरों को पाटे बैठाया है ' रूप से प्रसिद्ध हुआ है । स्यूत श्वेतवस्त्र पितरों के चान्द्रश्वेतरूप के प्रतीक हैं, जिन्हें पट्टे पर भावना से आहूत भौम पितरों के नैदानिक वस्त्र माने गये हैं । इन श्वेत वस्त्रों से रात्रिजागरण के अनन्तर पारिवारिक अविवाहित * ( १ ) - ' निवान्यायै दुग्धे सकृदुपमथिते एकशलाकया मन्थो भवति । ' ( शत ० २२६ | २ | ६ | ) ( २ ) - ' सौम्यं हि देवता वासः ' तै ० ० १।६।१।११ । ) । ( ३ ) - ' यत् पीतत्वं तत् पितृणाम् ' ( षड्विं ० ब्रा ० ४।१ । ) । ( ४ ) - ' सुगन्धि पतिदेवनम् ' - गन्धेन च वै रूपेण च गन्धर्वाप्सरसश्चरन्ति " २२० -शत ० ६ | ४ | १ | ४ / -

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् कुमार को सम्मानित किया जाता है । चन्द्रचन्द्रिका ही सौम्य पितर प्राणों के श्वेत वस्त्र हैं । श्वेतवस्त्र चन्द्रचन्द्रिका के ही प्रतीक हैं । पितरों का अपना शारीरिक भौतिक स्वरूप ' रक्त- पीत ', इन वर्णों में. विभक्त माना गया है । पितृशरीर का प्रारम्भिकरूप ' रक्त ' ( लाल ) है, फलानुबन्धी अन्तिम रूप ' पीत ' है, और इस संबन्ध में लोकानुगत वैवाहिक माङ्गलिक कर्म की मध्यस्थता अनुगमनीय है । विवाह में परिणयार्थ ( विवाहार्थ ) यज्ञमण्डप ( विवाहमण्डप ) में अमुक नियत स्थान पर आसीन कन्या ' श्वेत वस्त्र ' धारण किये रहती है, जो इसी अवसर के लिए इसे अपने मातृभ्राता ( मातुल - मामा ) से कुला-नायपरम्परा से प्राप्त हुआ है ।. अतएव यह श्वेतदुकूल ( १ ) ' वधूदुकूल ' नाम से प्रसिद्ध होता हुआ प्रान्तीयभाषा में ' मामाकाँवल ' कहलाया है । मातुल ही अपनी भगिनी ( कन्या की माता ) के परिणयकाल की स्मृति का प्रतीक बनता हुआ अपनी इस भगिनीकन्या ( भागिनेया - भानजी ) को वधूदुकूल प्रदान करता हुआ सहज भावी दाम्पत्य का मानो लोकशिक्षण ही प्रदान करता हुआ कन्या को विवाहमण्डप में समासीन करता है ( २ ) । सोमद्वारा गन्धर्वगृहीता, गन्धर्व्वद्वारा अभिगृहीता कन्या द्वारा अभि ( यज्ञाग्नि ) साक्षी मानवपति का संवरण करने के लिए विवाहमण्डप में समासीन कन्या ( ३ ) आज शुक्लचन्द्रात्मक सोममात्र की प्रतीक है ( विवाह से पूर्व पूर्व ) । अग्नि का वर्ण रक्तवर्णाधिष्ठाता मङ्गलग्रह से सम्बन्धित रक्त ही माना गया है । पुरुष ( भावी पति ) आग्नेय बनता हुआ रक्तवर्ण का प्रतीक है । विवाह से पूर्व अभी कन्या कन्या है, वधू नहीं । साप्तपदीन - कर्म्म ( सात फेरों ) के अनन्तर ही कन्या वर की सर्वात्मना वधू बनती हुई सुमङ्गली ( ४ ) बनती है । अतएव तत्पूर्व इसे श्वेतवस्त्रधारिणी - सर्वमाङ्गलिक - वेषभूषा-अलङ्कार - वर्जिता कन्यारूप से ही यहाँ आसीन बनाया जाता है । ये सब सौभाग्यपरिग्रह तो इसे प्राप्त होंगे अपने भावी पति से । दानकर्त्ता मातापिता केवल सहजभावापन्ना श्वेतवस्त्रा कन्या को वर के ( १ ) विवाहतः पूर्वं - " श्रीरा तनुर्भवति रुशती पापयामुया । पतिर्यद्वध्वो वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते " ( ऋक् सं ० १०।८५ । ३० । ) । ( २ ) दाक्षिणात्य आम्नाय में आचार्योत्पादक मातुल - भागिनेया ( मामा - भानजी ) का इतिहासरहस्य तदूरहस्यवेत्ताओं से ही ज्ञातव्य है । ( ३ ) सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये । रयिंश्च पुत्रांश्चादादमिथो इमाम ॥ ( ऋक् सं ० १० ५।४१ । ) । ( ४ ) सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत । सौभाग्यमस्मै दत्त्वा यथास्तं वि परेत न । ( ऋक् सं ० १० ८५।३३ । ) । २२१

