Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 331–340
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 331–340
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् उभयविध ( अन्नादात्मक, एवं अन्नात्मक ) पितरों का वस्तुस्वरूप स्पष्ट कर दिया गया है । तथापि यहाँ एक उस विशेष दृष्टिकोण से इस वस्तुस्थिति का स्वरूप - विश्लेषण अपेक्षित बन रहा है, जिस दृष्टि-कोण का रहस्यार्थ न जानते हुए हम पितृकर्म के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियों के अनुगामी बन करते हैं । भगवान् तित्तिरि ने भी विस्पष्ट शब्दों में इन दोनों पितृभेदों का निम्न लिखित रूप से स्पष्टीकरण किया है । ग्रहयागात्मक ' सोमयाग ' प्रकरण चल रहा है । इसी में ' सौत्रामणी ' नामक वह इष्टिया विद्दित हुआ है, जिस के लिए ' सौत्रामण्यां सुरां पिवेत् ' यह प्रसिद्ध है । इस सुरामिश्रित सोमग्रह इन्द्र को सन्तुष्ट किया जा चुका है । इस आहुति का जो शेष भाग बच रहता है, उस हुतशेषद्रव्य की आहुति अध्वर्यु, और प्रतिप्रस्थाता, नामक दोनों ऋत्विक् क्रमशः देवपितरों, एवं पितृपितरों के लिए आहुति एवं प्रदानकर्म ( क्रमशः ) करते हैं । इसी प्रकरण में अन्नादात्मक अमृत चान्द्र पितरों को देवयज्ञानुगत बतलाया गया है, एवं इन्हें स्वधावन्त मानते हुए ' जीवित पितर ' कहते हुए इन्हें ' समाना: समनसः ' नाम से व्यवहृत करते हुए चान्द्र यमलोक में इनका आवास निवास माना है । अन्नात्मक मर्त्य पार्थिव भौम पितरों को ' सजाताः समनसः ' नाम से व्यवहृत करते हुए इनका आवास निवास इसी पृथ्वी लोक में माना है । तित्तिरि भगवान् के द्विधा विभक्त इन देव - मानुष ( वैदिकलौकिक- चान्द्र पार्थिव - अन्नाद - अन्न- नित्य - श्रपपातिक ) उभयविध पितरों का स्वरूप भेद लक्ष्य बनाइए, अवश्य अधर्ममूलक अभिनिवेश उपरत हो जायगा - देखिए! हुतशेषं ददाति पितृभ्यः ( इति कल्पः ) ( १ ) - " पितृभ्यः - पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यः - स्वधाविभ्यः स्वधा नमः | अन् पितरः, अमीमदन्त पितरः, अमीतृपन्त पितरः । अमीमृजन्त पितरः । पितरः शुन्धध्वम् । पुतन्तु मां पितरः- पितामहाः - प्रपितामहाः - सोम्यासः पवित्रेण शतायुषा । विश्वमा-युर्व्यश्न | नापि पयसेऽग्ने! पवस्व पवमानः सुवर्जनः । पुनन्तु मा देवजनाः । जातवेदः पविपद्यते पवित्रमर्चिषि, उभाभ्यां देव सवितर्वैश्वदेवी पुनती । " ये ' समानाः समनसः पितरो यमराज्ये, तेषां लोकः स्वधा नमः । यज्ञो ( पितृय-ज्ञोऽयं ) देवेषु कल्पताम् ॥ ( २ ) - ये ' सजाता: समनसः ' जीवा जीवेषु मामकाः ( गृह्याः प्रातिस्त्रिकाः ) " । ते श्रीर्मयि कल्पतां - स्मिँल्लोके शतं समाः ” । २६१ - तैत्तिरीय ब्राह्मण २।६।३।३,४,५, ।
