Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 401–410
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 401–410
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१ २.. ३ ' १ आनन्दः विज्ञानम मनः १ २ ३ ब्रह्मा विष्णुः इन्द्रः ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( १ ) - प्राकृतिकसर्गाधारः - सर्गनिमित्तः - सर्वोपादानः - सर्वमूत्तिः - सर्वेश्वरप्रजापतिपरिलेख: – अद्ध े मात्रः - अमात्रः - सर्वमात्रः - मात्रातीतः - मायातीतः - परात्परः - विश्वातीतः - ' प्रखण्ड परात्परः ' अव्ययः ' पुरुषः ' पञ्चकलः अक्षरः पञ्चकल: ' पराप्रकृतिः ' ४ ५ प्राण: वाक् ४ ५ सोमः अग्निः १ २ ३ ४ ५ प्राणः आपः वाकू अन्नम् अन्नादः आत्मक्षरः पश्ञ्चकलः ( शुद्धः ) ( शुद्धा:) ( शुद्धा ) ( शुद्धम् ) ( शुद्धः ) ' अपराप्रकृतिः ' ( १ ) ( १ ) ( * ) ( १ ) ( १ ) १ ३ ४ ५ विकृतिक्षर: प्राणः आपः वाकू अन्नम् अन्नादः ४ पञ्चजनः ( पञ्चीकृत:) ( पञ्चीकृताः ) ( पञ्चीकृता ) ( पञ्चीकृतम् ) ( पञ्चीकृतः ) ' विकृतिः ' ( * ) ( * ) ( * ) १ २ ३ ४ ५ विकारकक्षरः वेदाः लोका: ( २५ ) ( २५ १ २ ३ देवाः पशवः भूतानि ( पञ्चपञ्चीकृताः ) ( पञ्चपञ्चीकृताः ) ( पञ्चपञ्चीकृताः ) ( पञ्चपञ्चीकृताः ) पञ्चपञ्चीकृतानि ( २५ ) पुरञ्जनम् ‘ विकारः ’ वैकारिकक्षरः ( २५ ) ( २५ ) ५ ६ स्वयम्भूः परमेष्ठी चन्द्रमाः पृथिवी पुराणि ( आकाशात्मा ) ( वाय्वात्मा ) ( तेजोमयात्मा ) ( १०० ) ( 200 ) ( १०० ) ( १०० ) ( जलात्मा ) ( पृथिव्यात्मा ) ' वैकारिकानि ' ( १०० ) पञ्चपञ्चीकृत पञ्चपञ्चीकृत पञ्चपञ्चीकृत-पञ्चपञ्चीकृत पञ्चपञ्चीकृत-स एष वशेश्वरः वेदपुरञ्जन | लोकपुरञ्जन प्रधान: प्रधान: देवपुरञ्जन -पशुपुरञ्जन-प्रधानः प्रधान: भूतपुरञ्जन -प्रधाना शतमूत्तिः शतमूत्तिः सर्वमूर्त्तिः सर्वमूर्त्तिः शतमूर्त्तिः शतमूर्त्तिः शतरूपा सैषा सर्व मूत्तिः सर्वमूर्त्तिः सर्वरूपा श्राजापत्यवल्शा १ २ ३ ४. ५ यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता श्रभि यत् संवहन्ति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तंत्र देवाः सर्व एकी भवन्ति एष एव सर्वेश्वरः प्रजापतिः ३३१
