Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 301–310

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 301–310

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् स्त्रियों के द्वारा ) रात्रि में पितरों के लिए पट्ट स्थापन होता है, पितरों की प्रतीकरूपा सुबर्ण ( हिरण्मयतेज ) मूर्त्ति ( जो कि लोकभाषा में ' पितरों की पातड़ी ' कहलाई है ) बनाई जाती है, मङ्गलगानानन्तर ' पातड़ी स्थापन के गीत ' के साथ पातड़ी पट्ट पर स्थापित करते हुए सर्वान्त में नमस्कारपूर्वक यह पावन पितर-कर्म उपरत होता है । सम्पूर्ण गृह्य मंगलाचारों में विवाहानुबन्धी माङ्गलिक कम्र्मों के उपलक्ष में किए जाने वाले रात्रि जागरणात्मक पितरकर्म में आरम्भ में ' गणपति ' का संस्मरण ( गणपति का लोक-गीतगायन ) इसलिए आवश्यक माना गया है कि, बिधाहारम्भ में गणपति का स्थापन ही मुख्य आधार बनता है । विवाहातिरिक्त अन्य सम्पूर्ण काम्य माङ्गलिक पित्तरकम्मों में गणपति का संस्मरण अनिवार्य नहीं माना जाता । पितृकर्मानुगत महामहनीय काम्य रात्रिजागरण का उपक्रम होता है तत्तत्कुलों की तत्तत् मान्यताओं से अनुप्रमाणित तत्तत् विशेषप्राणशक्तिरूपा कुलाराध्या कुलदेवी के पावन संस्मरण के साथ एव सर्वप्रथम उसी प्राथमिक पावनस्मृति की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया । पितृकर्म में सर्वारम्भ का मुख्य महासङ्गीत माना गया है । तन्मयतया श्रयताम् जाता है, जो ! अथवा स्त्री की सहजभावुकता ( स्त्रीसहजप्रवृति ) की दृष्टि से भी उक्त अभिधा का लोक-दृष्टि से भी समन्वय किया जासकता है । गीत बहुत छोटे, आरम्भ से अन्तत मूलविषय एक, और वह भी संक्षिप्त । किन्तु भाचुकतावश उसे ही पुनरुक्तिपूर्वक लयपूर्वक लम्बलम्बायमान करके गाना, छोटे से भी गेयपद्य को बहुत बड़ा बना कर गाना स्त्रीभावुकता का सहज स्वाभाव है । यदि स्त्री किसी की निन्दा करने बैठेगी, तो उसकी सात पीढ़ी के दोषों का बखान कर डालेगी, यदि स्तुति करने लगेगी, तो समस्त परिवार को सर्वमूर्द्धन्य प्रमाणित कर देगी । आरम्भ मात्र कर देना भावुकता का सहज किन्तु समाप्तिबिन्दु से अपरिचित रहना भावुकता का सहज दोष । भावुक स्त्री आरम्भ करना जानती गुण, है, समाप्त करना नहीं । दो चार स्त्रियों को बात चीत आरम्भ करने तो दीजिए, लक्ष्य बातचीत का नितान्त स्वल्प, किन्तु बातों का ओर छोर ही नहीं । जब सामान्य वार्त्तालाप सम्भाषण को ही यह है, तो गीतों के सम्बन्ध में तो आलोचना ही व्यर्थ है । गाते गाते गला भले ही सूख जाय, किन्तु कथा उपरत नहीं हो पाता । अतः इनके सभी गोत इस विस्तारानुबन्धिनी महत्ता के कारण ' महागीत ' ही नहीं गान, अपितु ' महासङ्गीत ' ही मानें गायेंगे । किसी भी एकाकिनी कुलस्त्री से आप लोकगीत का स्वरूप जानने का प्रयास कीजिए, कभी आपको तबतक अपनी इस जिज्ञासा सफलता प्राप्त न हो सकेगी, जब-तक कि दो चार स्त्रियाँ सम्मिलित होकर समात्मक एकीभाव से गान में प्रवृत्त न हो जायँगी । यही इन लोकगीतों की लोकनिबन्धना ' महासङ्गीतता ' है । क्या आप अपनी प्रेरणा - जिज्ञासा से कुलस्त्रियों का अपनी इच्छानुसार संघ बना कर उन से इस महासङ्गीत के स्वरूपज्ञान में सफलता प्राप्त कर सकते हैं?, नेति होवाच । कभी आप इस प्रत्यक्ष प्रयास में उन परोक्षप्रिया भावुक कुलस्त्रियों से साक्षाद् रूप से २३१

