Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 411–420

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् अव्ययात्मा षोडशी स्वयम्भूः ( पितामहः ) परमेष्ठी ( पिता ) ऋषिभावः ( ऋषिसर्गः ) पितृभाव: ( पितृसर्गः. ) ऋषिमानवः पितृमानवः २ अक्षरात्मा षोडशकलः ३ तरात्मा षोडशकलोपेतः सूर्य्य: [ पुत्रः ] देवभाव: ( देवसर्गः ) देवमानवः ऋषिः यतिः प्रारूढः मध्यमः संन्यासी वानप्रस्थी उपनिषदाम्नायः देवः आरुरुक्षुः गृहमे ब्राह्मणाम्नायः आरण्यकाम्नायः त्रिविध प्राकृतिक स्वायम्भुव - पारमेष्ठ्य - सौर, इन तीन अव्यय - अक्षर - आत्मक्षर - निबन्धन भावापन्न तीन- मानव संस्थानों के अतिरिक्त चतुर्थ क्रमप्राप्त चान्द्र- पार्थिवोभयसमष्टिरूप चान्द्र विकृति - रौद्र - विकार - भौम- पार्थिव संस्थान चतुर्थ ' लोकमानव ' का संस्थान ( स्थानप्रतिष्ठा ) बनता है, जिस में का इस चतुर्थ चतुर्दशविध भूतसर्गों का समावेश माना गया है । गृह्य स्मार्त्त धर्मात्मक लोकधर्म प्रधानरूप से ' चन्द्रमा, लौकिक मानव के साथ ही सम्बन्ध माना गया है, जिसके लक्ष्य थान हैं शरीर की अधिष्ठात्री है । तथा पृथिवी ' नामक दो प्राकृतिक विवर्त्त । चन्द्रमा मन का प्रभव है, पृथिवी करता है, एवं यही रात्रि-मनःशरीरप्रधान सामान्य लौ कक मानव ही लोकमान्यताओं का लक्ष्य बना - पुत्रादि पार्थिवचान्द्र जागरणात्मक लोकमान्यतानिबन्धन पितृकर्म से सम्बन्ध रखने वाली लोक - वित्त प्राकृतसर्गदृष्टि से समृद्धियों का भोक्ता बना करता है । वक्तव्यांश प्रकृत में केवल यही है से कि, ही पञ्चविध मानव को चार श्रेणि-मानव के चार स्थान हो जाते हैं, एवं इस स्थानचतुष्टयी के सम्बन्ध । विभागों में विभक्त माना जा सकता है, जैसा कि पूर्वपरिलेखों से स्पष्ट है चेतन - अचेतनसर्ग मीमांसा- सांख्य परि-इन चारों के अतिरिक्त पाँचवाँ पार्थिवसर्ग केवल जड़सर्ग ही माना गया है, जिसे को हम क्रमशः भाषा में ' असंज्ञ अचेतनसर्ग ' भी कहा गया है । इस दृष्टिकोण से इस पञ्चविधसर्ग -* " रुद्राश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दशं स्तोममुदजयँस्तमुज्जेषम् " यजुः संहिता - ६१३४ | ) इत्यादि यजुर्म्मन्त्राधारेण मीमांसित चतुद्द शाक्षर समन्वित आन्तरिक्ष्य चान्द्र से चतुद्द २१२ शभूतसर्गों पर्य्यन्त ) का । पूर्वपरिच्छेदों में अनेकधा स्पष्टीकरण किया जा चुका है ( देखिए पृ ० सं ० २०४ ३४१

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श्राद्धविज्ञान ' आत्मसर्ग, महत्सर्ग, प्राणसर्ग, चेतनसर्ग, जड़सर्ग ' इन नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । ऋषि-सर्ग आत्मसर्ग है, पितृसर्ग महत्सर्ग है, देवसर्ग प्राणसर्ग है, पशुसर्ग चेतनसर्ग है, भूतसर्ग जड़-सर्ग है । क्या ऋषि - पितृ - देवात्मक आत्म- मद्दत् प्राणसर्गत्रयी चेतन नहीं है?, प्रश्न का समाधान ' हाँ ' में भी होगा, ऐव ' ना ' में भी । ' चेतन ' का जैसा अर्थ दार्शनिकों नें मान रक्खा है, उस दृष्टिकोण से तो हम कहेंगे कि ' आरम्भ की सर्गत्रयी चेतन नहीं है ' । यदि ' चेतन ' का अर्थ निगमसम्मत ' आत्मा ' है, तो अवश्य ही सर्गत्रयी ही चेतन है, एवं पशु तथा भूत दोनों अधः सर्ग निगमदृष्ट्या चेतन हैं । जड़ और चेतन की महत्त्वपूर्ण तत्त्वमीमांसा नैगमिक - वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वञ्चित रहती हुई आज सर्वात्मना पदे पदे संदेह भाजना ही प्रमाणित हो रही है । यदि दार्शनिक ' मूढगर्भ ' माध्यम