Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 341–350

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 341 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मक कर्म्म ) क जाँय, इसी से माध्यम ' क्षिणा - दिग ' द्वितीयाय ' -संहारात्मक भूत समन्वय कृतिकरूप ही न - भुवपतिः, भूतवन्नाम् ' थ - भौम- ' ष्ट ही पार्थिव 1 ) रुद्र - अपने भाग भोमियाँ प्रमुख अग्नि i ) से पूछिए, भेद हैं, वहाँ टुप्छन्द ही-के सम्बन्ध से अभ्यषिञ्चन् णा ' ( ष. ३ | १ ) संस्था ( ) राजा भूतो ऋणमोचनोपायोपनिषत् - शत ० १४ | १ | १ | १-१११ * ' सोमो रुद्र: - व्यद्रवत् ' ( शत ० ३ । ४ । २ । १ । ) । २७१ भौज्याय ' ( ऐत ० ८ | १४ | ) इत्यादिरूप से दक्षिणादिक ही इन रुद्रों का गमन - आवास - विश्रामस्थान है | एकादश इन दक्षिणसंस्थ चान्द्र सोमसहकृत मूलरुद्रों के लिए ही काम्य - महाहवियोग में-' रुद्रा एकादशकपालेन माध्यन्दिने सवने ' ( जै ० २५ | ११ | ३ | ) इत्यादिरूप से एकादशकपाल पुरोडाश का निर्वाण विहित है । उक्त ११ रुद्रों में अन्तिम रुद्र ( ग्यारहवें रुद्र ) ही ' महावीर ' रुद्र हैं, जिनके अवतार माने गए हैं । भगवान् मारुति ( बजरंग - वज्राङ्ग - बालाजी हनूमान ) । सुप्रसिद्ध श्रौत धर्म्मयागापरपर्थ्यायक प्रवर्ग्य- नामक ' महावीरयाग ' का मूलाधार ये ही छिन्नशीर्षस्थानीय ११ वें रुद्रभगवान् हैं, जिन का यों स्वरूप-विश्लेषण हुआ है-" स यः स विष्णुर्यज्ञः सः । स यः स यज्ञोऽसौ स आदित्यः । स तिसृधन्वमादाय-अपचक्राम । स धनुरार्त्या शिर उपस्तभ्य तस्थौ । ताह वम्रच ज्यामपिक्षुः । तस्यां छिन्नायां धनुगत्न्यौं विष्णोः शिरः प्रचिच्छिदतुः । तद् ' घृङ् ' इति पपात । तस्माद् घर्म्मः । यत् प्रावृज्यत - तस्मात् प्रवर्ग्यः 1 । ते देवाः अत्र वन्- ' महान् बत नो वीरोऽपदि ' इति । तस्मान् महावीर: " । " वय: " ( दीमक ) द्वारा उस धनुष की ग्नायुमयी प्रत्यञ्चा के द्वारा - जिस पर कि मस्तक रख कर ( यज्ञात्मक ) रुद्र विष्णु सो रहे थे- -- मस्तक के कट जाने से - ' घुङ - ङ ' इस घोष के साथ वह मस्तक गिर पड़ा । वही धर्म्मयाग कहलाया, वही ' महावीर ' माना गया ' । इस यज्ञात्मक महावीरतत्त्व से का तो क्या सम्बन्ध?, रुद्र का सम्बन्ध इससे मान भी लिया जाय तो, लोकमान्यतानुगत ' बजरँगबली-हनूमान् हठीले ' के साथ यज्ञमूर्ति महावीरयाग का क्या सम्बन्ध?, ( क्या केवल ' महावीर ' नामसाम्य जैनी से ही इस अन्ध श्रद्धा के समन्वय का विफल प्रयास हो रहा है? । तब तो सर्वनिषेधवादी अपने ' महावीरजी ' को भी वेदशास्त्रसम्मत घोषित क्यों न कर दें? । यह कैसा नैगमिक आम्नाय है?! तभी तो हम इन सब प्रपञ्चों को अवैदिक होने से अमान्य ठहराते हैं " अभिनिविष्ट वेदभक्त की इस परव्यामोहक आपातरमणीयता का हम लोकसंग्रहधिया स्वागत ही करेंगे । किन्तु ' अर्द्धचन्द्राकार-प्रदान ' ही इस स्वागत की परिणामानुगता महान् व्याख्या होगी । और इस स्वरूपानुगत स्वागत के ' लिए वे वेदभक्त हमें ' योग्यं योग्याय ' आधार पर क्षमा ही कर देंगे, ऐसी है हमारी आस्था उन अभिनिविष्टों के प्रति ।

