Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 441–450
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 441–450
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, ऋऋणमोचनोपायोपनिषत् दोनों का इस अवैध ( यथापद्धतिपूर्वक न किए जाने वाले ) कर्म से कुछ उपकार सम्भव है? 1 यह स्मरण रहे कि, ये दोनों ही श्रेणियाँ श्रौतस्मार्त्त आम्नायसिद्ध श्रौतसूत्र - गृह्यसूत्रादि पद्धतियों के प्रति ही आस्था श्रद्धा रखतीं हैं 1 । अभिनिविष्ट वेदभक्तों की भाँति इनकी पद्धतियाँ कोई नवीन नहीं हैं । अपितु प्रथमश्रेणि पद्धति का स्वरूप यथावत् जानती नहीं, द्वितीय श्रेणि श्रौतस्मार्त्तपद्धति के अनुसार कर्म कर सकती नहीं । इसी दृष्टि से इन दोनों को अज्ञ कहना अन्वर्थ बनता है । उपकार - अपकार की मीमांसा करना तो लोकसंग्रह का विघात ही माना जायगा । वस्तुतस्तु यदि देवयुग में दर्भास्तरण से पूर्व वेदि के स्पर्शमात्र से इष्टकामसिद्धि के स्थान में यज्ञ इष्टविनाशक बन जाता है, तो पद्धतिपूर्वक न किया जाने वाला श्रौतस्मार्त्तकर्म कदापि अभ्युदय का साधक नहीं माना जा सकता । ' जहाँ लाभ नहीं, वहाँ हानि निश्चित है ' इस लोकसूत्र अनु-} सार यदि अभ्युदयात्मक उपकार नहीं, तो प्रत्यवायरूप अपकार निश्चित है । इस सम्बन्ध में तो हमें यह भी स्पष्ट कर देने में कोई संकोच नहीं है कि ' अतिथि को निमन्त्रण न देना उत्तम पक्ष है । किन्तु निमन्त्रण देकर उसके स्वरूप के अनुरूप आतिथ्यं न करना सर्वनाश का ही कारण है । ' यथेन्द्रशत्रुः स्व-रतोऽपराधात् ' * के अनुसार यदि केवल मन्त्रोच्चारण से सम्बन्धित उदात्त - अनुदात्तादि स्वरों में भी स्खलन हो जाता है, तो यज्ञकर्म अभ्युदय के स्थान में नाश का ही कारण बन जाता है । अत-एव प्रथम ज्ञवर्गात्मक पद्धतिविरुद्ध कम्र्मानुष्ठाता यजमान, तथा पुरोहित, दोनों का ही सर्वनाश विनिश्चित माना जायगा । एवं इस दिशा में कभी प्रथम श्रेणि - सम्बद्धा अज्ञतामूला कर्म्मसङ्गिता क्षम्य न मानी जायगी । कदापि अज्ञानमूलक, अतएव पदे पदे स्खलित कर्म्मकाण्ड का कभी लोकसंग्रहधिया समर्थन नहीं किया जायगा, नहीं किया जायगा । हमारी नहीं, अपितु शास्त्र की यह निश्चित धारणा है कि, भारतवर्ष की आस्था - श्रद्धाशीला आस्तिक प्रजा का अहोरात्र ' धर्म- धर्म ' की घोषणा करते हुए भी, ग्रामे आमे नगरे नगरे स्थाने स्थाने निरन्तर यज्ञोत्सवानुगमन करते हुए भी, देवपितृकार्य्यानुगमन करते हुए भी दिन दिन जो पराभूति श्रश्रद्धा, दीनता होती जा रही है, उसका एकमात्र कारण अज्ञतामूला कर्म-सङ्गता ही माना जायगा । आस्तिक प्रजा की आस्था श्रद्धा का जहाँ हम अभिनन्दन करेंगे, वहाँ इसकी अज्ञतामूला कर्मानुगति को हम सर्वात्मना घातक ही उद्घोषित करेंगे, फिर चाहे लोकसंग्रह सुरक्षित रहे, स्वरक्षितमात्र रहे, अथवा तो अरक्षित । ( देखिए शतपथ ब्राह्मण १।२।३।२६ ) ।
* दुष्टःशब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः ( वृत्रः ) स्वरतोऽपराधात् ॥
X ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत, नाज्ञात्वा कर्म श्राचरेत् ।
ज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे ॥
