Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 431–440
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 431–440
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रकृतिसम्मत विधिकम्मों की उपेक्षा, एवं निषिद्ध कम्मों का अनुगमन, अतएव ) ऐसे श्रासुर मानव बाह्याभ्यन्तर- दोनों प्रकार की पवित्रता से वचित रहते हैं । अतएव इनका कोई आचारधर्म ( सात्त्विक आचरणधर्म्म ) नहीं है । अतएव ये प्राकृतिक नर उस सत्यनिष्ठा से सर्वात्मना वश्चित ही रहते हैं, जिस सत्य का प्रतीक ' धर्म ' ( प्राकृतिक आचरण, प्राकृतिकी मर्यादा ) माना गया है । ( १६७१ ) । ( २ ) - ( अपनी मानसिक अमर्यादित कामपरायणता, शारीरिक भोगपरायणता को ही ' मानव जीवन ' का अनन्य पुरुषार्थ घोषित करने वाले इन विमूढ़ आसुर मानवों का कहना है कि ) " ईश्वर-परमात्मा - जगदाधार विश्वेश्वर नामक कोई वैसा सत्य तत्त्व नहीं है, ( जो मानव के अच्छे बुरे कर्मों का साक्षी बनता हुआ मानव पर निग्रहानुग्रह करता रहता है ) । सम्पूर्ण जगत् क्षणिक है, अनित्य है, मिथ्या है, ईश्वरनामक नियन्ता का यहाँ अभाव है । सम्पूर्ण जगत् केवल अपने समविषम ( परस्पर ) संयोग का परिणाममात्र है । प्राणियों की सहज मानसकामना ( सेक्स् ) ही सृष्टि ( प्रजासर्ग ) का मूल । कामभाव के अतिरिक्त ओर ( ईश्वरादि ) कारण हो हो क्या सकता है । " ( १६८ । ) । ( ३ ) - इस प्रकार की अनीश्वरवादमूला प्रत्यक्षभूतमूला असत्य प्रतिष्ठात्मिका नास्तिकदृष्टि को ही अपनी तत्त्वमीमांसा का मुख्य आधार मानते हुए ये कामभोगपरायण पशुसमानधर्म्मा इन्द्रियाराम सुरमानव अपने सहज परिपूर्ण आत्मस्वरूप को सर्वात्मना विस्मृत कर चुके हैं । विद्याबुद्धि का विशाल दृष्टिकोण इनका विलुप्त हो चुका है । नितान्त सीमिता केवल प्रत्यक्ष प्रभावानुगता इन विमूढ़ों की तमबहुला स्वल्पबुद्धि ( स्थूलबुद्धि - लोकबुद्धि ) अपनी कामभोगलिप्सा के उपशमन के लिए वैसे वैसे उग्र - भयानक- सर्वशान्तिविघातक - सर्वसंहारक भूतविज्ञानात्मक कम्र्मों की अनुगामिनी बनी रहती है, जिनसे परिणाम में जगत् ( जङ्गमशील मानवसमाज ) की सहजशान्ति का सर्वनाश ही निश्चित बन जाता है । संसार को अपने उग्रकम्मों से विनाशोन्मुख बनाते रहना ही इन आसुर मानवों की उत्पत्ति का एकमात्र ' परिणाम है | ( १६।६ । ) । ( ४ ) - " स शान्तिमाप्नोति न कामकामी " के अनुसार कभी भी उपशान्त- परिपूर्ण न होने वाली वह कामवासना भोगलिप्सा ही जिसकी परम्परा घृताग्निसंयोगवत शान्त होने के स्थान में उत्तरो-तर प्रवृद्धही होती रहती है- जिन मानवों की एकमात्र आश्रयभूमि बनी रहती है, जो प्रासुर मानव * - " यो वै स धर्म्मः, सत्यं वै तत् । तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुः - ' धर्मं वदति ' इति । धर्मं वा वदन्तं - ' सत्यं वदति ' इति " । - शत ० ब्रा ० १४/४/२/२३३
- न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवत्व भूय एवाभिवर्द्धते ॥
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श्राद्धविज्ञान आसुर तत्त्वों के अन्वेषण में अपनी जन्मजात अभिजात दुर्बुद्धि - अविद्याबुद्धि के कारण सर्वनाशक, इस प्रकार की विमुग्धा वारणी के कुशला बुद्धि के अतिमान ( हम से बढ़कर अन्य कोई बुद्धिमान् मन के अतिमान नहीं ( हम से अधिक महत्त्वशाली अनुगमन ) लक्षण ' दम्भ ' की, कामवासना से परिपूर्ण ' ' मान ' की, एवं लोगलिप्सापरा-ओर कौन हो सकता है, इस प्रकार की मत्तं वाणी के अनुगमन ) लक्षण - केशश्मश्रूशून्य आकर्षक ग्रण शरीर के अतिमान ( हमारे जैसे सुडौल- गौर- स्वच्छ - केशपाश विन्यासकुशल अनुगमन ) लक्षण ' मद ' की शरीर की समता कौन कर सकता है, इस प्रकार की उन्मत्ता वाणी के से - मानस - शारीरिक गर्व अतिमान चर्वणा