Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 321–330

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 321–330

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 321 का मूल पृष्ठ
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1 ऋणमोचनोपायोपनिषत् अब क्रमप्राप्त [ ४ ] - पितृकर्मानुगत मुख्य महासङ्गीत के नैगमिक आम्नाय का भी समन्वय कर लीजिए | इस समन्वय से पूर्व कुलस्त्रियों में प्रचलित एक विशेष मान्यता की ओर पाठकों का ध्यान प्राकर्षित कराया जाता है – कुलस्त्रियों से ऐसा सुनने में आता रहता है कि- " अर छोरा - छोरी-यो तर - फुलेल - लगार - फूलमाला पहर - दूध - खीर - बर्फी - चॉवल - मीठो चूँठो खार रातबिरात भर दोफरी - कलोई बखत बड़ - पीपल - बोरड़ी का पेड़ा में चोरावा में मत घूमता फिरोर, देखो काँई हो जाय लो तो लेणा से देखा पड़ जायला " इत्यादि । तात्पर्य है - " हे बालक बालिकाओ! सुगन्धित द्रव्य ( इत्र आदि ) लगा के, ( चम्पा चमेली - मोगरा - गुलाब आदि विशिष्ट गन्धयुक्त पुष्पों की ) माला पहन के, गोदूध, खीर, कलाकंद, चावल, ओर भी किसी भी प्रकार की मिठाई खाके रात्रि के समय, मध्याह्न में, सायंकाल ( झालर बांज्या की बखत ), बड़ - पीपल - झरबेरी का वृक्ष - आदि वृक्षों के नीचे, चतुष्पथ में घूमना ठीक नहीं ( क्योंकि इन स्थानों से वायव्य प्रेतपितृपरिवार विशेष रूप से अपना आकर्षण रखता है, अतएव यहाँ घूमने - फिरने - बैठने - सोने - खाने - पीने से यदि कहीं तत्समयविशेष में स्वभावतः श्राकर्षित प्रेतसर्गानुगता किसी हीन - मध्यम - उत्कृष्ट योनि का ) आक्रमण हो गया, तो हमें बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़ेगा । " क्या तथ्य है इस लोकश्रुति में?, प्रश्न की आलोचना से कई एक कारणों से हम तटस्थ ही रहना श्रेयःपन्था मान रहे हैं । प्रकृत में केवल ' सुगन्धिद्रव्य ' ( गन्ध और माला - पुष्प ) की मान्यता से सम्बन्ध रखने वाले आम्नाय की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, जिसका ' काए का तोला- ' इत्यादि उपक्रम वाक्य में ही प्रसङ्ग आया है । मनोमय - चान्द्र पितर के लिए वे ही उपकरण तृप्ति - तुष्टिसाधक माने जायँगे, जिनमें प्राकृतिक पितृप्राण का अनुशय साक्षाद्रूप से, अथवा तो प्रतीकरूप से, किंवा निदानरूप से रहेगा | चन्द्रमा भार्गव - तत्त्वप्रधान है, एवं भृगुतत्त्व ' श्रापः - वायुः सोमः ' रूप से तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है । सोम की घनावस्था ही ' आप ' है, यही ' वरुण ' है । सोम की तरलावस्था ही ' वायु ' है, यही घोर - अघोर भावापन्न ' रुद्र ' है । सोम की विरलावस्था ( बाष्पावस्था ) ही ' अन्नात्मक ' पितर ' है । इस दृष्टि से पः- वायुः - सोममय त्रिमूर्त्ति चन्द्रमा वरुण - रुद्र - पितर - मूर्त्ति बन रहा है । भार्गव चन्द्रमा का वारुण ' आप ' भाग ही ' अप्सरा ' प्राण का प्रवर्त्तक - अधिष्ठाता बनता है । भार्गव चन्द्रमा का रौद्र ' वायु ' भाग ही ' गन्धर्व्व ' प्राण का प्रवर्त्तक - अधिष्ठाता बनता है । एवं भार्गव चन्द्रमा का पैत्र ' सोम ' भाग ही ' प्रजापति ' प्राण का प्रवर्त्तक- अधिष्ठाता बनता है । इस प्रकार चान्द्र-सम्वत्सरचक्रात्मक द्यावापृथिव्य - चतुर्दशविध भूतसर्गात्मक ४२ भागों में विभक्त पार्थिव - भौम- अन्न-* " वयु- राप श्चन्द्रमाः - ( सोमः ) - इत्येते भृगवः " ( गोपथब्रा ० पू ० २६६ ॥ २५१