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श्राद्धविज्ञान पितृपरिवार को हम नवीन दृष्टिकोण से ' जीवित पितर, मृतपितर ', इन भागों में विभक्त करेंगे । जो चान्द्र पितर सौर देवसर्ग के द्वारा होने वाली प्रजासृष्टि के आरम्भक ( उपादान ) बनते हैं, उन सौराग्निमय सौम्य ' चान्द्र पितरों ' को ' जीवितपितर ' माना गया है । ये ही पितर ' नित्य - प्राकृतिक-सापिड्यभावाधिष्ठाता - भोक्ता - अन्नाद ' आदि विविध नामों से प्रसिद्ध हुए हैं, जिनका श्रौतपिण्डपितृयज्ञ ' ' के द्वारा सौरदेववत् अहःकाल में यजन हुआ करता है । अतएव ये ' यज्वानः ' हैं । इन्हीं को ' अमृत-पितर ' भी माना गया है । अमृततत्त्वनिबन्धना नित्यता ही इनका ' जीवितत्त्व ' है । जो चन्द्र पितर द्यावापृथिव्यं चान्द्र सम्वत्सरसर्ग से सम्बन्ध रखने वाली चतुर्दशविधा भूतसृष्टि से अनुप्राणित हैं, उन चान्द्रसोममय द्यावापृथिव्य ' पार्थिव पितरों ' को ' मृतपितर ' कहा गया है 1 । ये ही पितर ' अनित्य - वैकारिक - ( असन्तोषावस्था में ) सापिण्ड्यभावविघातक - भोग्य - अन्न ' आदि विविध नामों से प्रसिद्ध हुए हैं, जिनका श्रौत काम्यमहाहवियोगान्तर्गत ' काम्यपितृयज्ञ ' रूप स श्रौतविधि से हाल में ही यजन विहित हुआ है, एवं लोकमान्यता में कुलस्त्रियों के द्वारा चतुद्दशी की रात्रि में जिनका श्रद्धापूर्वक सम्मान विहित हुआ है । एकोद्दिष्ट - पार्वरण - महालयादि नित्यश्राद्धो का जहाँ अमृत पितरों से सापिण्ड्यपितरों से सम्बन्ध हैं, वहाँ पुरुषकृत काम्यपितृकर्म्म, पुरुषकृत गया श्राद्धकर्म्म, वृद्धि-श्राद्धकर्म का, एवं कुलस्त्रीकृत रात्रिजागरणात्मक पितृकर्म का इन प्र ेत मर्त्य - औपपातिक अन्नपितरों से सम्बन्ध है । पार्थिवानुशयानुगत क्षरभाव ही इन सौम्य पितरों का ' मृतत्त्व ' है । यही जीवित, तथा मृत, उभयविध पितरों का स्वरूप परिचय है । श्रौतस्मार्त्तानुमोदित सनातनधर्म इस दृष्टिकोण से जीवित ( चान्द्र ), तथा मृत ( पार्थिव ), दोनों का श्रद्धापूर्वक यजन - सम्मान करता है । यजन करते हैं द्विजाति-पुरुष, एवं सम्मान करतीं हैं मान्यतानुसार कुलस्त्रियाँ । यजनात्मक सम्मान शास्त्रीय सम्मान है, मान्य-तात्मक सम्मान शास्त्राम्नायानुमोदित लोकसम्मान है । दोनों से श्रमुष्मिक ऐहिक फलसमृद्धियाँ निश्चयेन प्राप्त हो जातीं हैं । उभयविध पितृकर्मानुगत परिवार को श्रद्धालु परिवार को । सैषा वस्तुस्थितिः । में स्थितन्य गतिश्चिन्तनीया । जीवित पिता पिामहादि को श्रद्धा ( चान्द्रश्रद्वानाड़ी ) के द्वारा प्रति अमा-वास्या ( मास में - ३० दिवस में १ दिवस ) तृप्त करना, क्षयाहतिथि को तृप्त करना, एवं महालय-श्राद्धपक्ष ( आश्विन कृष्णपक्ष ) में तृप्त करना ' जीवितपितृश्राद्ध ' है, एवं गयातीर्थ में विधिपूर्वक एकबार श्राद्ध करना, विशेष स्मार्त्तकम्मविसरों पर वृद्धिश्राद्ध ( नान्दीमुखश्राद्ध ) करना, चतुर्दशी की रात्रि को पितृकर्म्म करना आदि ' मृतपितृश्राद्ध ' है । सशरीर - पाञ्चभौतिक शरीर - युक्त - सगुणब्रह्म त्मक-माता - पिता, पितामहादि के प्रति श्रद्धापूर्वक देवभावेन आत्मसमर्पण किए रहना इन सगुण - सशरीर-पितादि की उपासना है । यह आत्मार्पण - श्रद्धा र्पण “ मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, अचार्यदेवो भव " इत्यादि उपनिषति के अनुसार ' उपासनाकाण्ड ' का विषय है, कर्म्मकाण्ड का नहीं । कर्मकाण्डानु-II.