में अहोरात्र आसक्त हैं, एवंविधं दम्भ- मान - मदान्वित ( बौद्ध कम्मों से विश्वनाशपूर्वक स्वस्वा-नित्य युक्त ), सर्वात्मना ( बौद्ध विचारों से, मानस संकल्पों से, शारीरिक ( प्रत्यक्ष भौतिक-र्थसाधनरूप ) अपवित्रभावों से सदा अपवित्र बने रहते हुए अज्ञानावृतज्ञानलक्षण ( दुराग्रही सर्वज्ञ ) बने रहते हुए ज्ञानरूप अल्पज्ञानलक्षण ) मोहपाश से भूतावेशवत् श्रभिनिविष्ट हुए इनके संग्रह - आविर्भाव - प्रचार में ही सर्वविनाशक असद्भावों - असत् कम्मों को ही सत् - उपादेय मानते शान्ति का क्षय पूर्वकथनानुसार सतत प्रवृत्त रहते हैं, जिन इनके सद्ग्राहों से सांसारिक प्राकृतिक [ १६ ॥ ] सर्वात्मना निश्चित बन जाता है । [ १६।१० । ] । है, एवं न अन्य-[ ५ ] - ऐसे आसुर मानवों की मानसी चिन्ता का न इस जीवन में अवसान - उत्पन्न होते रहो, जन्मों में । प्रतिसर्गात्मक प्रलयकाल पर्यन्त ' जायस्व - म्रियस्व ' [ कीटपतङ्गादिवत् करते हुए क्षणमात्र के लिए मरते रहो ] रूप जन्ममरण चक्रानुगत नानाविध हीन योनियों में चंक्रमण कैसे हो सकता है इन अ सुर मानत्रों भी चिन्ता से उपराम नहीं पा सकते । चिन्ता से त्राण सम्भव भी का एकमात्र लक्ष्य मनोऽनुगत का, जबकि इन्होंनें परिपूर्ण आत्मनिष्ठ मानव जैसे व्यक्ति के जीवन ही मान रक्खा हो, एव ं इसी को-कामभाव [ इन्द्रियारामपरायणता ], एवं शरीरानुगत भोगलिप्सा ( भोगलिप्सा ), और मौज “ मानवजीवन का एकमात्र निश्चित लक्ष्य अनन्य पुरुषार्थ है ' खाना पीना मान बैठे हों । [ १६।११ । ] । उड़ाना ( कामभाव ) " इस रूप से जो अपना निश्चित सिद्धान्त से दृढ़-[ ६ ] - अप्राप्त भौतिक परिग्रहों की प्राप्तिरूपा लिप्सामयी इच्छारूपा श्राशा की परम्परा मनसा , ( कामलिप्सा प्रतिबन्धकता में ) पाशबन्धनवत् निरन्तर आवद्ध कामलिप्सा में आसक्तव्यासक्त इस काम भोगलिप्सात्मिका एवं शरीरेण क्षणे क्षणे उत्त ेजित क्रोधाविष्ट ] बने रहते हुए मायाछलकपट अपनी - धूर्त्ततादि आसुर कम्मों स्वार्थवृत्ति में इस प्रकार अन्ध हो जाते हैं कि, सर्वथा अन्यायपूर्ण हो, जिससे इनकी काम-से वित्तसंग्रह में हीं अहोरात्र तल्लीन बने रहते हैं । जैसे भी हो, द्रव्यसञ्चय भोगलिप्सा चरितार्थ बने, यही है इनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य । [ १६।९ २ः ] । [ ७ ] - [ स्पष्ट है कि, तमोगुणप्रधान आसुर भौतिक प्रपञ्च में ] विद्याबुद्धियुक्त तमोगुणप्रधान हो जाता मन, तथा भोगपरायण शरीर को ही मुख्य मानने वालों का दैवात्मभाव सर्वात्मना अभिभूत ३६२
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ऋणमोचनोपायोपनिषत है । परिणामस्वरूप - ' बलं सत्यात् ( पुरुषात्मनः ) यजीय: ' - ' बलं वाव विज्ञानात् ' ( विज्ञानात्मनः विद्याबुद्ध: ) भूयः ' इत्यादि निगमसिद्धान्तानुसार आसुर मानवों को कुछ समय के लिए अपने पूर्वो-पवर्णित कुकृत्यों के परिणामस्वरूप सफलता प्राप्त होती है अवश्य होती है । इसी सफलता के बल पर ये अपने इन कुकर्मों की घोषणा करते हुए उन देवभावापन्न मानवों का उपहास किया करते हैं, उनकी उभयलोक - संसाधिका धर्म्मनिष्ठा की कुत्सित आलोचना किया करते हैं, जो युगधर्मानुसार कुछ समय के लिए उत्पीड़ित बन जाया करते हैं । [ अपनी इस तात्कालिक सफलता के मद से मदान्ध बने हुए इन त्रितैषणा - परायण आसुर मानवों की प्रतिमानात्मिका उत्तेजनापूर्णा ऐसी घोषणा कर्णाकर्णिपरम्परया सुनी जाती है कि ) - " देखो! हमने अपनी योग्यता से पुरुषार्थ से कौशल से आज अमुक वैभव प्राप्त कर लिया है, कुछ ही समय में हमारा अमुक मनोरथ पूर्ण होने ही वाला है, इतना प्रभूत भूतपरिग्रह तो हमने सञ्चित कर लिया है, निकट भविष्य में ही हम कोट्याधीश, इससे अर्बुद खबुद - न्यर्बुदादि अधीश बन जाने वाले हैं । ( २६ । १३ । ) । ( - ) - हमनें अपने अमुक प्रतिद्वन्द्वी को ( अपने वित्तबल से ) निःशेष कर दिया है । जो हमारे बचे खुचे अन्य शत्रु रह गए हैं, निश्चयेन उन्हें भी हम निकट भविष्य में हो निःशेष कर देंगे अ । हम आज सर्वसमर्थ ( ईश्वर ) हैं, ( हम न केवल सञ्चय ही करना जानते, अपितु । सञ्चित - सुवि-शोभन बहुमूल्य वस्त्राभूषण सुस्वादु भोजनाशनपान - विशिष्टतमा वाहनानुगति सांसारिक , भव्यभवननिवास सब व्यवसायों स्तृतोद्यानविहार, आदि रूप से भोग भी कर रहे हैं । हम आज सर्वात्मना , विविधास्त्र-के परपारदर्शी विद्वान् ( सिद्ध ) हैं, हम अपने इस वित्तवल के द्वारा असंख्य अङ्गरक्षकों से कृत-शस्त्रों से सुसज्जित रहते हुए बलवान् हैं, निष्कर्षतः हम सुखी हैं, सब दृष्टिकोणों कृत्य हैं । ( १६ ) १४। ) । ( ६ ) -ऐसा न समझ बैठना कि, हमनें भोगैश्वर्य्यसुखसाधनों में हीं अपना कोश रिक्त ( कर बहुधन- दिया है । अपितु हमारे कोश में अभी प्रभूत सम्पत्ति विद्यमान है, और यही हमारी वंशश्रेष्ठता आढ्यता सर्वत्र प्रसिद्ध सम्पन्नता ) है । जानते नहीं तुम, मैं असाधारण कुलीन हूँ, जिसकी कुलीनता में अमुक प्रान्तीय अभि-है | मेरे बाबा पड़बाबा - बाप सब प्रसिद्ध थे, अवश्य ही इस प्रकार वंशपरम्परया सब दृष्टियों से मैं लोक में धाओं से अभिजात हूँ, ( कुलप्रतिष्ठा कुज्ञयोग्यता- समृद्धपरिवार, सर्वात्मना " मैं नामयज्ञों के द्वारा विख्यात हूँ ) 1 । मेरे इस सर्वसमृद्ध वैभव की, मेरी कौन समता कर सकता है ।
* श्रधर्मेणैधते पूर्व, ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाञ्जयति, समूलस्तुविनश्यति ॥
-मनुः ३६३
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श्रविज्ञान यश प्राप्त करूँगा, नट - विट- गणक - गणिका कोई याचक मेरे दान से वञ्चित न रहेंगे, और इस प्रकार इन सर्वविध लोकैश्वय्यों से मैं परम आमोद - प्रमोद मोद का उपभोग करता रहूँगा " अज्ञान-विमूढ़ मानव इस प्रकार की दर्पानुभूतियों - अतिमानात्मिका दर्पोक्तियों के द्वारा अपनी आत्म-" विमूढ़ता लक्षण - पशुसमतुलिता - आसुरवृत्ति का उद्घोष करते हुए " इतस्ततो दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढ़ा भुवि कीटपतङ्गादिवत् - अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः " । ( १६।१५ । ) । [ १० ] - विविध भ्रान्तियों से सतत उन्मत्तवत् विभ्रान्त - दिङ विमूढ़ - लक्ष्यच्युत बने रहते हुए, मोह-परम्परापाश से आलोमभ्यः श्रनखाग्रेभ्यः आबद्ध बने रहते हुए, कामवासनानुगता भोगलिप्सा में अहोरात्र आसक्त [ मनसा ], व्यासक्त [ शरीरेण ] ऐसे श्रासुर मानव [ यहाँ तो इस जीवन में तो प्रलयान्तचिन्ता से संयुक्त रहन ही हैं, अनन्तर भी ये मानव ] कुम्भीपाक रौरव आदि भीषण - पूतिगन्ध-युक्त मलीमस नरकपरम्पराओं में अपने प्रेतशरीर से निःसीम परिताप का आस्वादन किया रहते हैं । [ १६ १६ । ] । [ ११ ] [ शिष्ट - सम्मान्य - योग्य - आत्मबोधपथानुगत देवमानव यद्यपि जानते हैं इनके तथाविध स्वरूप को । किन्तु लोकसंग्रहधिया, एवं युगधर्मांपेक्षा वे तटस्थ बने रहते हैं इनकी आलोचना से । यदा कदा परोक्षप्रिय देवमानव परोक्षरूपेण इनके स्वरूप को उद्बोधनार्थ विश्लेषण भी करते रहते हैं, किन्तु इनका उद्बोधन तो होता नहीं, प्रतिक्रियात्मक अभिनिवेश अवश्य इनमें जागरूक बन जाता है । और इस दिशा में आकर ये ] असुर मानत्र अपने मनोराज्य में हीं अपने आपको इतर सम्पूर्ण मानवों से श्रेष्ठ सम्पन्न - कुलीन- ऐश्वर्य्यशाली मानने की अनुभूति में तल्लीन रहते हुए अपनो रूक्षा-दम्भ दर्पपूर्णा वैखरी ध्वनिवाकूं [ पशुवाकू ] से इस ' शून्य - जघन्य प्रतिमानलक्षणा अनुभूति की चाटु-कार- रजनिचरपरायण खलजन - मण्डल में घोषणा करते हुए यत्किञ्चित् भी तो लज्जा से अवनत शिरस्क नहीं