Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 311–320
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 311–320
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) मा था ( माथान ) मँ मद ( मॅमद ) पर ल्यो | ( परन्यो ) द्वाराण्यों ए! र खड़ी ( रखड़ी ) ए माता रतन ( रतन ) जड़ाय - ( जड़ाय ) भैरूँ बाब खेल रह्यो, चौगान ( चौगान ) हणमत बाबो खेल रह्यो । ( २ ) - कानान कुण्डल ' परल्यो द्वाराण्यों ए! ' ठग ' ए माता रतन जड़ाय - मैरू ०, चौगान ० ॥ ( ३ ) * ' मुखड़ा ने बेसर ' परन्यो धाराण्यों ए! , ' भलको ' ए माता रतन जड़ाय - भैरू ०, चौगान ० ॥ ( ४ ) - ' गलान पंचमयों ' परल्यो द्वाराण्यों ए! ' कठलो ' ए. माता पाट पुवाय - भैरू ०, चौगान ०, ( ५ ) - बैय्यान बाजूबंद ' परल्यो आराण्यों ए! , बाजूबंद के ए माता ' लूम ' लगाय - भैरूँ ०, चौगान ० ॥ ( ६ ) - ' पोइयाँन गजरा ' परल्यो द्वाराण्यों ए! ' चुड़लो ' ए माता नकस लगाय – भैरू, चौगान ० ॥ ( ७ ) - कड्यॉन कणकती ' परम्यो झाराष्यों ए! कणकती क ए माता ' झूम ' लगाय – मैं ०, चौगान ० ॥ ( ८ ) - ' पगल्यान पायल ' परल्यो द्वाराण्यों ए! , गया में ए माता ' फोलरी ' सुहाय - भैरूँ, चौगान ०, ॥ ( ६ ) - ' कमरयाँ पटोलो ' परल्यो द्वाराण्यों ए! ' स्यालूड़ा ' क ए माता कोर लगाय - भैरूँ ०, चौगान ०, - सर्वत्र लोकगीतों में कुलस्त्रियाँ यथा सुविधा स्वानूरूप कहीं व्यञ्जनों, कहीं स्वरों, कहीं पद में मध्य मध्य में वितान - फैलाव - का समावेशा करतीं हुई हीं इन महासङ्गीतों का सम्मिलित रूप से ही यह महागान कर पातीं हैं । * नासिका ( मुखोपलक्षित नाक - नासिका ) । २४१
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श्राद्धविज्ञान ( १० ) - छतियाँ न अँगिया परन्यो द्वाराण्यों ए! ' अँगिया क. ए मा ' कणा ' लगाय - भैरूँ, चौगान ०१ ॥ ( ११ ) - खीर घेवर को भोग ' छ झाराण्यों ए! रुच रुच ए माता भोग लगाय - भैरू, चौगान ०, ॥ - * " नोलख श्रव थार बाँझड़ी हारायों ए! ( आशी: - कामना दसलख ए माता बालूड़ारी माय । बिनती सुराज्यो ह्यारी ए झाराष्यों ए! " चौरासी के ए माता पिच्यासी लगाय " भैरूँ बाब खेल रह्यो, चौगान रामबाब खेल रह्यो जी ॥ " पद्य ११ संख्या में विभक्त है, अन्तिम पद्य का आशी: - कामना ( फलकामना से ) सम्बन्ध है । एकादशपद्यात्मक इस आतिथ्य सत्कारनिबन्धन महासङ्गीत के द्वारा कुलदेवी का भावनामाध्यम से लोका-नुगत स्त्रीभावसमतुलित षोडश आभूषण शृङ्गारों से, प्रान्तानुगत वस्त्रविन्यास से, एवं निगमानुगत सेतिय अन्नप्रदान हुआ है । सर्वान्त के परिशिष्टात्मक संकेतित वाक्यचतुष्टयात्मक ( क - ख - ग - घ ) पद्म से सर्वविध आतिथ्य से तुष्टुतृप्त माता भवानी कुलदेवी से फलकामना अभिव्यक्त की गई है । * १ – मस्तक, २ – कर्ण, ३- मुख ( मुखोपलक्षिता नासिका ) ४- ग्रीवा: - भुजा, ६ - मणिबन्ध, ७- कटि, ८ - पाद, ६ - पादाङ्ग ली, इन नौ प्रधान शरीरावयों के आभूषणों - अलङ्कारों का ( प्रान्तीय मान्यता के अनुपात से ) स्वरूपवर्णन हुआ है, जो कि आभूषण - भूषणात्मक श्रलङ्कार - सौम्य - स्त्रीतत्त्व ( प्रकृतितत्त्व ) के लिए स्वभावतः आकर्षक शृङ्गारप्रसाधक बने रहते हैं, जिनके नैगमिक मूल एवंरूपेण