Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 421–430

महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् अवों में अन्तर्भाव हो रहा है । आत्मबोधस्वरूपविश्लेषिका, धर्म - ज्ञान - वैराग्य - ऐश्वर्यलक्षणा विद्या-बुद्धिचतुष्टयी के द्वारा अमिनिवेशात्मक अधर्म, अविद्यात्मक अज्ञान, आसक्तिरूप रागद्वेष, अस्मिता-· लक्षण अनैश्वर्यलक्षणा श्रविद्याबुद्धि - चतुष्टयी के निवृत्युपाय प्रदर्शक सर्वेश्वर - पूर्णेश्वर भगवान् ने तथो-पवर्णित विमूढ़ - आसरभावापन्न मानवों के सम्बन्ध में जो निम्न लिखित उद्गार प्रकट किए हैं, सम्भव है उनके द्वारा स्खलनपथारूढ़ गतानुगतिक आज के युग के भारतीय मानव का उद्बोधन सम्भव बन जाय । मानवोद्बोधकविभूतिद्वयवर्णन -- ' १ - देवमानवानुगता दैवीसम्पत् ( विमोक्षाय ) -१ - अभयं सवसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं - दमञ्च यज्ञश्च - स्वाध्यायस्तप श्रावम् ॥

२ - अहिंसा - सत्य - मक्रोधः - त्यागः - शान्ति - रपैशुनम् ।

दया- भूतेषु अलोलुपत्वं मादव- ही रचापलम् ॥

३ – तेजः - क्षमा- धृतिः - शौच - मद्रोहो - नातिमानिता भवन्ति सम्पदं देवीमभिजातस्य भारत! -१. २ - मुरमानवानुगता श्रासुरीसम्पत् ( निबन्धाय ) -१ – दम्भः - दर्पः - अभिमानश्च - क्रोधः - पारुष्यमेव च ।

ज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ । सम्पदमासुरीम् ॥

३ - द्वयोः सम्पदोः उदर्को --दैव सम्पद्विमोक्षाय, निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं देवमभिजातोऽसि पाण्डव! । * अथ हैनं शश्वदप्यसुराः - उपसेदुः - इत्याहुः । तेभ्यस्तमश्च, मायां च प्रददौ । श्रस्त्य हैव-' आसुरमाया ' इति इव | पराभूता हत्वेव ताः प्रजाः । ( शत ० २ | ४ | २ | ५ | ) । ३५१

पृष्ठ 422

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श्राद्धविज्ञान - दैव- श्रासुरमानवभेदभिन्नप्राकृतिकसर्गद्रय स्वरूपमीमांसा-द्वौ भूत

लोकेऽस्मिन् दैव, आसुर एव च ।

देवो विस्तरशः प्रोक्तः, सुरं पार्थ! मे शृणु ॥

-४ ----- श्रासुरमानवस्वरूपोपवर्णनम् ( दैवमानवोद्बोधन धिया ) -१ – प्रवृत्ति च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारः, न सत्यं तेषु विद्यते ॥

२ – असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।

परस्परसम्भूतं किमन्यत् काम हैतुकम् ॥

३ - एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।

प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥

ष्ट – काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भ - मान - मदान्विताः ।

मोहाद् गृहीत्वाऽसद् ग्राहान् प्रवर्त्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥

५ - चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति ' ' निश्चिताः ||

: - शापाशशतैर्वद्वाः कामक्रोधपरायणाः ।

ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

७ - इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये ' मनोरथम ' ।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥

- असौ मया हतः शत्रुः, हनिष्ये चापरानपि ।

ईश्वरोऽहं ' भोगो ', सिद्धोऽहं बलवान्, सुखी ॥

६ - श्राढ्यो - ऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।

ये - दास्यामि - मोदिष्ये - इत्यज्ञानविमोहिताः ॥

१० - अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।

प्रसक्ताः ' कामभोगेषु ' पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥

३५२ ?