पृष्ठ 342

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 342 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रवर्ग्य ही उच्छिष्ट है, जिसका ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा: - ' उच्छिष्टाजज्ञिरे सर्वम् ' इत्यादि रूप से ईशविज्ञानभाष्य प्रथमखण्ड में विस्तार से निरूपण हुआ है । विष्णु यज्ञ हैं, यज्ञ आदित्य है-' सयः स यज्ञः, असौ स श्रादित्यः ' से प्रमाणित ' अग्निरु वै यज्ञः, निर्वा रुद्र: ' भी नैमिक ही वचन हैं । ' उच्छेषणभागो वै रुद्र: ' ( तै ० ११७८ ५1 ) तो स्पष्ट ही रुद्राग्नियज्ञ की धर्म्मयज्ञता, महावीरत्व प्रमाणित कर रहा हैं । अव विवाद शेष है ' बजरंग ' और ' बाला ' शब्दों का । ' वज्राङ्ग ' ( वज्रसम कठोर - क्रोधाविष्ट निर्दय ) ही वज्राङ्ग के फलितार्थ हैं, जिन का प्राकृतरूप है - ' बजरंग ' | ' वाला ' शब्द ' बाल ' भावानुगत उसे सौम्यभाव का सूचक है, जिसका ' पित्तर बाला भोला ' इस चतुर्थ महासङ्गीत वाक्य में समन्वय किया जा चुका है । तत्काल विष्ट - क्रुद्ध होकर संहार करने. लग जाना रुद्र की घोर आग्नेयीतनू का जहाँ सहज स्वभाव है, तथैव स्तुत्यादि द्वारा तत्काल प्रसन्न होकर संरक्षण करने लग जाना रुद्र की शान्त- सौम्य - अघोर तनू का सहज स्वभाव है । घोरतनू से रुद्र वाङ्ग हैं, तो अघोरतनू से रूद्र शिव बनते हुए सर्वथा बालभावापन्न - सौम्य - भोलानाथ हैं । यही तो ' क्षणे रुष्टाः - क्षणे तुष्टाः ' विरुद्धभावानुगत शिव, किंवा रुद्रपरिवार का सर्वाधिक वैलक्षण्य है । स्वयं रुद्र में यदि विरोधी भावों का समन्वय है, तो तत्परिवार की भी यही स्थिति है । पिता का वाहन वृषभ,. तो माता का वाहन सिंह, दोनों में सहज पैर । पुत्र गणेश का वाहन मूषक, तो पुत्र कुमारं का वाहन मयूर, पिता के आभूषण सर्प, सर्प - मयूर - मूषक में परस्पर कोई मैत्री नहीं । सर्वविरोधों का एकत्र समसमन्वय ही तो ' शिवभाव ' का जनक बना करता है । विरोधात्मक निषेध ही जिन अभि-निवों का मुख्य पुरुषार्थ है, वे कैसे रुद्रानुगत पितृपरिवार का स्वरूप बोध प्राप्त कर सकते हैं । रुद्र - त्रिष्टुप् - माध्यन्दिनवन - सविता - आदित्य - पञ्चदशस्तोम - यज्ञ - चन्द्र - भूतसर्ग-यदि शब्दों का नैमिक इतिहास ( वैज्ञानिकस्वरूप ) जब तक जान नहीं लिया जाता, तबतक भारतीय किसी भी वैदिक - लौकिक आम्नाय का समन्वय कर लेना कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । आन्तरिक्ष्य पञ्चदशस्तोम को ही निगमपरिभाषा में ' वज्र ' कहा गया है । रुद्र श्रन्तरिक्ष्य है, इनका त्रिष्टुप् छन्द अन्तरिक्ष्य है, इनका सवन माध्यन्दिन ( मध्याह्न ) है । और यही अन्तिम रुद्र की - महावीर रुद्र की -वज्राङ्गता है, जिसका निम्नलिखित श्रौत तत्त्वों के आधार पर स्वरूपबोध प्राप्त करने का प्रयास करते रहें वे आस्था - श्रद्धाशून्य अभिनिविष्ट आकल्पान्त, तथापि ' मनरञ्जन तिनका कभी सम्भव नाँहि सुजान-" द्वितीय महरन्तरिक्षलोकः, आयततेनेन्द्रः । त्रिष्टुप् । पञ्चदशस्तोमः । बृहत्साम । वज्रवद्रूपम् । दक्षिणां दिशम् । ग्रीष्ममृतूनाम् । मरुतः | ( शाङ्खायन ब्राह्मरण - २२ | २ | ) ( मरुतो रुद्रपुत्रासः ' ( तत्पुत्रः - मारुति: - हनूमान् ) । * मांस एव पञ्चदशस्यायतनम् ' ( शत ० १०1१1४ ) - ' वत्रो वै पञ्चदश: ' ( तां ० १६ । RIKI ) - ' पञ्चदशो हि वज्रः ' ( शत ० ४ । ३ । ३ । ४ । ) । II तदित्थं- मूलर अग्रगामी दक्षिणपथ सिद्धान्त - पाछ ब अब क्रमप्राप किया जाता है कहलाई है, जिसे भ ' भैरव ' है, जिसकी ' भीरवता ' ही भैरव इस भैरवर्त्ति का विस्तार है । इसी शुक्लपक्षानुगत ' शुव लोकगीतों की - ' कार भँरूँ न मनावाँ गतार्थ बन रहा है-* - सान्निध्यं अभिगम्य - ततः श्र चुकोप सु पूर्वन प्रजाः सृज एवमुक्त्वा तस्य वा तत्र भूता कूष्माण्डा " भयङ्करो देवा: - भीषयमाणा

पृष्ठ 343

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 343 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

