Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 361–370
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 361–370
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ही माना जायगा । इसी का समन्वय प्रसङ्गतः उपात्त है । पितृकर्म का मुख्य उद्द ेश्य वही है, जो मह-दुक्थरूप इन्द्र के लिए ' अशीति ' प्रदान का उद्देश्य | अन्नात्मक मर्त्य पितरों को अन्नात्मिका अशीति से तृप्त करना ही इस लोकनिबन्धन पितृकर्म का प्रधान उद्देश्य है । अन्न ' अशीति ' भावापन्न बनता हुआ '८० ' संख्या से संयुक्त है । इसी संख्यासम्पत् का इस पितृकर्म के साथ आपको समन्वय करना है । पितृकर्म में महासङ्गीत हैं आठ ( ८ ) । ये आठ महासङ्गीत क्रमशः ११११ है ६ १४६ ६—६— इन पद्य संख्याओं से समन्वित हैं । इन पद्यों की पृथक् पृथक् संख्याओं से क्रमश: १ - रुद्रसम्पत् ( ११ ), २ - रुद्रसम्पत् ( ११ ), ३ - पार्थिव ( गायत्र ) सम्पत् ( ८ ), ४ - पार्थिव गायत्रसम्पत् ( ८ ), ५ - चतुद्द शविध पितृपरिवारसम्पत् ( १४ ), ६ - गायत्रसम्पत् ( क ), ७- षऋतुलक्षणा पितृसम्पत ( ६ ) - वृद्धापिवृद्धप्रपिता-महादि षटूपितृसम्पत् ( ६ ), ये पैत्रसर्गनिबन्धना अवान्तर सम्पत्तियाँ संख्यासम्पत् के द्वारा सहजभाव से प्राप्त हो जाती हैं । इन पद्यों की सम्मिलित संख्या ७२ है । ये ही प्राणनाड़ियाँ हैं, जिनका सहस्र-रूप से वितान हुआ है, एवं जिनका - ' द्वासप्ततिसहस्राणि नाड्य: ० ' रूप से ' आत्मगतिविज्ञानोप-निषत् ' में विस्तार से विश्लेषण होने वाला है । प्राणनाड़ियाँ ही श्रद्धात्मिका बनतीं हुई ' चान्द्रनाड़ी के द्वारा पितृतृप्ति का माध्यम बना करतीं हैं, जैसाकि ' श्राद्धकर्मविज्ञान ' नामक प्रथम ऋणमोचनोपाय-प्रकरण • विस्तार से बतलाया जा चुका है । तदित्थं - महासङ्गीतसंख्या से पार्थिव भौमपसम्पत् प्राप्ति, अवान्तर पद्यावयवों से रुद्रादि सम्पत्प्राप्ति, पद्यसंख्या ( ७२ ) से प्राणनाड़ी - सम्पत्प्राप्ति, एवं सर्वसमन्वयात्मिका ८० संख्या से - ' अशीतिभिर्हि महदुक्थमाप्ययतेतमाम् ' रूपा अन्नसम्पत् प्राप्ति, निग-वत्सर्वात्मना इस महासङ्गीत संख्यासम्पत् से सहजरूप से प्राप्त हो रहीं हैं, जिनका तालिका द्वारा स्पष्टीकरण हो रहा है । न केवल लोकात्मिका ( चन्द्र पितृलोकात्मिका चान्द्री ) अन्नसम्पत् हो, अपितु इसी संक्यासम्पत् से अधिदेवतानुगता - आध्यात्मिकी भी निसर्गतः संसिद्धा बन रही है । पद्यानुगता असख्यासम्पत् प्राकृतिक गायत्र ( अतएव ) अष्टावयव पितृसम्पत् की संग्राहिका बनती हुई अधिदेवत ( प्राकृतिक ) सम्पत् की संग्राहिका प्रमाणित हो रही है । एवं पद्यावयवानुगता द्वासप्तति ( ७२ ) संख्या-सम्पत् बैकारिक प्राणनाड़ीसम्पत् की संग्राहिका बनती हुई श्राध्यात्मसम्पत् की प्रतिष्ठा प्रमाणित हो रही है, जैसाकि परिलेख में इस दृष्टिकोण का भी स्पष्टीकरण कर दिया गया है । अवदैवत, एवं अध्यात्म, दोनों सम्पत्तियों का संग्राहक सम्बन्धसूत्र माना गया है अधिभूत | जिस प्रकार श्रौत देवपितृ - कर्म में सौरमण्डलात्मक प्राकृतिक यज्ञात्मक अधिदैवतभाव शारी-साथ रिक पिण्डात्मक वैकारिक यज्ञात्मक सौरभावात्मक बुद्धिप्रधान अध्यात्म ( भूतात्मलक्षण अध्यात्म ) का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए पार्थिव विवर्त्तात्मक प्राकृतिक - वैकारिक मध्यस्थ आधिभौतिक यज्ञात्मक ( भौतिक यज्ञात्मक ) संख्यासम्पत् - युक्तं हविद्रव्य - कपाल - इध्म - चरू - सान्नाय्य - दक्षिणा - पात्र - बहि - आदि २६१
