Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 351–360

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 351–360

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आप: -ऋणमोचनोपायोपनिषत् - मृत्-पद्यात्मक महासङ्गीत से | ' अष्टाक्षरा वै गायत्री - या वै सा गायत्री ग्रासीदियं वै सा पृथिवी ' १ | ४ | १ | ३४ | -- ' ' ) रूप से: - फेन - मृत् - सिकता - शर्करा - अश्मा - श्रयः -- हिरण्यरूपा श्रष्टावयवा ( शत ० पृथिवी ( भूमि ) गायत्र श्रष्टावयव - सम्पत्ति से युक्त है । पार्थिव भौम पितर भी इस दृष्टि से अष्टावयव - सम्पत्ति से युक्त हैं । संख्यासम्पत् के संग्रह के लिए इस सङ्गीत में आठ पद्य समाविष्ट हुए हैं । # दक्षिणादिक् असुर - राक्षसप्राणों का आवासस्थानं दिकू - माना गया है । ये हमारे गृह्य भौम पितर दक्षिण की ओर वायव्यप्राणरूपेण - शरीरेण - आक्रमण करने वाले असुर - राक्षस - नाष्ट्रा गणों की दक्षिणदिशा की ओर उन्हें जाते हुए नष्ट करते हुए हमारे ( इनके अपने हीं ) परिवारों का संरक्षण करते रहते हैं ÷ । भौम पार्थिव पितर इह्रीं आरसुभावों को शीघ्र से शीघ्र परास्त कर हमारे परिवारों को सुरक्षित 4. बनावें, यही कामना शस्त्रास्त्रसुसज्जित भौमपितर के मुख से अभिव्यक्त कराई गई है । --६-( ७ ) - कुलानुगता महासती के संस्मरणात्मक महासङ्गीत की सप्तम पावन स्मृति ( 2 ) - सत्ती क दरबार चम्पा फूल रही ह्यारी ह्माय ( २ ) - यो कुरण तोड़ फूल, या कुरण हार गूँथ झारी माय ( ३ ) - हरिचन्दरजी तोड़ फूल राख्याँ हार गूँथ झारी माय ( ४ ) - गुँथ्यो ए गुँ थायो हार सत्ती के सीस चढ़ झारी माय ( ५ ) - परभवानी माय हो थारा सेवक छाँ झारी माय -परसत्ती झारी माय यो बक्सीस झारी माय * देवा अभियुः - नो यज्ञ दक्षिणतो रक्षांसि नाष्ट्रा न हन्युरिति ( शत ० -७- । १।३७१ ) । ÷ दक्षिण दिशा की ओर से आसुरप्राण आक्रमण करता रहता है । अतएव भारतीय वास्तुशास्त्र में विहित प्रासादनिर्माण - शिल्प में दक्षिण की ओर द्वार रखना सर्वथा निषिद्ध माना गया है । नैगमिक आम्नाय के अनन्य संरक्षक जयपुर निर्माता स्व ० श्री जयसिंहनृपति ने वास्तुशास्त्र के आधार पर ही जिस जयनगर का निर्माण कराया था, जिस जयनगर के चारों ओर परकोटा. द्वार निर्मित हुए थे, जिसके नवों द्वार दक्षिणादिकू के श्रभिमुख्य से संस्पृष्ट रहते हुए आसुराक्रमण - भय से उन्मुक्त थे, -जयनगर की वह नैगमिकता यवनसंस्कृतिनिष्ठ एक यवन ( मिर्जा इस्माइल ) के मन्त्रित्व में छिन्न भिन्न हो गई, दक्षिण की ओर द्वार निकलवा दिए गए, जिसका - दर्शक रूप से अवलोकन करता रहा आम्नायस्वरूप संरक्षक यहाँ का सामन्त क्षत्रियबन्धुसमाज । तभी से जयपुर का नैगमिक वैभव? - ' ' । २८१