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श्राद्धविज्ञान दूसरा अज्ञ - कर्म्मसङ्गीवर्ग है स्त्री, शूद्र, एवं द्विजबन्धुवर्ग । इसकी अज्ञता का मूल है श्रौतस्मार्त्त वैध पद्धतियों में इनका अनधिकार । अतएव इन्होंने अपनी मान्यताओं के अनुसार ( किन्तु निगमाम्नाय के विरोध में न जाने वाली आस्था तथा श्रद्धा के आधार पर ) जो कर्म्मसङ्गिता परम्परया स्वीकृत कर ली है, वह अवश्य ही लोकसंग्रहधिया अलौकिक लोकमानव के द्वारा परोक्षरूपेण - तटस्थरूपेण अनुमोदनीया मानी जा सकती है । नैगमिक आम्नाय की पारम्परिक प्रतिच्छाया से अनुप्राणिता गृह्यपितरतुष्टिसंसाधिका लौकिक - पार्थिव - भौम - गृह्यपितरस्वरूपानुगता महासङ्गीतनिबन्धना ( निगमाम्नायसम्मत देवभावापन्न लोकगीतसमन्विता ) पितृस्वरूपनिबन्धन श्वेतरक्तवस्त्र - धूम्रार्कपिलागोधुग्धद्वारा निष्पन्न क्षीरान्नादि परि-ग्रहसमन्विता अमावास्यात्मकरात्रिजागरणात्मिका गृह्यपितरकर्म्मसङ्गिता इसलिए लोकसंग्रहधिया स्त्रीवर्ग की मान्य मान ली जायगी कि, इसका शरीरानुगता केवल मानसी श्रद्धात्मिका मान्यता से ही सम्बन्ध है, जिससे इस निगमाम्नायानुशयानुप्राणिता लोकमान्यता से पारिवारिक स्वस्तिभाव सुरक्षित रहता है | यहाँ लोकेष्टतासाधनता के अतिरिक्त किसी अनिष्टता का समावेश नहीं है । दूसरे शब्दों में ' थाँ जीयाँ स मारो मन भर जाय ' ही यहाँ कर्म्मसङ्गिता का फल है, जिसे निगम ने ' स्वस्त्ययन-कर्म ' रूप से इष्टसाधक ही घोषित किया है ÷ । इसी प्रकार स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धुवर्गत्रयी के अन्यान्य स्वस्तिभावात्मक आगमानुमोदित मानसभावानुगत अश्वत्थ- बट - बिल्व - तुलसी - सिंचन, कार्त्तिक - माघादि-स्नान - आगमानुगत प्रदोष - श्रष्टमी - नवमी - चतुर्दशी - शिवरात्रि नवरात्र पूर्णिमा आदि व्रतानुष्ठान, सूर्य्या -र्घ्यप्रदानादि कर्म्म शालग्रामशिला दर्शन - शिवदर्शन - नर्मदा गङ्गायमुनास्नान - दिव्यप्राणातिशयानुप्राणित पुष्कर - कुरुक्षेत्र - गालवाश्रम - बदरिकाश्रम - आदि तं र्थानुगमन - आम्नायानुगत दासभावना से प्रसंस्पृष्ट केवल भगवन्महिमावर्णनात्मक स्तुतिगान आदि आदि स्वस्त्ययनात्मक कर्म भी इस अज्ञ - अनधिकृतत्रयी के लोकसंग्रह धिया मान्य कहे जा सकेंगे । क्योंकि केवल मनःशरीरानुबन्धी स्वस्तिभावात्मक इन कर्मों से इष्ट ही सम्भावित बना रहता है यदि आस्था श्रद्धा है, तो । उक्त दृष्टि से अब हम ' अज्ञकर्मसङ्गी ' के तीन श्रेणिविभाग मान लेंगे, जिन तीनों में हीं निगमाम्नायानुगता आस्था - श्रद्धा का समावेश है । एक वैसा अज्ञकर्मसङ्गी - वर्ग माना जायगा, जो आस्था - श्रद्धाशील ' द्विजाति ' है, अतएव श्रौतस्मार्त्त सौर दिव्यकम् ( यज्ञ ) का अधिकारी है । किन्तु स्वयं तो वह इस वैदिक कर्म का रहस्य ही जानता, न पद्धति से ही परिचय रखता । अपितु अपने वे से- श्रद्धावेश से अपने सदृश ही योग्यता रखने वाले पुरोहितों के सहयोग से श्रौतस्मार्त्त कम्मों में ÷ असंख्य स्वस्त्ययनात्मक मान्यतात्मक लौकिक नैगमिक कम्मों में से कुछ एक स्वस्त्ययनकम्म का स्वरूप उपपत्तिपूर्वक गीताभाष्यभूमिका द्वितीयखण्ड के तृतीय ' ग ' विभाग के ' स्वस्त्ययनकर्म्मपरि-गणना ' नामक्त अवान्तर प्रकरण में द्रष्टव्य है । ३७८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् प्रवृत्त हो जाता है । निश्चयेन ऐसे यज्ञकर्त्ता यजमान