से चेतन - जड़ मीमांसा में प्रवृत्त हो जाते, तो कदापि उस सन्देहपरम्परा का जन्म न होता, जिसने सर्व-साधारण की सहज आत्मबोधनिष्ठा को आज सर्वात्मना विकम्पित कर दिया है । जड़ भूत के साथ ओतप्रोत सम्बन्ध से समन्वित रहने वाली क्रियाशीला प्रारणशक्ति को ही ' चेतनसर्ग ' का मूलाधिष्ठान मानने की भयावह भ्रान्ति करते हुए तत्त्वमीमांसकोंनें जड़ - भूत - समतुलित पशु -- ( तदुपलक्षित चतुर्दशविध भूत ) - सर्ग को भी जिस प्रकार ' चेतनसर्ग ' मानते हुए ' आत्मचैतन्य रूप से पशुसर्ग की तत्त्वमीमांसा कर डाली है, उसकी आलोचना का यहाँ प्रसङ्ग नहीं है । नापि प्रसङ्गावसर है चेतना -स्वरूपबोधानुगता महा भ्रान्ति की आलोचना का, जिस भ्रान्ति ने भारतीय नैमिक सनातन-शाश्वत आम्नायसिद्ध नित्य धर्म के सम्बन्ध में धर्मानुगता अहिंसा - हिंसा व्याख्याओं में, लोक-परलोक - गतिभावों में, शुचि - अशुचिभावों में, सत्यानृतभावों में, दया दानभावों में, सर्वत्र भ्रान्तिपरम्परा का सर्जन कर डाला है । और नाहीं हमें दार्शनिकों की ( विशेषतः गुणवादी - अव्यक्तनिष्ठ - सांख्य-दर्शन की ) उस दृष्टि की ही आलोचना करनी है, जिह्नोंनें सर्वमूर्द्धन्य सहजज्ञाननिष्ठ - ईश्वर प्रजापति-समतुलित - परिपूर्ण - पुरुष ( मानव ) को चतुर्दशविध भूतसर्गात्मक पशुसर्ग की श्रेणि समुपस्थित करने की घोरघोरतमा भ्रान्ति करते हुए सहजपूर्ण - सहजसिद्ध भी मानव को भूतसर्गनिबन्धना भूतप्रेत-भावापन्ना तान्त्रिक - सिद्धिपरम्पराओं के मोहजाल में आबद्ध कर, विविध योगानुगता विविध अणिमादि-सिद्धियों के व्यामोहन में आसक्त - व्यासक्त कर इसकी सहज शान्ति को विकम्पित कर डाला है । सर्वोपरि केवल भूतसर्गवादी? भूततत्त्वमीमांसक उन प्रतीच्य तत्त्वमीमांसकों के सम्मान को भी हम अणुमात्र भी आलोचना का विषय बनाना सर्वथा निःस्सार ही मानेंगे, जिन विदेशी तत्त्ववादियों में ' मानव ' का स्थान पशु - श्रेणि से भी निम्न भूतश्रेणि में नियत करते हुए जड़वाद के माध्यम से ' मानव ' के पुरुषार्थ को समन्वित करने में हीं, अपने जड़ विज्ञानात्मक भौतिक आविष्कारों से मानव की नैसर्गिक संघर्ष -मूला शान्ति का संघर्षशून्या मृतप्राया अनुकूलता का सर्जन करने में हीं अपने आप को गौरवान्वित • मान लिया है । प्रणम्य है सम्मानपूर्वक इत्थंभूत ज्ञात - अज्ञात भारतीय दार्शनिकों का निष्कैवल्य ३४२

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( आचार मीमांसारहित ) तत्त्ववाद, मान्यतावादाभिनिविष्टं भारतीयों का सम्प्रदायवाद विद्वानों का केवल भूतवादानुगत तत्त्ववाद, तथा तदनुगत हो सुर्तस्व विघातक जड़ - विज्ञानवाद , एवं प्रतीच्य । चेतनजड़व्यवहारमीमांसा-यद्यपि नैगमिक दृष्टि से ' चेतन ' - ' चित् ' - ' चिदाभास ' - ' जीव ' - श्रादि तथापि प्रचलित मान्यता को विषयसमन्वय की दृष्टि से मान्यता प्रदान शब्द करते सर्वथा महत्त्वशून्य हैं । सम्बन्ध में ' चेतन ' शब्द एवं भौतिक विश्व के सम्बन्ध ' जड़ ' शब्द संग्राह्य हुए हम ' आत्मा ' के ' ईशावास्यमिदं सर्वम् ' के अनुसार नैगमिकदृष्टि से चर - अचर - सबकुछ ' चेतन ' हैं । मान आत्मव्याप्ति- लेते हैं । दृष्ट्या कोई जड़ नहीं है । इसी आधार पर ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' - ' ब्रह्म ' सिद्धन्त ' थापित हुए हैं । क्या निगम में ' जड़ ' व्यवहार का कोई महत्त्व वेदं सर्वम् ' इत्यादि अद्वैत है । ' किन्तु आत्मस्वरूपाभिव्यक्ति - अनभिव्यक्ति रूप से । जिस भौतिक