यत्रतत्र ब्राह्मण आरण्यक ग्रन्थों में उपलब्ध हो रहे हैं-( १ ) - ' तं पञ्चशतान्यप्सरसां प्रतियन्ति - शतं फलहस्ताः, शतमाञ्जनहस्ताः, शतं मान्यहस्ताः, शतं वासो हस्ताः । अलङ्कारेण कुर्वन्ति " । -- शाङ्खायनारण्यक ३ । ४ । * ( १ ) - मस्तक - माथा । ( २ ) - कर्ण - कान । ( ३ ) - मुख तदुपलक्षित ) नाक । ( ४ ) - प्रीवा - गंला । ( ५ ) - भुजा - बैंया । ( ६ ) - मंणिबन्ध - पोंछया । ( ७ ) - कटि - कड्याँ । ( ८ ) -पाद - पगल्या । ( ६ ) - पादाङ्गुली -गल्यां, ये प्राकृतरूप हैं मस्तकादि संस्कृतरूपों के । २४२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् - " चतस्रो जाया उपकलुप्ता भवन्ति । सर्वा निष्किन्यः - अलङ्कृताः ” । -शत ० १३ | ४ | ११ | ( ३ ) - " लङ्कारान्वेव सिकता भ्राजन्त इव " । ( शत ० ३।५।१ । ३६। ) । संस्कृत साहित्य के, विशेषतः काव्य- नाटक - चम्पू- साहित्य के तो मूल ' अलङ्कार ' ही बने हुए हैं ' 1 मस्तकालङ्कार ' चूड़ामणि ' ( महमँद - टीडीभलको - बोरलो - रखड़ी - बोर ), ' तरलहार ', ' बालपाश्या ' ( मोरपट्टा झुठरणाँ - क्लिप - आदि ), ' पत्रपाश्या ' ( पीपलपत्ता ), ' ललाटिका ' ( आई ), ' कणिका ' ( बीडला ), ' तालपत्र ', ( फूलभूमका ), ' कुण्डल ', ( अरण - लोंग - कुड़की - वाटा - आदि ), कर्णवेष्टन ' ( झाला-' मोरी आदि ), ग्रैवेयक ' ' ( कण्ठी - माला - कठला - पचमण्या - आदि ), ' ललन्तिका ' ( हार ), ' उर: -' सूत्रिका ' ( मोतियों की माला ), ' कटक ' ( कड़े - नोगरी- मरहट्ठी आदि ), ' केयूर ' ( भुजबन्ध - वाजू - आदि ), ' अंगुलीयक ' ( अँगूठी - छल्ला ), ' काञ्ची ' ( कणकती - तागड़ी ), ' मञ्जीर - नूपुर ' ( पायल - नेवरी - साट-( पादकड़ा आदि ) इत्यादिरूप से यत्रतत्र उपवर्णित अलङ्कारों के आगममर्थ्यादा से चौवीस भेद प्रमाणित होते हैं, जिनका विशद निरूपण ' लोकगीतारहस्य ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध की ही अपेक्षा रखता है । प्रकृत महासङ्गीत में षोडशशृङ्गारसापेक्ष सोलह अलङ्कारों का प्रान्तीयभाषा में उपवर्णन हुआ है । प्रान्तीयों के लिए स्पष्टतम भी अक्षरार्थ अन्य प्रान्तीयों के लिए इन शब्दों में संक्षेप से व्यक्त किया जा सकता है । ( १ ) - हे महारानियो! आप अपने मस्तक में ' सुवर्णचन्द्राकाराकारित आभूषण ' ( मँहमद टीड़ी भलका ) धारण करें | आप की चूड़ामणि ( रखड़ी - बोरला ) में हम रत्न खचित कर रहीं हैं । आपके ( सीमित ) प्राङ्गण में ( रुद्रमूत्ति ) भैरव क्रीड़ा कर रहे हैं, आपके सुविस्तृत प्राङ्गण में ( एकादश रुद्रभूति ) महावीर * क्रीड़ा कर रहे हैं । ( २ ) - आप अपने कर्णों में कुण्डल धारण * यह ( भैरव - महावीर - गण वैदिक ' मरुत्त्वतीयप्रह ' से सम्बन्धित है । अन्तरिक्ष्य वायव्य मरुद्गण रुद्रविकार है ( मरुतो रुद्रपुत्रास: ) । मरुद्विकार भैरव - महावीरादि हैं । इतस्ततः सञ्चर-णात्मक उपद्रवात्मक क्रीडा - कौतुक ( खेलकूद ) इन मरुत्त्वानों का सहज धर्म है । अतएव इन्हें ' क्रीडिनः ' कहा गया है — ' मरुतो ह व क्रीडिनः- तत् क्रीड़िनां क्रीड़िचम् ' ( तै. | ६ | ७५ | ) | इसी नैगमिक क्रीड़ाभाव के आधार पर - ' भैंरू बाबो खेल रह्यो, चौगान हणमत बाबो खेल रह्यो ' यह महासङ्गीत प्रतिष्ठित है । भैरव इस मूलरुद्र के सञ्चारी हैं, जो रूद्र पूर्व में चतुष्ाथ के निवासी मग हैं | मान्यता के अनुसार चतुष्पथ के ही किसी कोण में भैरवप्रतिमा ( दक्षिणाभिमुखरूप से ) प्रतिष्ठित रहा करती है । चतुष्पथादिरूप सीमित प्राङ्गण ही इन पार्थिव भैरवनाथ का क्रीडास्थल है । इन का क्रीड़ा क्षेत्र बहुविस्तृत नहीं है । अतएव इन के लिए जहाँ केवल - ' भैंरूँ बाब खेल रह्यो ' इत्या-२४३