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ऋणमोचनोपायोपनिषत्

११ - श्रात्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।

यजन्ते नामयज्ञैस्तै दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥

१२- अहङ्कारं बलं - इ - कामं क्रोधं च संश्रिताः ।

: मामात्मपर देहेषु प्रद्विषन्तो ऽभ्यसूयकाः ॥

१३- तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

१४ - आसुरी योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।

मामायैव कौन्तेय! ततो यान्त्यवमां गतिम् ॥

श्रीमद्भगवद्गीता १६० । १ से २० पर्यन्त “ ३-१-१-१-१४- " इन पाँच भागों में विभक्त विंशति ( २० ) - श्लोकात्मक ' देवासुरस्वरूप -निरूपण ' नामक प्रकरण में भगवान् ने जिस उपनिषत् | रहस्यात्मक तत्त्वविज्ञान - मौलिकविज्ञान ) ar farmer किया है, उसका विशद निरूपण तो गीताविज्ञानभाष्यान्तर्गत तत्प्रकरण में हीं देखना चाहिए । प्रकृत में केवल अक्षरार्थ- समन्वय से ही सन्तोष मान लिया जाता है । ( १ ) - देवमानवानुगता देवीसम्पत् - विमादाय-' त्रिःसत्या ने देवा: ' इस नैगमिक चाम्नायानुसार देवीसम्पत् - स्वरूपपरिचयात्मक प्रथम-तर प्रकरण में तीन हीं श्लोकों से भगवान्नें ' अभयं सत्त्वसंशुद्धि: ' इत्यादि रूप से जन्मजात दैव-भावान्न मानव ( द्विजातिमानव की उस दैवीसम्पत् के सहज गुणों ( प्राकृतिक गुणों ) का ही स्वरूप विश्लेषण किया है, जो दैवीगुण युगधर्मानुगत सुरभावों के सम्पर्क में आकर भी ' प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ' इत्यादि के अनुसार येनकेन रूपेण सुरक्षित रहते ही हैं । ' वि यस्तस्तम्भ षडिमा रजांसि - श्रजस्य रूपे किमपि स्विदेकम् ' ( ऋक् सं ० ) - ' अभयं वं ब्रह्म ' ( वृ ० उप ० ४ । ४ । २५ । ) - ' ब्रह्म वै स्वयम्भू अभ्यानर्षत् ' ( शत ० ब्रा ० ) इत्याद्यनुसार स्वायम्भूव ' पुरुषात्मा ' हो १ - ' अभय ' ( पद ) है, जिसकी अनुगति ( बोध ) के अनन्तर देवमानव सर्वात्मना स्वयम्भूयत षट् - लोकात्मक ( भूः भुवः स्वः - महः - जनः - तपः ) रजों से तीत ' विरज ' बनता हुआ संसरण - कम्पन - शील सांसरिक यच्चयावत् भयभावों ( कम्पनभावों ) से पृथक हो जाता है । ' या सम्भवत्यादिदेवतामयी ' - ( कठोपनिषत् ४ । ७ । ) - सत्त्वादधि महानात्मा ' ( कठोपनिषत् ६०७ | ) ( सस्यैवः प्रवर्त्तकः ' ( उपनिषत् इत्याद्यनुसार - पारमेष्ठ्य ' महानात्मा ' ही २ - ' सच ' ( पद ) है, जिसकी अनुगति ( बोध ) के अनन्तर त्रिगुणात्मक विश्व के त्रैगुण्यभाव से ३५३

