Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 371–380
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 371–380
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( २ ) - आप धम्र्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राऽविरोधिना । ' यस्तर्केणानुसन्धत्ते ' स धर्मं वेद नेतरः || ( मनुः १२/१८६ | | ) तस्मात् -( ३ ) - नाकारणं हि शास्त्रेऽस्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले! ' कारणात् ' ' धर्ममन्विच्छन् -स लोकानाप्नुते शुभान ॥ वाद विवादमूलक तर्क जहाँ ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' ( वै ० दर्शन ) रूप से उपेक्षणीय है, वहाँ तत्त्वजिज्ञासामूलक तर्कवाद के लिए - ' यस्तर्केणानुसन्धत्ते ' - ' कारणाद्धमन्विच्छन् ' इत्यादि घोषणाएँ हुई हैं । और फिर केवल विधि - निषेधस्मारक के धर्मशास्त्र ( स्मृतिशास्त्र ) का यह उत्तरदायित्त्व } है भी कहाँ, जो प्रभुसम्मत राजाज्ञासमतुलित - वेदशास्त्र के रहस्यपूर्ण - विज्ञान पूर्ण तर्कयुक्तिसम्मत विधि - विधानों में हेतुवाद का समन्वय करे । यह उत्तरदायित्त्व तो एकमात्र है रहस्यपूर्ण वेदशा त्र काही | दुर्भाग्यवश कतिपय शताब्दियों से वेदशास्त्र की आम्नायसिद्धा तत्त्वविज्ञानपरिपूर्णा अध्ययना-ध्यापन प्रणाली विस्मृत कर दी भारतीय विद्वानोंनें । लक्ष्य बने रह गए इनके प्रधानरूप से केवल स्मृतिशास्त्र, पुराणशास्त्र, एवं आचारमीमांसाशून्य केवल शुष्कज्ञानानुगत तत्त्वमीमांसात्मक दर्शनशास्त्र । या तो वह लक्ष्य भी सर्वात्मना विस्तृत बन चुका है । आज तो लक्ष्य बन गए हैं अर्वाचीन शुष्क नव्यन्यायग्रन्थ, मनोरमादि वादात्मक - व्याकरणग्रन्थ, एवं मानसिक दुर्बलताओं को प्रोत्सहित करने वाला काव्य - साहित्यं प्रपञ्च । आज तो यह स्खलित ग्रन्थनिष्ठा भी पलायित है । आराध्य है आज के युग में तो सर्वलक्ष्यशून्या केवल ' नामभक्ति ' । नैगमिक आम्नाय गया, स्मृतिशास्त्र विलुप्त हुआ, इतिहास ( महाभारत ) पुराण विस्मृत बने, ज्ञानमीमांसात्मक दर्शनशास्त्र स्मृतिगर्भ में विलीन हुआ, नव्यन्यायग्रन्थ पलायित हुए, परिष्कार समाकुलित व्याकरणवाद अन्त हुआ, मनोऽनुरञ्जक काव्यसाहित्य पराः परावत वना, रह गया केवत वह ' हरे राम हरे राम ', जो मुमूर्षु ' ( मरणासन्न ) मानव ( ३०० पृष्ट की टिप्पणी का शेषांश ) इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । वाच्यं न च मां ( आत्मसत्तां ) योऽभ्यसूयति ॥ ( गीता: १ = । ६७ ॥ ) श्रद्धावाननुसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥ ( गीता ० १८/७१ ॥ ) * -श्रु स्तिस्तु वेदो विज्ञेयः, धर्म्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ( मनुः २ १०। ) । ३०१
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श्राद्धविज्ञान की भाषा मानी गई है ÷ । इस प्रकार ' विवेक भ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखम् ' को अक्षरशः चरितार्थ करने वाली यह स्खलनपरम्परा अभी भारतीय विद्वानों को ओर कहाँ लेजाकर निःशेष बना देनी वाली है?, प्रश्न के संस्मरण से भी आज हम विकम्पित हैं । ज्ञानविज्ञानपरिपूर्ण वेदशास्त्र की आत्यन्तिक उपेक्षा का ही यह दुष्परिणाम है कि, हमारा आस्तिक सम्प्रदायवाद भी मनोऽनुभूत्यात्मक भक्तिकाण्ड से प्रविष्ट बनता हुआ प्रत्यक्षरूप से वेदसिद्ध नैमिक आम्नायप्रामाण्य पर प्रतिष्ठित चतुद्दशविध चान्द्र भूतसर्ग के तात्त्विक स्वरूप से अपरिचित " रहता हुआ ' पितृपरिवार ' के स्वरूपज्ञान में कुण्ठित बन गया है । अतएव जिसने रुद्रत्रिभूत्यात्मक भैरव - भौमपार्थिव पितर ( भोमियाँ ) - महावीरादि- मान्यताओं का विस्पष्ट शब्दों में उपहास - उपेक्षा