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् गति है- ' श्रद्धया देयम् ' । जो कुछ आप अर्जन करते हैं, श्रद्धापूर्वक इन्हें अर्पण कर दीजिए । इसके अतिरिक्त ' श्रद्धा ' शब्दमाध्यम से आर्षाम्नायानुगत पितृश्राद्ध ' कर्म के सम्बन्ध में जो असत् कल्पना वेदभक्तोंनें उपकल्पित की है, वह एकान्ततः निर्मूल, प्रतएव उपेक्षणीय ही है । ( १ ) " देवा वा एते पितरः ' - ( गो ० उ ० ११२५ ) - ' ये वै यज्वानस्ते पितरः ' ( तै ० ११६६६ ) -' यत्तदमृतं - सोमश्चन्द्रमाः सः, पितृदेवत्यो वै सोमश्चन्द्रमाः, मासि मासि वोऽशनम् " इत्यादि निगमवचन उन ' जीवित पितरों ' का स्वरूप अभिव्यक्त कर रहे हैं, जो सौर देवों से समतुलित हैं । ( २ ) - " अन्तभाजो वै पितरः ' ( कौ ० २६८ ) - मर्त्याः पितरः ' ( शत ० १२२ | ३ | ४ | ) - अन- ' पहतपाप्मानः पितरः ' ( शत ० १२० १३४ | ) - ' रात्रिः पितरः ' ( शत ० २ | १ | ३ | १ | ) - ' यज्वानो गृह-मेधिनः पितरः ' ( तै ० १२६ | ६ | ६ | ) - ( मनः पितरः । ( ० १४.४ | ३ | १३ | ) - इत्यादि निगमवचन ' मृत पितरों ' का स्वरूप अभिव्यक्त कर रहे हैं । अभिनिवेश अन्ततः अभिनिवेश ही तो है । ' जीवित पितर ' का अर्थ ' चान्द्रपितर ' कैसे माना-गया?, श्रुति में कहाँ विस्पष्ट शब्दों में ' पराह्नभाज: ' पितरों को ' जीवित ' कहा है?, इत्यादि अभिनिवेशात्मक प्रश्नों का यद्यपि अब कोई महत्त्व शेष नहीं है । तथापि तुष्यद्द र्जन- न्यायेन इस सम्बन्ध में भी एक श्रौतप्रमाण उद्धृत कर दिया जाता है-" अथ यदपराह्न पितृयज्ञेन चरन्ति ( तस्य कारणमीमांसा क्रियते - उपपत्तिमौलिकरहस्यं निरूप्यते ) । अपराह्नभाजो नै पितरः । तदाहुः ( पूर्णपक्षः क्रियते ) – ' यत् - अपरपक्षभाजो वै पितरः, कस्मादेनान् पूर्वपक्षे यजन्ति '? इति । ( समाधीयते ) - देवा वा एते ( चान्द्राः - सौरानुगताः-नित्याः ) पितरः | जीवनवन्तौ श्राज्यभागो ( पितृयज्ञे ) भवतः । अथ यदध्वयुः पितृभ्यो निपृणाति, जीवानेव तत् पितननु मनुष्याः पितरः ( प्र ेतपितरो मर्त्याः - औपपातिका: - पार्थिवाः ) --अनुप्रवहन्ति । अथ देवयज्ञमेवैनं पितृयज्ञेन व्यवर्जयति ” । – गोपथब्राह्मण उत्तरभाग २ प्रपाठक, २५ वाँब्राह्मण । भूतात्मानुगता - भूतात्मगभिता बुद्धि जहाँ नित्य देवपितरों का आधार बनती है, वहाँ पाञ्चभौतिक-शरीरानुगत - शरीरभावगभित - मन अनित्य मानवपितरों का अवलम्ब बनता है । अमृत - जीवित - पितृ बौद्धकर्म्म है, श्रौतकर्म्म है । मर्त्य - पितृकर्म मानसकर्म है, स्मार्त्तकर्म है । बुद्धितन्त्रानुगत श्रौत पिण्डपितृयज्ञ से जीवित चान्द्र नित्य पितर तृप्त होते हैं, जो चान्द्र पितर सौर देवानुशय के सम्बन्ध से स्वयं भी सौर - धी भाग से समन्वित होते हुए नैष्ठिक हैं, जिन्हें श्रौत इतिकर्त्तव्यता के अतिरिक्त अन्य लोकानुबन्धों से मात्र भी प्रभावित नहीं किया जा सकता । एवं मनस्तन्त्रानुगत स्मार्त्त, लोकानुबन्धी २६३
