Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 451–460
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 451–460
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{ ऋणमोचनोपायोपनिषत् ( ४ ) - पार्थिवमानवसंस्थासमर्थकानि - मिगमागमवचनानि ( विकृतिविकारनिष्ठा मानवाः ) * १ - बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो नदक्षः । स्वर्धते सत्यशुष्माय पूर्वी वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः ॥ ( ऋक् - मनुष्यो लौकिको वन्दी दातारं बहुविधया स्तुत्या स्तौति - इति तद्भाष्ये ११५६ | ४ | ) २- " पद्भयां पृथिवी ह्य ेष सर्व्वभूतान्तरात्मा - सायणः-तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्य: - सोमात् पर्जन्य श्रोषधयः
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् पृथिव्याम् ।
सम्प्रभूताः ॥
सम्वत्सरं - चान्द्र ' - यजमानश्च - लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र तस्माच्च देवा बहुधा ( श्रष्टविधाः ) सम्प्रभूता: - सूर्यः मनुष्याः - पशवो - वयांसि - प्राणापानौ व्रीहियव तपश्च श्रद्धां सत्यं ब्रह्मचर्य विधिश्व " । - मुण्डकोपनिषत् २ । १ । ३ - मादुषं ह वै नामैतद्यन्मानुषम् । तन्मादुषं ( निदुष्टं दोषरहितं ) सन्तं ' मानुष ' मित्याचक्षते । ( ताण्ड्यमहात्रा ० १४।६।१२ । ) ।
४ -- मनोवंशा मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ।
ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ॥
- महाभारत ११७५ । * यान्ति देवत्रता देवान् पितन् यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्याः, यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् । इन चतुविध मानवों को हम गीतोपनिषत् परिभाषा के अनुसार क्रमश पितृयाजीमानव, देवयाजीमानव, भूतयाजीमानव ' इन नामों से भी व्यवहृत कर सकते: ' मद्याजी हैं मानव, आत्मपरायण ऋषिमानव ही ' मद्याजीमानव ' है । पारमेष्ठ्य पितृतत्त्वपरायण यतिमानव । स्वायम्भुव म नव ' है । सौर देवयज्ञपरायण मुनिमानव ही ' देवयाजीमानव ' है । एवं चान्द्रपार्थिव ही ' पितृययाजी-. परायण ) लौकिक मानव ही ' भूतयाजीमानव ' है जैसा कि तालिका से स्पष्ट है— भूतपरायण ( लोक-३८७
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श्राद्धविज्ञान निगमागम मान्यतानुगामी भारतीय मानव-चतु: संत्थान भारतीय द्विजाति मानव, तदनुगत वर्णशूद्र, तदनुगता अवर्णचतुष्टयी के अन्त्यज-अन्त्यावसायी - दस्यू - म्लेच्छ, इन चार विभागों में से आदि के तीन भारतीय अवर्णविभाग निगमागमा-म्नायसम्मत लोकमान्यताओं के संग्राहक बनते हुए भी यदि वर्त्तमानयुग में मान्यताविरोधी वर्गों के . समतुलन में दुःखी - दीन - हीन - से प्रतीत हो रहे हैं, तो यह मान्यता का अपराध नहीं माना जा सकता | इस सम्पूर्ण दयनी दशा का एकमात्र उत्तरदायी है वह राज्यसत्तातन्त्र, जिसने अज्ञता से, किंवा स्वार्थसाधन के लिए भारतीय आस्तिक प्रजा की धार्मिक मान्यताओं को निगमागमाम्नाय से पृथक् कर दिया है । " राजा एव कालस्य कारणम् - इति ते संशयो माभूत् ” ( महाभारत ) । पिपीलिकाभ्यः - कीटपतङ्ग ेभ्यः - अन्तः सङ्गसत्त्वेभ्यः ( चींटी - कीट - पतङ्ग - वृक्षादि ) के लिए भी तुष्टि - तृप्ति के साधन - परिग्रह समुपस्थित करते रहने वाला आस्तिक भारतीय मानव, आनृशधर्म-परायण भारतीय हिन्दू मानव आज अपनी मूलाम्नायप्रतिष्ठा ( वेदप्रतिष्ठा ) से स्खलित होता हुआ, किंवा सत्तानुगत घातक राजनैतिकतन्त्र से लक्ष्यच्युत कर दिया हुआ आज अपनी शरीरयात्रा के निर्वाह में ' यों असमर्थ वन जायगा, यह क्या