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श्राद्धविज्ञान पितर- परिवार का सर्व्वश्व, अतएव ' सर्व ' नाम से प्रसिद्ध भार्गव चन्द्रमा उक्त रूपत्रयी से उक्त त्रिवृद्भावों में परिणत हो रहा है, जैसा कि तालिका से स्पष्ट है--आपः - वरुणः १ - अप्सरा -वायुः २ - रुद्रः २ - गन्धर्व्वः ३ – सोमः ३- पितरः ३ - प्रजापतिः ( ( E ) त्रिवृदुभावापन्न-रचन्द्रमाः ३ ३ ' तदित्थं- ' चन्द्रमा एव सर्वम् ' - गो ० ना ० पू ० शा मूलभावत्रयी १ मध्यभावत्री तूलभावत्री ( १ ) चन्द्रानुगता -- मूलभावत्रयी-( १ ) - ' चन्द्रमा ह्याप: ' ( तै ० ना ० १७६।३ ) । ( २ ) - ' योऽयं वायुः पवते, एष सोमः ( शर ० ७ । ३ । १ । १ः ) । ( ३ ) - ' पितृदेवत्यो सोमः ' ( शत ० २४ | २ | १२ | ) । चन्द्रानुगता मध्यभावत्रयी--१-( १ ) —– ' वरुणस्य भर्गः – अप ' ( ० १८६१ ) - ' अप्सु वै वरुण: ' ( तै ० १ | ६ | ५ | ६ | ) । ( २ ) - यद्रद्रश्चन्द्रमास्तेन ' ( कौ ० ६ । ७ । ) । ( ३ ) - ' पितृदेवत्यो वै सोम: ' ( शत ० २ | ४ | २ | १२ | ) । ( ३ ) चन्द्रमानुगता तूलभावत्रयी-( १ ) - ' सोमो राजा, अप्सरसो विश: ' ( शत ० १३ | ४ | ३ || ) | ( २ ) - ' चन्द्रमा वै गन्धर्वः ' ( शत ० ६४ । १ । ६ । ) । ( ३ ) - ' सौ वै चन्द्रः प्रजापतिः " ( शत ० ६ २ २।१६ ) । –३– २५२

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ऋणमोचनोपायोपनिपत ---. उक्त चान्द्रसर्वता को अवधानपूर्वक लक्ष्य बनाते हुए लोकगीतानुगत ' सुगन्धिद्रव्य - परिग्रहग्रहण ' का समन्वय कर लीजिए, सब कुछ समन्वित हो जायगा । चान्द्र पैन्त्रमण्डल में वरुण - रुद्र - पितर- गन्धर्व-अप्सरा आदि आदि जो प्राण समाविष्ट हैं, वे अपने अपने स्वरूपानुगत पार्थिव भूतों- पार्थिव स्थानों के प्रति सहज रूप से उसी प्रकार आकर्षित रहते हैं, जैसे कि सोमप्रिय मरुत्त्वानिन्द्र वायुग्रह में तुरीयरूप प्रतिष्ठित होकर पृथिवी में उपलब्ध गोदुग्ध - उष्ण अन्न आदि के सोम का आकर्षण करते हुए-कालान्तर में इन्हें यातयाम ( नीरस ) बनाते रहते हैं । रुद्र का आकर्षण स्थान यदि ' एतद्वै जान्धितं प्रज्ञ तमवसानं - यच्चतुष्पथम् ' ( शत ० ) रूप से चौराहा है, तो निश्चयेन यह स्थान प्रणम्य ही बनना चाहिए । विशेषतः उन गन्धादि परिग्रहों से युक्त होकर उन विशेष आकर्षण - रुद्रकालों में तो वहाँ से बचकर ही चलना चाहिए, जिन चान्द्रपरिग्रहों के साथ भी समानस्थानीयत्त्वेन रुद्र का सहज आकर्षण रहता है । सुगन्धिद्रव्य - मोदप्रमोद आमोदादि परिग्रह चान्द्र गन्धर्वप्राण से सम्बन्धित हैं, तो रूप - हास-परिहास - क्रीड़ा कौतुक - नृत्य - सङ्गीत आदि चान्द्र अप्सरा प्रारण से सम्बन्धित हैं । यही कारण है कि, गन्धर्वप्राणप्रधान सौम्य - भावुक - मनुष्य सुगन्धित द्रव्य - माल्यादि में आमोदप्रमोद में - ही सतत आसक्त - व्यासक्त रहते हैं । एवं अप्सराप्राणप्रधाना मानुषी रूपदर्शन - रूपशृङ्गार- हास परिहास - क्रीड़ा-कौतुक नृत्यगीतादि में ही आसक्तमना बनीं रहतीं हैं । दोनों प्राण सहचारी हैं । अतएव एक एक प्राण-प्राधान्य से कृतरूप भी मनुष्य - मानुषी दोनों धम्मों से आक्रान्त रहते हैं । अवश्य ही तद्भावपरायण सौम्य बालक- स्त्रीवर्ग - इन कर्षण साधनों से भूतासर्गात्मक पितृप्रारण के द्वारा आकर्षित बन जाया करते हैं । निम्नलिखित कतिपय श्रौत वचन इसी मान्यता को आम्नायानुगत प्रमाणित कर रहे है! ---( १ ) - जानन्तो रूपमकृपन्त विप्रा मृगस्य घोषं महिषस्य ग्मन् । ऋतेन यन्तो अधि सिन्धुमस्थुर्विदद्गन्धर्वो अमृतानि नाम ॥

