Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 291–300
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 291–300
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".... ऋणमोचतोपायोपनिषत् .: और यहाँ आकर इस का सौभाग्य सफल माना जाता है, जिस की प्रामाणिकता के लिए पोडश स्मार्त्त -संस्कारों में प्रसिद्ध, ‘ सीमन्तसंस्कार ' की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जायगा ( १ ) । सीमन्तिनी का अर्थ है ' केशपाशविन्यासिनी ' । जिस सीमन्तभाव को प्रान्तीय भाषा में ' माँग ' कहा गया है, जिस में सौभाग्य - कुंकुम भरा जाता है, मस्तकस्थ के शगुच्छ के शिरोभागानुरात वह दक्षिणोत्तर पार्श्व का मध्यस्थ आग ही ' सीमन्तप्रदेश ' है, जिस के आधार पर ही देशद्वयविभाज्ञि हा मध्यरेखा से संयुक्त विभाजक प्रदेश भी, सीमान्त प्रदेश ' कहलाया है । षोडश शृङ्गारों में इस केशपाश विन्यासात्मक सीम-न्तशृङ्गार का सौभाग्य, की अपेक्षा से एक महत्वपूर्ण स्थान माना गया है । गर्भाष्म मास में मातृहृदय से गर्भस्थ शिशुहृदय- पर्यन्त गायत्रानुबन्धी अष्ट्रातरावयव इन्द्रविद्युत प्रबल वेग से, संचार करने लगता है । इस अवस्था में यदि सन्तति हो गई, तो वह जीवित नहीं रह सकती । यदि सन्तति जीवित रह गई, तो माता की मृत्यु निश्चित है । यदि महद्भाग्य से दोनों हीं जीवित रह गए, तो यह अष्टममासप्रसूता इन्द्रविद्य त्प्रधाना सन्तति महाभाग्यशालिनी प्रमाणित होती है, जो सर्वथा अपवादात्मक क्षेत्र ही है । नियमतः दोनों में से एक का निधन निश्चित है, और यह आशङ्का प्रथमसन्तान से ही सम्बन्धित है । इस भय से सन्त्राण करने के लिए ही ' सीमन्तसंस्कार ' विहित हुआ है । देवभावप्रधान इन्द्रविद्युत के विमोहनपूर्वक इसे उपशान्त करने के लिए लेप्याशलली ( सेह का शूल ) - बीरतरशंकू - सूत्र आदि आसुर भावप्रधान भूतमाध्यम से मन्त्रपूर्वक बीणावादन होते हुए भ्रर्त्ता परोक्ष में पत्नी के केशपाश को द्विधा विभक्त करता है, और यही गृह्यसूत्रानुबन्धिनी, सीमन्तसंस्कारानुगता इतिकर्त्तव्यता है । ( ' केशान्, द्विधा करोति भर्त्ता - पारस्करगृह्यसूत्र ) । इसी दिन से यह सीमन्तिनी ' ( माँगवाली ) कहलाने लगती है । ' माँग का सिंदूर ' इसी दिन से प्रक्रान्त होता है, जो सौभाग्य का महान प्रतीक माना गया है । T विवाह होने पर स्त्री का सौभाग्य लौकिक है, केवल शरीरानुगत है, जिस का प्रतीक है ' रक्तवस्त्र ' ( फेरों की लालसाड़ी ) । वास्तविक सौभाग्य का उपक्रमकाल माना गया है. सीमन्त संस्कारकाल यहीं से पत्नी. ' जाना गृहिणी ' आदि सम्मानित पदों से अलंकृत की जाती है । पुत्रोत्पत्ति से पूर्व पूर्व पत्नी और पति, दोनों हीं उपेक्षणीय माने जाते हैं । प्रति के शुक्र में महद्रूप से अवस्थित सापिण्ड्य-भाव प्रवर्त्तक प्राणात्मक पितर इस पतिपत्नी के दाम्पत्यभाव के फलस्वरूप ' पुत्र ' उत्पन्न हो जाने पर प्रजातन्तुवितानोद्देश्यरूप स्वोद्देश्य में 4. सफल बनते हुए यहाँ उपरत बन जाते हैं, कृतकृत्य हो जाते है, सौरहिरण्मयात्मक नाकस्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं ( २ ), लोकविजय ( १ ) -३२ श्रौतसंस्कार, १६ स्मात्त संस्कार, सम्भूय द्विजातिमानव को सुसंस्कृत बनाने के लिए श्रौतस्मार्त्त ४८ संस्कार विहित हुए हैं, जिन का स्वरूप परिचय गीता विज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत अन्त - रङ्ग परीक्षात्मक -: ' कर्मयोगरहस्य ' नामक ' गः विभागानुगत ४ चतुर्थ खण्ड में हुआ है । ( २ ) पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोति विष्टम् ॥ ( स्मृतिः ) । २२३
