Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 391–400
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 391–400
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् शास्त्रभक्ति, दर्शनाभिनिवेश, वेदाम्नायघोषणा । आम्नाय का स्वरूप क्या है?, वेद किन विद्याओं का किस पद्धति से प्रतिपादन करता है?, उन स्वरूपों - विद्यार्थी - पद्धतियों का मानवजीवन के साथ कैसे सहज सम्बन्ध है?, यह है आचरणात्मिका नैगर्मिक आम्नाय का वास्तविक स्वरूप, जिसकी वैज्ञानिक पद्धति का एकमात्र स्रष्टा है- ' निगमशास्त्र ', ' जो श्राग्नायपरम्परा से भारतीय जीवन से अनेक शता-दियों से सर्वथा विनिर्गत हो चुका है । व्यक्त बन गई है सर्वात्मना श्राम्नायविरुद्ध कल्पित मतवाद -परम्परा, कल्पित शास्त्राभास, आम्नायव्याख्यावञ्चित भारतीय दर्शनशास्त्र, और सर्वोपरि मूर्द्धाभिषिक्क बन गए हैं पूर्वोपचति दीक्षाभय- समाकुलित सिद्धियों के आकार - प्रकार | क्या निगमाम्नायानुमोदित भावका अनुगामी नहीं बनेगा भारत? । नेति होवाच । यह आम्नाय इसकी सनातन आम्नाय है । इसे दिक्- देश - कालसीमा कभी क्षत - विक्षत नहीं कर सकती । यही शाश्वत श्राम्नाय मानव की सहज जिज्ञासा का गुप्तरूप से नहीं, सर्वथा प्रकटरूप से आज भी समाधान करने के लिए सूर्य्यचत् जरीजागर्त्ति - जरीजागर्त्ति । दूँ ढ़िए, सत्यनिष्ठा से अन्वेषण कीजिए, आस्था श्रद्धापूर्वक अनुगमनप्रवृत्ति को जाग्रत बनाइए । — उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्य वरान्निबोधत!!! क्या वर प्राप्त किया हमनें इस आम्नायमूलक उस समाधान से, जो तटस्थ आलोचकों की तटस्थ आलोचना के प्रसङ्ग से प्रतिज्ञात बना था? । चरप्राप्तिमूलक समाधान एकमात्र है -ज्ञानविज्ञानपरिपूर्ण निगमशास्त्र का आम्नायनिष्ठा से - ' स तु दीर्घकालादर नैरन्तर्य्यसत्कारा सेवितो दृढ़-भूमि: ' नियमानुगतिपूर्वक श्राम्नायपरम्परात्मक स्वाध्याय, तत्त्वानुशीलन, तत्वचिन्तन । कथमपि सम्भव नहीं है भाषायम निबन्धों के माध्यम से, व्याख्यानपरम्परामाध्यम से, एवं तर्क- युक्तिलक्षणा वितण्डावादानुगति से आम्नायजिज्ञासाका वास्तविक समाधान | यही है तटस्थ आलोचना का प्रासङ्गिक तटस्थ एकमात्र समाधान, जिसकी तटस्थता आपद्धर्मधिया निम्नलिखित पावन स्मृति के रूपसे दो शब्दों में निवेदन कर इस प्रासङ्गिक चर्चा से अवकाश ग्रहण किया जा रहा है । तसे अनन्तर की ओर--जैसा कि पूर्व में कहा गया हैं कि, प्रतीच्य विद्वानों की तत्त्वमीमांसानुगता ( श्राचारमीमांसात्मिका धर्म्ममीमांसा से सर्वथा असंस्पृष्टा ) विचारसरणी के माध्यम से ही हमें तटस्थ आलोचना के प्रास ङ्गक समाधान की चेष्टा में प्रवृत्त होना चाहिए, एवं इस दृष्टिकोण - माध्यम से भौतिक विश्वकी स्वरूपानु-गता केवलं तत्त्वमीमांसा की सरणी से ही समाधानोपक्रम करना चाहिए ( देखिए, पृ ० सं ० ३०६ ) । तुष्यद्दु र्जनन्यायेन थोड़ी देर के लिए हम भी भौतिक विश्व की तत्त्वमीमांसा को ' फेनोमेलन ' सम्बन्धी प्रत्यक्षदृष्ट शरीरात्माधिकरण इन्द्रियजन्य ज्ञान का ही उपबृंहण मान लेते हैं, एवं इस दृष्टि से ही उनकी सरणी से ही ' अन्त से अनन्त की ओर ' ( सर्ग से प्रतिसर्ग की ओर, सञ्चर से प्रतिसञ्चर की ओर, विज्ञान से ज्ञान की ओर, अनेकत्त्व से एकत्त्व की ओर, मृत्यु से मृत की ओर, असत् सेस की घोर तप से ज्योति की ओर, विनाश से सम्भूति की ओर, विद्या ..३२१