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श्राद्धविज्ञान आदि पदार्थों को मध्यस्थ बनाया जाता है, ठीक इसी निगमाम्नाय के अनुसार भारतीय लोकमान्यात्मक गृ देवपितृकम्मों में भी चान्द्रमण्डलात्मक प्राकृतिक अधिदैवत के साथ चान्द्रभावात्मक मनःप्रधान अध्यात्म का सम्बन्ध कराने के लिए चान्द्रसोमप्रधान पार्थिव क्षीरान्नादि - वैखरी वाणीरूप ( मानसिक भावापन्न लोकगीतरूप ) महासङ्गीत, आदि आदि आधिभौतिक भावों को मध्यस्थ बनाते हुए सर्व-सम्पत् का संग्रह कर लिया जाता है । आधिभौतिकसम्पत् वह प्राजापत्या भौतिक सम्पत् हैं, जिसके द्वारा उस ओर की विदेवतसम्पत्, एवं इस ओर की अध्यात्मसम्पत्, दोनों का समसम्बन्ध सुसमन्वित बना रहता है । ' प्रजापतिः षोडशी ' के अनुसार प्रजापति संख्यासम्पत् के अनुपात से सोलह कलाओं में विभक्त माने गए हैं, जिस षोडषभावापन्न प्रजापति के ' षोडशीपुरुष -प्रजापति, षोडशकलपराप्रकृतिप्रजापति, षोडशकलोपेतापरा प्रकृतिप्रजापति, ये तीन क्रमशः आधिदैविक - आध्यात्मिक - श्राधिभौतिक महिमरूप ( विवर्त्त भाव ) निगमशास्त्र में प्रसिद्ध हैं, जिनका संक्षिप्त दिशापरिचय इसी प्रकरण से सम्बन्धित आगे आने वाले ' पावन स्मृति के सम्बन्ध में तटस्थ आलोचना, एवं तत्समाधान ' नामक अन्तर प्रकरण में स्पष्ट होने वाला है । प्रकृत में कहना यही है कि, कुलस्त्रियों से सम्बन्धित रात्रिजागरणात्मक सम्पूर्ण वैवाहिकादि लोकमान्यतानुबन्धी यानस-भावप्रधान देवपितृकर्म षोडशकलोपेत अधिभौतिक पार्थिव प्रजापति से ही सम्बन्धित हैं | इस - षोडशकलोपेत प्राजापत्यसम्पत के संग्रह के लिए ही लोकमान्यतानुम्बधी विवाहाद्यनुगत देवपितृकर्म-निबन्धन सम्पूर्ण लोकगीत ( देवीदेवताओं - देई देवताओं के गीत ) १६ ही आम्नायानुगत बन रहे हैं । .. विवाह हो, यज्ञोपवीत हो, किंवा काम्यरात्रि जागरण हो, सर्वत्र देवकर्मसम्बन्ध में कुलस्त्रियों की पारम्परिक आम्नाय के अनुसार सोलह ही गीत गाए जाते हैं । प्रकृत पावनस्मृति में आठ महासङ्गीत तो मुख्य हैं ह्रीं । परिशिष्टात्मक नवम गीत संग्रह में ' दीपक -अञ्जन- अलक्तकराग - महाबड़ - जिसका स्वरूप यवनसंस्कृति के सम्पर्क से आज ' मँहदी ' ने ग्रहण कर लिया है - आदि कतिपय महासङ्गीतों के अति-रिक्त ' दुर्गास्तुति ' स्वस्वमान्यतानुबन्धी ( कुलमान्यतानुबन्धी ) ' कालापहाड़वावास्तुति, नारायणस्तुति ( डिग्गी के श्रीश्रीदेवाधिदेव कल्याणभगवान् ) आदिरूप से अन्यान्य महासङ्गीतों का समावेश करतीं हुई कुलस्त्रियाँ जब तक १६ संख्यासम्पत् ( प्राजापत्यसम्पत् ) प्राप्त नहीं कर लेतीं, तबतक अपने देवपितृकर्मानुगत महासङ्गीतकर्म को ये देवियाँ अपूर्ण ही मानती हैं निष्कर्षतः मुख्य महासङ्गीतों के साथ अन्य उतने महासङ्गीत अवश्य ही देवपितृकर्म में कुलस्त्रियों के द्वारा समाविष्ट होते हैं, जिनसे १६ संख्या परिपूर्ण बन जाय, यही तात्पर्य है । इस प्रासङ्गिक वक्तव्य को लक्ष्य में रखते हुए ही तालिका से अपने मानस क्षेत्र को हम पावन बना रहे हैं । प्रस्तुत निबन्धग्रन्थ के १५६ वें पृष्ठ से आरम्भ कर २६४ वें पृष्ठ पर्य्यन्त अनुमानतः शतपृष्ठों में परिपूर्ण यह महासङ्गीतनिबन्धना पावन-स्मृति आम्नायशील आस्तिकों को शतायु बनावे, इसी मङ्गलकामना के साथ पितृतालिका उपस्थित हो रही है । २६२
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कमान्यात्मक सम्प दोनों का ते हुए सर्व-तिक सम्पत् | ( मानसिक मनः प्रधान बन्धना पावन-उपस्थित हो १८६ पृष्ठ में रखते विष्ट होते हैं, महासङ्गीतों तबतक अपने का समावेश धारायणस्तुति तों के अति-का स्वरूप ततो मुख्य की पारम्परिक बन रहे हैं देवपितृकर्म्म-बन्धी मानस-हैं । इस में कहना हैं, जिनका में actr तीन क्रमशः गोडशीपुरुष-सर्वसम्पदवाप्तिः- शरीरसहकृता - मनोऽनुबन्धिनी ) चान्द्री ( लोकनिबन्धनपितृकर्मणा चान्द्रेणानेन क्रम संख्या ) नाम ( ) । महासङ्गीतः ] एव ११ [ सङ्गीत एकादश - महानात्मानुगतः - ( पितृप्राणात्मकः : ) परिलेख - ( - संख्यासम्पत् पैत्रमहासङ्गीतानुगता ) ( २ - अभिधा महासङ्गीत - आरम्भकप्रतीक महासङ्गीतानुगत पद्यावयसंख्यासम्पत् महासङ्गीत पद्यावयवसंख्या ) १ ( कुलदेवीसंस्मरण ] [ ११ रुद्रसम्पत् कुलदेव्यातिथ्य )( ३ दुग्धदोहन )( 8 - आतिथ्य पितृ ) ( ५ स्तुति पितृपरिवार ) ६ ( पितृगमननिरोध कुलसतीसंस्मरण ) ( ७ पितृमूर्त्तिस्थापन )( ८ अष्ट षट् षट् ) ) ) ) २६४ ) ( २८१ २८७ ) ) ( २७८ ० " ( पृष्ठ ( २४५ ) ० " ( ० " ( २४१ " २.