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श्राद्धविज्ञान ( १ ) - कुलदेवी के संस्मरणात्मक महासङ्गीत की प्रथम पावनस्मृति-( १ ) — आज झार अन धन, हुया छ उछाह । भल टूटी छे ' बड़वासा ' माता ' मावली ' जी ॥ ( २ ) - चीरँजीओ मीसर ' सेवाराम ' जी, राव पूत -जगज नींव लगावला ' बिंदराबनजी ' मोकल जी ॥ ( ३ ) - वीरँजीओ मीसर ' बिंदरावनजी ', राव पूत-नारेला राकोट चुणावला ' जटासंकरजी ',. मोकलाजी || ( ४ ) - चीरँजीओ मीसर ' जटासंकरजी ', राव पूत -खेल सुपारी बढ़ावला ' लिछमणरामजी ' मोकलाजी ॥ ( ५ ) - चीरँजीओ मीसर ' लिछमणरामजी ', राव पूत-मँड काच लावला ' बालचन्दरजी ' मोकलाजी || ( ६ ) -- चीरँजीओ मीसर ' बालचन्दरजी ', राव पूत — सोना रो छत्तर लगावला ' हरीचन्दरेजी ' मोकलाजी ॥ ( ७ ) - चीरँजीओ मीसर ' हरीचन्दरजी ', राव पूत-मोतीडाएँ खत चढ़ावला ' महेसचन्दरजी ' मोकलाजी ॥ - घी भर दिवलो पावला ' सुरेसचन्दरजी ' मोकलाजी - लापसड़ीरो भोग लगावला, चँवर लावला ' प्रेमचंदरजी ' ' सतीसचंदरजी ' मोकलाजी ॥ महासङ्गीत का स्वरूपबोध प्राप्त न कर सकेंगे । महासङ्गीतभावना जागरूक बनती है इनमें स्वतः ही तत्तद्विशेष पर्वोत्सवों के अवसरों पर ही । वहाँ भी परोक्षरूप से ही आप इनका श्रवण कर सकते हैं । यदि आप प्रत्यक्ष में आ गए, तो लज्जास्वभावा कुलनारियाँ तत्काल उपरत हो जायँगीं । अतः आप परोक्षरूप से तदवसरों पर अवधान पूर्वक सुनिए, तदाधारेणैव उस श्रुत महासङ्गीत की पावन ' स्मृति ' के आधार पर ही इनकी आम्नायानुगता व्याख्या का समन्वय करने का प्रयास कीजिए । इसीलिए तो हमने यहाँ ' महासङ्गीत की पावनस्मृति ' ये उद्गार व्यक्त किए हैं । ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' । २३२

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ८ ) - लख्या ए * छोटा मोटा जात आया ज्याँ न फल देय - दूध, पूत, अटूट लिमी देई बड़वा माय! दे कुल दीवट माय! ( ६ ) -- बाबा ( सेवारामजी ) बिंदरावनजी का पीरवार में छप्पर छायो ए बड़वासण माय! वंस बधायो ए बड़वासरण माय! बेटा दीजे ए बड़वासरा माय! ओर ' आजे ए बड़वासण माय! ( १० ) - आँबा - बिजोरा - दाख- दाड्यूँ सदा ए लोयण साँवली कोयलिए मुँदरी चाल चाल, सूटो हरियालो जी " माता ईसरी परमेसरी कुल दीवट बँस बधावणी " राज - दिवाण सोवे ( ११ ) - त्यो त्यो मोटा घ त्यो ज्याँ घर पूत निपजे ag raat Hd माता! बहु ए वी मकती ॥ -१-( १ ) - सेबाराम: -वृद्धातिवृद्धप्रपितामहः - वृन्दावन: --अतिवृद्धप्रपितामह: / ( ७ ) - महेशचन्द्र: - ज्येष्ठपुत्रः ( ३ ) -- जटाशङ्करः --- वृद्धप्रपितामहः * - सुरेशचन्द्रः - हरिश्चन्द्रपुत्राः ( ४ ) - लक्ष्मणराम: - - प्रपितामहः प्रेमचन्द्रः - कनिष्ठपुत्राः --बाल चन्द्रः ( ६ ) - हरिश्चन्द्र: --पितामह: / -पिता / * - सतीशचन्द्रः सापिण्ड्य ' साप्तपौरुष मित्याहुराचार्याः * " लख्या ए छोटा मोटा जात भाया " - परमश्रद्धेय स्व ० श्रीबालचन्द्रजीशास्त्री के मध्यम पुत्र, . ( कुलज्येष्ठ - श्रेष्ठ अनन्यश्रद्धय वर्त्तमान श्रीहरिश्चन्द्रजी शास्त्री के मध्यम भ्राता ), एवं हमारे परमश्रद्धेय स्व ० श्रीराधाचन्द्रजी शास्त्री ( गोविन्दचन्द्र - सापिण्ड्य वितान परम्परा की अपेक्षा से पितामह, जिनका स्वर्गरागमन बहुत ही छोटी अवस्था में स्व ० श्रीबालचन्द्रजी शास्त्री के २३३