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श्रविज्ञान से विद्या की ओर, प्रकृति से पुरुष की ओर, कार्य से कारण की ओर, जड़ से चेतन की ओर, मेटर से फार्म की ओर, फेनोमेलन से रीजन की ओर, मेटर से फोर्स की ओर, थीम से थीम की ओर, निष्कर्ष विनश्वर जगत् से अविनश्वर जगदींवर की ओर ) इस दृष्टिबिन्दु के माध्यम से ही हम आलोचना के संक्षिप्त समाधान में प्रवृत्त हो रहे हैं । प्रणवसर्गत्रयीमीमांसा -' जो जिसका गुण, वही उसका दोष ' इस पूर्वोपात्त लोकसूत्र का अपवाद ही माना जायगा भौतिक प्राकृतिक विश्वसर्ग । प्राकृतसर्ग में गुण गुण ही रहता है, दोष दोष ही रहता है । इसी दृष्टि से हमें विश्वेश्वर के गुणसर्ग को, एवं विकारसर्ग ( दोषसर्ग ) की दिशा की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है । कारणसमुदाय को ही कार्य के प्रति कारणता है अन्तमूला सर्गव्याख्या की दृष्टि से, जैसा कि शरीरात्माधिकरणवादिनी अतएव अन्तवादिनी प्रमाणमीमांसानुगता न्याय - वैशेषिक-सांख्यदर्शन से सम्बद्धा सृष्टिसर्गव्याख्याओं में स्पष्ट घोषणा हुई है: । प्रत्यक्षदृष्ट भौतिकविश्व का स्वरूप क्या?, संक्षिप्त उत्तर परस्पर प्रतिद्वन्द्विताक्रान्त, ' प्रतिक्षण विलक्षण परिवर्तन, सदैकरस विलक्षण अपरिवर्तन ' 1 । परिवर्तन के कारण प्रत्येक भौतिक पदार्थ ( जो कि इन्द्रियगोचर है ) बदल रहा है, द्रुतवेग से परिवर्तित हो रहा है । तभी तो इसके ' अस्ति - जायते वर्द्धते - अपक्षीयते-विपरिणमते - विनश्यति ' इत्यादि षटभावविकारात्मक स्थूल परिवर्तन प्रत्यक्षदृष्ट बन रहे हैं । किन्तु चर्य, प्रतिक्षण विलक्षण परिवर्त्तन के विद्यमान रहते भी आदि से अन्तपय्र्यन्त " यह वही पदार्थ है, जो पहिले न था, आज उत्पन्न हुआ, यह वही है, जो पूर्व काल में नवोन था, भावी काल में पुराना हो जायगा " इत्यादि रूप से परिवर्त्तनीय भागों के साथ साथ ही ' वहीं है - वही है ' इस रूप से प्रत्यक्षसृष्टिवत् इस अपरिवर्त्तनीय भाव का भी हमें साक्षातकार हो रहा है, जो साक्षात्कार ' स एवायं देवदत्तः, यः पुरा मया मथुरायां दृष्टः ' इत्यादि वाक्यमाध्यम से ' प्रत्यभिज्ञा ' नाम से प्रसिद्ध है, जिस प्रत्यभिज्ञा के धार पर ( प्रादृष्टि के आधार पर ) सुप्रसिद्ध ' प्रत्यभिज्ञादर्शन ' का आविर्भाव हो पड़ा है । परि वर्त्तन, अपरिवर्तन, दोनों परस्पर तमः प्रकाशवत् अत्यन्त विरोधी, महान् प्रतिद्वन्द्वी, किन्तु दोनों का अन्तरान्तरीभाव सम्बन्ध से × एक ही विन्दु में समसमन्वय, क्या यह आश्चर्य नहीं हैं - ' ते हैते * - ' प्योयर मेटर, तथा क्योयर फार्म्म नाट ' | " फार्म्म ( आकार - चेतन - अक्षर ), और मेटर ( आकारित - जड़ - क्षर ), दोनों का शुद्धरूप स्वतन्त्ररूप से अनुपलब्ध है । ' अमृतं चैव मृत्युश्च सद-सच्चाहमर्जुन ' | - " यद्यत् कार्य्यं तत्तत् कर्तृ जन्यम् कार्य्यच्चात् घटवत् । चित्यङ्करादिकं कर्तृजन्यम् | कारणसमुदायस्यैव कार्य्यं प्रति कारणत्त्वम् ” । > ' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यामृतः श्राहितः । ' तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ३२३
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ब्रह्मणो महती महती यक्षे ' । जब कार्य का स्वरूप भावद्वयापन्न है, तो कारण भी अवश्य ही तंदुरूप ही होना चाहिए । कारणात्मक वही स्वरूप कार्य्यरूप - भावद्वयात्मक भौतिक जगत् का स्रष्टा प्रजा-पति है, जिस कारणरूप स्रष्टा प्रजापति के कारणात्मक भौतिक दोनों रूप क्रमशः ' रस - बल ' नाम से, ' प्रभू - अस्त्र ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं निगमाम्नाय में । गर्भित ' रसात्मा वही स्रष्टा जहाँ मुक्तिभाव का अधिष्ठाता बनता है, वहाँ रसगर्भित बलात्मा वही स्रष्टा भुक्तिभाव का प्रवर्त्तक बनता है । भुक्ति - मुक्ति- अधिष्ठाता वह रसवलात्मक प्रजापति-' आत्मा