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श्राद्धविज्ञान जयपुर प्रान्तीय शेखावाटी के लोकगीतों में ' सतीराणी ' के रूप से महामान्यता प्रचलित है । वहाँ सतियों के सुविशाल मन्दिर भी निर्मित हैं । लोकगीत नामक प्रकाशित ग्रन्थ में उसके सम्पादक-प्रकाशक ने यह मान्यता - व्यक्त की है कि, " यह राणीसती अग्रवाल जालान वंश में कोई साढ़े छः सौ वर्ष पूर्व हुई थी । इन की भस्मपर भूझणू में मन्दिर बना हुआ है " ( देखिए राजस्थान के लोकगीत, प्रथमभाग २२ पृष्ट ) । आस्थायुक्त श्रद्धा से हम इस मान्यता का समादर कर रहे हैं । किन्तु ' सती ' शब्द की केवल यही व्याख्या हमारी श्रद्धा की अवसानभूमि नहीं है । नैगमिक आम्नाय के अनुसार,, तदनुगत मानवधर्म्मशास्त्रानुसार तो स्त्रीमात्र सती है, महासती है । शरीरतः नारी सामान्या बनी रहती हुई भी यह अपनी अभ्यन्तर दैवी प्रकृति से ' माता ' है, आराध्या है, पूज्या है | स्त्री अपने आभ्यन्तर सहज प्रकृतिभाव से देवी है, सती ही नहीं, महासती है । ' पु'श्चली - कुलटा - असती - स्वैरिणी - दुष्टा- ' आदि उपाधियों का सर्जन हुआ है एकमात्र मानव के अपने दोष से । ' न स्वैरी स्वरिणी कुतः ', इत्यादि महाराज केकयोक्त औपनिषद सिद्धान्त के अनुसार स्वैरी पुरुष ही नारी को स्वैरिणी बनाता है । इसी आधार पर - ' न स्त्री जारेण दुष्यति ' इत्यादि स्मार्त सिद्धान्त स्थापित हुए हैं । अतएव मानवधर्म्म-शास्त्र में स्त्री सर्वात्मना ' अदण्ड्या ' घोषित हुई है । जैसे अदिति गौमाता अघ्न्या है, तथैव प्रदितिमातृ-स्वरूपा नारी सदा ही अदण्ड्या - पूज्या - मान्या - सती है, और यही ' सती ' शब्द की नैगमिक व्याख्या है, नैगमिक थाम्नाय है । प्रत्येक कुल की दिवंगत, तथा वर्त्तमान सभी नारियाँ सती हैं, जिनके अनुग्रह से पारिवारिक आम्नाय अद्यावधि सुरक्षित है । वर्त्तमान में इनके स्वरूप में जो दोष आगए हैं, उन सब ' का एकमात्र उत्तरदायित्त्व पुरुष पर ही अवलम्बित माना जायगा । सर्वगुण सम्पन्ना भी पत्नी [ स्त्री ] पतिदोष से [ पुरुषदोष से ] दोषयुक्ता बन जाती है । थै गुणहीना भी स्त्री पुरुषगुण से गुणवती बन जाती है । इस प्रकार स्त्री के गुणदोषभाव पुरुष के गुण-दोषों पर हीं अवलम्बित हैं । उदाहरण- क्षारसमुद्र, और मधुसमुद्र | स्वादूदका [ मिष्टजला ] भी नदी क्षारसमुद्र में जाकर चारा बन जाती है, एवं क्षारा भी नदी स्वादूदक समुद्र में जाकर मिष्टजला बन जाती है । ऐतिहासिक तथ्य है कि अधमयोनिजा [ निम्नकुला ] भी ' अक्षमाला ' स्त्री वसिष्ठं महर्षि के सहधर्म्माचरण से, चटका शारङ्गी स्त्री मन्दपालऋषि के सहवास से लोकपूज्या बन गई । स्पष्ट है कि नारी सहजरूप से ' नीराकारा ' है, निर्दोषा है । इसके गुणदोषभाव उसी प्रकार स्वस्व - भर्तृ गुण - दोष -तारतम्य पर ही अवलम्बित हैं, जैसे निर्मलाकार नीर - ' यद्यत् स्वरूपमादत्ते, तेन तेन स युज्यते ' के अनुसार तत्तदाकाराकारित तत्तत् क्षुद्र - महान् [ छोटे - बड़े ] पात्रों के सम्बन्ध से तत्तत् क्षुद्र - महान् आकारों में परिणत हो जाता है । नारी ' आपो नारा इति प्रोक्ताः ' के अनुसार 6 नारा ' [ आप: -A ] ही है । इसी धार पर हमारे अम्नाययुक्त प्रान्त में रुष्ठु कुलवृद्धस्त्रियाँ कनिष्ठ नारियों को उनके वास्तविक ' नारा ' [ आप: रूप निर्मल ] स्वरूप का परोक्षरूप से उद्बोधन कराती हुई कहा, करती हैं- " अर " नारा ' बैठी र छोनी र चुपकी र, कोई सुग लो तो आपणी काँई बड़ाई २८२

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् कर लो " | ' नारा ' रूप निर्मल आपः [ सौम्य पारमेष्ठ्य - पवित्र ' अम्भः ' ] ही ' नारी ' का स्वरूपारम्भक है, और इस स्वरूप से प्रत्येक नारी - पत्नी - माता - भगिनी - कन्या - सब सतियाँ हैं, महासतियाँ हैं । देखिए - मनु क्या कह रहे हैं इस सम्बन्ध में ---( १ ) - यागगुणेन भर्त्रा स्त्री संयुज्येत यथाविधि । गुणा सा भवति समुद्र व निम्नगा ॥