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श्राद्धविज्ञान ( २ ) अश्वत्थवृक्षात्मनिबन्धनपुरुष प्रकृतिभावपरिलेख: -( १ ) - परात्पराभिन्नः पञ्च कलाक्षर पञ्चकलात्मक्षरगर्भितः-( २ ) - पञ्चकलात्मक्षर - परात्पराभिन्नपञ्चकला व्ययगर्भितः-आनन्दविज्ञानमनोघनोवाक्प्राणमूत्तिः - अव्ययात्मा ( १ ) ब्रह्म ेन्द्रविष्णुघनःसोमाग्निमूर्त्तिः-( ३ ) - परात्पराभिन्नपञ्चकलाव्ययपञ्चकलाक्षरगर्भित: -प्राणापोवाग्धनोऽन्नान्नादमूर्त्तिः--अक्षरात्मा ( 2 ) - आत्मक्षरात्मा ( ३ ) ' श्रव्ययाक्षरात्मक्षरगभितः पश्वीकृत -प्राणापोवागन्नान्नादमय: -- विकृतिभावः ( ३ ) ( ५ ) - अव्ययाक्षरात्मक्षरपञ्चीकृत विकृतितरगर्भित - पञ्चपञ्चीकृत-२ वेद लोकदेवपशुभूतमय: --अव्ययाक्षरात्मक्षरविकृतिविकारगर्भितः- शतमूर्त्तिः-स्वयम्भूपरमेष्ठी सूर्य्यचन्द्रभूमिमयः - - वैकारिकभावः ( १ ) -विकारभाव: ( २ ) X ( ३ ) विश्व श्वरात्मनिबन्धन - पुरुषप्रकृतिद्वन्द्व परिलेख: -( १ ) अव्ययात्मा - षोडशीप्रजापतिः- -------- पुरुषः--औपनिषदः ( ऋषिसर्गाधारः ) ( २ ) अक्षरात्मा --- षोडशकलप्रजापतिः -- - प्रकृतिः परा - आरण्यकी ( पितृसर्गाधारा ) ( ३ ) आत्मक्षरात्मा - पोडशकलोपेतप्रजापतिः -- प्रकृतिरपरा - ब्राह्मणानुगता ( देवसर्गाधारा ) ( ३ ) विकृतिविश्वम् - विश्वम्-( २ ) विकार विश्वम् जगत्-( १ ) वैकारिकविश्वम् - संसार: -- विकृतिः - - वेदान्तानुगता ( मानवसर्गाधारा ) - विकारः - - सांख्यानुगता ( पशुसर्गाधारः ) - ठौकारिकः - वैशेषिकानुगता ( भूतसर्गाधारः ३३२ : दर्शनदृष्टि दृष्टिः विज्ञान -A विश्वम् विश्वात्मा
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T: सा : ( २ ) भावः ( १ ) fun र्गाधार: ) सर्गाधारा ) देवसर्गाधारा ) नवसर्गाधारा ) M सर्गाधारः ) ( भूतसर्गाधारः ) दर्शनदृष्टिः : विज्ञानदृष्टि -( १ ) विश्वम् विश्वात्मा ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ४ ) दार्शनिकदृष्टिकोण निबन्धनप्रकृतिपुरुषद्वन्द्व परिलेख: ---प्रकृतिरपरा ( पराप्रकृतिरूपाक्षरानुगृहीतः क्षरः ) एव घिजिज्ञास्यं ब्रह्म- - वेदान्तब्रह्म १ विकृतिरेव — विश्वम् - ब्रह्मसर्गः - -- विश्वसर्गः - - जन्मादिलक्षणः - - वेदान्त सर्गाभासः विकृतिरेव — संख्यातः सिद्ध: - -ज्ञानात्मकः प्रकृतिः - पुरुष: - - सांख्यप्रकृतिराभासिकी - सांख्यपुरुषः विकार एव - पशुभाव एव - चतुद्द शविधसर्गाधिष्ठात्री विकारा एव - भौतिक विश्वम्-३ -धर्माधारः - ईश्वर: - - वैशेषिक - आत्माभासः वैकारिक एव भौतिक सर्गमीमांसा --- धर्मसाधकाः पदार्थाभासाः - वैशेषिकविज्ञानाभासः ( ५ ) नैगमिकदृष्ट चनुगत - प्रकृतिपुरुषद्वन्द्वानुबन्धी - सर्गपरिलेख: -परमेष्ठी सूर्य : दम्पती दम्पती दम्पती । दम्पती चन्द्रमाः दम्पती ऋषिसर्गाधारः स्वयम्भूः ( १ ) - स्वयम्भूः-( २ ) - परमेष्ठी - - ऋतमेव-: - परमाकाशः - पुरुषः - ' पुरुष एवेदं सर्वम् ' - प्रकृतिः - प्रकृतिरेवेदं सर्वम् ( पुरुषसर्गः ) ( ऋषिमानवाधिष्ठाता ) ( १ - परमेष्ठी - ऋतमेष- - पुरुषः - प्रकृतिलक्षणः पुरुषः -( २ ) - सूर्य्यः -- पुराणाकाशः - प्रकृतिः - विकृतिलक्षणा प्रकृतिः ( १ ) - सूर्य: --- सत्यमेव - पुरुषः - प्रकृति विकृतिलक्षणः पुरुषः-( २ ) - चन्द्रमाः -- ऋतमेव- प्रकृतिः - विकृतिलक्षणा प्रकृतिः ( १ ) - चन्द्रमाः - ऋतमेव - - पुरुषः - विकृतिविकारलक्षणः पुरुषः ( २ ) - पृथिवी -- भूताकाशः -- प्रकृतिः - विकारलक्षणा प्रकृतिः पृथिवी ( १ ) - पृथिवी भूतम् - पुरुषः- विकारवैकारिकलक्षणः पुरुषः ( २ ) - भूतानि -- सत्यमेव - प्रकृतिः - वैकारिकलक्षणा प्रकृतिः ३३३ पितृसर्गाधार: ( प्रकृतिसर्गः ) ( यति मानवाधिष्ठाता ) मानव-( विकृतिसर्गः ) ( मुनिमानवाधिष्ठाता ) पशुर्गाधारः ( विकार सर्गः ) लोक-मानवस्थानम्; भूतसर्गाधार:. (ौकारिकसगः )
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भारतीय दर्शन का आलोच्य दृष्टिकोण-श्राद्धविज्ञान भारतीय दार्शनिकोंने जिस शैली से तत्त्वमीमांसा करते हुए अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को परम्परया आत्मबोध का साधक घोषित किया है, वह प्रथम तो पञ्चम परिलेखानुगत नैगमिक दृष्ट्यनुगता प्रकृति - पुरुषद्वन्द्वानुबन्धिनी पञ्चविधा सर्गमीमांसालक्षणा उस आचारमीमांसा ( पञ्चविध-प्राकृतसर्गमीमांसा ) से सर्वथा असंस्पृष्ट ही रहा है, और यही श्राचारमीमांसा - बहिंर्भूता भारतीय दार्शनिक तत्त्वमीमांसा की ऐकान्तिकी वह अनुपादेयता, तथा अनुपयोगिता है, जिसे मूल बना कर भारतीय आध्यात्मिक त्र्याचारमीमांसा के जिज्ञासू प्रतीच्य विद्वान् भारतीय दर्शनशास्त्रों से, तद्विज्ञ दार्शनिकों से बड़ी ही आशा - प्रतीक्षा के साथ समय समय पर अपनी जिज्ञासा अभिव्यक्त करते रहते हैं । केवल भारतीभाषा ( संस्कृतभाषा ) के विद्वान् भारतीय दार्शनिक प्रतीच्य विद्वानों की जिज्ञासा-शान्ति में समर्थ इस लिए बने रह जाते हैं कि, न तो इनके द्वारा उनकी भाषा में भारतीय दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण ही सम्भव, एवं न उनके द्वारा इन की भाषा ( संस्कृत ) में जिज्ञासा का ही स्पष्टीकरण सम्भव । अवश्य ही वैसे भारतीय दार्शनिक इस दिशा में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, जो संस्कृत-वाङमय के साथ साथ न केवल प्रतीच्यभाषा के ही, अपितु प्रतीच्य दार्शनिक