६ ० " माय ( २३२ " गाय ( जी सुजान " ए ० सी ", दिक्खण झारी धन डाँडी सा बरज रही चतर की माय फूल झाराख्यो कपला ल्याओ, तूतो अन काए थाँकी चम्पा र झार परल्यो झारी श्री मँदमंद, घूमर भोमियाँ खातीका आज मँमंद सी तोला दरबार ओ का माथान बरज के राय “ अँ माथान धोली " काए ह्मारा बाप सत्ती ह्यारा " " " “ " " ] [ ११ एकादश ] [ ११ रुद्रसम्पत् ] ] [ 5 [ ८ प्रष्ट ][ 5 पार्थिवगायत्रसम्मत ][ 5 पार्थिवगायत्रसम्पत् ] [ १४ चतुर्दश ] [ १४ पितृपरिवारसम्पत् ] ] [ ८ [ ६ अष्ट ] [ ८ गायत्रसम्पत् ] ६[ षड्ऋतुसम्पत् ] [ ६ ] ६[ षपितृसम्पत् ) - पैत्रसम्पत् गायत्रसम्पत् अधिदैवतसम्पत्संग्रहः - ( संकलन का अधिदैवतम् -- गायत्राः - संख्यासम्पत् प्राकृतिकाः अष्टपद्यानुगता पितरः ७२ संकलन-का ( अध्यात्म- ) अध्यात्मम् - सम्पत्संग्रहः प्राणनाड्यः पद्यावयवानुगतासंख्यासम्पत् ) ( 50 " माप्यायते इत्याहुर्नैगमिकाः अशीतिभिर्महदुक्थ- " ऋणमोचनोपायोपनिषत् - ' अशीतिः सम्पत् " ८०- " पितृसम्पदवाप्तिश्च ७२, - प्राजापत्यसम्पदवाप्तिश्च ८ + - पितृतृप्तिः संकलनेन षोडशकलोपेत , पितृतुष्टिः समन्वयात् - अध्यात्मानुगता लोकगीत मित-प्राणसम्पत् ७२ श्रसंख्या -, एवं अन्नसम्पत्प्रदानात्मकमहासङ्गीतप - अधिदैवतानुगता अन्नसम्पत् अन्यान्यदेवपितृभावानुगत = पैत्रसम्पत्
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श्रद्धविज्ञान पितृकर्मनिबन्धना - लोकमान्यतानुगता - अन्न पितृप्राणसन्तर्पिका रात्रिजागरण प्रधाना- कुलस्त्रीवर्ग-सम्पादिता - अष्टमूलपद्यात्मिका - द्वासप्तति ( ७२ ) पद्यावयवकृताङ्गा महासङ्गीतमयी पावनस्मृति प्रकान्त ' गयाश्राद्ध ' कर्म के आभ्यन्तर में ही प्रसङ्गाकर्षण से शुचिभावापन्न श्रद्धालु मानव की श्रद्धावृद्धि - श्री-वृद्धि की कामना से यहाँ अपनी अस्तव्यस्त - असम्बद्ध - किन्तु श्रद्धापूत - स्मृति के आधार पर गृहप्रतिष्ठा-लक्षणा कुलदेवी के निःसीम अनुग्रह से समुपस्थित की गई, जिसे स्मृत्त्वा स्मृत्त्वा रोमहर्षः ' प्रजायते ' | उपरता चेयं महासङ्गीतनिबन्धना पावन स्मृतिः पितृकर्मनिबन्धना प्रासङ्गिकी -:: -----पावन स्मृति के सम्बन्ध में प्रासङ्गिकी तटस्थ आलोचना, और तत् समाधान अभी एक प्रासङ्गिक चर्चा और शेष रह गई है, जो प्रासङ्गिक चर्चा युगधर्मानुगत वर्त्तमान भौतिक युग की अपेक्षा से, भूताविष्कारपरम्परानुग्रह से केवल भूतपरायण भूतनिष्ठ - भूताविष्ट - ( मनो-गर्भित शरीरपरायण - शरीरनिष्ठ - शरीराविष्ट ) बन जाने वाले वर्त्तमान विज्ञानवादी ( क्षणिक - भूत विज्ञानवादी ) नराभासवर्ग की अपेक्षा से अपना एक विशेष, निरतिशयरूपेण विशेषतर - विशेषतम महत्त्व रख रही है । सुनिए तो सावधान होकर अपनी सहज श्रद्धा को अश्माखणवत् ( पाषाणशिलावत् ) सुस्थिर - अविचलित बनाए रखते हुए उस अश्रद्धामूला वैकारिकभूतसर्गनिबन्धना प्राप्ताङ्गिक चर्चा -आलोचना का इतिवृत्त, जो सहसा पूर्वप्रतिपादित पावनस्मृति की ही भाँति आप जैसे श्रद्धालुओं के मुख से भी ' रोमहर्षश्च जायते ' भाव एकबार तो वैखरी - द्वारा अभिव्यक्त करा ही देगा । " मृतात्मा के लिए गया श्राद्ध न कराने से औपपातिक महानात्मा, तदनुगत वायव्य हंसात्मा मुक्त नहीं होगा । बद्ध- रुष्ट महानात्मादि - हंसात्मादि पितर तद्वंशजों को अपत्य - सम्पत् -श्रीविहीन करते रहेंगे । रात्रिजागरणद्वारा लोकनिबन्धन पितृकर्म के बिना गृह्य