बन जाते ये ऐकान्तिक ' आत्मसम्भावित ' धृष्ट निर्लज्ज -पासुर मानव । अपने चाटुकार मण्डल में जहाँ इनकी वैखरी वाणी अट्टाट्टहासरूप उद्वेग कर निनाद से माता-धरित्री की सहजशन्ति को विकम्पित करती रहती है, वहाँ शिष्ट, सांस्कृतिक - भद्र - आदर्शपरायण-विद्वान् - नैष्ठिक - देवमानवमण्डल में ये ही वाक्शूर अतिमानी आत्मसम्भावित श्रासुर मानव अपनी सम्पूर्ण योग्यता को सर्वात्मना विस्मृत कर अपने मुख को स्थिर नेत्रों से ' ख ' प्रदेश ( शून्याकाश ) में योगसमाधिवत् स्थिरता पूर्वक मर्यादित बनाते हुए ' मुहः खेऽन्यतरस्याम् ' इस पाणिनिसिद्धान्त को अन्वर्थ बना देते हैं | मुख को ' ख ' के अनुगत करने वाले शून्याकाशानुगामी ऐसे शून्य निरक्षर-मूर्द्धन्य आसुर मानवों के लिए ही तो ' मूर्ख ' शब्द का आविर्भाव हुआ है सर्वभावसंग्राहक ' कोश ' कोड में । युगधर्मानुग्रह से घुणाक्षरन्यायेन तथाविध शिष्टमण्डल में यदाकदा प्रवेश पा जाने वाले. ३६४
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् लोकैषणाकामुक ये आमसम्भावित मानव वहाँ के सात्त्विक प्रभावपूर्ण वातारण से अभिभूत होकर प्रथम तो सब कुछ विस्मृत करते हुए सर्वात्मना स्तब्ध बन जाने में हीं अपना कल्याण समझते हैं | यदि किसी समानशील व्यसन - धुरीण की प्रच्छन्न प्रेरणा से पंक्तिकण्ठस्थानुगति के आधार पर कभी ये कुछ तत्र शिष्टमण्डल में कुछ अनर्गल - असम्बद्ध बोलते हुए इस बुबुलिषा के माध्यम से इस मण्डल में भी अपने आपको मूर्द्धाभिषिक्त बनाने का दुस्साहस कर बैठते हैं, तो तत्क्षण ही हठात् सम्पूर्ण शिष्ट समाज को भी स्तब्ध करते हुए अपनी अनर्गलता से ये मूर्ख सहसा स्वयमपि सर्वात्मना ' स्तब्ध ' ही वन जाते हैं । हो जाना चाहिए था इस दिशा में पहुँचते ही इनका हार्द गत्यावरोध ( हार्टफेल ), किन्तु इनके आभ्यन्तर में धन - मान - मद - गर्व प्रतिष्ठित जो हो रहा है । वही आसुर मद [ धन - मान - मद- गर्व, शरीर-सम्बद्ध शरीरभोगसाधनभूत धनगर्व, मनः सम्बद्ध मानसकाम - साधनभूत मानगर्व, वुद्धिसम्बद्ध बौद्ध अतिमानसाधनभूत मदगर्व ) इन आसुर मानवों की निर्लज्जता का संरक्षक बना रहता है, जिसके अनु-ग्रह से ये शिष्ट सांस्कृतिक मण्डल में स्तब्ध बने रहते हुए भी अपनी प्रतिमानभाषा का उद्घोष प्रक्रान्त : ही रखते हैं । अपनी इस प्रक्रान्ति को शिष्टसमाज के द्वारा घुणाक्षरन्यायेन सुरक्षित रखने के लिए ये ' धनमानमदान्वित'-श्रासुरमानव लोकैषणात्मक अवैध काल्पनिक नाम यज्ञों का दम्भ करते रहते हैं, जिन नामयज्ञों का स्वरूप वर्त्तमान में आबालवृद्धवनिता - सबके लिए प्रत्यक्षतम बना हुआ है । कहीं श्रौतस्मार्त्तपद्धति-नियम- मर्यादा आदि का अनुगमन नहीं, कहीं नैगमिक आम्नाय का आधार नहीं, केवल मानस मान्यतानुगता लोकैषणा के आधार पर कहीं विश्वशान्ति की घोषणा से, तो कहीं ' अधर्म्मक्षय, धर्मस्थापन ' के व्याज से आज नैमिक पावन भारत के क्रोड़ में शरभदलवत् ( टिड्डोदल की भाँति ) यत्रतत्र सर्वत्र इन नामयज्ञों का ताण्डव प्रक्रान्त हो रहा है, जिन नामयज्ञ - ताण्डवों में ' दम्भ ' लक्षणा अविधि ही एकमात्र पद्धति है— “ यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् " । ( १६।१७ ) । ( १२ ) - हम से अन्य श्रेष्ठ कुलशीलशाली और कौन है, सर्वशास्त्रपारङ्गत - धर्म्मरहस्यवेत्ता - धम्मिष्ठ-सर्वोत्तम ( देखिये शङ्करानन्दी व्याख्या ) और कौन है, इस प्रकार के ' अहङ्कार ' में लिप्त शारीरनिबन्धन वित्तवल, प्राणनिबन्धन दर्पबल, मनोनिबन्धन काम - क्रोधबल, एवं बुद्धिनिबन्धन मोह - लोभ - पारुष्यादि-बल, इत्यादि मलीमस भावों में ही अहोरात्र ओतप्रोत सर्वव्यापक अन्तर्यामी सत्ता के ऐकान्तिक विरोधी आसुर मानव सदा सर्वदा अपने को सर्वगुणसम्पन्न, एवं दूसरों को सर्वदोषसम्पन्न प्रमाणित करते हुए - परगुणों की निःसार आलोचना करते हुए अपने ऐहिक - आमुष्मिक, दोनों भावों को पुरुषार्थ-साधन से वञ्चित बना रहे हैं । ( १६/१८ ) ३६५