राजामुपसियाणा योगा विभर्त्ति परमे व्योमन् ।

चरत् प्रियस्य योनिषु प्रियः सन्त्सीदत्य हिरण्यये स वेनः ॥

ऊर्ध्वो गन्ध अधिना अस्थात् प्रत्यचित्रा विश्रदस्यायुधानि ।

arat सुरभिं दृशे कं स्वर्ण नाम जनत प्रियाणि ॥

--ऋक्संहिता १०।१२३।४,५,७ ।

( २ ) - दिव्या गन्धर्वाः प्रतिनन्दन्ति । गन्धो मे, मोदो मे प्रमोदो मे ।

अप्सरसः प्रतिनन्दन्ति । हसो ( हासो ) मे, क्रीड़ा मे, मिथुनम्मे ॥

- जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण ५।५ । * ' इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते ' ( शत ० ४ | ३ | ४ | ३ | ४६ प्रकार के आन्तरीक्ष्य वायव्यग्रहों में एक चतुर्थांश इन्द्रप्राण समाविष्ट रहता है । -२५३

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श्राद्धविज्ञान ( ३ ) - विषमिति सर्पाः, ऊर्गिति देवाः, रयिरिति मनुष्याः, मायेत्यसुराः, स्वधेति पितरः, रूपमिति गन्धर्वाः, गन्ध इत्यप्सरसः । तं यथा - यथोपासते, तदेव भवति । - शतपथब्राह्मण १०/५/२/२०१ - गन्धेनैव च रूपेण च गन्धर्व्वाप्सरसश्चरन्ति । तस्माद्यः कश्च मिथुन -तिचैव रूपं च कामयते । ( ५ ) - योषिकामा वै गन्धर्वाः ( ० ० १ २७ । ) । -स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः ( कौ ० १२३ । ) । -शत ० ६ | ४ | १ | ४ | ( ६ ) - अथ देवा: - वीणामेव सृष्ट्वा वादयन्तो - निगायन्तो निषेदु:, इति वै ते ( देवाः ) - वयं-गास्यामः, इति त्वा ( वाचं - वागुरूपिणीं स्त्रियं ) प्रमोदयिष्यामहे, इति सा देवा-पावर्त्तत । सा वैसा मोघं ( आत्मविस्मृता सती स्वानुगतभावुकतया ) उपा-वर्त्तत - या स्तुवद्भ्यः शंसद्भ्यो नृत्यं - गीतमुपावर्त्तत । तामु ह्यन्या योषाः ( सर्वाः स्त्रियः ) । तस्मादप्येतर्हि ( लोकसर्गेऽपि ) मोघसंहिता ( आत्मस्वरूपविस्मृता ) एव योषा । तस्मात् — य एव नृत्यति, यो गांयति, तस्मिन्नेवैताः ( स्त्रियो-भावुका:: ) निमिश्लितमा ( विमुग्धा: - आकर्षिता: ) इव ( भवन्ति ) ।. .- शत ० सोमक्रयब्राह्यय २०४६ ( ७ ) – उपद्रवं गन्धर्वाप्सरोभ्यः ( प्रायच्छत् - प्रजापतिः ) । तस्मात् उपद्रवं गृह्णन्त इव चरन्ति 1 । ( जै ० उ ० ब्रा ० १ | १२ | १ | ) | ( ८ ) - गन्धर्वाप्सरसो वै मनुष्यस्य प्रजाया वाऽप्रजस्ताया वेशते । तेषामत्र सोमपीथः ।

तान् प्रीणाति । तेऽस्मै प्रजां प्रयच्छन्ति ॥

- ताण्ड्य महाब्राह्मण ९ ६ । ३ । २ । - तस्य पतञ्जलस्य काप्यस्य श्रासीद हिता गन्धर्वगृहीता ( शत ० १४।६।३।१ । ) । ÷ ' तस्मात्स्त्रियः पुंसोऽनुवर्त्मानो भावुका: " ( शत ० १३।२ । २ । ४ । ) । अप्सरासु च या मेधा गन्धर्वेषु च यन्मनः । मनुष्यजा ( स्त्री मेधा ) सा मां मेधा सुरभिजुषताम् " । ) ( त ० आरण्यक १८।४१ । २५४