( २ ) - क्षमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा ।

शारङ्गी मन्दपालेन, जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥

- एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।

उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भट गुणैः शुभैः ॥

- मनुः ६।२२, २३, २४ । सती नारी के ज्ञात - अज्ञात सम्पूर्ण दोष नारी के नहीं, अपितु पुरुष के दोष हैं । नारी तो. आदियुग से प्रलयपर्यन्त सती ही रहेगी । पारिवारिक सत्ता ही पुरुष की सत्ता है । पुरुषसत्ता ही पुरुष, का ' सद्भाव ' है, जिसकी मूल प्रतिष्ठा बनती है एकमात्र नारी । इस सद्भावप्रदान से भी नारीमात्र ' सती ' ( सद्भावप्रवर्त्तिका ) ही है । रात्रिजागरण में सती कुलस्त्रियाँ अपने कुल की स्वर्गीय प्रेतभावा पन्ना सती नारियों का ही स्तवन कर रहीं हैं इस महासङ्गीत के द्वारा, जिनके अनुग्रह से यह रात्रि-जागरणात्मिका पितृकर्मनिबन्धना आम्नायपरम्परा चली आ रही है इनके परिवार में । " चम्पा पुष्पमाला से मांतासती ( कुलानुगता दिवंगता प्रोतभावापन्ना सतीनारी ) का श्रातिथ्य सङ्गीत से अभिव्यक्त हुआ है । महासती के पितृपरिवारात्मक साम्राज्य वैभव ( दरबार ) में चम्पा -पुष्प विकसित हो रहे हैं ( खिल रहे हैं ) । ये कौन चम्पा पुष्प तोड़ रहा है?, ये कौन इन चम्पापुष्पों के हार ( माला ) बना रहीं हैं? । हमारे कुल के ज्येष्ठ श्रेष्ठ कुलपुरुष मिश्र हरिश्चन्द्रजी शास्त्री पुष्प तोड़ रहे हैं, उनकी धर्मपत्नी हार बना रहीं हैं । यह सूत्र प्रोत चम्पकहार माता सती के मस्तक पर हम चढ़ा रही हैं । माता सती भवानी इसे धारण कर रहीं हैं, ( पहिन रहीं हैं - पर भवानी माय ) । हे माता! हम सब आपके सेवक हैं । हे सती माता! यह पुष्पहार धारण करें आप, एवं हमें ( आपके वंश को ) श्री प्रदान करने का अनुग्रह करें । ' इत्यादि अक्षरात्मक सङ्गीत में केवल ' चम्पकपुष्प ' का आम्नाय विजिज्ञास्य है । आम्रवृक्षवत विशाल पर्णवाला सुप्रसिद्ध ' चमाकवृत्त ' ही ' चम्पा का पेड़ ' है, जिसके पीतवर्ण पुष्प आते हैं इनमें बड़ा ही मन्दगन्ध - आकर्षक - गन्ध ( भीनी भीनी - मनोमोहक सुगन्धी - सुगन्ध - ) रहता है । यह पुष्प शिवशक्ति की आराधना में विशेषरूप से ग्राह्य माना गया है । ' यत् पीतचं, तत् २८३

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श्राद्धविज्ञान पितॄणाम् ' ( शत ० वा ० ) के अनुसार पीतवर्ण पैत्र वर्ण माना गया है । अतएव पीतपुष्पानुगत चम्पकवृक्ष पैत्रकर्म्म में संगृहीत हो गया है । ' द्वारा साथीड़ा ऊभा छ चम्पाबाग में जी ' इत्यादि रूप से षष्ठ महासङ्गीत में भी चम्पक का समावेश इस पितृभाव से ही हुआ है । ' चाम्पेयरम्पको हेमपुष्पकः ' ( अमर ० २ | ४ | ६३ | ) से चाम्पेय ( चम्पापुष्प ) का हेमवत्त्व प्रमाणित है । एवं निम्न लिखित आगमवचन चम्पकचतुर्दशी ( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी ) तिथि में विहित शिवशक्त्यारावनारूप से इसका संग्राहक बन रहा है । देखिए!

चतुद्दश्यां च शुक्लायां ज्येष्ठे मासि महेश्वरम् ।

चम्पकैः पूजयेद् भक्त्या शिवलोकमवाप्नुयात् ॥

-उत्तरकामाख्यातन्त्र ११ वाँ पटल चम्पकपुष्पहार से सम्मानित कुलसतीवर्ग के अनन्तर इनका इनके द्वारा कुलाम्नाय ( कौलिक ना ) के आधार पर प्रक्रान्त रात्रिजागरणात्मक पितृकर्म में अवशेष रहा है ' पितृभूतस्थापनात्मक ' ( पितृमूत्तिस्थापनात्मक ) केवल एक कर्म्म, जिसके लिए इस सतीसम्नानात्मक महासङ्गीत के अनन्तर ही हमें पावन करने के लिए हमारे मानस धरातल में उदित होगी अष्टम पावन स्मृति, जिसे अभिव्यक्त होने से पूर्व हम सप्तम स्मृति के दो लोकविकल्पों का भी प्रासङ्गिक दिग्दर्शन करा देते हैं । सती सम्मानात्मक सप्तम महासङ्गीत के प्रान्तभेद से -6 विविध विकल्प उपश्रुत - उपवर्णित - उपगीत हैं । उनमें से प्रसङ्ग धिया दो महासङ्गीत यहाँ उद्धृत कर दिए जाते हैं । इनमें प्रथम विकल्प सतीपरम्परा का सामान्यरूप से विकल्प है । एवं द्वितीय विकल्प कुलस्त्री में जो मुख्य स्त्री पुत्रादिकामना - रक्षा-वृद्धि - कामना से जागरण करती है और वह यदि अपने पति की द्वितीया पत्नी है- प्रथमापत्नी यदि प्रतपितृभाव में परिणत हो गई है तो उस अवस्था से सम्बंन्ध रखता है । अतएव इस द्वितीय विकल्प को शेखावाटी प्रान्त में ' पितराणी ' कहा गया है । श्रूयताम्! ( ७ ) — सतीसंस्मरणात्मक सप्तम महासङ्गीत के प्रथम विकल्प की सप्तम पावनस्मृति - ( १ ) ( १ ) - कुरण चुरायो थारो देवरो माता! कुण तो लगाई ( २ ) - राजा चुणायो थारो देवरो माता! परजा लगाई जगजनींव | जगजनींव | ( ३ ) - ये कुरण गाती थार आवसी माता! ये कुरण ल्याव थार भेट । ( ४ ) - राण्या गाती आवसी थार माता! हरीचन्दरजी ल्याव थार भेट ।