पृष्ठ 424

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विज्ञान सम्बन्धित सम्पूर्ण पाप्मा - मलीमस विचार - मलिनता प्रचोदयात् ' - ' तेषामादित्यवज्ज्ञानम् ' इत्याद्यनुसार - सर्वात्मना पलायित हो जाते हैं । ' धियो यो नः जिसकी गति के अनन्तर अज्ञानावृत सौर ' विज्ञानात्मा ' ही ३ - ' ज्ञान ' ( योग ) है, जैसे कि उदित सूर्य्य से ' अन्धंतमः ' निःशेष ज्ञानात्मक बन मोह एकान्ततः पलायित हो जाता है उसी प्रकार, ' प्रज्ञानात्मा ' नुगत ५ – ' दान ', एवं पार्थिव ' भूतात्मानुगत जाता है । मर्त्यसूर्य्यानुगत प्लव ४ – यज्ञ, चान्द्र भी देवमानव में सहजरूप से उबुद्ध रहतीं ' ' ६ - दम ', ये तीनों मर्त्यकर्म्म - शप्तयाँ अमृतसौरज्ञान ही मानें गए हैं । हैं, जिनकी मूलप्रतिष्ठा स्वायम्भुव अभय, पारमेष्ठ्य सत्त्व, आत्मविभूतयः -१ - स्वायम्भुवं ब्रह्म २- पारमेष्ठ्यं सत्त्वम् ३- अमृतसौरज्ञानम् ४ – मर्त्यसौरः- यज्ञः ५ -- चान्द्र ं - दानम् ६ – पार्थिवः - दुमः अभयाधारम् सत्त्वसंशुद्ध राधारम् ज्ञानयोगव्यवस्थित राधारम् यज्ञाधारः दानाधारम् दुमाधारः ( पुरुषात्मानुगतम् ) । ( महानात्मानुगतम् ) । ( विज्ञानात्मानुगतम् ) ( प्राणात्मानुगतम् ) । ( प्रज्ञानात्मानुगतम् ) । ( भूतात्मानुगतम् ) । आत्मविभूतिप्राप्तिसाधनानि-१ - सर्वत्र सर्वावस्थासु स्थितिभावः २ - सर्वत्र सर्वावस्थासु विशुद्धभावना ३ - सर्वत्र सर्वावस्थासु निर्णयबुद्धेरनुगतिः अभयम् ( निडर रहो ) । सत्त्वसंशुद्धिः ( पवित्र रहो ) । ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ( ज्ञानोपासक बने रहो ) । ( कर्म्म करते रहो ) । ४- - सर्वत्र सब वस्थासु प्राकृतिककर्मानुगतिः ५ - सर्वत्र सर्वावस्थासु जात्मपरिग्रहार्पणम् यज्ञ ६ - सर्वत्र सर्वावस्थासु इन्द्रियमर्थ्यादानुगतिः दानम् दमः प्राप्त आत्मविभूतिसंरक्षणोपायाः-( i ) - सर्वत्र सर्वावस्थासु - प्रकृतिरहस्यानुशीलनपरायणता ( २ ) - सर्वत्र सर्वावस्थासु - प्राकृतिकपरिश्रमानुगमनम् ( ३ ) - सर्वत्र सर्वावस्थासु – ज्ञान क्रियार्थभावानां. ऋजुता - ( १६ ) -१--( आदान के लिए प्रदान करते रहो ) ( अपने को मर्यादित रक्खो ) । ( स्वाध्यायशील बने रहो ) -स्वाध्याय: ( सदा प्राणदान करते रहो ) -तपः ( सदा समत्त्व का अनुगमन करो ) श्रार्जवम् ३५४