म् ' इत्यादि रूप ज्ञ आदित्य है-भी नैमिक ही की घर्म्मयज्ञता, ' वज्राङ्ग ' ( वज्रसम बजरंग ' | ' बाला ' सोला ' इस चतुर्थ कर संहार करने तत्काल प्रसन्न है । घोरतनू से लानाथ हैं । यही क्षिण्य है । स्वयं पिता का वाहन तो पुत्र कुमार का सर्वविरोधों का ही जिन अभि सकते! चन्द्र - भूतसर्ग-तक भारतीय किसी है । यान्तरिक्ष्य का त्रिष्टुप् छन्द - महावीर रुद्र की -का प्रयास करते व नाँहि सुजान'-॥ बृहत्साम । २२ | २ | ) ( मरुतो : ' ( तां ० १६ । ऋणमोचनोपायोपनिचत् * - सान्निध्यं तत्र राजेन्द्र! रुद्रपत्न्या कुरूद्वह ।

- ततः श्र वा महातेजाः सर्वज्ञः परमेश्वरः ( रुद्र: ) ।

चुकोप सुभृशं देवो वाक्यचेदमुवाच ह ॥ १ ॥

पूर्वन्तु कविना ( भार्गवचान्द्ररुद्रण ) सृष्टः सर्वात्मना विभुः ।

प्रजाः सृजस्वेति तदा वाक्यमेतत्तथोक्तवान् ॥ २ ॥

एवमुक्त्वा भृशं कोपान्ननाद परमेश्वरः ।

तस्य वा नदतो ज्वालाः श्रोत्रेभ्यो ( दिग्भ्यो ) निर्य्ययुस्तदा ॥ ३ ॥

तंत्र भूतानि वेताला उच्छुष्माः प्रेतपूतनाः ।

कूष्माण्डा यातुधानाश्च सर्वे प्रज्वलिताननाः ॥ ४ ॥

- वराहपुराण | २७३ तदित्थं - मूलरुद्र के अवान्तर रुद्र वज्राङ्ग बाला प्रमुख ( महावीरप्रमुख ) बने रहते हुए -अग्रगामी दक्षिणपथसञ्चारी मूलरुद्र के पीछे पीछे गमन किया करते हैं, यही भाव, यही नैगमिक सिद्धान्त - ' पाछ बजरंग बाला ' इस महासङ्गीत से अभिव्यक्त हुआ है । अब क्रमप्राप्त चतुर्थ ' भैरवनाथ ' शब्द के नैगमिक समन्वय की ओर पाठकों का ध्यान आक-र्षित किया जाता है । रुद्रपत्नी महामाया जगदम्बा दुर्गा से प्रसूत तमोगुणप्रधान सर्ग ही रुद्रसृष्टि कहलाई है, जिसे भीषणभावात्मिका होने से ' भैरव ' कहा गया है । महाभयावहा पार्थिवी रुद्रसृष्टि ही ' भैरव ' है, जिसकी भयानकता श्रागमानुगत रुद्रसर्ग में बड़े आटोप के साथ उपवर्णित है । ' भीरवता ' ही भैरव की भैरवता है ( + ) । रुद्रगरणरूप से भी आगमशास्त्र में बड़े ही विस्तार के साथ इस भैरवविवर्त्त का उपबृंहण हुआ है । यह सब कुछ शुक्ल- कृष्णपक्षात्मक चान्द्रसर्ग का ही पार्थिव विस्तार है । इसी आधार पर श्रागमने अनेकधा विभक्त भी भैरवसर्ग के कृष्णपक्षानुगत ' कृष्णभैरव सर्ग ', शुक्लपक्षानुगत ' शुक्ल भैरवसर्ग ' नाम से दो ही मुख्य विवर्त्त मानें हैं, जैसाकि, भैरवयशोवर्णनात्मक लोकगीतों की - ' काला - गोरा न मनावाँ, अजन गारा न " र " मनावाँ ए, चालो ए सहेल्यो पाँ भँरूँ न ' र ' मनावाँ ए ' इत्यादि भावव्यञ्जनाओं से भी स्पष्ट है, जिसका आगमाम्नाय उत्तरपृष्ठ से गतार्थ बन रहा है -अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् || ( महाभारत ३८३ | ४८ | ) | X “ भयङ्करो वो यस्य - स भीरवः ' अणप्रत्ययेन ' भीरव ' एव भैरवः । तेन सर्वे पार्थिवा देवा: - भीषयमाणा प्रतिष्ठन् " ।