का, तथा यज्ञकारयिता पुरोहित का, दोनों का निवार्य बन जाता है । ऐसे श्रज्ञकर्म्मसङ्गी में तो बुद्धिभेद अवश्य ही उत्पन्न करा देना चाहिए, जिससे यह वर्ग अनिष्ट से बचा रह जाय । हाँ, यदि अज्ञकर्मसङ्गी यजमान को विज्ञ कर्मठ पुरोहित सौभाग्य से उपलब्ध हो जाय, तो इसके द्वारा ऐसे अज्ञकर्म्मसङ्गी यजमान का भी कर्म विज्ञ ऋत्विजों के देवयजनात्मक अनुग्रह से इष्टसाधक बन जाता है । एवं ऐसे यजमान - अज्ञकर्मसङ्गी यजमान-के सम्बन्ध में विज्ञ ऋत्त्विक् के माध्यम से ' न बुद्धि भेदं जनयेत् ० ' इत्यादि आदेश समन्वित हो जाता है । दूसरा अज्ञकसङ्ग - वर्ग निगमाम्नायपरायण परिवारों का श्रौतस्मार्त्तानधिकृत कुलस्त्रीवर्ग है! यदि इसकी मान्यताएँ, कर्म्मसङ्ग ( लौकिक स्वस्त्ययनकर्म्म ) नैगमिक आम्नाय के विरोध में नहीं जाता, , तो इनकी सब मान्यताएँ लोकसंग्रहधिया परोक्षरूपेण मान्य हैं । तीसरा वर्ग द्विजबन्धु ( यथाजात-संस्कारशून्य - निरक्षरमूर्द्धन्य ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य ), तथा शूद्रवर्ग का है, जिसकी नैगमिक आम्नाय के संरक्षण के लिए ही पुराणपुरुष के द्वारा सर्वस्वसंहिता ' ( पुराणसंहिता ) का आविर्भाव हुआ है । इन दोनों अज्ञकर्म्मसङ्गी - वर्गों की मान्यता भी लोकसंग्रहरूपेण संग्राह्या मानी जा सकती है । एवं यहाँ आकर ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' के अनुसार तीन के स्थान में चार अज्ञ ज्ञ - सङ्गीवर्ग प्रमाणित हो जाते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है-अज्ञसङ्गी - वर्गचतुष्टय परिलेखः— १- -विज्ञऋत्विग्युक्तः- -द्विजातिर्यजमानः-२ - अविज्ञपुरोहितयुक्तः - - द्विजातिर्यजमान: -- अज्ञः कर्मसङ्गी - लोकमान्यः अज्ञतमः कर्म्मसङ्गी - उपेक्षणीयः ३ - लोकाम्नाययुक्तः- --- शूद्राः - द्विजबन्धवश्च - अविज्ञातः कर्म्मसङ्गी - लोकसंग्राह्यः ४ - कुलान्नाययुक्त: - - कुलस्त्रीवर्ग: ---अविज्ञानः कर्म्मसङ्गी- लोकानुगतः X ---* " ऋत्विजो ह वै देवयजनम् । ये ब्राह्मणाः शुभ्र वांसोऽनृचाना विद्वांसो याजयन्ति ( यंज-मानं - अज्ञं कर्म्मसङ्गिनम् ), सैव ' ला ' ( वैधकर्म्मणः साङ्गोपाङ्गपरिपूर्णता ) । तन्नेदिष्ठामि-Tea मन्यामहे " ( शत ० ब्रा ० ३३ | १ | १ | ५ | ) |
- आख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गाथाभिः कल्पशुद्धिभिः ।
' पुराणसंहितां ' चक्रे भगवान् बादरायणः ॥
स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । ( तेषामेवैतत् पुराणशास्त्रम् ) । ३७६
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श्राद्धविज्ञान चारों में १-३-४, ये तोन वर्ग लोकसंग्राह्य, एवं द्वितीय वर्ग सर्वात्मना आलोच्य एवं उपेक्षणीय, यह निष्कर्ष निकला पूर्व के सन्दर्भ का । इस प्रकार चारों में तीन वर्ग ही ' न बुद्धि भेदं जनयेत् ० ' इत्यादि भगवदादेश के लक्ष्य माने जायँगे । मनःशरीरानुगता जिस मान्यता का ( निगमाम्नायपरम्परा- का नुप्राणिता प्रस्थाश्रद्धायुक्ता मान्यता का ) अज्ञकर्म्मसङ्गी त्रिविध वर्ग की अपेक्षा से जिस लोकसंग्रह आदेश दिया, उस लोकसंग्रह का नैगमिक मर्म्म ही, नैगमिक आम्नाय ही भगवान् की दृष्टि में लोक-में जो नैतिक संग्राह्य माना जायगा | अन्यान्य क्षेत्रों की भाँति इस लोकमान्यता