Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 41–50

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 41–50

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प्रजातन्तुवितान जगत के उपादानभूत पूर्वोक्त त्रिविध पितर भी इसी सौम्य महान् के गर्भ में प्रविष्ट हैं | वसु - रुद्र - आदित्यादि ३३ आङ्गिरस देवता, ६६ आप्य असुर, २७ - वायव्य गन्धर्व, सम्पूर्ण सौम्य देवता, सम्पूर्ण पशुप्राण, भृग्वङ्गिरोमूर्त्ति इसी महान के आधार पर जीवित हैं । आपोमयी लोकसृष्टि इसी आय महान् पर प्रतिष्ठित है । इस की इसी महत्ता को लक्ष्य में रखकर इसे इतर खण्डात्माओं की अपेक्षा यदि महान् कहा जाय तो, क्या आपत्ति है । महदुन्नि पितर प्रारण ही सातवीं पीढी - पर्यन्त वितत होने वाले प्रजातन्तु की प्रतिष्ठा है । भूतसंपृक्त महानात्मा-तावुभौ भूतसंवृतौ महान क्षेत्रज्ञ एव च । उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ( मनुः १२।१४ ) उक्त मानव सिद्धान्त के अनुसार महानात्मा, तथा विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध क्षेत्रज्ञात्मा, दोनों पृथिव्यादि पञ्चमहाभूतमात्राओं ( सुसूक्ष्म भूनमात्राओं ) से संश्लिष्ट होकर अणोरणीयान् - महतो-महीयान भेदभिन्न उच्चावच भूतों ( प्राणियों ) में विभक्त रूप से प्रतिष्ठित उस चिदात्मा को चारों ओर से व्याप्त कर आध्यात्मिक संस्था में प्रतिष्ठित रहते हैं । तात्पर्य मनु का यही है कि, महानात्मा वीधूतत्त्व है, शुक्रसम्बन्ध से पञ्चभूतों से सम्पृक्त है । यही चला की योनि हैं । ' यो बुद्वे: - परतस्तु सः ' लक्षण चिदात्मा महान् के गर्भ में प्रतिष्ठित रहता हुआ ' क्षेत्रज्ञ ' ( बुद्धि - विज्ञानात्मा ) का ग्राहक बन रहा है । एकमात्र इसी अभिप्राय से ' महान् क्षेत्रज्ञ एव च ' कह दिया गया है । मुख्य लक्ष्य महानात्मा ही है, जिस की उत्पत्ति का प्रधानतः ' शुक्र ' से सम्बन्ध माना गया है । हमारी आध्यात्मिक संस्था में प्रतिष्ठित महानात्मा कर्मात्मा नाम से प्रसिद्ध जीवात्मा के स्थूलशरीर निबन्धन ऐहलौकिक कर्म्मभोगानन्तर स्वप्रभवस्थानात्मक चन्द्रलोक में चला जाता है । जिस प्रकार महानात्मा प्रेतावस्था में सूक्ष्म भृतों से सम्परिष्वक्त रहता है, एवमेव कर्मभोका कम्मरमा भी इस प्रारब्धनिबन्धन स्थूलशरीर के परित्यागानन्तर सर्वत्र ( खगोल ) व्याप्त सूक्ष्मभूतों से सम्परिष्वक्त रह कर ही यामीयातनाएँ भोगने के लिए तत्तल्लोक - विशेषों की ओर गमन करता है । ' तदन्तरप्रतिपत्त रहति, सम्परिष्वक्तः - प्रश्ननिरूपणाभ्याम् " ( ब्रह्मसूत्र ३ | १ | ' ) इस सूत्र सिद्धान्त के अनुसार पृथिव्यादि भूतसूक्ष्मों से सम्पन्न सूक्ष्म प्रतिवाहिक शरीर धारण करके ही उसी प्रकार लक्षित स्थानान्तर में यह कम्र्मात्मा गमन करता है, जैसे कि, ' तृणजलौका ' नामक वर्षाऋतु का जन्तु उत्तर प्रदेश को पकड़ कर पूर्वप्रदेश को छोड़ता हुआ ही स्थानान्तरित होता है । कम्मरमा की इसी जलौकागति को लक्ष्य में रखकर भक्तिग्रन्थ ने कहा है-वर्जस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति । यथा तृणजलौकेयं देही कर्म्मगतिं गतः ॥ ( श्रीमद् भागवत ) ( ५