पृष्ठ 344

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 344 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान " तस्यां तु सद्यो जातं सुतद्वयम् ॥ ततस्तयोर्नामचक्र ' नारदो वचनान्नृप! । ज्येष्ठो भैरवनामाभूत् भीरोः पुत्रो भयङ्करः । वेतालसदृशः कृष्णो वेतालोऽभूत्, तथापरः. ( शुक्लः ) - इत्यादि कालिकापुराण ४६ अ ० । पार्थिव मूलरुद्र प्राणप्रधान है, ततपुत्रस्थानीय तृलरुद्रगणात्मक पार्थिव रुद्र भूतप्रधान है । प्राणरुद्र पृथिवी पर ' भूत ' रूपात्मक भैरव रूप से ही पार्थिव प्रजा को अपने संहारात्मक भीषणरव से विकम्पित करहु इतर भूतप्रजा ( प्रेतभूतवर्ग ) पर अनुशासन करते रहते हैं । पृथिवी में मूल - प्राणरुद्र की उपलब्धि भूतप्रधान भैरवरूप से ही हुई है, अतवए रुद्रापेक्षया भैरव ही ( गणदेव ही ) विशेषरूप से लोकमान्यता के अनुगामी बने हुए हैं, अतएव ' ध्वजा ' इन्हीं की मानी जाती है । झण्डा इन्हीं का फहरा रहा है पार्थिवप्रजा पर । तभी तो इनका ' झण्डो भैरू नाथ को ' इत्यादि रूप से उपवर्णन हुआ है । इसी सम्बन्ध में एक प्रासङ्गिक विशेष आम्नाय की ओर भी इसलिए आस्तिक भारतीय प्रजा का ध्यान कर्षित करना सामयिक बन रहा है कि, गतानुगतिक वर्त्तमान युग का युगधर्माक्रान्त भारतीय मानव उच्चस्वर से - ' झँडा ऊँचा रहे हमारा ' का निनाद करता हुआ ' राष्ट्रियध्वज ' रूप से, ' झण्डोत्तोलन-झण्डाभिवादन - ध्वजारोहण ', आदि आदि रमणीय भावनाओं के माध्यम से अपना ' ध्वजा ' राग अभि-व्यक्त करता हुआ नहीं अघाता । सुस्वागत है राष्ट्रप्रेो मानुबन्धिनी इस झण्डाभिव्यक्ति का, जिसके वर्त्तमान राष्ट्रियध्वज में ' वर्णत्रयी ' समन्वित है, अतएव जो राष्ट्रध्वजा ' तिरंगा झण्डा ' नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । भारतीय निगमानुगता आम्नाय ने भी बड़े विस्तार से ' ध्वजारोहण ' को मान्यता प्रदान की है । किन्तु यह मान्यता केवल गतानुगतिक नहीं हैं, नाहीं किसी बौद्ध - तदनुगामी अशोकादि मत-वादपरम्परा का भावुकतापूर्वक समर्थन करने वाली ही है । अपितु भारतीय राष्ट्रियध्वजा का मूल है वह भारतीय निगमागमसम्मत शाश्वत सनातनधर्मानुप्राणित सनातन आम्नाय जिस आम्नाय में देश-काल - पात्र - द्रव्य - श्रद्धा - वर्ण - आश्रम - देवता - भूत - आदि आदि के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर विभिन्न ध्वजाओं की ही प्राकृतिक व्यवस्था हुई है, जो एक स्वतन्त्र विषय है, एवं आम्नायनिष्ठ आस्तिक भारतीय के लिए सर्वात्मना विज्ञेय । जयपुर राज्य का ध्वजादण्ड लोकनीति, धर्मनीति, दो विभिन्न भाबों के माध्यम से दो स्वरूपों में विभक्त है ( था ), जो गतानुगतिक आवेशानुग्रह से कुछ समय के लिए विस्मृत बना दिया गया है । पञ्चविध यवनश्रेणि के विजयोपलक्ष से सम्बन्धित ' पचरंग झण्डा ' जहाँ लोकनीति का समर्थक था, वहाँ जयपुर की स्थिरभावापन्ना सुवर्ण - राजती मुद्राओं ( सोने की मोहर -चाँदी का रुपय्या - अठन्नी - चवन्नी - दुवन्नी मुद्राओं ) में ' वृक्षध्वजा ' समाविष्ट थी, जो सूर्यवंश का प्रतीक २७४

पृष्ठ 345

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 345 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ऋणमोचनोपायोपनिषत् थी । भगवान् रामने कुलाम्नायसंरक्षण का आदर्श उपस्थित करते हुए वनगमन किया, वहाँ सर्वप्रथम. जिस ' काञ्चनार ' ( कचनार ) वृक्षच्छाया में राम ने विश्राम किया, आगे चलकर रामवंश ने इस पावन स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए काञ्चनारवृक्ष को ही सूर्यवंश की ध्वजा का प्रतीक मान लिया, जैसाकि -' काञ्चनारध्वजो राजा ' इत्यादि से स्पष्ट है । वही सूर्यवंशात्मक - ध्वजाप्रतीक निगमाम्नायनिष्ठ जयपुर-राजवंश की राजमुद्रा में ' वृक्षध्वजा ' रूप से संगृहीत हुआ, जिस वृक्ष का प्रान्तीय नाम है - ' झाड़ ' | इसी से यहाँ की मुद्रा ( सिक्का ) ' झाड़शाही ' ( वृक्षयुक्ता ) कहलाई । भगवान् कृष्ण की रथध्वजा में ‘ गरुड़ ' ( सुपर्ण ) समाविष्ट था, अतएव वे ' गरुड़ध्वज ' कहलाए । महावीर अर्जुन की ध्वजा में भगवान् महावीर ( मारुति ) समाविष्ट थे । उपासनाकाण्ड में भी तत्तत् प्राणदेवताओं के स्वरूपभेद से विभिन्न ध्वजाएँ उपर्वाणित हैं, जैसा कि - ' काकध्वजरथारूढा ' इत्यादि से स्पष्ट है । जोधपुरराज्य की ध्वजा में खचित ' चिह्न ' ( चील - आकाश विचरणशील बृहदाकार पक्षी ) सुपर्णभावापन्ना भगवती भवानी काही प्रतीक है । निवेदन का निष्कर्ष यही है कि, भारतीय आम्नाय में कुलधर्म्मभेद से विभिन्न ध्वजों का संग्रह सनातन है । पितृदेवकर्म में प्रदत्त ध्वज रक्तपीता है, जैसा कि महासङ्गीत की कुलदेवी संस्मरणात्मिका प्रथम पावनस्मृति में ' राती पीली धजाए छढ़ावला ' इत्यादि रूप से स्पष्ट कर दिया -गया है । सिंहरूढ़ा, कपिसंस्था, वृषसंस्था, हंससंस्था, मयूरसंस्था, गरुत्मगा, महिषस्था, पद्मग्था, प्रतस्था, आदि आदि रूप से विभक्त विभिन्न ध्वजाओं के विभिन्न फल हैं । इसी ध्वजाम्नाय की अनिवार्य्यानुगति का समर्थन करता हुआ शास्त्र कहता है-१ – यावन्नो दीयते शुक्र! ध्वजः प्रासादमूर्द्धनि । तावत्तु न भवेत् - वत्स! प्रासादो देववाञ्छितः ॥