क्षेत्र में भी वर्त्तमान युग गई हैं, पतनानुगता स्खलनपरम्पर एँ ( सर्वथा काल्पनिक, किंवा दूषित निगमविरुद्ध कल्पनाएँ ) प्रविष्ट हो उनके प्रति भी लोकसंग्रह उसी प्रकार सर्वथा उपेक्षणीय ही माना जायगा, जैसा कि विज्ञ पुरोहितयुक्त अज्ञतम कर्म्मसंज्ञी वर्त्तमान युग के अवैध श्रौतस्मार्त्तकर्मानुगत द्विजातियजमान की मान्यता सर्वथा उपेक्षणीय ही मानी गई है । चान्द्र - पार्थिव - रौद्र - सर्गनिबन्धनं भूतप्रेतावेशलक्षण - परकाय प्रवेशात्मक -मानसिक मान्यता-भावों का जिस स्त्रीशूद्रद्विजबन्धुवर्गत्रयी की मान्यता से पूर्व में सम्बन्ध बतलाया गया है, इस मान्यता के माध्यम से इस वर्गत्रयी में असंख्य कल्पनाभावों का समावेश ओर हो गया है । साधारण सा ज्वरांश, अमुक · साधारण रक्तचापानुगत उत्तेजन, हृदयदौर्बल्यानुगतो मूर्च्छा., आदि आदि मानसिक - शारीरिक रोग भी आज दुर्भाग्यवश अपठित स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धु - परि वारों में ' भूतप्रेतबाधा ' नाम से प्रसिद्ध हो रहे हैं । बड़े बड़े हीनकर्मा कुत्सितवृत्तिपरायण- - हस्त-झाड़ा - का करने वाले आसुर मानवाधम परप्रतारणा - परव्यामोहनमात्र के लिए शिर पादादि के विकम्पन पूर्वक - " --हूँ - हूँ- हा हा - ही ही लेना लेना- पकड़ना पकड़ना - बांध दे लटका दे - मारो मारो - खाऊँगा - लेजाऊँगा - नहीं छोडूंगा - बकरा लाओ - मदिरा लाखो -रत-जगा करो - भेट धरो - चौराहे में कलसी रक्खो - श्मशान में भूत को तृप्त करो " इत्यादि घोषणा करते हुए नितान्त अज्ञों का विमोहन करते रहते हैं । पुत्रैषणा - वित्तैषणा - लिप्स अज्ञजन. अज्ञ-स्त्रियाँ अधिकांश में एवंविध नीचकर्मा प्रतारकों के द्वारा अहर्निश प्रतारित होते हुए अपना सर्वनाश कराते रहते हैं । काय - शिरो - ग्रीवा - विकम्पनकुशल ये घुड़ले, डोरा - डाँडाबन्धननिपुण विद्याविशारद, नानाविध उत्तालतरङ्गायिता ये जीवित भूतनियाँ, इनको वश में करने वाले ये सिन्दूरललाटी घूर्णितनेत्र महाश्रमाङ्गलिक पिशाचाकृतिदुष्ट नराधमसिद्ध ( श्याणा - भोपा - यदि नामों से प्रजा में प्रसिद्ध ) आज अज्ञकर्मसङ्गियों की भावुकता से अनुचित लाभ उठाते हुए भारतीय नैगमिक लोकाम्नाय की ओर सहज श्रद्धालुवर्ग की श्रद्धा को उत्तरोत्तर स्खलित करने के जघन्य कर्म का अनुगमन कर रहे हैं । आस्तिक लोकप्रजा को सदा सतर्क - सावधान रहना चाहिए इन प्रतारों से, एवं इनकी प्रतारणाओं से । मान्यता वही अनुगमनीया बननी ३८०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् बनानी चाहिए इस प्रजावर्ग को, जिसका आधार निगमाम्नाय है । अतएव जो बिना किसी जघन्य - हीन - कुत्सित प्रवृत्ति के सहजरूप से मान्यता का संरक्षण करती हुई स्वस्तिभावापन्ना ही बनी हुई है । जहाँ जिस परिवार में निगमाम्नायनिष्ठ देवभावापन्न श्रौत पुरुष सञ्चालक-नेता - नायक हैं, वहाँ प्रथम तो चान्द्री भूतबाधा का अवसर ही नहीं है । यदि पारिवारिक भावुक स्त्री - बालवृन्द के स्खलन से क्वाचित्क कहीं कभी भूतबाधा का आक्रमण हो भी जाता है, तो निगमोक्ता ( अथर्ववेदीया घोराङ्गिरा ) विद्या - देवविद्या से तत्क्षण ऐसी तात्कालिक भूतबाधा उपशान्त हो जाती है । अन्य कोई नैगमिक उपाय उपलब्ध न भी हो, तो आगमीय केवल आत्मसूक्ति के संस्मरण से राक्षस भूतात्मा