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( १ ) -मतम् ( २ ) - न मां दुष्कृतिनः ( ३ ) -( ४ ) - प्रकृतिं मोहिनीम् -( ५ ) - नाहं प्रकाश: -I ऋणमोचनोपायोपनिषत् -श्रव्ययात्मस्वरूपानुगतं भगवन्मतम् । असत्कर्म्मरताः - श्रात्मस्वरूपं न विजानन्ति । वैकारिकभावात्मकाज्ञानावृतां प्रकृतिं मोहात्मिकां श्रिताः । सञ्चालको नान्य: -.. ५.... ३६७ वजानन्ति मां मूढाः - मां - अव्ययात्मानं - अव्ययेश्वरसत्तामुपहसन्ति यथाजाता: -नास्तिकाः । कथमीश्वराव्ययः - भौतिके शरीरे समाविष्टः १, सम्भवमेतत् - इति जल्पन्तः केवलप्रकृतिपरायणा आत्मस्वरूपानभिज्ञा: - यासुरमानवाः - भूतानुगताशनायालक्षणविष्णु मायया युक्तोऽयमव्ययात्मा न विमूढ़-मनसि समायाति- ' योगमाया हरेश्चैतत् तया सम्मोद्यते जगत् ' । ( ६ ) - अव्यक्त व्यक्तिम् - मूर्खाः - यथाजाताः - लौकिकाः ' प्रकृतिरेवेदं सर्वम् । प्रकृतेः -प: - ईश्वरः ' इति उद्घोषयन्तः प्रकृतिमेव सर्ग -स्वमभिमन्यन्ते नराधमाः -- आसुरमानवाः । पूर्णेश्वर अतिमानव ( आधिकारिक मानव - अवतारपुरुष ) श्रीकृष्ण ने दैव आसुर सर्गभेद की मीमांसा के माध्यम से मानव स्वरूप की जो मीमांसा मानव के अभ्युदय - निःश्रेयस् के लिए स्पष्ट की, उस पश्चधा विभक्त दैवासुरसर्गस्वरूप - मीमांसा से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, मानव यदि अपना नैसर्गिक देवभावानुगत आत्मस्वरूप परिज्ञान प्राप्त कर ले, तो वह चतुर्द्धा विभक्त उस मानव-श्रेणि - विभाग का क्रमशः अनुगमन करता हुआ लोकसंग्रहपूर्वक सहजभाव से ऐहिक - श्रमुष्मिक अभ्यु-दय निःश्र यस् का फलभोक्ता बनता हुआ अपनी सहज परिपूर्णता को सुरक्षित रख सकता है, जिस श्रेणिचतुष्टयी का पूर्व में स्पष्टीकरण किया जा चुका है ( देखिए ३४१ पृष्ठ ) । प्राकृतिक श्रेणिसंस्थानुगामी भारतीय द्विजाति मानव किस पद्धति आम्नाय एवं लोकमान्यतात्मक लोकाचार के अनुगमन से अपनी परिपूर्णता, अपने आत्मबोध को अक्षुण्ण बनाए रख सकता है?, प्रश्न का समाधान ही निगमागमशास्त्र की रहस्यपूर्णा पारम्परिक - आम्नायानुप्राणिता सहजव्याख्या है, जो दुर्भाग्यवश सिद्धिकामुक योप्रवर्तकों के प्रतारणात्मक समाधि - धारणा - ध्यानादि भावों से, तन्त्रभा-यानुगता दीक्षाप्रकारों से, पुराणमर्मज्ञता से वञ्चित कथावाचकों की मानसकाम- शारीरिक भोगभावानुगता * " यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् " ( वेदान्तसूत्र )
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् भवी प्रौढ गृहमेधी - ' वनं पञ्चाशतो व्रजेत् ' इस आदेश को शिरोधार्य कर आमुष्मिक आत्मचिन्तन-पथ में आरूढ़ हो जाता है, जो इस का ' वानप्रस्थाश्रम ' नामक तृतीय आश्रम कहलाया है । इस आश्रम में यह आश्रमी वन्य - धर्मानुगता कामनात्यागमूला निवृत्ति के अभ्यासपथ का अनुगामी बनता - हुआ शनैः शनै. शारीरिक भोग, मानसिक काम, दोनों के आसक्ति - पाशबन्धन से नैष्ठिकी योगात्मिका ( ३६८ पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) अनुसार नष्ट हो जाती है । एवमेव जहाँ प्रकृत्या भावुक बालबुद्धि ( २७ वर्षपर्यन्त का कुमार ) नायक बन जाता है, वह संस्था भी उच्चिन्न हो जाती है । वर्त्तमान भारतीय परिवारों- कुटुम्बों - संस्थाओं, एवं सत्तातन्त्रों में आज जो कलह - अशान्ति - श्रीसमृद्धिविहीनता दृष्टश्रुत है, उसका मुख्य कारणं उक्त सूक्ति. ही मानी जायगी । कहीं एक भी नैष्ठिक सञ्चालक नहीं है, तो कहीं अनेक सञ्चालक बने हुए हैं । जिन में प्रत्येक में लोक - वित्त - पुत्रैषरणा, विशेषतः लोकैषरणा जागरूक है । संस्था - सत्तातन्त्रादि की आलं चना तो अपराध माना जायगा । गृहस्थ को ही उदाहरण बना लीजिए । गृहस्थ में आमरणान्त मुमूषु ' वृद्ध भी अपना नायकत्त्व परित्याग करना नहीं चाहता । उसने तो श्रौत अग्निहोत्रवत् अपने अनुशासन के सम्बन्ध में जरया ' वा जीर्य्यते, मृत्युना वा शीर्य्यते ' ' इस सिद्धान्त को ही सर्वात्मना चरितार्थ कर रक्खा है । आज तो ' जरया ' भी अपवाद ही है । मरणासन्न भी अपने अनुशासन - व्या-मोह का परित्याग करने के लिए कदापि स्वीकृति नहीं देसकता । उधर परिवार में प्राप्तवयस्क युवापुत्र प्रकृत्या अपना अनुशासन चाहते हैं । इस प्रकार इन अनेक नायकों के बौद्ध मानसिक - शारिरिक संघर्ष के परिणाम स्वरूप प्रथम तो सब में महान् विस्फोटन हो जाता है । यदि वृद्ध की निकृष्ट - जघन्य-प्रतारणा - भर्त्सना से प्रतारित भत्सित पारिवारिक अन्य व्यक्ति इस विस्फोट को सह्य बना लेते हैं, तो निश्चयेन इनका सहज बौद्धिक समतुलन - सहज मानसिक शान्ति - सहज शारीरिक स्वास्थ्य, सब कुछ नष्ट प्राय बन जाता है, अथवा तो वे वृद्ध महाभाग अपने पुत्रों के द्वारा ही उपेक्षित प्रतारित भसित . बना दिए जाते हैं । परिणाम में गृहस्थ इस बहुनायक पद्धति से सर्वात्मना क्षत - विक्षत - अशान्त-दुःखी बना रहता है । उधर पारम्परिक आम्नाय में ५० वर्ष की प्रौढ़ता के आगमन के साथ ही गृहस्थाध्यक्ष अपना अधिनायकत्त्व युवापुत्र को समर्पित कर इस गृहस्थोत्तरदायित्त्व से उन्मुक्त बनता हुआ मुष्मिक पुरुषार्थ साधन में प्रवृत्त हो जाता है । भले ही वर्त्तमान में सत्तातन्त्र के दोष से इसे शान्त अरण्य उपलब्ध न हो, अतएव वनगमन भले ही इसका सम्भव न बन सके । किन्तु यह गृहस्थ में रहता हुआ भी ' पुष्कर पलाशवन्निलेप ' ही बना रहता है । किसी पारिवारिक वित्त - पुत्र - लोकैषणा - लालसा में इस की मानसिक वृत्ति का समावेश नहीं हो पाता । और इस प्रकार हम री भारतीय आम्नाय के सहज जीवन तन्त्र में कभी कलह - संघ - अशान्ति, किंवा दुःखलेश का समावेश नहीं हो पाता । ३६६
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श्राद्धविज्ञान ( कौशलात्मिका ) बुद्धि के बल से विमुक्त होने का प्रयास करता हुआ क्रम क्रमशः आत्मबोधानुशीलन परायण बन जाता है | आचारमीमांसात्मक आचरणात्मक बाह्य स्वरूप का ( अपने स्थूल भौतिक रूप का ) परित्याग करता हुआ क्रमशः तत्त्वानुशीलनात्मक श्राभ्यन्तर सूक्ष्म - आचरण का अनुगामी बनने लगता है । यही इस वन्याश्रमी की तत्त्वशसनात्मिका चारमीमांसा ( सूक्ष्मधर्माचरण ) है । तृतीया पञ्चविंशति ( ७५ वर्ष ) के उपरत होते होते यह तत्त्वानुशीलन - तत्त्वोपासनारूप - आचार में सफलता प्राप्त करता हुआ सर्वात्मना विरजलोकनिष्ठापथ का सफल यात्री प्रमाणित हो जाता है । यहाँ कर इस के शारीरिक - मानसिक - बौद्धिक, तीनों तन्त्र ( भूमोदर्कपद्धति के अनुपात: ) त्मसत्ता से अभिभूत हो जाते हैं । सम्पूर्ण परिग्रह - आसक्तिबन्धनरूपा कामासक्ति का परित्याग प्रकृत्या सहजभाव से हो जाता है, और यही चतुर्थी पञ्चविंशति से सम्बद्ध इस पुरुषधौरेय का चतुर्थ ' संन्यासाश्रम ' कहलाया है, जिसके द्वारा ' ज्ञाननिष्ठा ' लक्षणा आत्मबोध की भावना से यह सर्वात्मना • कृतकृत्य बनता हुआ सम्पूर्ण विश्व के हितसाधन में विश्वेश्वरवत् अपने आपको समर्पित कर देता है । इन तीन आश्रमों के अनुबन्ध से ही मानव के तीन स्थान बन जाते हैं, जिनका ' स्वायम्भुवस्थान, पारमेष्ठ्यस्थान, सौरस्थान, ' रूप से पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । इन तीनों अलौकिक स्थांनों के अतिरिक्त एक चौथा ' चान्द्रगर्भित पार्थिव स्थान ' रूप एक स्थान और है, जिसे हम ' लौकिक स्थान ' कहेंगे | इसी स्थानापेक्षया अलौकिक भी द्विजातिमानव ' लौकिकमानव ' बना रहता