पितर अप्रसन्न हो कर काय -प्रवेश द्वारा पारिवारिक व्यक्तियों को उत्पीड़ित करते रहेंगे । अतएव कुलस्त्रियों के द्वारा महासङ्गीत माध्यम से यथासमय - यथापर्ण अन्य देवकार्यों की भाँत इन गृह्य प्रेतपितरों की भी अन्नप्रदान- द्वारा तुष्टि तृप्ति प्रक्रान्त रहनी ही चाहिए । अन्यथा ये भी कुलस्त्री - सम्पत् - सन्तति - सौख्य- के उत्पीड़क— विनाशक - बनते रहेंगे 1 । ये प्रतपितर श्मशानस्थ ' श्मशा ' नामक प्रतदेवता के द्वारा सञ्चालित रहते. हु इतस्तत: आकाश में- वट - पिप्पलादि वृक्षों में- पुरातन शून्य गृह- कन्दराओं में - मध्याह्न में, सायं काल - मध्यरात्रि में - श्मशानभूमि में चतुष्पथ में विविधाकारों में परिणत रहते हुए परिभ्रमण करते " रहते हैं । सुगन्धिद्रव्य ( इत्र- पुष्पमाला आदि ) लगा कर पहिन कर, क्षीरान्न - मिष्टान्नादि खा पीकर २६४
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| - कुलस्त्रीवर्ग-मृति प्रकान्त श्रद्धावृद्धि - श्री. गृहप्रतिष्ठा-प्रजायते ' 1 त वर्त्तमान विष्ट - ( मनो-क्षणिक - भूत र - विशेषतम शिलाबत ) ङ्गिक चर्चा-के मुख हंसात्मा -श्रीविहीन हो कर काय-महासङ्गीत के प्रदान- द्वारा के उत्पीड़क-लित रहते. में, सायं मरण करते खा पीकर ऋणमोचनोपायोपनिषत् उक्त स्थानों में उक्त समयविशेषों में घूमने फिरने विश्राम करने वाले बालकों पर स्त्रियों पर तत् स्थानीय प्र ेतों का आक्रमण होना सम्भव है, जिस इस आक्रमण से इनका विविध उत्पादादि रोगों से श्राक्रान्त बन जाना भी सम्भव है । अतएव परिवार के प्रज्ञाशील ( समझदार ) स्त्री पुरुषों को अपने अपने पारिवारिक बच्चों को, नववयस्का - विशेषतः ऋतुमती, सगर्भा स्त्रियों को उक्त स्थान -समयविशेषों में गमनागमन से बचाते रहना चाहिये ” । उक्त इत्यादि इत्यादि पूर्वोक्तलक्षणा जिस भूत - प्रेतबाधापरम्परा का पार्वण - महालय - क्षयाह-गया श्राद्धादि श्राद्धपरम्परा का ऋणमोचनोपायोपनिषत् से आरम्भ कर पूर्वोपवणित ' महासङ्गीत की पावन स्मृति ' नामक प्रासङ्गिक प्रतपितृकर्म पर्य्यन्त जो स्वरूप विश्लेषण हुआ है, इसकी प्रामाणिकता के लिए जो जो निगमागम - प्रमाण - आम्नायपरम्परा - बड़े आटोप के साथ उप-वर्णित हुई है, इसके माध्यम से भावुक श्रद्धालु मानवर्ग में जो भय - कम्पन - उत्पन्न करने का प्रयास हुआ है, वह अवश्य ही एतद्देशीय - परम्परा आम्नायभक्त ( रूढ़िभक्त ) धर्मभीरू भारतीय आस्तिक भावुक मानव के लिए ही श्रद्धा का विषय बन सकता है, सदा से ही बनता चला श्र रहा है । किन्तु इन सब प्रवादों का वर्त्तमान युग के उस तटस्थ आलोचक ही दृष्टि में क्या महत्त्व शेष रह जाता है, जिसकी बुद्धि ने, प्रज्ञाशीला मनीषा ने प्राकृतिक तत्त्ववादानुशीलनपरम्परा के तर्क-युक्ति, सर्वोपरि विज्ञानपरीक्षणपरम्परा के प्रामाण्य माध्यम से सम्पूर्ण प्राकृतिक तत्त्ववाद के वास्त-विक – तथ्यात्मक - स्वरूपज्ञान के द्वारा तथाविध केवल शब्द प्रामाण्यानुगत - सर्वथा अपरीक्षित - मान्यता-परम्पराओं की निःसारिता - अनुपयोगिता घातकता का इतिहास जान लिया है, सर्वात्मना पहिचान किया है । ऐसे प्रज्ञाशील मनीषी तटस्थ वैज्ञानिक का ओर से यदि निम्नलिखित आलोचना - परम्परा उपस्थित होती है हम केवल प्रमाणभक्तों के सम्मुख, तो उसका हमारी तर्क- युक्ति - विज्ञानशून्या जड़ श्रद्धा - अन्धश्रद्धा क्या समाधान करेगी?, एवं हम तथा हमारी काल्पनिक? मान्यता परम्परा, दोनों हीं कैसे सुरक्षित रह सकेंगे उन तटस्थ आलोचकों की तर्क - विज्ञानसम्मता तटस्थ आलोचना की प्रति-. द्वन्द्विता में, जिस तटस्थ आलोचना का स्वरूप वर्त्तमान युग में न केवल पठितवर्ग के लिए ही, अपितु सर्वसाधारण के लिए भी सर्वथा सुलभ बन गया है । “ अहोरात्र देखते हैं, देख रहे हैं, अनुभव कर रहे हैं हम मुकुलित नयन बन कर कि, जो प्रगति-शील मानवजातियाँ शास्त्रप्रमाणानुमोदित श्राद्धादि परम्परा के नाममात्र से भी परिचित नहीं हैं, ' पञ्चमहाभूतविज्ञानान्वेषण ' के अतिरिक्त जिनके कोश में ' भूत - प्रत ' नाम का कोई कल्पित पदार्थ समा-विट नहीं है, जो सपरिवार - सबन्धुबान्धव सर्वत्र स्वैराचारेण निर्भयरूपेण विचरण करते रहते हैं, जिनके परमसौम्य बालवृन्द, अनन्यसौम्य नारीवृन्द सर्वत्र सब कालों में सब कुछ स्वच्छन्दरूप -पान करते हुए अपने मानवजीवन को धन्य बना रहे हैं, जाग्रदवस्था की कौन कहे, २६५