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पितृकर्म से मर्त्य पार्थिव औपपातिक पितर तृप्त होते हैं, जो स्वयं भी पार्थिवाकर्षण - प्राधान्य से मनोमय ही बनते हुए भावुक हैं, अतएव जिन्हें स्मार्त्त वैध गयाश्राद्धवत् रात्रिजागरणात्मिका लोकमान्यताओं से भी प्रभावित किया जा सकता है । अलमतिपल्लववितेन - कुलस्त्रियों का रात्रिजागरणात्मकं पितृकर्म लोक-निबन्धनात्मक औपपातिक मनोमय पितरों से सम्बन्धित है- जोकि मनोमय पार्थिव पितर नैष्ठिक • नित्य - बुद्धिशील पितरों के समतुलन में सौम्य बालकवत् हैं, सौम्या भावुकतापूर्णा मुग्धा ( भोली ) वृत्ति सेयुक्त हैं । महासङ्गीत का अन्तिम अष्टम पद्य " हमारे मान्य पितर सौम्य हैं, भोले हैं, सहज ही करने वाले हैं, अतएव हमें सहज ही आशी: दे रहे हैं, हमारे वंश को कटुनिम्बवत् सहजभाव से ही विस्तृत कर रहे हैं " इत्यादिरूप से अपने मान्य पितरों का वस्तुस्वरूप ही अभिव्यक्त कर रहा है, ओर इसी आशी: कामना के साथ हमारा यह चतुर्थ महासङ्गीत उपरत हो रहा है-* पित्तर बाला भोला - जी घोर सीप । फलज्यो फूलज्योजी कड़वा नीम ज्यों ॥ ( ५ ) पितृपरिवारस्तुतिकर्मात्मिक महासङ्गीत की पञ्चम पावनस्मृति-( १ ) - झारा माथा न मँहमंद ल्याओ सा (? ) दिक्खण म मत न जाओ सा ( २ ) । आग आग भोमियाँजी, पाछ बजरंग बाला, C झण्डो भैंरूँ नाथ को, अगवाणी सातू भैयाँ ( ३ ) ॥ ( २ ) - झारी रखड़ी रतन जड़ाओ सा, दिक्खण ०! आगे आगे ० ( ३ ) ॥ * मूर्त्तमतीं अपौरुषेया श्रुतियाँ यदि - ' प्रायन्तु नः पितरः ' कहतीं हैं, तो ये मूर्त्तिमतीं पौरूषेया श्रुतियाँ ( कुलस्त्रियाँ ) ततसमतुलित अपने महासङ्गीत में - आओ ( श्रायन्तु ) म्हारा ( नः ) पितरो! ( पितरः ) पधारो म्हारा पितरो, यह उद्घोष कर रहीं हैं । वेदनिष्ठा यदि - ' इन्दवः पितरः ' ' पितरः सोमवन्त: ' - ' मनः पितरः ' कह रही है, तो ये ' पित्तर बाला भोला ' एवं ' थाँ जीम्याँस म्हारो मन भर जाय ' यह अभिव्यक्त कर रहीं हैं । समतुलन कीजिए महासङ्गीतानुगत वेदाम्नाय का, एवं पश्चात्ताप अभिव्यक्त कीजिए हमारे साथ साथ आप भी, जो ( पुरुषवर्ग ) सब कुछ ( वेदाम्नाय ) सर्वात्मना विस्तृत कर इन कुलदेवियों की महासङ्गीतात्मिका पारम्परिक वेदाम्नाय का उपहास करने पुरुषार्थ का श्राद्धकर्म सम्पादित मानने- मनवाने प्रचार करने की भयावह भ्रान्ति करते हुए प्रायश्चित्त के भागी बनते जा रहे हैं । २६४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत्
( ३ ) - झारा कानान कुण्डल ल्याप्रोसा, दिक्खरण ० ।
आगे आगे ( ३ ) ॥
( ४ ) - झारी नथ में रतन जड़ाओ सा दिखा ० ।
आगे आगे ० ( ३ ) ॥
( ५ ) - झारा गलान पंचमस्यों ल्याओ सा, दिक्खण ० ।
आगे आगे ० ( ३ ) ॥
( ६ ) - द्वारा छल्लों में रतन जड़ाओ सा, दिक्खण ० ।
धागे आगे ० ( ३ ) ॥
( ७ ) - झारी कड्यॉन काकतो ल्याप्रो सा, दिक्खण ० । आग आग ० ( ३ )!! ( ८ ) - झारी लूमाँ रतन जड़ाओ सा दिक्खण ० । आग आग ० ( ३ ) ||
( ६ ) -- झारा पगल्याँ न पायल ल्याओ सा, दिक्ख ० ।
आग आग ० ( ३ ) ॥
( २० ) - झारी पायल रतन जड़ाओ सा दिख ० । आग आग ० ( ३ ) ।
( ११ ) - झारी यगल्याँ म फोलरी ल्यायो सा, दिक्खण ० ।
आग आग ० ( ३ ) ॥
( १२ ) - झारी कमरयाँ पटोलो ल्याओ सा, दिक्खण ० । आग आग ० ( ३ ) || ( १३ ) - झारा स्यालूड़ाक कोर लगाओ सा, दिक्खण ० । SAINT SINTO ( 3 ) II
( १४ ) - झारी अँगियाँ में रतन जड़ा सा, दिक्खर ० ।
श्राग आम भोमियाजी ( ३ ) ॥