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' श्राद्धविज्ञान ( १ ) सम्राज्ञी श्वसुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रवा भव । ( ऋक्सं ० १०५८। ) । ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु । . हे वधू! सुसर - सास - ननद- देवर- सब के लिए तुम सम्मान्या बनो । और म संस्क सी.म है, का विभ न्तम्भ गर्भस इस माता इन्द्र नियर इस विमो भाव‍ विभ करो ‘ माँग ' रक्तव यहीं पत्नी भाव-जाने कृतकृ श्रीत 3 - रङ्गपर सम्मुख समुपस्थित कर स्वसत्त्वनिवृत्तिपूर्वक परस्वत्त्वस्थापनकर्मात्मक कन्यादानकर्म से अपने उत्तर-दायित्व से मुक्त हो जाते हैं । यही ' श्वेतवस्त्र ' चान्द्र सौम्य पितरों का किन्याभावात्मक ' प्रारम्भिक प्रतीक है, जिसके लिए पितृपट्टपर आरम्भ स्थानीय श्वेतवस्त्र ही बिछाया जाता है । कन्या - वरानुगत यह सम्पूर्ण दाम्पत्यरहस्य ‘ ऋग्वेदीयकतिपयसूक्तविज्ञानोपनिषत् ' नामक - स्वतन्त्रप्रन्थान्तर्गत ' सूर्य्यासावि-श्रीसूक्तविज्ञानोपनिषत् ' ( ऋक्संहिता १० मण्डल, ८५ सूक्त ) में विस्तार से प्रतिपादित है । विशेष जिज्ञासुओं को वहीं ग्रन्थ देखना चाहिए । प्रकृत में केवल पितृकर्मनिबन्धना वस्त्रमीमांसा ही हमारा मुख्य लक्ष्य है । पट्टासनात्मक आदिप्रतिष्ठारूप श्वेतवस्त्र वधूदुकूल का प्रतीक बनता हुआ चन्द्रचन्द्रिकारूपा सौम्या कन्या से सम्बन्धित भावी परिणयानुगत प्रजातन्तुवितानात्मक मूलपितर का प्रतीक है । श्वेतवस्त्रधारिणी कन्याः विवाहमण्डप मेँ समासीन हुई । विधिपूर्वक इस समानार्षगोत्रजा कन्या के साथ विधिपूर्वक वरे के साथ ' साप्तपदीन सम्बन्ध स्थापित हुआ । इस से यह कन्याभाव से नीभाव में परिणत होती हुई पितृग्रह से श्वमुरग्रह की धिष्ठात्री बन गई । ( १ ) । लोकाचार - पद्धति के अनुसार इस विवाहकर्म के सम्पन्न होते ही गृह की ज्येष्ठकनिष्ठ कुलनारियाँ कन्यागृह में या जातीं हैं, एवं अपने साथ लाये हुए सौभाग्यसाधक वस्त्र - आभूषणादि से महासङ्गीतपूर्वक इस वधू को इन सम्पूर्ण माङ्गलिक - सौभाग्य-परिग्रहों से संयुक्त कर इसे ' सुमङ्गली ' बना देती हैं । यह आगत वस्त्र सर्वथा ' रक्त ' ( लाल - लालसाड़ी, } जिसे लोकभाषा में ' फेरों की साड़ी ' कहा गया है ) बनता हुआ रक्तवर्णात्मक मङ्गलग्रहसमन्वित आग्नेय पुरुषपति के साथ होने वाले दाम्पत्यभाव का ही प्रकीक है ( २ ) । यही दाम्पत्यभावारम्भक पितरों की मध्य स्थिति से सम्बन्ध रखने वाला रक्तवस्त्रात्मक द्वितीय प्रतीक है । वधू ससम्मान श्वसुर गृह में आ जाती है । कालान्तर में प्रत्यनुगत दाम्पत्यभाव से पत्नी 7 सत्त्वानुगता - ( गर्भवती बनती है । यथासमय एवयामरुत्त ' के अनुग्रह से गोवर्द्धक पुत्र को जन्म देती है, ( २ ) - इस अवसर पर महासङ्गीत की भाषा में जो भाव व्यक्त हुआ है, वह बड़ा ही चमत्कृत है । मङ्गलगान करती हुई देवियाँ पितरों से यह कामना करती हैं कि- " एक लाडली को चीर बध-satara को सेवरो । बधज्यो बधज्यो हो लाडा गोत तुह्मारो ० " - इत्यादि का तात्पर्य: स्पष्ट है । कन्या · का चीर ( सौभाग्यप्रतीक रूपा लालसाड़ी ) सदा अंग रहे, वर का सेवरा ( कुलप्रतिष्ठा ) सदा सुरक्षित हे! तुह्मारी गोत्रवृद्धि हो ( इस वधू के साथ होने वाले दाम्पत्यंभाव से ) - ' गोत्रं नोऽभिवर्द्ध-न्ताम् ' ( आम्नायवचन ) ( बधज्यो गोत तुह्मारा ' अक्षरशः आम्नाय वचन का अनुवाद हुआ है ।