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4 ऋणमोचन पायोपनिषत् - राज्यां ही ति ( पितृभ्यो ददाति ) । वयममुळे लोकं परेत्य - पितृभ्यः, अथो एनं नः श्रद्धाताः । तदेतर्हि हूयते रात्र्यामेवत्येतदेव कुमारी गन्धर्वगृहीतोवाच । - शाङ्खायनब्राह्मण राही एतदु हैवाच कुमारी गन्धर्वगृहीता- ' वक्तास्मो वा इदं पितृभ्यः, यद्वै तदग्निहोत्रमु रहू ' इति । - ऐतरेय ब्राह्मण २५ | ५ | २६ | " गन्ध, माल्य - ञ्जन - अलङ्कार - शृङ्गार - मोद, प्रमोद, हास, परिहास, क्रीड़ा, मिथुन-भाव, रूप ( सौन्दर्य ), योषित् ( स्त्रियाँ ), स्त्रीकामुक, गन्धर्व, अप्सरा, नृत्य, गायन, वीणा-वादन, विविध आकस्मिक उपद्रव, चतुष्पथ, भृत प्रेतादि, कुमारी - स्त्री - में भूतावेश, पितर, रात्रि " सम्पूर्ण भाव गन्धर्वाप्सरोऽनुगत हैं, यह उक्त निगमवचनों से सर्वात्मना स्पष्ट है, ओर इसी स्पष्टी-करण के साथ सर्वात्मना समन्वय हो रहा है कुलस्त्रियों की उस सामयिक मान्यता का, जिसका पूर्व में उल्लेख हुआ है । चान्द्र - गन्धर्व जहाँ मानवीय ' मन ' का स्वरूपाधिष्ठाता बनता है, वहाँ वारुणी अप्सरा मानवीय शरीर की अधिष्ठात्री बना करती है * । निष्कर्षतः मन गन्धर्वप्राणप्रधान है, जिसके कारण नर ' गायन ' वृत्ति का उदय होता है । शरीर अप्सराप्राणप्रधान है, जिससे नारी में ' नृत्यवृत्ति ' का उदय होता है । यद्यपि नर - नारी दोनों में गन्धर्वाप्सरा- दोनों प्राण समन्वित हैं । किन्तु दोनों का गौरा-मुख्यात्मक समन्वय भी प्राकृत ही है । अप्सराप्राणगर्भित गन्धर्वप्रारण नर के मन का, एवं गन्धर्वप्राण-गर्भित अप्सराप्राण नारी के शरीर का प्रधान आधार बनता है । अतएव नृत्य - गीत, दोनों की दोनों ही ' अनुगति रखते हुए भी नर गायन - प्रधान है, नारी नृत्यप्रधाना । कौनसी नारियाँ, और कौन से नर नृत्य - गीत परायण बना करते हैं?, जिन्हें अपना नैगमिक श्रात्म-बुद्धधनुगत स्वरूप बोध नहीं होता । जिन यथाजात - संस्कृत - शुद्रसधम्र्मा - पशुसमानधर्मा - नर - नारियों में स्वरूपबोध का अभाव रहता है, मनोऽनुभूत्या उच्छङ्खल - उत्तालतरंगायित स्वैराचारपरायण वैसे प्राकृत नरों, तथा तत्समतुलिता नारियों में ही चान्द्रभावानुगत गन्धर्वाप्सरात्मक वृत्युत्तेजक सहजशान्ति-स्वस्त - विघातक नृत्य गायन का उद्गम होता रहता है, जो भारतीय आर्षदृष्टिकोण से नैगमिक द्विजाति प्रजा के लिए तो सर्वथा न केवल उपेक्षणीय ही है, अपितु श्रुतिद्वारा आत्यन्तिक रूप से निषिद्ध, अतएव त्याज्य ही माने जायँगे । देखिए! एवं प्रचलित नृत्य - गायनाभ्यास - नृत्यगायन श्रवणाभिरुचि - तदनुगता शिरः- शरीर - हस्त विधूननादि लक्षणा स्त्रैणवृत्ति से संत्राण कीजिए वर्त्तमान नर - नारी युग्म का | * -- इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति । ( छान्दोग्योपनिषत् - पञ्चाग्निविद्या. ) २५५