नहीं है?, है, और अवश्य ( चेतनस्वरूप ) अभिव्यक्त है, वह निगम परिभाषा में ' चेतन ' सर्ग में आत्मस्वरूप जिस भौतिक सर्ग में आत्मम्वरूप अनभिव्यक्त रहेगा, वह ' चेतन ' ( ( आत्मयुक्त ) माना जायगा, एवं विमूढात्मसर्ग ) कहा जायगा । घन्टाघोष पूर्वक हमें उस नैगमिक सिद्धान्त को नतमस्तक होकर स्वीकार कि, यच्च यावत् प्राण - सर्गों में केवल ' मानव ' सर्ग में ही आत्मा स्वस्वरूप से अभिव्यक्त कर ही लेना पड़ेगा इसी के लिए ' पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' ( शत ० २२५ | १ | १ | ) यह सिद्धान्त स्थापित है । अतएव पुरुष ही ' पुरुष ' है, यही ' चिदात्मा ' है, जिसकी अभिव्यक्ति हुई है सहज हुआ है । अव्यय-ह्रीं । अतएव यच्च यावत् सर्गों में ' पुरुष ' लक्षणा आत्म - अभिधा का सम्मान रूप से एकमात्र मानव में प्राप्त हुआ है | इस ' पुरुष ' भाव के कारण ही एकमात्र मानव ही स्वतन्त्र पुरुषार्थद्वारा एकमात्र मानव को ही असम्भव को सम्भव, सम्भव को असम्भव बनाने की क्षमता रखता है, जब कि मानवेतर सम्पूर्ण प्राणी ' प्राकृत ' बनते हुए प्रकृतिपरवश बने रहते हुए स्वतन्त्र पुरुषार्थ में एकान्ततः असमर्थ केवल .. उद्भव - विलयन - शरीरयापन - सब कुछ परतन्त्र है, प्रकृत्याधीन है । आत्मबोधस्वरूपा हैं । इनका बल पर ( स्वस्वरूप बोधाधार पर ) मानव जहाँ कत्तु मकर्त्त मन्यथाकर्तुं समर्थ है, ब्रह्मविद्या वहाँ प्रकृति- के भावापन्न इतर सर्ग प्रकृत्यवयरूप बने रहते हुए प्रकृत्या नियन्त्रित हैं, परतन्त्र हैं, जिन संरक्षण निगमने - ' स्वैषमेव चकार रूप से किया है । की भावुकता का जड़ चेतनानुगता महती समस्या -बहुत बड़ीं समस्या उपस्थित हो जायगी निगमरहस्यासंस्पृष्ट केवल दर्शनभक्त -तीय आस्तिक मानव के लिए यह सुन कर कि, " मानवेतर सम्पूर्ण प्राणिसर्ग अचेतन सम्प्रदायभक्त हैं भार-, पाषाण ' * - ' ब्रह्मविद्यया ह वै सर्वं भविष्यन्तो मन्यन्ते मनुष्याः / - ( शत ० १४ | ३ | २ ) । ३४३

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श्राद्धविज्ञान लोष्ठवत् जड़ हैं ' । समस्या वास्तव में तदवधिपर्य्यन्त इसके लिए समस्या ही रहेगी, जब तक कि मानव भारतीय मूल समस्यामीमांसक निगमशास्त्र के तात्त्विक स्वाध्याय में प्रवृत्त नहीं हो में जायगा शक्य | यही नहीं तो स्वयं अपनी ' हमारी समस्या ' है, जिसका समाधान विषयान्तरानुगत प्रस्तुत निबन्ध है ÷ । मानते हैं मानवेतर पशु - पक्षी - कीट - कृमि, आदि में ही क्या, ' अन्तः सज्ञा भवन्त्येते सुखदुःख-समन्विताः - तस्मात् हसन्ति पादपा: - तस्माद्रुदन्ति पादपाः - तस्माञ्जिन्ति पादपा: ' ( महाभारत इन्हें भी ) इत्यादि रूप से ओषधि वनस्पतियों में भी सेन्द्रियमन प्रतिष्ठित है । इस सेन्द्रिय मन से ' चेतन ' का मानववत् सुख - दुःखानुभूति होती है । और सम्भवतः एकमात्र इन्द्रियानुगत मनोभाव को ही शिष्टों लक्षण मानने की भयावह भ्रान्ति करते हुए अव्यक्तनिष्ठ दार्शनिकोंनें, एवं तदनुगामी भारतीय नें * इन्हें ' चेतन ' मान लिया है । यदि ' चेतन ' का अर्थ केवल ' क्रियाशीलतानुगता - सुखदुःखादि द्वन्द्वानुभूतियाँ ' ही हैं, तब तो हमें कोई आपत्ति नहीं है । यदि ' चेतन ' शब्द से ' ग्रात्मसत्ता - आत्मा-भिव्यक्तिलक्षणा - आत्मबोधसत्ता ' उनका अभिप्राय है, तो वह सर्वथा आपातरमणीय, अतएव उपेक्षणीय ही माना जायगा । अहिंसा - हिंसा - जनिता पुण्यपापव्यवस्था, सत्य - दया - दान- अस्तेय - शौच-यज्ञव्यवस्था, श्राद्ध - पिण्ड-इन्द्रियनिग्रहादि लक्षणा धर्मव्यवस्था, ब्रह्मयज्ञ देवयज्ञ - पितृयज्ञ- भूतयज्ञादिरूपा दानं - रात्रि जागरणादिरूपा प्रतपितृकर्मव्यवस्था, अभ्युदय - नि यस्- स्वर्ग - नाक - मुक्ति आदि श्रात्मगतिव्य-वस्था ( परलोकव्यवस्था ) आदि श्रात्मस्वरूपानुबन्धिनी सम्पूर्ण व्यवस्थाओं का एकमात्र उत्तरदायित्त्व ' मानव ' से ही सम्बन्धित है, यही चिदात्मलक्षण पुरुष है, एवं इस दृष्टि से एकमात्र यही ' चेतन ' अभिधा का पात्र है । मानव ही परिपूर्णबोधावस्था में ऋषि है, बोधपथानुगतिकाल मानव ही पितर है, और बोधपथसाधकमार्गानुगमनकाल में मानव ही ' देव ' है । यदि मानव अपनी आत्मानुबन्धिनी इस स्वरूप-त्रयी के बोध से वञ्चित ( पराङमुख ) है, तो हमें निरतिशया दुःखानुभूतिपूर्वक इस सहजरूपेण परधर्मों परिपूर्ण के भी मानव के लिए इस कटुसत्य की अभिव्यक्ति करनी ही पड़ती है कि, " अमुक आगन्तुक . आगमन से अपने आपको विस्मृत करते हुए मानव ने ' पशुभाव ' का ही अभ्यास कर लिया है । " पशुमानव की अनुभूतियाँ -यही कारण है कि, पशुभावाक्रान्त मानव की सम्पूर्ण अनुभूतियाँ ' पशु ' को, तदभिन्न जड़भूतंवर्ग की .को मध्यस्थ बना कर ही प्रवृत्त हो रहीं हैं । न केवल अनुभूतियाँ हीं, अपितु इत्थंभूत भावुक मानव ÷ - इन समस्या परम्पराओं की आलोचना ' हमारी समस्या ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में ही तजिज्ञासुओं को देखनी चाहिए ।. * ' सेन्द्रियं चेतनद्रव्यं, निरिन्द्रियमचेतनम् ' । - चरकसंहिता ३४४

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् तत्त्वमीमांसा का माध्यम भी पशु एवं भूतसर्ग ही बनता है । परिणाम इस मध्यस्थता का यह होता है कि, पशुशरीर - पशुमन - पशुइन्द्रियाँ, तथा भूतानुगत अणु - परमाणु हीं इसकी अपनी स्वरूपमीमांसा के उदाहरण - दृष्टान्त - बनते हुए इसे सर्वात्मना लक्ष्यच्युत बना रहे हैं । परिपूर्ण मानव के आत्मा - बुद्धि-मनः- शरीर - भावों का स्वरूपबोध प्राप्त करने के लिए यह भावुक मानव पशु एवं भूतों के परीक्षण [ एक्सपेरीमेन्ट - Expriment ] में प्रवृत्त हो पड़ता है । एवं पशु तथा भूतों के प्राकृतिक परिवर्तनों के माध्यम से मानव अपने परिवर्तनों का समतुलन करता हुआ अपने आपको वैज्ञानिक तत्त्वमीमांसक घोषित करने लगता है । यही एवंविध मानव की पशु - भूतभावसमतुलिता चिकित्सा प्रणाली है, यही इसके सर्वविध अन्यान्य पुरुषार्थक्षेत्र हैं, जिनका आविष्कारक पशु - भूतवादी मानव मानव के सहज परिपूर्ण स्वरूप का आज के वर्त्तमान युग में उसीप्रकार मानो उपहास ही कर रहा है, जैसे कि विगत शताब्दियों से भारतीय दार्शनिक - साम्प्रदायिक - तान्त्रिक - योगपरायण भावुक मानव केवल चान्द्र सर्गानुगत पशु-सर्गस्थान ही मानव का स्थान मानते हुए भारतीय आस्तिक किन्तु भावुक मानव के सम्मुख आचारशून्या ( निगमव्याख्याशून्या ) तत्त्वमीमांसा, केवल - मानसानुभूतिलक्षणा सम्प्रदायानुगता भक्तिमीमांसा, भूतप्रेतपिशाचनिबन्धना सिद्धिमीमांसा, चित्तवृत्तिनिरोधलक्षणा - धारणाध्यानसमाधिरूपा योगमीमांसा यदि ( ( ओर भी ज्ञात अज्ञात विविध प्ररोचनामीमांसाएँ ) समुपस्थित करते हुए इसकी सहज परिपूर्णता का उपहास ही करता आ रहा है । पञ्चविध मानवसर्ग समन्वय— यद्वा तद्वास्तु । प्रतिप्रश्नात्मिका उक्त सामयिक आलोचना से प्रकृत में हमें निगमानुगत उस पञ्च-विध सर्ग को ही लक्ष्य बनाना है, जिसके आधार पर तटस्थ आलोचना का समाधान अवलम्बित है । अध्यात्मदृष्ट्या इस पञ्चविध सर्ग को