दृष्टिकोण के भी सुविज्ञ नहीं, तो विज्ञ अवश्य हों । होंगे अवश्य ही वैसे भी उभयनिष्ठ भारतीय दार्शनिक, किन्तु हम दुर्भाग्यवश जैसे उभयनिष्ठ भारतीय दार्शनिकों की अभिधा से अपरिचित ही हैं । यदि वैसे उभयनिष्ठों से परिचित होते, तो अवश्य ही उनसे यह जानने का प्रयास किया जाता कि, आचार-मीमांसावजिता प्रतीच्य तत्त्वमीमांसा को ही लक्ष्य बनाने वाले उनके दार्शनिक दृष्टिकोण के समतुलन माचारमा ( सृष्टिसव्याख्या ) से एकान्ततः संस्पृष्ट केवल तत्त्वमीमांसात्मक ही भारतीय उस दार्शनिक दृष्टिकोण का क्या महत्त्व है, जो नैगमिक आचारनिष्ठा आचारव्याख्या से पराङ्मुख रहता हुआ प्रतीच्य दर्शनवत् केवल नास्तिकता का ही उपोबलक प्रमाणित हो रहा है? 1 यह कटुसत्य है कि, जबतक दर्शनों का विज्ञानानुमोदित नैगमिक दृष्टिकोण से समन्वय नहीं कर लिया जाता, जब तक दर्शनशास्त्र का भारतीय शास्त्राम्नायपरम्परा में कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं माना जा सकता । जो भारतीय विद्वान् अपने आप को उभयनिष्ठ मानते हुए विदेशों में ख्यातिलाभ प्राप्त कर चुके हैं, उन ' स्वामी ( विवेकानन्दादि ) परिव्राजकादि ( सत्यदेवादि ) ' के यशःशरीर की कोई आलोचना न करते हुए इस दिशा में हमें वर्त्तमान युग की मान्यता के अनुसार सुप्रसिद्ध भारतीय? दार्शनिक सर्वश्री माननीय राधाकृष्णन् महोदय से सम्मानपूर्वक यह आवेदन कर ही देना चाहिए कि, विदेशियों को भी चमत्कृत कर देने वाली उनकी बड़ी ही ओजपूर्णा- गभीरार्थसमन्विता - महत्त्व -पूर्णा इंगलिशवाक - शैली, तद्रूपा ही लेखनशैली - मात्र का माध्यम स्वप्न में भी भारतीय दार्शनिक ३३४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् तटस्थ आलोचना का मुख्य लक्ष्यबिन्दु -तटस्थ आलोचना का मुख्य लक्ष्यबिन्दु बना हुआ है भारतीय श्रद्धालु - आम्नायभक्त ( शास्त्र -भक्त ) भारतीय मानव | आलोचना का प्रवर्त्तक बना हुआ है मुख्य रूप से भूतविज्ञानवादी प्रतीच्य ( ३३४ वें पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) दृष्टिकोण से सम्बन्धित श्राचारमीमांसा का पुनःस्थापन जबतक करने में अणुमात्र भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकेगा, जबतक कि वे भारतीय शिरोभूत नैगमिक आम्नाय का अपने दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ समन्वय न कर लेंगे । क्या हमारा यह दृष्टिकोण सर्वश्री राधाकृष्णन् के सम्बन्ध में अन्वर्थ बन सकेगा?, प्रश्न बड़ा ही महत्त्वपूर्ण इस लिए है