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श्राद्धविज्ञान करें, हे माता! आप कर्णभूषण से आबद्ध ' बालपाश्या ' ( झुठरणाँ ) अलङ्कार धारण करें, जिन में रत्न जड़े हुए हैं । ( ३ ) - आप अपनी नासिका में नासाभूषण ( नथ - बेसर ) धारण करें, जिसका मुक्तामणिमय मध्यभाग ( भलका ) रत्नजटित हैं । ( ४ ) - आप अपनी ग्रीवा ( गले ) में ग्रैवेयक ( पचमण्याँ ) धारण करें, माला धारण करें, जो माला मसृणसूत्र ( रेशमी डोरा - पाट ) में प्रोत है । ( ५ ) - आप अपनी भुजाओं में केयूर ( बाजूबंध ) धारण करें, जिस में सुवर्णमय गुच्छ ( लूम-सरघुण्डी का बाजू ) खचित हो रहा है । ( ६ ) - आप अपने मणिबन्ध ( पोंछघां ) में कटक ( गजरा ) धारण करें, और वैसा चूड़ा धारण करें, जिस में अद्भुत शिल्प ( नकस- नक्काशी ) कराया गया है । ( ७ ) - आप अपने कटि भाग में काऊची ( कणकती ) धारण करें, जिसमें सुवर्णमय गुच्छ ( भूमका ) लगा हुआ है | ( ) - आप अपने चरणों में नूपुर ( पायल ) धारण करें, एवं चरणाङ्गुलियों में अङ्गुलीयक ( फोलरी ) धारण करें, ( ६ ) हे महाराणियो! इन अलङ्कारों के साथ साथ आप-अपने अधः प्रदेश में तदनुरूपवस्त्र ( पटोला - घाघरा ) धारण करें, एवं उत्तमाङ्ग में तदनुरूप वैसा ही परिधान ( वैसी यह ओढणी - स्यालूड़ा ) धारण करें, जिस के प्रान्तभाग में हमनें विशिष्ट कोण ( गोटा किनारी आदि ) लगाए हैं । ( १० ) - आप वह कञ्चुकी ( काँचली - अँगियाँ ) धारण करें, जिस के ऊसूत्र ( कसरणा ) आबद्ध कर दिए गए हैं । ( ११ ) - हे माता! इस प्रकार ( श्रद्धापूर्वक प्रदत्त इन - षोडश अङ्कारों, तथा त्रिविध वस्त्रों से ( लोमभ्यः - श्रनखाग्रेभ्यः - नखशख- पर्यन्त ) मुसज्जित होकर आप इस भोजन सामग्री को ग्रहण करें, जिस में क्षीरान मुख्य हैं ( और घेवर ' हमारे प्रान्त का विशिष्ट मिष्टान्न है ) । हे माता! आप रुचि - पूर्वक इसका आस्वादन करौं, यही हमारी प्रार्थना है । ( विशिष्ट अशी: कामना ) - हे माता! हम यह अनुभव कर रहीं हैं कि, आप हमारे इस श्रद्धात्म आतिथ्य से हम पर प्रसन्न हैं । हमने आप के सम्बन्ध में यह सुन रक्खा है कि, आप के प्राङ्गण में लक्षलक्ष वन्ध्या स्त्रियाँ बाँझ ) आतीं हैं, । ( और वे पुत्र - वरप्राप्त कर लेतीं हैं ) । इन से भी अधिक आतीं हैं ( हमारी जैसी ) वे पुत्रवती नारियाँ, जिन की यह विनय पूर्वक नम्र प्रार्थना है कि ( आपके निःसीम अनुग्रह से हमनें सभी प्रकार का पारिवारिक वैभव - पति - पुत्र - पौत्र - वित्तादि. दिरूपसे ' क्रीड़ा, मात्र ( खेल रह्यो ) का उल्लेख हुआ है, वहाँ एकादश रुद्रप्रतीकभूत हनूमान के लिए ' चौगान हणमत बाब खेल रह्यो ' इत्यादिरूप से बहु विस्तृत प्राङ्गण का भाव ' चौगान ' रूप से अभिव्यक्त हुआ है । पार्थिवगण, भैरव है । पृथिवी सीमित प्राङ्गण है । आन्तरिक्ष्यगण रुद्रगणात्मक महाबीर है | अन्तरिक्ष ‘ उर्वन्तरिक्षमन्वेमि ' - महद्धीद मन्तरिक्षम् ' [ कौ ० २६ । ११ । ] रूप से सुविशाल है, ऊरू है, महान् ( चौगान ) है, । २४४
