Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 381–390
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 381–390
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} ऋणमोचनोपायोपनिषत न सही आचारमीमांसानुगता धर्म्ममीमांसा का समावेश तथाकथिता प्रतीच्यसरणी के सम्मान की दृष्टि से । केवल तत्त्वमीमांसा की सरणी से ही आलोचना के समाधान का अन्वेषण कीजिए । " यह सब कुछ प्रत्यक्षदृष्ट प्रपञ्च क्या है?, कैसा है?, कैसे उत्पन्न हुआ है?, किससे उत्पन्न हुआ है?, कब तक रहेगा?, अन्त में कहाँ कैसे नष्ट, किंवा विलीन हो जायगा?, ” इत्यादिरूप से पाञ्चभौतिक, किंवा ( उह्नीं की सरणी के अनुसार केवल ' भौतिक ' ही ) संसार के सम्बन्ध में प्रज्ञाशील मानव की सहजप्रज्ञा में जो ज्ञान जिज्ञात्मिका - प्रश्नपरम्परा उदित होती रहती है, उस ज्ञान - जिज्ञासा ( जानने की इच्छा ) को तृप्त - तुष्ट- समाहित करने के लिए अपनी सहजप्रज्ञा से उन मनीषियोंनें जिस ‘ ज्ञानसरणी ' को अपनाया, वही उनकी अपनी दार्शनिक भाषा में - ' तत्त्वमीमांसा ' नाम से प्रसिद्ध हुई तथोपवर्णिता विशुद्ध दर्शनदृष्टिमूला तत्त्वमीमांसा, किंवा ज्ञानमीमांसा के प्रारम्भ के इतिहास में उस ' आचरणात्मक धर्म्म ' का समावेश उपलब्ध नहीं होता, जो आचरणात्मक धर्म - परामर्श उनकी मान्यता में आगे - बहुत आगे चल कर प्रादुर्भूत हुआ, एवं जिसका नामकरण हुआ उन्हीं की भाषा में-' आचारमीमांसा ' ( Ethics - एथिक्स ) इस कालान्तरभाविनी आचरणात्मिका आचारमीमांसा को जन्म दिया मानवीय उस प्रज्ञात्मक मन की सहज चिन्तनवृत्ति ने, जो सहजरूप से मानवीय बुद्धि को तत्त्वा-नुशीलन की वास्तविकता की और शनैः शनैः आकर्षित करती रहती है । यही मानसिक चिन्तनवृत्ति वहाँ ' मनोविज्ञान ' ( साइकॉलॉजी - Psychology ) नाम से प्रसिद्ध है, जिसे हम आचारमीमांसा की कह सकते हैं । प्रज्ञा के सहज उत्कर्षतारतम्य से मनोविज्ञान अनेक सामान्य- विशेष विचार-विमर्शपरम्पराओं में विभक्त हुआ । यह विमर्शपरम्पराएँ अपनी सामान्य - उत्कृष्ट विशेषताओं के अनु पात से प्रथम - मध्यम - तृतीयादि श्रेणिविभागों में विभक्त हुई । सहज मननशील उन दार्शनिकों ने * दुर्भाग्य है यह पश्चिमीजगत के दार्शनिक दृष्टिकोण का कि, मानसिक चिन्तनवृत्तिलक्षण जो मनोविज्ञान ( Psychology ) वहाँ तत्त्वमीमांसानुगता आचारमीमांसा ( धर्ममीमांसा ) के लिए आविर्भूत हुआ था, वह आस्था श्रद्धा धरातल से वञ्चित रहने के कारण कालान्तर में उस मनः- शरीरा-गता कामवृत्ति ( Sex - कामवासना ) का ही समर्थक बन गया, जिसके तदनुरूप इतिहास का जात स्वरूप वर्त्तमान युग में प्रधानरूप से ' अमेरिकनमनोविज्ञानवेत्ता - समाज ' बना हुआ है । इस दिशा में ' मनोविज्ञान ' जैसे पवित्र लक्ष्य को दूषित कर देने वाले जिस ' कामविज्ञान ' के माध्यम से ' मनो-विज्ञान ' नाम से जिन सुविशाल ग्रन्थों का निर्माण वहाँ के सेक्स्- ज्ञ ( exologists ) पण्डितों? कीर से हुआ है, भारतीय शिक्षणालयों में सहशिक्षा ( Co - education ) प्राप्त करने वाले तरुण-तरुणीयुग्म उन मनोवैज्ञानिक? ग्रन्थों से किस प्रकार की आचारमीमांसा के पथिक बनते जा रहे हैं?, प्रश्न का समाधान उन स्वच्छन्दविचरणशील तरुण तरुणियों से ही प्रष्टव्य है । ३११
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श्राद्धविज्ञान अपेक्षाभेदभिन्ना मान्यता के विभेद से उच्चश्रेणि के चिन्तकों को चिन्तनशैली को सम्माि मनोवि-देखा, उन्हें अपनी चिन्तनशैली का पथप्रदर्शक ( Author - ऑथर स्वीकार किया, ओर यों ज्ञानानुगता चिन्तनमीमांसा ही उनकी सुप्रसिद्ध ' प्रमाणमीमांसा ' ( Epistemology ) की जननी का बनी । इस दृष्टिकोण से पश्चिम की क्रमव्यवस्थानुमोदिता, अतएव समादरणीया मीमांसाचतुष्टयी न होगी-क्रम यदि हम निम्न लिखितरूप से स्वीकार करलें, तो सम्भवतः उन्हें कोई आपत्ति १ - तचमीमांसा ( मॉफिजिक्स- mataphysics ) - चिन्तन मीमांसा ( साइकालॉजी- Psychology ) ( ज्ञानमीमांसा ) ( मनोमीमांसा ) २ प्रतीच्यानुगता मीमांसा-( धर्ममीमांसा ) ३ - आचारमीमांसा ( एथिक्स - Ethics ) सरणी चतुष्टयी Epistemology ) ( प्तवचनमीमांसा ) ४ - प्रमाणमीमांसा ( अपिस्टोमोलॉजी-( Meta-उक्त विचारसरणी के आधार पर यह तो सर्वात्मना प्रमाणित है कि, तत्त्वमीमांसा की भाँति किसी न किसी physics ) को ही सर्वेसर्वा मानने वाले प्रतीच्य विद्वानों में भी पूर्वीय विद्वानों की है । किन्तु उनकी रूप से प्राप्तवचनप्रामाण्यरूपा ' प्रमाणमीमांसा ' ( Epistemology ) स्वीकृत ' से अन्ततोगत्त्वा केवल ' मीमांसा यह प्रमाणमीमांसा उनकी आचार मीमांसा ( Ethics ) की शिथिलता नबीनवाद इस मीमांसा ही बनी रह गई । इस मीमांसात्मक बाद से उन्हें ' बोध ' न हो सका । हाँ एक उपरति के दुष्परिणाम ने र उत्पन्न कर दिया, वाद वादका ही जनक बनकर उपरत हो गया, जिसकी Materealism ) के स्वरूप कालान्तर में धर्म्ममीमांसानुगता श्राचारमीमांसा में क्षणिक भूतविज्ञान सीमित ( भावों की अभिव्यक्ति आधारभूत उन दिग्- देश - काल ( Time - Space - Causality ) तीन Plato के शिष्य एरिस्टाटिल हो पड़ी, जिस भावत्रयी का अव्यक्तरूप Greek विद्वान् दार्शनिक चुका था । ओर यही ( Aristotle ) की दार्शनिक विचारमीमांसा ( तत्त्वमीमांसा ) में समाविष्ट हो ) के ह्रास का उपक्रम तत्त्वमीमांसक पश्चिमी जगत् की तत्त्वमीमांसा - ( दर्शनमीमांसा - ज्ञानमीमांसा बना, जिसने कालान्तर में इसे दार्शनिक से वैज्ञानिकभाव में परिणत कर डाला से । ही यों परोक्षरूप मीमांसाचतुष्टयी से उस के अन्त में प्रतिष्ठित आप्तवचनप्रमाणरूपा प्रमाणमीमांसा के अनुग्रह न केवल प्रतीच्यदेश ' विज्ञानमीमांसा ' ( Scientific Outlook ) का अविर्भाव हो पड़ा, जिसने कर दी है । सम्मुख ही, अपितु विश्व मानवकी सहजशान्ति के सम्मुख एक भयानक समस्या उपस्थित से जिस विज्ञान को मनीषी विद्वान् लोकसुख का अन्यतम कारण घोषित करते आ रहे हैं आदियुग ही, वह विज्ञान - वर्त्तमानविज्ञान - यों सहसा लोकध्वंस का निमित्त कैसे बन गया?, इस समस्या आचार- का समाधान कोई कठिन मीमांसा नहीं है, जब कि हम वर्त्तमानविज्ञानवादियों की धर्मानुगता ३१२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् मीमांसा का, दूसरे शब्दों में प्रत्यीच्य जगत् की धर्मपरम्परा के वास्तविक इतिहास का तथ्यपूर्ण समन्वय कर लेते हैं, तो । प्लेटो ( Plato ) के सुयोग्य शिष्य Greek विद्वान् एरिस्टॉटल ने जिस कथाशा त्र - तर्कशःस्त्र ' ( Logic ) प्रणाली को अव्यक्तरूप से जन्म देने का प्रयास किया था, वही प्रयास कालान्तर में पश्चिमी विद्वानों के द्वारा दिग्देशकालसापेक्ष बनता हुआ ' विज्ञानवाद ' का जनक वन गया, जिसका मुख्य आधार बना ' गणनात्मक काल ' | आज जितने भी महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक आविष्कार प्रचलित हैं, सबका मूलाधार ' गणितविज्ञान ' ( Mathematics ) ही बना हुआ है । इसी गणनप्रक्रिया के आधार परं वर्त्तमानयुग का सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ' आइन्स्टीन ' ( Einstein ) अपने सुशान्त प्रासादकक्ष में बैठा आपने सापेक्षवाद ( Relativity of kno ) सिद्धान्त से विज्ञानवादियों को चमत्कृत कर रहा है । निश्चयेन उसकी यह गणनकालात्मिका अनन्य उपासना इसे शनैः शनैः साम्वत्सरिक काल की ओर आकर्षित करती हुई कालान्तर में कालातीत इन्द्रियातीत उस अभिन्न सत्तातत्त्व का बोध करा सकती है । यदि वह मतवाद के अभिनिवेश से अभिनिविष्ट न बना दिया गया तो । सत्ताब्रह्म हमारी यह चारणा चरितार्थ करे, यही कामना है तत्त्ववादाभिनिवेश के दुष्परिणाम से ही पश्चिमी विद्वानों की धर्मानुगता आचारमीमांसा दिग्-देशकालसीमा से बाहिर न निकल सकी । वहाँ धर्म केवल ' अन्धविश्वास ' ( Blind faith ) का ही कारण बना रह गया । अतएव वहाँ धर्म्म अतीन्द्रिय- पारलौकिक तत्त्व न रहकर केवल ' मतवाद ' ही प्रमाणित हो सका । प्रतीच्य मानवने धर्म्म को आस्था श्रद्धानुगत न बनाकर केवल लौकिक मान्यता का क्षेत्र मानते हुए इसका समस्त उत्तरदायित्त्व व्यक्तिविशेष पर ( क्राइस्ट पर - Christ ) छोड़ करं निश्चिन्तता प्राप्त कर ली । सहजभाषा में हमें यह कह देने में भी कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि, वहाँ धर्म्म ( उपनाम मतवाद ) केवल ' अन्धविश्वास ' ही बना रह गया । धर्म है वहाँ मान्यतामात्र, जिसमें तर्क- युक्ति - विज्ञान - सबका प्रवेश सर्वात्मना निषिद्ध है । अतएव वहाँ की तस्त्वमीमांसा ( दर्शना-त्मिका ज्ञानमीमांसा ): धर्ममीमांसा ( आरमीमांसा ) से सर्वथा संस्पृष्ट ही बना रह गई 4. 1: . * हमें यह स्पष्ट कर देने में अणुमात्र भी संकोच नहीं करना चाहिए कि, यही दोष भारतीय दर्शन-शास्त्र में भी परोक्षरूप से विराजमान है । यहाँ का दर्शनशास्त्र भी आचारमीमांसात्मिका प्राकृतिकसर्ग-व्याख्यानुगता धर्माचरणात्मिका आस्था श्रद्धा से वञ्चित ही रह गया है । निगमागमानुगत प्राकृतिकसर्ग-व्याख्यान की उपेक्षा ही यहाँ के दर्शनों की निःसारिता का मूल कारण बना है । निगमविज्ञानवञ्चिता भारतीयदर्शनशास्त्र की तत्त्वमीमांसाः प्रतीच्यदर्शनशास्त्र की तुलना में ही प्रतिष्ठित है । दोनों में यह अन्तर अवश्य स्वीकार कर ही लेना चाहिए अपना अभिनिवेश छोड़ते हुए भारतीय दार्शनिकों को कि ३१३
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श्राद्धविज्ञान प्रतीच्य दर्शन तत्त्वतः धर्मशून्य, केवल तत्त्वमीमांसारूप । अतएव वहाँ परलोक भय का श्रात्यन्तिक अभाव | वहाँ परलोक का उत्तरदायित्त्व न धर्म पर है, न आत्मस्वरूपबोध पर । अपितु एकमात्र ' क्राइस्ट ' ही इनके अमुक अवसर पर बड़े से बड़े अपराध भी क्षमा करवा देते हैं । इस मान्यता के विरुद्ध एक शब्द भी बोलना वहाँ ' ब्लेस फेमी ' ( Blasphemy ) नामक महा अपराध माना गया है । इस दिशा में वहाँ का मानव विचारस्वातन्त्र्य - अभिव्यक्त करने में सर्वात्मना असमर्थ है । जिस प्रकार व्यक्तिनिन्दा ( डिफेमेशन - Defamation ) - राजनीतिनिन्दा ( सेडीशन् - Sedition ) वहाँ अपराध है, तथैथ धर्मनिष्ठा भी ' ब्लेस् फेमी ' नामक महा अपराध है । ' कुछ मत करो, केवल क्राइस्ट पर विश्वास रखो ' इस प्रकार का निषेधभाव ही वहाँ धर्म्माचरण का एकमात्र इतिहास है, जब कि ' यह करो - यह न करो, ऐसे करो वैसे मत करो, अपने पर अपने आत्मस्वरूप पर व्यापक सखा-' पर विश्वास रक्खो ' इस प्रकार का विचारस्वतन्त्रात्मक विधिभाव ही यहाँ धर्माचरण का महत्त्व-पूर्ण इतिहास रहा है । यहाँ कभी विचार स्वातन्त्र्य पर किसी को ' वध ' दण्ड नहीं दिया गया, जैसे कि वहाँ मान्यता के विरुद्ध शब्दोच्चारणमात्र से वधदण्ड निर्णीत बन जाता है । यही कारण है, ब्रॉड ले ( Bradley ) जैसा तत्त्वज्ञ दार्शनिक वेदान्तनिष्ठानुगत धर्म का अतीन्द्रिय स्वरूप अंशतः जानता हुआ भी अपने देशानुगत धर्म्मदण्ड- भय से इस सम्बन्ध में न तो अपने विचार अभिव्यक्त ही करना चाहता, एवं न कुछ लिखना ही चाहता । इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं समझ लेना चाहिए कि, वहाँ के तत्त्वज्ञ विद्वान् आचारमीमांसा, किंवा तद्रूप ईश्वरीय - पारलौकिक धर्म की, दूसरे शब्दों में अध्यात्म ननिष्ठा की जिज्ञासा ही नहीं रखते । अवश्य ही वहाँ के कतिपय तत्त्वज्ञों का ध्यान इस भारतीय अध्यात्मबाद ( Theism ) की ओर आकर्षित हुआ है । इसी आकर्षण का यह सुपरिणाम है कि, वहाँ की तत्त्वमीमांसा में ' रियेलिटी ' ( Reality- वास्तविकता - सत्ता ) के आधार पर उस ' एल्टीमेटरीपोलिटी ' ( EIte- Metre - Polite ) सत्तावाद ( Existentialism ) का आविर्भाव हो पड़ा, जिसके उनकी तत्त्वमीमांसा में ' मोनिजम ' ( Monism- एक सत्ताबाद अद्वयत्रह्मवादवादी ) ' ड्य एलिस्ट ' ( Dualist - द्विसत्तावाद - प्रकृतिपुरुष-( ३१३ पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) पश्चिमी जगत् ने आचारमीमांसा की उपेक्षा करते हुए भी गतानुगतिकता से जिस क्षणिक विज्ञान के द्वारा जहाँ कुछ समय के लिए भौतिक सुख - साधन जुटाने में सफलता प्राप्त कर ली है, वहाँ भारतीय दार्शनिक ने धर्माचारमीमांसा से अस्पृष्ट रहने के साथ साथ क्षणिक विज्ञानकाण्ड से भी असंस्पृष्ट रहते हुए अपना ऐहिक जीवन भी कण्टकाकीर्ण बना लिया है, जिसे भारतीय आदर्शवाद की दृष्टि से हम अभिनन्दनीय ही मान लेते हैं । ३१४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् वाद ), सोलिटिज्म ' ( Absolietism - निश्चित एकतन्त्रवाद - - साम्यवाद - Communism का मूलाधार ), ' प्लूरलिज्म ' ( Pluralism - अनेककाररणतावाद ), ' थीज्म ' ( Theism - केवलेश्वरवाद ), ' डीज्म ' ( Deism - देवसत्तावाद ), अवान्तर विभेद उसी प्रकार मीमांस्य बन रहे हैं, जैसे कि आचार-मीमांसाशून्य भारतीयतत्त्ववाद ( दर्शनवाद ) में सत्ताब्रह्म के अनेक विकल्प तो उपवर्णित हैं । किन्तु बिना निगमव्याख्यात्मक - प्राकृतसर्गात्मक - आचारधर्म के वे सब विकल्प मानव को वस्तुसत्ता का उप-भोग कराने में वति हो प्रमाणित हुए हैं । एवमेव जिस प्रकार भारतीयदर्शन - आचारधर्म्मशून्य दर्शन--के अनुग्रह से उत्पन्न ' एकस्मिन्धम्मिणि विरुद्धनानाकोट्यवगाहिज्ञानं संशयः ' लक्षणोपेत संशयवाद ( Secptieism ) ने अनीश्वरवाद, तथा चार्वाकमूलादि सम्मत भूतवाद ( जड़ात्मक प्रत्यक्षवाद ) को उपोद्बलित कर रक्खा है, तथैव वहाँ भी ' थीम ' | Atheism - अनीश्वरवाद ), और ' मेटिरियलिज्म् ' ( Materialism- भूतवाद ) आविर्भूत हो पड़े हैं, जिनकी निःसीम कृपा का ही सुपरिणाम ' भौतिक-विज्ञानवाद ' है । पश्चिमी जगत् के सुप्रसिद्ध तत्त्वमीमांसक ( दार्शनिक ) सर्वश्री ' कान्त ' ( Kant - कैन्ट ) महो-दय ने अपनी व्यवस्थित - विकसित प्रतिभा के बल पर आदशवाद ( Idealism - धर्म्म ), और यथार्थ -वाद ( Relaism - विज्ञानवाद ), दोनों के समन्वय की चेष्टा करते हुए दर्शन के साथ धर्म का समन्वय करते हुए इसे विज्ञान के साथ समन्वित करने की चेष्टा की है । ओर इस चेष्टा में सफलता प्राप्त करने के लिए कान्त ने उस ' जन् ' ( Reason - कारणतावाद, भारतीयपरिभाषानुसार महद्गर्भिता स्वस्थ बुद्धि ) को माध्यम माना है, जिसके क्रमविकास का इतिहास ( फेनोमेनल - सिन्सिविलिटी - Phenomenal - Sensibility - इन्द्रियजन्यज्ञान समतुलितज्ञान - बाह्यज्ञान ), ( न्यूमिनल अण्डरस्टेण्डिग् कन्स्प्ान- Noumenal - Understanding - Coneption - मनोजन्यप्रज्ञान समतुलित किंवा प्रज्ञात्मक संम्कारज्ञान समतुलित - अन्तःकरणानुभूतिज्ञान ), इन दो शब्दों के इतिहास को मूल बना कर ही कान्तद्वारा प्रवृत्त हुआ है । कान्त की धारणा में ' रीजन ' पूर्वक सब कुछ मान्य घोषित हुआ है. यद्यपि, तथापि भारतीय धर्माम्नाय के सम्बन्ध में वह भी अपने उस अभिनिवेश का परित्याग करने में समर्थ ही प्रमाणित हुआ है, जिसका दिग्दर्शन पूर्व में कराया जा चुका है । धम्र्माम्नाय के प्रति, ( किसी भी कारण से हो ) कान्त ने ' फेथ ' ( Faith ) को ही अपने मतवाद को ही आराध्य घोषि करते हुए भारतीयधर्म को ( वर्त्तमान धमिष्ठ - धर्माभिनिविष्ट - भारतीयों की आर्त्त - दीन - हीन अवस्था के आधार पर ) ' कर्मयों का जीवनसाधन ' बतलाते हुए कान्त ने पश्चिम के मनीषी को इससे बचे रहने का ही आदेश दे डाला है, जिस आदेश का, आदेशप्रदाता कान्त का हम तो हमारी आस्था - श्रद्धा से आम्नायसिद्ध - ' यस्मिन् देशे मृगः कृष्णः - तत्र धम्मं निबोधत ' इस घोषणा का संरक्षक मानते हुए हृदय से अभिनन्दन ही करेंगे । ३१५