( ५ ) - सासू बहू थार श्रावसी माता! घोर जिठाण्याँ ल्याव थारी भेट ।

( ६ ) -- गोद जडूला ल्याव थार पूत ०! ए झारी झाय ॥।

.१. २८४

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ७ ) पितृराज्ञो ( पितराणी ) संस्मरणात्मक महासङ्गीत के द्वितीय विकल्प की सप्तम पावनस्मृति ( २ ) ( १ ) - इन्दर लोकाँ स झारा जीजीबाई ऊतरथा जी, कोई बड़त लियो छ मुकाम, मारा जीजीबाई ० । 1- आज छोटी क जी बड़ी या पाँवरणाँ जी, ( २ ). चोकी तो चन्नरण जीपर द्वारा जीजीबाई बेठियाजी । ( ३ ) - चाँवल तो राँधाँ ऊजला जी, हरिया तो मूँगाकी दाल जी, बीजापुर को बीजों जी, गढ़ मथुरा को थाल जी, की को थाँका थालमें जी द्वारा जीजीबाई ० । ( ४ ) - मूँगफली सी थाँकी श्राँगल्याँ जी जीजीबाई, दाय सिरसा दाँत जी झारा जीजीबाई, थे तो जीमो जी द्वारा जीजीबाई द्वारा हाथ से जी, द्वारा जीजीबाई ० । ( ५ ) जीम्याँ जी चूँख्या जीजीबाई पाट'रम रह्या जी, सोबान मान ठोर बताए ह्यारी छोटी भरण ए, रब ने मान ठोर बताए मारी छोटी भरण, द्वारा जीजीबाई ० । ( ६ ) - थे तो सोओ द्वारा जीजीबाई थाँका राजालम जी, थाने बीजणी दुलायाँ मारा जीजीबाईजी, रमज्यो रमज्यो जी लाँ में मारा जीजी बाई, झारा जीजीबाई ० । ( ७ ) -थे ही सो ओ हारी छोटी भए द्वारा हालाँ म जी, थाने ही दियो छ े तो अम्मर सुहाग जी, तो अब जास्याँ इन्दर लोकों में झारी भरण ए, द्वारा जीजीबाई, इन्दर लोकाँस मारा जीजीबाई ॥ दोनों विकल्पों का अर्थ स्पष्ट है । ( १ ) - हे सती माता! आप के मन्दिर का निर्माण किसने किया है? । किसने इस की सुविस्तृत ( अजगज ) नींव ( शिलान्यास ) लगाई है? | ( देशाधिपति -. आम्नायसंरक्षक - धर्मरक्षक ) राजा ने तो अपने हाथों मन्दिर का निर्माण किया है, एवं प्रजाने इसका शिलान्यास किया है, नींव भरी है । है माता! ये कौन आपके गाती ( और बजाती ) आवेंगी ( रहीं हैं )?, हे माता ये कौन आपके भेट - पूजनपरिग्रह लावेंगे ला रहें हैं )? । कुलसाम्राज्ञियाँ ( कुलवधूवर्ग ) आपके मङ्गलगान करती हुई आयेंगीं ( आरहीं हैं ), एवं कुल ज्येष्ठ श्रेष्ठ पुरुष मिश्र हरिश्चन्द्रजी प्रमुख सम्पूर्ण पुरुषवर्ग आपके भेट पूजन परिग्रह लायेंगे ला रहे हैं ) । हे माता सासुएँ, २८५