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श्राद्धविज्ञान स्वप्नावस्था में भी तो वे भूत - प्रेत- पितर - भैरव - देवी - यक्ष - गन्धर्वादि स्पर्श भी तो नहीं कर पाते उनका, जिन भूत प्रेतादि की मान्यता से भारतीय परिवार अहर्निश विकम्पित बने रहते हैं । उतनी विदूर अनुधावन करने की क्या आवश्यकता है, जबकि हम हमारे ही देश में हमारी शास्त्रीय मान्यताओं के प्रति आदरभाव सुरक्षित रखने वाली कतिपय जातियाँ वैसे स्थानों में न केवल भ्रमण हीं करतीं, अपितु वे श्मशानस्थान - शून्य चैत्यादि स्थान ही उन जातियों के अहोरात्र के निवास स्थान बने हुए हैं, जहाँ गमनमात्र से हम नागरिकों के, श्रद्धालु - शास्त्रभक्त नागरिकों के — बच्चे, और स्त्रियाँ विकम्पित होते रहते हैं । स्वयं हमारे धर्मशास्त्र ने कतिपय वैसी जातियों का उल्लेख किया है, जो शास्त्रीय विधिपूर्वक श्मशानादि स्थानों में हीं सपरिवार यावज्जीवन तत्रैव निवास करतीं हैं । श्म-शानकरग्राहिणी सुप्रसिद्ध ' महाब्राह्मणजाति ' ( काट्या ) संपरिवार चिताओं से संलग्न गृहों में ही सुख-शान्तिपूर्वक निवास करती है । इनके दुधमुँहे बच्चे श्मशानचिता के आस - पास क्रीड़ा कौतुक करते वहाँ कर्मनिबन्धन आगत- दुग्ध- मिष्टान्न - चाँवल से अपनी रसना को रसान्वित करते रहते हैं, और श्मशानवासी भूत - प्रेतगण, किंवा वेदाम्नायसिद्ध श्मशानशवानुगत घोरघोरतम ' श्मशा ' देवता इनकी र विप भी तो नहीं कर सकते । कहना, और मानना पड़ेगा, कहना चाहिए, और मानना चाहिए कि, शास्त्रीय आम्नायप्रामाण्य पर अवलम्बित श्रद्धापूर्वक विहित सर्वविध श्राद्धादि और्ध्वदेहिक-कर्म्म, भूतावेश - भूतप्रेतबाधा - सब कुछ विज्ञानदृष्ट्या इस वर्त्तमान वैज्ञानिक युग में सर्वात्मना आलोच्य श्रतएव अप्रामाणिक, अतएव नितान्त उपेक्षणीय ही हैं । अन्धश्रद्धालु - गतानुगतिक स्त्री-समाज ( सो भी भारतीय अपठित स्त्रीसमाज ) के अतिरिक्त, एवं तत्समानधर्मा जड़मति मानववर्ग के अतिरिक्त कोई भी प्रज्ञाशील मानव युक्तिविज्ञानतर्कशून्य ऐसी काल्पनिक मान्यताओं के प्रति, काल्पनिक शास्त्रभक्ति के प्रति यत् किञ्चित् भी आस्था नहीं रख सकता, नहीं रख सकता, नहीं रखनी चाहिए | प्रत्यक्षप्रमाणानुगत तथाकथित कुछ एक लौकिक निदर्शनों के माध्यम से ही जब आपकी शास्त्र -मान्यता का सुदृढ़ दुर्ग सर्वात्मना विकम्पित है, तो इस सम्बन्ध में विज्ञानानुमोदित अन्य तर्क - कारणों का माध्यम इसलिए ( हम आलोचक ) सर्वथा व्यर्थ ही मान रहे हैं कि, निरतत्त्व - निरर्थक - चर्चा में अपनी विज्ञानबुद्धि का दुरुपयोग करना तटस्थ आलोचकों का काम नहीं । " " आलोचनाप्रसङ्ग- ' ओम् ' इत्येतदुवाच श्रद्धालुरयम् " अक्षरशः तटस्थ आलोचकों की उक्त आलोचना इसलिए शास्त्रभक्त प्राम्नायप्रामाण्यवादी श्रद्धालु के लिए मान्य होगी कि, आस्तिक श्रद्धालु केवल ' विधिवाद ' का ही समर्थक है । वह ' हाँ ' करना ही जानता * निषादस्त्री तु चाण्डालात् पुत्रमन्त्यावसायिनम् । ' श्मशान गोचरं ' सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ मनुः १०।