करनें में हीं अपने कल्पित भक्तिकाण्ड के संरक्षण का अनैकान्तिक उपाय मान लिया है । अपने आपको सनातनधर्म्मसंरक्षक - आस्तिकमूर्द्धन्य घोषित करने वाले भारतीय सम्प्रदायवाद की जहाँ ऐसी काल्पनिक प्रज्ञा बन गई है, तो उन अन्य तटस्थ आलोचकों के सम्बन्ध में हम क्या आलोचना करें, जो भारतीय वर्णमाला से, भारतीय भाषा की मौलिक व्यञ्जना से भी सर्वात्मा बने हु हैं । यह विधा पातरमणीयता सम्बन्धित है वेदाम्नाय के परित्याग से, उस वेदाम्नाय के परित्याग से, जो प्रत्येक विधि की विधि के साथ ही ज्ञानविज्ञानसम्मता रहस्यपूर्ण व्याख्या का समन्वय करना अपना मुख्य लक्ष्य मानती है । ऐसा करो! कहने के साथ ही ' तत् - यत्- कृष्णाजिन-मादत्ते - ( तदुच्यते - तस्य कारणमीमांसा क्रियते ) ' इत्यादि रूप से उस विधि की वैज्ञानिक मीमांसा करके ही अग्रगामिनी बनती है । अतः स्मार्त्त विधिभावों की यकारणमीमांसा - विज्ञानमीमांसा-आचारमीमांसा - से सम्बन्धित जिज्ञासाओं के वैज्ञानिक समाधान का उत्तरदायित्त्व एकमात्र वेदशास्त्र पर ही अवलम्बित है । धर्म का धर्म्मत्त्व, कर्म्म - का कर्म्मत्त्व, मान्यता का मान्यतात्त्व, सब कुछ विज्ञानद्वारा वेदशास्त्र में समाहित है । देखिए! स्वयं स्मार्त्ताचार्य्य इस सम्बन्ध में अपने क्या मनोभाव अभिव्यक्त कर रहे हैं-( १ ) — चातुर्वर्ण्यं, त्रयो लोकाश्चचारश्राश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भवच्चैव सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति ॥ ( मनुः १२।६७ । ).. -शब्दः - स्पर्शश्च - रूपश्च - रसो- गन्धश्च पञ्चमः । वेदादेव प्रसूयन्ते, प्रसूतिगुणकर्मतः || ( मनुः १२ | ६८ | )
- वेदविहीनाश्च पठन्ति शास्त्रं, शास्त्रैर्विहीनाश्च पुराणपाठकाः ।
पुराणहीनाः कवयो भवन्ति, भ्रष्टास्ततो भागवता ( नामसंकीर्तनपरायणाः ) भवन्ति ॥
पहा निजं धर्मं ' रामकृष्णेति ' वादितः ।
ते हरेद्वेषिणः पापाः, धर्मार्थं जन्म यद्धरेः ॥
- स्मृतिः झञ्झातालमृदङ्गवाद्यनिरता दासाः कलौ वैष्णवाः ( नामभक्ता: ) । ( गन्धर्वाप्सराप्राणप्रधानाः - नृत्य - गीत - वादन चतुराः ) ३८२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ३ ) – बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । तस्मादेतत् परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥. ( मनुः १२।६६ । ) ( ४ ) —अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते । “ धर्म्यं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः " ॥ ( मनुः २।१३ । ) तस्मात-( १ ) -- वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । तं स्याहुः परं धर्मं - उपधम्र्मोऽन्य उच्यते ॥ ( मनुः ४।१४७ । ) ( २ ) - वेदमेव सदाभ्यस्येत् - तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः । वेदाभ्यास हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते । ( मनुः २।१६६ । ) वेदानभ्यासेतु– ( ३ ) - योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । सजीवन्नेव शूद्रवमाशु गच्छति सान्त्रयः ॥ ( मनुः २।१६७ ) । ज्ञानविज्ञानपरिपूर्ण वेदशास्त्र स्वाध्यायाम्नाय का ही यह सुपरिणाम था कि, वेदवित् एतद्देशीय भारतीय अग्रजन्मा भूदेव ज्ञानविज्ञानव्याख्या के द्वारा अपनी सनातननिष्ठा की सुरक्षा करता हुआ सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल की तत्तत् विभिन्न मानवजातियों की मान्यताओं में भी यही पथप्रदर्शक बना रहताथा, जिसके आधार पर भगवान् मनु ने यह घोषणा अभिव्यक्त की थी कि—
एतद्दशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥
सब मतवादी सर्वत्र अपने अपने मतवाद की मान्यता की ही घोषणा करना अपना परम पुरुषार्थ ते हैं । सबको अपना अनुयायी बनाने में हीं अपनी सफलता मानते हैं । उधर भारतीय आर्ष-द्विजाति बुद्धिभेदमान्यतानुबन्ध से यह घोषणा कर रहा है कि - ' हम से पृथिवी के सम्पूर्ण मनुष्य अपने अपने चरित्र, स्वस्व देशकालपात्र द्रव्यश्रद्धानुरूप अपने अपने कर्त्तव्यकर्म का मौलिक स्वरूप समझें । है कहीं अन्यसंस्कृतियों में ऐसी निर्व्याज घोषणा? । वर्त्तमानयुग में ' तर्क -युक्ति - हेतु -वाद - संशयवाद - ' आदि के सम्बन्ध में सर्वसाधारण आस्तिक- भावुकप्रजा का वैसा आत्मविमोहन नहीं है, जैसी कि आत्मविस्मृति वर्त्तमानयुग के आस्तिक मानव - किन्तु भावुकमानव की प्रचलित ' विज्ञान ' शब्द -. से हो रही है । ' विज्ञान ' शब्द श्रवणमात्र से इसकी दृष्टि के सम्मुख बाष्प्रयान ( रेलगाड़ी ) -वायुयान - मोटरयान - विद्युत् - तार - टेलीफोन - वायरलेसटेलिग्राफी - रेडियो -- ग्रामोफोन -- रेडियम- सर्वो-३०३
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श्राद्धविज्ञान परि एटम्बॉम आदि आदि शतशः सहस्रशः वैज्ञानिक - भौतिक आविष्कारपरम्परा प्रतवत् नृत्य करने लगती है, ओर भावुक आस्तिक मानव इस लीला के वास्तविक ध्वंसात्मक मर्म से अज्ञ बने रहने . के. कारण अपनी सुध बुध ही खो बैठता है । दिङ विमूढ़ - सा, आश्चर्यचकित - सा, बिभ्रान्त - सा, श्रान्त- -सा, स्तब्ध - सा, " चित्रचित्रित - सा यह स्वस्वरूपविमुग्ध मानव इन भौतिक वैज्ञानिक तात्कालिक भयावह् आपातरमणीय आविष्कारों को, तथा आविष्कारकों को ही ' ' दूसरे रामजी ' मानने- कहने की भ्रान्ति कर डालता है । प्रभावितानुगता इस भयावह भ्रान्ति का एकमात्र कारण है इसका अपने पुरातन द्वारा ' देवासरेतिहास ' से अपरिचित रहना । उस पुरायुग में वरुणानुमोदित - दैत्यगुरू शुक्राचार्य हुआ है, के उनकी ' आविष्कृत आसुरभावापन्न जिन जिन भौतिक - आविष्कारपरम्पराओं का आविर्भाव भौतिक आविष्कार कुछ | में तो ये नितान्त क्षणिकविध्वंसक - मानव सहजशान्तिविघातक वर्त्तमान तुलना में भी तो महत्त्व नहीं रखते । प्रमाण के लिए रामरावणयुद्धप्रसङ्ग में, तथा महाभारतयुद्धप्रसङ्ग इतिहास ही पर्याप्त . घटित उपवर्णित श्रासुर - आविष्कारपरम्परा के लोकोत्तर चमत्कारों का जाग्रत सुरशास्त्र में वर्त्तमान मान लेना चाहिए | इसका यह अर्थ नहीं है कि, शुक्रशास्त्र में, किंवा तदनुगत कि वर्त्तमानयुग के कतिपय युगानुगत रेल - वेलुन - तार - टेलीफ़ोन आदि जैसे ही आविष्कार थे, जैसा श्रविष्ट बनते हुए शब्दों आस्तिक भारतीय विद्वान् अपने अतीत गौरवगान के भावावेश से भूतावेशवत् भ्रान्ति कर रहे हैं । की अर्थ - व्यञ्जना के माध्यम से रेल - तारे का अर्थ घोषित करने की महती नहीं जाता, एवं इन्हें इनके प्रमाणित न करने से वेदशास्त्र के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्त्व घट से हमारे शान्त्र का आवेशधिया वर्ण अक्षर शब्द - पद- साम्यभ्रान्ति से प्रमाणित करने की व्यर्थचेष्टा से, इस प्रकार की ' ज्ञानिकखोज ' गौरव अभिवृद्ध नहीं हो जाता । अपितु, हम तो कहेंगे, ऐसे आवेश हम न्यूनतम की नितान्त खतनरूपा भावुकवृत्ति से वेदशास्त्र - सर्वज्ञान विज्ञाननिधि निगमशास्त्र का महत्त्व । गोमूत्र - गोमय • ही प्रमाणित करेंगे | " गंगाजल में कीटाणु मारने की शक्ति है, इसलिए यह पवित्र क्षणिकविज्ञानवादियों है की कोची भी हिन्दूपद्धति में कीटाणुविनाशक ही है " इत्यादिरूप से वर्त्तमान की घोषणा करना आस्तिक कीटाणुसमतुलित कीटाणु - परम्परा का समावेश करते हुए विज्ञान सहजरूप से विद्वानों की आपातरमणीयता ही कही जायगी । तत्र तो उन सुसूक्ष्म कीटाणुविनाशक - ( जिससे वर्त्तमान-ु लभ स्पीट - रक्तवर्णभ आकर्षक आदि पदार्थों का ही हमें गंगा गोमूत्र - गोमय कर