कि, सम्भवतः सन् ३६-४० में ( जबकि श्रीराधाकृष्ण - र् महोदय हिन्दू विश्वविद्यालय के ' वाइस चांसलर ' पद को समलङ्कृत थे ) महामना स्व ० श्रद्धेय श्रीमालवीयजी महाराज के विशेष आग्रह से नैमिक दृष्टिकोण के विचारविनिमय के लिए तत्रैव जब हम उनकी सेवा में उपस्थित हो कर संस्कृत में अपना मन्तव्य प्रकट करने का उपक्रम करने लगे, तो ( सम्भवतः ' सर ' महोदय के उस समय के प्राइवेट सेक्रेट्री ) श्रीपन्त महोदय ने इस भारतीय? महान् दार्शनिक का यह अभिप्राय व्यक्त करने का निःसीम अनुग्रह किया कि, ' सर ' महोदय संस्कृत में उत्तर नहीं देंगे! हाँ, यदि इंग्लिश के माध्यम से हम अपने विचार अभिव्यक्त कर सकें, तो हमें उनका इंगलिश के माध्यम से ही उत्तर प्राप्त हो सकता है । इस दिशा में निरक्षरमूर्द्धभ्य इस व्यक्ति का प्रणतभाव से ' कालाय तस्मै नमः ' की अनुभूति को शिरोधार से परावर्तित हो जाना ही परमपुरुषार्थ शेष रह गया था । वही हुआ भी । एवं इस प्रकार ' इंग्लिश ' भाषा जैसी तत्त्वमीमांसा परिपूर्णा? दार्शनिक भाषा? के बोध से बञ्चित रहने के कारण हमें उस महान् दार्शनिक, उस भारतीय दार्शनिकश्रेष्ठ के दार्शनिक - विचार - श्रवण - लाभ से वञ्चित ही रह जाना पड़ा, जो महान् दार्शनिक - सुनते हैं प्रतिवर्ष विदेशी विद्वानों से आमन्त्रित होकर वहाँ भारतीय दार्शनिक सिद्धान्तों से उन्हें चमत्कृत करता रहता है, जो भारतीय दर्शनशास्त्र हम जैसे भारतीयों के सौभाग्य से केवल - विशुद्ध उस भारतीय भारतीभाषा ( संस्कृत ) को ही समलङ कृत कर रहे हैं, जिनके तत्त्वबोध की कथा तो दूर, बिना संस्कृत भाषा की परिपूर्ण विज्ञता के जिन दार्शनिक सूत्रों का अक्षरार्थ भी समन्वित नहीं हो सकता । सम्भव है हमें अपात्र समझते हुए ही उस समय ' सर ' महोदय ने ' इंग्लिश ' माध्यम की पहेली मध्यस्थ व्यक्ति के द्वारा हमारे सम्मुख उपस्थित करवादी हो । मान लेते हैं इस सम्भावना को भी लोकसंग्रहबुद्धया निश्चयात्मिका ही तदपि हमारा यह ग्रह, किंवा दुराग्रह तो सर्वथा सुरक्षित ही है कि, निगमानुगता आचारमीमांसा से संस्पृष्ट भारतीय दर्शन भारत भाषा के माध्यम से विज्ञात बनते हुए भी न तो हमारे ( भारतीयों के ) धर्म का ही संरक्षण कर सकते, एवं न इस केवल तत्त्वमीमांसात्मक भारतीय - दर्शन भारतीय दार्शनिक विदेशी तत्त्वमीमांसकों का ही सम्यक समाधान सम्भव बना सकतें । इस दिशा में तो एकमात्र नैगमिक समन्वयं ही भारतीय दर्शनप्रतिमा में प्राणप्रतिष्ठा करता हुआ इसे उपास्य बना सकता है । ३३५.