हुआ, यथा-जात भावुकलोक - समाज की दृष्टि में अपने आपको सर्वथा लौकिक ही प्रमाणित करता हुआ लोक-मानवों में बुद्धिभेद उत्पन्न न कर परोक्षरूप से अपनी अलौकिकता के माध्यम से लोकमानवसमाज का उद्बोधन कराता हुआ लोक - परलोक संग्राहक यह त्रिस्थान मानवश्रेष्ठ अपने मानवजीवन को वास्तव में धन्य बनाता रहता है । इस प्रकार ३ अलौकिक स्थान, १ लौकिक स्थान, रूप से द्विजातिमानव के चार स्थान हो जाते हैं, जिनका पूर्व में स्पष्टीकरण किया जा चुका है ( देखिये पृष्ठसंख्या ३२२ से ३४२ पृष्ठ पर्य्यन्त ) । यद्यपि पूर्व में चारों स्थानों का दिग्दर्शन कराया जा चुका है । तथापि क्योंकि अब हम तटस्थ आलोचना - समाधान के सन्निकट पहुँच रहे हैं । अतः सन्दर्भसङ्गति के लिए एक नवीन दृष्टिकोण से उस मानचतुष्टयी का सिंहावलोकन और कर लिया जाता है । श्रौतस्मार्त्त सहज संस्कारों से सुसंस्कृत द्विजाति मानव इस प्रकार पूर्वोक्त अपने चार आश्रमों के द्वारा सहजरूप से कर्म्म- ज्ञानोभयलक्षण, अव्ययाक्षरात्मक्षरमूति षोडशी - षोडशकल - षोडशकलोपेत प्रजापतिरूप, स्वायम्भुवपुरुषात्मा, पारमेष्ठ्य महानात्मा, सौर विज्ञानात्मा - रूप ऋषि पितृ देवमूर्त्ति प्राकृत विश्वेश्वर की पूर्णता सम्पादन करता हुआ गृहस्थ- वानप्रस्थ - संन्यास, इन तीन आश्रमों का क्रमिक अनुगमन करता हुआ इन तीन आश्रमों के द्वारा क्रमश: ' मुनि - यति - ऋषि ' पद प्राप्त कर लेता है, जिन इन तीन मानवपदों की संक्षिप्त स्वरूपदिशा का य समन्वय किया जा सकता है । ३७०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् परोक्षरूप से ही सामाजिक उद्बोधन में प्रवृत्त होना चाहिए । यही अलौकिक मानव की, नैष्ठिक मानव की लौकिक समाजानुबन्धिनी चौथी लोकमानवता है । समाज भावुक समाज के भावुक व्यक्तियों की वैसी भावुकता - परम्पराओं - मान्यतापरम्पराओं का तो लोकांनष्ठ अलौकिक लोकमानव के द्वारा स्वप्न में भी समर्थन न होगा, जिन मान्यताओं का केवल भावुकतापूर्ण कल्पनाओं से ही सम्बन्ध है, जिन मान्यताओं से नैमिक आम्नायपरम्परा का अनुमोदन - समर्थन - संरक्षण तो विदूर, अपितु जिन से नैगमिक श्राम्नायपरम्परा का मूलोच्छेद सम्भावित ही क्या है, निश्चित है, कदापि ' लोकसंग्रह ' जैसे निष्ठापथ के माध्यम से समर्थन नहीं किया जायगा, नहीं करना चाहिए । ऐसा श्रुत उपश्रुत है कि, हमें किसी मान्यता का प्रत्यक्ष विरोध इस लिए नहीं करना चाहिए कि, इस से ' बुद्धिभेद ' उत्पन्न हो जायगा | क्या ‘ न बुद्धिभेदं जनयेत् ' का यह तात्पर्य है कि, “ मान्यता भले ही सर्वथा निर्मूल ' हो, नैगमिक सिद्धान्तविरोधिनी हो, मानव का उत्तरोत्तर सर्वनाश करने वाली हो, तदपि हमें लोकसंग्रहदृष्टि से उसका विरोध न करते हुए ' जोषयेत् सर्वकर्माणि ' इत्यादि उत्तरवाक्यानुसार स्वयं भी इन मान्यताओं का अनुगामी बना रहना चाहिए " । क्या भगवान् के ' लोकसंग्रह ' आदेश का यही तात्पर्य है? | वर्त्तमान में हम इस प्रश्न के ' मिति ' - ' नेति ' दोनों ही समाधान करेंगे । ' मिति ' ( हाँ ) इसलिए कि, गतानुगगिक एषरणालिप्त असन्निष्ठ मानवों की ऐसी धारणा है कि, वर्त्तमानयुग ' अर्थतन्त्रप्रधान ' युग है, भौतिक युग है, जिसमें केवल आत्मा - सत्त्वबुद्ध्यनुगत आदर्शो - नैगमिक आम्नायों के अनुगमन से कदापि आज के युग के अर्थसंकटग्रस्त मानव का परलोक साधन तो क्या, शरीरयात्रानिर्वाह भी तब तक असम्भव है, जब तक कि वह वर्त्तमानयुग के अर्थ-तन्त्राभिषिक्त सम्पन्न महानुभावों की सदसत् - सर्वविध मान्यताओं का, भावुकताओं का अक्षरशः अनु-मोदक समर्थक - प्रशंसक बनना हुआ सर्वात्मना स्वयं को भी लोकसंग्रहदृष्ट्या इसी पथ का पथिक नहीं बना लेता । और इस दृष्टिकोण से हमें भी उन सभी मान्यताओं का बुद्धिभेदभय से ( जो भय वास्तव