पृष्ठ 425

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् देवभावसंरक्षकाः - सामान्योपायां: - ( सामान्यवृत्तयो ( १ ) -सर्वभूतद्दिते रतिः वा - साच्चिकमानवस्य ) सबको सहयोग प्रदान करो । ( २ ) - विज्ञानसम्मतो वाग्व्यवहारः तत्त्वसम्मता भाषा बोलो उत्तेजित मत बनो ( ३ ) - शारीरिकोत्तेजननियन्त्रणम् ( ४ - कामासक्तौ - अनासक्तिः ( ५ ) - मानसिकोत्तेजनस्योपेक्षा ( ६ ) - परच्छिद्रान्वेषणे उपेक्षा ( ७ ) - श्रसमर्थेषु सहयोगप्रदानम् ( ८ ) - वित्तपरिग्रहे लिप्साया श्रभावः ( ६ ) - व्यवहारेषु कोमलता ( ० ) - निन्द्यकर्मसु लज्जाशीलता ( ११ ) - मनसः - इन्द्रियाणाञ्च बुद्धया नियन्त्रणम् सन्धि से बचे रहो मानसिक चञ्चलता की उपेक्षा करो दूसरों के दोषदर्शन से बचे रहो समर्थो की सहायता करो वित्तलालसापाश में न बंधो लोकव्यवहार में उग्र न बनो कम्मों में लज्जाशील बनो बुद्धि के स्थिरधर्म को अपना अहिंसा सत्यम् क्रोध: त्यागः शान्तिः अनम् दया भूतेध्यलोलुप्त्वम् मम् ह्री: अचापलम् ( १२ - व्यवसायबुद्ध: सुतीक्ष्णता ( १३ ) - अपराधोपेक्षा ( १४ ) - बुद्ध रकम्पनम् ( १५ ) - बाह्याभ्यन्तर मलशुद्धिः ( १६ ) - अपकारिषु उपेक्षा ( १७ ) - स्वशक्त: परोक्षता - ( १६ ) - २-सूक्ष्मदर्शी बन अपराधों की उपेक्षा करो तेजः क्षमा बुद्धि को सुस्थिर रक्खो धृतिः उभयशुद्धि को अपनाओ शौचम् निन्दकों की उपेक्षा करो अद्रोहः स्वशक्ति को प्रकट न करो नातिमानिता - ( १६ ) -३-जिस द्विजाति मानव की वंशपरम्परा प्रक्रान्त रहता है, वह कुलीन ही ' अभिजात में आम्नायसिद्ध निगमानुगत सनातनधर्म्म परम्परया ' है देवसम्पदृष्ट्या सम्पत् परम्परया प्रतिष्ठित रहती है - । उस मानव में जन्मतः उक्त देवी-" भवन्ति सम्पदं देवोमभिजातस्य भारत! " -1--२- यासुरभावानुगता आसुरीसम्पत् - निबन्धाय-दैवीसम्पत् के अभयादि - दमान्त ६ विशेषधर्म अहिंसादि नातिमानितान्त १७ विशेषधर्म,, स्वाध्याय - तप श्रार्जवरूप ३ संरक्षणोपाय, एवं सम्भूय इन २६ ( छब्बीस ) दैवीसम्पदाओंके भयादि २६02

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श्रद्धविज्ञान विपर्य्यम मानें गए हैं, जिनका समावेश तो जन्मना आसुरीसम्पत् - युक्त मानव में रहता ही है । इनके अतिरिक्त ' दम्भ - दर्प - अभिमान - क्रोध- पारुण्य- अज्ञान ' ये ६ विशेष धर्म्म इसमें ओर समाविष्ट हो जाते हैं । इस विशेषता के कारण ही तो देवासुरप्रतिद्वन्द्विता में आरम्भ में कुछ समय के लिए देवबल पराभूत सा प्रतीत होने लगता है, जबकि अन्त में असुरबल के लिए - ' समूलस्तु विनश्यति ' पुरस्कार ही सुरक्षित माना गया है । इसी आधार पर ' चलं सत्यादोजीयः ' - ' सत्यमेव जयते- नानृतम् ' सिद्धान्त स्थापित हुए हैं-सुरोसम्पद्युक्तमानस्य सामान्यविशेषधर्माः ---( १ ) - मनसि सदा विकम्पनता ( २ ) - सदा मलिनविचारानुगतिः ( ३ ) - सदा अनिश्चितमत्यनुगतिः ( ४ ) - सदा विरुद्धकर्मानुगतः ( ५ ) - परपरिग्रहाकर्षणवृत्तिः ( ६ ) --सदा उन्मर्यादा मन में सदा भयसंत्रस्त हैं सदा पवित्र हैं सदा संशयशील हैं प्रकृतिविरुद्ध कर्म्म करते हैं. भयम् तमः अज्ञानम् ( ७ ) - सदा आम्नायालोचना तद् विरोधश्च शास्त्र - धर्म्मविरोधी हैं ( ६ ) - सर्वत्र कुटिल व्यवहारः ( १० ) - सर्वभूतोत्पीडनम् विक परसम्पत्ति अपहरण मेंकुशलहैं अपहरणम् सदा अमर्यादित हैं स्वाध्यायविरोधः - उच्छ्रङ्खलश्रमानुगतिः निरर्थक साहसों के अनुगामी हैं । आयासः कुटिलता हिंसा अनृतम् क्रोधः आसक्ति: मन से सदा शान्त हैं अशान्तिः दूसरों को दोषी मानते रहते हैं पिशुनता ( १६ ) - असमर्थेषु दण्डप्रदानम् निर्बलों को दण्ड देते हैं क्रूरता लिप्सा ( ११ ) - स्वार्थसम्मतो वाग्व्यवहारः ( १२ ) - शारीरिको त्तेजनानुगतिः ( १३ ) - कामासक्तिपरायणता ( १४ ) - मानसिकोत्तेजनानुगतिः ( १५ ) - परं दोषमीमांसानुगतिः ( १७ ) - वित्तेषु लिप्सा ( १८ ) - व्यवहारेषु रूक्षता ( १६ ) - निन्द्यकर्मसु यशःख्यापनता ( २० ) - मनसः इन्द्रियाणाञ्च चपलता ( २१ ) - प्रत्यक्ष बुद्धेरनुगतिः ( २२ ) अपराधिषु निर्म्मम प्रहारः सर्वत्र कुटिलता रखते हैं सबको पीड़ित करते रहते हैं । स्वार्थ से ही बात करते हैं । तत्क्षण उत्तेजित हो पड़ते हैं कामभोग में तल्लीन हैं. सम्पत्ति लालसा में लिप्त हैं । व्यवहार में बड़े रूखे हैं बुरे कर्मों को पुरुषार्थ मानते हैं सदा चञ्चल बने रहते हैं सदा प्रत्यक्ष से प्रभावित रहते हैं क्षमा करना जानते ही नहीं ३५६ रूक्षता निर्लज्जता चपलता स्थूलदृष्टि: . क्र राः