तत्क्षण पलायित हो जाते हैं, निश्वयेन पला-यित हो जाते हैं । ऐतरेय - शाङ्खायनादि ब्राह्मणग्रन्थों में, विशेषतः उपासनाकाण्डप्रधान तैत्तिरीया-एकग्रन्थ में मानस - मान्यतानुबन्धी असंख्य नैगमिक उन प्रकारों का सहजभावेन स्प-ष्टीकरण हुआ है, जो नैगमिक विद्वानों के द्वारा स्वतन्त्र ' संग्रहग्रन्थ ' रूप से समाजानुबन्धी सामूहिक लोकाभ्युदय के लिए शीघ्र अभिव्यक्त हो जाने चाहिए । बुद्धिभेदसंरक्षणात्मक ' लोकसंग्रह ' के प्रसङ्ग में इस चतुर्थ स्थानीय ' लोकमानव ' के विश्लेषण हमें इस लिए विशेष आवेदन करना पड़ा कि, अपने भुक्त जीवन में हम स्वयं ' लोकसंग्रह ' माध्यम से तथाविध उन प्रतारकों का सम्मान करते रहे हैं, जो वस्तुतः ' वाङ मात्रेणापि नाच ' येत् ' रूप से वाणी-सम्मान के भी पात्र नहीं हैं । युगधर्मानुसार प्रत्यक्ष में हम उन प्रतारकों का लोकसंग्रहधिया सम्मान करते रहे इसलिए कि, दुष्टबुद्धि के अन्तिम परिणाम को जानते हुए भी भारतीय प्राम्नाय में अपनी शिष्टता के स्वरूप संरक्षण के लिए अन्तिम क्षणपर्यन्त उस के स्वरूपोद्बोधन के लिए उसका बुद्धिभेद संरक्षण शिष्टपरम्परा - संम्मत माना गया है । भगवान् कृष्ण का आततायी दुष्टबुद्धि दुर्योधन को अन्तिमक्षण पर्यन्त उद्बोधन कराने का प्रयत्न करना, चैद्य ( शिशुपाल ) की असुरसंख्यासम्मित नवतीर्नव ( ६६ ) परुषवाणी की उपेक्षा करते रहना, आदि निदर्शन हीं अत्र प्रमाणम् । किन्तु उस पूर्वयुग में, तथा वर्त्तमान नितान्त स्खलित युग में अहोरात्र का व्यवधान हो गया है । अतएव वर्त्तमान युग में उस भूतयुगानुगता शिष्ट मान्यता का नितान्त अशिष्ट - अशुचि - अभद्र - श्रमङ्गल - भावापन्न हीन-* स्थाने हृषीकेश! तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भूतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥ ( गीता ०११ । ३६ । ) इस श्लोक को भूर्जपत्र पर लिख कर ग्रीवा में बांध देने मात्र से बच्चों का ' कुक्कुरकास ' ( कूकरखाँसी-काली खाँसी ) विलम्ब स्मृतिगर्भ में विलीन होती देखी गई है । ३८१
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श्राद्धविज्ञान कर्म्मा निकृष्टकर्मा स्वस्त्ययनकर्म्मपराङमुख - शील - विनय - सौजन्यादि सद्गुणवहिम्मुख अमा-ङ्गलिक वेशभूषापरायण - उद्वेगकरी अश्लील भाषा के प्रयोक्ता- निगमागमाम्नायविरोधी - सर्वज्ञान-विमूढ - आसुरमानवों के लिए कोई महत्त्व शेष नहीं रह गया है । अब वैसे प्रतारक-दम्भी - धनमानमदान्ध - लोकैषणा लिप्सू निगमाम्नाय - विरोधी हीनकर्मा अज्ञ कर्मसङ्गियों के सम्बन्ध में ' लोकसंग्रह ' जैसे शिष्ट - पावनं आदेश का स्वप्न में भी उपयोग नहीं करना चाहिए, नहीं करना चाहिए नैगमिक शिष्ट श्रेष्ठ मानवों को । लक्षीभूत मानव की आभ्यन्तर - बाह्य- ' स्थिति - परिस्थिति का आमूलचूड़ अन्वेषण करते हुए प्रस्थाश्रद्धा की अनुगति उपलब्ध होने पर ही निगमाम्नायपरायण उन मानवों की मान्यता का ही लोकसंग्रह होना चाहिए, जो स्वयं विज्ञ नहीं हैं, अथवा तो अल्पज्ञ हैं, अकृत्स्न हैं, साथ ही जिज्ञासा रखते हैं, इसे आस्था - श्रद्धापूर्वक प्रणतभाव से अभिव्यक्त करते हुए जानना चाहते हैं निगमागमरहस्यों को आम्नायविधिपूर्वक । ऐसे अकृत्स्न-मन्द - जिज्ञासू मानव ही कृत्स्न नैष्ठिकों के द्वारा लोकसंग्राह्य