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श्राद्धविज्ञान बहुएँ, आपके आवेंगी ( यों ही परम्परया सदा ही आती रहेंगीं ( आती रहतीं हैं ), देवररानियाँ. ( द्यो रानियाँ, ) जिठानियाँ ( यों ही सदा ही ) आपके भेट लातीं रहेंगी ( लातीं रहतीं हैं ), इन सब कुलस्त्रियों की गोद में हे माता! चूड़ायुक्त ( जड़ लायुक्त केशपाशयुक्त ) बालक रहते हैं, इन्हें साथ-गोद में लेकर ये आपके ( जड़ ू ला उतारने ) आतीं रहतीं हैं ( क्यों कि हे माता! ) हे मेरी करुणामयी मातां! ( आपके निःसीम अनुग्रह से ही तो इन कुलस्त्रियों की गोद भरी हुई रहती है )! | द्वितीय विकल्प का भाव बड़ा ही करुणापूर्ण है । कुलपुरुष की पूर्व स्त्री मर चुकी है, इसने दूसरा विवाह कर लिया है । इस के सन्तति हो गई है । यह अपने रात्रि जागरण में अपने पति की पूर्व पत्नी को ( जो प्रतभाव में परिणत होकर प्रेत लोक में पितरपरिवार के साथ निवास कर रही है, बड़े ही आत्मीय भाव से, - ' झारा जीजीबाई ' ( ( मेरी बड़ी बहिन ) इस भाव से उनका भी आमन्त्रण करती है । इह्रीं के आतिथ्य का इस विकल्प में गान ( विस्तार ) हुआ है । " ( २ ) - ( १ ) --मेरी बड़ी बहिन ( इस अपनी छोटी बहिन के द्वारा सम्पादित पितृकर्म में आशी: प्रदान करने ) इन्द्रलोक से उतरे । वहाँ से उतर कर सर्वप्रथम उन्होंनें ( ग्रामोपान्त्यप्रदेश में स्थित ) वटवृक्ष की छाया में / जो कि वृक्ष इनका पार्थिव वासग्रह है ) विश्राम लिया । वहाँ से चलकर ( २ ) - मेरी बड़ी बह्नि आज ( चतुर्दशी की रात्रि में ) इस अपनी छोटी बहिन के अतिथि बने हैं । मैनें दूध से उनके चरणकमल धोए हैं ( जो प्रथम आतिथ्यक माना गया है ) । ( ३ ) - मैनें इनके लिए वेत चाँवल, हरित मुद्गदाल सम्पन्न की है । बीजापुर का सुप्रसिद्ध पङ्खा मँगाया है, मथुरा का सुप्रसिद्ध थाल मँगाया है, इस में चाँदी की कटोरियाँ सजाई हैं । ऐसे पात्रों में इनके लिए मिष्टान्न सहित दालभात का पर्यवेषण- ( परोसा गया ) हुआ है ४ ) - हे मेरी जीजी बाईजी । आप के ( हाथों की अँगुलियाँ ) बड़ी ही सुडौल हैं ( जिनसे आप नैवेद्य ग्रहण करने वालीं हैं ) । आप की दन्तोवली दाड़िम - फलवत् बड़ी ही मनोहर है ( जिस से आप गलाध: करणानुकूल - व्यापाररूप भोजन करनें वालीं हैं ) । हे मेरी बड़ी बहिन! अब आप ( अपने हथ के साथ साथ ) मेरे हाथों से भी भोजन कीजिए ( जो मेरे हाथ भी आपही के स्थान पर आने के कारण आपही के हाथों के प्रतीक हैं ) । ( ५ ) - ( जीजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक भोजन कर लिया ) - भोजन जलपानादि कर्म से निवृत्त होकर जीजीबाई ( यहाँ के आवासस्थानरूप ) पितृ - पट्ट पर विश्राम कर रहे हैं । इन्होंने मुझसे यह कामना प्रकट की कि, हे छोटी बहिन! अब मुझे तुम शयन का स्थान बताओ -( परीक्षा लेने की दृष्टि से कि, कहीं मुझ बड़ी से इस छोटी को ईर्ष्या तो नहीं है- ' मैनामन्योऽद्राक्षीत्-रूपा ' ) । हे बहिन हमें रमरण के लिए अनुरूप स्थान बताओ । ( ६ ) - हे मेरी जीजीबाई! ( यह आपने क्या कहा ) आप अपने राजमहल में ( जहाँ भौतिक शरीर मेरे आगमन से पूर्व आप ही सोते थे - अतएव जो आज भी आपही का महल है ) शयन करें । मैं आपको पंखा झलू गीं । इस प्रकार आप अपने ही राजमहल में रमण करें । ( ७ ) - गद्गद हो पड़ीं पितुराज्ञी - देवलोकवासिनी बड़ी २८६

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् बहिन छोटी की इस भावना से, परीक्षा समाप्त हुई, छोटी बहिन परीक्षा में सर्वात्मना समुत्तीर्ण होई । इस भाव से अन्तरात्मना तुष्ट तृप्त बड़ी बहिन गद्गद होकर कहने लगी कि ) हे मेरी छोटी ( लाडली ) बहिन! तुम्हीं मेरे महलों में शयन करो । मैनें तुम्हें ही ( अपना शरीर छोड़ने के अनन्तर ) अपनी ओर से अमर सौभाग्य प्रदान कर दिया है । अब तुम हमें जाने दो ( अपनी प्रेतयोनिमर्यादा के अनुबन्ध से अब ( अधिक हम समय यहाँ नहीं ठहर सकतीं ) अबतो हम अपने इन्द्रलोक में हीं जायेंगे ” । विकल्पद्वयात्मक इस सप्तम पावन स्मृति के अनन्तर हमें पवित्र करती हुई उदित होर ही है-( ८ ) - पितृ मूर्तिस्थापनानुगत महासङ्गीत की अष्टम पावनस्मृति-( १ ) - ह्यारा राय खाती का र, तू तो चतर सुजान! बिराणीहार, झार पाटड़लो घड़ल्यार बिराणीड़ा । ( २ ) - ह्मार - पित्तर बाबा जोगो, बड़वासरण माता जोगो, ध्याड़ी माता जोगो, हणमत बाबा जोगो, भैंरूँ बाबा जोगो, देई देवताँ जोगो, पाड़लो घड़ल्या र बिराणीड़ा । ( ३ ) - ह्यारा राय खाती बाबा, तन करड़ कसार, बिराणीड़ा, मारो खाता माई जोग लचपच लापसीर, बिगड़ा । ( 8 ) 1- द्वारा राय खाती का र! तन पचरंग पाग बिराणीड़ा, झारी खातरण जोगी भो रँग चूँ दड़ी जी । ( ५ ) - झार खाती बाबा जोग मुरकी पराय, बिराणीड़ा, खात जोगी तिलड़ी, टेवटो जी, ( ६ ) ) - द्वारा खाती बाबा तूतो मन ' पाटड़ - ' पाटड़ी ' र । खाती बाबा तो ल्यार ' सोना पातड़ी ' र ।