चतुर्दश ( १४ - चौदह ) पद्यात्मक एवं द्वाचत्वारिंशत् ( ४२ - बियाँलीस ) वाक्यात्मक उक्त महासङ्गीत के द्वारा सहजभाव से मूलतः चतुर्दशधा विभक्त, अवान्तर शक्तित: ४२ भागों में विभक्तात्मक व्यष्ट्यात्मक सम्पूर्ण उस पितृवार को ही स्तुति हुई है, जिसका पूर्व में ( देखिए पृष्ठ संख्या २२४ ) तालिका एवं संक्षिप्त व्याख्यारूप से स्पष्टीकरण किया जा ' चौदह पद्यों में से ११ पथों में अलङ्कार माध्यम से, एवं ३ पद्यों में वस्त्रमाध्यम से स्तुतिका चुका अनुगमन है । हुआ है, जिन आभूषणों तथा वसनों का स्वरूप पूर्व के कुलदेवी स्तुत्यात्मक दूसरे महासङ्गीत में २६५
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श्राद्धविज्ञान स्पष्ट किया जा चुका है । लक्ष्य केवल इस महासंगीत का है १४, तथा ४२, द्विधा विभक्त संख्यान, जिनसे समस्त पितृपरिवार संगृहीत हो जाता है । र सब कुछ आना पूर्ण सङ्गीतव्याख्याओं से गतार्थ है । विजिज्ञास्य है प्रस्तुत महासङ्गीत के - ' दिक्खण - भोमियाँ- बजरंगवाला - भैरू नाथ - सातू भैयाँ ' इन शब्दों का आम्नायानुगत नैगमिक समन्वय । समन्बय से पूर्ण सङ्गीत के अक्षरार्थका यो समन्वय कर लेना चाहिए कि - " हे पारिवारक पिरो! आप मेरे शिरोभूषण ( महमंद टीडीभलका ) लाने का अनुग्रह करें, ( ओर साथ ही मेरी इस प्रार्थना को भी ध्यान में रखने का अनुग्रह करें कि ) आप ' दक्षिण दिशा ' की ओर गमन न करें । ( किन्तु मैं यह जानती हूँ कि आप मेरी इस प्रार्थना पर कोई ध्यान न देते हुए अवश्य ही अपने चौदह प्रकार के परिवार के आकर्षण से आकर्षित होकर अवश्य ही दक्षिण की ओर गमन करेंगे ही जिस आपके परिवार में ) भौमियाँजी मूलपितर ) महाराज सबसे ( पितृपरिवार से ) आगे आगे चलते हैं, इनसे पीछे पीछे श्रीमहावीर चलते हैं, और श्रीभैरवनाथ झण्डा लिए चलते हैं, एवं इस परिवार की अगुवानी करती हुई सातों बहिनें चलती हैं । " बस यही इसी से समतुलित पद्यार्थ अन्य शेष १३ हों पद्यों के साथ सुसमन्वित कर लेना चाहिए । ऋतु - स्वरूप के मूलाधारभूत ऋताग्नि ( प्राणाग्नि- वायव्याग्नि ) एवं ऋतसोम ( प्राणसोम-' वायव्य सोम ), दोनों श्रन्तरिदय तत्त्व क्रमशः अमृत अन्नादपितर, एवं मर्त्य अन्नपितरों के स्वरूपात्रम्मक माने गए हैं, जिन दोनों पितरों का चतुर्थ महासङ्गीत के अन्त में स्पष्टीकरण कर दिया गया है । अन्नादलक्षण ऋतारिन दक्षिणदिशा को अपना उद्गम स्थान बनाते हुए अनवरत दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर जाते रहते हैं । एवं अन्नलक्षण ऋतसोम उत्तरादेशा को उद्गम स्थान बनाते हुए उत्तर से दक्षिण की ओर आते रहते हैं । दक्षिण से उत्तर की ओर सहजरूप से गमनशील ऋतग्नि हो ही अन्नादरूप देवलक्षण श्रमृतपितृषक की मूलप्रतिष्ठा बनते हैं, श्रनएव इन्हें भी दक्षिण से ( उद्गम स्थान से ) उत्तर की ओर ( निवासस्थान की ओर ) गमन करने वाला माना जायगा, एवं इस दृष्टिसे इन्हें ' उत्तरसंस्थ ' दक्षिण से चलकर उत्तर में विश्राम लेने वाले पितर कहा जायगा । इसी प्रकार उत्तर से दक्षिण की ओर सहजरूप से आगमनशील ऋतसोम ही अन्नरूप से पितृलक्षरण मत्यं पितृषट्की मूल प्रतिष्ठा बनते हैं, अतएव इन्हें भी उत्तर से ( उद्गम स्थान से ) दक्षिण की ओर ( निवासस्थान की ओर ) ही आगमन करने वाला माना जायगा एवं इस दृष्टि से इन्हें ' दक्षिणसंस्थ ' ( उत्तर से चल कर दक्षिण में ठहरने वाले - विश्राम करने वाले - पितर ) कहा जायगा । इन