कम प्रायश्चित्त है इसके आम्नायविरोधरूप महतोमहीयान् 1 भारतीय मानव की शाश्वतनिष्ठा-कोई इसे अन्ध श्रद्धालु कह कर इसका उपहास कर रहा है, कोई इसे रुढिभक्त प्रमाणित कर रहा है, तो कोई विज्ञान - तर्क - युक्ति हेतुवादशून्य निरक्षरमूर्द्धन्य । ओर यह सनातन भारतीय मानव सब आक्रोशों को अवनतशिरस्क बना रहता हुआ तूष्णीं रूप से सहन करता हुआ मानो अपनी ' वृक्ष इत्र स्तब्ध: ' इस शाश्वतनिष्ठा को ही अभिव्यक्त कर रहा है । क्षणि कमदान्धजातियाँ प्रचण्डवेग से इस पर आक्रमण करतीं हुई कालान्तर में विनिष्ट होतीं रहीं । किन्तु यह अमृतपुत्र सनातन मानव अश्माखरणवत् अपनी निष्ठा पर आस्था - श्रद्धा पर हिमगिरिसम निश्चलता से निश्चल बना रहा, एवं निश्चल ही बना रहेगा, भले ही इसका वर्त्तमान विचलित माना जाता रहे । यह ( ३८७ वें पृष्ठ की टिप्पणी का शेषांश ) ( १ ) स्वायम्भुव ं श्रव्यमात्मपरायणाः- - मद्व्रताः -- मद्याजिनः ( २ ) पारमेष्ठ्य - महानात्मपरायणाः---- पितृकृताः – पितृयाजिनः ( ३ ) सौर--- विज्ञानात्मपरायणाः - - देववताः – देवयाजिनः ( ४ ) चान्द्रपार्थिवः- प्रज्ञानभूतात्मपरायणाः - भूतव्रताः — भूतेज्याः ३८८
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् ठीक है कि, वर्त्तमानयुग के भौतिक विज्ञानचाकचिक्य ने इसे कुछ समय के लिए प्रभावित कर लिया है । किन्तु जब भी यह अपने शाश्वत - नैगमिक विज्ञान की ओर, तद्रूपा देवविद्यादि की ओर दैवानुग्रह से आकर्षित हो पड़ेगा, तत्क्षण आत्मबोधपथारूढ बनता हुआ यह इस प्रभाव से अपने आपको अहिः कञ्चुकिवत् उन्मुक्त करता हुआ उभयलोक की समृद्धि - शान्ति का अनन्यभोक्ता बन जायगा, निश्चयेनबन जायगा, - निकट भविष्य में हीं बन जाने वाला है । अपनी विस्मृत उस ज्ञानविज्ञाननिधि की स्वाध्यायपरम्परा का अनुगमन करने के अव्यवहितोत्तर क्षण में हीं यह भारतीय मानव उस ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' का शाश्वत अधिकारी प्रमाणित हो जायगा, जिस नित्यविज्ञान का उपक्रम हुआ है ' वा ' से एवं उपराम हुआ है - ' प्राणब्रह्म ' पर । यही प्रारणब्रह्मात्मक प्राणविज्ञान इसे महा-प्राण बनाता हुआ इसे महाप्राणशक्ति से समन्वित कर देगा, जिसके अच्छेद्य - अदाह्य अक्लेद्य - अशोष्य-सनातनस्वरूप से प्रत्याहत होने वाली एक ही तटस्थ आलोचना नहीं, अपितु परमपराद्ध मिता आलोचना-परम्परा भी इसकी मान्यता का यत्किञ्चित भी अहित न कर सकेगी, इसी माङ्गलिक सनातन भावना के माध्यम से अब तक के सन्दर्भ से परोक्ष - प्रत्यक्षरूप से सर्वात्मना भी समाहित तटस्थ आलोचना वैखरी वागाय के द्वारा दो शब्दों में समाहित करते हुए यह प्रासङ्गिक अप्रिय चर्चा समाप्त की जाती है । भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण-भारतीय विज्ञान की दिशा का पूर्व में दिग्दर्शन कराते हुए यज्ञविज्ञान ' ' को ही नैगमिक विज्ञान घोषित किया गया है, जिसके गर्भ में खण्ड - खण्डात्मक असंख्य विज्ञान, एवं विज्ञानानुप्राणिता देव -विद्यामिका अवान्तर उपनिषत् ( रहस्यात्मिका मौलिक विद्याएँ ) समाविष्ट हैं । अनन्त असंख्य इन देव-विद्यात्मक खण्ड विज्ञानों में से अभी भारतीय मानव को - ' नायमात्मा - बलहीनेन लभ्यः स नैगमिक सिद्धान्त के अनुसार सर्वप्रथम निगमाम्नाय - परम्परानुगत वेदस्वाध्याय के द्वारा आत्मस्वरूपबोधोपयिक उस आध्यात्मिक विज्ञान के अनुशीलन में हीं सर्वतोभावेन प्रवृत्त हो जाना चाहिए, जिस आध्यात्मिक विज्ञान का उपक्रम - उपराम बिन्दु माना गया है- “ वाग्ब्रह्मानुगत - प्राणब्रह्म " । सर्वख़ण्डविज्ञानात्मक स्वायम्भुव ' सर्वहुत ' नामक ' यज्ञकाण्ड ' के माध्यम से पूर्व में ज भारतीय विज्ञानकाण्ड की स्वरूपदिशा का दिग्दर्शन कराया गया है, शब्दद्वयात्मिका तटस्थ - आलोचक-* “ तस्माद्यज्ञात् सर्व हुत ऋचः सामानि जज्ञिरे, छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात्, यजुस्तस्मा-दजायत् ” ( यजुःसंहिता ) । ब्रह्मवै स्वयम्भु तपोऽतप्यत । तत् सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुत्वा, भूतानि चात्मनि हुत्वा सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठ्य ं स्वाराज्यमाधिपत्यं पय्यैत् । स वा एष सर्वमेधः-सर्वहुत: - दशरात्रो यज्ञक्रतुर्भवति । परमो वा एष यज्ञक्रतूनां यत् सर्वमेधः - सर्वहुतः " । ( शत ० १३'७।३।१,२, ) । ३८६
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श्राद्धविज्ञान स्वरूपोद्बोधन के समाधानात्मिका आस्थाश्रद्धाशून्या अप्रियचर्चा से पहिले भारतीय मानव के नैगमिक भूतविज्ञान-लिए, साथ ही भूतविज्ञानवादी वर्त्तमान तटस्थ आलोचक की सर्वविनाशकारिणी ध्वंसात्मिका का माङ्गलिक-दृष्टि के अतिमानोद्बोधन के लिए आस्थित श्रद्धालु भारतीय की उस प्रिय विज्ञानचर्चा हितकर-संस्मरण दो शब्दों में अभिव्यक्त कर दिया जाता है, जिस आध्यात्मिकी श्रेयः प्रेयोभावात्मिका रुचिकर - प्रियचर्चा का स्वरूप विस्मृत कर सचमुच भारतीय श्रद्धालु ने अपना बहुत बड़ा अहित कर लिया है । - धि-पावन आध्यात्मिक चर्चा का स्वरूप - विश्लेषण हुआ है देवविद्यानिष्णात आधिदैविक भौतिक मन्त्रविज्ञाननिष्ठ देवर्षिनारद की अध्यात्मविज्ञानमूला पान जिज्ञासा के आधार पर विनिः-सृता तत् समय के अध्यात्मविज्ञाननिष्ठ सर्वविज्ञानज्ञाननिष्णात भगवान् ' सनत्कुमार ' महर्षि तत्पश्चर्या की वाणी के के द्वारा । देवर्षि नारद ने अनन्यनिष्ठा के द्वारा चिरकालिक स्वाध्याय - अनुशीलनात्मिका माध्यम से आधिभौतिक पार्थिव, एवं तन्मूलमूलभूत आधिदैविक सौर, दोनों यज्ञविद्याओं का, तदाधार-गायत्रीमात्रिक रूप ऋग्यजुःसामतत्त्वात्मक पार्थिव छन्दोमात्रिक वेद, एवं ऋग्यजुः सामतत्त्वमय सौर * के . वेदतत्त्व का स्वरूपबोध प्राप्त किया । और यों नारद ने द्यावापृथिव्य - सौरपार्थिव रोदसी - त्रैलोक्य अधिभूत - अधिदैवत यज्ञ का, तदनुगता सम्पूर्ण मन्त्रात्मिका देवविद्याओं का स्वरूपज्ञान प्राप्त कर अपनी ' देवर्षि ' अभिधा को अन्वर्थ बना लिया । अब नारद के अन्तःकरण में जिज्ञासा उत्पन्न हुई उस ' ब्रह्मर्षि ' पद के स्वरूपबोध की, जिस ब्रह्मर्षिपद का अधिष्ठान माना गया है अधिभूत - अधिदैवतमूलरूप किंवा सर्व मूलभूत अध्यात्मविज्ञान | इसके स्वरूपबोध के लिए ही न रद समिध ग्रहण कर ब्रह्मर्षि सनत्कुमार के सम्मुख प्रभाव से विधिवत् ÷ उपसन्न होते हुए कहने लगते हैं -' अधीहि भगव! ( भगवन्! ) इति होपससाद सनत्कुमारं नारदः ' * " यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थं, ता ऋचः, स ऋचां लोकः । अथ यदेतदचिर्दी-प्यते - तन्महावतं, तानि सामानि स साम्नां लोकः । अथ य एतस्मिन् मण्डले पुरुषः - सोऽग्निः, तानि यजूंषि, स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या - गायत्रीमात्रिक वेदतत्त्वरूपा - तपति - योऽसौ-सूर्य्यः । तद्वैतदप्यविद्वांस आहु: ( मूर्खाः - लौकिका अपि जानन्तिस्म तद्य गे, यत् - सूर्य्यः खलु त्रयीविद्यात्मकः - का कथा तद्य गानुगतानां तत्त्वविदुषाम् ) - ' त्रयी वा एषा विद्या तपति ' इति । ' वा ' हैव तत् पश्यन्ती वदति " ( शत ० १० ५२ १,२,। ) । + सार्द्ध दशाङ्गुलमित ( १० | | अङ्गुलपरिमित ) आध्यात्मिकप्राण - समिन्धन की प्रतीकभूता तत्परि-मारणरूपा ही प्रादेशमिता ' समिधा ' हाथ में लेकर ही पुरायुगे जिज्ञासू शिष्य आचार्य के सम्मुख प्रणतभाव से उपस्थित होता हुआ अपनी जिज्ञासा अभिव्यक्त किया करता था । ३६०