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न्वें ऋणमोचनोपायोपनिषत् ऐहलोकिक - वैभव प्राप्त कर लिया है । अब तो हमारी एकमात्र यही पारलौकिक कामना और शेष रही है कि- प्रदत्त आयुर्वैभव सुख भोगानन्तर ) आप हमारी ८४ संख्या को ८५ संख्या में परिणत करने का अनुग्रह करदें ( चतुरशीतिलक्ष्य - चौरासी लाख योनिचक्रबन्धनों से विमुक्त कर हमें ८५ बें मुक्तिपथ की अनुगामिनी बनाने का यथासमय अनुग्रह ओर करेंगीं आप । ( ३ ) - गोदोहन - कम्र्मात्मक महासङ्गीत की तृतीय पावनस्मृति-( १ ) - " धोली सी धूमर झारी कपला सी गाय - ॥ १ ॥
- दूध दुहावा मीसर हरीचन्दरजी जाय ॥ २ ॥
- बाछड़ला पकड़वा बाँकी साथण जाय ॥ ३ ॥
( ४ ) - सोना की तोलड़ी में दूध दुहाय ॥ ४ ॥
- दूध दुहाय बाँकी खीर रँधाय ॥ ५ ॥
- खीर रँधाय वाँका पितर जिमाय ॥ ६ ॥
( ७ ) - थे जीमोजी द्वारा सकल पितर ॥ ७ ॥
( ८ ) - थाँ जीम्याँ से झारो ' मन भर जाय ' ॥ ८ ॥ "
३. ( १ ) - श्वेत, धूम्रवर्णयुक्ता यह मेरी कपिला गौ है ( जिसके दुग्ध से मुझे क्षीरान्ननिर्माणद्वारा पितरों को तृप्त करना है । ( २ ) - कपिला गौ के दुग्ध दोहनकर्म के लिए हमारे कुल के सर्वज्येष्ठ श्रेष्ठ कुल-पुरुष मिश्र श्रीहरिश्चन्द्रजी शास्त्री जाते हैं । ( ३ ) एवं गोवत्सों को पकड़ने के लिए उनकी सहचारिणी ( साथिन - धर्मपत्नी ) जाती है । ( ४ ) - मिश्रजी ने सुवर्णपात्र में गोदुग्ध दोहा है । ( ५ ) - इस ( सद्यः प्राप्त ) गोदुग्ध से ( चाँवलप्रक्षेपद्वारा उनकी धर्मपत्नी हमारे कुल की सर्वज्येष्ठा श्रेष्ठा कुलस्त्री ने ) क्षीरान सम्पन्न किया है । ( ६ ) - इस सम्पन्न क्षीरान से ( हम - कुलस्त्रियाँ सम्मिलितरूप से अपने गृह्य - भौम-' पार्थिव ) पितरों को तृप्त कर रहीं हैं । ( ७ ) हे मेरे पितरो! आप अपने परिवार सहित इस क्षीरान -भोजन से तृप्त बन जाने का अनुग्रह कीजिए । ( 5 ) - आपके क्षीरान से तृप्त हो जाने से ही हमारा मन तृप्त होगा । * ' सहधर्मं चरताम् ' | २४५
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( ४ ) - पितृकर्मानुगत मुख्य महासङ्गीत की चतुर्थ पावनस्मृति-( १ ) - कार का तोला यो कार की डाँडी-तोर गन्धी का बेटा किसतूरी ।
- गन्धी को तोल हरीचन्दरजी करावे ।
तोर गधी का बेटा किसतूरी ॥ १ ॥
( २ ) - जी- सोना की तोली जीमें चाँवलिया सा थोड़ा-पितरों को लस्कर भो घणो । आप जीयाँ वाँका साथीड़ा भी जीम्याँ. तभी तोली में चावल भो घणा ॥ २ ॥
( ३ ) - जी- छोटी सी तलाई जीमें पाणीड़ो भी थोड़ो । fuai को लस्कर भो घणो ।
पीय वाँका साथीड़ा भी पीयो ।
तभी तलाई में पाणी भो घणो ॥ ३ ॥
( ४ ) - जी- छोटो सो डाबो जीं में गैणाँ भी थोड़ा । पितरों को लस्कर भो घणो ।
पपराका साथीड़ा भी पर चा ।
तोभी डाबा में गैाँ भो घणा ॥ ४ ॥
( ५ ) - जी- छोटो सो बुगचो जीमें कापड़ला भी थोड़ा । faai को लस्कर भो घणो ।
पपरा वाँका साथीड़ा भी पर चा ।
तोभी बुगचा में कपड़ा भो घणा ॥ ५ ॥
( ६ ) - उधो ए बुधो कर आओ द्वारा पितरो! पधारो द्वारा पितरो -कुसल कुसल घर जायजो ॥ ६ ॥