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श्राद्धविज्ञान जिस प्रकार आधिकारिक स्वर्गीय दिव्य वृक्षों में अश्वत्थवृक्ष माना जाता है, तथैव वटवृक्ष शिवदेवात्मक माना गया है । ( पीपलका पेड़ ) विष्णुदेवात्मक-पराणां परमा परमेश्वरी ही ' वटवासिनी ' देवी कहलाई है, जो शिव वटस्थित की महाशक्ति शिवके महामाया ईश्वरी परा-स्थित है । इसी शब्द का प्राकृत रूप है - ' बड़वासण माता ' । बट साथ दाम्पत्यरूप से भवानी - आदिदेव महादेव की श्रद्धाङ्गिनी ' आदि भवानी ' ही हमारी में रहने वाली शिवसंयुक्ता परमेश्वरी सापिण्ड्यलक्षणा सप्तप्रजातन्तुवितानात्मिका निगममर्थ्यादा से इसी की स्तुति कुलदेवी है । ' महासङ्गीत ने कुलाम्नाय में वटवृक्ष महा पूज्य माना गया है । इस का काष्ठ कभी हमारे की है । इसीलिए हमारी ( रसोई ) में उपयुक्त नहीं होता । वैसे व्यापक मान्यता के अनुसार भी इसी शिवशक्ति गृहानुबन्धी पाकक कारण वटवृक्ष मृत्युञ्जय भगवान् शिव का प्रतीक माना गया है, जिस -अधिष्ठान के अमावास्या तिथि को आज भी सौभाग्यसंरक्षण - शीला कुलदेवियों के के आधार पर ज्येष्ठ कृष्णा पावन तिथि ' वटसावित्रीतिथि ' नाम से प्रसिद्ध है । पुराण की द्वारा यह पूजित होता है, जो कि बलपर महासती सावित्री ने अपने पति सत्यवान् को यमपाश से ऐसी मान्यता है कि, इसी व्रत के मुक्त कर लिया था । भौतिक जीवनकाल में ही हो गया था, तब उन्होंने हीं कुताम्नाय उनके कनिष्ठपुत्र एवं श्रीहरिश्चन्द्रजी के कनिष्ठ भ्राता - वर्तमान गोविन्दचन्द्र संरक्षण के लिए जिस शर्मा को श्रीराधा-चन्द्रजी का दत्तक पुत्र बना दिया था वे, तथा आम्नाय श्रद्धालु गोविन्द चन्द्रशम्र्मा तत्पुत्रौ आयुष्मन्तौ श्रीकृष्णचन्द्र - श्रीवसन्तकुमार शम्र्माणौ निश्चयेन आम्नायसंरक्षकौ ( पिता ), एवं कुलदेव्यानुग्रहेण, सापिण्ड्य भावप्रवर्त्तकौ - तत्संरक्षकौ नैगमिका " हो महासङ्गीतानुगत श्रीवटवासिन्याः इत्यादिपद्य पठित ' छोटा मोटा ' का स्वरूप परिचय है । हमारे कुल में सर्वज्येष्ठ ' ओलख्या ए ० ' हरिश्चन्द्रजी की वंशपरम्परा के समतुलन में क्योंकि श्रद्धेय स्व ० श्रीराधाचन्द्रजी की गोविन्द - श्रेष्ठ श्रद्धेय श्री-वंशपरम्परा कनिष्ठ है, अतः इस परम्परा को ' छोटा ' कहा जायगा । साथ ही कनिष्ठ चन्द्रादिरूपा आगे चल कर वंशाम्नायपरम्परा को विशाल वंशवृक्ष रूप में सुविस्तृत करती परम्परा ही क्योंकि ( कनिष्ठ ) को ' मोटा ' ( महान् ) भी कह देना अन्वर्थ हो माना है । अतएव इस ' छोटा ' जायगा । यही ' छोटामोटा ' का समन्वयार्थ होगा । लोकप्रतिष्ठा - लोकप्रसिद्धि - लोकख्याति का ज्येष्ठ कुलपुरुष पद-है, जैसा कि - ' एको गोत्रे स भवति पुमान् - ' यः कुटुम्बं विभर्त्ति ' इत्यादि से ही सम्बन्ध आम्नाय सिद्ध है | लोकसम्मान के लक्ष्य से कुलज्येष्ठपरम्परा ही नामग्रहणपूर्वक लक्षित बना आम्नायवचन करती से प्रमाणित का स्थान तो कनिष्ठता के कारण, जेष्ठ के समतुलन में आत्मसमर्पणात्मक श्रद्धाभाव है । कनिष्ठपरम्परा के कारण अलदित-ही माना जायगा । यही आम्नायसिद्ध ' अलक्षित ' भाव महासङ्गीत में प्राकृतरूप पद ( जो लक्षित हैं, कनिष्ठपरम्परा के कारण जो ज्येष्ठों के सामने समादरात्मिका से - ' ओलख्या ए ' नहीं होते ) अभिव्यक्त हुआ है । अभिधा से सम्बोधित २३४