लेना चाहिए जिससे विज्ञानवादी वृणा ही अभिव्यक्त करना सुना गया है ) के स्थान में सन्निवेश * कुछ समय पूर्व एक वेदभक्त सतावत्री गुजरात महानुभाव से साक्षात्कार हुआ अर्थ? ( अनर्थ - महा-था । आपने एक दिन वेद के अमुक मन्त्र में पठिन ' अकवार इन्द्रम ' का यह का ' अकबर ' शब्द विनिर्गत अ ) व्यक्त करने का अनुग्रह किया था कि, " इसी ' वारि ' से यवनों हैं ये वैज्ञानिक व्याख्याता । हुआ है । उन्होंने हम से ही इस प्रकार सत्र कुछ लिया हैं " इत्यादि । धन्य ३०४ हमारा * हो जाँर अथर्ववे इनके हैं । की अभीतर संक्रम निषत् ' } उस च नामक तथा म तो अ विज्ञान हैं । ' केवल में प्रवृ वनेगा गया है । समन्व
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हो! ऋणमोचनोपायोपनिषत् भी बच जाय, एवं हम इन विज्ञानवादियों की दृष्टि में सभ्य सुसंस्कृत भी प्रमाणित ' कीटाणु ' का महत्त्व भारतीयोंनें सर्वथा उपेक्षित ही किया हो, यह बात तो नहीं है । स्वयं अथर्ववेद ने सुरभावापन्न - राजयक्ष्मादिप्रवर्त्तक ' अमीवा ' कीटाणुओं का सविस्तर उपवर्णन किया है, 1 इनके निराकरण के मणि - मन्त्र - ओषध्यादि सभी प्रकार के उपाय भी तत्र विस्तार से उपवर्णित हुए हैं । कीटाणुजनिता सांक्रामिकता का विश्लेषण भी हमारे शास्त्र में जैसा हुआ है, वर्तमान विज्ञानवादी अभीतक उसके संस्मरण का भी पात्र नहीं बनने पाया है, जिसके आधार पर स्पृश्यास्पृश्य- आशौच संक्रमणादि वैज्ञानिक पद्धतियाँ आविष्कृत हुई हैं, जिनका संक्षिप्त स्वरूप क्रमप्राप्त ' आशौचविज्ञानोप-' निषत् ' चतुर्थखण्ड में बतलाया जाने वाला है । किन्तु ' कीटाणु ' ही यहाँ सर्वस्व नहीं है । स्मरण कीजिए उस चतुद्दशविध - पार्थिव भूतसर्ग का, जिसे ' चान्द्रजीव ' माना गया हैं, जिसके अन्त में ' कीट - कृमि ' नामक दो सगे उद्घोषित हुए हैं । इन चौदहों ब्रह्मादि स्तम्बान्त संगों का तो केवल मानवीय मन, तथा मानवीय शरीर पर ही अवसान माना गया है । मानवसंस्था के बुद्धि, भूतात्मा नामक दो विव तो अभी शेष ही रह जाते हैं, जिनका इन चान्द्रजीवों से सर्वथा पार्थक्य ही माना गया है । बुद्ध्यनुगत विज्ञानकाण्ड, एवं भूतात्मानुगत विज्ञानकाण्ड, दोनों इस क्षणिक भौतिक विज्ञान से बहुत परे की वस्तु हैं । ' तद्विज्ञानेन परिश्यन्ति धीराः - सत्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' - ' विज्ञानमित्युपास्य ' - विज्ञानं ब्रह्म ेति विजानात् ' इत्यादि श्रौतवचनपठित ' विज्ञान ' और वर्त्तमान भूतवादी का कीटाणुसमतुलित केवल ' पदार्थ विज्ञान ', सीमांसा कीजिए दोनों दृष्टिकोणों की, एवं तभी भारतीय विज्ञानवाद के समन्वय में प्रवृत्त होने का अनुग्रह कीजिए । अन्यथा ' बिभेत्यल्पच ताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ही चरितार्थ बनेगा | कहाँ है इस प्रकार की विज्ञानघोषणा अन्यत्र, जिसे सम्पूर्ण चर - अचर का मूल माना गया है, देखिए! -* " विज्ञानाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते, विज्ञानेन जातानि जीवन्ति विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति " तैत्तिरीयोपनिषत् ब्रह्मानन्दवल्ली मानव की आध्यात्मिक- आधिदैविक- आधिभौतिक, तीनों कारण- सूक्ष्म - स्थूल - संस्थाओं का समन्वय पूर्वक विकास - स्वरूप संरक्षण - सुरक्षित रखने वाले संघर्षात्मक जीवन के. विरोधी शुक्रशास्त्रा-* ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भुयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ ( गीता ० ७।२ । ) ३ ९ ५