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श्राद्धविज्ञान ara के ' रिलीजन ' ( Religion ) शब्द से प्रभावित वर्त्तमान प्रतीच्य दार्शनिक, एवं तद्भक्क भारतीय दार्शनिक, दोनों ही प्लेटो - एरिस्टाटल - शॉपनहॉवर आदि की तत्त्वमीमांसा को गौण मानते हुए वर्त्तमान पाथों में युगधर्मप्रभाव से ' कान्तदर्शन ' को ही प्रमुखता प्रदान करने के लिए आकुल-व्याकुल बनते प्रतीत हो रहे हैं । बहुत सम्भव है, हमारे इन उद्गारों के व्यक्त होने के साथ साथ ही यह प्रतीति शिक्षणालयों ( College - कालेजों ) में कार्य्यरूप में परिणित भी हो जाय । यद्वा तद्वास्तु । आरम्भ से अब तक की प्रतीच्य सरणी के दग्दशंग के आधार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, पश्चिमी विद्वानों में भी एक ओर जहाँ कान्तप्रतिद्वन्द्वी सुप्रसिद्ध: विज्ञानवादी ' ह्वाइटहेड ' ( Whitehead ) नामक विद्वान वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ही मानवजीवन के लिए. चरमोत्कर्ष का स घोषित कर रहा है वहाँ दूसरी ओर कान्तसदृरा प्रज्ञाशील मनीषी भारतीय अध्यात्मवाद को भी मानव जीवन में समाविष्ट करते हुए से प्रतीत हो रहे हैं । बड़ी संकर अवस्था है इस दिशा में पश्चिमी तत्त्व-मीमांसकों की, आचारमीमांसकों की, एवं सर्वोपरि विज्ञानवादियों की, जिन्होंनें अणुबम ( ^ tom Bomb ) आविष्कृत तो कर दिया, किन्तु इसके निरोध के उपाय में अद्यावधि असमर्थ बने रहते हुए भावी भया-शङ्का - परम्पराओं से सन्त्रस्त बनते हुए, सुनते हैं आज कल वे इस अन्वेषण में प्रयत्नशील बने हुए हैं: कि, सूर्य से ऊपर की सूर्य्य से भी प्रबल किसी वैसी ( पारमेष्ठ्य ) शक्ति का सर्जन किया जाय, जो सौ शक्ति ( सौर विद्युत्शक्ति - भारतीयपरिभाषानुसार उल्कापुञ्जरूप धूमकेतु ) का निरोध कर सके | जगदीश्वर इन्हें इस सर्जनकर्म में सफलता प्रदान करे, यही कामना है! वस्तुतः कान्त के प्रतिद्वन्द्वी नहीं, अपितु कान्त के सहयोगों, कान्तसदृश ही दार्शनिक विद्वान् ह्वाइटहेड़ की दृष्टि में जहाँ दिग्देशकालनिबन्धना ' फिजिक्स ' ( Physics ) की मान्यता प्रधान बनी हुई है, वहाँ कान्त सांख्यदर्शनानुसार दिग्देशकालातीत ' तत्त्व ' को प्रधानरूप से मान्य घोषित कर रहा है.। ‘ फिजिक्स् ’ से सम्बन्धित विज्ञानवाद के कारण ही हाइटहेड विज्ञानवादी घोषित हो गया है. अत-एव उसकी विज्ञानभावापन्ना दार्शनिक भाषा दार्शनिक जगत् में ' दुरधिगम्या ' मानी जा रही है । ÷ भारतीय नैगमिक वैकारिक सृष्टिविज्ञान ( पृथिव्यप्तेजवायुराकाशात्मक पञ्चमहाभूतात्मक वैकारिक भूतविज्ञान ) की शिरोमूला दृष्टि के अनुसार मस्तकस्थानीयं सत्यस्वयम्भू से ऋतपोमय परमेष्ठी का उद्गम हुआ है, जो परमेष्ठी ' सरस्वान् समुद्र ' कहलाया है, एवं जिसके गर्भ में समहिम सूर्य की वही स्वरूपसत्ता है, जो सत्ता समुद्र में एक बुबुद ( - बुलबुले ) की रहती है । अतएव पुराण से सूर्य्य को ' बुद्बुद ' नाम से भी व्यवहृत किया है । ' द्रप्स स्कन्द ' ( ऋग्वेद ) रूप से श्रुति ने सूर्य को ' स ' ( बृहद् बिन्दु - द्रप्स - द्राप्स - ड्राप्स ) कहा है । एवं- अपां ' गमन्त्सीद ' ( ऋग्वेद ) रूप से इस सात्मक बुदबुदसमतुलित सूर्य को पारमेष्ठ्य आपोमय, सरस्वान् समुद्र के अन्तस्तल ( गहराई ) में प्रतिष्ठित माना है । ' असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार ३१६
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' ऋणमोचनोपायोपनिषत् हाँ, तो हमनें यह अनुभव किया संगभावानुगता अपनी स्खलित स्मृति के आधार पर पश्चिमी जगत् की सरणी के द्वारा उनके एवंविध मनोभावों के सम्बन्ध में कि, भले ही अधिकांश में उनका समाज विज्ञानवाद से आविष्ट रहता हुआ भारतीय नैगमिक - आगमिक आम्नायपरम्परा की पूर्व निर्दिष्टा तटस्थ - आलोचना करने की धृष्टता करता हुआ हमारी आम्नायं परम्परा को विज्ञानदम्भ के ( ३१६ पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश. ) रोऽग्नि - पुञ्जरूप सूर्य ही ताम्रवर्णात्मक विविधवर्णसमन्वित ( रक्त - बभ्रु - नील - पीत - आदि युक्त ) वह ऐन्द्रविद्य त्पुञ्ज है, जिसे संहारक ' रुद्र ' माना गया है । जब तक पारमेष्ठ्य सोम का इसके साथ सम्बन्ध होता रहता है, तब तक ' सूय्र्यो ह वा अग्निहोत्रम् ' ( शत ० ) के अनुसार अग्नीषोमात्मक बने ) हुए सौर रुद्र ' शिव ' भाव में परिणत रहते हैं, एवं तभी तक रोदसी त्रैलोक्यरूप पार्थिव विश्व का स्वरूप-संरक्षण है । यदि कारणवश सौर रुद्र पारमेष्ठ्य सोम से पृथक हो जाते हैं, तो तत्क्षण ये विश्वसंहारक बन जाते हैं । रुद्र की इस ध्वंसप्रवृत्ति के उपशम के लिए ही तो - ' शान्तरुद्रिय ' नामक यज्ञकर्म्म ( शत-रुद्रिक ), ' साम्ब सदाशिवोपासना ', ' जलाभिषेक ' ( सहस्रघट ) आदि विधान विहित हुए हैं । आपोमय परमेष्ठी भृगु - अङ्गिरोमय है । भृगु ' स्नेह ' तत्त्व है, अङ्गिरा ' तेज ' तत्त्व है, सुतीक्ष्ण है आपोमय समुद्र में दोनों ऋतरूप से परिभ्रममारण हैं । इन दोनों में अङ्गिरोऽग्निमय ऋतपुञ्ज ही ' धूमकेतु ' माने गए हैं, जिनके भारतीय विज्ञान ने ' सहस्रधूमकेतवः ' रूप से सहस्र वर्ग माने हैं । पारमेष्ठ्य समुद्र में विचरणशील. प्रचण्ड - घोरघोरतम उल्कारूप परिभ्रममारण यह अङ्गिरोऽग्निपुञ्ज ही धूमकेतु है, जो कालान्तर में ' यज्ञवराह ' नामक पारमेष्ठ्य सौम्य वायु से शनैः शनैः केन्द्रीभूत होता हुआ सहसा ‘ सूर्य्यपिण्ड ' रूप से अभिव्यक्त हो पड़ता है । यही सूर्याविर्भाव का एक प्राकृतिक क्रम है, जिसका शतपथभाष्य में विस्तार से निरूपण हुआ है । ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के ४३ वें सूक्त में ३३ मन्त्रों में इसी पारमेष्ठ्य धूमकेतु का सविशद निरूपण हुआ है, जिसका एक मन्त्रमात्र यहाँ उद्धृत हो रहा है--हरयो धूमकेतवो वातजूता उपद्यवि । यतन्ते वृथगग्नयः || - ऋक्संहिता ८ | ४३ | ४ | -वक्तव्य यही है कि, पारमेष्ठ्य अङ्गिरोमूर्ति लम्बलम्बायमान - कटक- अण्डाकार - वक्राकारादि विविधाकाराकान्त - उल्कापुञ्जलक्षण अग्निपुञ्ज ही धूमकेतु का स्वरूपपरिचय हैं, जिसके द्वारा पिण्डीभाव-माध्यम से सूर्य का पिण्डस्वरूप विनिर्मित हुआ है । " अवश्य ही यह धूमकेतुप्रतीकरूप सूर्य पार्थिव विश्व को क्षणमात्र में भस्मावशेष बना डालता, यदि इसके साथ पारमेष्ठ्य भार्गव - शान्तिपुञ्जरूप - सोम का सम्बन्ध न होता तो । देखना है, केवल अग्निपुञ्जात्मक, अतएव रुद्रात्मक, अतएव संहारात्मक अणुबम कब उन, आविष्कारकों के द्वारा पारमेष्ठ्य सौम्य शक्ति से समन्वित बन कर विश्वभय को अभयरूप में. परिणत करता है । ३१७
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श्राद्धविज्ञान माध्यम से केवल ' कर्म्मयों की कल्पना ' कहने मानने का अक्षम्य अपराध करना हीं अपने जीवन का परम पुरुषार्थ मान रहा हो । किन्तु हैं वहाँ भी, उस समाज में भी वैसे यशः शरीरी कतिपय मनीषी विचारविमर्शक नैष्ठिक परिगणित विद्वान्, जो भारतीय श्राम्नायपरम्परा को ' अध्यात्ममूलक ' मानते. हुए सतृष्ण दृष्टि से इसकी ओर जिज्ञासाभाव से अपना यह प्ररणतभाव अभिव्यक्त कर देने में अणुमात्र भी संकोच नहीं कर रहे कि, " विज्ञान की इस चरम उन्नति के संघर्षकाल में भी अध्यात्मगुरू ' भारतवर्ष से आज भी हमें वह शान्ति सन्देश प्राप्त हो सकता है, जो मानव के वास्तविकरूप से अभ्युदय निःस्साधन की क्षमता रखता है " । सर्वश्री प्लेटो, एरिस्टाटल, शॉपनहावर, डॉ साइल्स ( Sailes ), गौस ( Gose ), एमर्सन् ( Emerson ), हक्सले ( Huxley ), शेगल ( Shegal ), बाल ( Ball ), रास्को Rasko ), विल्सन् ( Wilson ), मेक्समूलर ( Maxmuller ) वेबर ( Weber ), सिसरो ( Ciecro ), वेलेन्टिन ( Walington ), बॉप ( Bopp ), मिस कार्पेन्टर ( Miss carpenter ), वेलेस ( Wallace ), चपण्डित लुई जेकोलियट ( Louis Jacolliot ), क्रोभर ( Crozor ), विक्टरकजिन ( Victor cousin ), काउन्ट जॉन स्टर्जना · ( Count John_Stirjana ), पालड्य सन ( Polldusion ), काउण्ट जोनटोन, ( Count Johnton ), स्वेडिश काउन्ट ( Swedish Count ), कालब्रुक ( Colebrook ), मेगडा नल्ड ( Megdanald ), हीरेन ( Heeren ), विलियम जोन्स ( Wilhamjones ), पायरी लॉटे ( Pieree Late ), आदि विद्वान् उक्त प्रणतभाव के ही समर्थक हैं । पश्चिम की जिज्ञासा -अंशतः प्रस्थाश्रद्धानुगत तथाकथित प्ररणतभाव को चरितार्थ करने के लिए ही पश्चिम ने बड़ी ही आशा - उत्सुकता से पूर्व की ओर देखा । यहाँ उसे मिला क्या?, मिल क्या रहा है?, उत्तर स्पष्ट है । आस्था - श्रद्धा के नैगमिक आम्नाय में हीं अपने षड्भावविकारों से पुष्पित - पल्लवित होने वाले भारतीय आस्तिक जिज्ञासूको यहाँ के वर्त्तमान युग के सन्यासी - साधू - सम्प्रदायाचार्य मठाधीश - दार्शनिक विद्वान् - षट्शास्त्रपारङ्गत मनीषी - तान्त्रिक - सिद्ध - मौनी- तपस्वी आदि आम्नायसंरक्षकों से विगत कतिपय शताब्दियों से जो कुछ जिज्ञासा समाधान के लिए मिला है, मिल रहा है, और भगवान् जाने -- कब तक इसी प्रकार यही सब कुछ? मिलता रहेगा, वही सब कुछ तो मिलना चाहिए था उन प्रतीच्य जिज्ञासुओं को भी । ओर परिणाम इस जिज्ञासा समाधान? का यही तो होना था, जो परिणाम, आज भारतीय आस्तिक प्रजा अश्रुपूर्णाकुलेक्षणा बन कर भोग रही है । सम्भवत: क्यों, निश्चयेन दूरदर्शी . दार्शनिक ईश्वरवादी कान्त ने इसी परिणाम की, सुपरिणाम? की भावी कल्पना के आधार पर ही यह कहना सामयिक माना होगा कि - " हम कृतज्ञ हैं भारतीयों की आत्मनिष्ठा से, तत्त्वमीमांसा से । किन्तु हमें उनकी आचारमीमांसा का कभी अनुगामी नहीं बनना चाहिए, जो मानव को अकर्मण्य बना देती * इनके सोदाहरण निदर्शन ' उपनिषद्विज्ञानमाष्यभूमिका ' प्रथमखण्ड में द्रष्टव्य हैं | ३१८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् हैं " । विश्वास न हो तो प्रमाणमीमांसानुगता जिज्ञासा को सर्वोत्मना उपशान्त करने के लिए कुछ ही समय पूर्व जिज्ञासू अतिथि बन कर समागत ' श्री पॉलबन्टन ' ( Paul Brunton ) की अनुभूति से सम्बद्ध ' गुप्त भारत की खोज ' नामक उनके ही लिखें निबन्ध में देखिए । डॉ ०० पाल ब्रेन्टन की खोज का परिणाम-क्या मिला पॉल को इस भारत गुप्त खोज से?, प्रश्न का समाधान तो स्वयं पॉल से ही प्राप्त करना चाहिए, जिह्नोंनें उन क्रीड़ा - कौतुकों को सामान्य गन्धर्वलीलाओं ( बाजीगरी के प्रदर्शनों ) को ही ' गुप्त भारती खोज ' में विस्तार से उपवणित किया, जो यहाँ के नगर नगर में, ग्राम ग्राम में भोली भँडा लगाए इतस्ततः दंद्रम्यमाण बाजीगर कालबेलिया ( सँपरे ) बुछ एक पैसों के आकर्षण से, करपट्टिकाखण्डाकर्षण ( रोटी के टुकड़ों के ) पर जीर्णशीर्ण वस्त्रों पर बिना निमन्त्रण के ही, बिना जिज्ञासा अभिव्यक्त करते हुए ही न - न करते भी दिखलाते फिरते हैं । ' प्राणनिरोध ' जैसे सामान्य शारीरिक कर्म को ही ' समाधि ' जैसे लोकोत्तर शब्द से घोषित करने वाले योगीराज, सामान्य चेटकों, को ही महासिद्धि घोषित करने वाले तान्त्रिक सिद्धियों के सिद्ध प्राचार्य्यं, नारीकर्म्म सुलभ हंसात्मत्तम्भन ( मेस्मेरेज्म - Mesmerism ) को ही आत्मस्वरूपबोध करा देने की प्रक्रिया घोषित करने वाले तपस्वी-श्रेष्ठ, ( अमुक किसी गुप्त खोज में ही तल्लीन ) लोकसंग्रह - के निन्दक गिरिकन्दराओं में - शून्यपर्वत-कन्दराओं में परोक्षरूपेण अपने भक्तवृन्द से अहोरात्र संवेष्टितकाय मुनिराज, सभी के तो उपवर्णन हुए हैं ' गुप्त भारती की खोज में ' । लप्यालमिदं सर्वम् । पॉल महोदय को क्या विदित था कि, यहाँ कोई आम्नाय ' गुप्त ' नहीं हैं, खनिजद्रव्यसम भूगर्भ निहित नहीं है । अपितु यहाँ की सहज आम्नाय में सबकुछ स्फुटत्तमरूप से आचरण में समाविष्ट है ( पूर्व में पुरुष समाज में, और है वर्त्तमान में भी अपत्ति कहे जाने वाले सहजजीवनानुगत