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् पाणी देवर्षि नारद से नैष्ठिक ब्रह्मचारी वीतराग ब्रह्मर्षि सनत्कुमार ने प्रश्न किया कि, ' यद्वत्थ, तेन मोपसीद । तत ऊर्ध्वं वक्ष्यामि इति । तात्पर्य, ' अब तक तुमने जो कुछ अध्ययन किया है, उसका स्वरूप अभिव्यक्त करो । तब मैं तुम्हें उससे आगे का स्वाध्याय बतलाऊँगा । नारद अपनी पति विद्याों की तालिका सनतकुमार के सम्मुख अभिव्यक्त करते हुए कहने लगे किं-“ भगवन्! मैंने ऋग् - य्जुः साम - अथर्व - इतिहासपुराण- पित्र्यराशि - देवनिधि - वाकोवाक्य- एकायन-देवविद्या ( आत्मक्षरविद्या - सौर विद्या ) - ब्रह्मविद्या । क्षरविद्या- पार्थिव विद्या - ( चान्द्र विद्या ) - क्षत्रविद्या-नक्षत्रविद्या - सर्पदेवजनविद्या ' - इत्यादि सम्पूर्ण ( आधिदैविक- आधिभौतिक, सौर पार्थिव ) विद्याओं का स्वरूप जान लिया है " । अपनी ज्ञात - विज्ञात विद्यातालिका उद्धृत करने के अनन्तर नारद कहने लगते हैं, " भगवन्! मैं केवल ' मन्त्रवित् ' ( वा ब्रह्मात्मिका शब्दविद्यावित् ) ही हूँ | मैंने अभी तक अध्यात्मस्वरूप नहीं प्राप्त किया है । आप जैसे ब्रह्मर्षि आत्मवेत्ताओं से ऐसा सुनता रहा हूँ कि, आत्मस्वरूपबोध प्राप्त किये बिना मानव शान्तिरूप शोक से सन्त्राण नहीं प्राप्त कर सकता । इसी आत्मबोध के अभाव से ओर सब कुछ ( दैवत - भौतिक बिद्याएँ ) जानता हुआ भी मैं नैष्ठिकी आत्मशान्ति प्राप्त नहीं कर सका हूँ । किन्तु मुझे विश्वास है कि, आप अवश्य ही मुझे शोकसागर से पार लगा देंगे ” । सनत्कुमार कहने लगे, " ठीक है नारद! वास्तव में आत्मस्वरूपबोध के बिना शोकसन्तरण सम्भव नहीं है । अब तक तुमनें जो कुछ पढ़ा और जाना है, वह तो केवल अध्यात्म का सर्वथा बाह्य भौतिक ' नामात्मक ' स्वरूप ही है । यही नामभावात्मक दैविक - भौतिकविज्ञान से जो भी लौकिक पारलौकिक फल मिलनें चाहिएँ, अवश्य मिल जाते हैं । किन्तु ये सब फल - प्लवा ह्यते श्रद्धा यज्ञरूपाः ' इत्यादि के अनुसार नश्वर हैं । अतएव इन नामात्मक विज्ञानों से कदापि शाश्वत शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती । शान्ति प्राप्त होती है उससे, जो इन सम्पूर्ण नामभावों का - - दैविक भौतिक सौर पार्थिव खण्ड - खण्डात्मक - यज्ञविज्ञानों का - वारपारीण एक आलम्बन - आधार - अधिष्ठान है, अतएव जो इन नामभावात्मक दैविक - भौतिक-विज्ञानों की अपेक्षा महतो महीयान् है " । बाग्ब्रह्म ही नामप्रपञ्च का सर्वाधार है, जो ' वषट्कार ' रूप से ' यावद्ब्रह्मविष्टितं - तावती वाक् ' रूप से भूकेन्द्र से आरम्भ कर स्वायम्भुव परमाकाशपर्यन्त समुद्ररूप से अभिव्याप्त है । इसी वाक्-समुद्र में सम्पूर्ण नाम ( नामभावात्मक आधिदैविक सौर- आधिभौतिक पार्थिव विश्व ) प्रतिष्ठित है । देवता - असुर - राक्षस - गन्धर्व्व - सब कुछ, सम्पूर्ण वर अचर प्रपञ्च इसी लोकवेदसमन्विता साहस्री -वाकू पर प्रतिष्ठित हैं । इसी वाक् की स्तुति करते हुए ऋषि ने कहा है-१ – सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा महिमानः सहस्रं यावद्ब्रह्मविष्टितं तावती वाक् ॥ किं तत् सहस्रमिति?, इमे लोका: -- इमे वेदा: -अथो वागिति ब्रूयात् ।
२ – वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
वाचमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥
३ - वागतरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माता अमृतस्य नाभिः ।
सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मे ऽस्तु ॥
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, श्राद्धविज्ञान इस वा ब्रह्म से ही अध्यात्मविज्ञान का उपक्रम किया भगवान् सनत्कुमार ने । अनन्तर क्रमशः सूक्ष्म आध्यात्मिक पत्रों का स्वरूप अभिव्यक्त करते हुए सर्वान्त में सनत्कुमार ने ' प्राणब्रह्म ' को उपराम वाते हुए यह ' अध्यात्मविज्ञान ' दिशा नारद के सम्मुख रखी । वाग्ब्रह्म का आधार ' मनोब्रा ', इसका आधार- ' संकल्पब्रह्म ', तदाधार ' चित्तब्रह्म ', तदाधार ' ध्यानब्रह्म ', तदाधार ' विज्ञान ब्रह्म ', तदाधार ' बलब्रह्म ', तदाधार ' ब्रह्म ', तदाधार ' आपोत्र ( भृखङ्गिरोब्रह्म ), तदाधार ' तेजोब्रह्म ', तदाधार ' आकाशब्रह्म ', तदाधार ' स्मरब्रह्म ', तदाधार ' आशा ', एवं सर्वान्त का सर्वाधार वाकू-शरीरी ' प्राणब्रह्म ', इस प्रकार वाग्ब्रह्म से आरम्भ कर प्राण ब्रह्मपर्यन्त इस अध्यात्मविज्ञान के सम्भूय चतुर्दश विभाग हो जाते हैं । जिस प्रकार चान्द्र - पाथिवसर्गे चतुद्दशविध है, तथैष अध्यात्मसर्ग भी इस प्रकार चतुर्द्ध शविध ही बना हुआ है । रहस्यपूर्ण छान्दोग्योपषित के इस चतुर्दशविध आत्मसर्ग का स्वरूप भारतीय द्विजाति को आत्मस्वरूप बोध के लिए अवश्य ही जान लेना चाहिए । , अध्यात्म - अधिभूत - अधिदैवत, तीनों की मूलप्रतिष्ठा अध्यात्मविज्ञानोपक्रमरूपा वाग्देवी ही है, जिसका ऋग्वेद के ' आम्भृणीसूक्त ' में विस्तार से उपबृ हरण हुआ है । भगवान् ऐतरेय के - ' सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था ' इस वाक्य को समन्वय करने पर हमें तीनों विज्ञानतन्त्रों के समसंख्यासमन्वय से आश्चर्य्यविभोर हो जाना पड़ता है । १५ उक्थ सहस्र महिमात्र में | परिणत हो रहे हैं तीन स्थानों में । वेदस्थान, लोकस्थान, वाकस्थान, तीनों क्रमश: अधिदैवत- अधिभूत - अध्यात्मविवर्त्त हैं । तीनों के लिए ही पूर्वोपात्त मन्त्र में - " किं तत् सहस्रमिति?, इमे वेदाः, इमे लोकाः, अथो वाक् इति ब्रूयात् " यह कहा गया है । वेदसाहस्री, लोकसाहस्री, वाकसाहस्त्री से समन्वित, पञ्चदश उक्थ ( १५ उक्थ ) जिस: महतो महीयान् अणोरणीमान् सर्वेश्वर में ' अरा रथनाभौ इ ' अर्पित हैं, वही ' महदुक्थ ' है, जिसके आधार पर ' उक्थवैराजिक ' नाम की मानवानुगता अध्यात्मबोधविद्या प्रतिष्ठित हुई है । समष्टि-व्यष्टिरूप से यह साहस्रीत्रयी पञ्चदश- पञ्चदशं पञ्चदश- संख्याओं में विभक्त है, जिनमें १-१-१ संख्या समभाव की सूचिका है, एवं १४-१४-१४ संख्याएँ व्यष्टिभाव की सूचिकाएँ हैं । वेदसाहस्री रूप-पञ्चदशोक्थलक्षण आधिदैविकसर्ग भी समष्टिव्यष्टिरूप से १५ भागों में विभक्त है । लोकसाहस्रीरूप आधिभौतिकस भी इन्ही भागों में, एवं वाक्साहस्रीरूप आध्यात्मिकसर्ग भी इह्रीं भागों में विभक्त है । इसी समसमन्वय के आधार पर हम इन तीनों सर्गों के सम्बन्ध में यह कह सकते हैं कि-( १ ) - चतुद्दशविध एव अध्यात्मसर्गः. ( आत्मसर्गः ) । ( २ ) - चतुद्दशविध एव अधिदैवत सर्गः ( देवसर्गः ) । ( ३ ) - चतुद्दशविध एव अधिभूतसर्ग: ( भूतसर्गः ) । त्रिकाण्डात्मक यही त्रिविध विज्ञ न भारतीय विज्ञान है, जो सहस्रवल्शामूर्त्ति ' ब्रह्माश्वत्थ ' के धार पर प्रतिष्ठित है । समतुलनभावानुरक्त मानव की सुविधा के लिए यहाँ इस सर्गत्रयी की तालिका-मात्र उद्धत करदी जाती है, जिसके आधार पर वह नैगमिक मानव विज्ञानस्वाध्याय में सुविधापूर्वक प्रवृत्त हो सकता है । * इसी नैगमिकाम्नाय के आधार पर संकल्पित मानवाश्रमविद्यापीठ का नैगमिक सर्वथा परोक्ष नामकरण संस्कार हुआ । है- ' मानवोक्थवैराजिकब्रह्मौद्य ' । ३६२.