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श्राद्धविज्ञान मानव । अतएव आलोचना के सामयिक समाधान से पूर्व हमें इन दोनों विभिन्न ऐन्द्र - वारुण मानवों के प्राकृतिक तत्त्वात्मक स्वरूप को लक्ष्य में आरूढ़ कर लेना चाहिए, जो तात्त्विक स्वरूप - परिचय विस्तारभिया अन्य निबन्ध के तत्प्रकरणविशेष की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित कर देता है । ऐन्द्र भारतीय आस्तिक मानव का स्थान पञ्चविध, किंवा षविध प्राकृतिक सगे में कौनसा?, एवं वारुण प्रतीच्य मानव का ( तथा तदुच्छिष्टभोगी तदनुवर्त्मा गतानुगतिक भारतीय वर्त्तमान उस मानव का जो इस गतानुगतिकता से प्रभावित होकर अपने को वारुणभावात्मक वारुणपाश से आबद्ध करता हुआ प्रतीच्यमानववत् अपनी शास्त्राम्नाय का उनकी भाँति हीं आलोचक बन गया है युगधर्मानु-ग्रह से ) कौनसा स्थान?, सर्वप्रथम यही प्रश्न मीमांस्य है । ' सूचीकटाह न्याय ' से सर्वप्रथम उस वर्त्तमान भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण से मानव - स्थान का अन्वेषण कीजिए, जो चारमीमांसा से श्रसंस्पृष्ट रहता हुआ समवर्त्तनात्मक सर्वस्वघातक ' साम्य-वाद ' की घोषणा कर रहा है । इस की दृष्टि में ' मानव प्रज्ञाशील बुद्धिनिष्ठ प्राणी है । स्थान इसका यह भूलोक । पुरुषार्थ इसका इस लोक में तत्त्वों का अन्वेषण - प्रचार, एवं सम्पूर्ण पृथिवी के मानवमात्र. समदृष्टि विधुत्वभावना, पारस्परिक सहयोगादानप्रदान " । अलमतिपल्लवितेन । एवंविध दार्शनिक मानव के स्थान की मीमांसा वर्त्तमान दार्शनिकों के अनुग्रह से बड़े आटोप के साथ मीमांसित है, उपवर्णित है, जिसके पुनरावर्त्तन से इस मानव का कोई सौहार्द नहीं है । इसे तो अपने भारतीय दृष्टिकोणात्मक नैगमिक दृष्टिकोण से ही, ' विषमवर्त्तन श्वे सति समदर्शन त्वम् ' लक्षणा नैगमिक मीमांसा के माध्यम से ही मानवस्थान का अन्वेषण करना है । नैगमिकमानवचतुष्टयी— ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस नैगमिक अनुगम के आधार से मानव के चार स्थान मानव के सम्मुख उपस्थित हो रहे हैं पूर्वोक्त षड़विध, किंवा पञ्चविध प्राकृतिक धरातल में । पूर्णेश्वर प्रजापति के तीन वित्त का स्मरण की जिए, जिनका पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है ( देखिए पृ ० सं ० ३२६ ) । षोडशी प्रजापति, षोडशकल प्रजापति, षोडशकलोपेतप्रजापति, तीनों क्रमशः अव्ययात्मा - अक्षरात्मा-आत्मक्षरात्मा - प्रधान बनते हुए क्रमश: ऋषिलचण भावसर्ग, पितृलक्षण गुणसर्ग, देवलक्षण विकारसर्ग के अधिष्ठाता बने हुए हैं । इन तीनों सर्गों के अधिष्ठान हैं क्रमशः ' स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूर्य ' ये तीन प्राजापत्य विवर्त्त ( प्रजापतिमहिम मण्डल ) । इन तीन आत्मनिबन्धन सर्ग - पर्वो के सम्बन्ध में नैगमिक मानव के षोडशीप्रजापतिलक्षण- श्रव्ययात्मप्रधान - ' स्वायम्भुवस्थान, ' षोडशकल-* देखिए- गीताविज्ञानभाष्यभूमिका - बहिरङ्गपरीक्षात्मक प्रथमखण्डान्तर्गत ' गौर - कृष्णरहस्य ' ( ' हम काले, और वे गोरे ' ) नामक परिच्छेद । ३३६