हम दो भागों में विभक्त मानेंगे - पुरुषसर्ग, एवं प्रकृतिसर्ग । पुरुषसर्ग को हम सर्वाधार ' ' कहेंगे, एवं प्रकृतिसर्ग को सर्वाधार पर प्रतिष्ठित ' सर्व ' कहेंगे । इस प्राकृतिक सर्वसर्ग के चार विवर्त्त अध्यात्म में क्रमश: ' महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, भूत ' नामों से व्यवहृत होंगें, एवं पाँचवाँ सर्वातीत पुरुष ' आत्मा ' कहलाएगा । इस आत्ममहिमा ( पुरुषात्ममहिमा ) में प्रतिष्ठित महदादि क्रमशः " महानात्मा - विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) - प्रज्ञानात्मा ( मन ) - भूतात्मा ( शरीर ) " नामों से व्यवहृत होंगे । स्वायम्भुव पुरुषात्मा, पारमेष्ठ्य महानात्मा, सौर विज्ञानात्मा, चान्द्र प्रज्ञानात्मा, पार्थिव भूतात्मा, इन पाँचों के साथ क्रमश ऋषि - पितर- देव - पशु - भूतसर्गों का सम्बन्ध है । इन पाँचों का उद्गीथ ( केन्द्र ) मध्यस्थ देवभावात्मक विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) है, इसके उस ओर पुरुषात्मा, महानात्मा, ये दो अमृतभाव प्रतिष्ठित हैं, इस ओर प्रज्ञानात्मा भूतात्मा, ये दो मर्त्य भाव प्रतिष्ठित हैं, मध्यस्थ सौर विज्ञानात्मा उभयात्मक है ÷ । यह है पुरुष - प्रकृतिसमन्वित-रूपात्मक परिपूर्ण मानव के परिपूर्ण स्वरूप का एक नैगमिक दृष्टिकोण, जिसके आधार पर ही हमें तथाकथित मानव की चार स्थानमीमांसाओं को अवधान पूर्वक लक्ष्य बनाते हुए ही समाधान के निकटतम पहुँचने का प्रयास करना है. -- " तद्यत् किञ्चार्वाचीनमादित्यात्, सर्वं तन्मृत्युनाऽऽप्तम् " ( शत ० १८ | ५ | १ | ४ | ) : - " आकृष्णेन रजसावर्त्तमानः- निवेशयन्नमृतं - मर्त्यञ्च " ( यजुः संहिता ३२ ३१ | ) ३४५

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श्राद्धविज्ञान सर्वसंग्रहस्वरूपः - परिपूर्णमानवस्वरूपपरिलेखः – ( ३ ) (? ) -१- स्वयम्भूः -- वृषा - पुरुषः-पुरुष एव २ - परमेष्ठी - योषा - प्रकृतिः - प्रकृतिरेव प्रकृतिगभितः पुरुषात्मा ( आत्मा ) -स्वायम्भुवः-पितृमण्डलम् * - परमेष्ठी - वृषा - पुरुषः- - प्रकृतिः ३ - सूर्य्य: - - योषा - प्रकृतिः - विकृति - प्रकृतिलक्षणः महानात्मा ( सत्त्वम् ) - पारमेष्ठ्यः-अमृत-संस्था देवमण्डलम् * -सूर्य्य: - वृषा- पुरुषः- -- प्रकृति विकृतिः ४ - चन्द्रमाः - योषा - प्रकृतिः - विकृतिः - विकृतिलक्षण: - विज्ञानात्मा ( बुद्धि:) - सौर: -अमृत-मर्त्य संस्था ऋषिमण्डलम् २ पशुमण्डलम् * -चन्द्रमाः- वृषा - पुरुषः --- विकृतिविकारः ५- पृथिवो - योषा - प्रकृतिः - विकारः * - पृथिवी -- वृषा - पुरुषः -- विकारवैकारिकः * -भूतानि -- योषा - प्रकृतिः - वैकारिकः इति नु - अधिदैवतम् प्रजापतिरीश्वरः पूर्णमद: -विकारलक्षण: - प्रज्ञानात्मा ( मन ) मर्त्यसंस्था -- चान्द्रः-वैकारिकलक्षण: - भूतात्मा ( शरीरम् ) इति नु - अध्यात्मम् पुरुषो मानवः पूर्णमिदम् भूतमण्डलम् ५ पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्टमित्याहुराचाय्र्याः ३४६