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( २३ ) बुद्धे विकम्पनता ( २४ ) - बाह्याभ्यन्तरमलिनता ( २५ ) - उपकारिषु उपेक्षा ( २६ ) - स्वशक्त र्घण्टाघोषः ( २७ ) - १ - स्व महत्त्वख्यापनप्रवृत्तिः ( २८ ) - २ - पर महत्त्व निन्दाप्रवृत्तिः ( २६ ) - ३- भूतावेशवत् - आवेशानुगतिः ( ३० ) - ४ - मनसिवच सिकायेनिष्ठ रता । ( ३१ ) - ५ - अविद्याचतुष्टय्यायामासक्तिः ऋणमोचनोपायोपनिषत् बुद्धि सदा डाँवाडोल रहती है सर्वात्मना मलिनविचार रखते हैं । उपकारी को भूल जाते हैं. सदा अपनी बड़ाई करते रहते हैं । — पूर्वविपर्ययाः-अपने महत्वस्थापन के लिए धाकुल हैं महत्त्व के विशिष्ट निन्दक हैं. सदा भावाविष्ट रहते हैं । सर्वात्मना पाषाणहृदय हैं ' श्रव्यवसायिनः अशुचयः कृतघ्नाः एषणाख्यापकाः एषणाकामुकाः - परगुणनिन्दकाः भावाविष्टाः पाषाणहृदया: श्रविद्याचतुष्टयी के महापण्डित हैं बुद्धियोग भ्रष्टाः - ( १६ ) -४-- ' अभिजातस्य पार्थ! सम्पदमासुरीम् ' ( ३ ) द्वयोः सम्पदो: - उदकौं-प्रतिपादित उभयसम्पत्तियों का स्वरूप ही दोनों के उदर्कभावों ( परिणामों ) का स्पष्टीकरण कर रहा है । ऐन्द्री दैवीसम्पत् जहाँ पाशविमोचिका है, यहाँ वारुणी आसुरी सम्पत् पाशबन्धन - प्रवर्त्तिका है । यह ठीक है कि, जन्मना दैवीसम्पत् - युक्त मानव अपनी भावुकता के दोष से अर्जुनादिवत् परधर्मा-क्रान्त बनता हुआ, अपनो सात्त्विक आस्थानुगतां श्रद्धाप्लाविता सहज निष्ठा से पराङमुख बनता हुआ कुछ समय के लिए अवश्य ही उत्पथपथानुगामी हो जाता है । किन्तु कालान्तर में इसका उद्बोधन सहज है । यही भाव भगवान् के ' मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव! " ( १६।५ ) इन शब्दों हुआ है, जिसका अन्यत्र इन शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है -* स्वभावजेन कौन्तेय! निबद्धः स्वेन कर्मणा । च्स मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ( गीता १८६० । ) * - ' ज्याँ का पड्या सुभाव ( स्वभाव - प्रकृति ) जासी जीवसे ' ( लोकोक्तिः ) । ' प्रकृर्तिदुस्त्यजा ' ( साहित्यसूक्तिः ) । न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः । स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः ॥ ( नीतिसूक्ति: ) । ३५७