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श्राद्धविज्ञान सर्वान्त का ' पीतवस्त्र ', जिस प्राप्त कर लेते हैं । इसी सौर हिरण्मयभाव का प्रतीक है से पुत्रवती सीमन्तिनी को पुत्रजननमहोत्सव के अवसर पर पितृप्राणप्रतीकभूत ( १ ) कूपपूजन के समय सम्मानित किया जाता है । यही पीतवस्त्र पितरों की ओर से पुत्रजनननिमित्त महापारितोषिक इसे प्राप्त हुआ है । यही पीतवस्त्र लोकभाषा में ' पीला ' ( विशेष प्रकार का पीतवस्त्र - जिसे राजपूताना की पुत्रवती स्त्री अपना महामहनीय वस्त्र - प्रोढ़ना - मानती है ) नाम से प्रसिद्ध है । ऐसी मान्यता है इस पीतवस्त्र के सम्बन्ध में आम्नायपरायण राजपत्तन प्रान्त में कि, पतिपुत्रवती वीरा सौभाग्यवती ही इसे अपना परिधान ( ओढ़ना ) बना सकती है ( ओढ़ सकती हैं ) । पतियुक्ता भी अपुत्रवती ( जबतक पुत्रसन्तति न हो जाय ) के लिए पीतवस्त्रधारण यहाँ की मान्यता में सर्वथा वर्ज्य है । निष्कर्षतः कन्यावस्थानुगत प्रथमस्थानीय आधारभूत श्वेतवस्त्र ( कन्यावस्त्र ), वधुस्थानीय पत्यनुगंत दाम्पत्यभावानुगत मध्यम स्थानीय रक्तवस्त्र ( पत्नीवस्त्र ), एवं जायास्थानीय पुत्रानुगत दाम्पत्यफलानुगत तृतीयस्थानीय पीतवस्त्र ( पुत्रवतीवस्त्र ) भेद से आम्नायानुमोदित पथानुसार पितृ-प्राणपरम्परानुगति से सम्बन्धित प्रारम्भिक चन्द्रचन्द्रिकात्मक श्वेतवर्ण, मध्यस्थ अग्न्यनुगत रक्तवर्ण, अन्तस्थ सौर हिरण्मयानुगत पीतवर्ण क्रमशः तीनों की प्रतीकता का समर्थन कर रहे हैं । अतएव रात्रि जागरणात्मक पितृ - स्थापना में श्वेतवस्त्र पट्ट पर बिछाया जाता है, रक्त और पीतवस्त्रपट्ट पर पितृसम्मान के लिए रक्खा जाता है । कहीं कहीं श्वेत और रक्त दो का प्राधान्य है । कहीं कहीं तीनों संग्रहीत हैं । कहीं पितृध्वजारूप से सङ्गीतभाषा में ' रक्त पीत ' - दो का संग्रह हुआ है, जैसा कि -' राती - ( रक्त ) पीली ( पीत ) धजा ( ध्वजा ) ए छड़ावेला ( लगाएँगे ) हरीचन्दरजी ( हरिश्चन्द्रजी ) मोकला ( बहुत बड़ी ) जी " इत्यादि सङ्गीतभाषा से स्पष्ट है । विषय विस्तृत बनता जारहा है । अतः अन्य सम्पूर्ण आम्नायों की मान्यता सहज श्रद्धा के प्रति समर्पित करते हुए तालिकोद्धरण रूप से ' पितृ-परिवार ' की यह पावनगाथा उपरत हो रही है, जिसके माध्यम से रात्रिजागरणात्मक पितृकम्मनुबन्धी महासङ्गीत के सम्बन्ध में, उसकी पूर्वप्रतिज्ञात पावनस्मृति के सम्बन्ध में कुछ निवेदन करते हुए श्रद्धा को मूल बनाने के लिए हम मनसा वाचा कर्मणा आतुर हैं । पर्याप्त है पितृपरिवार के के, तथा तन्निबन्धन रात्रि जागरणात्मक पार्थिव भौम पितृकर्म के सम्बन्ध में वेदभक्त श्रमिनिविष्टों परितोष के लिए पूर्वनिद्दिष्ट नैगमिक प्रामाण्यवाद । यदि इसके आधार पर ' स्थाली पुलाकन्याय ' काम समझते हुए उन्होंने श्राम्नाय - निगमविरुद्ध अपने अमिनिवेश - दुराग्रह ( हठधर्मी ) का परित्याग करते हुए इस पितृकर्म के सम्बन्ध में अंशत: भी आस्थानुगत श्रद्धा अभिव्यक्त करने का निःसीम अनुग्रह किया, तो जिज्ञासा अभिव्यक्त करने पर वेदाविरोधी तर्कवाद के माध्यम से ही महा-सङ्गीतनिबन्धन ( लोकगीतानुगत ) कुलस्त्रीद्वारा अनुष्ठित पितृकर्म की मान्यता से सम्बन्ध रखने वाले अक्षर अक्षर के नैगमिक आम्नायप्रामाण्य से उनका अनुरञ्जन सम्भव बन सकेगा, निश्चित बन सकेगा । अलमतिपल्लवितेनामिनिविष्टेषु वेदभक्तेषु । परिलेखद्वारा निरूपित पितृपरिवार का सिंहा-वलोकन करते हुए पितृकम्र्मानुबन्धी रात्रिजागरणानुबन्धी महासङ्गीत ( रातीजगा में गाए जाने वाले: लोकगीत ) की पावन स्मृति के आधार पर कतिपय स्मृत्यनुगत उदाहरण समुपस्थित किए जारहे हैं । ( १ ) पितृदेवत्यो वै कूपः, खातः ( शत ० ३ । ६ । १ । १३ । ) । २२४