ह्यारा खाती बाबा तूतो ल्यार ' पितराँ पातड़ी ' र ।

" पितराँ पातड़ी जी, पितराँ पातड़ी जी " ॥

÷ विवाहकर्म में भी काष्ठपट्ट स्थापित होता है । पाटा और चोपड़ा, दोनों घर का खाती ही घड़कर लाता है, एवं इस कर्म के लिए, तथा मण्डपानुगत तोरण - थाम के लिए गृह्य रथकारदम्पती सम्मानित किए जाते हैं । वहाँ भी इसी प्रकार का लोकगीत गाया जाता है । किन्तु वहाँ ' झार पितर बाबा जोगो ' के स्थान में ' मार बिंदायक बाबा जोगो ' का समावेश होता है । ओर भी कई स्थानों में परिवर्तन होता है, जो तद्गीत में ही द्रष्टव्य है । २८७

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श्राद्धविज्ञान वृद्धातिवृद्ध प्रपितामह, अतिवृद्धप्रपितामह, वृद्धप्रपितामह, प्रपितामह, पितामह, एवं पितुःश्री-बालचन्द्रशास्त्री पर्य्यन्त षटूपितृषट् की नैदानिक सुवर्ण प्रतिमा रथकार द्वारा निम्मित होती है, जिस पितृषट्कसम्पत् संग्रह के लिए प्रस्तुत महासंगीत में ६ पद्य समाविष्ट हुए हैं । वैसे सुवर्ण-रत्नादि की प्रतिमा - आभूषणादि बनाना ' सुवर्णकार ' ( सुनार ) का कर्म माना गया है, एवं काष्ठ-पट्टादि कर्म्म ‘ रथकार ' ( खाती ) का माना गया है । किन्तु इस पितृकर्मात्मक सौम्य पावन कर्म भी में उपयुक्त काष्ठ पट्ट जहाँ रथकार से निम्मित है, वहाँ - स्वर्णकारकर्मानुगत स्वर्णमूर्ति का निर्माण रथकार के द्वारा ही विहित हुआ है । कारण स्पष्ट है । आकाररूप, और वर्णरूप, दोनों के लोककर्म्म -कर्त्ता क्रमशः रथकार, एवं पेशस्कार कहलाएं हैं । ये ही दोनों लोकभाषा में ' खाती - सुनार ' कहलाए हैं । दोनों में रथकार श्रेष्ठ इस लिए माना गया है कि, यह माहिष्यपुरुष से करिणीस्त्री में उत्पन्न होता हुआ द्विजाति - भावानुरूप से समन्वित होता हुआ पेशस्कारादि इतर प्रतिलोमसंकर - जातियों की तुलना में पावन है, पवित्र हैं, शुचिभावापन्न है । अतएव इसे अपशुद्राधिकरण में अग्न्याधानादि { कतिपय श्रौतकर्मों का, एवं परिणित स्मार्त्त कम्मों का अधिकारी मान लिया गया है । इसी शुचिता के कारण पितृकर्म में रथकार से ही पट्ट और पातड़ी बनवाए जाते हैं । बिना - मस्तक - हस्त पादादि शरीरावयों की केवल पट्टिकामात्रा पितृप्रतिमा ही पितृकर्म में ग्राह्य है । प्र ेत का केवल बाह्य आकार ही ग्राह्य बन सकता है, जीवित मानवाकार नहीं । यह आकार-भाव ही ' नैदानिकप्रतिमा ' कहलाई है, जिसे प्राकृतभाषा में ' पितरों की पातड़ी ' कहा जाता है । - " स्त्रीखं प्रमदे कुमारीपुत्रं मेधायै रथकारं धैर्य्याय तक्षाणम् " ( वा ० सं ० ३०।६ । ) इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए भाष्यकार महीधर ने कहा है- ' रथकारं माहिष्येण करिण्यां जातम् ' । क्षत्रियपुरुष से वैश्या स्त्री ( बनियानी ) में उत्पन्न पुत्र ' माहिष्य ' कहलाया है, एवं वैश्यपुरुष से शूद्रास्त्री में उत्पन्न कन्या ' करणी ' ( हस्तिनी ) कहलाई है । इस माहिष्य संकरपुरुष से करिणी संकरा स्त्री में उत्पन्न सन्तति ‘ रथकार ' कहलाई है ( याज्ञवल्क्यस्मृति, ४,६५ ) स्मार्त्ताचार्य शङ्ख के मतानुसार रथकार के इज्या - दान - उपनयन आदि मान्य हैं, जैसाकि स्मृति वचन से प्रमाणित हैं-' क्षत्रिय - वैश्यानुलोमान्तरोत्पन्नो यो रथकारस्तस्य - इज्यादानोपनयनसंस्कारक्रिया, अश्व-प्रतिष्टारथसूत्र वास्तुविद्याध्ययनवृत्तिता च " ( शङ्खस्मृतिः ) । मिताक्षराकार ने भी कहा है- ' एवं ब्राह्मणक्षत्रियोत्पन्नमूर्धावसिक्तमाहिष्यादनुलोमसंकरे जात्यन्तरता उपनयनादिप्राप्तिश्च वेदितव्या तयोर्द्विजातित्त्वात् " । रथकार शब्द की जात्यनुगता मीमांसा का मुख्य प्रयोजन है महासङ्गीत में पुनः पुनः पठित ' विराणीड़ा ' शब्द, वैश्या ( बनियानी-वणिक स्त्री ) ही प्रान्तीय भाषा में ' बिराणी ' कहलाई है । ' बामण - बाण्या ' और ' बामणी - बिराणी ' युग्म प्रसिद्ध है । माहिष्य पुरुष ही रथकारजाति का मूलप्रवर्त्तक है । माहिष्य की उत्पत्ति हुई है क्षत्रिय के शुक्र एवं वैश्या ( बिराणी ) के योनिस्थानीय शोणित के दाम्पत्यभाव से । ' बीजाद्योनिर्बलीयसी ' सिद्धान्त प्राकृतिक है । अतएव माहिष्य ' क्षत्रियपुत्र ' न कहलाकार ' वैश्यापुत्र ' ( बरियारी का पुत्र ) ही कहलाएगा । यही वैश्यापुत्र माहिष्य क्योंकि रथकार का मूलप्रवर्त्तक है, अतएव इसे भी वैश्यापुत्र ( माहिष्य ) के पुत्र होने से ' वैश्यापुत्र ' ( बिराणीड़ा ) ही कहा जायेगा । २८८