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रजापतिक्षण - अक्षरात्मप्रधान--'पारमेष्ठ्यस्थान, ' १ एवं षोडशकलोपेतप्रजाः तिलक्षण- आत्मक्षरप्रधान -' सौरस्थान, ' ' ये तीन हीं मुख्य स्थान प्रमाणित हो रहे हैं । निरूपणीय चतुर्थ स्थान तो निगमदृष्ट्या, किंवा निगमानुगत आत्मबोधदृष्ट्या अस्थान ही माना गया है, जिसका दिग्दर्शन अनुपद में ही कराया जाने वाला है । स्वायम्भुवस्थानवासी मानव स्वयमपि ' स्वयम्भू ' है, पारमेष्ठ्यस्थान का मानव ' परमेष्ठी ' है, एवं सौरस्थान का मानव ' सूर्य ' है । आत्मबुद्ध परिपूर्ण आरूढ़ सिद्ध सहज मानव ' स्वयम्भू ' है । आत्मबोधसन्निकटवर्ती परिपूर्ण-पथवर्त्ती- - श्रारूढवत् - सिद्धवत् - सहज मानव ' परमेष्ठी ' है । एवं आत्मबोधपथानुगत परिपूर्णणपथानुगत-आरुरुक्षू मानव ' सूर्य्य ' है । - सिद्धिमार्गारूढ़ - सहज भावारूढ़ आचारमीमांसात्मक स्मार्त्तदर्शनात्मक भगवद्दर्शन ( श्रीमद्भगवद्गीता ) की दृष्टि से ही पहिले उक्त मानवत्रयी की आम्नाय प्रामाणिकता का अन्वेषण कीजिए । गीताने विस्पष्ट शब्दों में अनेकधा इन तीनों मानववर्गों का दिग्दर्शन कराया है । गीतादृष्टि के अनुसार उक्त तीनों मानव-श्रेणियों को क्रमशः ' ऋषिमानव, यतिमानव, मुनिमानव ' नामों से व्यवहृत किया जा सकता है । तीनों क्रमशः – ‘ आरूढ़ — मध्यस्थ - आरुरुतू ' रूप से, ' युक्त - मध्यस्थ - युञ्जान ' रूप से गीता में उपवर्णित हुए हैं । निम्न लिखित गीतावचन इह्रीं श्रेणिविभागों का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-१ - ऋषिमानवः स्वायम्भुवः १ - - लभन्ते ब्रह्मनिर्वाण “ मृषयः " क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ ( गी ० ५। २५ । ) । - योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ ( गी ० ५।२४ । ) । ३ – योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ( गी ० ६।३ । ) । या हिनेन्द्रियार्थेषु न कर्म्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी ' योगारूढ ' स्तदोच्यते ॥ ( गी ० । ६।४ ) । २- यतिमानवः पारमेष्टयः १ – कामक्रोधवियुक्तानां " यतीनां " " यतचेतसाम् । तो ब्रह्मनिर्वाणं वर्त्तते विदितात्मनाम् ॥ ( गी ० ५।२६ । ) २ - प्रशान्तात्मा विगतभीत्र ह्मचारिवते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ ( गीता ६ । १४ । ) । ३३७
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श्राद्धविज्ञान ३ –भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञाच्चा मां शान्तिमृच्छति ॥ ( गी ० ६।२६ । ) । ३- मुनिमानवः--सौरः १ – यतेन्द्रियमनोबुद्धि - " मुनि " मोक्षपरायणः । faridarata यः सदा, मुक्त एव सः । ( गो ० ५।२८ ) । - यदा हि नेन्द्रियार्थेषु नः कर्मस्वनुषञ्जते । सर्वसंकल्प संन्यास योगारूढस्तदोच्यते ॥ ( गी ० ६ । ४ । ) । ३ -- श्रारुरुक्षोमुनेर्योगं कर्म्मकारणमुच्यते ॥ ( गी ० ६।३ । ) । बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ( गी ० २।५० । ) । X नैमिक मानवों का मूलप्रतिष्ठारूप बैगमिक श्राम्नाय है क्रमशः उपनिष - आरण्यक-ब्राह्मण । ब्राह्मणानुगत श्रौतदेवपितृ " यज्ञकर्म्म " सौर मुनिमानव की, आरण्यकानुगत श्रौत उद्गीथादि ' उपासनालक्षणा " तपश्चर्या " पारमेष्ठ्य यतिमानव की, एवं उपनिवदनुगत श्रौत शिरोव्रतलक्षण " आत्मबोध " स्वायम्भुव ऋषिमानव की सहज आम्नाय है । तीनों आम्नायों का एक ही भारतीय द्विजाति - मानव की ' गृहस्थाश्रम - वानप्रस्थाश्रम ' संन्यासाश्रम न तीन श्रौत श्राश्रमव्यवस्थाओं के साथ क्रमिक सम्बन्ध है | आत्मबोधपरायण परिपूर्ण भारतीय ऋषिमानव ' सन्यासी ' है, तपश्चरित ` परिपूर्णतानुगामी यतिमानव ' वानप्रस्थी ' है, एवं श्रात्मबोधपथारुरुक्षु मुनिमानव ' गृहस्था मी ' है । यही नैगमिक़ी प्राकृति + सर्गनिबन्धना मानव की संक्षिप्त स्थानमीमांसा है, जिसके नैगमिक मूलों का निम्न लिखितरूप से समन्वय किया जा सकता है-१- षोडशीप्रजापतिरव्यात्मप्रधानः स्वायम्भुवः-··
१ - यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा ।
प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोड़शी ॥
: - यजुः संहिता ३६ |
- अप तस्य हतं तमो व्यावृत्तः स पाप्मना ।
सर्वाणि तस्मिन् ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ ॥
- अथर्व संहिता १० | ७ | ४० | ३३८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत्
३ - ग्रजापते! न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव ।
यत् कामास्ते जुडुमस्तन्नो वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥
- ऋक्संहिता १०।१२१।१० । २ - षोडशकलः प्रजापतिरक्षरात्मप्रधानः- पारमेष्ठ्यः षोडशकलं भारद्वाज! पुरुषं वेत्थ । इहैवान्तःशरीरे सोम्य! स पुरुषः, यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति " इति । - प्रश्नोपनिषत् ६ । १ । २ - एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्य स्तं गच्छन्ति, भिद्यते तासां नामरूपे । ' पुरुष ' इत्येवं प्रोच्यते । स एषो -S कलोऽमृतो भवति ( षोडशी भवति ) ” । प्रश्नोपनिषत् ६ । ६ ।
- अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः ।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युःपरिव्यथा ॥
- प्रश्नोपनिषत् ६ । ६ । ३- षोडशकलोपेतः - प्रजापतिः सौर सम्वत्सरात्मा आत्मक्षरात्मप्रधानः सौरः ? - - स एष सम्वत्सरः प्रजापतिः पोडशकलः ( कलोपेतः ) । - शत ० १४ । ४ । ३ । २१ । २ - षोडशकलं वै ब्रह्म ( तरात्मा ) - जै उ ० ३।३८।८ । ३ - स प्रजापतिः पोडशोऽऽत्मानं व्यकुरुत - १ - भद्रं च २ - समाप्तिश्च । ३ - प्राभृतिश्च, ४ - सम्भूतिश्च । ५- भूतं च ६ - सर्वं च । ७ - रूपं च, ८- अपरिमितं च । - श्रीश्व, १० - यशश्च । ११ - नाम च, १२-| १३ - सजानाच, १४ - पयश्च । १५ - महिमा च १६ - रसश्च ॥ - जै ० उ ० ११४६ | २ | १ - षोडशी प्रजापतिगर्भितः स्वायम्भुवः - ऋषिसर्गः -१ – विश्वकर्मा विमना श्रद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्हक । पामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्त ऋषीन् पर एकमाहुः ॥ ३३६
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श्राद्धविज्ञान २ - यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या ॥,
३. -यजन्त द्रविणं समस्या ऋषयः पूर्वे जरितारो न भूना ।
सूर्त्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि ॥
- ऋक्संहिता १०८२ सूक्त । - षोडशकल प्रजापतिगर्भितः पारमेष्ठ्यः पितृसर्गः-१ - अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः । -तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम ||
२ - संगच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन् ।
हित्वायावद्य ' पुनरस्तमेहि सं गच्छस्व तन्वा सुवर्चाः ॥
३ - उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।
सु ईरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥
- ऋक्संहिता १० | ० | १४,१५ सूक्त । - षोडशकलोपेतप्रजापतिगर्भितः - सौरः- देवसर्गः--१ - चित्रं देवानामुदगादनीकं चतुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आमा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥
तत् सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं संजभार ।
देदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥
देवा उदिता सूर्यस्य निरंहसः पिता निरवद्यात् ।
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
- ऋक्संहिता १ मं ० । ११५ सूक्त । -X -३४० 1