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-: परिलेख पितृपरिवार - पार्थिव भौम- - मर्त्य अन्तधर्मावच्छिन्न-पृथिवी - धरातलरूपा - सूर्य्या तद्भोग्या पार्थिवचन्द्रानुरक्ता - ) २ ( प्रतिष्ठितश्चन्द्रः केन्द्र पार्थिवभौमात्रिप्राणजनितश्चान्द्रसम्वत्सर - ) १ ( X- ----------द्यौः रुद्रः- महान् चन्द्रो ) १ ( पृथिवी रुद्राणी- मही पृथिवी ) २ ( X * ) पतिः रुद्रः ( पिता -- द्यौः ) १ ( * ) पत्नी रुद्राणी ( माता - पृथिवी ) २ ( X - रुद्रमूर्तेर्महन्मूर्त्तेश्चान्द्रपितुः द्यावापृथिव्यात्मकस्य तस्यैतस्य परिवारश्चतुद्दशविधः X महानौपपातिकः पिताप्रजापतिरुद्रश्चान्द्रो -प्रजाः- : -तस्येयमौपपातिक्य १ २ ३ पुत्रप्रजाः पुत्रपत्न्यः कन्याप्रजाः ६३ ) ७ ( ब्रह्म - १ ) ७ ( ब्रह्माणी ) ७ (: प्रतिष्ठाशक्ति ) ६ (: प्रजापति - २ ) ६ ( ईश्वरी ) ६ (: पुरंधिताशक्ति ) ५ ( इन्द्रः - ३ ) ५ ( इन्द्राणी ) ५ ( भाग्यशक्तिः ) २१ ( ) ४ ( पितरः ४-) ४ ( हैमवती ) ४ (: प्रजननशक्ति ) १ ( मानवः ७-) २ ( यक्षः -- ६ ) ३ ( गन्धर्वः - ५ ) ३ ( अप्सरा ) ३ ( सङ्गीतशक्तिः ) ( यक्षिणी ) २ (: मोहनशक्ति ) 1 ( मानवी ) १ (: सर्वशक्ति ) १ ( ) २ ( ) ३ ( ) ७ ( पिशाचः - ८ ) ७ ( पिशाची ) ६ ( राक्षसः - ६ ) ६ ( राक्षसी ) ५ ( पशुः १०-) ५ (: स्त्रीपशव ) ४ ( पक्षी ११-) ४ ( पक्षिणः स्त्री ) २१ ( ) ३ (: कीट - १२ ) ३ (: स्त्रीकीटा ) २ (: कृमि - १३ ) २ ( स्त्रीकृमयः . ) १४ ( ) १ (: स्तम्ब १४-पत्नीसर्गः ) १४ ( ) 1 (: वल्लय ) ६ (: अवरोधशक्ति ) ७ (: निगरणशक्ति ) ४ ( आहरणशक्तिः ) ५ ( भोग्यशक्तिः ) ३ (: संहारशक्ति ) २ ( ध्वंसशक्तिः ) १ (: आवरणशक्ति कनिष्ठभगिनीसर्गः ) १४ ( । ) २६ ० उ ० ना गोपथ ( " पत्नी पृथिव्यग्नेः ) रुद्रः अग्निर्वा ( " * ( ( ( ३ २ ) २ ) – - ) कृष्णपक्षानुगतासु भगिन्यः उपपत्न्यः पुत्राः सप्त सप्त सप्त -- घोरतमाः - घोरतराः घोराः रात्रिसु - सृष्टिविघातकाः - ध्वंसप्रवत्तिकाः - उत्पातप्रवर्त्तिकाः २ ( ( १ ) - ) पुत्रवध्वः - सप्त-शान्ततराः सन्ततिप्रवृत्तिकाः ३ ) ( शुक्लपक्षानुगतायां - कन्याः विचरणशीला - सप्त-शान्ततमाः वर्गत्रयी चन्द्रिकायां सौख्यप्रवर्त्तिकाः --- पुत्राः सप्त - शान्ताः - स्वस्तिप्रवर्त्तकाः दन्द्रम्यमाणा कृष्णा - तमोमयी - वर्गत्रयी ( २ ) १ () शुक्ला - सात्त्विकी “ महासङ्गीतानुबन्धीनि - पितृकर्म्माधारभूतानि पितृपरिवाराणि ” रात्रिजागरणेन - उभयविधानां षड्विधानां -चतुर्दशविधानां द्वाचत्त्वारिंशत् ( ४२ विधानां ) वा महासङ्गीतमाध्यमेन कुलस्त्रीवर्गेण पितृभावानां तुष्टिः पुष्टिर्विधीयते
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ऋणमोचनोपायोपनिपत गर्भाधान - पु ' सवन - जातकम् - नामकरणादि षोडश स्मार्त्त गृह्य वैध संस्कार - कम्मों से सम्ब न्धित माङ्गलिक महोत्सवों पर कुलस्त्रियों के द्वारा रात्रि में इन की अपनी मान्यता के अनुरूप स्वस्व-कुलानुगता कुलदेवियों की साक्षी में पूर्वनिद्दिष्ट पितृपरिवारतालिकाभुक्त औपपातिक पार्थिव रौद्र भौम शान्त घोर पितरों को तुष्ट - तृप्त करने के लिए रात्रिजागरण होता है । नियत शुद्ध प्रदेश में काष्ठ-पट्ट ( पाटा ) स्थापित किया जाता है । दीपक प्रज्वलित किया जाता है । एवं अनुमानत: रात्रि के १०-११ से ' पितृकर्म्म ' आरम्भ होता है, जिस का माध्यम बनता है महासङ्गीत, जिस की स्मृति से सम्व-न्धित कुछ एक उदाहरण यहाँ उद्धत कर प्रस्तुत प्रक्रान्त पावन स्मृति को अक्षुण्ण बनाया जा रहा है । प्रस्तुत महासङ्गीत ( जिनका रात्रिजागरणात्मक लोकानुबन्ध पितृकर्म से सम्बन्ध है ) केवल हमारी श्रद्धात्मिका स्मृति से सम्बन्धित हैं, जिन्हें अपने पारिवारिक पर्वोत्सव - विशेषों पर हमें यदा कदा सुनने का महत्सौभाग्य प्राप्त होता रहता है । इन लोकगीतों की आम्नायप्रामाण्यानुबन्धिनी मार्मिकता से हमें निरतिशयरूपेण प्रभावित होना पड़ा । एवं फलस्वरूप हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा किं, ऋषिसंस्कृति - प्राच्य नैगमिक संस्कृति की आम्नाय - परम्परा से अनुप्राणित इन लोकगीतों का संरक्षण राष्ट्रिय संस्कृतिसंरक्षण का एक प्रधान अङ्ग है । इसी निष्कर्षाकर्षण से आकर्षितमना बनते हुए हमनें यह जानना चाहा कि, क्या किसी प्राच्यसंस्कृतिप्रेमी ने इस दिशा में कोई सफल प्रयत्न किया है? | परिणामस्वरूप ' राजस्थान रिसर्च सोसायटी कलकत्ता ' द्वारा प्रकाशित ' राजस्थान के लोकगीत ' नामक ग्रन्थ ( दो भागों में प्रकाशित ) दृष्टि के सम्मुख उपस्थित हुआ, जिस के यशस्वी सम्पादकोंनें इस ग्रन्थ का सम्पादन किया है । अवश्य ही यह प्रयास भावुकतासंरक्षण की दृष्टि से प्रशंसनीय माना जाना चाहिए । इस दिशा में, जब कि अन्य कोई उपलब्धि उपलब्ध नहीं है, तो यही उपलब्धि तुष्टि का कारण मानी जानी चाहिए । किन्तु......? । आम्नायानुगत सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सम्बन्धित लोकगीतों का उक्त ग्रन्थ में संस्पर्श भी नहीं हुआ है । जिन देव - पितृकम्मों से सम्बन्धित लोकगीतों के आधार पर हमारी मूल संस्कृति का लं किक संरक्षण सुरक्षित माना जा सकता है, तत्सम्बन्धी प्रकरण तद्ग्रन्थ में ' नहीं ' के समान ही है । ६०० पृष्ठात्मक इस ग्रन्थ में केवल आरम्भ के २३ पृष्ठों में ' देवी देवताओं के गीत ' नामक प्रकरण में कुछ एक वैसे प्रान्तीय ( सम्भवतः जयपुर प्रान्तान्तर्गत शेखावाटी ) गीतों का समावेश हुआ है, जिन से सांस्कृतिक आम्नाय गतार्थ नहीं बन सकती । " झालर - माताजी - बालाजी - भैंरूँ जी - जलदेवता-* ठाकुर श्रीरामसिंह एम् ० ए ० विशारद, श्रीसूर्यनारायण पारीक एम् ० विशारद, तथा श्रीनरोत्तम दास स्वामी एम ० ए ० विशारद, सम्पादकत्रवी । प्रकाशक श्रीरघुनाथप्रसाद सिंघानिया, मुद्रक श्रीभगवती-प्रसादसिंहवर्मा बिसेन, न्यूराजस्थानप्र स कलकत्ता, दो भागों में प्रकाशित । २२५
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श्राद्धविज्ञान सेडलमाता - सतीराणी- पितराणी - " इन आठ गीतों में कहीं भी नैगमिक मान्यता, जैसी कि सांस्कृ-तिक संरक्षण के नाते अभीष्ट है, नहीं है । आगे के सम्पूर्ण लोकगीत भी देवपितृभावना से सर्वथा संस्पृष्ट रहते हुए केवल प्रचलित लोकसाहित्य - शृङ्गारप्रधानसाहित्य का समर्थन करते हुए मानव की भावुकता ( शरीरमनोऽनुगता दुर्बलता ) को ही प्रोत्साहित कर रहे हैं । क्या यही स्वरूप है लोकगीतों का, उस लोकगीतसंग्रह का, जिसे हम ' महासङ्गीत ' की उपाधि से विभूषित करते हुए आम्नायानुगत मानने का साहस, किंवा दुस्साहस कर रहे हैं । महती समस्या उपस्थित कर दी उस ग्रन्थ ने हमारे सम्मुख इस दिशा में । केवल ' राजस्थान ' नाम का व्यामोहन, किंवा ' राजस्थान के लोकगीत ' घोषणा काव्यामोहन ही तो सांस्कृतिक क्षेत्र में पर्याप्त नहीं है । और फिर उस वर्त्तमान शताब्दी में भुक्त राजस्थान के लोकगीत, जिन्होंने राजाओं की स्वच्छन्दता - स्वैराचारिता की छत्रछाया में अपना कायात्मक निर्माण किया हो? | उस राजस्थान के लोकगीत, जिस राजस्थान ने श्रौतस्मार्त्त संस्कारपरम्परा को जलाञ्जलि समर्पित कर अपने आपको सर्वात्मना ' शूद्रसधर्माण: ' प्रमाणित कर लिया हो?, उस राज-स्थान के लोक- उत्सव - पर्वगीत, जहाँ का सम्पन्न श्रेष्ठिव यज्ञोपवीत जैसे संस्कार को भी अपने लिए विशेष महत्त्व का न मान रहा हो? | दक्षिणभारत धन्य है इस दिशा में, जहाँ आज भी आम्नायानुगत स्मार्त्तसंस्कार परम्परा येन केन रूपेण प्रक्रान्त है । वहाँ जो द्विजाति ( ब्रा ० ० ० ) यज्ञोपवीत संस्कार से संस्कृत नहीं होता, वहाँ वह द्विजाति ही नहीं माना जाता । उसके हाथ का जलग्रहरण भी वहाँ वर्ज्य है | गुर्जरप्रान्त - मिथिलाप्रान्त - विशेषतः दक्षिणभारत में आज भी षोडशसंस्कारों