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महानात्मा का आविर्भावक-श्राद्धविज्ञान सुसूक्ष्म भूतों का यह प्रतिवाहिक शरीर परिमाण में अङ्गष्ठमात्र माना गया है । अपने इस पृथिव्यादिभूतसूक्ष्मात्मक अङ्ग ुष्ठपरिमाणात्मक सूक्ष्मशरीर से कम्मात्मा वासना भावना वासित-भावित कर्म्म ज्ञान जनित शुभाशुभ संस्कारों के अनुरूप शुभाशुभ लोकान्तरों में शुभाशुभ फल भोगता हुआ विचरता रहता है । सूक्ष्मशरीरानुबन्धी यह पारलौकिक फलभोगकाल जब समाप्त हो जाता है, तो - ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( हां.उ. ) के अनुसार पुनः यह इसी पृथिवीलोक में स्थूलभूता. त्मक स्थल शरीर धारण करता हुआ अवतीर्ण होता है । वैश्वानरमूत्ति अग्नि, तैजसमूत्ति वायु, प्राज्ञमूर्ति इन्द्र, त्रिदेवसमष्टिरूप, अतएव देवसत्यात्मा ' नाम से प्रसिद्ध कर्मात्मा, जिसेकि गर्भविज्ञानवेत्ता महर्षियों ' पपातिक आत्मा ' नाम से भी व्यवहृत किया है, आमुष्मिक कर्मभोगानन्तर दिव्यपितृप्राणयुक्त आन्तरिक्ष्य चान्द्र पितृप्राणरूप में परिणत होकर ही अन्न में प्रविष्ट होता है । दिव्य नान्दीमुख पितृ-प्राण, आन्तरिक्ष्यचान्द्र ऋतुपितृप्राण, पार्थिव अन्नगत अश्रुमुख पितृप्राण, इन तीनों पितृ प्राणों से संयुक्त पातिकमा द्वारा पुरुषाग्निसंस्था में सर्वप्रथम प्रविष्ट होता है । पुरुषाग्नि में आहुत होने ' वाला अन्न कालान्तर में शुक्ररूप में परिणत हो जाता है । यही शुक्र ऋतुकाल में योषिद्गर्भ में, तत्रस्य ( शोणित ) में आहुत होकर महानात्मा का आविर्भावक बनता है । पपातिक कर्मात्मा-शुक्र पिता का अंश है, शोणित माता का भाग है । दोनों के दाम्पत्यभाव से ही चिग्राहिणी मह-का होता है । इसी महद्योनि में प्रविष्ट औपपातिक कम्र्मात्मा स्थूलशरीर से जन्म लेने में समर्थ होता है । अनेक जन्म के अनन्तर यह स्थूल जन्मसंसिद्धि का अधिकारी बनता है । यह औपपातिक आत्मा सब से पहिले पुरुषगत शुक्रावच्छिन्न सौम्यगुणक महानात्मा में प्रतिष्ठित होता है, एवं यही इसका • प्रथम जन्म है । भुक्त अन्न रेत है, शुक्र है । पुरुषाग्नि शोणित है । दोनों के दाम्पत्यभाव से ही पुरुषके शुक्र-धातु में आत्मा सर्वप्रथम गर्भधारण करता है । शुक्र शुक्र है, मातृगत गर्भाशयस्थ शोणित शोणित है । इस द्वितीय दाम्पत्यभाव से शुक्र द्वारा यह मातृगर्भ में जन्म लेता है, एवं यही औपपातिक आत्मा का द्वितीय जन्म है । एक चान्द्रसम्वत्सर के अनन्तर एवयामरुत् नामक गर्भवायु के प्रत्याघात से स्वस्थान से च्युत होता हुआ यह मातापृथिवी के गर्भ में आता है, एवं यही इसका तृतीय जन्म है । दोषमार्जक-हीनाङ्गपूरक - अतिशयाधायक भेद से त्रिधर्मावच्छिन्न षोडश ( १६ ) स्मार्त संस्कारों से, तथा द्वात्रिंशत् ( ३२ ) श्रौतसंस्कारों से, इस प्रकार अष्टाचत्वारिंशत् ( ४८ ) श्रौतस्मार्त - संस्कारों से सुसंस्कृत - शुद्ध - पूत-अतिशययुक्त - पूर्णलक्षण देही ब्रह्मभाव में परिणत हो जाता है, एवं यहीं इसका चतुर्थजन्म है यही जीव का परमपुरुषार्थ है, यही इसका जन्मसाफल्य है । * इन शुभसंस्कारात्मक शुभ कर्मों के प्रभाव से स्थूलशरीर त्यागानन्तर यह औपपातिक आत्मा ' प्रेत ' भाव में परिणत होकर परलोक में दिव्ययोनि में जन्म लेता है, अशुभकम्मोदर्क से हीन -पिशाचादि योनि में जन्म लेता है, एवं यही इस पाङक्त यज्ञात्मा का पांचवाँ जन्म है ।