३६ । २६६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् है, ' ना ' करना नहीं । ' निषेधभाव ' उसकी अस्तिभावानुगता विधि से सर्वथा तटस्थ आलोचकों की आलोचना का सर्वात्मना अन्तःकरण से समर्थन करते हुए, उनकी विज्ञानानुमोदिता है । अतएव भावुकतापरम्परा को सुरक्षित रखते हुए ही हम उनकी तटस्थ आलोचना का तटस्थ रूप से ही समाधान करने का सामयिक प्रयास करने की चेष्टा करेंगे । समाधान से पूर्व कुछ एक प्रतिप्रश्न हैं हमारी ओर से उन तटस्थ आलोचकों की आलोचना--त्मिका प्रश्नपरम्परा के सम्बन्ध में । जो असभ्य - असंस्कृत - मूर्ख - यथाजात - मानव मानवसर्ग के प्रारम्भ युग से वर्त्तमान युगपर्य्यन्त सभ्यता - संस्कृति - शिक्षा - नीति - धर्म - विज्ञान - तत्त्वमीमांसा -मनोविज्ञान - आदि आदि से सर्वथा अपरिचित रहते हुए, पशुवत् केवल आहारनिद्राभयमैथुनपरायण आचारमीमांसा-बने रहते हुए, पशुसमान हीं जीवनयापन करते हुए ' जायस्व - म्रियस्व ' ( पैदा हो जाओ, और मर जाओ हीं को ही अपने मानवजीवन का परमपुरुषार्थ मानते चले आ रहे हैं, उनकी दृष्टि ) आदि से सम्बन्धित विधि - निषेध ( नियम और अपवाद ) का कोई महत्त्व में है क्या संस्कृति - सभ्यता ? | क्या मानव ही एकमात्र प्राकृतसगे का प्राणी है? | क्या मानवेतर पशु - पक्षी - कीट- कृमि - आदि प्राकृतिक सर्ग के प्राणी नहीं है? | क्या इन पश्वादि प्राकृतिक प्राणियों के लिए, इनके समुद्धार के लिए, शिक्षित - सभ्य बनाने के लिए प्राकृतिक विज्ञानवादियों ने आज तक कौई जैसा सफल प्रयास इन्हें सुसंस्कृत-किया है, जिसके द्वारा इनकी आकृति - भाषा - व्यवहार मानवसदृश बन गया हो? | मीमांसा कीजिए अपनी तर्क-युक्ति - सम्मता विनदृष्टि से इन प्रतिप्रश्नों की । मीमांसा से आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचें, अनुग्रह उससे हमें भी कृतकृत्य कीजिए! कर प्रकृतमनुसरामः । अवश्य ही अमुक जातियाँ श्राद्धादिकर्म्म - भूत मान्यता - आदि से अस्पृष्ट रहतीं हुई भी अपने ऐहलौकिक सुखोपभोग में अपत्य - कलत्र परम्परा से आज सर्वाग्रणी, विशेषतः मान्यतानुगामिनी आस्तिक वर्त्तमान भारतीय हिन्दूजाति की अपेक्षा से तो अवश्य ही सर्वसुखोपेता प्रमाणित हो रहीं हैं । और ऐसी समस्या आज ही कोई नवीन नहीं है । पुरायुग ( वैदिकयुगात्मक देवयुग ) में भी यह समस्या ठीक इसी रूप से आस्तिक भारतीय मानव के सम्मुख उपस्थित हुई थी. उस युग के विज्ञानपरायण लोकसुखानुगत - भारतीय आस्तिक - मान्यताओं के अन्यतम प्रतिद्वन्द्वी - विरोधी - मानव-समाज के समतुलन में | श्रुतिसिद्ध यज्ञकाण्ड पर, देवयजनक पर, पितृयजनक पर उस युग आतिक मानव की पूर्ण श्रद्धा थी । किन्तु जब इसने यह देखा, और यह अनुभव किया कि, " जो जातियाँ हमारे शास्त्र पर अणुमात्र भी विश्वास - श्रद्धा न कर केवल अपने बुद्धि - विज्ञानबल पर लोको-न्नतिमूलक भौतिक कम्मों में परायणा हैं, हमारी अपेक्षा विशेष समृद्ध हैं । इधर श्रद्धापूर्वक देव-पितृयजनक में अहोरात्र तल्लीन हम भारतीय परलोक सुख की कौन कहे, ऐहलौकिक सुख से भी वञ्चित हैं " । इसी समतुलनभावानुग्रहेण उत्पन्ना तात्कालिक अश्रद्धा से उस युग का भारतीय आस्तिक २६७
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श्राद्धविज्ञान की ब्राह्मणग्रन्थों ' मानव देवपितृकर्म से विमुख बन गया, जिस पुरायुगानुगता ऐतिहासिक ), ते पापीयांसः घटना । य उ न यजन्ते ' अश्रद्धा वै मनुष्यान् विवेद । य उ यजन्ते ( भारतीय द्विजातयः ० ११२।३।