Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 51–60
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 51–60
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प्रजातन्तुवितान कौषीतकि का ' विचक्षण ' तत्व-' आपः पुरुषवचसो भवन्ति ० ' इस छान्दोग्य - सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि पुरुषसृष्टि का मूलारम्भक गया है, तथापि इस सम्बन्ध में पार्थिव प्रजा के लक्ष्य से पारमेष्ट अपतत्त्व ही माना यह नहीं भुला देना चाहिये कि अस्मदादि पार्थिव पदार्थों की उत्पत्ति का प्रधानतः चन्द्रमा के साथ ही सम्बन्ध है । केवल पारमेष्ठ अप्तत्त्व का ही नहीं, अपितु स्वायम्भुव सत्य, सौर ज्योति, विविध भावापन्न नाक्षत्रिक प्राण, आाप्य असुरप्राण, वायव्य गन्धर्वप्राण, द्यावापृथिव्य पशुप्राण, सभी का पार्थिव भूतात्मा के साथ सम्बन्ध है । परन्तु इन सब आधिदैविक पदार्थों के आगमन का एकमात्र द्वार चन्द्रमा ही माना गया है । दूसरे शब्दों में चन्द्रमा ही ऋतुरूप सम्वत्सर के द्वारा पार्थिव प्रजा की प्रतिष्ठा बन रहा है । सर्वप्रतिष्ठा होने से ही चन्द्रमा ब्राणग्रन्थों में ' सर्व ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जैसाकि - " चन्द्रमा वै सर्वम् " ( गो ० ना ० पू ० २८ ) इत्यादि निगम से प्रमाणित है । भगवान् safe a fa म्नलिखित शब्दों में स्पष्ट ही चन्द्रमा को ऋतु द्वारा सर्वप्रभव माना है-* विचक्षणाहवो रेत श्राभृतं पञ्चदशात् प्रसूतात् पित्र्यवतस्तन्मा पुंसि कर्त्तर्ये -रध्वम् । पुंसा कर्त्रा मातरि मा निषिक्त स जायमान- उपजायमानो द्वादशत्रयोदश ' उपमासो द्वादशत्रयोदशेन पित्राऽऽसंतद्विदे प्रतितद्विदेऽहं तन्म ऋतवो अमर्त्यव आम-रध्वम् " ( कौ ० उप ० १ । २ । २ । ) सम्वत्सरस्य प्रतिष्ठा -पूर्व प्रकरणान्तर्गत ' ऋतुपितरनिरूपण ' प्रकरण में पड़ ऋतुसमष्टिरूप सम्व को हमने सर्व प्रपञ्च की प्रतिष्ठा बतलाया है । यह ऋतुभाव चान्द्रतत्त्व पर ही प्रतिष्ठित है । चान्द्र-सोम व सम्बन्ध से ऋतसोमरूप में परिणत होता है । यही ऋतचान्द्रसोमं ऋताग्नि में उच्चा-भाव से आहत होकर षड ऋतु का जनक बनता है । अतएव चन्द्रमा ही ऋतुसमष्टिरूप सम्वत्सरप्रजापति की प्रतिष्ठा माना गया है, जैसा कि - " नक्षत्राणि स्थ चन्द्रमसि सम्वत्सरस्य ' प्रतिष्ठा " ( तै ० ब्रा ० ३ । ११ । १ । १३ । ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । सर्वसृष्टि- ( पार्थिवसर्वसृष्टि ) -प्रवर्त्त कला के सम्बन्ध से ही चन्द्रमा के लिये " ब्रह्मा कृष्णश्च नोऽवतु, चन्द्रमा वै ब्रह्मा कृष्णः " ( शत ० १३ । १ । ११ । ) इत्यादि प्रसिद्ध हैं । इन्हीं सब विस्पष्ट प्रमाणों के आधार पर हमने दिव्य-पितृप्राणगर्भित ऋतुपितर ( चान्द्रतत्त्व ) को पार्थिव प्रजा का प्रजनयिता माना है । एकमात्र इसी सृष्टि-" विचक्षणात् - बहुबिधभोगदानकुशलात् सूर्य्य सुषुम्नाडीरूपाच्चन्द्रमसः " " असौ वै सोमो राजा विचक्षणश्चन्द्रमाः " ( कौ ० ब्रा ० ४ । ४ । ७ । १० । )
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श्राद्धविज्ञान प्रवृत्ति की अपेक्षा से चन्द्रमा ' धाता विधाता ' नामों से प्रसिद्ध है - ( देखिये गो ० वा ० पू ० १ | १३ | ) मासि मासिवोऽशनम् — उक्त कथन से यह भलीभांति सिद्ध होजाता है कि, दिव्यपितृप्राणयुक्त चान्द्र पितृप्रारण ( ऋतु पितृप्राण, जोकि श्रद्धासोममय है ) वृद्धि के द्वारा ओषधिरूप में परिणत होता है । दिव्यपितृ-प्रारण क्योंकि आदित्यात्मक है, अतएव ' आदित्याज्जायते वृष्टिः ' कहना भी निर्विरोध सुरक्षित रहजाता है । दित्यरश्मियाँ आदित्यप्राणात्मिका हैं, ये ही