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 359 का मूल पृष्ठ
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् अब दो शब्दों में महासङ्गीत के अक्षरार्थ का भी समन्वय कर लीजिए । ( १ ) - हे मेरे सम्मानित रथकार! तुम बड़े चतुर ( शिल्पी - कारीगर ) हो, साथ ही सौम्यत्वभाव ( सुजान, अतएव सौम्य पितृकर्म के अनुरूप ) । हे बिराणीड़ा! ( श्यापुत्ररूप से मूलदृष्ट्या प्रख्यात - देखिए इसी महासङ्गीत की टिप्पणी में इस शब्द का निर्वाचन ) तुम मेरे इस पितृकर्म के लिए काष्टपट्ट घड़लाओ । ( २ ) – ( यह ध्यान रहे कि ) यह पट्ट पितरों के, बटुवासिनी माता के, ध्याड़ीमाता के, महावीर के, भैरूँ के, ओर ओर भी समस्त पितृपरिवारानुगत- पितृदेवता ( देवता ) और पितृपत्नियों ( देई - देवी ) के अनुरूप ही हो । ( ३ ) -इसके उपलक्ष में मैं तुझे ' करड़कसार ' ÷ से सम्मानित करूँगी । तुह्यारी पत्नी को घृताप्लुत. लचंपच ) लापसी से सम्मानित करूँगी । ( ४ ) - तुम्हें पंचरंग उष्णीष ( पगड़ी ) दूँगी, तुह्मारी पत्नी को विविधरंगरञ्जित पीतवस्त्र ( पोला - चूँ दड़ी - जिसे पैत्रवस्त्र माना गया है ) । ( ५ ) - तुम्हारे कानों में मुर्की ( कुड़की ) पहिनाऊँगी, तुम्हारी पत्नी को कण्ठी ( गले की तिलड़ी - त्रिगु-रिणता - त्रिवलिता गलमाला ) और पचमण्या ( टेवटा ) पहिनाऊँगी । ( ६ ) - अब ( इन सर्वविध सम्मान परिग्रहों से सम्मानित - तुष्ट - तृप्त होकर ) हे रथकारबाबा! मुझे पट्ट के लिए ' पट्टप्रतिमा ' - ' पितृ-प्रतिमा ' - ' पितर प्रतिमा ' ला दे " ( अ ) यह पितरों के लिए प्रतिमा है, यह पितरों के लिए प्रतिमा है ( प पड़ी जी, पितराँ पातड़ीजी ) । कुलस्त्रियों के द्वारा महता समारम्भ से यह पितृप्रतिमास्थापन कर्म्म सम्पादित हुआ है । इस कर्मकाल में सब स्त्रियाँ ( सौभाग्यती स्त्रियाँ ) सावधान बन जाती हैं । दीपक को सँभालती हैं, * हमारी कुलदेवी जहाँ वटवासिनी है, वहाँ विभिन्न अन्य कुलों की मान्यता के अनुसार विभिन्न भी कुलदेवियाँ हैं । कुलदेवी का सामान्य नाम है - ' ध्याड़ी माता ' । अतएव जिस अवसर पर कुलदेवी का कौलिक नाम स्मृत नहीं होता, वहाँ ' ध्याड़ी ' अभिधा का सन्निवेश हो जाता है । ' ध्यात-ध्यान ' ही ' ध्याड़ी ' शब्द के निर्वचनार्थ हैं । - गोधूमचूर्ण को घृत में परिपक्व कर ( गेहूँ के आटे को घी में सेक कर ) उस में गुड़ मिला कर जो मोदक बनाया जाता है, उसे ' कसार ' कहा गया है । घृत इसमें नाममात्र ही रहता है । अतएव यह कठिनावयय रहता है । अतएव यह ' करड़ - कठिनावयव - कसार ' कहलाया है । यह गुड़ के सम्बन्ध से माङ्गलिक माना गया है । अतएव विवाह में भी माङ्गलिक दानपरिग्रहों में ' सूत मगद का लाडू ' रूपसे सूत मोदक का ( करकसार मोदक का ) ग्रहण हुआ है । [ अ ] -- ( १ ) प्रपितामह ( २ ) पितामह ( ३ ) पिता ( श्रीबालचन्द्र ), ये तीनों मुख्य माने गए हैं । तीनों के भावनात्मक संग्रह के लिए ही ( १ ) ' पट्टप्रतिमा- पितृप्रतिमा- पितरप्रतिमा ' इन तीन वाक्यों का सन्निवेश हुआ है ( देखिए तैत्तिरीय ब्राह्मण - २।६।३।३ । ) । २८६