( ७ ) - चोदस के दिन ओ द्वारा पितरो-मावस घराँ पधारज्यो जी ॥ ७ ॥
( ८ ) -- पित्तर बालाभोला, जी - घोर असीस । फलज्योजी फूलज्योजी कड़वा नींम ज्यों ॥ ८ ॥ "
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ऋण मोचनोपायोपनिषत् ( १ ) - हे सुगन्धिद्रव्य विक्रेता गांधीपुत्र! ( गंध - सुगंध द्रव्य परिमाण -तौल के लिए ) तुम्हारी ( दुकान ) में परिमाणसाधन ( तोला - तौलने के बाट ) तो किस द्रव्य के हैं ( किस धातु के बने हुए हैं ), - तराजू के पलड़े किसके हैं, और तराजू का दण्ड ( डाँडी ) किस का है? | ( हमनें यह परीक्षा करली है कि, तुम्हारी ताखड़ी - बाट - डाँडी - सब कुछ परिमाणसाधन पितरों के स्वरूप के अनुरूप-सुवर्ण के ही है, अतएव इस परीक्षा के अनन्तर ) हे गन्धी के पुत्र! सौम्यभावापन्न! ) तू हमें पितृकर्म के लिए सुगन्धि - द्रव्य - जिसमें मुख्य मृगनाभिगन्ध ( कस्तूरिका - कस्तूरी ) हो, ( और गौणरूप से चन्दन - चम्पा - सरोज - खस का गन्धद्रव्य ( इत्र ) हो, तौलने ( परिमाण करने ) की व्यवस्था कर देना । हमारे ( कुलस्त्रियों के इस निकट भविष्य में ही सम्पादित होने वाले पितृकर्म के लिए अपेक्षित विशिष्ट ) गन्धद्रव्य का मूल्याङ्कन ( मोल - भाव ) द्वारा क्रय ( हमारे कुल के ज्येष्ठ श्रेष्ठ पुरुष ) मिश्र हरिश्चन्द्रजी शास्त्री करा रहे हैं । [ किस गन्धद्रव्य का तुझ गन्धीपुत्र से किस कार्य के लिए कौन क्रय कर रहा है, यह जानकर ही है गन्धीपुत्र! पितृकार्य के अनुरूप ही तुझे गन्धद्रव्य देना है, इसमें जो भूल हो जायगी, उसके प्रायश्चित्त का भागी तू ही बनेगा, यही प्रथम पद्य का निष्कर्षार्थ है ] | [ २ ] - पितृकार्य - स्वरूपानुगत सुगन्धि- द्रव्य - पुष्पादि की व्यवस्था के अनन्तर हम [ कुल-स्त्रियों ] नें [ पितृकर्म - स्वरूप के अनुरूप ही ] सुवर्णस्थाली [ सोने की बटलोही ] में [ श्वेतधूम्रा कपिला गो के सद्यः दुग्ध में चावल डाल कर जो क्षीरान्न - खीर - सम्पादित की है, उसमें थोड़ा सा ही तो दूध है, और ] थोड़े से ही चाँवल है [ अर्थात हम पितृपरिवार के महतो महीयान् सुविः तृत बहुसंख्यक परिवार के समतुलन में बहुत ही स्वल्पमात्रा में क्षीरान्न सम्पादित कर पाईं हैं इस प्रकार यद्यपि हमसे उन सम्मान्य पितर अतिथियों के स्वरूप के अनुरूप कुछ भी व्यवस्था नहीं बन पड़ी है, तथापि हम देख रही हैं कि, हमारी श्रद्धात्मिका भावना के आकर्षण से इस स्वल्प क्षीरान को अनुग्रह-पूर्वक ग्रहण करने के लिए ] सुमहान् पितरों का सुविस्तृत परिवार हमारे घर पधार आया है । ( हमनें यह देखा, अनुभव किया, और यह देखकर अनुभव कर हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा कि, यहाँ पधारे हुए पितरों में ) मुख्य पितरोंनें भी रुचिपूर्वक तृप्त होकर क्षीरान्न का भोजन किया । उनके अन्य समस्त असंख्य पारिपारिक व्यक्तियोंनें भी तृप्तिपूर्वक भोजन किया, और थाली में फिर भी * पारस्परिक सनातन आम्नाय का अपने महासङ्गीत के माध्यम से सदा से संरक्षण करती रहनें बालीं ये कुलदेवियाँ ‘ गन्धो ' न कहकर ' तोलर गन्धी का बेटा किस्तूरी ' कहतीं हुईं यहाँ भी परम्परा को ही महत्त्व प्रदान करती हुई परोक्षरूप से परिवार को यह उद्बोध प्रदान कर रही हैं कि, जो तत्त्व- जो वस्तुतत्त्व- किंवा जो लोकपरिग्रह पारम्परिक आम्नायानुगत व्यवसाय - स्थानों ( कुलक्रमानुगत परिग्रह विक्रेताओं की पुरातन आपणों पुरानी दुकानों ) में सुविधापूर्वक तथा विशिष्ट - परीक्षित रूपेण उपलब्ध होता है, वह नूतन - आपणों में नहीं । २४७