- शून्यध्वजं सदा भूता नानागन्धर्व्वराक्षसाः ।

विद्रवन्ति महात्मानो ( सोम्यासः ) नानावाधाञ्च कुर्वते ॥

३- तस्माद् देवगृह - द्वार - पुर - पर्व्वत - पत्तने ।

उच्छ्रिताः शान्तिकामाय ध्वजाः शुक्र! सदा हिताः ॥

आन्तरिक्ष्य रुद्रपरिवार में रुद्र रिवार के प्राकृतिक ध्वजदण्ड का नियतिर्लक्षरण भयप्रदानात्मक दण्ड का - दण्डग्रहण का - उत्तरदायित्त्व है भीषयमाण, अतएव ' भैरव ' नाम से प्रसिद्ध रुद्रदेवता का, जिसके भय से त्राण पाने के लिए ही ' शान्तरुद्रिय ' कर्म का आविर्भाव हुआ है । इसी ध्वजाम्नाय का महासङ्गीत के ' झण्डो भैंरूँ नाथ को ० ' इत्यादि रूप से विश्लेषण हुआ है । ध्वजसमन्वित इस भीषयमाण भैरवात्मक तूलरुद्र का नैगमिक आम्नाय उत्तरपृष्ठ में यों अभिव्यक्त हुआ है-२७५

पृष्ठ 346

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 346 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान " सोऽयं शतशीर्षा रुद्रः - सहस्राक्षः - शतेषुधिः - अधिज्यधन्वा -प्रतिहितायी - भीषयमाणः - श्रतिष्ठन् । तस्माद् देवा अभियुः " । - शत ० ब्रा ० ६ | ११ | ६ | अब सर्वान्त में ' सातू मँणा, वाक्य का समन्वय शेष रह जाता है । जैसा कि का प्रस्तुत दिग्दर्शन पञ्चम सङ्गीत के ‘ भोमियाँ ' पद का समन्वय करते हुए पूर्व में अन्नाद - अन्नात्मक दो पितृसर्गों पितरों से ( देव-.कराया गया था, वहाँ वसन्तादि शरदुपसंहारात्मिका षड्ऋतुसमष्टि का सम्बन्ध नित्य औप-पितरों से ) बतलाया गया है । एवं शरदादि वसन्तोपसंहारात्मिका षड्ऋतु - समष्टि का सम्बन्ध पातिक पितरों ( पितृपितरों ) से बतलाया गया है । अतएव रुद्रगणात्मक भ्रातृसर्ग की ( १४ सर्ग की ) स्वसा - स्थानीया ( भगिनी - स्थानीया ) अम्बिकाशक्ति का उपक्रम स्थान भी ' शरद् ऋतु को ही माना गया है से, जिसके उपलक्ष में ' शारद नवरात्र ' में अम्बिकोपासना का श्रागमिक विधान सुप्रसिद्ध है । इसी चान्द्रसर्ग- दृष्टि ' शरत् ' को रुद्रस्वसा मान लिया गया है, जिन १४ स्वसाओं में ७-७ के दो युग्मों का पूर्व के, जिन व्याख्यान में स्पष्टीकरण किया जा चुका है । यही नैगमिक सप्तस्वसृवर्ग यहाँ ' सातों भगाँ ' हैं को के लिए कहा गया है -- ‘ अगवाणी सातू मँगाँ ' 1 । अम्बिका - शक्तिपुञ्ज ही रुद्रपरिवार - भ्रातृवर्ग उत्तर- -गतिशील बनातीं हैं, वे इनसे आगे हीं रहतीं हैं । यही इनका अगवानी करना है । निगमाम्नाय पृष्ठानुगता श्रुद्धियों से प्रसिद्ध ही है--ॐ प्रतीकविधानुगत उपासनारहस्य में भैरव का वाहन ' श्वान ' माना गया है । श्याव - शवल नामक - हिंस्रक दो प्राण जिन श्वानप्राणियों में विशेषतः उबुद्ध रहते हैं, वे तो साक्षात् भैरवप्रतीक घटना का ही माने गए है । इनका रुदन अवश्य ही तत्प्रदेश में घटित होने वाली भावी अशुभ है । सूचक माना गया है । इस अवसर का श्वानरव बड़ा ही भीषयमाण - डरा देने वाला होता ' श्याव - शवल ' दोनों प्राकृतिक वे ' खानप्राण ' हैं, जो ' सारमेय ' नाम से भी व्यवहृत हुए हैं । प्रतपितृपथात्मक अन्तरिक्ष ही ' यमसदन ' है, जिसमें चतुर्दिक रूप से ये दोनों प्राण मानों इस पथ से आने जाने वाली पितरप्रजा के संरक्षक ( पहिरेदार ) ही हैं । चतुर्द्दिक्स्थता ही इनका ' चतुरक्षौ ' ( चार आँखों वाला ) भाव है । इन प्राणों की प्रधानता से युक्त श्याव - शक्ल वर्णात्मक पार्थिव श्वानपशु ( कुत्तों ) के लिए प्रेतकर्म में बलिविधान हुआ है । इस बलिप्रदान से तृप्त श्वानपशु सजातीय प्राणाकर्षण-सम्बन्ध से अन्तरिक्ष्य श्वानप्रारण की तृप्ति के कारण बन जाते हैं । एवं तृप्त श्वानप्रारण यमपथ से आने जाने वाले पितरों को कोई कष्ट नहीं पहुँचाते । इसी आधार पर आगमशास्त्र ने कहा है-avaratra - शव वैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्यामन्न ' प्रयच्छामि स्यातावेतावहिंसकौ ॥ -पुराण २७६