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' पितृभ्यो देवदानवाः ' ( मनु: ३ | २०१ ) इस मानव सिद्धान्त के अनुसार परमेष्ठी पिता-' प्रजापति के रेत से देवसृष्टि होती है । ' आदित्याज्जायते वृष्टि: ' ( मनुः ३७६ ) के अनुसार प्रजापति के रेत से उत्पन्न प्रारणदेवताओं के द्वारा पर्जन्याग्नि में ' श्रद्धा ' नाम के चान्द्रसोम की आहुति होती है । इस आहुति से ' वर्षा ' का जन्म होता है । वर्षात्मक रेत की पार्थिव अग्नि में आहुति होने से औषधियाँ उत्पन्न होतीं हैं । ओषधिरूप रेत की पुरुषाग्नि में आहुति होने से रेत ( शुक्र ) उत्पन्न होता है । रेतो लक्षण रेत की योग्नि में आहुति होने से प्रजोत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह पारमेष्ठ्य दिव्यं पितृत्व ही क्रमशः देव, वर्षा, अन्न, रेतो भावों में परिणत होता हुआ अन्ततोगत्वा प्रजारूप में परिणत होजाता है । प्रजा का रेत ( मूलप्रतिष्ठा ) हृदय है, हृदय का रेत ' मन ' है, मन का रेत ' वाक् ' है, क्योंकि वा ही मन के मानस भावों को प्रकट करने का अभ्यतम द्वार है । बिना चागाश्रय के मानसजगत् सर्वथा शिथिल है, जैसा कि निम्न लिखित ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है-" वर्चश्च सामानि च मन एव यजूंषि । सा यत्रेयं वागासीत् सर्वमेव तत्राक्रियत, सर्वं प्राज्ञायत । अथ यत्र मन आसीत्, नैव तत्र किञ्चनाक्रियत, न प्राज्ञायत । नो हि मनसा ध्यायतः कश्चनाजानाति " । रेतोमय कम्र्मात्मा-शत ० ४।६।७।५ । बाकू का रेत कर्म्म है । मानसरेतोभूता वाक् कम्मश्रिय से ही वीर्य्यवती बनती है । केवल चाकू - प्रयोग तब तक सर्वथा व्यर्थ है, जब तक कि तदनुरूप कर्मविभूति का आश्रय न ले लिया जाय । यही कर्म्मविभूति इसकी जीवनमुक्ति का कारण बनती है, जैसाकि निम्नलिखित उपनिषच्छु ति से प्रमाणित है. -" कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं नान्यतो S स्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ " ( ईशोपनिषत् " तोमूला इसी पितृसृष्टि का भगवान् ऐतरेय ( महीदास ) ने निम्नलिखित शब्दों स्पष्टीकरण किया है-" अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो देवाः, देवानां रेतो वर्ष, वर्षस्य रेत ओषधयः ' श्रोषधीनां रेतोऽन्नं, अन्नस्य रेतो रेतः, रेतसो रेतः प्रजाः । प्रजानां रेतो हृदयं, हृदयस्य रेतो मनः, मनसो रेतो वाक, वाचो रेतः कर्म्म । तदिदं कर्मकृतमयं पुरुष ब्रह्मणो लोकः " ( ऐ ० आ ० २।११३ ) ७

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' इरा ' रसमय कम्र्मात्मा -श्राद्धविज्ञान विज्ञानात्मतत्त्व का विकास ( उत्पत्ति ) सौर हिरण्मय तेज से हुआ है । प्रभवभूत हिरण्मयतेज के सम्बन्ध से ही यह विज्ञान ' हिरण्मयपुरुष ' कहलाया है । आपोमय परमेष्ठी प्रजापति का रेत ' आप ': है, जिसके “ प्रापो भृग्वङ्गिरोरूपमा पो भृग्वङ्गिरोमयम् ” इस गोपथवचन के अनुसार भृगु - अङ्गिरा नामक दो विवर्त्तमाने गए हैं । भृगु स्नेह तत्र है, अङ्गिरा तेज है । तेजोभूत अङ्गिरा योनि है, स्नेहभूत भृगु रेत है । इसकी आहुति से हिरण्यगर्भ सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है, जो कि सूर्य-( यजुः सं ० " ) मन्त्रवर्णन से देवप्राणघन है । ' कंस्विद्गर्भ दध आपः ' -' चित्रं देवानामुदगात् ' के रेत से ही ' अपांगम्भन्त्सीद ' इत्यादि अन्य मन्त्रश्रुतियाँ भी भृग्वङ्गिरोमय परमेष्ठी प्रजापति hara हिरण्यगर्भ का विकास बतला