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' ऋणमोचनोपायोपनिषत् १ - स्वायम्भुवः - पुरुषात्मा ऋषिप्रारणावच्छिन्नः- तत्प्रधानः - ऋषिमानवः - ज्ञानपरायण: ( १ ) २ - पारमेष्ठ्यः - महानात्मा- पितृप्रारणावच्छिन्नः- तत्प्रधानः - पितृमानवः - उपासनापरायण: ( २ ) ३ - सौरः - विज्ञानात्मा देवप्राणवच्छिन्नः- तत्प्रधानः - देवमानवः - ऋषिपितृदेवकर्म्मपरायण: ( ३ ) ४- चान्द्रः -- प्रज्ञानात्मा - पशुप्रारणावच्छिनः ५- पार्थिवः -- भूतात्मा - -- भूतप्राणावच्छिन्नः • तत्प्रधानः- लोकमानवः - लोकपरायणः ( ४ ) उपनिषदारण्यक ब्राह्मणानुगताः-मानवाः नैगमिकमानवाः-आगमिक-भारतीयमानवस्य एकस्यैव पुरुषप्रकृत्यनुगता - संस्थानचतुष्टय सैषा ( ३ ) ÷ ' चतुष्टयं सर्वो वा हि इदं मानवः सर्वम् ' १ - ज्ञानपरायणः - स एव पुरुषः -- - ' संन्यासी ' - ' संवित् ' शीलः ( १०० ) २ - उपासनारतः -- स एव मानव: -- ' वानप्रस्थी ' - ' महिम ' शीलः ( ७५ ) ३. कम्र्मानुगतः - - स एव मनुष्यः - ' गृहस्थी ' - ' निष्ठा ' शीलः ( ५० ) - ' लौकिक: ' - -४ - लोकानुग: - स एव नरः ----- निष्ठानुगतः ( १ - १०० ) + प्रकृतिपुरुषरहस्यवेत्ता नैगमिक महर्षियोंनें पुरुषाधार पर प्रतिष्ठित जिन आठ प्रकृतियों के आधार पर ' प्राकृतिक - वैकारिक- विमूढ़ ' नामक तीन मानवसर्गों की रहस्यपूर्णा व्याख्या की है, उसके माध्यम से होने वाले इन तीनों मानवसर्गों के प्रत्येक के १६ - १६-१६ विवर्त्त हो जाते हैं । सम्भूय सम्पूर्ण पार्थिव मानवों के ४८ वर्ग हो जाते हैं, जिनका स्वरूप परिचय ' भारतीय हिन्दू मानव, और उसकी भावुकता में संक्षेप से, तथा ' मानवस्वरूपमीमांसा ' नामक निबन्ध में विस्तार से प्रतिपादित हुआ है | ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य सच्छूद्र, ये चार वर्णमानव, अन्त्यज- अन्त्यावसायी - दस्यू म्लेच्छ-, ये चार वर्ण मानव, सम्भूय आठ मानववर्ग वर्णावसर्ग से सम्बद्ध हैं । वर्णमानव के ब्राह्मणादि चार वर्ग प्रत्येक चतुर्द्धा - चतुर्द्धा विभक्त होते हुए १६ अवान्तर सर्गों में विभक्त हैं, जिन्हें यहाँ ' पुरुष - मानव-३४७

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कृतकृत्य मानव ---यावञ्जीवन सम्पूर्ण लोकमान्यताओं का सुप्रसिद्ध शास्त्रीय लोकनीति के माध्यम से लोक-संग्रह भावना से भावुकतापूर्वक अनुगामी बना रहने वाला भारतीय आस्तिक द्विजाति अपने प्रथमाश्रम ( गृहस्थाश्रम ) में श्रौत देव - पितृयज्ञकम्मों का अनुगमन करता हुआ द्वितीय आश्रम में श्रौत उद्गीथो-पासनाप्रवण बनता हुआ तृतीय ( ज्ञानशिक्षणात्मक प्रथम ब्रह्मचर्याश्रमापेक्षया चतुर्थ ) आश्रम में श्रौत ज्ञानपरायण बन जाता है । इस परम्परा से इस मानव की ईश्वरस्वरूपानुगता ज्ञानकम्र्मोभयात्मिका परिपूर्णता सर्वात्मना संसिद्ध हो जाती है । यही इस नैगमिक परिपूर्ण मानव की कृतकृत्यता है । ऐसे ही महामानव के लिए - ' न स पुनरावर्त्तते, न स पुनरावर्त्तते ' घोषणा हुई है ।. भारतीय प्राकृतिक सर्गनिवन्धन मानववर्ग के उपनिषदनुगत संन्यासी ऋषिमानव, एवं श्रारण्य-कानुगत वानप्रस्थ पितृमानव, इन दो के सम्बन्ध में, इन दोनों की जीवनेतिकर्त्तव्यता - मान्यताओं के सम्बन्ध में हम अपने गृहमेधी भावानुबन्ध से कोई भी आलोचना - प्रत्यालोचना - मीमांसा करना इस लिए निगमाम्नायविरुद्ध मान रहे हैं कि, दोनों हीं मानववर्ग - विधि - निषेध से परे रहते हुए वर्ण-धर्ममीमांसा, लोकमान्यता मीमांसा से सर्वात्मना संस्पृष्ट हैं, जैसा कि निम्न लिखित शब्दों में विस्पष्ट घोषणा हुई है -( ३४७ पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) मनुष्य - नर ' नामों से व्यवहृत किया गया है । ' चत्त्वारः पुरुष इति बाध्य: ' ( ऐतरेय आरण्यक ) इत्यादि नैगमिक सिद्धान्तों के अनुसार पुरुषादि चारों प्रत्येक चार चार भागों में विभक्त होते हुए षोडशविध ( १६ प्रकार के ) बन जाते हैं, यही प्रथम प्राकृतिक मानवसर्ग है, जिसके उद्भव का