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श्राद्धविज्ञान नुगत वे सम्पूर्ण ऋनुकूलताप्रवर्त्तक, साथ ही परिणाम में ध्वंस के जनक आसुर भौतिक श्राविष्कार, इन क्षणिक विध्वंसक - भौतिक- आसुर आविष्कारों का आविष्कारक क्षणिक भौतिक विज्ञान यहाँ देवभावा-' नुगत परिपूर्णतानुगामी मानव के लिए सर्वथा त्याज्य ही घोषित हुआ है, जिसका न्यून न्यूनतर न्यूनतम रूप - विकृतरूप वर्तमान विज्ञान, एवं इसकी आविष्कार परम्परा भी दुर्भाग्यवश देवविज्ञानोपासक भार-हिन्दूमानव को सर्वथा इसकी भावुकता से आज व्यामोह में डाल कर इसे श्राश्चर्यविभोर बना रही है, इससे अधिक इसका और क्या पतन होगा? क्या था इस देवभावापन्न भारतीय मानव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण?, प्रश्न की मीमांसा स्वतन्त्रनिबन्धसापेक्ष है । यहाँ ' भारतीय विधान ' के सम्बन्ध में केवल यह दृष्टिकोण जान लेना अनिवार्य्यरूपेण श्रावश्यक होगा कि, " प्राणदेवमूलक यज्ञकाण्ड ही वह भारतीय विज्ञानकाण्ड है, जिसमें आकाशात्मा स्वयम्भू ब्रह्मा से आरम्भ कर भूतात्मा पार्थिव पद्मभू नाक्षत्रिक - ग्रहोपग्रह - अव्य-मध्यात्मिक - आधिदैविक - श्राधिभौतिक -यात्मविज्ञान - महदात्मविज्ञान - विज्ञानात्मविज्ञान - प्रज्ञानात्मविज्ञान ( मनोविज्ञान ) - भृतात्म-विज्ञान - प्राणविज्ञान ( तत्त्वविज्ञान ) - समन्वयविज्ञान ( श्राचारविज्ञान ) - विद्य द्विज्ञान - वृष्टि -विज्ञान - दगर्गलविज्ञान - उक्थविज्ञान - श्रौषधिवनस्पतिविज्ञान - पशुविज्ञान - पक्षिविज्ञान - कृमिकीट-विज्ञान - आदि आदि यच्चयावत् प्राकृतिक वैकारिक खण्डविज्ञान समाविष्ट हैं । समस्त खण्ड-विज्ञानगर्भित यज्ञविज्ञान ही भारतीय विज्ञानदिशा का मापदण्ड है । यही यहाँ की देवविद्या-नुगता ब्रह्मविद्या ( क्षरविद्या ) है, जो ' अक्षर ' नामकी पराविद्या के आधार पर प्रतिष्ठित है । पराविद्या का मूलाधार है अवर तर, पर अक्षर से भी अतीता अव्ययविद्या, जिसे ' पुरुषविद्या ' कहा गया है, यही विज्ञानकाण्ड की पराकाष्ठा है, “ सा काष्ठा सा परागतिः " । पुरुषविद्यात्मक पुरुषविज्ञान आधार बन रहा है अक्षरविज्ञान का । यह आधार बन रहा है तर-विज्ञानात्मक उस यज्ञविज्ञान का, जिसमें समस्त तथाकथित खण्ड - खण्डात्मक सृष्टिविज्ञान प्रतिष्टित ( गर्भीभूत ) हैं । पुरुषविज्ञानालम्बन पर प्रतिष्ठित अक्षरविज्ञान के द्वारा ही क्षरविज्ञानात्मक उस यज्ञ-विज्ञान का आविर्भाव हुआ है, जो सम्पूर्ण प्रजा का मूल उपादान माना गया है । यही यज्ञविज्ञान कर्मकाण्डात्मक लौकिक अभ्युदय ( विश्वसम्पति - अभिलषित सम्पत्ति ) का प्रदाता माना गया है, जो नाश्रमव्यवस्थानुसार गृहस्थाश्रमी द्विजाति का ' इष्टकामधुक ' * ( यथेच्छ फलप्रदाता ) माना गया है, जिसमें देव - पितृकर्म्म मुख्य बन रहे हैं । क्षरानुगत यज्ञकाण्ड ही उन शेत - सहस्र देवविद्याओं का
* सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
-गीता ३ | ११ | ३०६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रवर्त्तक है, जिसका स्वरूपपरिचय भी उन क्षणिक विज्ञानवादियों को आश्चर्यविमूढ़ करने की क्षमता रखता है । ' जिन भूतविज्ञानवादी वैज्ञानिकों के कृमिकीटात्मक विज्ञानाभासों से दुर्भाग्यवश अपनी नैमिक आम्नाय को विस्मृत कर देने वाला कर्मशून्य - उत्पथकर्मानुगामी - लक्ष्य भ्रष्ट वर्त्तमान आस्तिक हिन्दूमानव स्वयं प्रभावित हो रहा है । " कालाय तस्मै नमः " । अव्ययविज्ञानात्मक पुरुषविज्ञान १ - ' ज्ञानकाण्ड ' ( सापेक्ष ज्ञानात्मक ज्ञानकाण्ड ) का आधार बनता हुआ द्विजाति शिरोव्रतानुगामी १ - ' सन्यासी ' का आधार है । अक्षरविज्ञानात्मक प्रकृतिविज्ञान २ - ' उपासनाकाण्ड ' का आधार बनता हुआ द्विजाति २ - ' वानप्रस्थी ' का आधार है । एवं क्षरविज्ञाना-त्मक विकृतिविज्ञान ३- ' कर्म्मकाण्ड ' का आधार बनता हुआ द्विजाति ' ३ - ' गृहस्थी ' का आधार है । इन तीनों भारतीय विज्ञानकाण्डों का मूल संहिता व्याख्यात्मक - तृलवेदात्मक १ - ' उपनिषत् ' - २ - आरण्यक ' ' ३- ' ब्राह्मण ' ग्रन्थों में विस्तार से उपबृंहण हुआ है, जिनकी स्वाध्यायपरम्परा आज सर्वात्मना विलुप्त है । फिर कैसे भारतीय का स्वरूपोद्बोधन हो । प्रकृत में तो हमें पितृकर्म्मनिबन्धना उस तटस्थ आलो-चना के सम्बन्ध में हीं भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्ति - तर्क - सम्मत – विज्ञानमाध्यम से कुछ निवेदन कर देना है, जिससे वह आस्तिक श्रद्धालु, किन्तु भावुक मानव इस दिशा में वर्त्तमान चाक-चिक्यात्मक - दिङ विमोहात्मक - भूतप्रेतावेशसमतुलित भूतविज्ञान के प्रभाव से बचे रहते हुए ' देवकार्य्याद् द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते ' अपनी इस नैगमिकनिष्ठा से पराङमुख न बन जाँय । जब पाण्डव वनगमन करने लगे, तो कुलपुरोहित धौम्य के साथ साथ अन्य ब्राह्मण भी साथ हो लिए | वननिवास में युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा इन ब्राह्मणों की शरीरयात्रा के निर्वाह में अपने आपको असमर्थ देख जब दुःखार्त्त बन गए, तो धौम्य ने सौर प्रारणानुगता देवविद्या के प्रदान से स्थाली के माध्यम से युधिष्ठिर का सन्त्राण किया । स्थाली से शतसहस्र अतिथि सम्मानित हो जाते थे, तो भी स्थाली परिपूर्ण ही रहती थी । कौरवप्रासाद में ही अवस्थित प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट संजयद्वारा जिस देव-विद्या के माध्यम से महाभारतयुद्धप्रसङ्ग सुनने में समर्थ हो सके थे, व्यासप्रदत्ता वह देवविद्या भी सभी ने कथानक रूप से तो सुन रक्खी ही होगी । क्या महत्त्व है इन देवविद्याओं के समतुलन में विशुद्ध ध्वंसमूला वर्त्तमान क्षणिक आविष्कारपरम्परा का? यह ठीक है कि, आम्नायविस्मृति से भारत-वर्ष उन यज्ञविज्ञ नमूला देवविद्याओं से वञ्चित होता हुआ आज सर्वसमृद्धि शून्य - सा माना जारहा है । किन्तु क्या इसीलिए यह अपने आपको पशुभाव में परिणत कर ले? निगमाम्नाय को निश्चित प्रतीक्षा * ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्वम् ' नामक संस्कृतनिबन्ध में भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण का, तथा ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका - प्रथमखण्ड ' के उपक्रम में इस दृष्टिकोण का दिग्दर्शन कराने की चेष्टा की गई है । ३०७
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श्राद्धविज्ञान में इसे कभी इन पशुभावों का अनुगामी नहीं बनना चाहिए, भले ही इसकी शरीरय वा युगधम्म -नुसार वर्त्तमान से भी दुःसाध्य क्यों न बन जाय । ऐसे ही अवसर तो नैष्ठिक भारतीय मानव के के परीक्षण के अवसर मांने गए हैं । और हमें दृढ़तम आत्मविश्वास है कि, ' अमृतस्य पुत्रा अभूम ' की घोषणा करने वाला भारतीय आतिक मानत्र, नैष्ठिक मानव कभी युगधर्मानुगत मृत्युपाशों के पाश में आबद्ध न होता हुआ अपने को गतानुगतिक पशुसमानधर्मा नहीं बनाएगा, स्वप्न में भी नहीं बनाएगा । " देवस्मरण, श्राद्धकम्मनुगमन, रात्रिजागरणात्मक पितृकम्र्मानुगमन न करने से देवता और पितर अप्रसन्न होकर हमारा अनिष्ट कर देते हैं । यत्रतत्र अमुक स्थानों में गमन करने हमारे बालक-स्त्रियाँ भूत - प्रेतबाधा से युक्त होकर कष्ट पाते हैं, और जो ऐसी मान्यताओं को सर्वथा उपेक्षणीय मानते हैं, उन इतर जातियों का न तो हम कोई अनिष्ट ही देखते, न उन्हें वित्त - पुत्र लोक - विभूतियों से ही वञ्चित पाते । तव कहना पड़ेगा कि, यह सब अकर्मण्य - भीरू- तत्त्वविज्ञानशून्य - यथाजात -भारतीय मानवों की शून्य मान्यता मात्र है " - यही तो है तटस्थ आलोचक की वह आलोचना, जिसके समाधान में लोकसंग्रहबुद्धि