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् १ २ वेदसाहस्री २ १ ११ - षोडषी अव्ययः- १- षोडशकलः- १ - षोडशकलोपेतः - ३ ३ लोकसाही ३ १ ३ पञ्चदशः १ अक्षरः - पञ्चदशः ' क्षरः- पञ्चदशः ३ 9. - प्राणब्रह्म १ १ - सूत्रब्रह्म २ १ - ब्रह्मब्रह्म ३ ३ २ - शात्रह्म २ - नियतिव्रह्म २- प्रजापतिब्रह्म ३ ४ १ ३ - स्मरत्र झ २ ३ - अत्रिब्रह्म .३ ३- इन्द्रब्रह्म ३ ५ १ २. ३ ईशावास्यामिदं सर्वं ६ - पोब्रह्म यत् १ किञ्च जगत्यां जगत् । १०- ध्यानब्रह्म तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा : - मा गृधः कस्य स्विद्धनम् || ४ - आकाशब्रह्म ४ - श्रङ्गिराब्रह्म ४ - पितृब्रह्म ३ ६ १ २ ३ ५- - तेजोब्रह्म १ ५- भृगुब्रह्म ५ गन्धर्वब्रह्म ३ ७ २ ३ ७ - अन्नब्रह्म १ ८-- बलब्रह्म १ ६ - आयुर्ब्रह्म ६ - यक्षब्रह्म ३ २ ३ ७ - गौत्रह्म ७- मानवब्रह्म ३ २ ३ = - ज्योतिर्ब्रह्म पिशाचब्रह्म ३ १० ३ ६ - विज्ञान ब्रह्म ६ - यशोब्रह्म ६ - राक्षसब्रह्म ३ ११ १ २ १०- श्रद्धा ब्रह्य ३ १०- पशुब्रह्म ३ १२ १ ३ ११- चित्तब्रह्म ११ - रेतीब्रह्म ११- पक्षिब्रह्म ३ १३ 7 १ १२- संकल्पब्रह्म 9 ३ १२ - द्यौ ब्रह्म १२ - कीटनह्य ३ १४ १ २ ३ १३ - मनोब्रह्म १३ - गौब्रह्म १ १४- वागब्रह्म २ १४- वाग्ब्रह्म १३ कृमिब्रह्म ३ ३ १५ १४ - स्तम्ब ब्रह्म ३ १६ चतुद्दशविधः आत्मसर्गः अध्यात्मम् ञ्चदशान्युक्था चतुद्दशविधः देवसर्गः पञ्चदशान्युक्था चतुर्दशविधः भूतसर्गः अधिदैवतम् अधिभूतम ३६३ । जगत् कलं पञ्चदशान्युक्थाः = ४ षोडशीपुरुषः । विश्वा || षोडशी भुवनानि स सचते श्राविवेश य ज्योतींषि : -जात अस्ति परो संरराणस्त्रीणि न प्रजया यस्मादन्यो प्रजापतिः
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आलोचनासमाधानोपराम-श्राद्धविज्ञान मानव ने अपना स्थानपरिचय प्राप्त किया । इस स्वात्मानुगत - श्रात्मानुगत -- सुपरिचित पूर्वोक्त चार स्थानों में अपने आपको संन्यास- वानप्रस्थ -- गृहस्थ-- लोकतन्त्र में प्रतिष्ठित किया, एवं तदनुपात से ही औपनिषद आरण्यक ब्राह्मणभागानुगत, तथा लोकमान्यतात्मक चतुर्विध पथों पर व्यवस्थितरूप से अपने आपको मर्यादित किया सर्वथा सहज रूप से । एवंविध व्यवस्थित मर्यादित -मान्यतानुगत परिपूर्ण मानव क्या कभी श्री - समृद्धि - शान्ति - तुष्टि पुष्टि से वञ्चित रह सकता है । ऐसा मात्र तो जिस वातावरण में विचरण करता है, जहाँ निवास करता है, वहाँ सर्वसमृद्धि अयाचित रूप से सुप्रतिष्ठित हो जाती है | जिसे आज का आलोचक समृद्धि - सुख कहता है, वह तो है प्रकृत्या पशुधर्म्म, अमर्यादिता इन्द्रियपरायणता । ऐसी आसुरवृत्ति- पशुवृत्ति ही जब सर्वश्रेष्ठ जेष्ठ अनिष्ट है, तो इससे अधिक इसका क्या अनिष्ट होगा । पाषाणलोट सम- जड़वत् आत्मस्वरू वेस्मृत पशुओं पर भूत-बाधा क्यों होने लगी. जबकि ये स्वयं ही भूतयोनि कं ' चरितार्थ कर रहे हैं । श्वेत - स्वच्छ वस्त्र पर ही मलिनता का आक्रमण प्राकृतिक है । कृष्ण मलिनवस्त्र पर मलिनता क्या आक्रमण करेगी । मर्य्यादा-शील के लिए ही पतनभय प्राकृ तक माना जायगा । उन्मय्र्याद मानव को पतन से भय होगा ही क्यों । एक ओर का ऋषिसंस्थान यदि अभयपद है, तो दूसरी ओर का विमूढ़ श्रासुरमानव भी अभयपद ही माना जायगा । वह आत्मबोध द्वारा अभयपदारूढ़ है, तो यह आत्मस्वरूपविस्मृति के द्वारा अभय-निर्भय बनता हुआ स्वैराचारपरायण है, स्वच्छन्द विचरणशील है । भय है अस्मदादि सदृश