उ एकः सन्नेततत् त्रयम् ' इत्यादि रूप से तीन प्रकार से अपनी महिमा से विभूति सम्बन्ध से - योग सम्बन्ध से - एवं बन्ध सम्बन्ध से - व्यक्त होता है । स्रष्टाप्रजापति के इन सम्बन्धों का स्वरूप-बोध प्राप्त कर लेना ही भौतिक विश्व का सर्वात्मना स्वरूपबोध प्राप्त कर लेना है । अपने इन विभिन्न सम्बन्धों से प्रजापति तीन प्रकार के सर्गों में प्रवृत्त होता है, जो तीनों प्राजापत्य ' सर्ग ( किंवा उपनिषदों की भाषा में ' महिमसर्ग ' ) क्रमशः १ - ' ऋषिसर्ग - २ - ' पितृसर्ग - ३ - देवसर्ग ' नामों से प्रसिद्ध हुआ है - निगमाम्नाय में, जिन इन तीनों नैगमिक श्रौत सर्गों का स्मृति में इसी नाम से, एवं पुराणपुरुष की भाषा में ' भावसर्ग- गुणसर्ग - विकारसर्ग ' नामों से उपवर्णन हुआ है ( अ ) । पुराणपरिभाषा में ये ही तीनों सर्ग ' मानसीसृष्टि - देवसृष्टि- ' मैथुनी सृष्टि ' -- ( १ ) - सद्वाऽइदमग्र आसीत् । ऋषयो वाव तेऽग्रे ऽसदासीत् । प्राणा वा ऋषयः । इदं ( विश्वं ) इच्छन्तः श्रमेण तपसा ' अरिषन् ' ( प्राणा: - सद्र पाः - इति प्राणा एव ) तस्मात् -' ऋषयः ' । ( शत ० ६ | १ | १ | १ | ) | ( २ ) - आपो वै प्रजापतिः परमेष्ठी । ता हि परमे स्थाने ( सूर्य्यादपि परस्थाने - ऊर्ध्वस्थाने तिष्ठन्ति ) ( शत ० ८ | २ | ३ | १३ | ० २२/१०१५ ) ॠतमेव परमेष्ठी ( तै ० १५५१ | ) - स ( ऋषिमूर्त्तिः स्वयम्भूःप्रजापतिः ) पितृनसृजत । तत् पितॄणां पितृत्त्वम् | ( तै ० २३।८।२ ) - ( शत ० ११।१।६।१७ ॥ ( ३ ) स ( परमेष्ठी ) प्रजापतिरिन्द्र पुत्रमत्रवीत् - ' अनेन चा कामप्रेण यज्ञेन प्रजायानि, येन मां पिता प्रजापतिः ( स्वयम्भूः - ऋषिः ) अयीयजन् - इति 1 । तथेति । ता वा एता देवता: -एतेन कामप्रेण यज्ञेन - अयजन्त " | ( शत ० ११।१।६।२० | ) | ( अ ) - ऋषिभ्यः पितरो जाता, पितृभ्यो देवमानवाः देवेव्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ( मनुः ) । महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ( गीता ० १०/७१ ) विकारां गुणा तान् विद्धि प्रकृति - सम्भवान् ( गीता ० ) ३२३
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श्राद्धविज्ञान मायातीत इन नामों से प्रसिद्ध हुई है । पञ्चदशकलाधारभूत निष्कल सर्वबलविशिष्टर सैकघन परात्पर ब्रह्म की अखण्ड सत्ता से अनुगृहीत पचकल अव्ययात्मा, पञ्चकल अक्षरात्मा, पञ्चकल की समष्टि रूप षोडशकल प्रजापति ही इस सर्गत्रयी का सर्वस्व बना हुआ है, इसी क्षरात्मा, । पञ्चकल क्षरात्मा, आधार पर - ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' यह निगमाम्नाय प्रतिष्ठित हुआ है ' पञ्चकल अक्षरात्मा, दोनों को स्वगर्भ में भुक्त रखने वाला अखण्ड परात्पराभिन्न ' पञ्चक अव्ययात्मा ऋषिसर्ग का प्रवर्त्तक बनता है ' । तर अव्यय को गर्भ में निहित रखने वाला ' पञ्चकल अक्षरात्मा - श्राप-पितृसर्ग का प्रवर्त्तक बनता है ' । एवं परात्पराव्ययाक्षरको स्वगर्भ में भुक्त रखने वाला ‘ प्राण इन तीन वाक् - अन्न - अन्नादमूर्त्ति ' - ' पञ्चकल - क्षरात्मा देवसर्ग का आरम्भक ( उपादान ) बनता है ' । ' सर्ग में । सर्गों में ही मुख्य आत्मसर्ग परिसमाप्त है, जिसका परिपूर्ण समन्वय हुआ है परिपूर्ण ' मानव देवसर्ग के साथ इसीलिए भगवान् मनु ने - ' पितृभ्यो देवमानवाः ' रूप से आत्मसर्वत्रयी के अन्तिम लक्ष्य बनाइए, एवं इसी ' मानव ' का भी संग्रह कर लिया है । इन तीनों आत्मसर्गों को अवधान पूर्वक । अवश्य आप सर्वा-धार पर अपनी तटस्थ आलोचना के प्रासङ्गिक समाधान का अन्वेषण कीजिए ' त्मना सुसमाहित बन जायँगे --- ( १ ) - अव्ययात्मसर्गः - ऋषिसर्गः --भावसृष्टिः} -पुरुषसर्गः ( १ ).. ( २ ) — अक्षरात्मसर्गः -- पितृसर्गः--- गुणसृष्टिः -- प्राकृतसग ( २ ) ( ३ ) - क्षरात्मसर्गः ---देव ( देवमानव ) सर्ग: विकारसृष्टिः सर्गः प्रणव -१. १ - परात्पराभिन्नः - पञ्चकलाक्षर - पञ्चकलचरगर्भितः - आनन्द विज्ञानमनोघनप्राणवाङ्मूर्त्तिरव्ययात्मा पोडपी २ - परात्पराभिन्नपञ्चकलाव्यय - पञ्चकलक्षरगर्भितः ब्रह्मन्द्रविष्णुसोमाग्निमूर्त्तिरतरात्मा — षोडशकलः ३ - परात्पराभिन्नपञ्चकलाव्यय - पञ्चकलक्षर गर्भितः प्राणापोवा गन्नान्नादमूर्त्तिः क्षरात्मा - - पे षोडपकलोपेतः * इसी निगमाम्नाय के आधार पर कुलस्त्रियों की देव - पितृकर्मानुगता महासङ्गीतव्यवस्था षोडश ( १६ ) महासङ्गीतों से ही परिपूर्ण मानी गई है । ' देई देवता हैं ' ( । देवपत्नियाँ और देवता ) ) श्रों के-गीत स्त्रियों की लोकाम्नाय में १६ गीतों में ही परिपूर्ण माने जाते + इन आत्मसर्गों का विशुद्ध वैज्ञानिक विवेचन ईशभाष्य, आत्मपरीक्षात्मक गीताभूमिका ' क ' विभाग, आदि अन्य निबन्धों में द्रष्टव्य है-३२४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) - षोडशीप्रजापतिः- - ऋषिसर्गाधारः - स्वयम्भूत्रह्म एव ऋषिभाव: ( ज्ञानगम्यः ) ( २ ) - षोडशकल प्रजापतिः - पितृसर्गाधारः - परमेष्ठी सुब्रह्म एव पितृभाव: ( श्रपासनिकः ) ( ३ ) - पोडशकलोपेतप्रजापतिः - देवसर्गाधारः - सूर्य्यस्त्रयीधन एव देवभाव: ( यज्ञाधिष्ठाता कम्र्माधिष्टाता ) शेषिक - सांख्य- वेदान्त के आलोच्य दृष्टिकोण -सांख्याभिमत प्रकृति - पुरुषद्वन्द्व की अपेक्षा से नैगमिक सर्ग यद्यपि अव्याख्यात है । तथापि हम अपनी ओर से सांख्याभिमत प्राकृतिक सर्ग के साथ नैगमिक सर्ग का समन्वय करते हुए चार प्रकार के सर्गो का यहाँ प्रसङ्ग समन्वय की दृष्टि से संग्रह कर लेते हैं । सांख्य जिसे प्रकृति कहता है, निगमाम्नाय दृष्टि से वह है वास्तव में ' वैकारिक पशु भाव ' । एवं सांख्य जिसे ' पुरुष ' कहता है, वह है निगमदृष्टि से वास्तव में ' विकृति ' भाव, जो इत्थंभूत दृष्टिकोण अवश्य ही अव्यक्तनैष्ठिक प्राधानिकों की उत्तेजना का कारण बन सकता है । अणिमामहिमादि सम्पूर्ण सिद्धियाँ, भूतप्र ेतसर्ग आदि सब कुछ सांख्य के उस कारिक पशुसर्ग में हीं अन्तभूत मानें जायेंगे, जो पशुसर्ग वर्त्तमान दर्शन, किंवा तत्सम अन्य तन्त्रादि शास्त्रों में उपवरित सिद्धिपरम्पराओं के माध्यम से निगमाम्नाय से देवभाव में परिणत भी मानव की वैकारिक प्रवृत्ति का ही कारण प्रमाणित हो रहा है । निगमने इस वैकारिक दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया हो, यह बात तो नहीं है । अवश्य ही निगमशास्त्र ने विज्ञानात्मिका कारणता - मीमांसा-पूर्व विस्तार से सांख्याभिमत वैकारिक सर्ग का भी निरूपण किया है । निगमशास्त्र ( मूलसंहिताओं ) में विस्तार से सांख्यदृष्टिकोण निबन्धन चतुर्दशविध उस भूतसर्ग का विस्पष्ट निरूपण हुआ है, जिसे हमनें पार्थिव चान्द्रसर्ग, किंवा चान्द्रगर्भित पार्थिवसर्ग कहा है । अतएव चतुद्दशविध भूतसर्गों के आदिभूत ब्रह्मादि आठ देवसर्ग निगम में ' पार्थिवदेवाः ' कहलाए हैं, जो अपनी सहजसिद्ध प्राकृतिक सिद्धियों से यथाजात मनः शरीरपरायण चान्द्रपार्थिव ' नर ' पर अनुग्रह किया करते हैं । तत्त्वगुणानुबन्ध से दिव्यभावापन्न इन पार्थिव अष्टविध चान्द्रदेवताओं का प्रादुर्भाव ' अत्राह गोरमन्वत - इत्था चन्द्रमसो गृहे ० ' ( ऋग्वेद ) इत्यादि मन्त्रानुसार चन्द्रानुगता - चन्द्रमण्डल-सौररश्मियों से ही हुआ है । इसी सौरगौ ( रश्मि ) सम्बन्ध से इन दिव्य सत्त्वगुणक ) पार्थिव -चान्द्रदेवों को ' गोजाता: ' ( सौररश्मि से