पृष्ठ 347

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 347 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( १ ) -ऋणमोचनोपायोपनिषत् - अम्बिका ह वे नामास्य रुद्रस्य स्वसा ( भगिनी ) - शत ० २२६ २६ -तै० ना ० २ | ६ | १० | ४ | - शरद्वा अस्य रुद्रस्य अम्विका स्वसा । ( ३ ) - शरद्व रुद्रस्य योनिः ( उपक्रम विन्दुः ) स्वसाम्बिका । ( ४ ) - अम्बी वै स्त्री भगा नाम्नी, तस्मात् त्र्यम्बकाः । II - मैत्रायणी संहिता १1१ । - काठकसंहिता ३६।१४ । दिक्खण - भोमियाँ - बजरँगबाला - भैरुनाथ - सातू ॐणाँ, इत्यादि दिग्देशानुगत १४ - २१–४२ भागों में विभक्त पितृपरिवार को उपस्तुति चतुर्दशी की रात्रि में चौदह पद्यों में, अवान्तर ४२ वाक्यों ( २७६ पृष्ठ की टिप्पणी का शेष ) अभिनिविष्ट कहेंगे, “ पुराण में तो इसी प्रकार की कल्पनाओं का साम्राज्य है, जो वेदविरुद्ध होने से केवल कल्पना ही है " । इन अभिनिविष्टों का संतोष करना इसलिए कठिन है कि, ये भ्रान्ति, से. भी स्वप्न में भी कभी वेद पर दृकपात भी तो नहीं करते । यदि वे निगम पर दृष्टि - निक्षेपमात्र भी कर लेते, तो इन्हें विदित हो जाता कि - ' निगमादागतः - श्रागमः ' निर्वचनानुगत ' आगम - पुराणशास्त्र का अक्षर - अक्षर ।नगम ( वेद ) आम्नाय से श्रोतप्रोत है । क्या निम्न लिखित निगमवचनानुगत दोनों श्वानप्राण उन अभिनिविष्टों का उद्बोधन कराने लिए पर्याप्त नहीं मान लिए जायँगे -यति द्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शक्लौ साधुना पथा । थापितन्त्सुविदत्र उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति ॥

यौ ते श्वानौ यम! रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षौ ।

ताभ्यामेनं ( पितरं ) परिदेहि राजन्त्स्वस्ति चास्या अनमीवञ्च धेहि ॥

- ऋक्संहिता १० मण्डल, १४ सूक्त, श्रुति का ' eat ' पद प्राणी श्वान के ( पार्थिवश्वान - कुत्ते के ) कर्त्तव्य का भी संग्रह कर रहा है । श्वान से बढ़ कर पथिरक्षिता ( द्वाररक्षक - गृहरक्षक - मार्गरक्षक ) दूसरा और कौन हो सकता . है । अथर्वाप्राण का प्रकृत्या विज्ञाता श्वानपशु अथर्वा प्राण के अनुशयमात्र के माध्यम से स्तेयकर्मकर्त्ता नर ( चौर ) के अन्वेषण में सफलता प्राप्त कर लेता है । अन्तरिक्ष्य इन्द्रप्राण का अनुशय भी. इस श्वानपशु में, विशेषतः इसकी जिह्वा में प्रतिष्ठित रहता है । अतएव आम्नायानुगता ग्रामीण चिकित्सा-प्रणाली में गहरे घावों पर दही डाल कर इसे श्वान की जिह्वा से चटा दिया जाता है, और इन्द्रप्राणानुगत अमृतसोम के अनुशय ' युक्त श्वानजिह्वा से घाव ठीक होता देखा गया है । इति नु प्रासङ्गिकम् | २७०