मध्यस्थ गृहस्थ मानव को, जिसे निगमाम्नायनिष्ठा प्राप्ति के लिए, आस्था श्रद्धा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए, ' श्रद्धा च नो माव्यगमत् ' भय से एवं लोकसंग्रहधिया निगमाम्नायानुगता लोकमान्यताओं का गतानुगतिक बनना ही पड़ता है, बनना ही चाहिए । यही है एकमात्र समाधान उन तटस्थ आलोचकों की तटस्थ आलोचना का, जिससे वे सन्तुष्ट हों, अथवा न हों, इसकी हमें अणुमात्र भी चिन्ता नहीं है | हमारा तो एकमात्र लक्ष्य है श्रद्धापूर्वक निगमागमाम्नायसम्मत लोकमान्यताओं का लोक-संग्रहविधा अनुगमन, जिसके आधार पर प्रस्तुत नैगमिक निबन्ध में हमनें ' महासङ्गीत ' माध्यम से पितृकर्मानुबन्धिनी- रात्रिजागरणरूपा पितृकर्ममान्यता को मान्यता प्रदान करना अनिवार्य माना है । समाप्ता चेयं प्रासङ्गिकी तटस्थालोचकस्य - तटस्थसमाधानपरम्परा सामयिकी X
* यश्च मूढतमो लोके, यश्च बुद्धेः परङ्गतः ।
arda सुखमेधे क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् पुनः प्रकृतानुसरण, एवं सन्दर्भसङ्गति-' ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' नामक प्रक्रान्त द्वितीय परिच्छेद के सपिण्डीकरणात्मक आनृ-एयभाव, प्रजोत्पादनात्मक आनृण्यभाव, पार्वणश्राद्धादिरूप आनृण्यभाव, इन तीन आनृण्यकम्र्म्मो के स्वरूपविश्लेषण के अनन्तर ( पृष्ठ सं ० ८५ से १८ पृष्ठ पर्य्यन्त ) पार्थिव प्र ेतरूप औपपातिक महा-नात्मा के बन्धनविमोक से सम्बन्ध रखने वाले क्रमप्राप्त चतुर्थ ' गया श्राद्धानुगत श्रानृण्यभाव ' नामक अवान्तर प्रकरण का उपक्रम हुआ । पृष्ठ १८२ से १८८ पर्यन्त गया श्राद्ध के वैज्ञानिक स्वरूप का दिग्-दर्शन कराया गया । इसी प्रसङ्ग में लोकमान्यतात्मक गृह्य तपितरसन्तर्पक - रात्रिजागरणात्मक वह प्रास-ङ्गिक प्रकरण उपस्थित हो गया, जिसकी लोकमान्यता के सम्बन्ध में आस्तिकप्रजा का वर्त्तमान में विमोहन देखा सुना गया है । जिस नैगमिक आम्नायपरम्परा को मूल आधार बना कर इस लोकमा -न्यता को लोकसंग्रबुद्धा नैगमिक नैष्ठिक विद्वानोंनें लोकमान्या घोषित किया था, परप्रतारकों के निम-हानुग्रह से उसमें अनेक प्रकार की निगमविरुद्ध मान्यताओं का समावेश हो गया । फलस्वरूप लोक-परिवार की इष्टसाधनता के स्थान में यह लोकमान्यतात्मक पितृसन्तपर्ण कम्मे अनिष्ट का कारण बन गया, जिसका गया श्राद्धाधारभूत पार्थिव औपपातिक महानात्मा की सामयिक तृप्ति से सम्बन्ध माना गया । है | प्रक्रान्त चतुर्थ गया श्राद्धानुगत आनृण्यकर्म्म प्रकरण के मध्य में ही इस प्रासङ्गिक लोककर्म्म का ' तृणस्पर्शन्याय ' से समावेश कराना अनिवार्य्य समझ लिया गया । " कुलस्त्रियों के प्रास-ङ्गिक महासङ्गीत की पावन स्मृति " नाम से यह प्रासङ्गिक प्रकरण पृष्ठ संख्या १८६ से २६४ पृष्ठ पर्यन्त उपवर्णित हुआ । भारतीय नैगमिक शास्त्रीय विधिविधानों पर तन्मूलाधारत्वेन प्रतिष्ठित निगमाम्नायानुप्राणित लोकमान्यताओं पर भारतीय शास्त्र- लोकसूत्रों से सर्वथा अपरिचित तटस्थ आलोचनों की ओर से जो निर्मम कटु आलोचना- परम्परा वर्त्तमान में श्रुत उपश्रुत है, प्रसङ्गोपात्त उसका स्वरूप परिचय, एवं निराकरण भी अनिवार्य बन गया । अतएव महासङ्गीत की प्रासङ्गिक पावन स्मृति के अनन्तर ही " पावनस्मृति के सम्बन्ध में प्रासङ्गिकी तटस्थ आलोचना, और तत् - समाधान " नाम से इस अवान्तर प्रकरण का भी उसी तृणस्पर्शन्यायमाध्यम से समावेश करना अनिवार्य मान लिया गया, जिस