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ऋणमोचनोपायोपनिपत महासङ्गीत का अक्षरार्थ यद्यपि स्पष्ट है । तथापि अन्य समन्वय यों किया जासकता है कि- प्रान्तीयों की दृष्टि से इसकी भाषा का ( १ ) ' अहो! ( ' अँ – श्रो ' का मूलरूप ) अन्न और वित्त की कुल में बहुत बड़ा उत्सव ( पितरकर्म्म ) होने जा रहा है । यह अन्न परिपूर्णता के कारण आज मेरे ( रात्रि जागरणात्मक महत्फलप्रदाता काम्य पितरकर्म्म ), सब - धन की समृद्धि, यह महामहोत्सव मातृशक्ति की अनुकम्पा का ही महत्फल है, जो अपनी अवान्तर कुछ हमारी कुलदेवी वढवासिनी उस मातृपरम्पराओं में - पक्ति में श्रेणिविभाग में विभक्त होती अङ्गशक्तियों से ' मातृ - परम्परा - चतुर्दश-से प्रसिद्ध हो रही है । हुई ' मावली ' ( मा की अवली - पंक्ति ) नाम ( २ ) - ( उस कुलदेवी के अनुग्रह से चान्द्रलोकस्थ हमारे सेवाराम जी मित्र चन्द्रलोक में स्वस्थ रहैं । उनके कुल के वृद्धातिवृद्धप्रपितामह श्रद्धेय श्री-सम्पत्तिशाली ( राव ) स्व अपने सापिण्डथ बतान से अपने कुल की नींव सुदृढ़ ० पुत्र श्रीवृन्दाबनजी लगावेंगे - ( लगा रहे हैं - लगा दी है ) । लगा रहे हैं, बहुविस्तृत ( मोकली - मोकला ) ( ३ ) -- अतिवृद्धप्रपितामह श्रद्धय मिश्र श्रीवृन्दावनजी स्वलोक शङ्करजी कुलदेवी के मंन्दिर ( कुल ) में श्रीफलों का दुर्ग निर्माण में स्वस्थ रहैं, जिनके पुत्र श्रीजटा-सम्पत्ति को करायेंगे ( करा रहे हैं, करा दिया है ), ' बनायेंगे - ( बना रहे हैं, बना दी है ) । ( ४ ) - वृद्धप्रपितामह श्रद्धेय मिश्र श्रीजटाशङ्करजी स्वस्थ रहैं स्वलोक रामजी मातृमन्दिर में पूजार्ह सुपारी से माता का सम्मान करेंगे - ( में, जिनके पुत्र श्रीलक्ष्मण-कर रहे हैं, सदा के लिए कर रक्खा है ) । ( ५ ) - प्रपितामह मिश्र श्रद्धेय श्रीलक्ष्मणरामजी स्वस्थ . मातृमन्दिर को दर्पणच्छाय से समलंकृत करेंगे - ( कर रहे हैं रहैं स्वलोक में, जिनके पुत्र श्रीबालचन्द्रजी , कर दिया है ) । ( ६ ) - पितामह मिश्र श्रद्धेय श्रीबालचन्द्रजीशास्त्री सर्वसौख्ययुत सुपुत्र ( हमारे कुल के सर्वज्येष्ठ श्रेष्ठपुरुष ) श्रीहरिश्चन्द्रजी शास्त्री रहें चान्द्रस्वर्ग में, जिनके वर्तमान नाम ' से लोक में सुप्रसिद्ध ) मातृमन्दिर में सुवर्ण का छत्र लगाएँगे ( वर्त्तमान श्रभिधा में ' बाबा हरिश्चन्द्र ' द्वारा हिरण्मय तेजोमण्डलाल्पक ' ब्रध्नस्य विष्टप् ' नामक सौर - हिरण्मय । ( दत्तकमर्थ्यादया पौत्रमुख- दर्शन में प्रतिष्ठित करने के रूप में सुवर्ण का छत्र लगा चुके हैं, जिसे संस्कार को अपने ऐहिक भूतात्मा लोक में- ' सोने की सीढ़ी पर चढ़ना कहा जाता है ) । ' * अध्यापन कराने वाले द्विजाति को ' आचार्य ', एवं कुजानुगत पौरोहित्यकर्म ' उपाध्याय ' कहा जाता है । दोनों कर्म कराने वाले ' मिश्रकम्र्मानुगत कराने वाले को प्राकृतरूप है लोकगीत में ' मिसर - मीसर ' | ' द्विजाति ' मिश्र ' कहलाए हैं, जिसका २३५