पृष्ठ 348

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 348 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान संख्यानुरूपतापूर्वक जिस इस पञ्चम महासङ्गीत के द्वारा हुई है, उसकी पावनस्मृति के आधार पर. दक्षिण की ओर गमनशील - गमनोत्सुक बने हुए पितृपरिवार से - ' दिवखरण म मत न जाओ सा ' इस प्रकार कुछ समय के लिए नम्र आवेदन कर अब अग्रिम पावनस्मृति के द्वारा मुख्यपितर ( ज्येष्ठ पुरुषरूप मूलपुरुष भौम- पार्थिव पितर - भोमियाँ ) से साक्षातरूप से ही कुलस्त्रियाँ न जाने का आग्रह अभिव्यक्त करती हुई कहतीं हैं -( ६ ) - मुख्य पितृनिरोधात्मक महासङ्गीत की पष्ट पावन स्मृति-* ( १ ) - बाप बरज भोमियाँ, थाँ की माय बरज जी । उस चाँबल पर भोम्याँ मत जाओजी ।

उस लिली र देस भोम्याँ मत जाओगी ।

काला खेली र देस भोम्याँ मत जाओ जी ॥

* जयपुर के प्रान्तों में यत्रतंत्र इन श्राम्नायगीतों का स्वरूप प्रान्तभेद से परिवर्तित हो गया है, जिनका संग्रह भी वाञ्छनीय माना जायगा । प्रस्तुत षष्ठ महासङ्गीत की प्रान्तीय विकल्पस्मृति का स्वरूप इस रूप से उपलब्ध हुआ है--( १ ) भोमियाँजी हाथी न सिणगारो, आप हाथी ने सिणगारो जी । ( २ ) पाँ पर सरम चालस्याँ जी । ( ३ ) भोमियाँजी जपर सरछ दूरो । ( ४ ) आप तो कोटा सर म चालस्याँ जी । ( ५ ) भोमियाजी कोटा का भलका म ' आँधा ' ह्यान दीखो जी । ( ६ ) भोमियाँजी बूँदी का भलका म ' बरा ' ह्यान दीखो जी ।

( ७ ) भोमियाजी गोटा तो चेंड़ा, दुनियाँ ह्यान दुलख जी ।

( ८ ) भोमियाजी हाथी न सिणगारो जी ॥

· ६ ----" हे भौमदेवता! आप हाथी को अलङ्काराभरणवसन से सुशोभित करें । हम ( आपके साथ ) जयपुर शहर में चलेंगीं । ( नहीं नहीं ) जयपुर तो यहाँ से ( अपने प्रान्त से ) बहुत दूर पड़ेगा, अपन ती ( समीप के ) कोटा शहर में हीं चलेंगे । हे भौमदेवता! आप ( गजारूढ़ बने ) कोटा में विचरते हुए वहाँ के चाक चिक्य में हमें ' अन्धे ' प्रतीत हो रहे हैं, बूँदी के चाकचिक्य में हमें बहिरे प्रतीत २७८

पृष्ठ 349

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 349 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( २ ) - नहीं हाँला बापजी, हमें नहीं हालाँ ए मायड़ नहीं हाँला ए । ह्यारी चढ़ी सवारी अमलो प्यारो लाग जी । ह्यारा सेलड़ा भलक छ बालू + रेत माँई जी ।

मारा साथीड़ा खड़ा छ चम्पा बाग माँई जी ।

झारी जीत का नगारा च्यारूँ कूँट बाज जी ॥

( 3 ) - भाई बरज भोमियाँ, थाँकी भावज बरज जी, उस चॉबल पर ०

( ४ ) - नहीं हाँला भाई जी, में नहीं हाँला ए भावज नहीं हाँला रा ।

झारी चढ़ी असवारी ० ॥

हो रहे हैं । हे भौमदेवता! हम आपके ( सम्मान में ) गोटा - किनारी लगा रहे हैं, ( आपका शृङ्गार कर रहे हैं -- इस प्रकार हम सर्वात्मना श्राप की रहती हुई भी संसार की दृष्टि में वैभव से वञ्चित हैं, ( अतएव ) संसार हमें ( यह कह कर कि क्या मिल गया तुम्हें भौमदेवता की आराधना से ) तिरस्कृत कर रहा है । ( क्या अब भी संसार हमारा यों ही तिरस्कार करता रहेगा, जब कि हमने आपका य ले लिया है?, कभी नहीं, सर्वथा नहीं । " ) श्रद्धात्मक मन न आँख रखता, न कान । न वह आँखों से परीक्षण करना चाहता, न कानों से परीक्षणात्मिका व्याख्या सुनने को ही श्रातुर बनता । अपितु अन्ध-न करना परम्परा के सम्मुख नतमस्तक होकर प्रणतभाव से श्रद्धापूर्वक देवपितृक में आत्मसमर्पण किए रहता है । यही स्थिति प्राणात्मक देवपितरों की है । श्रद्धापूर्वक अनुगति रखने वाला उपासक कैसा है?, साधु है अथवा श्रसाधु?, यह प्रश्न मीमांसा वहाँ नहीं है । उनका सहज अनुग्रह श्रद्धामाध्यममात्र से सब श्रेणि के कुल प्राप्त कर सकते हैं । " अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्य-भाक् । साधुरेव समन्तव्यः सम्यग् व्यवसितो हि सं: " ( गीता ) “ यो यच्छ्रद्धः, स एव सः " इत्यादि सिद्धान्त सुप्रसिद्ध हैं । ' ह्मान आँधा दीखोजी - बहरा दीखोजी ' का यही रहस्यार्थ है, जो सहजरूप से सहजभाषा में - कुलदेवियों के सहज मह, सङ्गीत में अभिव्यक्त हुआ है, जिस की रहस्यदिशा का पूर्व में भी सङ्क ेत हो गया है । + दक्षिणदिशा आयी है, श्रतएव सौम्या उत्तर दिशा की अपेक्षा रूक्षा है । यही दक्षिणादि-गनुगता सृष्टि की कृष्णवर्णता, तथा उत्तरदिगनुगता प्रजा की गौरवर्णता का रहस्य है, जिस का शतपथभाष्य में विस्तार से विश्लेषण हुआ है । दक्षिणा आग्नेयी रूक्षा दिकू की रूक्षता का स्पष्ट प्रतीक है रूक्षा वालुका ( बालू रेत, जो हमारी मरुभूमिका का भी हृदय है, एवं हमारा आमा । दक्षिण का लम्बलम्बायमान सुप्रसिद्ध ' सहारा ' नामक मरुस्थल भी प्रसिद्ध ही है । दक्षिणदिगनु-गता यह रूक्षता ' ह्यारा से लड़ा ( त्रिशूल ) भलक छ बालू रेत माँई जी ' द्वारा अभिव्यक्त हुई है । २७६