चन्द्रमण्डल में उत्पन्न ) कहा गया है । चन्द्रमा स्वयं ' चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्ण: ० ' के अनुसार आपोमय है । अतएव तद्रूप इन गोजात देवों को ' प्या ' ( पोमय ) कहा जायगा । पितृभावापन्न ये ही चान्द्रदेव ' नर ' नामक पार्थिव यथाजात मानव को ( मानवद्वारा मान्यता - आस्था श्रद्धापूर्वक तुष्ट तृप्त किए जाने पर ) सम्पत्ति, पुत्रादि श्राशी- ' र्भावों से समन्वित कर देते हैं । तभी तो इह्न ' ' दातारः ' कहा गया है । चान्द्रपितृदेवानुबन्धिनी आशीः ३२५
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श्राद्धविज्ञान का इसी दृष्टि से - ' दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम् ' - ' गोत्रं नोऽभिवर्द्धन्ताम् ' - बहुदेयं च नो s स्तु ' इत्यादि रूप से वर्णन हुआ है I । स्वयं मूलसंहिताने स्पष्ट रूपसे इस पार्थिवदेववर्ग का यों स्वरूपविश्लेषण किया है । देखिए! नो यो
मोजतो दातारो भूत नृवतः पुरुक्षोः ।
दशस्यन्तो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता श्रप्या मुलता च देवाः ॥
- ऋक सं ० ६।५० | ११ | किन्तु ततप्रतिपादक स्वयं सांख्य नैगमिक श्राचारमीमांसा से, नैगमिक व्याख्या से संस्पृष्ट रहता हुआ । जैसा कि सांख्य की त्रिगुणात्मिका अव्यक्तभाषा से प्रमाणित हो रहा है ) इस नैगमिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एकान्ततः पराङ मुख ही बना रह गया है । अवश्य ही सांख्य ने ' न वयं षट-पदार्थ वादिनः- वैशेषिकवत् ' कहते हुए अपने लक्ष्य को वैशेषिक दर्शन से उच्च प्रमाणित करते हुए दिग्देशकालसीमा से निकलने का स्तुत्य प्रयास किया है । सम्भवतः सांख्य के इसी दृष्टिकोण के स्वाध्याय से प्रभावित पश्चिमी दार्शनिक ( जिसे इस दृष्टिकोण से हम सांख्यवादी कह सकते हैं ) सर्वश्री कान्त की तत्त्वमीमांसा अन्य दार्शनिकों की अपेक्षा अंशतः व्यवस्थित, अतएव वर्त्तमान दार्शनिक जगत् की दृष्टि में मान्या भी प्रमाणित हो रही है । किन्तु सांख्य का सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान, उसकी त्रिगुणात्मिका सर्वाधिष्ठात्री प्रकृति के माध्यम से संख्यातः सिद्ध उसका पुरुषानुगत ज्ञान ( तत्त्वमीमांसा ) वस्तुतः पशुसर्ग के मूलाधारभूत विकारक्षर की ही मीमांसा है । अतएव सांख्य अध्यात्मज्ञानानुगता नैगमिक आचारमीमांसा से सर्वथा परांङ मुख बनता हुआ दर्शनाभास ही प्रमाणित हो रहा है । जब सांख्य की यह स्थिति है, तो अणुवादी उस विशेष - भूतपदार्थ की व्याख्या करने वाले दिग्देशकालसीमा में आमूलचूड़ निबद्ध वैशेषिकदर्शन के सम्बन्ध में क्या मीमांसा की जाय, जो नैमिक प्रवर्ग्य. ( उच्छिष्ट ) भूतभौतिक आत्यन्तिक वैकारिकसर्ग से समतुलित बन रहा है । शेष रह जाती है सुप्रसिद्ध वेदान्तनिष्ठा, तत्प्रतिपादक वेदान्तदर्शन । सचमुच हमें अन्तरात्मा से क्षुब्ध होते हुए इसके सम्बन्ध में भी यही भाव अभिव्यक्त करना पड़ रहा है कि, नैगमिक आचारमीमांसा प्राकृत-सर्गव्याख्या से वैशेषिक - सांख्यवत् असंस्पृष्ट रहता हुआ यह दर्शन भी केवल ' क्षरब्रह्म ' का ही स्पर्श कर पाया है, जो क्षरब्रह्म ' भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि महद्ब्रह्म कमतरं - बहुब्रह्म कमक्षरम् ' इत्यादि निगम - वचनानुसार जन्मस्थितिभङ्गात्मक विश्व के मूलभूत क्षरब्रह्म को ही अपना मुख्य लक्ष्य बना रहा है, जिसे नैगमिक परिभाषानुम्पर ' विकृति ' ही कहा जायगा । यही वहाँ का ' ब्रह्म ' है, इसी की वहाँ प्रारम्भमूला जिज्ञासा है, यही वहाँ जन्मादि का कारण घोषित हुआ है, एवं यही शास्त्रसिद्ध ब्रह्म है वहाँ । * " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा, जन्माद्यस्य यतः, शास्त्रयोनित्वात्, तत्तु समन्वयात् " - वेदान्तसूत्र चतुष्टयी ३२६