प्राण दिव्य पितर हैं । इनका सुषुम्णानाडी में भोग होता है । सुषुम्णा द्वारा इन दिव्यप्राणों का चान्द्रमण्डल में भोग होता है । चान्द्रसोम आदित्यरश्मि-गत प्राणाग्नि के सम्बन्ध से द्रुत होकर वृष्टिरूप में परिणत होता है । यही वृष्टिभाग ओषधिरूपमें परिणत होता है । इन ओषधियों का आप्यायन चान्द्रतत्व से स्वतन्त्ररूप से भी होता रहता है । यह श्राप्यायन कर्म कृष्णपक्ष में अधिक बलवान रहता है । सौररश्मिगत इन्द्र नामक प्रारण विशेष सोमानग्राहक है । शुक्लपक्ष में इसका प्राधान्य रहता है । अतएव चान्द्रसोम इस पक्ष में ओषधि-आप्यायन कर्म से असमर्थ है । कृष्णपक्ष में भी आप्यायन कर्म्म अमावास्या ' में सर्वप्रधान है । क्योंकि इस तिथि को इन्द्र सोमग्रहण में असमर्थ हैं । क्योंकि अमावास्या ओषधियों का आप्या-यनकाल है, अतएव इस दिन ओषधि काटना निषिद्ध माना गया है । चान्द्रसौम्यप्राण सम्बन्ध से ही अमावास्या ‘ पार्वणश्राद्धतिथि ' मानी गई है, जिसके सम्बन्ध में - " मासि मासि वो अशनम् ' ( शत ० वा ० २ । ४ । १ । २ । ) इत्यादि प्रसिद्ध है ।. दधि घृत - मधु - लक्षण कम्र्मात्मा-ओषधिरूप अन्न चान्द्रसोमप्रधान है, अतएव चन्द्रमा ' प्रोषधीनां पतिः ' नाम से प्रसिद्ध है । इस चान्द्रसोमप्रधान औषधिरूप भोग्य अन्न में दिव्य, आन्तरिक्ष्य, पार्थिव, तीनों द्रव्यों का समन्वय है । चान्द्र सोम की प्रधानता के साथ साथ दिव्यपितरप्राण की सत्ता भी पूर्व से गतार्थ है । पार्थिवमृद्-भाग भी समाविष्ट हैं । ये तीनों ही द्रव्य अग्नीषोमात्मकरूप से उभयविध हैं । अन्तर केवल घन - तरल-विरलावस्थाओं में हैं । पार्थिव अग्नि ' घन ' है, पार्थिव सोम घन है । यही ' आप ' नाम से प्रसिद्ध है । ओषधियों का दृश्य स्थूलभाग, जोकि - ' दधि हैवास्य लोकस्य रूपम् ' ( शतः ७ ५। ११३ ) के अनुसार ' धि ' नाम से व्यवहृत हुआ है, स्थूलाग्निसोममय है । स्थूल पानी, तथा चित्यलक्षण स्थूलाग्नि के समन्वय से ही मिट्टी बनी है । यही ओषधियों का स्थूल रूप है । अन्न में जो ' दाना ' ( घनता ) देखा जाता है, जिस घनता को तोड़ने के लिए अन्न को चक्की में पीसा जाता है, वही दधिभाग है । यह पार्थिव घनाग्नि सोमप्रधान है । पार्थिव संस्था में ' यथाग्निगर्भा पृथिवी ' के अनुसार अभि की प्रधानता है, सोम गौण है । अतएव पार्थिव पचमहाभूत समष्टि ' वाकू ' नाम से प्रसिद्ध है, जो कि ' बाक ' शब्द-' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ' ( शत ० प्रा ० १० ५ | १ | १ | ) के अनुसार अमितत्त्व का ही तर है । १६
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प्रजातन्तुवितान दूसरा भाग इन औषधियों में आन्तरिक्ष्य अग्नि, सोम का प्रतिष्ठित है । अन्तरिक्ष के अग्नि-सोमवायव्य बनते हुए प्राणप्रधान हैं । औषधिरूप अन्न में जो एक बलप्रद प्राण है, जिसके आगमन से सहोबल ( साहस ) का प्रादुर्भाव होता है, वही आन्तरिक्ष्य अग्नीसोस हैं । यह आन्तरिक्ष्य युग्म तरलावस्थापन होने से ' घृतमन्तरिक्षस्य ' के अनुसार ' घृत ' नाम से प्रसिद्ध है । चक्की में पि आटे को जब गोंदा जाता है, तो उसमें एक प्रकार की मसृणता आ जाती है, जिसे लोकभाषा में ' लेस ' कहा जाता है । चिकनाई प्रतं त होने लगती हैं । यह इसी आन्तरिक्ष्य प्राण का माहात्म्य है । ' पोमयः प्राणः ' सिद्धान्त के अनुसार पानी ही प्राणविकास की प्रतिष्ठा है । अतः अप् सम्बन्ध से ही आटे में इस घृत्तप्राण का विकास होता है । यह आन्तरिक्ष्य प्राण शारीर " ओज ” धातु का प्रवर्त्तक है । तं. सरा दिव्य अग्नि - सोमयुग्म विरलावस्थापन्न है । इससे औषधियों में मधुभाग का विकास होता है! ' आदत्यो वै देवमधु ' ( छान्दोग्य उपनिषत, मधुविद्या ) " मध्वमुष्य ( लोकस्य रूपम् ) -( शत ० ब्रा ० ७।