माने जायँगे । परप्रतारक वञ्चकों की सहज सुरवृत्ति के पूर्णज्ञाता भगवान् को स्वयं ऐसी आशङ्का हुई होगी कि } कहीं उनके-' न बुद्धिभेदं जनयेत् ० ' आदेश का यह अर्थ न लगा लिया जाय कि एकलया वे सभी व्यक्ति लोकसंग्राह्य हैं, जो निगमान्ताय से विरोध करते हुए यथेच्छ कल्पित मान्यताओं से अपने आपको -' कर्मवीर ' - कर्मठ ' ' - ' निष्काम कर्मयोगी ' घोषित करते हुए विश्वक्षय के निमित्त बने हुए हैं । इसी लिए भगवान् को अन्यत्र इस ' लोकसंग्रह ' आदेश का पूर्वोक्त नैगमिक दृष्टिकोण के माध्यम से निम्न लिखित रूप से स्पष्टीकरण करना पड़ा । श्रयताम! १ – सक्ताः कर्म्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत! कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तचिकीषु र्लोकसंग्रहम् ॥ २- न बुद्धिभेदं जनये: ज्ञानां कर्म्मसङ्गिनाम्! जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥
३ - प्रकृतेगु सम्मूढाः सञ्जन्ते गुणकर्मसु ।
" तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत् " ॥
- गीता ३।२५, २६, २६ | प्रकृतमनुसरामः । मानव के चतुर्थ संस्थानरूप ' लोकमानव ' का क्रमसिद्ध प्रसङ्ग प्रक्रान्त है, जिस के मध्य में हीं प्रसङ्गधिया उपात्त ' लोकसंग्रह ' की मीमांसा का स्पष्टीकरण करना पड़ा । अब पुनः प्रकृत की ओर लोकनिष्ठ मानवों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । जैसा कि स्पष्ट किया गया है, मानव के तीन अलौकिक स्थानों ( ऋषि - पितृ - देवस्थानों ) से ही मानव का प्रकृत चतुर्थ स्थान ३८२
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ऋऋणमोचनोपायोपनिषत् ( सांख्यसम्मत चतुद्दशविध भूतसर्ग के मध्य व्याख्यात बन रहा है । अपने गृहस्थानुबन्धी ब्राह्मणग्रन्थनिबन्धन में प्रतिष्ठित रजोविशालसर्गात्मक मानवस्थान ) ( मुनिमानरूप श्रेष्ठमानव ), वानप्रस्थानुबन्धी आरण्यकमन्थनिबन्धन कर्मकाण्ड में तत्पर देवमानव पितृमानव ( यतिमानवरूप महामानव ), संन्यासानुबन्धी उपनिषद्ग्रन्यनिबन्धन उपासनाकाण्ड में आत्मपर ऋषिमानव ( अतिमानव ) अपने आश्रमानुगत इन तीनों ज्ञानकाण्ड में मत्पर रहता हुआ * ' लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कत्तु मर्हस ' इस संस्थानों आदेश को में क्रमश: निष्ठापूर्वक आरूढ़ पार्थिवसर्गनिबन्धनात्मक - शिरोधार्य कर केवल चान्द्र-मनः शरीरमात्रपरायण - किन्तु - आस्था श्रद्धायुक्त - रजोविशालसर्गात्मक परम्परानुशय से अनुप्राणित एवं अज्ञ पूर्वोपवर्णित त्रिविधकर्म्मसङ्गी - निगम-लोकमानवियों ( कुलस्त्रियों ) की आम्नायानुगता मान्यता के - यथाजात लोकमानवों एवं हुआ, स्वयमपि बुद्धिभेदनियन्त्रणदृष्टि से गतानुगतिक बनता प्रति परोक्षरूप से लोकसंग्राहक बनता ; यही इसका संक्षिप्त स्वरूपपरिचय माना जायेगा, जिस स्वरूपपरिचय हुआ ही ' लोकमानव ' कहलाएगा, नैमिक अलौकिक स्वरूपों के साथ यों समसमन्वय किया जासकेगा का इस लोकमानव के त्रिविध -' लोकमानव ' का अर्थ है - " मनः शरीरमात्रानुगता वैय्यक्तिक राष्ट्रिय नैगमिक मान्यताओं की अनुभूति - अनुमोदन - समर्थन - ( - पारिवारिक - सामाजिक- तथा करते हुए मान्यतासक्ति- मान्यताचर्वणा - घोषणा - वियुक्तिपूर्वक सहजरूप गतानुगतिकतारूप से से अनुगमन भी ) आभ्यन्तर आत्मा - बुद्धयनुगता