में से कतिपय मुख्य मुख्य संस्कार आम्नायानुगत बने हुए हैं । श्रवश्य ही तन्निबन्धन उन प्रान्तों के लोकगीत आम्नायानुगत ही होंगे, ऐसी हमारी धारणा है, और सांस्कृतिकसंरक्षण के उद्देश्य से ' राजस्थान ' के वर्त्तमानयुग के स्खलित - आम्नायविरुद्ध - संस्कारशून्य - अतएव काल्पनिक व्यामोहन को छोड़ते हुए हमें उन प्रान्तों के लोकसाहित्यान्वेषण - संरक्षण- प्रचार में वृतप्रयत्न होना हीं चाहिए । दुर्भाग्य है हमारा कि, उन गुर्ज्जरादि प्रान्तों की प्रान्तीयभाषाओं के सम्पर्क में न आने के कारण हम उस अनिवार्य आवश्यक प्रयत्न में अपने आपको सर्वात्मना श्रसमर्थ ही अनुभूत कर रहे हैं । तद्देशीय विद्वानों से हम आग्रहपूर्वक प्रणतभावेन यह आवेदन करेंगे कि, वे उन लोकगीतों का, जिनका श्रौतस्मार्त संस्कारों से सम्बन्ध हैं, संग्रह कर राष्ट्रिय मौलिक संस्कृति के संरक्षण का स्तुत्य कार्य सम्पादित करने का अनुग्रह करेंगे । हम क्या करें इस दिशा में, जब कि हम राजस्थान के तथोपवर्णित आम्नायशून्य - संस्कारशून्य वातावरण में विचरण कर रहे हैं । ' ढोलामरवरण ' के यशोगान से तो आम्नायानुगता मूलसंस्कृति का कोई हित साधन सम्भव नहीं हो सकता । ' परिणहारी ' के लोकगं त तो हमारी नैगमिकनिष्ठा को सुरक्षित नहीं रख सकते । क्या कोई लक्ष्य शेष नहीं रहा राजस्थानी होने के नाते आम्नायानुगत लोगगीतों के अनु-शीलन के सम्बन्ध में हमारे लिए? । नेति होवाच । ' विधि ' ही हमारा श्राराध्यमन्त्र है, निषेध नहीं । फिर इस दिशा में भी हमारे लिए निराशा का कोई स्थान नहीं है । जयपत्तन ( जयपुर ) भी तो राज-२२६
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7 ऋणमोचनोपायोपनिषत् पत्तन ( राजपूताना - राजस्थान ) का ही अङ्ग है । और कर्णाकर्णिपरम्परया आज तो ऐसा सुनने सुनाने में आ रहा है कि, जयपुर तो वर्त्तमान में राजस्थान की सत्ता का केन्द्र बनता हुआ सम्पूर्ण राजस्थान का प्रतीक है, राजस्थान की राजधानी नहीं, अपितु धूलिधूसरित राजस्थान की ' प्रजकी ' धाणी ' है आज के इस सर्वतन्त्र स्वतन्त्र गणतन्त्रात्मक - सार्वभौमप्रजातन्त्रयुग में । वैसे भी जयपुर अमुक दृष्टिकोणों से आरम्भ से ही विद्या - शिल्प - कला - आदि के समतुलन सदा ही केन्द्र बनता हुआ । राजस्थान का प्रतीक चला आ रहा है । न सही केन्द्र, किंवा प्रतीक, तथापि ' समुदाये द्रष्टा: शब्दा अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते ' न्याय से ' पटो दग्धः ' वत् राजस्थान का अवयवभूत जयपुर भी ' राजस्थान ' का प्रतीक माना ही जा सकता है । इस जयपत्तनात्मक राजस्थान केमाध्यम से जयपुर ( के माध्यम से, जयपुरीय प्रजावर्ग में प्रचलित पर्वोत्सवानुगत लोकगीतों के माध्यम से, जिनमें से पूर्वोपवर्णित - ' राजस्थान के लोकगीत ' नामक महाग्रन्थ में एक भी लोकगीत का समावेश नहीं हुआ है, सम्भवतः इसलिए कि जयपुरीय लोकगीत नैगमिक प्राम्नायानुगत बनते हुए वेदवत् शुष्क हैं, नीरस हैं, साहित्यिक छटा से संस्पृष्ट हैं, वेदवादानुगता जड़ता के? प्रतीकमात्र हैं । हमें राजपत्तनानुगता लोकगीतनिबन्धना सांस्कृतिक ना परम्परा विधिपूर्वक प्रमाणित करनी है, सर्वात्मना संसिद्ध करनी है, संसिद्ध है, इतर प्रान्तीय गुर्जर - मिथिला- दक्षिणभारतीयानुगता लोकगीतनिबन्धना सांस्कृतिक आम्नायपरम्परा के सम-तुलन में 1 यही नहीं, बड़े ही सम्मानपूर्वक तत्प्रान्तीय तदाम्नायपरम्पराओं से, तन्मान्यतानुगामी तत्-प्रान्तीय शिष्ट मान्य विद्वानों से हमें इस आम्नायदिशा के सम्बन्ध में यह भी धृष्टतापूर्वक निवेदन कर ही देना पड़ेगा कि, प्रतीच्यपथानुगता - विदेशी सभ्यता संस्कृतिसमाकुलिता विगत - भुक्त जिन दो तीन.. शताब्दियों में सम्पूर्ण भरत, विशेषतः आम्नायपरम्परा का अनन्योपासक