५।१।३१ ) के अनुसार मधुभाग का प्रवर्त्तक दिव्याग्निसोमयुग्म ही माना जायगा । प्रत्येक अन्न मेँ एक प्रकार का मिठास होता है । अन्नगत यही मधुभाग शरीर में मधुभाव का स्वरूप समर्थक बनता है । यही दिव्य विशुद्ध अमित सोम प्रज्ञान नामक सर्वेन्द्रिय मन का आरम्भक बनता है, जिसके लिये - ' अन्नमयं हि सौम्य! मनः ' प्रसिद्ध है । इस प्रकार मुक्त अन्न-त्रैलोक्यरसावच्छिन्न बन्स्ता हुआ पार्थिवाग्मिसोमयुग्म से वाङ् मयी सप्तधातुसमष्टि का, अन्तरिक्ष्या-ग्निसोमयुग्म से प्राणमय ओज का, एवं दिव्याग्निसोमयुग्म से मन का उपादान बन रहा है । अग्नी-षोमयुग्मों का स्वरूपभेद ही इन तीनों आध्यात्मिक पर्वों के स्वरूपभेद का मुख्य कारण है । मनःप्रारण-वाङमय भतात्मा क्योंकि रसत्रयाचच्छिन्न अन्नरस से सम्बद्ध है, अतएव त्रिपर्वा यह कम्ममा ' अन्न-रसमयब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है । अन्न ही भूतात्मा की प्रतिष्ठा है, जैसा कि - ' अन्नाधीनं जगत्सर्वम् ' से स्पड़ है । इसी आधार पर अन्न को ' ग्रहोपनिषत माना गया है - ( देखिये शत ० ४।६।५।५ । ) " स वा एष आत्मा वाङमयः , प्राणमयो मनोमयः ” १- रसः, २- असृक्, ३ - मांसम् ४ - मेद ५ अस्थि, ६ - मज्जा, ७ शुक्रम प्रोज ३ सत्त्वम् - पार्थिव धातवः सप्त पार्थिव पितृप्राणेनाग्निषोमीयेन निष्पन्नाः - ' वाङ्मया: ' ( भूत्तमयाः ) ' वाकू " - आन्तरिच्यो धातुः - अन्तरिक्ष्यपितृप्राणेनाम्नीषोमीयेन निष्पन्नः " प्राणमयः " " "" प्राणः ” -- दिव्यधातुः - दिव्यपितृप्राणेनाग्नीषोमीयेन निष्पन्नः । " मनोमय " " मनः ”
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श्राद्धविज्ञान श्रात्मविवत सम्परिष्वक्ति-भुक्तान रसासृगादि द्वारा अन्ततः अपने पार्थिव इरामय सारभाग से ' शुक्र ' रूप में परिणत हुआ । अन्नगत सौम्यगुणक चान्द्र पितृप्रारण का भी शुक्र में समावेश हुआ । इस चान्द्रप्रारण से आकृति - प्रकृति, अहंकृतिभावसमर्पक ' महानात्मा ' का उदय हुआ । शुक्र में प्रतिष्टित बीजी इसी महानात्मा की इच्छा से ही आगे की ३. तसम्भूति ( प्रजोत्पत्ति ) लक्षण सन्तानधारा प्रवाहित होती है । बीजवस्थापन महान् का जितना श्राकार है: जैसी प्रकृति है, जो अहंभाव है, शुक्रसेकद्वारा गर्भ में प्रतिष्ठित गर्भ का उतना ही आकार, वैसी ही प्रकृति, वही अहंभाव सम्पन्न होता है, जैसाकि ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रकरण के ' महदात्मोपनिषत् ' नामक अवान्तर प्रकरण में विस्तार से बत जाया जाचुका है । उक्त सन्दर्भ से हमें केवल महानात्मा, क्षेत्रज्ञ, कम्र्मात्मा, इन तीन आत्मविवर्त्ती की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना है | भुक्तान्न का पार्थिव भाग ( वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञात्मक स्तौम्यलोकों का प्रवर्ग्यभाग ) तो वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञमूर्ति कर्मात्मा है । भुतान का चान्द्रसोमभाग " ' महानात्मा ' है । कम्र्मात्मा से युक्त अन्नमय प्रज्ञान पर प्रतिबिम्बित सौर हिरण्मयतेज विज्ञानात्मा है, यही क्षेत्रज्ञ है । क्षेत्रज्ञ बुद्धि है, प्रज्ञान मन है, कम्मरमा कर्मभोक्ता है, महानात्मा श्राद्धपिण्डरस भोक्ता है । जीवनदशा में सब आत्मविवर्त परस्पर सम्परिष्वक्त रहते हैं । प्रयाणकाल मैं बुद्धिरूप क्षेत्रज्ञ ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' के अनुसार स्वप्रभव सौर हिरण्मय मण्डल में अर्पीत होता है । प्रज्ञान मन अनुशयरूप से भोकात्मा