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श्राद्धविज्ञान ( ७ ) - वर्त्तमान- पिता अनन्य श्रद्धेय पूज्य मिश्र श्रीहरिश्चन्द्रजीशास्त्री अपने वर्त्तमान जिनके जीवन ज्येष्ठ पुत्र में कुलानुगता लोकख्याति, पुत्रादिसम्पत्ति, वित्तादिसम्पत्ति का भोग करते हुए शतायु बनें, भोग, श्री महेशचन्द्रजी, कनिष्ठ तीनों पुत्र मातृमन्दिर में क्रमशः मोतियों के अक्षत, घृत - दीप, लपसी का चामरव्यजन का अनुगमन करेंगे । ( इस प्रकार हे कुलदेवि! हमारी समस्त कुलाम्नाय में सदा से ही , यही . हमारे कुलपुरुष प्रापकी प्रतिभाव से उपासना करते या रहे हैं, करते रहें यावच्चन्द्रदिवाकरौ कामना है हम कुलस्त्रियों की ) । ( ८ ) - माता! हमने अपने कुल के मुख्य पुरुषों की नामगणना की है आपकी आराधना - छोटे - बड़े के प्रसङ्ग में । इसका यह अर्थ नहीं समझलें आप कि, जिन ज्ञात अज्ञात - परिचित - अपरिचित कुलपुरुषों का नाम ग्रहण हमनें नहीं किया, उन पर आप अनुग्रह नहीं करेंगी । माता! उन पर तो आपका विशेष अनुग्रह इसलिए होना चाहिए कि, उन्होंनें तो बिना नाम - रूप कर्म के अपना अस्तित्त्व-व्यक्तित्त्व ( जाति - जात - सब कुछ ) पहिले से ही आपको समर्पित कर दिया है । अतएव सर्वस्व समर्पक नाम से संस्पृष्ट उन छोटों को तो आप दुग्ध ( अन्नसम्पत्ति ), पुत्र ( प्रजासम्पत्ति ), एवं अक्षय लक्ष्मीभाण्डार प्रदान करने का अवश्य ही अनुग्रह करेंगीं हीं, ऐसी हम कुलस्त्रियों की श्रद्धा है । हे वट-वासिनी! आप उक्त सम्पत्तियों का अनुग्रह करतीं हुई हमारे कुल में ऐसे पुरुष को जन्म देने का अनुग्रह करें, जो अपने यश - कीर्त्ति - विद्या बुद्धि - सम्पत्ति आयु आदि से ' कुलदीपक ' प्रमाणित हो । ( ६ ) - हे माता ( सापिण्ड्य सम्बन्धप्रवर्त्तक ) # बाबा श्रीवृन्दावनजी के परिवार में आपने अपने * वृद्धातिवृद्धप्रपितामहस्थानीय सर्वादि के चन्द्रलोकस्थ सप्तममूलपुरुष मिश्र श्री सेवारामजी अब केवल एक सहोभाग से युक्त हैं, इस मान्यता के आधार पर सेवारामजी का इस मर्यादानुबन्ध लोकगीत में हमने नामग्रहण उपयुक्त मान लिया है । कुलदेवी के अनुग्रह से सप्तमपुरुष ' पुत्र ' स्थानीय श्री-महेशचन्द्रजी के, तथा सुरेशचन्द्रजी के भी पुत्रसम्पत्तियाँ होगईं हैं । इन आठवें पुरुषों ( मिश्र श्रीहरिश्चन्द्रजी के पौत्रों ) के कारण हम से आठवें बनते हुए चन्द्रलोकस्थ सेवारामजी का एक सह पूर्णरूपेण सपिण्डता प्राप्त करता हुआ मुक्त हो गया है । अतएव अब हमारे कुल में उनके साथ सपिण्डताप्रवृत्ति का सम्बन्ध न मान कर प्रतिवृद्धप्रपितामह स्थानीय दूसरे चन्द्रलोकस्थ षष्ठ मूलपुरुष मिश्र श्रीन्दावनजी को ही सपिण्डता का मूल मानते हुए इन्हें ही परिवार का मूल ( सपिण्डता का मूल ) माना जायगा । प्रस्तुत कुलगीत में इन्हीं को परिवाराध्यक्ष ( मूलपुरुष - सप्तमपुरुष ) मान लिया गया है । दत्तकविध मर्यादा सेतो गोविन्दचन्द्र श्रीहरिश्चन्द्रजी का पौत्र है, यह पुत्रसन्तति से युक्त हो चुका है, जो कि इस के पुत्र मिश्र श्रीहरिश्चन्द्रजी के प्रपौत्र ( पड़पोते ) स्थानीय हैं । इस दृष्टि से तो बाबा वृन्दावनजी भी . चन्द्रलोक से मुक्त हो गए हैं । अतएव अब लोकगीत में वृन्दावनजी के स्थान में ' बाबा जटासंकरजी का: २३६