रहीं हैं, जिसे अपनी सहजभाषा में हम आदित्यपुरुष भी कह सकते हैं । प्रजापति ( परमेष्ठी ) के भृग्वङ्गिरोमय अवलक्षण रेत से उत्पन्न आदित्यनामक हिरण्मय देवता ही स्व आग्नेय रेत से बर्षा - श्रोषधि- अन्न- रेतो -रूप में परिणत होता हुआ पुरुष स्वरूप में विभूत होता है | अतएव " देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थास्वनुपूर्वशः " कहना अन्वर्थ बन रहा है । श्रादित्यपुरुष, तथा मानवपुरुष, दोनों इस रेतः सृष्टिविज्ञान की अपेक्षा से अभिन्न हैं, अतएव ' योऽसावा-दित्ये पुरुषः सोऽहम् ' कहना भी न्यायसङ्गत वन रहा है । पार्थिव र ' इरा ' नाम से प्रसिद्ध है । ओषधियों में इसी रस का प्राधान्य है । इस पार्थिव इरारस के प्राधान्य से तत्रागत हिरण्मयदेवता भी इरामय बन जाते हैं । इस प्रकार बही • लोकस्थ हिरण्मय पुरुष पृथिवी में आकर तस से सम्परिष्वक्त होकर ' इरामय ' बन रहा है । यही इरामय पार्थिव पुरुष सुप्रसिद्ध कम्र्मात्मा है, जिसे हम द्युलोकस्थ दिव्य हिरण्मयपुरुष का द्वितीयावतार कह सकते हैं । पार्थिव स्तौम्यत्रिलोकी के वैश्वानर - तेजस - प्राइरस भी इरामय पुरुष में समन्त्रित हैं । तएव यह तद्र ूप ( वै ० तै ० प्रा ० मय ) प्राज्ञमूर्त्ति पुरुष ' कम्मात्मा ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जिसे कि पूर्व में ' देवसत्य ' नाम से भी व्यवहृत किया गया है । जिस प्रकार लोकरसप्रधान विज्ञानात्मा अपने वास्तविक हिरण्यतेज के सम्बन्ध से ' हिरण्मय पुरुष ' कहलाता है, एवतेव पार्थिवरसप्रधान कम्र्मात्मा भी परोक्षभाषा सम्बन्ध से ' हिरण्मय होने से ' नाम से ही व्यवहृत हुआ है । दोनों ही हिरण्मय हैं । अन्तर यही है कि, विज्ञानात्मा हिरण्मय हिरमय है, कर्मात्मा इरामय होने से हिरण्मय है । इरामय कम्मतिमा को हिरण्मय कहने का अभिप्राय एकमात्र यही है कि, कम्र्मात्मा वास्तव में है उसी दिव्य हिरण्मय का प्रवर्ग्याश । केवल भूतभागासक्ति से भूतप्रधान इरारस के प्राधान्य से यह उससे पृथक् सा होगया है । श्रेष्ठतम यज्ञादि सौर कम्र्मानुष्ठान से जिस दिन यह कर्मात्मा अपने पार्थिव इरारस की ग्रन्थियाँ शिथिल कर देता है, उस समय यह

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पार्थिवाकर्षण से विमुक्त होकर अपने प्रातिश्विक विशुद्ध हिरण्मयरूप में परिणत हो जाता है । इसी उभयविध पुरुषविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऐतरेय कहते हैं-" स इरामयः । यद्धि - इरामयः, तस्माद्धिरण्मयः । हिरण्मयो वा मुष्मिल्लोके सम्भवति य एवं वेद । " पदप्रतिष्ठ कर्मात्मा — ऐ ० ० २ | १ | ३ | उक्त लक्षण पार्थिव इरामथ कम्र्मात्म | दो प्रकार से हमारी अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित रहता है | प्रातिश्विक रूप से प्रविष्ट होने वाला भूतात्मा ( कम्मतिमा ) शुक्र में प्रतिहित रहता है, एवं. यह प्रति प्राणी में भिन्न भिन्न है । यही प्राधानिकों का प्रतिशरीरभिन्न जीवात्मवाद है । यह पार्थिव. भूतात्मा औपपातिकरूप से शुक्रशोणित के दाम्पत्यभाव में आकर कालान्तर में स्थूलशरीर धारण करता हुआ भूमिष्ठ बन जाता है, तो इसमें सजातीयाकर्षण से पुन: इरामय पार्थिव रस प्रविष्ट होता है । यह आगन्तुक इरारस प्राणिमात्र में समान है । पार्थिव इरामय औपपातिक आत्मा अन्तर्यामि सम्बन्ध से