संवित एवं निष्ठा पर आरूढ़ रहते हुए ( सर्वथा श्रौतस्मार्त्ताम्नायपरायण परोक्षरूप से अपनी बने रहते हुए ) केबल लोकसंग्रहबुद्धया प्रत्यक्ष में सर्वथा ही को लौकिक- व्यावहारिक - सर्वसमानधर्मा ही प्रमाणित गतानुगतिक करते हुए बने रहते हुए ( अपने आप मानवों की मान्यताको क्रम क्रमशः नैगमिक निष्ठा की ओर आरूढ़ ) यथाजात कर्मसङ्गी लौकिक शरीरात्मक प्रज्ञानगभित भूतात्मा ( शारीरिक आत्मा - प्राणात्मा ) को करने ही लक्ष्य के बनाए लक्ष्य से अपने मन: -रखना " । यही इस लोकमानव का ' मानवभाव ' है । एवंविध द्विजाति मानव ही है [ मन शरीरानुगत - प्रज्ञानभूतात्मानुगत लोकनिष्ठ द्विजाति है ] । यही इस मानव ' लोकनेता ' है, ' मानव ' सर्वायु से सम्बद्ध ( सम्पूर्ण जीवन से सम्बद्ध ) ' चतुर्थस्थान ' है । यही त्रिः प्रजापतियों का सर्वाश्रमानुबन्धी ( अव्ययात्मक षोड़शी, अक्षरात्मक षोड़शकल, आत्मक्षरात्मक षोड़शकलोपेत तीनों प्रजापतियों ) से गभित विकृति-क्षरलक्षण चान्द्र - तथा विकारलक्षण पार्थिव - प्रज्ञानात्मभूतात्मस्वरूप ' विकृतिविकाररूप ( लोकस्थान ) है, जिसका सर्वभावापन्न - सर्वगुणात्मक चान्द्रपार्थिव विश्वस्थानं ' ट्रे सम्बन्ध माना गया है । प्रज्ञानगभित भूतात्मसम्बन्ध से ही यह ' प्रज्ञान लोकमानव गर्भितभूतात्मा लोकाम्नाय ' से में ही ' प्राज्ञ - मनीषी - महाप्राण - महासत्त्व ' आदि अभिधाओं से प्रसिद्ध हुआ है । यही चतुर्थ मानव ' मानव ' अभिधा से मान्य घोषित हुआ है । एवंविध द्विजातिमानव को ही हम लोकबन्धु कर सकते हैं । ऐसे ही त्रिःस्वरूपगर्भित श्रेष्ठमानव - अतिमानव - महामानवात्मक ' लोकमानव ' उपाधि से विभूषित के लिए पुराणपुरुष की यह घोषणा हुई है कि-गुह्यं ब्रह्म तदिदत्रवीमि -नहि " मानुषात् श्र ेष्ठतरं ह किञ्चित् " । -महाभारत
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श्राद्धविज्ञान चतुर्विधमानवसंस्थानपरिलेख :-सर्व संग्रहात्मकः -( निगमागमपरायणभारतीय द्विजातिमानवस्य अवस्थाचतुष्टयी ) " बाध्यः इति पुरुषा चत्वारः " 8-अव्यात्मरूपषोडशी प्रजापति -लक्षण : -- स्वायम्भुवः -पुरुषात्मा-अक्षरात्मरूपषोडशकल प्रजापति -लक्षण :-पारमेष्ठ्यः - महानात्मा-प्रपितामहो पितामहो -- तदभिन्नो तदभिन्नोऽतिमानवः लोकस्य लोकस्य महामानवः - यतिः - ऋषिः --- पितरः - वानप्रस्थी - ऋषि संन्यासी : ( द्वितीयस्थानः ( प्रथमस्थानः -– तपोनिष्ठः- ज्ञाननिष्ठ ): -) ॥ श्रात्मक्षरात्मरूपषोडशकलोपेतप्रजापति - लक्षणः - सौरः -विज्ञानात्मा पिता -लोकस्य- तदभिन्नः श्रेष्ठमानवः - मुनि :- - -देवः गृहस्थी ( तृतीयस्थांनः ---कर्मनिष्ठः-) । - विकृतिविकारक्षररूपविश्व -लक्षणः -चान्द्रपार्थिवः - प्रज्ञानगर्भितभूतात्मा -तदभिन्नो मानवः -चतुर्थस्थान सर्वस्थानो वा: --सर्वाश्रयी -लोकनिष्ठः --बन्धुर्लोकस्य - -मानवः ( 8 ) -महापुरुषः- -- तस्यासावादित्यो रसः ( ऋषिमानत्रः --सर्वज्ञः ) ( २ ) -वेदपुरुष : -- तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः ( पितृमानव : -- सुज्ञ : ) - ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' ( देवमानवः ----विज्ञ : ) ( ३ ) —– छन्दः पुरुषः --तस्यैतस्याकारो रसः ( ४ ) -शरीरपुरुषः --तस्याशरीरः प्रज्ञात्मा रस : ( मानवमानवः --प्राज्ञः ) ' चत्वारः पुरुषाः ' इति बाध्वः ( महर्षिः ) -' शरीरपुरुषः -- छन्दः पुरुषः - वेदपुरुषः - महापुरुषः ' इति । -ऐतरेय आरण्यक शराश लोकमानवः ३८४ अलौकिक मानत्रयी