वा सहयोगी बना रहता है । जबतक महानात्मा स्व-प्रभव चन्द्रलोक में नहीं चला जाता, तबतक तो कम्र्मात्मा महानात्मा के साथ रहता है । जब महानात्मा चन्द्रलोक में पहुँचकर स्ववंशज अन्य महानात्मानों के साथ सापिण्ड्यभाव को प्राप्त होजाता है, तो तदनन्तर ' देही कर्मगतिं गतः सिद्धान्त के अनुसार कम्र्मात्मा शुभाशुभ कर्मोदर्कभोगार्थ यात्रा का अनुगमन कर लेता है । क्योंकि श्राद्ध का लक्ष्य एकमात्र महानात्मा है, अतः इसी की ओर पाठकों का विशेषरूप से ध्यान आकर्षित किया जाता है । चन्द्रलोकानुगत - महानात्मा--" महानात्मा सजातीयानुबन्ध सम्बन्ध से सौम्य शुक्र में प्रतिष्ठित है, यह स्वयं चान्द्र सोम-प्रधान है, षड गुणक है, चिदात्मा की योनि है " इस निष्कर्ष को लक्ष्य में रखते हुए विचारविमर्श कीजिए । जो वस्तुतत्त्व जिस लोक का, जिस जाति का होता है, सजातीयाकर्षणसिद्धान्त के अनुसार उस वस्तुतत्त्व के साथ उस लोक, उस जाति का स्वाभाविक आकर्षण बना रहता है । एवं इस आक-र्पणसूत्र के आधार पर उन उन सजातीय, समानस्थानीय वस्तुतत्त्वों का प्रवर्ग्यरूप से परस्पर आदान दान हुआ करता है । मिट्टी के ढेले को आप कितना ही ऊंचा फैंकिए, परन्तु सजातीय समानस्था १६
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नीय पार्थिव आकर्षण से तत्क्षण धर तल पर ही आके टहरेगा । अग्निमयी वाला बलवदाक्रमण ऊर्ध्वगमन की ओर से वञ्चित नहीं की जासकेगी । इस सामान्य सिद्धान्त के आधार से भी स्वीकार कर लेने में कोई आपत्ति न होगी कि, चान्द्रसोमप्रधान - शुक्रस्थित महानात्मा चान्द्र पर आकर्षण हमें यह नित्य आकर्षित रहता है | क्योंकि भूतात्मा शुक्रावच्छिन्न है, अतएव तदभिन्न महानात्मा के नित्य से सम्परिष्वङ्ग से इसे भी पृथकू नहीं किया जा सकता । यही कारण है कि, जबतक महानात्मा में पहुँचकर सापिण्ड्यभाव को प्राप्त नहीं हो जाता, तबतक भूतात्मा इसके साथ बद्ध रहता चन्द्रलोक है । स्थूलशरीरनिधनानन्तर महानात्मा चान्द्राकर्षण से आकर्षित होकर चन्द्रलोक में जाता है, साथ ही महा-नात्मा से बद्ध कर्मात्मा को भी एक बार अवश्य ही चन्द्रलोक में जाना पड़ता है । घोरातिघोर पापिष्ट, सर्वोत्कृष्ट पुण्यात्मा, कोई भी हो, देहविच्युति के अनन्तर एक बार अवश्य ही ' महानात्मा ' के अनुग्रह से उसे ( कम्र्मात्मा को ) चन्द्रलोक में पहुंचना पडता है । वहां पहुँचे के अनन्तर महानात्मा से जब इसका ग्रन्थि- विच्छेद हो जाता है, तब यह कम्र्मानुसार पितृयाण, देवयानपथों में से किसी एक का आश्रय लेता हुआ कभफल भोगार्थ गमन करता है । इसी सामान्य गतिविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए कहा गया है-" ये वै चास्माल्लोकात् प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति " - कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषत् शरा भूतात्मावच्छिन्न महदात्मपितर शरीर के परित्यागानन्तर इस पृथ्वी से ऊपर की ओर ( चन्द्र-लोक की ओर. ) गमन करते हैं, अतएव - ' इतः ( पृथिविम्थानात् ) प्रयन्ति ' इस निर्वचन से इन्हें ' ' तपितर ' कहा जाता है, जैसा कि ' प्रतपितरोपनिषत् ' प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । प्रतसंज्ञक महानात्मा स्वप्रभव चन्द्रलोक में जाता है, इस गमनस्थिति का निम्न लिखित शब्दों में विश्लेषण किया जा सकता है । गमनस्थिति विश्लेषण --कल्पना कर लीजिये - श्राज आश्विनशुक्ला द्वितीया है । पश्चिम क्षितिज पर चन्द्रोदय हुआ है । इस समय चन्द्रमा का स्वाति नक्षत्र के साथ योग है, शरद ऋतु है, सायंकाल है । इस मुहूर्त्त एक पूर्ण र्भोक्ता भाग्यशाली गृहस्थ का आत्मा शरीर छोड़ता