२४ ) इत्यादिरूप से विस्तार से ( अभारतीयाः ), ते यांसः । किंकाम्या यजेमहि " ( शतपथ ब्रा मीमांसा हुई है * । पुनः नवीन नवीन इतिहास का पुरायुगानुगता मीमांसा परम्परा युगधर्मानुपात से उसी प्रकार पुनः बुद्धिनिष्ठा लोकभावुकता-निर्माण किया करती है, जैसे कि विवस्वद्युग में उद्भूता राजर्षिविद्यानुगता उसका नैष्ठिक आचार्यों के द्वारा नुगता मीमांसा से आक्रान्त होती रही है, एवं युग युग में पुनः पुनः ' ( गीता ० ) आविर्भाव होता रहा है । ‘ स कालेन महता योगो नष्टः परन्तप!, में स एव घटित मयातेऽद्य होती रहती है +1 प्रसिद्ध ही है । यही अवस्था इतिहासपुराणयुक्त वेदशास्त्र के सम्बन्ध आवर्त्तन शाश्वत ' देवासुर संग्राम-. उसी पूर्वघटना का आज के इस विज्ञानयुग में पुनरावर्त्तनमात्र है, जो होना पूर्ण मानव की सनातननिष्ठा वत् ' शाश्वत माना गया है । अतएव इससे यत् किञ्चित् भी विकम्पित ' असुर ' ही रहेंगे । के लिए कदापि श्रेयःपन्था नहीं माना जा सकता । देवता ' देवता ' ही रहेंगे, असुर आरम्भ नावश्य ही दोनों की प्रतिद्विद्वता में ' बलं सत्यादोजीय: ' मानव इस - किंवा प्राकृतिक विश्वमानव सिद्धान्तानुसार में देवभाव - उद्-में कुछ समय के लिए ( जब तक कि मानव - भारतीय पराजित - सा होता हुआ अपने आपको बुद्ध नहीं हो जाता, तब तक के लिए ) मानव असुरबल से के अनुसार विजयश्री का अधिकारी अनुभव करने लगता है । किन्तु अन्त में ' सत्यमेव जयते, नानृतम् ' ही आसुरी - भौतिक बुद्धि का अति-मानव का दैवभाव ही बना करता है । ठीक इसके विपरीत अवश्य से भूतसमृद्धि का अनुगामी बन जाता है, मानी मानव अपने भूतबल के तात्कालिक मायामय विस्तार के देवभाव को सर्वात्मना प्रवृत कर अन्ततो-निश्चयेन बन जाता है । किन्तु यही भूतातिमान मानव कि - ' तेह असुरा प्रतिमानेनैव गत्त्वा उसी प्रकार इस के समूलविनाश का कारण बन देवों जाता की है प्रतिद्वन्द्वता , जैसे करने वाले अभिमानी असुर परावभूवुः ' ( शत ० ५ | १ | १ | १ | ) इत्यादि के अनुसार सर्वात्मना निर्मूल बन जाया करते हैं ÷ । का विस्तार * भारतीय हिन्दू मानव, और उसकी भावुकता ' निबन्धोपक्रम में इस आख्यान से विश्लेषण हुआ है ।
+ युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयंभुवा ॥
- पुराण - अधर्मेणैधते पूर्वं - ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाज्ञ्जयति, समूलस्तु विनश्यति । -मनुः २६८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया ' इसलिए कि, तटस्थ आलोचक, विज्ञानवादी आलोचक हमारे पूर्वोद्गारों से इस तथ्य के अनुगामी बनते जारहे होंगे कि, आलोचना का युक्ति - तर्क - विज्ञानसम्मत समाधान तो श्रद्धालु - आस्तिक के कोश में है नहीं । अपितु - ' शेष कोपेन - पूरयेत् ' न्याय से वह उसी शास्त्र-प्रामाण्य की घोषणा का अनुगामी बनता हुआ उन हम - श्रलोचकों की प्रतारणा से गतानुगतिक अपने मूर्ख अनुयायियों को तुष्टमात्र करना चाहता है, जो तटस्थ आलोचक बिना युक्तितर्कसम्मत विज्ञानवाद के केवल - काल्पनिक शास्त्रव्यामोहन से स्वप्न में भी प्रभावित होना नहीं जानता । इस स्थिति का अनुभव कर रहा है स्वयं यह श्रद्धालु भी अपने अन्तर्जगत् में | किन्तु इस स्थिति से वह चिन्तित इस लिए हो रहा है कि, यह भूतविज्ञानवाद से सर्वथा अपरिचित है, एवं अपरिचित है भूतविज्ञानवादियों की सभ्यता - संस्कृति - शिक्षा - धर्म्म ( मत ) -नीति - आचार-विचार - प्रणाली से । इसी सहजचिन्ता ने स्थिति - परिस्थिति के जानकार भी इस श्रद्धालु को हत • प्रभ बन रक्खा है । इस के समीप तो इस चिन्तावियुक्ति का एकमात्र यही शास्त्रसम्मत समाधान है कि-१ – पाषण्डिनो विकर्मस्थान् - वैडालव्रतिकाञ्छठान् । हेतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नाच्चयेत् || ( मनु ० ४ | ३० | ) २ – या वेदबाह्या स्मृतयः --याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य, तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ ( मनु ० १२।६५ । ) ३ – उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् । | --तान्यर्वाक् कालिकतया ४ - श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः, ते सर्वान्वमीमांस्ये, निष्फलान्यनृतानि च ' ॥ ( मनु ० १२।