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् सहज अनुग्रह को सुरक्षित कर रक्खा है, जो अनुग्रह लोक में ' छत्रछाया ' ( छापर ) + कहलाया है | . हे वटवासिनी! आप ही ने अनुग्रह कर हमारे वंश की वृद्धि की है । ( श्रतएव ) हम आप से ही ( पुन: पुन: ) यह आवेदन कर रही हैं कि, आप सदा ही इस वंश में पुत्रपरम्परा -प्रदान का अनुग्रह करतीं रहैं । ( माता! हमारी प्रार्थना है कि, आप इसी प्रकार जब जब हम आपका स्मरण करें, पधारती रहें । ( १० ) आम्रफल, बिजोराफल, द्राक्षाफल, दाड़िमफल, एवं जम्बूफल, हे माता ये पाचों महामाङ्गलिक फल- ' फलेन फलितं सर्व्वम् ' इस शास्त्रीय आम्नाय के अनुसार फलाशी: के लिए हम आपके समर्पण कर रहीं हैं । इस फलसमृद्धिपूर्ण हमारे कुल में उसी प्रकार मन्दगति का अनुसरण करने वाली पिक ( कोयल ), हरितवर्ण का शुक ( तोता ) - तद्भावापेक्षित मधुरभाषिणी कन्या, परिवार में ', यह समावेश हो जाना चाहिए I आगे आगे की पुत्र सन्तति के संख्यान - क्रमानुसार मूल-पुरुष का लोकगीत में परिवर्तन होता रहना चाहिए, यही लोकगीत का श्राम्नायानुगत प्रामाण्य माना जायगा । महेशचन्द्रजी के पौत्र होने पर औरस मर्यादा से वृन्दावनजी का स्थान ' जटाशंकरजी ' ग्रहण करलेंगे, तबतक वहाँ ( हरिश्चन्द्रजी के परिवार में ) ' बाबा वृन्दावनजी का परिवार में ' यह आम्नाय ही व्यवस्थित मानी जायगी । इधर गोविन्दचन्द्र के परिवार में श्रीचन्द्रलोकस्य मिश्र श्रीराधा चन्द्रजी से सम्बन्धित दत्तक मर्यादा से कृष्णचन्द्र - वसन्त प्रादुर्भाव के कारण ' बाबा जटाशंकर-जी का परिवार में ' यह समाविष्ट होगया है । कुलदेव्यानुग्रह से निकट भविष्य में ही कृष्णचन्द्र के पुत्रसन्तति होते ही उस समय से गोविन्द्रचन्द्र के परिवार में ' बाबा बालचन्द्र जी का परिवार में ' यह समाविष्ट होने वाला है, जिसका कुलकी आम्नायपरायणा देवियों को स्मरण रखना चाहिए । + जयपुरीय ग्रामीण भाषा में पानी - फूँसके ' छप्पर ' के कच्चे निवासगृह हुआ करते हैं । छप्पर की छाया में हीं ग्रामीण जनता विश्राम ग्रहण करती है । इसी का विकृतरूप है - ' छप्पर ' किंवा ' छपरा ' | नागरिक भाषा में जो अर्थ ' छत्रछाया ' का है, ग्रामीण भाषा में वही भाव ' छप्पर ' का है । ग्रामसभ्य-तानुबन्ध से ही लोकगीत में छत्रछायांसमतुलित ( भावसमतुलित ) ' छापर ' शब्द समाविष्ट गया है । * बा, बिजोरा, दाख, दाड्यूँ, जामूण, प्रान्तीय नाम । जामूण सलोनी है, साँवली है । अतएव इसके लिए लोकगीत में ' लोयण साँवली ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ' लोयरण ' शब्द मृदुता का - चिक्कणता-माता का सूचक है, ' साँवली ' शब्द बाह्य नीलाभवर्ण का सूचक है । दोनों स्त्रीसौन्दर्य के क्योंकि प्रतीक हैं, अतएव स्त्रियों की भाषाने इसका अपने भावरूप के समतुलन से ग्रहण कर लिया है । २३७

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श्राद्धविज्ञान समृद्धिशाली पुत्र ( भ्राता - भगिनीवर्ग - भाई बहिन ) हमारे इस परिवारोद्यान में सदा क्रीडाकौतुक करते रहैं । ( इस प्रकार आरम्भ में वंशवर्णन के द्वारा वंश की स्वस्ति कामनापूर्वक कुलस्त्रियोंनें कुलसमृद्धि के लिए सब कुछ व्यक्त कर १० दशम पद्य से- ' फलेन फलितं सर्वम् ' इस स्मार्त्त आशीः को सफल बनाते हुए सब कुछ प्राप्त कर लिया कुत्तदेवी माता वटवासिनी भगवती से । अब इसी पद्य के अन्तिम भाग से कुलदेवी की महिमामयी महाशक्ति - महासामर्थ्य को अभिव्यक्त करती हुई श्रद्धापूर्वक स्तुतिभाव ही अभि-व्यक्त करतीं हुईं - कुलस्त्रियाँ कह हैं है कि ) हे माता! आप ईश्वरा ( सर्वसमर्था ) हैं, परमेश्वरी ( पराशक्ति आदिशक्ति- आदिभवानी - प्रजासर्ग की मूलाधिष्ठात्री ) हैं, अतएव ' कुलदीपक ' ( यशस्वी-दीर्घायु - विद्याबुद्धिवित्तसम्पन्न ) रूप से वंशवृद्धिकारिणीं हैं— ' माता ईसरी - परमेसरी - कुलदीवट - चंसवधावणी ' ( ११ ) - ( सर्वान्त में माता की दीप- कर्पूर से आरार्त्तिक - आरती भाव अभिव्यक्त करती हुई - कुल-स्त्रियाँ कहती हैं कि ), मातृकास्तुति - शारार्त्ति देशाधिपति ( उस ) राजा, और राज्यमन्त्री ( दीवान ) के यहाँ सुशोभित होती है ( जो इस आम्नाय के संरक्षक माने गए हैं, प्रजा का धम्र्माम्नायसंरक्षण ही जिस राजा और मन्त्री का मुख्य कर्त्तव्य माना गया है ) । यह आरार्त्तिक वहाँ सुशोभित होती है, जो समृद्धिशाली आदर्श परिवार हैं, सम्पन्न गृहस्थ हैं । और यह मङ्गलाचार वहाँ ( हमारे कुल में ) सुशोभित हो रहा है, जिस कुल में ( माता के अनुग्रह से आम्नाय संरक्षक ) पुत्र उत्पन्न हुआ करते हैं । ( अपने इन पुत्रों के आधार पर ही हे माता! आपके अनुग्रह से हमारी यह दृढ़ श्रद्धा है कि ) हमारे कुल शीघ्र ही वह पुत्रवधू आने वाली है, ( जो अपने शृङ्गारप्रसाधनों से रुमझुम - मकती हुई है, अतएव जो वंशपरम्परा का वितान करने के अनुरूप - सौभाग्य प्रसाधनों से - वस्त्रालङ्कारों से सुसज्जित है ) । " माता! बहू ए आवली झमकती " = आरम्भ से नवम पद्यवय्यत कुलदेवियोंनें सपिण्डतानुगत शास्त्रीय वंशमय्र्यादा- फलकामना व्यक्त की । किन्तु नारी स्वयं माता है । माता की अपनी भावुतका है कन्या और पुत्र, ( छोरा - छोरी ) -छोटे छोटे मधुरभाषी तुतलाती बोली बोलने वाला बालवृन्द । प्रस्तुत दशम ( १० ) पद्य से कुलस्त्रि -कुलदेवी से यही फलाशी: फलार्पणबुद्धया अभिव्यक्त की है । आम्रादि पाचों फलों की महा-माङ्गलिकता सर्वात्मना निगमागमद्वारा अन्यत्र निरूति है । पाँचों में पारिवारिक विधानों में ' बिजोरा ' अपना विशेष महत्त्व रखता है । तन्त्र ने बिजोरा फल को ऋद्धि - सिद्धि - समृद्धि का प्रतीक माना है । * पुत्रवधुओं का ही तो यह सब कुछ पारिवारिक वैभव है, जिनके द्वारा वंशवितान सुरक्षित रहता है । अतः सर्वान्त में यही कामना अभिव्यक्त हुई है । २३८