दक्षिणभारत विदेशी मत.. वाद के भावुकतापूर्ण प्रवाह में प्रवाहित हो कर तन्मतवाद को भारतव्यापक बनाने का लाभ? प्राप्त करने में अपना जैसा कौशल? अभिव्यक्त कर चुका है, तत्समतुलन की दृष्टि से द्वि - त्रि - शता-दियों का राजपत्तनेतिहास नै गमिक आम्नायपरम्परा के संरक्षण की दृष्टि से सम्पूर्ण भारत का नैग-मिक प्रतीक प्रमाणित हुआ है, जिस गौरवपूर्ण प्रतीकभाव का एकमात्र श्रेय नैगमिक संस्कृति के अन-* यह वातविक ऐतिहासिक तथ्य है कि, अपने अर्थतन्त्रप्रधान राजनैतिकतन्त्र की सफ-लतामात्र के लिए आटोपपूर्वक प्रचारानुगत क्राइस्टमत ( इसायत ) ने जो सफलता दक्षिणभारत में प्राप्त की, वैसी अन्य प्रान्तों में नहीं । हमारा राजपत्तन तो वेदस्रष्टा भगवान् ब्रह्मा के आवास निवासरूप पुष्करक्षेत्र - तीर्थ के अनुग्रह से पावन बना रहता हुआ सर्वथा इसाइयत ( कृश्चिनियेटी ) से संस्पृष्टही प्रमाणित रहा है । २२७
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श्राद्धविज्ञान न्योपासक स्वनामधन्य ' शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ' संस्मरणीय जयपुरीय ' राजवंश ' को ही समर्पित किया जायगा । न केवल राजस्थान को ही, अपितु सम्पूर्ण भारत को इस नैगमिक सांस्कृतिक संरक्षण के माध्यम से जयपुरीय राजवंश के प्रति कृतज्ञताञ्जलि समर्पित करनी चाहिए, करनी ही पड़ेगी, आज नहीं, तो कल ( वर्त्तमान में नहीं, तो निकट भविष्य में ) । जयपुर राजवंश अपने आप को भगवान् राम के पुत्र ' कुश ' की परम्परा से सम्मानित मानता. हुआ ' सूर्यवंशी कुशवाह ' वंशी मानता चल रहा है, जिस का प्राकृतरूप है - ' कछवाहा ' । इन के मूल का पुरातनतम इतिवृत्त तो अज्ञात है । हाँ, विक्रम सम्बत् ६३३ से अद्यावधिपर्यन्त अनुमानतः १८७७ वर्ष पर्यन्त का क्रमबद्ध इतिहास उपलब्ध होता है । इस क्रमसे इन के मूलवंशप्रवर्त्तक ' नृवर ' नामक राजाने अपने ही नाम से जो पुरी निम्मित की, वह ' नरवर ' कहलाई । इन की वृद्धावस्था में ' श्रीसोढदेव ' नामक पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने ' द्यौसा ' नामक पुर में चौहाण राजा को परास्त कर वहाँ अपना आधि-पत्य स्थापित किया वि ० सं ० १३३. में । इनके ४० वर्ष राज्यभोगानन्तर इनके पुत्र ' श्रीदुर्लभराय ' द्यौसा को छोड़ कर आम्बेर के आगे के ' रामदुर्ग ' ( रामगढ़ ) को अपनी राजधानी बनाया । इनके पुत्र ' श्रीकालिदेव ' ने आम्बेर के उत्तर भाग में पर्वतश्रेणि में सुरक्षित ' कुन्तलगढ़ ' नामक दुर्ग पर आक्रमण कर यहाँ के भैरव को प्रसन्न कर यहाँ ' अम्बावती ' पुरी की स्थापना की, जिनकी प्रतिष्ठा हुई रामगढ़ में, जो भवानी ' जमवा ' माता नाम से प्रसिद्ध है, एवं जो इन राजाओं की कुलदेवी मानी जाती हैं । इसी परम्परा में आगे चल कर नं ० १६४६ में ' श्रीमान सिंह ' राज्यासीन हुए, यहीं से देवोपाधि का स्थान ' सिंहोपाधि ' ने ग्रहण किया । मुगलसाम्राज्यसेना के प्रशास्ता श्रीमानसिंह ' काबुल विजेता ' नाम से उपवर्णित है । इनके ज्येष्ठपुत्र श्रीभावसिंह ने तत्कालीनसत्ता से ' मिर्जा ' उपाधिग्रहण कर ६ वर्ष में ही लीला समाप्त कर दी । इनके अनन्तर ' मिर्जाराजा जयसिंह ' अधिकारारूढ़ बने इनके अनन्तर श्री विष्णुसिंह, तदनन्तर हमारी आम्नाय के मूलप्रवर्त्तक ' श्रीसवाई जयसिंह महाराज ' सं ० १७५४ में राज्यासीन बने । १७५४ से २०१० वि सम्वत्पर्य्यन्त श्रीसवाई जयसिंह से आरम्भ कर राज्यसत्तावञ्चित * वर्त्तमान राजवंशी श्रीसवाईमानसिंह नृपतिपर्यन्त मध्य में श्री ईश्वरीसिंह, श्रीमाधवसिंह, श्रीपृथिवीसिंह, श्री प्रतापसिंह, श्री जगतसिंह, श्रीजयसिंह, श्रीरामसिंह, तथा नैगमिक आम्नाय के अनन्य भक्त आस्था परिपूर्ण श्रद्धा से आप्लुत सदा सर्वदा संस्मरणीय स्व ० श्री श्री सवाई माधवसिंह