६६ । ) धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ || ( मनु ० २ | १० | ) तस्मात् ५ – योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ( मनु ० २।१२ । ) Proa उक्त स्मार्त्तों का यही है कि, “ जिस विधि - आम्नाय - मान्यता का मूल श्रुति, एवं स्मृतिशास्त्र ( निगमागमशास्त्र ) है, उसके सम्बन्ध में किसी भी तर्क हेतु विज्ञान- किंवा मीमांसा -आलोचना को कोई भी अवसर नहीं है । ' यदस्माकं शब्द ग्राह तदस्माकं प्रमाणाम् ' - यतो हि शब्द प्रमाणका वयम् ' ही हमारा एकमात्र समाधान है । जो व्यक्ति तर्क - युक्ति - विज्ञानवाद को अग्रणी बना कर हमारी निगमागममूला आस्था श्रद्धा - मान्यता की आलोचना - प्रत्यालोचना करते हैं, साधू लोग २६६
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श्राद्धविज्ञान ( दण्डकमण्डलुधारी वीतराग चतुर्थाश्रमी - तत्त्वचिन्तक तत्त्वोपदेष्टा आचार्य संन्यासी ) उस वेदनिन्दक केवल हेतुवादी - तर्कवादी का सर्वात्मना बहिष्कार ( उपेक्षा ) ही कर देते हैं । और तो और, वे सन्यासी जैसे हेतुवादी - बकवृत्तिपरायण - वैडालव्रतिक - पाखण्डी - विकर्म्मस्थ ( शास्त्रविरुद्ध निन्द्य - असत्-कर्मानुगामी ) का वाणी से भी सम्मान करना उचित नहीं मानते ” । क्या भारतीय शास्त्रनिष्ठा में तर्कवाद, युक्तिवाद एवं विज्ञानवाद का उसी प्रकार प्रवेश निषिद्ध है, जैसे कि अभारतीयों के मतवादों में तर्क- युक्ति - विज्ञान - ' कुफ ' माना गया है? | क्या इस प्रकार भयत्रस्त है भारतीयशास्त्र मतवादों की भाँति ही तर्क- युक्ति - विज्ञानवाद से? । यहाँ हमें आपद्धर्मानुगता विधि की आज्ञा से सर्वथा अपवादरूप से ' नेति होवाच श्रद्धालु: ' इस निषेध भाषा का अनुगामी बन ही जाना पड़ा, विवशतावश बन जाना पड़ा । कौन कहता है कि, भारतीय कर्म्म केवल उसी प्रकार ' मान्यता ' मात्र है, जैसे कि इतर प्राकृतिक - युगधर्मानुगत मतवाद? | कौन यह प्रमाणित करने का दुःसाहस कर सकता है कि, भारतीय श्रुतिस्मृतिसिद्ध धर्म के पावन - विशाल - शाश्वत - सनातन - विमल-प्राङ्गण में युक्ति - तर्क - हेतु - विज्ञानवाद का समावेश निषिद्ध है? । अभी अनुपद में हीं मनुश्लोकों के द्वारा हमनें हीं तो समावेश निषिद्ध बतलाया था । बतलाया था । बतलाना एक विशेषदृष्टिकोण से अनिवार्य था, इसलिए बतलाया था, इसलिए तर्क - विज्ञानादि का प्रवेश निषिद्ध प्रमाणित किया था । जहाँ जिज्ञासा नहीं, केवल वितण्डावाद है, जहाँ तत्त्वबोध के लिए सीमांसासम्मत ' वाद ' नहीं, जहाँ केवल ' वाद ' के लिए ' वाद ' है, निरर्थक वाद - विवाद है, शुष्क वाक्कलहमात्र है, अनृजुता है, अतपस्कता है, वहाँ तर्क - युक्ति - विज्ञानद्वारा शास्त्रनिष्ठा प्रमाणित भी यदि कर दी गई, तो अभिनिविष्टों का इस " कोई उपकार सम्भव नहीं । हाँ, श्रद्धालु का समय अवश्य व्यर्थ प्रमाणित हो जाता है । इसका स्वयं अपना अपकार अवश्य निश्चित बन जाता है । इसी दृष्टिकोण से भगवान् मनुने तर्कवादादि का प्रवेश निषिद्ध माना है । ठीक इसके विपरीत जो जिज्ञासाबुद्धि रखते हैं, सात्त्विक भाव से कुछ जानना चाहते हैं, अतएव जो तपस्क - ऋजुकाय - अजिह्म - श्रद्धालु हैं, उन के समाधान के लिए वे ही भगवान् मनु क्या कहते हैं?, सुनिए! ( १ ) - प्रत्यक्षं - चानुमानञ्च - शास्त्रञ्च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सा । ( मनु: १२ ।१०५ । ) X- ' अन्तःशाक्ताः- बहिः शैवाः - सभामध्ये च वैष्णवाः ' को चरिचार्थ करने वाले 1 * " तह प्रजापतिं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोकः - येषां तपः, ब्रह्मचर्य्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् । तेषामेवैष विरजो ब्रह्मलोक: - न येषु जिह्म ', अनृतं -नं माया चेति " -- प्रश्नोपनिषत् २ । १६ । ३००