दोनों दृष्टिकोणों के माध्यम से हो ' दिक्खण म मत न जाओसा ' इत्यादि वाक्य का समन्वय सम्भवा सकेगा । उत्तर - दक्षिण भावापन्न पितरों के क्रमबद्ध स्वरूप परिचय के लिए ' अग्न्याधान ब्राह्मण ' के रहस्यार्थ को लक्ष्य बनाना पड़ेगा । हववाद पूर्वप्रदर्शित पितृस्वरूप व्याख्याओं से गतार्थ है । यहाँ • केवल तद् ब्राह्मण का आरम्भभाग लक्ष्य बना लेना है-२६६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् “ ( १ ) वसन्तः, ग्रीष्म, वर्षाः, ते देवा ऋतवः । ( अन्नाद - ऋतवः ) ( २ ) शरत् - हेमन्तः- शिशिरः, ते पितरः । ( अनाद - ऋतवः ) ( १ ) य एवापूर्यतेऽर्धमासः, स देवः । ( अन्नादपितृपक्ष - शुक्लः ) ( २ ) यो पक्षीयते ( अर्द्धमासः ), स पितरः ( पितृपक्षः - कृष्णः ) ( १ ) अहरेव देवाः ( अभादपैत्र- अहः ) ( २ ) रात्रिः पितरः ( श्रनपैत्र- रात्रिः ) ( १ ) स यत्रोदगावर्त्तते, देवेषु तर्हि भवति । ( श्रनादेषु भवति ) अन्नादादिक ( २ ) अथ यत्र दक्षिणावर्त्तते, पितृषु तर्हि भवति 1 । ( अन्नेषु भवति ) अन्नदिक् ( १ ) तपामानो देवाः, अमृता देवाः । ( अमृताः पितरः ) ( २ ) श्रनपहतपाप्मानः पितरः मर्त्याः पितरः । ( मर्त्याः पितरः ) . " ( १ ) स यत्रोदगावर्त्तते, तह्यग्नी श्रदधीत । सर्वमायुरेति । ( २ ) अथ यत्र दक्षिणावर्त्तते यस्ताधते, पुरा हायुषो म्रियते । " - शतपथ, अग्न्याधान ब्राह्मण, २।१३ प्रा ० श्रुति वसन्त - प्रीष्म वर्षा, इन तीन चान्द्र ऋतुओं से आपूर्यमाण चान्द्र शुक्लपक्ष को, सौर अह ' काल को, साम्यत्सरिक षण्मासात्मक उत्तरायणकाल को ' देवदेवता ' ( आग्नेयदेवता ) कहा है । एवं शरत् - हेमन्त शिशिर, इन तीन चान्द्र ऋतुओं को, अपक्षीयमाण चान्द्र कृष्णपक्ष को वारुण रात्रिकाल को, षण्मासात्मक दक्षिणायनकाल को ' पितृदेवता ' ( सौम्यदेवता ) माना है । पञ्चमयुग्म के द्वारा श्रुति देवदेवताओं को अमृत, पितृदेवताओं को मर्त्य बतलाती हुई अग्न्याधानकाल के सम्बन्ध मैं यह सिद्धान्त स्थापित कर रही है कि, यदि यजमान दक्षिणायनकाल में अग्न्याधान करेगा, तो वह २६७
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श्राद्धविज्ञान आयु से पूर्व ही शरीर छोड़ देगा । अत: इसे पूर्णायुर्भोग के लिए उत्तरायणकाल में ही अग्न्याधान करना चाहिए । दक्षिण से उत्तर की ओर ऋताग्निगमन कर रहा है, एवं उत्तर से दक्षिण की ओर ऋतसोम आगमन कर रहा है । इन दोनों के दाम्पत्यभाव से अग्नीषोमोभयात्मक जो योगजभाव उत्पन्न होता है, वही ऋताग्नि - सोमसम्बन्ध से ' ऋतु ' कहलाया है । अद्यतनानद्यतनानुगता मध्यरेखा से उत्तरभाग-( उत्तरायणभाग - जिसका उपक्रम दक्षिणगोल में, उपसंहार उत्तरगोल में होता है ) में सोमप्राणगभित अग्निप्रधानबसन्त- त-: ग्रीष्म - वर्षा, इन तीन ऋतुओं की सत्ता रहती है । एवं मध्यरेखा से दक्षिणभाग ( दक्षिणायनभाग - जिसका उपक्रम उत्तरगोल में, उपसंहार दक्षिण गोल में होता है ) - में शरत् - हेमन्त -शिशिर इन तीन ऋतुओं की सत्ता रहती है । इस अग्नि- सोम - प्राधान्य- गौणतारतम्य से वसन्तादि त्रयी ' देवा ' मान ली गई है । एवं शरदादि त्रयी ' पितर ' मान ली गई है । हमनें अन्नादपितरों को तो अमृतपितर कहा है, अन्नपितरों को मर्त्य पितर माना है | श्रुति ने अन्नादाग्नि को देवाः