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् कुलदेवी के प्राथमिक पावन महामाङ्गलिक संस्मरण से सम्बन्ध रखने वाला पूर्वप्रतिपादित ' महासङ्गीत ' ११ एकादश पद्यों में परिपूर्ण हुआ है, जो एकादशसंख्या रुद्रविभूति मानी गई है, जोकि ' रुद्रचान्द्रपितर ' पूर्व की प्रेतपितृस्वरूपव्याख्या के प्रसङ्ग में तालिकाप्रदर्शन पूर्वक विस्तार से प्रतिपादित हो चुका है । रुद्रात्मक + चान्द्रमहादेव ( महानात्सदेव ) से अनन्या वटवासिनी रुद्राणी ही आदिभवानी ईश्वरी परमेश्वरी कुलदेवी है । रुद्रानुबन्ध से इस रुद्राणी कुलदेवी के यशोगान में सहज आम्नाय से एकादश समाविष्ट हुए हैं । दो शब्दों में इस प्रथम महासङ्गीत के निगमानुगमानुगत आम्नाय - प्रामाण्य की भी मीमांसा कर लीजिए | क्या मूल है ' वटवासिनी ' का?, तथा क्या महत्त्व है सौम्य पितरकर्म में वटवृक्ष का, एवं तच्छक्तिरूपा भवानी का 1. वेष्टनधर्मा, अतएव लोकसाहित्य में ' वट ' नाम से प्रसिद्ध ' बड़ ' का पेड़ निगम भाषा में ' न्यग्रोध ' कहलाया है । प्रारम्भिक यज्ञानुगत सौम्य चमस ( वायव्य-प्राणात्मक यज्ञिय पात्रविशेष ) में परिपूर्ण अश्मासोम ( धनभावापन्न सोम- अस्थिभावात्मक सोम ) का अध: ( नीचे की ओर ) विस्रसन ( स्खलन ) हुआ, इसी से ' न्यग्रोध ' वृक्ष का स्वरूपनिर्माण हुआ । नीचे की ओर जटाविस्तार से भूगर्भानुगत बनता हुआ यह वृक्ष ' न्यङ - रोहति ' लक्षण रोहण से ही ' न्यग्रोह ' कहलाया है, जिसे परोक्षभाषा में ' न्यग्रोध ' कहा गया है ( शत ० १३२७१३२ - ऐ ० वा ० ७/३० ) | घनास्थिलक्षण आश्मासोम ही न्यग्रोध का मौलिक उपादान है, जो कि सोमोपादान पितर-प्रारणात्मक बनता हुआ ' स्त्रधा ' कहलाया - है ' अस्थिभ्य एवास्य ( चान्द्रसम्वत्सरप्रजापतेः ) स्वधा वन्, स न्यग्रोधोऽभवत् ' ( शत ० १२७ १२६ ) । चन्द्रमा जहाँ साक्षात सोम है, वहाँ यह न्यग्रोध सोमस्वधा से निर्मित होता हुआ परोक्ष सोममूर्त्ति ही है- ' परोक्षमित्र - ह वा एष सोमो राजा-यन्न्यग्रोध: ' ( ऐत ब्रा ०७ / ३१ | ) | चन्द्रमा हीं सोमरूपात्मक रुद्ररूप से ' महान् देव ' बनते हुए ' महादेव ' हैं । " तं रुद्रमब्रवीत् - ' महान् देवोऽसी ' ति । तद्यदस्यतन्नामाकरोत् चन्द्रमास्तद्र, द्रमभवत् । प्रजापति-र्चे ' चन्द्रमाः, प्रजापति महान्देवः " ( शत ०६ | १ | ३ | १६ ) । न्यग्रोध इसका प्रतीक बनता हुआ अवश्य ही शैव- पैत्र - चन्द्र- रौद्र - वृक्ष है । तदभिन्ना रौद्री भवानी शक्ति ही ' वटवासिनी ' देवी है, जो सौम्या बनती हुई वंशानुगत - पितरप्राण की मूलप्रतिष्ठा मानी जा सकती है, एवं यही इस वटवासिनी देवी का नैगमिक आम्नाय है । भूतनाथ रुद्रभगवान् का प्रतीकरूप वटवृक्ष ' वृक्षनाथ ' है, रुद्रवृक्ष है, इसका आधिकमूल आर्य सर्वस्व ( पुराण ) में यों निरूपित हुआ है-+ इसी दृटिकोण से मालवा प्रान्त ( मध्यप्रान्त ) में रात्रि जागरणात्मक पत्रक में ' महादेव ' के माध्यम से भी तत्प्रान्तीय ' ओङ्कारेश्वर महादेव ' का यशोगान वहाँ के लोकगीतों में समाविष्ट है । * शब्दरत्नावली में पठित वदनाम - ' वृक्षनाथ ' । २३६