संघर्ष -परायण ग्रामीण मानव समाज में एवं अपठित नारीसमाज के महासङ्गीतों की आम्नायानुगता आम्नायभाषा में ) । निगमाम्नायानुगता सर्वथा सहज देवसिद्धियाँ, तदनुगत सहज आचरण, सब कुछ लुप्त हो गया निगमाम्नाय की विलुप्ति से । एवं स्खलित मान्यतारूप से यत्र तत्र ग्रामीण समाज में, तथा नारीसमाज के महासङ्गीतों में जो निगमाम्नायशेष आज भी बचा रह गया है, उसे निगमाम्नायवञ्चित आज का मानव स्वयं समझने - समझाने में असमर्थ रहता हुआ इस ओर से उपेक्षा कर बैठा । इस दिशा में आकर ही अपने आप को शिक्षित- विद्वान् - सिद्ध - तान्त्रिक - दार्शनिक - वेदान्तनिष्ठ - योगी-महात्मा मुनि घोषित कर देने वाले भारतीय गुरुसम्प्रदाय को स्वप्रतारणापूर्वक परप्रतरणा से सम्बन्ध रखने वाली लोकैषणा के अनुग्रह से ही अपनी उन खोजों? को खोज करने वाले जिज्ञासुओं के सम्मुख. रखदेना पड़ा, जिससे प्रभावित होकर अन्वेषक पॉल को अन्त में जो कुछ मनोभाव परोक्ष रूप से इस ३१६
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श्राद्धविज्ञान वर्त्तमान गुप्त भारत के सम्बन्ध में अभिव्यक्त करने पड़े, उन्हों यथासम्भव न सुना जाय, इसी में आस्तिक भारतीय मानव का श्रेय है । स्तुत्य एवं सर्वात्मना स्पृहणीय है उन प्रतीच्य विद्वानों की जिज्ञासावृत्ति, जो विविध प्रकारों से सदा ही भारत के आमन्त्रण के लिए उत्सुक हैं । उसने शान्तिसंवाहक? बौद्ध मठों की धूलि को मस्तक पर लगाया, वाराणसी में रहकर मुण्डनपूर्वक काषायवस्त्र धारण कर तपः पूत कष्टसाध्य नीवन-यापन को अपनाया, भारतीय दार्शनिक? विद्वानों को आमन्त्रित कर अपनी शिक्षासंस्थाओं में उनके विचारप्रवाहों का सर्वात्मना आतिथ्य किया, सभी कुछ किया, सभी कुछ हुआ, किया जायगा, होता जायेगा, करते ही रहेंगे वे जिज्ञासू कर्म्मठ 1 । किन्तु? इस सर्वस्त्र घातक ' किन्तु - परन्तु ' का इतिहास हम क्या निवेदन करें, जबकि स्वयं हम हीं अपनी नैगमिक न सें पराः परावत बन गए हैं । " हमारे शास्त्रों में ऐसा हमारे दर्शन ऐसे, हमारे वेदों में सब कुछ, यहाँ से सबने लिया, सब ने सीखा ", इसी को क्या आम्नाय कहा जायेगा? | यही है वर्तमान युग के भारतीय विद्वानों की * ' गुप्त भारत की खोज ' नामक सामयिक निबन्ध के मूललेखक तरुणयुवा सर्वश्री ' पाल-ब्रन्दन ' के गुप्त अन्वेषणों का ' श्री वी ० वेङ्कटेश्वरशर्मा शास्त्री ' द्वारा अनुवादित एतन्नामक हिन्दीनिबन्ध जो उपवर्णन हुआ है, उसमें आदि से अन्त पर्यन्त भारतीय उस नैगमिक - आम्नायपद्धति का संस्पर्श भी हमें उपलब्ध नहीं हुआ, जो आम्नाय ही भारत का एकमात्र रहस्यपूर्ण अन्वेषण माना गया है । यही कारण है कि, डॉ ० महोदय को यहाँ जिनसे जो कुछ उपलब्ध हुआ, उस से वे सन्तुष्ट न हो सके | अपनी सहज शिष्टता से भावुकतापूर्ण वर्त्तमान भारतीय मान्यताओं के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त " करने वाले इस शिष्ट मानव को मध्ये मध्ये अपने ये भी सहज उद्गार प्रकट कर ही देने पड़े कि— ( १ ) “ बाकी रात मुझे तनिक भी नींद नहीं आई । मैं जागता हुआ लेटा रहा, और कुम्भकोणम् के जगद्गुरू श्रीशङ्कराचार्य, जिन्हें भारत की - भोली हिन्दू जनता ईश्वर का प्रतिनिधि मानती है - " - इत्यादि ( पृष्ठ २२६ ) । ( २ ) " लेकिन किसी मनुष्य ने किसी जी उबाने वाले भारतीय गाने -भजन - टेक को उच्च स्वर से अलाप कर मेरी इस स्वर्गीय स्वाप्तिक अनुभूति को बड़ी ही कर्कशता से ठेस पहुँचाई ” । - इत्यादि ( पृष्ठ ३५७. ) । ( ३ ) " मैं फिर एकबार मानवजीवन की अविश्वसनीय कथा सुनने लगा । स्पष्ट है कि, पूरबी ‘ संसार में कहीं भी जाऊँ, इस कहानी से मेरा पिंड न छूटेगा । किन्तु क्या कभी इन कल्पनामय पुरुषों भेंट होगी? | क्या इस प्राचीन सिद्धान्त को विज्ञाने और मानसिक शास्त्र के लिए महत्त्वपूर्ण मान कर पश्चिम कभी स्वीकार करेगा, या नहीं " ( पृष्ठ ३८५ ) । ३२०