एकमात्र श्रेय उसी पावन देश ( भारतवर्ष ) को है, जहाँ त्रयीवेदात्मक यज्ञ का प्रतीकभूत कृष्ण मृग स्वछन्द विचरण करता रहता है । अन्त्यजादि रूप चतुर्थ अवर्ण सर्ग नैकारिक सर्ग है, जिस के प्रत्येक के ४-४ अत्रान्तर भेदों से सोलह अवान्तर वर्ग बन जाते हैं । तीसरा मानव विभाग विमूढात्मक है, जिसके चार विभाग मुख्य, अवान्तर १६ विभाग हो जाते हैं । इन अष्टाचत्वारिंशत् मानववर्गों में स्थ आलोचकों का कौनसा स्थान है?, प्रश्न को अभी हम मीमांस्य मानते हुए उपेक्षणीय ही ठहरा देते हैं । कोई सा भी स्थान हो आलोचक मानव का । यह निश्चित है कि, प्राकृतिक वर्णानुगत १६ सोलह प्रकार के वर्णविभागों से पृथक् ही उस अलोचक का तटस्थ आलोचक का स्थान माना जायगा, जो भारतीय निगमागमाम्नाय से एकान्ततः अपरिचित संस्पृष्ट- बहिर्भूत ही है । * न बुद्धिभेदं जनयेत् - ज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ ( गीता ३।२६ ) । ३४८

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} ऋणमोचनोपायोपनिषत ( १ ) - यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन के पश्येत् जिघत् - अभिवदेत् शृणुयात् मन्यीत-विजानीयात् । येनेदं सर्वं विजानाति, तं केन विजानीयात् विज्ञातारमरे! केन विजानीयात् । ( शत ० १४ | ५ | ४. २६ । ) । ( २ ) - तद्वा स्यैतत् - अतिछन्दः, अपहतपाप्मा, अभयं रूपं अशोकान्तरम् । अत्र पिता पिता, माता अमात, लोका अलोकाः, देवा देवाः, यज्ञा यज्ञाः । स्तेनोऽस्तेनः भ्रूणहा अहा, पौल्कसोऽपौल्कसः, चाण्डालोऽचाण्डालः, श्रमणोऽश्रमणः, तापसोऽतापसो भवति । पापेन तीणों हि तदा सर्वाच्छो कान्हृदयस्य भवति । ( शत ० १४।७।१।२२ । ) । ( ३ ) - तत्र ब्रह्म ( ब्राह्मण: ) ब्रह्म भवति, क्षत्रमात्रम् ' इत्यादि । लौकिक मानव की लोकसंग्राहकता -उक्त दोनों मानव ( संन्यासी, एवं वानप्रस्थी श्रात्मबोधयुक्त मानव ) लोकमान्यतामीमां-साओं से सर्वथा पराः परावत हैं । भूत - प्रेतादि की कथा तो विदूर रही, सृष्टिसञ्चालक देवता भी इन दिग्देशकालातीत परिपूर्ण मानवों पर दृष्टिनिक्षेप करने में असमर्थ हैं । अब शेष रह जाते हैं दो प्रकार के भारतीय मानववर्ग - देवभावात्मक गृहस्थी मानव, एवं लोकभावात्मक लोकमानव । श्रौत देवपितृयज्ञ-निष्ठ, नितान्तनैष्ठिक द्विजाति मानव ही देवभावात्मक गृहस्थी मानव है । इसके प्रचण्ड आध्यात्मिक सौर दिव्य नैगमिक तेज के सामने भी चान्द्रसर्गानुगत चतुद्दशविध भूतसर्ग उसी प्रकार अभिभूत है, जैसे कि अहःकाल में सौर आतपमण्डलमुक्त चन्द्रमा सर्वात्मना अभिभूत निस्तेज बना रहता है । ' देवभावापन यही गृहस्थी मानव अपने लोकनिबन्धन पारिवारिक जीवन की अपेक्षा से लौकिक मानव भी है, जिसके परिवार में चान्द्रसोमप्राणप्रधान बालवृन्द, तथा सौम्य नारीवृन्द भी समाविष्ट है, जो दोनों ही वर्ग श्रौत दिव्य संस्कारात्मक - यज्ञकर्म में अनधिकृत माने गए हैं । रात्रिजागरणात्मक कर्म से चान्द्र - अन्न पितृपरिवार को तुष्ट तृप्त बनाए रखना एक ओर जहाँ पारिवारिक कुलस्त्रियों का अनन्य कर्त्तव्य है, वहाँ लोकसंग्रहदृष्ट्या नैगमिक देवमानव का इस पारिवारिक मान्यता में सहयोग प्रदान करना भी इसका लौकिक उत्तरदायित्त्व बन जाता है । देवमानव के वातावरण में सुरक्षित परिवार को भी यद्यपि कोई भय नहीं होना चाहिए चान्द्रभूतप्रेतबाधा का । किन्तु बालक स्वभावतः बालक ( सौम्य-भावुक ) ही है, स्त्रियाँ स्वभावतः स्त्रियाँ ( सौम्या - भावुका ) हीं हैं । अतएव इन देवपरिवारानुगत, देवसंस्कारानुशयभावापन्न अतएव श्वेतवस्त्रसमतुलित निर्मल बाल - नारीवृन्द की ओर चान्द्रमूलसर्गा-त्मक प्र ेतादि का आकर्षण सहज बना रहता है । इन अन्तरिक्षचारी उभयतः - अमूल प्रांत - राक्षसगणों * " अमूलं वा इदमुभयतः परिच्छिन्न ' रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति " । -शत ० ३ | १ | | ३ १३ | ३४६