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श्राद्धविज्ञान मेंहदी लगाती हैं, अञ्जन जतीं हैं । इस प्रकार सर्वात्मना सञ्जीभूत बन कर मङ्गलभावापन्न वन कर प्रतीमास्थापन कर्म्म करतीं हैं, और यही मुख्य पितृकर्म का अन्तिम कर्म माना गया है कुलस्त्रियों की मान्यता में । तदनन्तर शेष रात्रि में स्त्रियों की सहज भावुकता से सम्बन्धित सहज आमोद - प्रमोद-भावनिबन्धन अन्यान्य लोकगीत गाए जाते हैं, जिनमें से कुछ को तो रहस्यपूर्ण ही माना जायगा! दीपक के गीत, कज्जल के गीत, मँहदीके गीत, आदि विशेष महत्त्व रखते हैं । इन गीतों की परोक्षव्यञ्जना भी बड़ा ही महत्त्व रखती है, जिसे विस्तारभिया यहाँ समाविष्ट नहीं किया गया है । प्रतिमास्थापनान्त अष्ट महासङ्गीतों के अनन्तर गाए जाने वाले सम्पूर्ण शेष गीतों को हम ' परिशिष्ट गीत ' कहेंगें, एवं इन सबकी समष्टिका नवम विभाग माना जायगा, जो नवम संख्या अपनी अपूर्णता से -' नवो नवो भवति जायमानः ' के अनुसार चान्द्रसर्ग को सदा प्रक्रान्त रक्खा करती है । प्रसङ्गोपा संख्यासम्पत् के सम्वन्ध में भी दो शब्द निवेदन कर देना संग्राह्य ही माना जायगा श्रद्धालुओं की श्रद्धापूत दृष्टि में । " प्राणतत्त्व जिन जिन संख्याओं में प्रकृतिमण्डल में विभक्त हैं, प्राणानुगत पार्थिव भूतों की उन उन संख्याओं के साम्य से तत् - संख्यासमतुलित प्राकृतप्राणसम्पत् स्वत: ही प्राप्त हो जाती है " यह नैगमिक रहस्य है | उदाहरण के लिए यदि इन्द्रदेवता के लिए महदुक्थात्मिका अन्नाहुति दी जायगी, तो मन्त्रसंख्या ८० होगी । ८० संख्या का सूचक शब्द है ' अशीति ' । उधर यही शब्द ' अन्न ' का भी सूचक बन रहा है । इसी आधार पर ' अशीतिभिर्हि महदुक्थमाप्यायते ' सिद्धान्त स्थापित हुआ है । अस्सी मन्त्र, अस्सी अक्षर, अस्सी पदार्थ, इस प्रकार अशीति संख्या देवान्नसम्पत् की संग्राहिका बन जाती है । इष्टियाग में दस पात्र दो दो का युग्म बनाकर रक्खे जाते हैं । दशसंख्या से प्राकृतिक दशावयव विराड्यज्ञ - सम्पत का संग्रह हो जाता है, एवं युग्मसंख्या से दाम्पत्यभावानुगत प्रजननसम्पत् का संग्रह हो जाता है । शतपथविज्ञानभाष्य में यत्रतत्र सर्वत्र इस संख्यासम्पत् के समन्वय के द्वारा ही यज्ञरहस्य का स्वरूपविश्लेषण हुआ है । क्या लोकमान्यतानुगत रात्रिजागरणात्मक पितृकर्म में भी निगमानुगत संख्यासम्पत् का आम्नाय प्रतिष्ठित हुआ है?, प्रश्न है । यदि महासङ्गीतों का समन्वय पूर्ववर्णनानुसार निगमाम्नायप्रामाण्य - सम्पत् से सर्वात्मना संयुक्त है, तो अवश्य ही संख्यासम्पत् - दृष्टि से भी महासङ्गीत - समष्टि को सम्पदामाम्नायप्रामाण्य से संयुक्त * " द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति- शूर्पच, अग्निहोत्रहवणीश्च । स्पयश्च कपालानि च । शम्याश्च, कृष्णाजिनश्च । उलूखल - मुसले । दृषत् - उपले । तद्दश ( १० ) । दशाक्षरा वै विराट, विराड् वै यज्ञः । तद्विराजमेवैतत् - यज्ञमभिसम्पादयति । अथ यद् द्वन्द्व ' - द्वन्द्व ं वै वीर्य्यम् । यदा वै द्वौ संरभेते, अथ वीर्य्यं भवति । द्वन्द्व ं वै मिथुनं प्रजननम् । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते " - शत ० १११११२२ / २६०