नृपतिवर क्रमशः प्रतिष्ठित हुए । इस प्रकार नृवर राजा से आरम्भ कर वर्त्तमान श्री सवाई मानसिंहनृपतिमहोदय पर्यन्त ३८ शाखओं का इतिहास उपलब्ध होता है । जिनमें हमारी नैगमिक आम्नाय से सम्बन्धित महा-सङ्गीतपरम्परा नृपतिश्रेष्ठ श्रीसवाईजयसिंह महाराज को ही वे न्द्र बना रहा है, जो वि ० सं ० १७५४ में आम्बेर * हमारी राय से तो अब भी राजसत्ता से संयुक्त । २२८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् राजधानी में राज्यासीन बने, अनन्तर जिनके द्वारा वर्त्तमान जयपत्तन नगर का शास्त्रीय आम्नायपूर्वक ही निर्माण हुआ । तब से आरम्भ कर वर्त्तमान सम्वत् ( २०१० ) पर्य्यन्त अनुमानतः ढाईसौ वर्षात्मक-काल नैगमिक - धार्मिकपरम्परा में आदर्श ही प्रमाणित रहा है * । महाराज जयसिंह स्वयं निगमागमशास्त्रों के मर्मस्पर्शी विद्वान् थे । इनकी सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ कालचक्रानुगत सम्वत्सरचक्र से समतुलित रहतीं हुई ज्योतिःशास्त्रानुगता थीं, जिसके ज्वलन्त उदाहरण जयपुर का ' ज्योतिष्यन्त्रालय ' ( अब्जरवेद्री ), बनारस के मानमहल में प्रतिष्ठित ज्योतिषशाला, उज्जैन की शाला - रूप से सर्वत्र भारत में अभिव्यक्त हैं । अम्बर ( आमेर ) और जयपुर के मध्य में पार्वत्य पावन क्षेत्र में इन्होंनें नैगमिक अश्वमेध का अनुष्ठान कराया, जिसकी इतिकर्त्तव्यता का सञ्चालन किया तत् समय के सुप्रसिद्ध पञ्चद्रविड़ - पञ्चगौड़ वेदवित नैगमिक विद्वानों नें 1 । गुर्जर - मिथिला- दक्षिणभारत-वाराणसी - आदि से निगमवेत्ता विद्वान् ब्राह्मण श्रामन्त्रित हुए, इनके लिए यज्ञशाला के ही सन्निकट ' ब्रह्मपुरी ' नाम की एक स्वतन्त्रपुरी का निर्माण हुआ, इन्हें प्रभूत - भूदान ( जागीरी ) द्वारा शरीरयात्रा निर्वाह की चिन्ता से सदा के लिए उन्मुक्त करते हुए यहीं रख लिया गया । ये ही विद्वान् जयपुरीय सनातन प्रजा की नैगमिक लोक आम्नाय के सूत्रधार बनें । तदित्थं - राज्याश्रय से निश्चिन्त बने हुए नैगमिक विद्वानोंनें यहाँ की प्रान्तीयभाषा ( जयपुरीभाषा ) में स्वयं महासङ्गीत ( लोकगीत ) का आम्नायानुरूप निर्माण कर इसे परोक्षरूप से जयपुर के नागरिक जीवन में आम्नायपरम्परा का अनुगामी बनाने का श्रेय प्राप्त किया । पाठक स्वयं यह गनुभव करेंगे इन लोकगीतों के नैगमिक प्राम्नाय भावों को देख सुन कर कि, इनके वाक्यसन्दर्भ वेदमन्त्रों के अनुवाद हैं, जो अवश्य ही वेदवित् विद्वानों के माध्यम: से ही राज्याश्रय के द्वारा जयपुरीय प्रजावर्ग में अवतरित हुए हैं । यही हमारी आस्था - श्रद्धानुगता आशा का वह अश्माखण केन्द्र है, जिसके आधार पर हम राजस्थान के प्रतीकभूत महासङ्गीतात्मक आम्नायसिद्ध लोकगीतों को पावनस्मृति को सुरक्षित रखने के गर्व से आत्मविभोर बने हुए हैं । धन्य है राजस्थान, कृतकृत्य है वह राजस्थान, जिसका केन्द्र जयपत्तन बना हुआ है । धन्य है जयपुर का पारम्प-रिक राजवंश, जिसने विद्वानों के द्वारा नैगमिक आम्नाय से अपनी प्रजाको धन्य बनाया । और सर्वाधिक धन्य हैं वे पाठक, जो इस प्रासङ्गिक महासङ्गीत के अनुग्रह से निश्चयेन आस्थायुक्त श्रद्धा से आत्मविभोर * और हमारी ऐसी निश्चित आस्था है कि, जगन्माता जगदम्बा माताशिलामयी के पारम्परिक श्राम्नायसिद्ध अनुग्रह से वर्त्तमान नृपति श्रीमान सिंहदेव के, तथा इनके वंशजों के द्वारा भी पूर्व -स्थापित नैमिक -- धर्मपरम्परा - आम्नायपरम्परा आदर्श ही प्रमाणित होती रहेगी । वर्त्तमान में जो इस दिशा में युग - धर्मानुगत विराम देखा सुना जा रहा है, उसे हम कृत्रिम श्रापातरमणीय मानते हुए गन्धर्वनगरीला ही समझ रहे हैं, जो निकट भविष्य में ही शरदभ्रवत् विलीन होने वाली है, एवं उदित होने वाला है वही सूर्य अपने स्वस्वरूप से । श्रमित्येतत् । २२६.