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श्राद्धविज्ञान 13 ( १ ) - य एष ब्राह्मणः ( ब्राह्मण: - क्षत्रियः - वैश्यः - ) गायनो वा ( गायनपरायणो - बा ) - नर्त्तनो वा ( नृत्यपरायणो वा ) भवति, तमाग्लागृध इत्याचक्षते । तस्माद् - ब्राह्मणो. नैव गायेत्, न नृत्येत्, माग्लागृधः ( मलीमसः - तमोगुणयुक्तः - आत्मबुद्धिस्वरूप - विमुग्धः ) स्यात् " । इति । — गोपथाः पूत्र २२२१३ ( २ ) - " भीमं - चत - मलम् । ( भीमं भयानकं - मलं - तमोभाव ( एव परोक्षेण ) भीमलम् । तस्मात् - भीमला ( मलिना ) धियः ( बुद्धिवृत्तयः ) वा एता: - ( नृत्यगायनवृत्तयः - बुद्धि-दूषिका इति ) तस्मादु गायतां. ( नृत्यगायनशीलद्विजातीनामन्न ) नाऽश्नीयात् । मलेन ते जीवन्ति " -4 - जैमिनीयोपनिषद्ब्राह्मण १८ । २ । आत्मानुगता ' संवित् ', एवं बुद्धयनुगता ' निष्ठा ', दोनों धर्मो से एकान्तः विरुद्ध, ' मनोऽनुगता ' भावुकत ', शरीरानुगता ' भुक्ति ' से अनुप्राणित नृत्य - गीत कभी नैष्ठिक तन्त्रा-ध्यक्षों के द्वारा प्रोत्साहित नहीं होने चाहिए । यदि ऐसा होता है, तो यह राष्ट्रकर्णधार की, ' नैष्ठिक तन्त्राधीश की " परप्रत्ययानुगता भावुकता ही मानी जायगी, जिसका राष्ट्रिय अभ्युदय से यत् किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है 1 वीणागाथिनो गायन्ति ' - ' साम गायति ' इत्यादि रूप से श्रौतस्मार्त कम्मों में जिस वीणा-वादन, तथा सामगान का उपवर्णन हुआ है, उसका सम्बन्ध उन प्राकृतिक देवप्रारणों के साथ है, जिन्हें य॒ज्ञकर्म्म में तदनुरूप भावों से संतुष्ट करना सृष्टिसर्ग अनिवार्य माना गया है । श्रवश्य ही वर्त्तमान युग के संगीत - नृत्यानुरागी अनुभूतिपरायण भावुक जन हमारे इस नैगमिक दृष्टिकोण से सहसा क्षुब्ध हो पड़ेंगे । किन्तु उनके परितोष के लिए इस निबन्ध में कतिपय प्रमाणोद्धरण के अतिरिक्त विशेष विस्तार का अनुगमन अप्रासङ्गिक ही माना जायगा । हम सज्जीभूत हैं उनके परितोष के लिए अन्य प्रसङ्गावसरों पर । हाँ, तो प्रसन्न यहाँ करना है उन पितरों को, जो मनः- शरीर - प्रधान बनते हुए अपने चान्द्र-धर्म से गन्धर्वाप्सराप्राणों के सहचारी हैं । अतएव रात्रिजागरण में पितरों के लिए संगृहीत परिग्रहद्रव्यों में सुगन्धिद्रव्य - पुष्पमाला - आदि प्रसाधनों का संग्रह मान्य मान लिया गया है । इतर -- तस्मादपि राजन्यं वा, वैश्यं वा, ' ब्राह्मण ' इत्येव ब्रूयात् । ( शत ० ३ | २ | १ | ४० | ) | २५६

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ऋणमोचनोपायोपनिषत सामान्य गन्ध – माल्य द्रव्यों के साथ मुख्य सुगन्धिद्रव्य यहाँ ' कस्तूरिका ' ( मृगनाभिगन्ध - कस्तूरी ) प्रधान मानी गई है ( महासङ्गीत में ); जैसा कि - ' तोलर गन्धीका बेटा किसतूरी ' वाक्य से स्पष्ट है । ‘ मृगमद ’ – ‘ मृगगन्ध ' आदि विविध नामों से प्रसिद्ध कस्तूरी के कपिला ( कपिलवर्ण ), पिङ्गला, कृष्णा, ये तीन जातिविगाग सुप्रसिद्ध हैं । कामरूपदेशोद्भवा कपिला कस्तुरी सर्वश्रेष्ठा मानी गई है, नेपालदेशोद्भवा मध्यमा मानी गई हैं, एवं कशमीर देशोद्भवा सामान्या मानी गई है । तीनों हीं स्थानों में तीनों जातियाँ उपलब्ध हैं । इनमें से पितृकम्स में ' कपिला ', वह भी कामरूपदेशोद्भवा. ही प्राप्त हो, तो वह पितृकर्म के लिए सर्वथा अनुरूप है, जिसका जानकार गृहस्थी नहीं हो सकता । अपितु गन्धद्रव्यों के पारम्परिक व्यवसाय में निपुण ' गन्धी ' व्यवसायी ही परिज्ञाता हो सकता है । अतः कस्तूरी की अनुरूपता का उत्तरदायित्त्व गन्धी से ही सम्बन्धित मानती हुई गीताभाषा में यह व्यक्त कर रही हैं कि, " हमनें कस्तूरी परीक्षित - कपिला- कस्तूरी ( जिसकी कि परीक्षा हमें नहीं है ) अपने कुल के सर्वश्रेष्ठ ज्येष्ठ व्यवहार - निपुण मिश्र हरिश्चन्द्रजी के द्वारा तद्व्यवसायकुशल गन्धी व्यवसायी के माध्य से ही मँगवाई है । अतएव यह असंदिग्धरूप से पितृकर्म के लिए अनुरूप है " । कपिला-' गौ पूर्व निरूपणानुसार जैसे चान्द्रपितृसर्ग का सर्वात्मक प्रतीक है, तथैव कपिलव - भाव से यह कपिला कस्तूरी भी पितृकर्म का प्रतीक बन रही है । ' ऐशान देवत्या कपिला वर्णेन । रुद्रो देवता ' ( गो ० ब्रा ० पू ० ११२४ ) । इत्यादि निगममूल स्पष्ट है | ' मृग - चन्द्र ' दोनों समान - प्राणानुबन्धी हैं, यह आजके साहित्य - शृङ्गाररसिक - मनोऽनुबन्धी- भावुक कविसमाज - साहित्यिक से परोक्ष नहीं है, भले ही इन पदार्थों की नैगमिक आम्नाय से वह सर्वात्मना बहिष्कृत ही क्यों न बन चुका हो । पितर चान्द्र हैं, मृग भी चान्द्र है । ब्राह्मणग्रन्थों का सुप्रसिद्ध नाक्षत्रिक मृगव्याधाख्यान इसी मृगप्राणका स्वरूप विश्लेषण कर रहा है, जिसका सुप्रसिद्ध शिवभक्त गन्धर्व पुष्पदन्त ने भी महिम्नस्तोत्र में - ' त्यजति न मृगव्याधरभसः ' इत्यादि रूप से दिग्दर्शन कराया है । कस्तूरिका ( कपिला कस्तूरी ) विशेषतः पैत्र है, यही वक्तव्य निष्कर्ष है | निम्न लिखित आगमवचन कस्तूरी की इसी जातित्रयी का स्वरूप अभिव्यक्त कर रहे हैं-कपिला- पिङ्गला - कृष्णा - कस्तूरी त्रिविधा मता ॥ नेपाले s पि च, काश्मीरे, कामरूपेऽपि जायते ॥ १ ॥

कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा, नैपाली मध्यमा भवेत् ॥ काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी धमा स्मृता ॥ २ ॥

गृह के लिए अपनी पारिवारिक - स्वस्ति - कामना के लिए पितृकर्म का महत्त्व देवकार्य से भी विशेष महत्त्व रखता है । अतएव देवकार्य की अपेक्षा से भी पितृकार्य में, तदपेक्षित गन्धादि " देवकार्य्याद् द्विजानीनां पितृकार्यं विशिष्यते " २५७

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श्राद्धविज्ञान परिग्रहग्रहण में बड़ी ही सतर्कता अपेक्षित मानी गई है । गतानुगतिकता से किसी भी वस्तु - परिग्रह का पितृकर्म में ग्रहण नहीं होना चाहिए । प्रत्येक वस्तु का क्रम - आदान -संग्रह - इतिकर्त्तव्यता- बड़ी ही सतर्कता की अपेक्षा रखते हैं । अतएव कुलस्त्रियाँ अपने रात्रिजागरणात्मक लोकमान्यतानुगत पितृ-कर्म्म तक में –'यो देई देवताँ को काम छ, पितरों को काम छ, देख ओंठ झोंठ न हो जाय, चाय जिया हाथ न लाग जाय ' इत्यादि रूप से यह सतर्कता व्यक्त करतीं रहतीं है । गन्धादि परिग्रह क्रय में सर्वत्र पदे पदे यह सतर्कता - परीक्षणबुद्धि अपेक्षित है, यही तात्पर्य है । ' काए तोला श्रो ' काए की डाँडी ' इस वाक्य से यह परीक्षात्मक सतर्कभाव ही अभिव्यक्त हुआ है । गन्धी का तोला ( बाट ) तराजू - तराजू की डांडी - सभी पूर्णरूपेण परीक्षणीय हैं । तदनन्तर ही गन्धादि क्रय अपेक्षित हैं । ' गन्धद्रव्य - तीरान - जल - आभूषण - वस्त्र, ' ये पाँच परिग्रह पितृकर्म में ( रात्रिजागरणात्मक पितृकर्म में ) प्रधान माने गए हैं । महासङ्गीत के पाँचों पद्यों से इन्हीं पाँचों को श्रद्धापूर्वक पट्टस्थित पितृदेवों के समर्पित करने की भावना व्यक्त हुई है, जैसाकि इन पाँचों पद्यावयवों से स्पष्ट है - " ( १ ). किसतूरी, ( २ ) — चाँवल भो घग्णा, ( ३ ) – पाणी भो घणो, ( ४ ) – गैणाँ भो घणा, ( ५ ) – कपड़ा भो " । विस्तार भिया इन पाँचों मुख्य परिग्रहों की व्याख्या न कर पाँचों की सौम्यपितृप्राणात्मकता से सम्बद्ध नैमिक आम्नायमात्र व्यक्त करदी जाती है । ( १ ) —– गन्धो युष्मासु गन्धर्वेषु ( जै ० उ ०० ३ | २५ | ४ | ) – ' चन्द्रमा वै गन्धर्वः ' ( शत ०६ | | | | ) ( चन्द्रः सोमः, पितरः सोम्यासः ) । - इति गन्धद्रव्यस्य मृगगन्धस्य अनुरूपता पितृकर्मणि । ( २ ) -- निवान्यायै ( कपिलायै ) दुग्धे मन्थो भवति ( पितृभ्यः ) ( शत ० २२६/११६ । ) – इति क्षीरान्नद्रव्यस्य - अनुरूपता पितृकर्मणि । ( ३ ) – पितृदेवत्यो वै क्रूपः - खातः ( छोटा सर- छोटी सी तलाई ) - ( शत ० ३२६ | १।१३ ) सौम्या ह्याप: ( ए ब्रा ० १७ - पितरः सोम्यासः । इति जलद्रव्यस्य - अनुरूपता - पितृ कर्म्मणि । - सोमस्य तनूः सुवर्णम् ( तै ० ब्रा ० ११४/७५ | ) ( तन्मय आभूषण ) – इति आभूषणस्य अनुरूपता पितृकर्म्मणि । ( ५ ) - वासो दक्षिणा | सौम्यं हि देवतया वासः समृद्धचै ( तै ० ना ० १।६।१।११ । ) - इति वस्त्र-स्य अनुरूपता पितृकर्मणि । २५८