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वेदान्त का विवर्त्तवाद -ऋणमोचनोपायोपनिषत् बेदान्त का ' विवर्त्त ' वाद ही इसका सूचक है कि, औपनिषद सिद्धान्त के माध्यम से सज्जीभूत वेदान्त ने उपनिषत् के ' महिमा ' शब्द की उपेक्षा कर उस कल्पित ' विवर्त्त ' शब्द की व्याख्या से वेदान्तनिष्ठा का समन्वय करने की चेष्टा की, जिस ' विवर्त्त ' का समन्वय दार्शनिकों से अद्यावधि नहीं हो सका है । पश्चिमी विद्वान् भी सांख्यपर्यन्त तो यथाकथञ्चित अनुधावन कर लेते हैं, किन्तु वेदान्त के ' वि ' शब्द से संत्रस्त बन कर उन्हें भी यहाँ हतप्रभ ही हो जाना पड़ता है । ' महिमा ' शब्द जहाँ ब्रह्मसर्गव्याख्या को, नैगमिक सृष्टिविज्ञान को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित रखता हुआ वेदान्तदर्शन की मीमांसा को आचरणात्मिका आचारमीमांसा से समन्वित करने की क्षमता रखता है, वहाँ ' विवर्त्त ' शब्द ' मृगमरीचिका - बन्ध्या पुत्र - शशशृङ्ग -- खपुष्प - स्थारणू पुरुष - स्वप्नजगत् ' - जैसे बालभावापन्न · लोकप्रतारणात्मक उदाहरणाभासों से प्राकृत नैगमिक सर्ग का मानों उपहास सा ही करता हुआ ' जग-मिध्यात्व ' वाद की जो व्यञ्जना व्यक्त कर रहा है, उसी के अनुग्रह से भारतीय नैगमिक आ आज विस्मृति के गर्भ में विलीन होता हुआ भारतीयों को अभिशप्त - श्रभितप्त - लक्ष्यच्युत - अकर्मण्य ही बनता जा रहा है । प्राकृतिकसर्गाम्नायमूलक नैगमिक पुरुषार्थ से वञ्चित वर्त्तमानयुग का भारतीय मानवसमाज एकहेलया बेदान्तनिष्ठ बनता हुआ उभयलोकसम्पत् से वचित होता हुआ - ' कलौ वेदान्तिनः सर्वे ' को अक्षरशः चरितार्थ कर रहा है । सर्वश्री कान्त ने यह ठीक ही कहा है कि, “ पश्चिम को पूर्व की ऐसी आचारमीमांसा का अनुगामी नहीं बन जाना चाहिए, जो अकर्मण्यता का ही सर्जन करती है " । सम्वत्सरचक्रत्रयी, और सर्गत्रयी-निष्कर्षतः अणुवादी वैशेषिक ने पञ्चमहाभूतात्मक वैकारिकसर्ग को अपना प्रतिपाद्य बनाया दिग्-देशकालानुगतिपूर्वक, जिसका ' पार्थिवसम्वत्सरचक्र ' से सम्बन्ध माना जा सकता है । ' त्रिगुणवादी ' सांख्य ने दिग्देशकाल को अमान्य ठहराते हुए ' विकारसर्ग ' को अपना निरूपणीय माना, एवं इस ‘ बिकार ' को ही इसने ‘ प्रकृति ' नाम से घोषित किया, जिसका ' चान्द्र सम्वत्सर चक्र ' से सम्बन्ध माना जा सकता है । ' विवर्त्तवादी ' वेदान्त ने ' क्षरब्रह्म ' को अपनी जिज्ञासा का लक्ष्य बनाया, एवं यही वहाँ जन्मस्थितिभङ्गाधार ' ब्रह्म ' घोषित हुआ, जिसका ' अक्षरधिया ' ' सौरसम्वत्सरचक्र ' से सम्बन्ध माना जा सकता है । यह साथ ही स्पष्ट कर लेना चाहिए कि, इस दर्शनत्रयी की क्षर -विकार - वैकारिकभाव-निबन्धना तत्त्वमीमांसा इसकी अपनी काल्पनिक मीमांसा है, जिसके साथ निगमव्याख्यानुगता आचार-मीमांसाभावापन्ना सौर - चान्द्र - पार्थिव - सम्वत्सर चक्रत्रयी से कोई सम्बन्ध नहीं है, जिसके बिना इस भारतीय दर्शनत्रयी का कोई महत्त्वपूर्ण स्थान शेष नहीं रह जाता । तालिकाद्वारा समन्वय कर लीजिए इस दार्शनिक दृष्टिकोण का -३२७