शुक्र में प्रतिष्ठित रहता है । इसका प्रभवथान अन्न है, योनिस्थान पुरुष है, प्रतिष्ठास्थान शुक्र है, आशय सर्वाङ्गशरीर है । भूमिष्ठ होने के अनन्तर यह पार्थिवप्राणदेवता अग्नि- प्रधानता के कारण नवजात शिशु के दक्षिण प्रपद ( फाबा ) से प्रविष्ट होता है । पार्थिव चैतन्य सर्वप्रथम बार क के प्रपदस्थान में ही प्रवेश करता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, नवजात शिशु सर्वप्रथम पादाग्रभागों को ही सक्रिय बनाता है । प्रपद स्थान से ऊपर की ओर चढ़ता हुआ उरुस्थान में आता है । अतएव पादानन्तर उरुद्वय में ' गति ' का उद्रेक होता है 1 | उससे हृदय में आता हुआ जाटराग्नि - समतुलित उदर में आता है । यहीं से बुभुक्षा तीव्र होने लगती है । यही बुभुक्षावृद्धि आयतनवृद्धि का कारण बनती है । उवथ श्रर्व अशीति-लक्षण अन्नोर्कप्रारणानुग्रहात्मक यज्ञ ही आयतनवृद्धि का कारण है, एवं इस यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा ' शनाया ' ( बुभुक्षा ) बल ही माना गया है । उदरस्थान के अनन्तर वही पार्थिवरसात्मक चित् प्रारण कण्ठदेशस्थ तेजोनाडी ( जिसे कि उपनिषत् ने ' उदान ' नाम से भी व्यवहृत किया है ) के द्वारा ऊर्द्ध-स्थानों में ' ( वाक - प्राण - चक्षुः - श्रोत्रादि में ) व्याप्त हो जाता है । इरामय हिररमयात्मा ( पार्थिवक-मात्मा ) शरीर के साथ उत्पन्न होता हुआ जहाँ ' उत्पत्ति सृष्ट ' है, वहां यही इरामय पार्थिव प्रतिष्ठातत्व ' शरीरोत्पत्यनन्तर उत्पन्न होता हुआ ' उत्पन्नसृष्ट है । वह अन्तर्य्याम सम्बन्ध से प्रतिष्टित रहता है, यह. बहिर्य्यामि सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है, जिसे ' विभूति ' सम्बन्ध भी कहा * जासकता है । इसका प्रभवस्थान पार्थिव गायत्र प्रारण है, योनि दक्षिण प्रपद है, प्रतिष्ठा हृदय है, आशय सर्वाङ्गशरीर है । इस प्रकार पार्थिवपुरुष का कम्र्मात्मा, प्रतिष्ठात्मा, रूप से हमारी आध्यात्मिक संस्था में दो प्रकार से उपभोग हो रहा है । ε

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करारविन्देन पदारविन्दम्-श्राद्धविज्ञान पृथिवी की एक साम्वत्सरिक परिक्रमा से घनानिप्रधान प्रतिष्ठामूलक इरामय यह पार्थिव प्रारण सर्वाङ्गशरीर में प्रतिष्ठित होता हुआ शिशु को स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित कर देता है । जब तक ( एक वर्ष-पर्यन्त ) यह प्रतिष्ठात्मक पार्थिव प्राण शिशु- शरीर में सर्वात्मना प्रतिष्ठित नहीं हो जाता, तब तक शिशुशरीर परावलम्ब की अपेक्षा रखता है । एक वर्ष के अनन्तर ही यह स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता हुआ खड़े होने में समर्थ बनता है । सर्वव्यापक ईश्वर की चिच्छक्ति का उपक्रमस्थान प्राणमय स्वयम्भू है, उपसंहारस्थान अन्नादमयी पृथिवी है । भूपृष्ठ पर उत्पन्न होने वाली अस्मदादि पार्थिव प्रजा को इसी पार्थिव चिच्छक्ति को प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है । यही कारण है कि, मरतक की अपेक्षा चरण को विशेष महत्त्व दिया जाता है । ' पद्भ्यां भूमिं प्रतिष्ठितः ' इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार सप्तवितरित कायात्मक विश्वव्यापक · विराट पुरुष के पादप्रतिष्ठालक्षण भूप्रदेश का ही पार्थिवप्रजा के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । पृथिवी