से हम प्रवृत्त होना चाहते हैं । एवमस्तु । एक सुप्रसिद्ध लोकसूत्र है कि, जो जिसका गुण है, वही ( निःसीम बनकर ) उसका दोष बन जाता है ' 1 । भारतीय आस्तिक मानवका सहजगुण था, ' आस्थायुकश्रद्धा ' | यह गुण ही निःसीम-से वञ्चित आस्तिक भावानुगत बनता हुआ आज इसका महान् दोष प्रमाणित हो रहा है । स्वस्वरूपबोध अतः भारतीय मानव की आस्था - श्रद्धा के क्षेत्र आज बन रहे हैं दर्शन - विज्ञानवादी पश्चिमी विद्वान् । सर्वप्रथम हम इन भारतीयों की वर्त्तमान परानुगता - आस्था श्रद्धा से समतुलित प्रतीच्च विद्वानों की ( अज्ञातप्राय - किन्तु सङ्गदोषानुग्रह से यदाकदा श्रुतस्मृतप्राय ) सरणी की दिशा से ही समाधान का उपक्रम कर रहे हैं । ' सुनते हैं, आज से लगभग २००० वर्ष पूर्व सुप्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान् स्वनामधन्य सर्वश्री ' प्लेटो ( Plato ) ने ग्रीक ( Greek ) देश को पावन बनाया था, जिसके जीवन की दो धाराएँ तत्त्वमीमांसक पश्चिमी विद्वानों में प्रसिद्ध हैं | आरम्भ का तरुण प्लेटो शरीरानुगत मानस भावों, मानस अनुभूतियों का ही अन्वेषक बना रहता हुआ ' काव्यसाहित्य ' का स्रष्टा बना । सौभाग्य से किसी ज्ञात - अज्ञात महामानव के माध्यम से प्लेटो का ध्यान भारतीय निगमाम्नाय की ओर आकर्षित हो पड़ा, जिस आम्नाय का * जर्मनी के सुप्रसिद्ध विद्वान् हर हिटलर ( Herr Hitler ) के दीक्षागुरू - पथप्रदर्शक शॉपनहॉवर ( Schopenhaver ) के पथव स श्री ' निटश्चे ' ( Nietzsche ने यही भाव is निम्न- best लिखित शब्दों में व्यक्त किया है, जिसका नागरीलिपि में यह रूपान्तर सम्भव है - " One ) । punished for One's Virlues " ( अर्थात् मानव अपने सद्गुणों से ही दण्डित होता है - निश्चे ( जर्मन विद्वान् ) । ३०८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् मूलाधार बुद्धि और भूतात्मकक्षेत्र माना गया है । आमूलचूड़ परिवर्तन कर दिया प्लेटो का इस भारतीय दृष्टिकोण ने । विस्मृतिके गर्भ में विलीन हो गई इस तरुणकी काव्य साहित्यानुगता मानस उत्तालतरङ्ग । ओर बन गया यह सहसा आत्मानुगत - बुद्धिवादी, तत्त्वविमर्शपरायण तत्त्वमीमांसक दार्शनिक । कहते हैं, इसने दार्शनिक जीवनधारा में प्रवाहित होने के साथ ही अपनी मानसिक भावुकता से सम्बन्धित समस्त काव्य साहित्यरचना को अपने हीं हाथों से क्रव्यादान में आहुत कर डाला इस रचना के प्रति पश्चात्ताप अभिव्यक्त करते हुए । प्लेटो की दार्शनिक जीवनधारा से अनुप्राणित सुप्रसिद्ध ' रिपब्लिक ' ग्रन्थ ( चार भागों में विभक्त - Republic of Plato ) में भारतीय आचारमीमांसा का सर्वात्मना समर्थन हुआ है, जिसके कुछ एक वर्णव्यवस्थानुबन्धी वचनों को गीताभाष्यभूमिका द्वितीयखण्ड ' ख ' विभागान्तर्गत ' वर्णव्यवस्थाविज्ञान ' उद्धृत करने का हमें भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है । प्लेटो की मानसिकधारा को दार्शनिक - बौद्ध-विचारधारा में प्रवाहित करने का श्रेय जिस महामानव को प्राप्त हुआ था, वह भारतीय वेदान्तनिष्ठा केअनुशय से प्रभावित होने वाला ' साक्रिटीज् ' ( Socrates- सुकरात ) ही था । यही प्लेटो का दार्शनिक गुरू था, जिसकी अव्यक्त दार्शनिकता व्यक्तरूप में परिणत हुई प्लेटो में । प्लेटो ने अपना विद्यापुत्र बनाया ' एरिस्टाटल ' ( Aristotle - अरस्तू - सिकन्दरमहान् का गुरू - Alexander the great ) को, जो प्लेटो की दार्शनिकता के साथ साथ कथाशास्त्रात्मक तर्कशास्त्र ( लॉजिक - Logic ) केमाध्यम से आगे चलकर अपने गुरू प्लेटो का महान् आलोचक बनता हुआ दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोणात्मक ' यथार्थवाद ' का मूल सर्जक बना । और यों इन तीनों ग्रीक