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् • महासङ्गीत के पाँचवें पद्य ( जो कि पितृकर्मानुगत परिग्रहदृष्ट्या ) अन्तिम पद है ) में - ' वस्त्र ' का समावेश हुआ है 1 । यहीं पितृकर्म्म समाप्त है । अतएव यही वस्त्र दक्षिणा बन रहा है इस लोक-मान्यतात्मक गृह्य पितृयज्ञ की । इसीलिए - ' वासो दक्षिणा ' रूप से श्रुतिने वस्त्रको ' दक्षिणा ' का प्रतीक घोषित कर दिया है । अब क्या शेष रह गया?, प्रश्न है । शेष रह गई वह शी: -समृद्धि, जिस फलकामना - आशी: -समृद्धि के लिए पञ्चपरिग्रह द्वारा यह पितृकर्म कुलस्त्रियोंनें सम्पादित किया है । यद्यपि अपनी सहजभावुकता के माध्यम से पाँचों परिग्रह द्रव्यों के समर्पण साथ भी परोक्षभाषा . में कुलस्त्रियोंनें “ तोली में चावल - तलाई में पाणी - डब्बा में गैणाँ- बुगचा में कापड़ला " थोड़ा - थोड़ा-पितरारों लस्कर आयो- जीम्याँ, पीयो- परथा - परया - तोभी ( सब कुछ ) भो घरणा - " इत्यादिरूप से अपने परिग्रहद्रव्यों की आरम्भ में अल्पता, पितृसमर्पणानान्तर उनकी विपुलता बतलाते हुए समृद्धि प्राप्त करली है । तथापि प्रत्यक्षरूपसे अभी समृद्धिकामना अभिव्यक्त नहीं हुई है । दक्षिणाप्रतीक रूप-वस्त्र - समर्पणानन्तर अब साक्षात् रूप से समृद्धि - याचना का अवसर आ गया है । ' देवतया -समृद्धचँ ' इत्यादिरूप से श्रुति भी वस्त्र प्रदान के साथ साथ ही समृद्धि की अभिव्यक्ति कर रही है । अतएव इस श्रुति - पद्धति का अक्षरशः अनुगमन करने वाली ये मूर्तिमती श्रुतियाँ ( कुलस्त्रियाँ ) पञ्चम पद्य से बस्त्र समर्पण करने के अनन्तर ही पितरों से समृद्धिकामना करती हुई ' कहती हैं ' ऊधो ए बूधो ० ' सौभाग्यवती कुलीना नारी की वैसे तो ' नहि कामानामन्तोऽस्ति, समुद्र इव कामः ' ( तै ० २।२ । ) के अनुसार पुरुषकामनावत् कामनाओं का कोई अन्त नहीं हैं । सब कुछ प्राप्त कर लेने पर भी, प्राप्त हो जाने पर भी इनका सन्तोष - तृप्ति - पुष्टि इसलिए सम्भव नहीं है कि, प्रकृति ने इन्हें उस ' मन ' की साम्राज्ञी बनाया है, जिसकी सहजवृत्ति है वह ' भावुकता ' जिसे अनन्त - सहस्र कामना - परम्पराओं से भी तृप्त नहीं किया जा सकता । सर्वं सुस्थम् । किन्तु दो कामनाएँ इनकी ऐसी सहज हैं, जिनकी पूर्ति का अभाव इन्हें कथमपि सह्य नहीं है । ये अपने को पुत्रवती देखना चाहतीं हैं, एवं अपनी माता को पुत्रवती देखना चाहतीं हैं । स्वयं की, एवं माता की पुत्रकामना इन्हें सदा चिन्तित बनाए रहती है । ' माका जाया भाई, ओर पेटाँ - उदर का - जाया पूत ' किंवदन्ती प्रसिद्ध है, जिसका इन शब्दों में भी विश्लेषण, सुना गया है कि - ' लुगाई क एक तो पेट की आग, ओर एक पीर की आग ', जिसका तात्पर्य स्पष्ट ही है । निष्कर्षतः पुत्र - पौत्रादि परस्परा की कामना, भ्राता भ्रातृपुत्रादि परम्परा ( भाई - भतीजों की परम्परा ) की कामना, ये ही दो मुख्य कामनाएं हैं कुलनारी की । पितृकर्म का एकमात्र उद्देश्य पुत्रादिवंश का संरक्षण, पुत्रादि परम्परा का उद्भव, उद्भूत पुत्रादि का पौत्र - प्रपौत्रादि रूप से बृहद्रूप में विस्तार ही माना गया है, जिसका नैगमिक मूल है – “ गोत्रं नोऽभिवर्द्धन्ताम् ” । हे पितरो! आप हमारे वंश में ऊद्भव ( वंशोत्पत्ति ) करते हुए, एवं उत्पन्न वंश को बृहत् करते हुए ही हमारे इस पञ्चविध आतिथ्य का ग्रहण करने का अनुग्रह करें । ' उद्भव ' - ' बृहत् ' शब्दों के ही प्राकृतरूप हैं-२५६