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-श्राद्धविज्ञान यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ( गीता १८ । ५६ । ) । सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ( गीता ३।३३ । ) । ठीक इसके विपरीत जन्मना आसुरीसम्पत - युक्त मानव अपनी स्वार्थलिप्सा - परिपूर्णा - आस्था - श्रद्धा-संस्पृष्टा जघन्यनिष्ठा ( कुनिष्टा ) के माध्यम से केवल स्वार्थसाधन के लिए स्वार्थसाधन प्रसङ्गावसरों पर अपने आपको श्रद्ध शील- धर्मभक्त घोषित करता हुआ ', ' मुखे रामः कक्षे क्षुरिका ' * को अन्वर्थ बनाता हुआ कुछ समय के लिए अवश्य ही दैवीसम्पत् - युक्त सा प्रतीत होने लगता है । किन्तु कालान्तर में इसका व्याघ्रचर्माच्छिन्नरासभ स्वरूप अवश्य ही सुव्यक्त हो जाता है । ऐसे तारकों से मानव को सर्वात्मना सतर्क रहना चाहिए, जिनका यशोवर्णन? विस्तार से स्वयं भगवान् हीं करने वाले हैं । - ( १६ ) -५ -.... ३ ----( ४ ) - देवासुरभावभेदभिन्नप्राकृतिकसर्गद्वयस्वरूपमीमांसा -स्वायम्भुव ब्रह्मात्मक ऋषिसर्ग, एवं पारमेष्ठ्य सुब्रह्मात्मक पितृसर्ग, दोनों कालचक्रात्मक सम्वत्सरसीम नुगता विधि - निषेधसीमा से बहिर्भूत हैं: । अतएव तद्रूप संन्यासी, तथा तपस्वी, इन दो अाश्रमसर्गों को भूतमर्गसीमा से पृथक् ही म ना जायगा, जिह्न भगवान् ने - ' महर्षयः सप्त पूर्वे ' इत्यादि रूप से भावात्मक मानससर्ग ( श्रव्ययात्मक सर्ग - असर्गात्मक सर्ग ) ही कहा है ( × ) । सर्गमर्यादा का उपक्रम होता है संसृष्टिलक्षणा ' सृष्टि ' से । यह सृष्टि अवलम्बित है. रविप्राणात्मक दाम्पत्यभाव पर, मिथुनभाव पर । अतएव इसे ' मैथुनी सृष्टि ' कहा गया है । यही संसृष्टिलक्षण-मिथुन भावात्मक - भूतसर्ग है, जिसका उपक्रम स्थान है देवप्राणघन विश्वकेन्द्रस्थ ' सूर्य ' । यहाँ क्योंकि अधोभागावस्थित पार्थित्र चान्द्र मर्त्यसर्ग का भी समन्वय है, अतएव सौर - भूतसर्ग के ही ' दैवसर्ग ' * - ' मुख में राम, बगल में छुरी ' ( लोक आभाणक ) । यस्मादर्वाक् सम्वत्सरोऽहोभिः परिवर्त्तते । तद्ददेवा ज्योतिषां ज्योतिरायुपासतेऽमृतम् ॥ ( शत ० १४।७।२।२० । )! x महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भात्रा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ( देवप्रजा, असुर प्रजा च ) | | ( गी ०१०।६ । ) । ३५८