है । मृतशरीर का यह उत्क्रान्त आत्मा ( महानात्मयुक्त कम्र्मात्मा, किंवा कम्मत्मियुक्त महानात्मा ) जिस ओर चन्द्रमा की स्थिति है, उस अपनी गति बना लेता है । उत्क्रान्त आत्मा ने तत्समय की चन्द्रस्थिति के अनुरूप जो गमनं मार्ग. निश्चित कर लिया है, आसा पिण्ड्यभाव- पर्यन्त यह उसी निश्चित पथ की ओर क्रमशः - अग्रेसर होता रहता है । आश्विन द्वितीया को पश्चिम क्षितिज की विन्दुविशेष पर उदित होने वाला चन्द्रमा क्रमशः बदलने लगता है । नक्षत्र भोगानुगत कालभेद से चान्द्र उदयास्त परिवर्तनशील बना रहता है । अपनी १६
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श्राद्धविज्ञान परिवर्तनरूपा इसी परिक्रमा से यह २७ दिन, तथा कुछ घन्टों में एक दक्षपरिक्रमा पूरी कर लेता है । स्वात्तपरिभ्रमरणगतिवञ्चित चन्द्रमा की यह स्ववृत्तगति निर्दिष्ट उक्त समय में पूरी हो जाती है । २७ दिन, कुछ अंशों के संकलन से चान्द्र सम्वत्सर के १३ मास हो जाते हैं । इस प्रकार सौर सम्वत्सर की पूरी परिक्रमा लगाने में चन्द्रमा को पूरे तेरह मास लग जाते हैं । प्रत्येक मास की शुक्ल द्वितीया को गमनशील प्रेतात्मा तथा चन्द्रमा का समसाम्मुख्य होता रहता है । इस तिथि में प्रेतात्मा में चन्द्रवल समावेश के लिए उस वैज्ञानिक प्रक्रिया का आश्रय लिया जाता है, जो प्रक्रिया मासिक श्रद्धा ' एकोद्दिष्टश्राद्ध ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रथम मास में पार्थिव आकर्षण विशेषतः प्रबल रहता है, अतएव आरम्भ में पाक्षिकश्राद्ध ( पन्द्रहवीं ) किया जाता है । अनन्तर षाएमासिक, सर्वान्त में वार्षिकश्राद्ध किया जाता है । ज्यों ज्यों प्रेतात्मा पार्थिवाकर्षण से विमुक्त होकर चान्द्रमण्डल ' के समीप पहुँचता जाता हैं, त्यों त्यों इस की स्थिति में विकास होने लगता है । इन सब स्थितियों को त्रैलोक्य के आधार पर अश्रुमुख - पार्वण - नान्दीमुख, नामों से व्यवहृत किया गया है । स्थ चान्द्रलोक में मुख है, अन्तरिक्षस्थिति में पार्वण है, दिव्य चान्द्रस्थिति में नान्दीमुख है । पहुँच कर तत्रस्थ स्ववंशज नान्दीमुख पितरों से युक्त होकर स्वयमपि तद्रूप बनता हुआ यह प्रेत विशुद्ध सौम्यभाव में, पवित्रभाव में परिणत हो जाता है, जो कि पावन स्थिति आशौच निवृत्ति का मानी गई है, जिसके १३ मासात्मक काल का १३ दिनों में अन्तर्भावि मान लिया गया है । . तात्पर्य - प्रेतात्मा अपने निश्चित गतिमार्ग से बढ़ता रहता है । चन्द्रमा बदलता रहता है । त्रयोदशमासानन्तर ठीक उसी साम्मुख्यभाव के उपलब्ध होने पर यह नान्दीमुखों से संयुक्त होजाता है । इस भाव है । यहीं ( चन्द्रलोक में ) इस प्रतपिण्ड के पिता, पितामह, प्रपिता-महादि के अत्यपि प्रतिष्ठित हैं । इन पितृपिण्डों के साथ इस प्रतपिण्ड का युक्त हो जाना ही ' सापिण्ड्य ' है, जिस प्राकृतिक स्थिति की प्राप्ति के लिए प्रेतात्मा के पुत्र द्वारा ' सपिण्डीकरण ' नामक • प्रक्रिया विशेष को माध्यम बनाना आवश्यक होता है । जिस ऋतु में कम्र्मात्मा शरीर का परित्याग करता है, वही ऋतुमय सूक्ष्मभूत अङ्गष्ठमात्र शरीर से इस प्रेतात्मा का वहन करते हैं । अतएव इस पिण्ड - शरीर को ' प्रतिवाहिकशरीर ' कहा जाता है, जैसा कि आने वाली - ' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् मैं विस्तार से बतलाया जाने वाला है । गोत्र सृष्टिमीमांसा -ress से चन्द्रलोकस्थ वंशज पितरों का प्रसङ्ग चल पड़ा । अतः दो शब्दों में इसकी भी मीमांसाकर लेना अप्रासङ्गिक न होगा । जिस प्र ेतात्मा का आज गमन हो रहा है, उसके मूलपितर ( बंशज पितर ) ' सपिएड, सोदक, सगोत्र ' भेद से तीन श्रेणियों में विभक्त हैं । १- स्वयं प्रसंपितर २ - प्रतपितर का पिता, ३- पितामह, ४-- प्रपितामह, ५- वृद्ध प्रपितामह,