उस 1. विराट पुरुष के पाद हैं, सूर्य हृदय है, स्वयम्भू मरतक है । जो चिच्छक्ति शिरः स्थानीय स्वयम्भू में है, वही हृदयस्थानीय सूर्थ्य में, तथा पादस्थानीया पृथिवी में है । शिरोभाग ( श्वयम्भू ) से प्रारम्भ कर पादभाग ( पृथिवी ) पन्त एक ही चैतन्यधारा प्रवाहित है । दोनों परस्पर ' प्रहितां संयोगः प्रयुतां -संयोगः ' लक्षण गायत्री के ' एति - प्रेति ' सम्बन्ध से सम्बद्ध हैं । इसका वहां गमन ' प्रेति ' भाव है, उसका यहां आगमन ‘ एति ' भाव है । पृथिवी की प्रतिष्ठा अभिसम्बन्ध से दक्षिणादिक मानी गई है । इसी प्राकृतिक चिच्छतिरहस्य को लक्ष्य में रख कर निदानविद्या के प्राचार्यों ने पुरुषोत्तमेश्वर के के दक्षिणपादाङ्ग ुष्ठ को उनके मुखविवर में प्रविष्ट माना है । अमृत - ब्रह्म - शुक्रात्मक ब्रह्माश्वत्थवृक्ष की बहशा के एक पत्र ( भाग ) पर प्रतिष्टित इसी परम भागवत तत्व की प्रारम्भिक स्थिति का दिग्दर्शन कराते

हुए भागवताचायों ने कहा है-करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।

• पत्रस्य मुखेशयन्तं बालं मुकन्दं मनसा स्मरामि ॥

पादस्थान ही हमें उपलब्ध होता है, अतएव उपासना काण्ड में भगवच्चरणारविन्दो का ही महत्त्व विशेष रूप से ग्राह्य है । पिता, ज्येष्ठ भ्राता, माता श्राचार्यादि की पाद सेवा भी इसी लिए सर्वोत्कृष्ट मानी गई है । इरामय पार्थिव ब्रह्म प्रपदस्थान से ही तो प्रविष्ट होता है । वास्तव में यह स्थान पवित्रतम है, जिस का रहस्य लौकिक मनुष्य नहीं जान सकते । कहना यही है कि, सर्वव्यापक . ईश्वर - तत्त्व पाप्माओं से एकान्ततः विरहित, अतएवं विशुद्ध- नित्यशुद्ध - मुक्त है । उत्पन्न शिशु भी तत्सम है, परमह सकता में प्रतिष्ठित है । इस के अन्तःकरण में भी चैतन्य समानधारा से प्रवाहित है । अपनी इसी प्रवाहवृत्ति से नवजात शिशु दक्षिणपादाङ्ग ष्ठ को चूसा करता है । जिस बालक " में ऐसी वृत्ति रहती है, शकुनशास्त्रवेत्ता उसे भाग्यशाली बतलाते हैं । तमोगुणप्रधान शिशुओं में प्रायः

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प्रजातन्तुविता यह भाव उपलब्ध नहीं होता । इस प्रासङ्गिक विनोद के अन्त में हमें यही कहना है कि, पार्थिवात्मा अन्तर्याम, बहियम भेद से दो प्रकार से पुरुष में प्रतिष्ठित रहता है । एक जीवनसत्ता का, उत्पत्ति को कारण है, दूसरा शरीरप्रतिष्ठा का आलम्बन है । पशुसंस्था में भी दोनों आत्मविवर्त्त प्रतिष्ठित रहते हैं । परन्तु इन में ' इषे वोर्जेवा वायवस्थ देवो वः ' के अनुसार वायव्यप्राण की प्रधानता रहती है । अतएव पशु को स्वप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होने के लिए एक वर्ष नहीं लगता । अपितु यह उत्पन्न होते ही उछलने कूदने लगता है । ' अथातो रेतसः सृष्टि: ' इत्यादि पूर्वोक्त ऐतरेय श्रुति ने जीवनसत्तौपयिक कर्मात्मा का स्वरूप बतलाया था, अब निम्नलिखित ऐतरेय श्रुति प्रपद सम्बन्धी प्रतिष्ठात्मा का विश्लेषण कर रही है --" तं प्रदाभ्यां प्रापयत ब्रह्म मं पुरुषम् । यत् प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्म मं पुरुषं, तस्मात् प्रपदे । तस्मात् प्रपदे - इत्याचक्षते शफाः खराः इत्यन्येषां पशूनाम् । तदूर्ध्वमुदसर्पत् । ता ऊरू अभवताम् । उरू गृणीहीत्यब्रवीत्, तदुदरमभवत् । उर्वेव मे