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श्राद्धविज्ञान क्षीरान अत्यधिक मात्रा में बचा रह गया । ( सचमुच स्वल्पद्रव्य का भी यों बहुसमृद्धिरूप में परिणत हो जाना महा आश्चर्य है । अथवा तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है । यह तो महा-महिमशाली समृद्धिशाली समृद्धिप्रदाता पितरों की ओर से होने वाला सहज सामान्य अनुग्रह है ) । श्रद्धापूर्वक प्रदत्त खल्प भी परिग्रहप्रदान देवानुग्रह से बहुसमृद्धिफलात्मक बन जाता है, निश्चयेन बन जाता है, यही तात्पर्य है ) । ३-४-५ पद्यार्थ द्वितीय पद्यार्थ से समतुलित हैं । ( ३ ) क्षीरान्न भोजनानन्तर पितरों के लिए जिस तालाब में जल की व्यवस्था की गई है, वह बहुत छोटा, पानी भी उसमें बहुत ही थोड़ा | किन्तु आश्चर्य, सपरिवार पितर इससे तृप्त हो गए, और तालाब का पानी पहिले की अपेक्षा समृद्ध बन गया । [ ४ ] छोटा सा आभूषणों का ' वसुधानकोष ' [ गहनों का विशेष प्रकार का डब्बा ], उसमें परिगणित आभूषण | किन्तु पितरानुग्रह से हमारी आभूषण - सम्पति भी बहुसमृद्ध बन गई । [ ५ ] -छोटी सी वस्त्रमञ्जूषा [ बुगचा ], उसमें बहुत थोड़े परिगणित वस्त्र । किन्तु गृह्यपितरों के अनुग्रह से ये भी सुसमृद्ध बन गए । इस प्रकार पितृ देवों के इस श्रद्धानुगत स्वल्पतम भी आतिथ्य से हमारे कुल को अनसम्पत्ति ( क्षीरान - तदुपलक्षित पशुसम्पत्ति भी ), आभूषणसम्पत्ति ( तदुपलक्षित अन्य वित्त-सम्पत्ति भी ), एवं वस्त्रसम्पत्ति ( तदुपलक्षित अन्य पार्थिव सम्पत्ति भी ), अनायास ही प्राप्त हो गई, यही चारों ( २-३-४ ५ ) पद्यों का फलितार्थ है । अब संक्षेप से गोदोहनकर्मानुगत तृतीय, तथा पितृकर्मानुगत मुख्य चतुर्थ, दोनों महासङ्गीतों की नैमिक आम्नाय ( वेदप्रामाण्य ) का भी अनुशीलन करते हुए अपने साथ साथ आप हमें भी कृतकृत्य कर दीजिए । पितृकर्म में पितरों के लिए प्रधानरूप से गोदुग्ध में अक्षत निक्षेप द्वारा बना हुआ ' क्षीरान्न ' ( दूधपाक - क्षीर - खीर ) तृप्ति का साधक माना गया है महासङ्गीतात्मक गोदोहनकर्मात्मिक तृतीय महासङ्गीत के द्वारा । काम्य महाहवियोगात्मक श्रौत देवयज्ञकर्मेतिकर्त्तव्यता के प्रसङ्ग में विहित - संगृहीत काय पितृकर्म में पितृतृप्ति के लिए जिस ' मन्थ ' द्रव्य का उल्लेख हुआ है, वह क्षीरान्नविशेष ही है, जिसका निर्माण ' निवानी ' ( प्रथम प्रसूता - पहलूण गो- के दुग्ध से विहित हुआ है । देखिए! " थ पितृभ्योऽग्निष्वात्तेभ्यः - निवान्यायै दुग्धे सकृपमथितः -एकशलाकया मन्थो भवति । सकृदु ह्येव पराञ्चः पितरः । तस्मात् -सकृदुपमथितो भवति " । ( शत ० महाहविर्य्यागब्राह्मण, २।६।१।