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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' सुरसर्ग ' ये दो विभाग मान लिए जाते हैं । सूर्य्य हो अपने द्यावापृथिव्य कश्यप मण्डल से पश्यक बनता हुआ ' कश्यप प्रजापति ' है, जिसकी अदितिपत्नी से दवसर्ग, एवं दितिपत्नी से दानवसर्ग ( आसुरसर्ग ) का उदय हुआ है । इन दोनों सर्गों के उपबृहंणात्मक विवेचन का ही नाम सौरपुराणा-काशविद्या प्रतिपादक ' पुराणशास्त्र ' है । सौरसर्ग ही अदिति - दिति भेद से दैव आसुर इन दो सर्गों से परिणत हो जाता है, जिस के सूर्य्य - चन्द्रमा, चन्द्रमा - पृथिवी, पृथिवी भूत, ये तीन अवान्तर विवर्त्त हो जाते हैं, जिन का दिग्दर्शन पूर्व में कराया जा चुका है ( देखिए पृष्ठ सं ०३३३ का परिलेख ) । सूर्याचन्द्रमसौ चन्द्रमापृथिव्यौ, भूतपृथिव्यौ, ये तीनों दाम्पत्यभाव ही वहाँ क्रमशः देव, पशु, भूत, इन तीनों सर्गों के प्रवर्त्तक बतलाए गए हैं । चान्द्रव्य पशुसर्ग ही सांख्याभिमत चतुद्दशविधभूत- चेतनसर्ग है, एवं पार्थिव लोष्ट -पाषाणादि जड़सर्ग ही अचेतनसर्ग है । इन दोनों सर्गों में क्रमशः तमोगर्भित रज, रजोगर्भित तम का प्राधन्य है । तमो भाव ही ' सर्वं वृत्वा शिव्ये ' लक्षण आवरणधर्मा ' वृत्र ' प्रमुख आसुरभाव है । एवं इस दृष्टिकोण से इस चान्द्र - पार्थिव उभयविध भूतसर्ग को हम ' आसुरसर्ग ' ही मान सकते हैं । इसी आधार पर उभयसर्ग - मूलभूत चन्द्रमा को ' वृत्र ' कहा गया है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों प्रमाणित है -( १ ) - वृत्रोह इदं सर्वं कृत्वा शिश्ये यदिदमन्तेरण द्यावापृथिवी । स इदं सर्वं वृत्वा शिष्ये, तस्माद् वृत्रो नाम । ( शत ० १ । १ । ३ । ४ । ) । ( २ ) - पाप्मा वै वृत्र: ( शत ० ११ १२५७ ) - स यद्वर्त्तमानः ( प्रत्यक्षभूतानुगतः ) समभवत्, तस्माद् - वृत्रो नाम ( शतः ११६ । ३ ॥ ) । ( ३ ) - वृत्रो वै सोम आसीत् ( शत ० ३ | ४ | ३ | १३ | ) | इन्द्रस्तं वृत्रं द्वधा - अन्वाभि-नत् । तस्य यत् सौम्यं न्यक्तमास, तं चन्द्रमसं चकार । अथ यदस्य - श्रसुर्य्यमास, तेनेमाः प्रजा उदरेण ( अशनायया बुभुक्षया ) आविध्यत् ( शत ० १ | ६ | ३ | १७ | ) -" अथैष एव वृत्र:, यच्चन्द्रमा: ( शत ० १ | १ | ६ | ४ | १३ | ) । निस्कर्ष यह निकला कि, सौर- चान्द्र - पार्थिव - ये तीन मर्त्य विवर्त्त हीं क्रमशः देव, चतुद्दशविध-भूतात्मक चेतन पशु, एवं असंख्यविभेदात्मक अचेतन भूत, इन तीन सर्गों के अधिष्ठाता बने हुए हैं, जिस में सौर ‘ देवसर्ग ' का एक स्वतन्त्र विभाग है, एवं चान्द्र चेतनसर्ग ( पशुसर्ग ), तथा पार्थिव अचेतनसर्ग " एतद्व ै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत - अकरोत् । तद्यत् अकरोत्, तस्मात् कूर्म्मः । कश्यपो वै कूर्म्मः । स यः स कूम्र्म्मः - असौ स आदित्यः " ( शत ०७ | ५ | १ | ५ | ) । ३५६