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महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३, पृष्ठ 420 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान आकर्षण से त्राण पाने के लिए बाल - नारीवृन्द का सतर्क रहना सर्वथा प्रकृति सम्मत है, जिसका आयुःशास्त्र की सुप्रसिद्ध आर्षभावात्मिका चरकसंहिता के ' भूतोपशमनीयाध्याय ' में विस्तार से उ-बृहण हुआ है । इस लोकमान्यता के साथ साथ पारिवारिक मृतप्राणियों के श्मशा ' नामक पितृदेवता के अनुशासन से अनुशासित गृह्य- पार्थिव पितरों की अनुग्रह प्राप्ति के लिए कुलस्त्रियों के द्वारा रात्रि-जागरणमाध्यम से पितृकर्म्मानुगमन भी आवश्यक है । एवमेव भूतात्मानुगत हंसात्मा के बन्धनविमोक के लिए स्वयं श्रौतकर्माधिष्ठाता कुलपुरुष के द्वारा स्थानविशेष में गया श्राद्धानुगमन भी सर्वथा अनिवार्य है । लोकसंग्रहविघातक विमूढ़मानव-" जो मानव ऐसा नहीं करते, नहीं कर सकते, उनका कोई अनिष्ट देखा - सुना नहीं गया " इस लोचना का केन्द्र मानवानुबन्धी वह पशुभाव है, जड़ात्मक भूतभाव है, जिसके हैकारिक- विमूढ़ नामक दो अवान्तर विभेद पूर्व में स्पष्ट हो चुके हैं । लक्ष्यंत्र भारतीय मानवसर्ग वैकारिक है, एवं पर-लक्ष्यानुगत मानवसर्ग विमूढ़सर्ग है, जिसे ' आसुरसर्ग ' ' वारुणसर्ग ', आदि नामों से भी व्यवहृत किया गया है । इस उभयविध मानवसर्ग की अध्यात्मसंस्था के आत्मा, आत्मनिबन्धना सत्त्वभावापन्ना विद्या-बुद्धि, दोनों दैवधर्म सर्वात्मना श्रभिभूत रहते हैं । अतएव आत्मज्ञान न - - बुद्धिविद्याविमूढ़ ऐसे मानव-सर्ग के लिए अबतारपुरुषों के द्वारा यही व्यवस्था हुई है कि - ' सर्वज्ञानविमूढ़ाँस्तान - विद्धि नष्टान-चेतसः ' ( गीता ३ | ३२ ) । पशुसर्गवत् एवंविध विमूढ़ मानवों में सेन्द्रियमन, तत्कामनाश्रयरूप शरीर. ये दो ही भाव मुख्य बने रहते हैं । मनोवशवर्त्तिनी बनती हुई इन आसुरभावापन्न मानवों की बुद्धि तमोगुणबहुला बनती हुई ' विद्या -अस्मिता आसक्ति - - ( रागासक्ति, एवं द्व ेषासक्ति ) - अभिनिवेश ' इन चारों मायामय तमोमय भावों से सतत आक्रान्त रहती है । ऐसे ही मानवसर्ग के सम्बन्ध में नीति का यह सिद्धान्त सर्वात्मना समन्वित हो रहा है, भले ही वह भारतीय मानव हो, अथवा तो अभारतीय ।

आहारनिद्राभयमैथुनञ्च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।

धर्मो हि तेषामधिको विशेषः, धर्मेण होनाः पशुभिः समानाः ॥

मनः शरीरमात्र परायण, तमो बहुलबुद्धि के परमाचार्य ऐसे विमूढ़ मानवों का चरम पुरुषार्थ है । माया, तम, छल, कपट, मात्सर्य, पिशुनता, असूया, आदि सुरभावों के माध्यम से नानाविध उत्पात -परम्पराओं के सर्जन द्वारा लोक में सहज प्राकृतिक अशान्ति का उद्भव करते रहना, एवं तद्द्वारा स्वार्थसाधनपूर्वक केवल शरीरपरायण, तदनुगत मनःपरायण ( कामभोगपरायण ) बने रहते हुए -" आज ऐसे यह प्राप्त कर लिया, वैसे वह प्राप्त कर लेंगे " इस चर्वणा में ही अहोरात्र आसक्त व्यासक्त बने रहना, जिन श्रासुर. छलकपटादि समस्त सुर- भावों का श्रौत ' माया एवं तम ' इन दो महा ३५०