६ । ) । ब्राह्मणाम्नाय में तो केवल ' निवानीगोदुग्ध ' का विधान हुआ है । फिर यह ' धोली सी धूमर म्हारी कपला सी गाय ' ( श्वेत- धूम्रवर्णा कपिला गौ ) की घोषणा किस श्राम्नाय के आधार पर व्यक्त कर डाली कुलस्त्रियोंनें अपने महासङ्गीत में? । अन्वेषरण कीजिए! इस प्रश्न का भी यत्र - तत्र निगमाम्नाय उपलब्ध हो ही जायगा । ' धोली -सी- धूमरसी - कपिला - सी ' का अर्थ है ' श्वेत - सी धूम्र - सी -२४८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् कपिला सी - गौ ' । सफेद रंग की गाय ' श्वेत ' है, ललाई लिए हुए काला रँग * धूम्र ' है, एवं भूरा रंग ' कपिला ' है, तद्वर्णा गौ कांपला है । न तो श्वेता ही, न धूम्रा ही, अपितु श्वेत- धूम्र - कपिल, तीनों वर्गों से अंशतः समतुलित गौ ही श्वेता - सदृश, धूम्रा सदृश, एवं कपिला - सदृश - गौ यहाँ ( पितृकर्मानुगत क्षीरान सम्बन्ध से ) माह्य है । इस सादृश्य लिए ही प्राकृतरूप से ' सी ' का प्रयोग हुआ है । ' श्वेत - धूम्र - कपिला - सहश गौ ' का प्राकृत रूप बना है - महासङ्गीतानुगता लोकभाषा में - ' धोली-सी, घूमर ( झारी ) कपला - सी गाय ' । श्वेतवर्ण चन्द्रमा का प्रतीक है, धूम्रवर्ण पृथिवी का प्रतीक है, एवं कपिलवर्ण रुद्र ( मूलपित्तर - श्राग्नेयं पितर ) का प्रतीक है । सांख्यानुगत पितृपरिवार में श्वेत-चन्द्रमा, धूम्रा पृथिवी, कपिल रुद्र, तीनों के प्राणों का समन्वय है । अतएव यहाँ तीनों वर्णों से अंशा-त्मना समतुलिता निवानी गौ का ही दुग्ध क्षीरान्न के उपयोग में आता है । अब केवल वैसे वचनों को मध्यस्थ बना लेना है, जो चन्द्र - पृथिवी - रुद्र के साथ श्वेत- धूम्र - कपिलवर्ण का सम्बन्ध व्यक्त कर रहे हों । ( १ ) – “ भाति हि चन्द्रमाः ' ( शत ० = | ४ | १ | १० | ) - ( सूर्यस्येव हि चन्द्रमसो रश्मयः ' ( शत ० ६ | ४ | १ | ६ | ) — " यत्राह गोरमन्वत - चन्द्रमसो गृहे " ( ऋक् सं ० ) । ( २ ) - " धूम्रा वाऽदितिः । ( श्रदितिः पृथिवी, मागामनागामदितं वधिष्ट ) । अनुस्तरणी कृता भवति । यमायोदेहीति । सा याऽनुस्तरणी, सैव सा " । - ताण्ड्य महाब्राह्मण २१।१ / ७ / ( ३ ) - " या सा तृतीयामात्रा - ऐशानदेवत्या कपिला चर्णेन । रुद्रो देवता " - गोपथब्रा ० पू ० ११२५ । - कपिलानां रुद्राणां - कपिलानां रुद्राणीनां स्वतेजसा भानि " — तैत्तिरीयारण्यक ११ ११,२, । चान्द्र अश्मा - सोम ही रौद्र आग्नेय प्राण से विस्रस्त होकर पार्थिव खनिज धातु बनता हुआ ' सुवर्ण ' रूप में परिणत हुआ है, जैसा कि - ' सोमस्य या प्रिया तनूरुदक्रामत्, तत्सुवर्ण हिरण्यमभवत् ' ( तै ० ना ० १1४ / ७ / ४-५ - ) ' चन्द्र ' हिरण्यम् ' ( तै ० ब्रा ० ११७६।३ ) इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । घूँ का सा रँग, सूँघनी तमाखू का सा रँग ही ' धूम्र ' है, जिसका प्राकृतरूप ' घूमर ' है । - * प्र े तकर्म्मसंस्कार में विहित गोदान से सम्बन्धित गौ धूम्रा ही अनुरूप मानी गई है । मही प्रतपितर को वैतरणी - पाशात्मक वरुणपाश से तारने के कारण ' अनुस्तरणी ' कहलाई है, जिस प्रोतसदन के अध्यक्ष ' यम ' ( आग्नेय रुद्र ) माने गए हैं । २४६