में हमारे स्वार्थ से सम्बन्धित स्वयं हमारा अपना भय है ) समर्थन - अनुगमन ही करना चाहिए, जैसा कि युगधर्माक्रान्त आज का मानव कर रहा है, एवं इसी पुरुषार्थ? के बल पर तथाविध I मानव शरीरयात्रा निर्वाह में सफल हो रहे हैं । ' नेति नेति ' ( ना - ना ) इसलिए कि, आम्नायानुगत की ऐसी निश्चित आस्था है कि, कैसा भी युग क्यों न हो, मानव नुगता परिपूर्णता ही मानव का सर्वयुगानुगत परमपुरुषार्थ है । एषणा कामुक सन्निष्ठ श्रेष्ठ मानवों सदा ही मानव ही है, आत्मबोधा-विज्ञानतन्त्र - कामतन्त्र - अर्थतन्त्र, किंवा ओर भी वर्त्तमान युगानुगत - प्रजातन्त्र - गणतन्त्र आदि आदि तन्त्र कभी इस आत्मतन्त्रायी मानव की हृततन्त्री को इस तत्री की सहज सत्त्वनिष्ठा को यत् किञ्चित् भी विकम्पित नहीं कर सकते, नहीं कर सकते । शरीरयात्रानिर्वाह जैसे नगण्य - प्रश्न की तो कथा हो दूर है, विध के अन्य सुसमृद्ध समहदा-३७३
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श्राद्धविज्ञान कर्षण भी निगमाम्नायनिष्ठ इस सहज मानव को अणुमात्र भी प्रभावित नहीं कर सकते, नहीं कर सकते । घुणाक्षरन्यायेन सम्भव है अपने भावुक परिवार की भावुकतापूर्णा मनोवृत्तियों के उत्तरदायित्त्व के नाते ऐसे नायनिष्ठ को यदाकदा लौकिक- व्यावहारिक संकटों का अनुगमन करना पड़े । किन्तु एतावता ही इसकी सहजनिष्ठा की कोई क्षति नहीं हो सकती, नहीं हो सकती । ऐसे नैगमिक मानवश्रेष्ठ केवल उन्हीं मान्यताओं के लोकसंग्राहक बना करते हैं, जो मान्यताएँ निगमाम्नायानुशय से अनुप्राणित रहतीं हैं । आम्नायविरुद्ध, अतएव आदर्शविरुद्ध किसी भी युगधर्मानुगता काल्पनिक मान्यता का तो क्या, श्रवरण भी इन्हें अप्रिय ही प्रतीत होता है, ओर ऐसे अप्रिय श्रवण प्रसङ्गों पर ये ' शान्तं पापम्'- ' आलप्यालमिदम् ' * रूप तत्क्षण आत्मभावानुगत बन जाते हैं । अपनी निगमनष्ठा, तत्-स्वरूपसंरक्षिका निगमागमशास्त्र- स्वाध्यायनष्ठा ही इन मानवश्रेष्ठों की एकमात्र अनन्यनिष्ठा बनी रहती है जरामर्थ्यसत्त्रवत् । विश्व का कोई भी प्रावाहिक - युगधर्मानुगत भावुकतापरिपूर्ण कामार्थाकर्षण इन्हें इस निष्ठा से वित नहीं कर सकता, नहीं कर सकता । केवल एकमात्र ' परापराणां परमा ' भावानुगता इष्टदेवानुगता मानसिक भावुकता ही इनकी भावुकता है, जिसके द्वारा निष्ठा को आत्यन्तिक रूप से तत्र समर्पित करते हुए ये नैगमिक मानव अहोरात्र सतत अपनी उपास्या इस परापराणां परमा निगमाम्नायसम्मता हैमवतीजमा भगवती ( वागाम्भृणी समन्विता सौरी इन्द्रवागुरूपा बृहतीवागूलक्षणा गायत्री मात्रिक वेदतत्त्वानुगता सत्यब्रह्माभिन्ना हिरण्मयी - हैमवती - महाशक्ति ) के द्वारा राद्वान्तित ' ब्रह्मणो at विजये महीयध्वम् ' ( केनोपनिपत् ) इस वेदान्तसिद्धान्ता ( उपनिषत् सिद्धान्ता ) वेदान्तनिष्ठा को ही अपना लक्ष्य बनाए रहते हैं । इसी इष्टदेवभावुकतानुगता निरतिशया संविल्लक्षणा निष्ठा से इनकी सम्पूर्ण लोकयात्राएँ सहजरूप से प्रारब्धकर्मानुसार नियतिचक्र के द्वारा परिपूर्ण बनतीं रहतीं हैं । अतएव तात्कालिक असुविधा - परम्पराएँ इन्हें कथमपि अपनी स्वाध्यायनिष्ठा से विच्युत नहीं कर सकतीं, नहीं कर सकतीं । वैसे युगधर्मानुगत - एषणालिप्सापरिपूर्ण सम्पूर्ण आर्थिक आकर्षण इन अनन्य नैष्ठिकों के लिए अहि: -कञ्चुक्ति त्याज्य ही बने रहते हैं, जो अर्थाकर्षण स्वाध्यायनिष्ठा में विघ्नपरम्परा का सर्जन करते हुए इनकी सत्त्वबुद्धि को मलीमस कर देने की व्यर्थचेष्टा किया करते हैं । यही है लोकसंग्राहक लौ-* प्यालमिदं बोर्यत् स दारानपाहरत् । कथापि खलु पापानामलम यसे यतः ॥ --- महाभारत
सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ।
यथातथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥
- मनुः ३७४