पृष्ठ 350

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 350 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान ( ५ ) - भरण बरज भोमियाँ, थाँकी भण बरज जी, उस चाँबल पर ० ॥

( ६ ) - नहीं हाँला भरण ए झारी नहीं हाँला ए ।

ह्यारी चढ़ी सवारी ० ॥

( ७ ) —जोय बरज भोमियाँ थाँकी जोय बरज जी, ( 5 ) - नहीं हाँला गोरी ए हो नहीं हाँला ए, उस चाँवल पर ० ॥ ह्यारी चढ़ी असवारी ॥ ६-( १ ) - हे भौमदेवता! आपके पिता माता आपको रोक रहे हैं । इसलिए आप ( हमारे नगर की ) नदी उस पार ( भी ) न जायें । उस मायावी देश में श्राप न जायँ, उस सर्प क्रीड़ा ** करने वाली के देश में आप न जायँ । ( २ ) हे पिता, हे माता! अब हम यहाँ नहीं रहेंगे, ( नहीं रह सकते ) | हमारा सैन्यबल अब सज्जीभूत हो गया है, हम अश्वारूढ़ बन चुके हैं ( घोड़े चढ़ चुके हैं, ) अब हमें 1. हमारा सैन्य हो प्रिय लग रहा है । हमारे अस्त्र शस्त्र इस बालुकायम तेज में चमक रहे हैं । हमारे सहचर चम्पाबाग में खड़े हुए हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं । हमारे विजय का निनाद - उद्घोष - चतुर्दिक व्याप्त हो चला है ( ऐसी स्थिति में हम अब अधिक इस गृह में कैसे ठहर सकते हैं ) । ( ३ ) -हे भौमदेवता! आपके भ्राता, आपकी भ्रातृपत्नी आपको रोक रहे हैं । इसलिए तो आप रुकें । ( ४ ) — भ्राता भ्रातृपत्नी! हम वस्तुतः अब नहीं रुक सकते ० । ( ५ ) - हे भौम देवता! ( देखिए ) ये आपकी कनिष्ठ बहिनें आपसे आग्रह कर रहीं हैं कि, आप थोड़ी देर और ठहर जायँ । ( ६ ) - हे प्रिय-भगिनियों! ( तु बताओ! ) अब हम कैसे ठहर सकते हैं । ( ७ ) - हे भौमदेवता! ( उधर देखिए ) वह आपकी पत्नी आपसे रुक जाने का आग्रह व्यक्त कर रही है ( इसलिए तो आप रुक जाइए! ) ( ८ ) - हे पत्नी! ( तुह्मी सोचो तो भला कि, इस साज सज्जा के अनन्तर भी ) क्या कोई पुरुष ( पत्नी कर्षण से ) घर में रहा है? ( निष्कर्षतः भौम देवता को दक्षिणपथानुगमन करना ही है ) । पूर्व में सांख्याभिमत पितृपरिवार का स्वरूप विश्लेषण किया जा चुका है - ( देखिए पृष्ठ संख्या २२४........ ) । चान्द्रसम्वत्सरात्मक द्युलोक चतुद्दशविधं भूतसर्ग का पिता है, चान्द्री पृथिवी माता है, पार्थिव मूलरुद्र ज्येष्ठपुत्र स्थानीय ( जिनके चतुर्दशविध गणात्मक - परिवारात्मक विभाग हैं ) भौमपितर हैं । शेष पार्थिवसर्ग कनिष्ठभ्राता भ्रातृपत्नियाँ, स्वसृवर्ग ( भगिनियाँ ), एवं पत्नियाँ हैं । इन सबके 1. माध्यम से ही लोकभावनानुगता - लोकमान्या - आग्रह भावना के माध्यम से कुलस्त्रियाँ कुछ समय के लिए ( मूर्त्तिस्थापनावधिपर्यन्त के लिए ) और यहाँ रोक लेने की भावना अभिव्यक्त कर रहीं हैं, आठ * दिति - प्रदितिमूलक सुप्रसिद्ध ' सौपर्णाख्यान ' में असुरमाता दिति दक्षिण में प्रतिष्ठित है, एवं वह सर्वप्राणमयी है । इसी आधार पर ' काला खेलणी र देस ० ' इत्यादि भाव अभिव्यक्त हुआ है । २८०