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श्राद्धविज्ञान जिस प्रकार श्वेत- धूम्र - कपिला गौ में चान्द्र - पार्थिव - रौद्र - तीनों पितृप्राणों का समावेश है, तथैव सुव भी चान्द्रोम - आग्नेयरुद्र - पार्थिवभूत, तीनों के समन्वय से पितृस्वरूप का ( पितृपरिवार का ) प्रतीक बन रहा है । इसी आम्नाय के आधार पर महासङ्गीत में - ' सोना की तोलड़ी में दूध दुहाय ' इस भावना का समावेश हुआ है । ' थे जीमो जी द्वारा सकल पितर ' वाक्य नैगमिक ' पितृवार ' का ग्राहक बन रहा है । पितृपरिवार ( भौम पार्थिव पितृपरिवार - महाहवियगात्मक काम्य पितर ) का केवल द्यावापृथिव्य चतुद्दशविध भूतसर्गात्मक चान्द्रसर्ग से सम्बन्ध है, जैसाकि पूर्व में विस्तार से बहलाया जा चुका है । पिण्डपितृयज्ञात्मक पितर भी यद्यपि हैं चान्द्र - सौम्य हीं, किन्तु वे प्राकृत देवसर्ग के सञ्चालक बनते हुए देवयज्ञवत सौरसर्ग के सहयोगी माने गए हैं । अतएव चान्द्रतत्त्व के साथ साथ सौरतत्त्व का भी पिण्डपितृयज्ञात्मक श्रौत पितृपरिवार के साथ सम्बन्ध है । पार्थिव चान्द्र भौम पितरों का जिन्हें पूर्व गृह्णपितर औपपातिकपितर कहा गया है - केवल चान्द्रसम्वत्सर से ही सम्बन्ध है । चान्द्रतत्त्व ' मन ' का अधिष्ठाता है, सौरतत्त्व ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' रूप से ' बुद्धि ' का अधिष्ठाता है । अतएव भौम- चान्द्र- औपपातिक - गृह्यपितरों का केवल चान्द्र मन से, केवल मानस - भावना - मान्यता - अनन्य-श्रद्धामात्र से सम्बन्ध है । इन्हीं के लिए ' इन्दव इव हि पितरः - मन इव ' [ ताण्ड्य महाब्राह्मण ६।६।१६ २० ] यह कहा गया है | श्रुति का ' इव ' पद बड़ा ही रहस्यपूर्ण है । श्रुति ने - ' इन्दवः पितरः ' न कह कर ' इव ' कहा है । चन्द्रमा की भाँति, मन की भाँति, ही ' इव ' शब्दार्थ है, जिसका तात्पर्य्य यही है कि, द्यावापृथिव्य चान्द्रसम्वत्सर में केवल चन्द्रमा, एवं चान्द्र मन ही प्रधान नहीं है । अपितु इसमें चान्द्र लोकस्थ चन्द्रसम - अन्तरिक्षलोकस्थ आग्नेय रुद्र - पार्थिव भूतप्राण [ श्मशा प्राण ] - तीनों का समन्वय है । है यह पितृसर्ग मूलतः चन्द्रप्रधान ही, किन्तु समन्वय रुद्र और पार्थिव भूत का भी है । यही ' इव ' शब्द का रहस्यार्थ है । उधर पिण्डपितृयज्ञाधिष्ठाता श्रौत पितर चान्द्र - सौर, दोनों प्राणों से समन्वित रहते हुए चान्द्रमन के भी संग्राहक हैं, एवं सौरी बुद्धि के भी संग्राहक हैं । अतएव मनोगर्भिता बुद्धि की आस्था से समन्वित श्रौत - नैगमिक व्यवस्थित श्रद्धा से युक्त द्विजातिपुरुष ही उस पितृकर्म का कर्त्ता माना गया है । उसमें स्त्रियाँ अनधिकृत हैं । स्त्रियों की मान्यता - श्रद्धा के एकमात्र अवलम्ब सनोमय भौम पार्थिव पितर ही हैं, जिन्हें किं श्रुति ने " ये वा अयज्वानो गृहमेधिनः, ये पितर: -अग्निष्वात्ताः शत ० २ | ६ | १ || ] इत्यादिरूप से विस्पषु भाषा में श्रौत सौरयज्ञसीमा से पृथक् करते हुए इन्हें गृहस्थी की मान्यता से अनुगत ' अयज्वान ' कहा है । श्रौत पितर जहाँ अन्नाद हैं, वहाँ स्मार्त्त गृह्य पितर ' अन्नभावात्मक ' हैं, जिन दोनों पितृविवत्तों का स्पष्टीकरण पूर्वनिरूपण से गतार्थ है । वक्तव्य इस विवेचन से यही है कि- ' मन इव वै पितरः ' निगमाम्नाय ही लोकगीत के ' थाँ जीम्याँ से म्हारो मन भर जाय ' इस पद्य की मूल प्रतिष्ठा बन रहा है, और यही [ ३ ] गोंदोहन कर्मात्मक महासङ्गीत की तृतीय ( ३ ) पावनस्मृति की नैगमिक आम्नाय का संक्षिप्त समन्वय है । -३-२५० ।