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श्राद्धविज्ञान बन जाने वाले हैं । इसी कृतज्ञता परम्परा से पितर कम्र्मानुगत रात्रिजागरण - निबन्धन कतिपय महासङ्गीतों दाहरण समुपस्थित हो रहे हैं । श्रूयताम्! श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्!! आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ इस पावन स्मृति के श्रवण - अवधारण से पूर्व पाठकों से साञ्जलिबन्ध एक आवश्यक आमानिवेदेन और | उदाहरणरूपेण अत्र उपन्यस्त - उद्धृत लोकगीतों की भाषा वह जयपुरी भाषा है, जिसका भाषाविज्ञान की दृष्टि से कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं है । यह भाषा एक प्रकार की प्राकृत भाषा है, ग्रामीण भाषा है, शिष्टमान्यता - शिष्ट आदर्श से स्खलित भाषा है । किन्तु है यह हमारी देशभाषा, जिसे हम जयपुराभिजनत्त्वेन ' जननी ' ( मातृभाषा ) पद पर आरूढ़ मान रहे हैं । इसीलिए हमारे लिए यह श्रद्धाभाजना है । फिर उन प्रस्तुत लोकगीतों के सम्बन्ध में तो कुछ कहना हीं नहीं है कि, जिनमें अनन्यश्रद्धाक्षेत्रानुगत पितर - कर्म का यशोगान हुआ है । श्रतएव इन उदाहरणों की भाषानुगता आलो-चना को मीमांस्य न बनाते हुए कृपालु पाठक इनके आम्नायानुगत भावों को ही लक्ष्य बनाने का अनुग्रह . करते हुए हमारी इस श्रद्धा का संरक्षण करने को निःसीम उदारता ही अभिव्यक्त करेंगे । कारण, हमारा मूल.. लक्ष्य रहा है एकमात्र - ' श्रद्धवाँल्लभते ज्ञानम् ' । वही लक्ष्य पाठकों का भी रहे, तो श्रेयः पन्था है । पितृकर्मानुबन्धी--: महासङ्गीत की पावनस्मृति के कतिपय उदाहरण. जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है, अमुक विशेष कामना की पूर्ति के लिए, अथवा तो गर्भाधानादि स्मार्त्त माङ्गलिक पर्वों के अवसर कुलस्त्रियों के द्वारा ( समानगोत्रानुगता कुटुम्बकी ÷ चान्द्र - महानात्मस्वरूप पितरों से सम्बन्ध रखने वाले इन पैत्र- लोकगीतों की पावनस्मृति ' इस लिए ' महासङ्गीत ' नाम से सम्बोधित हुई है कि, इन गीतों का प्रधान प्रतिपाद्य विषय बन रहा है । ' चन्द्रानुगत पाथिव महानात्मा ' | महान् ( महानात्मरूप पितर ) का यह ' संगीत ' है, अतएव इस ' महान् -संगीत ' ( महानात्मसङ्गीत ) को ' महासङ्गीत ' कहना सर्वथा अन्वर्थ बन जाता है । ' महासङ्गीत ' क्यों, ' महागीत ' ही क्यों नहीं?, प्रश्न किया जासकता है इस अभिधा के सम्बन्ध में । उत्तर स्पष्ट है । ' समित्येकीभावे ' प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है - अनेकों का एकत्र निविरोधरूप से एकीभाव, समसमन्वय । यदि एकाकिनी कुलस्त्री ही इस पैत्र गीत का गान करती, कर सकती, तो अवश्य ही महानात्मनिबन्धन पैत्रगीत को केवल ' महागीत ' अभिधा से युक्त माना जा सकता था । किन्तु अनेक कुलस्त्रियों - समान-गोत्रानुगता बन्धु - परिवार की सम्मिलित स्त्रियों के एकीभाव से - एकतानता से ही इन गीतों का गान सम्भव बनता है । इस ‘ सम् ' भावात्मक ' अनेकासामेकीभावात्मक ' महागीतको ' महा - सम् गीत ' रूप से ' महासङ्गीत ' नाम से व्यहृत करना ही अन्वर्थ बनता है । २३०