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान

ऋषय ऊचुः — कथं त्वयाश्ववटौ गोब्राह्मणासमौ कृतौ ।

सर्वेभ्योऽपि तरुभ्यस्तौ कथं पूज्यतमौ कृतौ? ॥

सूत उवाच - अश्वत्थरूपो भगवान् विष्णुरेव न संशयः ॥

रुद्ररूपो वस्तद्वत् ' पलाशो ब्रह्मरूपधूक ॥ १ ॥

दर्शनस्पर्शसेवासु ते वै पापहराः स्मृताः ।

दुःखापद्व्याधिदुष्टानां विनाशकारिणौ ध्रुवम् ॥ २ ॥

- पद्मपुराण- उत्तरखण्ड - १६० अध्याय । " वटे वासोऽस्याः - इति ( रुद्रशक्तिः - पराशक्तिः - परमेश्वरी - आद्या एव ) वटवासिनी - देवी " इति हेमचन्द्र ' -१-( २ ) कुलदेव्यातिथ्यात्मक महासङ्गीत की द्वितीय पावनस्मृति-) - भावापन्न भावनामय- मनोमय - ( भावुकतानुगता श्रद्धात्मिका मान्यतानुगता संस्मरण - ( स्वरूपोपवर्णन ) --पूर्व के प्रथम महासङ्गीत - श्रवण से कुलस्त्रियों के भावनाजगत् में सङ्गीत- माध्यम से वटवासिनी रौद्री. चान्द्री - कुलदेवी पधार कर प्रतिष्ठित होग ई अतिथिरूप से । इनके साथ साथ इन की अवान्तर शक्तियाँ अवान्तर सशक्त भूतवर्ग, आदि लक्षण वह समस्त शक्तिपरिवार, किंवा रुद्रपरिवार भी भावनाजगत् में • समाविष्ट हो गया, जिस परिवार का पूर्व के सांख्याभिमत चान्द्र चतुर्दशविधभूतसर्ग - प्रसङ्ग में निरूपण G किया जा चुका है । श्रतएव रौद्री कुलदेवी के आगमन का अर्थ यह हुआ कि, रुद्रमूलक रुद्रात्मक सम्राज्ञी ' " चतुर्दशविध चान्द्र भूतसर्ग से नित्य संश्लिष्ट चतुर्दशविध शक्तिसर्ग - जिसे की पूर्व में ' एक ही ( महारानी ) रूप से उपस्तुत किया है - कुलस्त्रियों के भावनाजगत् में प्रतिष्ठित हो गया । ) सम्राज्ञी ने ( मूल एक ही शक्ति ने ) नहीं, अपितु तूलभावापन्ना चतुर्द्दश सम्राज्ञियोंनें ( चौदह महारानियोंनें आतिथ्य ग्रहण कर लिया । पितरकर्म से भी पूर्व अवान्तरशक्ति युक्ता इस कुलदेवी का आतिथ्य वि बन जाता है । प्रस्तुत द्वितीय महासङ्गीत उसी आतिथ्यकर्म का स्वरूपविश्लेषण कर रहा है । अवधानपूर्वक कीजिए इस महासङ्गीत की पावनस्मृति को भी अपने श्रद्धामय मानस पटल पर खचित प्रतिष्ठित! २४०