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श्राद्धविज्ञान ( १ ) - आत्मक्षर: ( अपराप्रकृति: ) --ब्रह्म १ ( २ ) - विकारक्षर: - ( पञ्चजन प्रकृति: ) -- विश्वम् ( १ ) - विकारक्षर: ( गुण प्रकृतिः ) -- पुरुष: ) - वैकारिकतर: ( भूतप्रकृति: ) - प्रकृतिः ( १ ) - वैकारिकक्षर: ( पशुप्रकृति: ) - - विकृतिः ( २ ) - पञ्चमहाभूतानि ( वैकारिकजगत् ) -विकाराः वेदान्तनिष्ठा - सौर सम्वत्सरात्मिका ( विवर्त्तवादः ) J सांख्यनिष्ठा —चान्द्रसम्वत्सरात्मिका ( गुणवाद:) वैशेषिकनिष्ठा – पार्थिवसम्वत्सरात्मिका ( भूतवाद:) ' सेतु ' माध्यम से मीमांसोपक्रम -जिन नैगमिक भाव - गुरु - विकार - नामक इन तीन ऋषि- पितर - देव- सर्गों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उनके समतुलन की दृष्टि से ब्रह्म, किंवा ' पुरुष ' किसे कहना चाहिए?, एवं प्रकृति किसे मानना चाहिए?, ये मीमांस्य प्रश्न हैं दार्शनिकों के लिए । दो शब्दों में इस समन्वयदृष्टि की मीमांसा कर लेना भी अप्रासङ्गिक न होगा । इस समन्वय के लिए हमें किसी वैसे ' सेतु ' ( कूल-किनारे ' इस औपनिषद सिद्धान्त के ) मध्यम बनाना पड़ेगा, जो वास्तव में - ' यः सेतुरीजानानाम् अनुसार ' सेतु ' अभिधा से प्रसिद्ध हुआ है । ' मानव ' दृष्टया हम मानवसर्ग को ही नैगमिक ' सेतु ' ( ऋषि - पितृ - देवसर्गत्रयी ) का, एवं इस कहेंगे, जो उस ओर की अमृतभावापन्ना वैज्ञानिकसर्गत्रयी ओर की मर्त्यभावापन्ना दार्शनिकसर्गत्रयी का मध्यस्थ प्रेक्षक, वास्तव में मध्यस्थ बनता हुआ ' सेतु ' प्रमा-गित हो रहा है । यद्यपि चान्द्रसर्गवादी सांख्य की दृष्टि से मानवसर्ग सत्त्वगुणप्रधान - अष्टविध - देवसर्ग से इस ओर, एवं तमोगुणप्रधान स्तम्बसर्ग के उस ओर मध्य में प्रतिष्ठित मर्त्य सेतु है, रजोगुण-प्रधान सर्ग है । किन्तु निगमव्याख्या के अनुपात से मानवसर्ग का साक्षात् सम्बन्ध है ' सौरसम्वत्सर-चक्र ' से, जैसा कि - ' अहं सूर्य इवाजनि ' से प्रमाणित है । पूर्व में भी सांख्यसर्गानुगत ' पितर परिवार ' की मीमांसा करते हुए हमनें दोनों दृष्टिकोणों का स्पष्टीकरण कर दिया है ( देखिए पृष्ठ संख्या २८६ ) । पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्यचल्शा-विषय बहुत विस्तृत बनता जा रहा है । अतः अव विशेष विस्तार की ओर न जाकर हमें ' पञ्चजन ' शैली से अनुप्राणित उस ' पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यचल्शा ' के माध्यम से इन नैगमिक ३२८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( वैज्ञानिक ), तथा दार्शनिक सर्गों के तारतम्य की मीमांसा में प्रवृत्त हो जाना चाहिए, जो बल्शा ! टहनी - शाखा ) अव्ययेश्वरषोडशप्रजापति - सहस्रवल्शामूर्त्ति - अश्वत्थवृत्तमूत्ति की सहस्रवल्शाओं में से केवल ' पञ्चजन ' नाम की एक वल्शा से ही सम्बन्धित है । अव्ययेश्वर से संयुक्त अक्षरद्वारा आत्मक्षरोपादान से उत्पन्न विकारक्षरों के पञ्चीकरण से जो पञ्च पञ्चात्मक पाँच तर प्रादुर्भूत हुए, वे ही ' पञ्चजन ' कहलाए । इन पञ्चीकृत पञ्चात्मक ( प्रत्येक ) पाँच क्षरों से ( पञ्चजनों से ) इन ' के पञ्चीकरण से पञ्चविंशति - पञ्चविंशति ( २५-२५ ) कल पुरभावसमर्पक जो क्षर सम्पन्न हुए, वे ' वेदा: - लोकाः - देवाः - पशवः - भूतानि ' नामक ' पुरञ्जन ' कहलाए । इन पुरञ्जनों के पञ्ची-करण से जो पाँच पुर प्रादुर्भूत हुए, वे ही निगमपरिभाषा में क्रमशः ' स्वयम्भूः - परमेष्ठी - सूर्य: -चन्द्रमाः, -पृथिवी - ' इन नामों से प्रसिद्ध हुए । इन पाँचों पुरों का इतिहास ही निगमाम्नायानुगत प्राकृत सर्गेतिहास हैं, जिसे हम निगम के शब्दों में ' ऋषि - पितर - देव - मानव - पशु - भूत ' इन ६ भागों में विभक्त मानते हुए ' षडविधप्राकृतसर्गेतिहास ' भी कह सकते हैं । भूत, किंवा - पञ्चमहाभूतों का इतिहास ही ' पृथिवी का इतिहास ' ( १ ) है । पशु, किंवा प्रवर्ग्य का इतिहास ही ' चन्द्रमा का इतिहास ' ( २ ) है | मानव, किंवा भुक्त्यनुगत मानवात्मक लौकिक मानव का इतिहास ही सेतुस्थानीय ' मानव का इतिहास ' ( ३ ) है । देव, किंवा मुक्त्यनुगत देवात्मक - देवभावापन्न, अलौकिक मानव का इतिहास ही ' जनेतिहासात्मक सूर्य का इतिहास ' है ( ४ ) । पितरों का इतिहास ही ' परमेष्ठी का इतिहास ' ( ५ ) है | एवं ऋषियों का इतिहास ही ' स्वयम्भू ब्रह्म का इतिहास ' है ( ६ ) । इस षड्विध इतिहास को मूल बना कर ही तो हमें आलोचना का समाधान करना है । ( १ ) - ऋषि - इतिहास: - ( स्वयम्भू - इतिहास ) ( २ ) - पितर- इतिहास: - परमेष्ठी इतिहास ) -( ३ ) - देव - इतिहास: ( ४ ) - मानव इतिहासः - प्राणेतिहासः ( आकाशेतिहासः ) --अबितिहास: ( वायुरितिहास: ) - ( सूर्य - इहास ) - वागितिहास: ( ५ ) - पशु - - इतिहास: - - ( चन्द्र तिहास ) ( ६ ) - भूत - इतिहास: - ( पृथिवी - इतिहास ( तेज इतिहास: ) अन्नेतिहासः ( जलेतिहास: ) - अन्नादेतिहासः ( पृथिवीतिहास: )
* यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इत्र स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥
३२६ पञ्चपुण्डीराप्राजा सोऽयं वा षड्विधो पञ्चविधः
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श्राद्धविज्ञान ( १ ) - ऋषि इतिहासः - ( स्वयम्भूः ) “ प्राण वा ऋषयः ” ( शत २६ १ १ १ १ ) - " ब्रह्म वै स्वयम्भूस्तपोऽतप्यत । स सर्वेषु भूतेषु श्रात्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि ( हुत्वा ) - सर्वेषां भूतानां ष्ठ्यं स्वाराज्यं श्राधिपत्यं पय्यैत् " ( शत - १३ | ७ | १ | १ | ) । ( २ ) - पितर- इतिहास ( परमेष्ठी ) -" आपो वा इदं सर्वं यत् परमे स्थाने तिष्ठन्ति । तस्मात् ' परमेष्ठी ' नाम " ( शत ० ११।६।१: -१६ ) - " तृतीये वा इतो लोके ( सोमात्मके परमेष्ठिलोके - ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोमः ' ) पितरः " ( तै ० ब्रा ० १ | ३ | १८ | ५ | ) | ( ३ ) - देव इतिहासः ( सूर्यः ) -" तं देवा अत्र वन् सुवीर्यो मर्य्या यथा गोपायत १. इति तत् सूर्यस्य सूर्य्यच्चम् " ( ao To RIRIPO 81 ) — 40 " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता: " - " सूर्यो ह सर्वेषां देवानामात्मा " ( शत - १ | ३२ || ) । ( ४ ) - पशु - इतिहासः ( चन्द्रमाः ) -" एष वै सोमो राजा देवानामन्न यच्चन्द्रमाः " ( शत ० १ | ६ | ४ | ५ | ) - " सौ वै चन्द्रः पशुः, तं देवाः पौर्णमास्यामालभन्ते ” ( शत ० ६।२।२।१७ । ) । ( ५ ) -- भूत - इतिहासः ( पृथिवी ) -" इयं वै पृथिवी भूतस्य प्रथमजा " ( शत ० १४।११२ ११० - यजुः सं ० ३७ ४1 ) - " सर्वेषां भूतानां पृथिवी रस: " । ( छन्दोग्य उ ० १ १ २ ) - " इयं वा पृथिवी अन्नादी " ( कौ ०२६।५ । )! " अस्मिन् हि लोके - पृथिव्यामेव - सर्वाणि क्षियन्ति " ( शत ० १४।१२।२४ । ) ” । दार्शनिकतत्त्वमीमांसा के अनुरोध से उक्त छत्र ऐतिहासिक सर्गों को क्रमशः ( १ ) - अव्ययात्मानु-गत ( षोडशीप्रजापत्यनुगत ) ऋषिसर्ग को ' पुरुषसर्ग ' कहा जायगा । ( २ ) - अक्षरात्मानुगत ( षोडशकल प्रजावत्यनुगत ) पितरसर्ग को ' परा प्रकृतिसर्ग ' कहा जायेगा । ( ३ - आत्मक्षरानुगत ( षोडशकलोपेत प्रजापत्यनुगत ) देवसर्ग को ' परा प्रकृतिसर्ग ' कहा जायगा । ( ४ ) - विकृतितरानुगत सौर सम्वत्सर-चक्रात्मक मानवसर्ग को ' विकृतिसर्ग ' कहा जायगा । ( ५ ) -विकारादि सामान्यतरानुगत चान्द्रसम्वत्सर-' चक्रात्मक पशुसर्ग को ' विकृतिसर्ग ' कहा जायगा । ( ६ ) - एवं वैकारिक विशेषक्षरानुगत पाथिवसम्वत्सर-चक्रात्मक जैकारिक सर्ग को ‘ भूतसर्ग ' कहा जायगा । इस निगमाम्नायदृष्टि से ६ श्रों सर्गों का तात्त्विक ( तत्त्वमीमांसासम्मत ) समन्वय लोकसंग्रहधिया तालिकामाध्यम से निम्न लिखित रूप से समन्वित माना जा सकेगा -३३०