विद्वानों की परम्परा ने तीन प्रकार की सरणियों के सर्जन का श्रेय प्राप्त किया-* १ - केवल तत्त्वमीमांसा ( वेदान्तनिष्ठा ) सॉक्रिटीज ( Socrates ) २ - श्राचारमीमांसासम्मता तत्त्वमीमांसा ( सांख्यनिष्टानुगता वेदान्तनिष्ठा ) प्लेटो ( Plato ) ३ — यथार्थमीमांसानुगत तत्त्वविमर्श ( वैशेषिकनिष्ठानुगता सांख्यनिष्ठा ) एरिस्टाटल ( Aristotle ) ( १ ) - परमगुरू - सॉक्रिट्रीज ( Socrates ) तत्त्वद्रष्टा ( २ ) - गुरू- प्लेटो ( Plato ) आचारसम्मततत्त्वमीमांसक ( ३ ) - शिष्य - एरिस्टॉटल ( Aristotle - यथार्थसम्मततत्त्वालोचक ग्रीकविद्वत्त्रयी * इसी आधारपर वर्त्तमान पश्चिमी चिन्तकों के निम्न लिखित दो दृष्टिकोण व्यवस्थित बनें ---' फिलासफिकल आउटलुक ' एवं ' साइन्टिफिक् आउटलुक ' Philosophical outlook & Scientific outlook दार्शनिक दृष्टिकोण – और — वैज्ञानिक दृष्टिकोण २०६
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श्राद्धविज्ञान fara प्रक्रान्त शताब्दियों में पश्चिम में जितने भी तत्त्वविचारक हुए हैं, वे सभी प्रायः उक्त त्रयी के विचारों के ही समर्थक - आलोचक - मीमांसक माने गए हैं, जिन तत्त्वविचारकों में शॉपनहावर ( Schopenhaver ), कान्त ( Kant ), ह्य मर ( Haumer ), निट्श्चे ( Nietzsche ), ब्रॉडले ( Bradley ), हीगल ( Hegel ) आदि पश्चिमी विद्वानों के नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय माने जाते हैं उनकी मान्यता में | Greek Plato को छोड़कर निगमाम्नाय के सम्बन्ध में इन उल्लेखनीय विद्वानों में से किसी ने अपने स्पष्ट विचार अभिव्यक्त नहीं किए हैं । केवल तत्त्वमीमांसा ( Metaphysics - मेटाफिजिक्स ), आचारमीमांसा ( Ethics - एथिक्स ), प्रमाणमीमांसा, मनोविज्ञान ( Psychology - साइकोलॉजी ), आदि दार्शनिक दृष्टिकोण ही इन कां प्रधान प्रतिपाद्य रहा है । ' मेक्समूलर ' ( Maxmuller ) आदि परिगणित विद्वानोंनें यदि निगम-शास्त्र पर कुछ आलोचनात्मक निबन्ध लिखे भी हैं, तो वे भारतीय आम्नाय से विपरीत होने से उपेक्षणीय ही माने जायँगे । धर्म के सम्बन्ध में - जिसका प्रधान सम्बन्ध आचारमीमांसा के साथ माना गया है - इन अधिकांश विद्वानों के ये उद्गार हैं कि - " सबल - समर्थों के आक्र-म से अपने आपका विरोध करने के लिए - ( बचाव करने के लिए ) ही - निर्बलोनें धर्म्म ( मत ) का आश्रय ग्रहण कर रक्खा है " - जिसका व्यञ्जनार्थ यही है कि असमर्थ मानव ही धर्म्म की घोषणा करते रहते हैं, जो असमर्थ मानव समर्थ विद्वानों के लिए सदा उपेक्षणीय ही रहते हैं । इत्थंभूतलक्षण इन प्रतीच्य विद्वानों की विश्वास ( Belief ), श्रद्धा ( Faith ), वैयक्तिक शिष्टाचार-रूपा शिष्टता ( Ettiquette ), पारिवारिक शिष्टाचाररूपा सभ्यता ( Civilization ), सामाजिक शिष्टाचाररूपा संस्कृति ( Culture ) लक्षणा विचारसरणिपरम्परा निगमाम्नाय से कैसे कब सुसम -न्वित होगी?, प्रश्न वास्तव में मीमांस्य है । फिर भी कतिपय तत्त्वानुचिन्तक उन प्रतीच्य दार्शनिक विज्ञानों की इस मान्यता से प्रभावित होना ही पड़ता है, जिनके विचार सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः पूर्वदृष्टिकोण से इस रूप से समतुलित हैं कि, “ बिना धर्म के दर्शन सर्वथा चतुर्विहीन ( अन्ध ) हैं, एवं बिना दर्शन के धर्म सर्वथा निस्सार - " । * “ Morality is an invention erected by the weak, to deter the strength of the STRONG " --Nietzsche. " Philosophy blind is without religion and religion without philosophy is ' ontentless " देखिए, ' भारतीय हिन्दू मानव और उसकी भावुकता ' नामक निबन्धन का ' भारतीयदर्शन, और प्रतीच्यदर्शन ' नामक अवान्तर प्रकरण । ३१०