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ऋणमोचनोपाथोपनिषत् ' मानव ' के चार स्थानविभागों के सम्बन्ध में यद्यपि तालिका प्रदर्शिता भगवान् ऐतरेयसम्मता वचतुष्टयी के अनन्तर अन्य नैमिक प्रमाण अनपेक्षित है । तथापि निगमस्वाध्याय से वञ्चित, किन्तु परप्रतारणा मात्र के लिए निगमभक्तिप्रदर्शक श्रभिनिविष्ट निकृष्ट नर भावुकप्रजा में इस दृष्टिकोण से भी व्यामोहन उत्पन्न कर सकते हैं । अतएव तन्मुखबन्धनाय यहाँ कुछ एक वैसे वचन उद्धृत कर दिए -जाते हैं, जिनसे पूर्वोपरिणत मानव के चारों संस्थान स्पष्टरूप से प्रमाणित हो जाते हैं । ( १ ) - ऋषिमानवसंस्थासमर्थकानि - निगमागमप्रमाणानि -( श्रव्ययात्मनिष्ठा महर्षयः ) १ - ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्द्धयन् गिरः । सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥ ( ऋक्सं ०६।११४ । २ । ) 1 २- यो वैज्ञातोऽनूचानः, स ऋषिरार्षेय: ( शव ०४ | ३ | ४ | १६६ ) - ऐते वै विप्राः यदू-ऋषयः ( शत १/४५२७ || ३ - सप्त - ( अवान्तर विभागा: - ऋषीणाम् ) - यथा-“ — ब्रह्मर्षि – देवर्षि - महर्षि - परमर्षयः । ' काण्डविथ - श्रुतर्षिश्व राजर्षिश्व " क्रमावराः ॥ -आगमः
४ - लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
विधातात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
-गीता ५२५५० ( इसी प्रमाण सम्बन्ध में देखिए पृष्ठसं ० ३३७ ) ( २ ) - यतिमानवसंस्थासमर्थकानि - निगमागमप्रमाणानि -( अक्षरात्मनिष्ठा यतयः ) २ - तत्त्वा यामि सुवीर्यं तद्ब्रह्म पूर्वचिचये । येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ । ३८५ - ऋकसं, शहर
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श्राद्धविज्ञान
२ - वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगात् - यतयः - शुद्धसत्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥
-मुण्डकोपनिषत् ३ । २६ ।
३- अविमुक्ते प्रविष्टानां विहारस्तु न विद्यते ।
यतिभिर्मोक्षकामैश्च अविमुक्तः निषेव्यते ॥
- मत्स्यपुराण १५६ अ ।
४ - यदक्षरं वेदविदो वदन्ति, विशन्ति यद्ययतो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥
-गीता | ८ ११ | ( देखिए - पृष्ठसं ० ३३७ ) -२ ---( ३ ) - देवमानवसंस्था समर्थकानि - निगमागमवचनानि-( क्षरात्मनिष्ठा देवाः ) १ - एतेन वै ष्टरात्रेण देवा: ( प्राणरूपाः ) देवत्त्वमगच्छन् । देवत्वं गच्छति-यो यज्ञियमानवः - एवं वेद । ( ताण्ड्यमहाब्राह्मण २२।११।२,३, ) । २ - आहुतिभिरेव देवान् प्रीणाति, दक्षिणाभिर्मनुष्यदेवान् ब्राह्मणाञ्छु बुषोऽनू-चानान् । ( शत ० २ | २ | २ | ६ ) । विद्वांसो वै - याज्ञिकाः - देवाः । ( शत ० ३ ७ ३ | १० ) । ३ - द्वा वै देवाः । देवा व देवाः । श्रथ ये ब्राह्मणाः शुश्रवांसोनूचानास्ते मनुष्यदेवाः । तेषां द्वधा विभक्त एव यज्ञः । आहुतय एव देवानां दक्षिणा मनुष्यदेवानां ब्राह्मणानां शुश्रुवुषामनूचानानाम् । त एतं ( यजमानं ) उभये देवाः प्रीताः स्वर्ग लोकमभिवहन्ति । ( शत ० ४ । ३ । ४ । ४ । ) । ( देखिए पृष्ठ सं ० ३३८ ) । ३८६ X