कुरु, इत्यब्रवीत् । तदुदरोऽभवत् । उदरं ब्रह्म ेति शार्कराच्या उपासते, हृदयं ब्रह्म ेति रुणेयः । ब्रहा हैव ता ३ इ, इति । ऊर्ध्वं त्वेवोदसर्पत् । तच्किरोऽश्रयत । यच्छिरोऽश्रयत, तच्छिरोऽभवत् । " ( ऐ ० आ ० २ । १ । ४ । पा १- अन्नम् - प्रभवः २ - पुरुषाग्नि: - योनिः ३- शुक्रम् - प्रतिष्ठा ४- शरीरम् - आशयः १ - भूमि: - - प्रभवः . २ - प्रपदे - योनिः ३ - हृदयम् - प्रतिष्ठा ४ - शरीरम् - आशयः अन्तर्यामसम्बन्धेन शुक्र प्रविष्टः इरामयत्त्वाद्धिरण्मयः, लोकान्तरसञ्चारी, जीचसँज्ञः, कर्मभोक्ता - " कर्मात्मा ' । हिमसम्बन्धेन हृदये प्रविष्ट इरामयत्त्वाद्धिरण्मयः, पृथिव्यामेवान्ततः प्रतिष्ठितः, अभिमानी संज्ञः - ' प्रतिष्ठात्मा । far प्रतिष्टात्मा वात्मविच * ४ ११

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कर्मात्मा के तीन जन्म-श्राद्धविज्ञान बतलाया गया है कि, अन्तम सम्बन्ध से अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित होने वाले कम्मा के पांच जन्म होते हैं । भगवान् ऐतरेय ने तीन जन्मभावों को ही प्रधान माना है । अन्न-द्वारा पुरुष के शुक्र में प्रतिष्ठित होकर शुक्रद्वारा स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित होना प्रथम जन्म है, नत्रमासानन्तर भूमिष्ठ होना द्वितीय जन्म है । स्थूलशरीरविनष्टि के अनन्तर प्रतिवाहिक शरीर से लोकान्तर में जन्म लेना तृतीय जन्म है । इस व्यवस्था के अनुसार अन्नद्वारा पुरुषशुक्र में प्रतिष्ठित होने वाले पूर्वोक्त प्रथम जन्म का साधन रूपतया शोणितजन्म में अन्तर्भाव माना जा सकता है, जोकि ऐतरेय के अनुसार प्रथम जन्म है । एवमेव पूर्वप्रतिपादित संस्काररूप चतुर्थ जन्म का साधनरूपतया पाँचवें जन्म में अन्तर्भाव माना जा सकता है, जोकि ऐतरेयसम्मत तृतोय जन्म है । इसी जम्मविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-----१ – “ पुरुषे हवा मादितो गर्भो भवति, यद्रतः । तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्ग भ्यस्तेजः सम्भूत-मात्मन्येवा SS त्मानं बिभर्त्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैतज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म " । - " तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति, यथा स्वमङ्ग तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साड़ स्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भ बिभर्त्ति, सोऽग्र एवं कुमारं जन्मनोऽग्रे ऽधि भावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रे ऽधि भावयति, आत्मानमेव तद् भावयति - एषां लोकानां संतत्या । एवं सन्तता ही मे लोकाः । तदस्य द्वितीयं जन्म । " ३ - " सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृत-कृत्य वयोगतः प्रति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते, तदस्य तृतीयं जन्म 99 तदुक्त ऋषि - " गर्भेऽनु सन्नन्वेषामवेदमहं देवाना जनिमानि विश्वा । शतं मापुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयम् " - ऐ ० आ ० २।५ । १ । १ - पुरुषे ह अयमादितो गर्भो भवति - तदस्य प्रथमं जन्म : - तदस्य प्रथमं जन्म । २ - तद्यदा स्त्रियां सिञ्चति --- तदस्य द्वितीयं जन्म ३ - स यत् कुमारं जन्मनः--- तदस्य तृतीयं जन्म - तदस्य द्वितीयं जन्म । १२ ?