कहा है, अन्नसोम को पितर माना है । ऐसी स्थिति में पितरों को अन्नदानस्वरूप कैसे माना गया?, यह समस्या है, जिसका निराकरण इसी अग्न्याधेय श्रुति से हो रहा है । प्राणाग्निरूप दोनों के गर्भ में प्राण सोमरूप पितर प्रतिष्ठित हैं, एवं प्राणसोमरूप पितरों के गर्भ में प्राणाग्निरूप देवप्रतिष्ठित हैं । इस दृष्टि से तीनों ऋतुओं के दोनों विभागों में दोनों तत्त्व समन्वित हैं । अतएव वसन्तादि तीनों को ' देवाः पितरः कहा जा सकता है, शरदादि तीनों को ' पितरः- देवा ' दोनों कहा जा सकता है । तभी तो - ' षड्वा ऋतवः पितरः ' ( शत ०६ | ४ | ३ | ८ | ) यह अन्यश्रुति समन्वित होती है । तभी तो पितृकर्म में ऋतु अनुबन्धी षड्कपालपुरोडाश ' समन्वित बनता है । अन्तर दोनों स्थितियों में यही है कि, देवात्मक पितरों में सोम गौण है, अग्नि प्रधान है, तव ये देवसमतुलित है, अन्नाद हैं, उत्तरसंस्थ हैं । पितरात्मक पितरों में अग्नि गौण है, सोम प्रधान है, अतएव ये पितर ही हैं, ये ही अन्न हैं, मर्त्य हैं, दक्षिण संस्थ हैं । इन दोनों पितृषट्कों का निम्नलिखित परिलेख से सुसमन्वय हो रहा है-२६६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् अग्नि: ( १ ) -- देवा: - वसन्तः -- पितरः वसन्तः ( १ ) - २ सोम: ( २ ) -- पितरः - शरत्-- पितरः अग्निः ( ३ ) - देवा: - ग्रीष्मः -- पितरः ग्रीष्म: ( २ ) -२ इति वसन्तः देवा ते - ग्रीष्म : ऋतवः - वर्षा : -सोम: ( ४ ) - पितरः - हेमन्ताः -- पितरः अग्निः ( ५ ) - देवा: - वर्षाः - - - पितरः-) ) पार्थिवाः -पितरः यज्वानः - मर्त्याः -- दक्षिणायनस्थाः : षड्ऋतवः- काम्या महासङ्गीतानुगता अन्नानि ( ( दक्षिणसंस्थाः - पितरः षड्ऋतवः -- उत्तरायणस्थाः अन्नादाः - चान्द्राः - अमृताः उत्तरसंस्थाः ) यज्वानः : पिण्डपितृयज्ञात्मका ( ) देवयज्ञानुगताः ( सोम: ( ६ ) - पितर: - शिशिरः- पितरः - वर्षाः ( ३ ) - ३ सोमः ( ७ ) - पितर: - शिशिरः - पितरः अग्निः ( ८ ) - देवा: - वर्षा: --- पितरः सोम: ( ६ ) - पितर: - हेमन्तः - पितरः निः ( १० ) - देवा: -- ग्रीष्मः -- पितरः सोम: ( ११ ) - पितरः - शरत्-- पितरः शिशिरः ( १ ) - २ - हेमन्त: ( २ ) -२ . शरन ( ३ ) -२ निः ( १२ ) - देवा: - वसन्तः - पितरः शरत् इति - हेमन्तः-पितरः शिशिरः गृह्य - सौम्य - मनोमय - पार्थिव - भौम - औपपातिक - अन्नात्मक - भोग्य - शरद्धेमन्त शिशिरऋतुमय - मर्त्य-प्रेतपितर जहाँ उत्तर से चलकर दक्षिण में प्रतिष्ठित होते हैं, वहाँ चान्द्र - बुद्धिमय आन्तरिक्ष्य - नित्य -अन्नादात्मक - भोक्ता - वसन्तग्रीष्मवर्षाऋतुमय - अमृत - सापिण्ड्यपितर दक्षिण से चलकर उत्तर में प्रति-ठत होते हैं । रात्रिजागरणात्मक गृह्यपितर प्रकृत्या क्योंकि: ' दक्षिणसंस्थ ' हैं, गृह्यपितृकर्म से तृप्त पितर आशी: प्रदान करते हुए सपरिवार - स्वावान्तर शक्तिसहित - दक्षिण दिशा की ओर ही अभिमुख हो जाते हैं, एवं चतुर्थ महासङ्गीत के अन्तिम - ' पित्तर बालाभोला - द्यो - जी सीस ' इस भाव से एक प्रकार से पितृकम्मे समाप्त है । अतः यहीं तुष्ट पितर दक्षिणाभिमुख बन जाते हैं । भावात्मक पितृकर्म + ' पितुषणिः ' की व्याख्या करते हुए भगवान् ऐतरेय कहते हैं - " अन्न वै पितु । दक्षिणा ( दिक ) वै पितु । ताननेन ( मन्त्रेण ) सनोति । अन्नसनिमेवैनं करोति " ( ऐ ० ना ० ३।२ । ) । स्पष्ट ही अन्नात्मक गृह्य पितरों का दक्षिणसंस्थत्त्व प्रमाणित हो रहा है । २६६