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1 प्रजातन्तु विज्ञान ६ – अतिवृद्धप्रपितामह, ७- वृद्धातिवृद्धप्रपितामह, ये सात पितर ' १ - सपिण्डपितर ' कहलाते हैं । तात्पर्थ्य यही है कि - ' सापिण्ड्यं साप्तपौरुषं, सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते सिद्धान्त के अनुसार पिण्ड सम्वन्ध सात धाराओं में भी उपभुक्त है । प्रेतात्मा से पहिले के ६ पिण्ड, स्वयं प्रेतात्मा ७ वाँ पिण्ड, यही सप्तपुरुषानुगत सापिण्ड्यभाव है । सातवें वृद्धातिवृद्ध पितामह से आगे की सात पीढियों के सात क्रमिक पितर ( १४ पन्त ) ' २ - सोदकपितर ' कहलाए हैं । इस से भी आगे का पितृसप्तक ( २१ पर्यन्त ) ' ३ - सगोत्र पितर ' संज्ञा से प्रसिद्ध हुआ है । इन तीन पितृसप्तकों के अनन्तर ' सजातीय-चन्धुपित्तर ' विभाग है । ' सृष्टि - वेद - गोत्र ' भेद से ऋषितत्त्व तीन सृष्टियों का प्रवर्त्तक माना गया है * । सृष्टि-प्रवर्त्तक ऋषि, गोत्रप्रवर्त्तक ऋषि, वेदप्रवर्तक ऋषि, तीनों ही ऋषितत्त्वों का मूल आधार ( प्रतिष्ठा-विकासभूमि ) एकमात्र आङ्गिरस - स्वायम्भुव - अग्नितत्त्व है, जिसका विकास आपोमय परमेष्ठी - मण्डल मैं माना गया है । ऋषितत्त्व की इसी मूल प्रविष्ठा का स्पष्टीकरण करते हुए वेदद्भगवान् ने कहा है-" विरूपास इषयस्त इद् गम्भीरवेपसः । वे अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे " । - ऋक्संहिता. १०।६२ राश " एकर्विशिनोऽङ्गिरसः ” इस श्रौतसिद्धान्त अनुसार यह ऋषिप्राणधारा मूलभल ङ्गिरा की २१ धाराओं के सम्बन्ध से गोत्रसृष्टि में २ ९ पीढ़ी पर्यन्त प्रवाहित रहती है । इसी मौलिक- श्रौत रहस्य के आधार पर स्मार्त्ताचायों ने सगोत्र पितरों की सीमा २१ वीं पीढी पर्यन्त मानी है | " लोकस्तु भुवने जने " ( अमरः ३ । ३ 1२1 ) के अनुसार भुवन, जन, दोनों के लिए लोक शब्द प्रयुक्त हुआ है । भ तसर्गे ( भूतप्रजाजन ) चौदह भागों में विभक्त है, जोकि सांख्य-परिभाषा में - ' चतुद्दशविध भूतसर्गे ' नाम से प्रसिद्ध है । चौदह जन ( प्रजासृष्टिवर्ग ) की अपेक्षा से भी चौदह लोक प्रसिद्ध हैं, एवं भूरादि सप्त ऊर्ध्व भुवन, अवलादि सप्त अधोभुवन, संकलन से चौदह दृष्टि से भी चौदह लोक प्रसिद्ध हैं । प्रकृत में जनात्मक चौदह लोक ही अपेक्षित हैं । ' महा-व्याहृति ' से सम्बन्ध रखने वाले ब्रह्मभुवन - ' भ: - भुवः स्वः ' इस त्रैलोक्य से युक्त भः ( रोदसी-त्रैलोक्य ), भुवः ( क्रन्दसी त्रैलोक्य ), स्वः ( संयती त्रैलोक्य ) नाम के सप्तलोक त्मक तीन लोक हैं, जिन की समष्टि के लिए ' त्रैलोक्यत्रिलोकी ' संज्ञा व्यवहृत हुई है । इसी त्रैलोक्यत्रिलोकी के गर्भ चतुर्दशलोक ( प्रजासृष्टि ) प्रतिष्ठित है । * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' उपनिषद्विज्ञानभाग्यभूमिका ' द्वितीयखण्ड में देखना चाहिए | २१
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श्राद्धविज्ञान भुवनात्मक ( स्थानात्मक ) लोक हो, अथवा जनात्मक ( स्थानस्थित प्रजात्मक ) लोक हो, उभय-विध लोकसृष्टि ( लोकसृष्टि, तथा लोकीसृष्टि ) का मूल अप्तत्त्व ही माना गया है । सिसृक्षु-प्रजापति अपने आपोमुख से ही उभयविध लोकसृष्टि के सूष्टा बनते हैं, जैसाकि - ' अप एव ससर्जादी ' इत्यादि मानवसिद्धान्त + से भी प्रमाणित है । ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' इत्यादि उपनिषच्छु ति जहाँ अपूतत्त्व को प्रजासृष्टि का आरम्भक लतला रही है, वहाँ — ' आपो वै सर्वाणि भूतानि ' ( शत ० ११ १ ६ १६ ) इत्यादि ब्राह्मण श्रुति इसी को भवात्मिका लोक-सृष्टि का भी आरम्भक मान रही है । निम्न लिखित व्याससूक्ति भी लोकसृष्टि की अवरूपता का समर्थन करती हुई इसे सर्वसृष्टिप्रवर्तक मान रही है-" प्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोकान्सु प्रतिष्ठिताः । आपोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत् ॥ " ( महाभारत ) चतुर्दशविध लोक ( प्रजा ) भेद से अतत्त्व भी चतुद्दशधा विभक्त है | किंवा लोकात्मक के चतुर्दशधा विभक्त रहने से लोक ( प्रजा ) भी चतुर्दशधा विभक्त है । उभयथा अपू तत्त्व का १४ संख्यात्त्व अक्षुण है । क्योंकि अपूतत्त्व १४ भागों विभक्त है, अतएव तद्रूप पितृपरम्परा भी इसी संख्या पर उपसंहृत है । एकमात्र इसी मूल के आधार पर चतुर्दशपर्यन्त ' सोदक ' ( जलाञ्जलि से सम्बन्ध रखने वाले ) पितरों की सत्ता मानी गई हैं । " तीसरा " सपिण्डपितर ” विभाग है । सोमगर्भित अग्नि ही पिण्डस्वरूप को निष्पादक माना गया है । साम्वत्सरिक अग्नितत्त्व सोमाहुति को गर्भ में आत्मसात् करता हुआ पिण्डसृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । यह साम्वत्सरिक पिण्डभाव सम्पादक ऋङ मूर्त्ति अग्नि सप्तसंस्थ माना गया है । सात संस्था पर्य्यन्त ही सोमगभित एक अग्निघन ( स्थिर - ध्रुवाग्नि ) का वितान होता है । इसी सप्ताग्निपिण्डसंस्था के आधार पर ज्योतिष्टोम यज्ञ की सात संस्थाओं का उदय होता है, जोकि सप्तक-" अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्यस्तोम, षोडशीस्तोम, अतिरात्रस्तोम, वाजपेयस्तोम, आप्तो-यस्तोम " इस नाम से प्रसिद्ध है । इसी सप्तभाव के कारण सोमगर्भित अग्निदेवता ' सप्तार्थ, सप्त-जिह्न ' इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । सात के अनन्तर घनता उत्क्रान्त हो जाती है, अग्निदेव संकोच प्रवत्त के सोमसम्बन्ध से वञ्चित होते हुए स्वयं सोमरूप में परिणत हो जाते हैं । इसी आधार पर ऋषियों + सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षु र्विविधाः प्रजा: ।.. • अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् । ( मनुः १८ ).. * " ने वेदः - " ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः " ( तै ० ३११२६१, २, ३ ) २२
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प्रजातन्तुवितान प्रतपित्तरों का पिण्डत्त्व सात पर ही विश्वान्त माना है, जं कि विश्रान्ति प्राकृतिक नियमानुगता होने से सर्वथा मान्य है । यही तीसरा ' सपिण्डपितर ' विभाग है । सौर सम्वत्सरानुगत पाथिव सम्वत्स: सोमगर्भित अग्निप्रधान है । भृग्वङ्गिरोमय परमेष्ठी समुद्र आपः प्रधान है । एवं ऋत - सत्यमय स्वयम्भ विश्वरूप प्राणप्रधान है । प्राणप्रधान स्वयम्भू को व्याप्ति इतर दोनों पर है । धान परमेष्ठी की व्याप्ति सौरपार्थिव सम्वत्सर पर है । फलतः, स्वायम्भुव प्राण की व्याप्ति भी पृथिची पय्येन्त है, एवं पारमेय अत्तत्त्व की व्याप्ति भी पृथिवी aria है, यह सिद्ध होजाता है । एवं इस व्याप्ति प्रदर्शन से हमें कुछ निष्कर्ष निकालना है, जैसा कि पाठक अनुपद में हीं देखेंगे । अभी वक्तव्य यही है कि - स्वायम्भुव प्राण ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं यह मूलरूप अङ्गिरा के सम्बन्ध से २ ९ विभूतिभाबों में विभक्त है । यही ऋषि गोत्रसृष्टि का प्रवर्तक है, यही सगोत्रपितृप्राण की मूलप्रतिष्ठा है । स्वायम्भुव विभूति से युक्त सगोत्रपितर ही दिव्य-नान्दीमुख पितर हैं, जिनसे - ' गोत्रं नोऽभिवर्द्धन्ताम् ' यह फलाशी: माँगी जाती है । पारमेष्ठ्य तत्त्व सोदक पितृप्राण की प्रतिष्ठा