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श्राद्धविज्ञान ( भूतसर्ग ), दोनों का एक स्वतन्त्र विभाग है । यही लक्ष्यात्मक वृत्रप्रमुख आसुरसर्ग है, जो देववर्गानु-बन्धनी विज्ञानबुद्धि ( विद्याबुद्धिचतुष्टयी ) के नियन्त्रण में रहता हुआ । जहाँ देवसर्गात्मक देवभावापन्न गृहस्थाश्रमी द्विजाति मानव की लोकानुगता चान्द्र पार्थिव - पारिवारात्मिका स्वस्ति का संरक्षक बना रहता है, वहाँ अविद्याबुद्धि से संयुक्त होकर यही श्रासुरसर्ग द्विजाति के लिए -द्विजाति के भावुकता प्रधान सौम्यबाल - नारीवृन्द के लिए - सोम त्मक ( चन्द्रात्मक ) भावप्राधान्य से सजातीय सौम्याकर्षण के द्वारा अनिष्टकर बना रहता है, जिसके लिए नारीवृन्द लोकमान्यत त्रों का अनुगामी बना रहता है । तदित्थं पञ्चविध प्राकृतिक सर्गों में आरम्भ के असर्गात्मक भावात्मक दो सर्गों ( ऋषि - पितृसर्गों ) को संसृष्टिलक्षणा सर्गमर्यादा से पृथक् करते हुए भगवान् ने शेष रहे हुए देव - पशु - भूत, इन तीन सर्गों में से श्रन्त के ' पशु - भूत ' दोनों सर्गों को एक मानते हुए देव, आसुर भेद से दो प्रकार के ही ' विश्वानुबन्धी भूतसर्ग स्वीकार किए हैं, जिनका पुराणपुरुष व्यास ] की " ह्रौ भूतसग लोके-s स्मिन् - दैव, आसुर एव च " इस वाणी से स्पष्टीकरण हुआ है । भाव सृष्टिः सृष्टिः सर्गेद्वयी २ [] ६ १ - परमेष्ठिगर्भितः - स्वायम्भुवसर्गः. २- सूर्य्यगभितः- -पारमेष्ठ्य सर्गः [ स्वयम्भु परमेष्ठिरूप: ] -ऋषिसर्गः [ ऋषिमानवः - संन्यासी [ परमेष्ठि - सूर्यरूप ] -पितृसर्ग: [ यतिमानवः - वानप्रस्थी -सर्गातीतौ * ३ - चन्द्रगर्भितः --- सौरसर्गः [ सूर्य्यचन्द्ररूपः ] — देवसर्गः [ देवमानवः - गृहस्थी दैवसर्गः ४ - पृथिविगर्भितः - चान्द्रसर्गः [ चन्द्रपृथिविरूपः ] - पशुसर्गः ५ -- चन्द्रगर्भितः —- पार्थिवसर्गः [ पृथिविभू रूपः ] -भूतसर्गः लोकमानव. - ( सुरसर्गः लौकिकः सृष्टि : मैथुनी सृष्टिः सर्गत्रयी-[ ३] - [ १६ ] -६—— ( ५ ) - श्रासुरमानवस्वरूपोपवर्णनम् ( दैवमानबोद्बोधन धिया ) ( 2 ) - प्रकृतिसम्मत अमुक कर्म करने से मानव का --8-- अभ्युदय निःश्रेयस् साधन होता है, एवं प्रकृति - विरुद्ध कर्म करने से मानव का सहजं आत्मस्वरूप आवृत हो जाता है, इस प्रकृति सिद्ध प्रकृतिरूप विधि, एवं निषेध का मर्म श्रसुर मानव नहीं जान सकते । ( उनका एकमात्र पुरुषार्थ है ३६०