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प्रजातन्तुवितान ४ - पुण्येभ्यः कर्म्मभ्यः-• तदस्य चतुर्थं जन्म - तदस्य तृतीयं जन्म । ५ - वयोगतः प्रति-- तदस्य पञ्चमं जन्म १ - अन्नद्वारा शुक्र प्रतिष्ठा कम्मात्मनः-- प्रथमं जन्म १-- प्रथमं जन्म २- शुक्रद्वारा शोणिते प्रतिष्ठा कम्र्मात्मनः--- द्वितीयं जन्म ३ - गर्भाशयद्वारा भूमौ प्रतिष्ठा कम्र्मात्मनः --तृतीयं जन्म - द्वितीयं जन्म ४ - संस्कारद्वारा दिव्यभावे प्रतिष्ठा कम्र्मात्मनः ५- अग्निद्वारा परलोके प्रतिष्ठा कम्मत्मिनः-रेत - योनि - रेतोधा-चतुर्थं जन्म - पञ्चमं जन्म - तृतीयं जन्म Y प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति में ' रेत योनि - रेतोधा ' नामक तीन साधन अपेक्षित माने गएहैं । द्रव्य वस्तुस्वरूप का उपादानकारण बनता है, स्वरूपसमर्पक बनता है उसे ' रे ' कहा जाता है । जिस स्थान में प्रतिष्ठित होकर यह रेतोद्रव्य वस्तुस्वरूप में परिणत होता है, वह स्थान ' योनि ' कहलाता है । एवं योनि में रेत को प्रतिष्ठित करनेवाला निमित्तकारणबिशेष ही ' रेतोधा? नाम से प्रसिद्ध है । प्रजापति के द्वारा विहित उपर्युक्त रेतःसृष्टि - प्रक्रिया में ये तीनों उपकरण विद्य- " " मान हैं । ( १ ) - सावित्राग्नि ' योनि ' है, भृग्वङ्गिरोमय पारमेष्ठ्यरस ' रेत ' है, ' मातरिश्वा ' नाम से प्रसिद्ध पारमेष्ठ्य भार्गव वायु ' रेतोधा ' है । तीनों के समन्वय से पहिली ' देवसृष्टि ' का विकास हुआ है । ( २ ) - पर्जन्याग्नि ' योनि ' है, सौरमण्डलस्थ देवप्राणगर्भित ' श्रद्धा ' नामक चान्द्रसोम ' रेत ' है, आन्तरिक्ष्य ' पावक ' नामक वायुविशेष ' रेतोधा ' है, तीनों के समन्वय से ' वृष्टिसृष्टि ' का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । ( ३ ) - पार्थिव उख्याग्नि ( गायत्राग्नि ) ' योनि ' है, आपोमय वृष्टिसोम ' रेत ' है, पार्थिव ' पवमान ' नामक वायुविशेष ' रेतोधा ' है, तीनों के समन्वय से ' ओषधिसृष्टि ' हुई है । ( ४ ) — आलोमभ्यः, आनखा भ्यः, व्याप्त पुरुषशरीरावच्छिन्न वैश्वानराग्नि ' योनि ' हैं, भुक्त अन्न सोम ' रेत ' है, प्रशनायासूत्रात्मक प्राणवायु ' रेतोधा ' है, तीनों के समन्वय से ' शुक्रसृष्टि ' हुई है । ( ५ ) - स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित अङ्गिराप्राणघन शोणिताग्नि ' योनि ' है, पुरुषशरीर में.. प्रतिष्ठित सौम्यशुक्र ' रेत ' है, नाभानेदिष्ठ - बालखिल्या - वृषाकपि, नामक गर्भस्वरूप- सम्पादक प्राण-विशेषों की आधारभूमि ' एवयामरुत् ' नामक वायुविशेष ' रेतोधा ' है, तीनों के समन्वय से प्रजासृष्टि का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । १३

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 50 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान * * - रेतः- - भृग्वङ्गिरोमय्यः पारमेष्प्रधापः ( सोमः ) २ - योनिः - - द्युलोकस्थः साविन्नाग्निः ( अग्निः ) १ ३ - रेतोधा: - भार्गवो मातरिश्वा वायुः ( वायुः ) * - चान्द्रसोमः श्रद्धात्मकः ( सोमः ) १ - रेतः-२ - योनिः --- पर्जन्यामिरान्तरीयः ( अभिः ) २२ ३ - रेतोधा: - पाचको वायुरान्तरीक्ष्यः ( वायुः ) १ - रेतः - दिक्सोममय्य श्रापः ( सोमः ) - योनिः -- पार्थिवउख्याग्निगयत्रः ( अग्निः ) ३ - रेतोधाः - पवमानो वायुः पार्थिवः ( वायुः ) -भुक्तान्नम् ( सोमः ). - रेतः २ - योनिः --- पुरुषाग्निर्वैश्वानरः ( अग्निः ) ४ ३-- रेतोधाः -- प्राणो वायुः शारीरः ( वायुः ) १ - रेतः--सौम्यं शुक्रम् ( सोमः ) २ - योनिः --- गर्भानुगतः शोणिताग्निः ( अग्निः ) ३ - रेतोधा: - एबयामरुत - शारीरः ( वायुः ) १४ - देवसृष्टि: --" प्रजापतेरेतो देवाः " अपसृष्टि: -" देवानां रेतो वर्षम " • श्रोषधिसृष्टिः " वर्षस्यरेत योषधयः " -शुक्रसृष्टि : -" योषधीनां रेतोऽन्नम् " - प्रजासृष्टि: -" नस्य रेतो रेतः " " रेतसो रेतः प्रजाः "