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श्राद्धविज्ञान यद्यपि चतुर्थ पद्य पर ही उपरत है । किन्तु भूतापक पितृकर्म ( मूर्त्ति - पातड़ी - स्थापनात्मक कर्म्म से ) शेष है । तदवधिपर्य्यन्त इन पितरों का अभी यहीं ठहरना आवश्यक है । भावात्मक अतिथ्यक दक्षिणाभिमुख बन जाने वाले पितर मूर्त्तिस्थापनावधि से पूर्व ही इस स्थान से चले न जाँय, इसी अभिव्यक्ति के लिए, साथ ही परोक्षरूप से पितृपरिवार की संस्थानुगता भाववृत्ति के माध्यम से स्तुति करने के लिए ही प्रस्तुत पञ्चम महासङ्गीत का आविर्भाव हुआ है । और यही ' दक्षिणा - दिग् ’ अनुगत - ' दिक्खण म मत न जाओ सा ' का नैगमिक आम्नाय है । पितृपरिवार के ज्येष्ठ श्रेष्ठ पितृपुरुष ' श्मशा ' नाम के भोक्ता ' एको रुद्रो न द्वितीयाय ' वाले भगवान् मूलरुद्र ( पशुपति - भूतपति- मूतनाथ - - श्मशानवासी भूतप्रेतगणोपसेवी - संहारात्मक ताण्डवनृत्यपरायण ) हैं । इन मूलरुद्र भगवान् को ही इन के चान्द्र ( आप्य ) सहकृत पार्थिवभूत समन्वय से ' भौम ' कहना अन्वर्थ बनता है, जिस ' भौम ' ( मूल पार्थिव रुद्रपितर ) रुद्र का प्राकृतिकरूप ही ' भोमियाँ ' है । ' इयं वै पृथिवी भूतस्य प्रथमजा ' ( शत ० १ २ | १ | २ | १० ) ( श्रग्निनामानि - भुवपतिः, भुवनपतिः, भूतानांपतिः ' ( शत ० १ | ३ | ३ | १७ ) ' एष देवो रुद्रोऽभवत् । तदस्यैतत् भूतवन्नाम् ' ( ऐत ० ३।३३३ ) " रुद्रोऽभिमन्येत - अग्नये रुद्रवते पुरोडाशमष्टाकपालं निरुप्य - अथ - भौम- ' कपालं निरुप्य - श्रन्यमालभेत " ( ताण्ड्य ० २ ९ | १५ | १४ | ) इत्यादि निगमवन प ही पार्थिव भूताधिपति मूलरुद्र का भूतपतित्त्वेन भौमत्त्व प्रमाणित कर रहे हैं, जो भौम ( भोमियाँ ) रुद्र - अपने परिवार में सर्वतः अग्रणी माने गए हैं, जिस इस वेदाम्नाय का हो भाषान्तर है- ' आग आग भोमियाँ जी ' । जैसे देवमण्डल- देवपरिवार में - ' अग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' रूप से देवप्रमुख अग्नि आगे आगे चलते हैं, तथैव पितृमण्डल में भौम ( मूल एकाकी ) रुद्र ही आगे आगे चलते हैं । --' पाछ पाछ कुरण चाल छ '? प्रश्न का उत्तर भी उहीं मूर्त्तितीं श्रुतियों ( कुलस्त्रियों ) से पूछिए, समाधान प्राप्त हो जायगा । मूलरुद्र के चान्द्रसोमनिबन्धन जहाँ १४-२१-४२ अवान्तर विभेद हैं, वहाँ स्वानुगत अग्निप्राणनिबन्धन ११ अवान्तर विभेद की सुप्रसिद्ध हैं । एकादशाक्षर त्रिष्टुप्छन्द ही -‘ त्रिष्टुब्रुद्राणां पत्नी ' ( गो ० उ ० २६ ) के अनुसार रुद्रपत्नी है । एकादशाहरा त्रिष्टुप् के सम्बन्ध से ही मूलरुद्र ११ तूलभावों में परिणत हो रहे हैं । ' अथैनं - इन्द्र - दक्षिणस्यां दिशि रुद्रा अभ्यषिञ्चन् * ( १ ) दक्षिणवृद्धि पितृणाम् ' - ( तै ० १६८५ ) - ' पितृणां वा एषा दिक - यद्दक्षिणा ' ( प. ३ | १. ) ' दक्षिणसंस्थो वै पितृयज्ञः ' ( कौ ० ५/७ | ) ( इति नु - अन्न पितणामवसानसंस्था ) ( २ ) ' उत्तरा ह सोमो राजा ( चन्द्रमा: ) ( ऐ ० १ | | ) ( यदुत्तरतो वासि, सोमो राजा भूतो वासि ( जै ० उप ० ब्रा ० ३।२१२ ) इति नु - अन्नादपितणामवसानसंस्था ) । II छ