बनता है । अपतत्त्वानुबन्धी चतुद्द शविकास के सम्बन्ध से सोदक पितर चतुर्द्द शशाखापर्य्यन्त व्याप्त रहते हैं । ये ही आन्तरिक्ष्य पार्वण पितर हैं । पार्थिव अग्नितत्त्व सपिण्ड पितरों की प्रतिष्ठा बनता है । सप्तधा विभक्त अग्नि के सम्बन्ध से सपिण्डता सात ही पीढ़ी प्रक्रान्त रहती है । ये ही सपिण्ड पितर पार्थिव अश्रु मुख पितर हैं । स्वयम्भू स्वः है, परमेष्ठी भुवः है, सम्वत्सर भूः है, यही महाव्याहृतिरूप महाविश्व है । जिस के तीनों पर्वों में क्रमशः सगोत्र - सोदक - सपिएड पितर प्रतिष्ठित हैं । ऋषिसम्बन्ध से स्वा यम्भुव पितर ' य ' कहलाए हैं, अपसम्बन्ध से पारमेष्ठ्य पितर ' याप्य ' कहलाए हैं, एवं सम्ब-त्सर- मण्डलान्तर्वर्त्ती ऋतुसोम के सम्बन्ध से पार्थिव - साम्वत्सरिक पितर ' सौम्य ' • कहलाए हैं । यही इन विविध पितृप्राणों का मौलिक स्वरूप परिचर है । १ –स्वयम्भूः ( स्वः- संयती त्रैलोक्यरूपः ) - द्युलोकः - प्राणमयः २ - परमेष्ठी ( भुवः - क्रन्दसी त्रैलोक्यरूपः ) - अन्तरिक्षलोकः – आपोमयः ३ - सम्वत्सरः ( भूः - रोदसी त्रैलोक्यरूपः ) - पृथिविलोक: - सोमा भवाग्निमय: २३
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विज्ञान - गोत्रप्रवर्त्तको ऋषिः गोत्रपितरः - २१ विभक्ताः १-- प्रारण: -२ - आपः - लोकप्रवर्त्तका आपः - उदकपितरः- १४ विभक्ताः ३ -- अग्निः -- पिण्डप्रवर्त्तको ऽग्निः पिण्डपितरः -- ७ विभक्ताः १ - - सगोत्राः - - ना ० दीमुखाः - - दिव्याः ( आदित्यानुग्रहीताः - अनुगृहीताच ) १२- सोदकाः - पार्वणः -- वरीच्याः ( रुद्रानुग्रहीताः - अनुगृहीताश्च ) ' ३ प - सपिएडा: अश्रुमुखा: - पार्थिवा: ( वस्वनुग्रहीताः - अनुगृहीताच ) दूसरी दृष्टि से विषय का समन्वय कीजिए । निष्टात्मिका आर्ष वैदिक परिभाषाओं के सम्पर्क आए हुए विज्ञ पाठक सम्भवतः यह अवश्य स्वीकार कर लेंगे कि, दृश्यस्थिति की अपेक्षा से पृथिवी ( भूपिड ) आधारशिला है । पृथिवी से ऊपर चन्द्रमा है, तदुपरि सूर्य्य है, तदुपरि परमेष्ठी है, सर्वोपरि स्वयम्भू है । स्वायम्भुव प्राण ' ऋषि ' नाम से, पारमेष्ठ्य प्राण ' पितर ' नाम से, सौरप्राण ' देव ' नाम से, चान्द्रप्राण ' गन्धर्व ' नाम से, एवं पार्थिवप्राण ' पुरुष ' ( वैश्वानर ) नाम से प्रसिद्ध है! प्राणमय स्वयम्भ ऋतत्व का आयोमय परमेष्ठी पितृतत्त्व का, वाङमय सूर्य देवतत्त्व का, अन्न-चन्द्रमा का प्रवर्तक है, एवं अन्नादमयी पृथिवी पुरुषसृष्टि की प्रवृत्तिका है । इस वित्तों में से पारध्य पितृप्राण हमारा प्रधान लक्ष्य बना हुआ है । ' सर्वयज्ञ ' विज्ञान के आधार पर हमें मान लेना पड़ता है कि, ये पाँचों प्राकृतिक प्राण परस्पर समन्वित हैं । इसी समन्वय के आधार पर कहा जा सकता है कि, पारमेष्ठ्य पितृप्राण के साथ भी शेष ऋषि - देव- गन्धर्व - पुरुष, इन चारों प्राणों का समन्वय सम्बन्ध हो रहा है । हम तो इस महमूत्ति पारमेय पितरत्राण के सम्बन्ध में यह भी कह सकते हैं कि, यही इन चारों प्राणों की विकास-भूमि है । सृष्टिमर्थ्यादा से अतीत, असङ्ग, ऋषितत्त्वप्रधान अव्यक स्वयम्भू का योगन संसङ्ग सर्ग मैं प्रवृत्त हो जाना एकमात्र इसी पारध्या के समय का फत है । देवप्राणवत हिरण्यगर्भसूर्य इसी परमेष्ठी के भाग का विकास है । प्राणात्मक चन्द्रमा इसी पारमेय भार्गव आय वायु का विकास है । पुत्राणात्मिका पृथिवो भो पारमेध्य अपतत्त्व के रूपान्तरित ' मर ' नामक पानी के प्रयास का ही परिणाम है । यही तो इस परमेष्ट्री की महत्ता है, अतएव तो इस सलिला -धिष्ठाता को ' महान ' कहना अर्थ बनता है, जिस को कि महत्ता का ऋषि ने निम्न लिखित शब्दों में यशोगान किया है.