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान ' ऊधो - बूधो ' | ' गोत्रं नः'वाक्य ' ऊधो ' रूप उद्भव ( उत्पत्ति ) का आधार है, ' अभिवर्द्धन्ताम् ' पद ' बूधो ' रूप ' बृहद् ' ( वंशविस्तार - जिसमें परोक्षरूप से मातृवंशकामना भी सुरक्षित है ) का आधार है । उत्पत्ति और वृद्धि, यही ' ऊधो ए बूधो कर आओ म्हारा पितरों ' का निष्कपार्थ है । पितृकर्म्म वैय्यक्तिक ( पारिवारिक है, देवकर्म्मवत् सामाजिक नहीं । तभी तो पितरों को ' गृह्य ' कहा गया है । इसी गृह्यभाव - प्रातिस्वकभाव की अभिव्यक्ति के लिए यत्रतत्र - ' ह्मार ' ( हमारे पितर - पारिवारिक पितर ) शब्द प्रयुक्त हुआ है । इन पितरों ( प्रेतपितरों ) घर दो हैं । जहाँ इन्होंनें अपने भौतिक शरीर से मानव जीवनोपभोग किया था, वह परिवार भी इनका घर है । एवं चान्द्रद्यावापृथिव्य रात्रिमण्डल भी इनका घर है । अक पर्वोत्सवों पर मान्यता के द्वारा ये इस पूर्वगृह ( परिवार ) में पधारते रहते हैं, जिस प्रथमगृहागमन की अभिव्यक्ति ' आओ म्हारो पितरो ' रूप से होती है । एवं यहाँ गन्धादि पञ्चानुरूप आतिथ्य से तुष्ट- तृप्त होकर ये पुनः अपने प्रेतलोकात्मक रात्रिमण्डल में गमन कर जाते हैं, जोकि इनका प्रेतयोनिनिबन्धन स्थायी गृह माना गया है । इसी द्वितीयगृहगमन की अभि-व्यक्ति हुई है - ' कुसल कुसल घर जायजो ' इस उत्तर वाक्य से । इस प्रकार वाक्यत्रयात्मक छठे पद्य से उक्तरूप से पितृसमृद्धि ( पितरों की समृद्धि, एवं समृद्ध - तुष्टतृप्त - कुशलभावापन्न पितरों से आशी रूप से प्राप्त होने वाली पारिवारिक समृद्धि, दोनों समृद्धियों ) की कामना अभिव्यक्त हुई है 1 कब तक तो प्रतपितर प्रथमगृह रूप परिवार में आते रहते हैं?, एवं कब यहाँ से सन्तुष्ट होकर ये स्वगृह में पधार जाते हैं?, दोनों प्रश्न पितृस्वरूप से गतार्थ हैं । चान्द्र सौम्य पितर चतुर्दशी की रात्रि को तो प्रथम गृह में आते हैं, एवं रात्रि में तृप्त हो अमावस्यातिथि में सजातीयाकर्षण से पुनः चन्द्रलोकरूप स्थायी द्वितीय गृह में पधार जाते हैं । यह है- इन भौम- पार्थिव - औपपातिक - हंसात्मानुगत विविध ( सर्वादि ) योनिभावापन्न - अन्न तरों की व्यवस्था, जिन्हें पूर्व की पितृस्वरूप - मं. मासा में महा-. हविगानुबन्धी कार्यापितरों के काम्यभाग से सम्बन्धित माना गया है । पिण्डपितृयज्ञात्मक नित्य-अन्नादपितर जहाँ श्रमावास्या में अहः काल में आहुति द्वारा तृप्त किए जाते हैं द्विजाति यज्ञसूत्री पुरुष के द्वारा | अन्नात्मक गृह्य पितर वहाँ गन्धादि लोकानुबन्धी मान्यतानुबन्धी भूतपरिग्रहों से चतुर्दशी की रात्रि में तुष्ट किए जाते हैं — द्विजाति परिवारों की मर्यादा - आम्नाय का सञ्चालन करने वाली असूत्रा कुलदेवियों के द्वारा । क्रमप्राप्त सप्तम पद्य यही भाव अभिव्यक्त करता हुआ - ' चोदस के दिन ओ म्हारा पितरो मावस घरों ए पधारज्यो ' इत्यादिरूप से स्त्रीभावानुगता लोकमर्यादा का संरक्षण स्वयं कुलस्त्रियों के आम्नायपरायण मुख से ही प्रमाणित कर रहा है । सर्वान्त के अष्टम पद्य से रात्रिजागरणानुगत लौकिकमान्यतानुगत - कुलस्त्रीवर्गद्वारा सम्पादित पितृकर्म से सम्बन्ध रखने वाले प्र ेत गृह्य औपपातिक पितरों का वस्तुस्वरूप उपवर्णन करते हुए फाशीः कामना अभिव्यक्त हुई है । यद्यपि पूर्व में ' पिण्डपितृयज्ञ - काम्यपितृयज्ञ ' रूप से २६०