अनिवार्यता की पूर्ति पृष्ठ संख्या २६४ से आरम्भ कर पृष्ठ संख्या ३६४ पर्य्यन्त समन्वित बनी । संस्कृत साहित्य में ' ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति ' न्याय सुप्रसिद्ध है, जिसका तात्पर्य स्पष्ट है | ग्रामयात्रा करता हुआ पथिक मार्ग में आगत समागत वृक्ष - लता - गुल्म - तृणादि का भी कौतूहल रूप अन्वेषण स्पर्शादि करता जाता है । मुख्य उद्देश्य ग्रामगमनानुगत पथसन्तरण ही है । किन्तु मध्ये मध्ये प्रसङ्गरूपेण समागत तृणादिस्पर्श भी इसके कौतहुलात्मक गौण उद्देश्य बनते जाते हैं । ३६५
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श्राद्धविज्ञान यह है सन्दर्भसङ्गति, जिसके अनन्तर मुख्यप्रतिपाद्यरूप गया श्राद्धकर्म के शेष निरूपणीय विषय का दिग्दर्शन कराता हुआ ‘ ऋणमोचनोपायोपनिषत् ' नामक द्वितीय परिच्छेद उपरत हो रहा है । पपातिक प्रेतात्मबन्धन विमोचक गया श्राद्ध-प्रकृत गया श्राद्ध से इन आगन्तुक पितरों की सुक्ति हो जाती है । यह स्मरण रखना चाहिए कि,. पार्वणादि श्राद्ध जहाँ केवल स्व पितरों की ही मुक्ति के कारण बनते हैं, वहाँ गया श्राद्धकर्त्ता स्वागन्तुक पितरों के बन्धन- विमोक के साथ साथ अन्यों की भी विमुक्ति का निमित्त बन सकता है । स्थानविशेष माहात्म्य से आस - पड़ौस के बन्धु बान्धवों के प्र ेतात्मा आशोन्मुख बन कर श्मशानपरिक्रमा के साथ ही गया श्राद्धकर्त्ता के अनुगामी बन जाते हैं । स्वप्न में अपने लिए याञ्चा करते हैं । एवं यह इन का भी सन्तोष कर सकता है, करना चाहिए । क्षेत्र का वैज्ञानिक स्वरूपपरिचय -उक्त ‘ गयाश्राद्ध ' कर्म्म के लिए ऋषियोंनें सुप्रसिद्ध ' गया ' स्थान ही उपयुक्त माना है, जि सके कई एक प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष कारण हैं । भौगोलिक विद्वानों को विदित है कि, गयास्थान सुप्रसिद्ध ' फल्गु -नदी ' के सम्बन्ध से तीर्थ बन रहा है, एवं पितरप्राण के साम्राज्य से क्षेत्र बन रहा है । इस प्रकार यह स्थान ' गयातीर्थ ' भी है, ' गया क्षेत्र ' भी है । फल्गुनी नक्षत्रप्राण के सम्बन्ध से ही यह नदी फल्गु कहलाई है । तत्तत् पदार्थविशेषों में जो एक प्रकार का श्लथभाव उपलब्ध होता है, वह इसी नाक्षत्रिक प्राण का माहात्म्य है | तूल ( रुई ), भुर्भु र पाषाण, श्लथावयव शर्करा, आदि इसी प्रारण से युक्त हैं । जातिविशेष के पाषाण भी इसी प्राणसमन्वय से कालान्तर में सर्वथा रेलथावयव ( फोसरे ) बन जाते हैं । रथभाव ही फल्गु है, फल्गुभावसम्पादन से ही यह नक्षत्र ' फल्गुनी ' कहलाया है, जिस का निम्न लिखित शब्दों में उपवर्णन हुआ है-" गवां पतिः फल्गुनीनामसि त्वं तदर्य्यमन् वरुण मित्र चारु । तं त्वा वयं सनितारं सनीनां जीवा जीवन्तमुपसंविशेम || ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ) फल्गुभावसम्पादक फल्गुनी नक्षत्रप्राणातिशय से ही यह नदी ' फल्गु ' कहलाई है । गङ्गा-यमुना - सरस्वती - गोदावरी - नर्मदा- सरयू आदि नदियाँ तत्तत्प्राणातिशय - सम्बन्ध से ही तत्तत् नामों से व्यवहृत हुईं हैं । इस जलातिशय से ही वह प्रदेश ' तीर्थ ' कहलाया है । एवं भूमि के सम्बन्ध से वह ' क्षेत्र ' कहलाता है । जिस प्रदेश में जो कार्य्यं चिरकाल पर्यन्त हो जाता है, वहाँ उस कार्य का अनुशय ( प्राणरूप से ) प्रतिष्ठित हो जाता है । यदि किसी प्रदेश में कोई तपस्वी चिरकाल पर्यन्त तपोसाधन करते रहते हैं, तो उनका विभूतिप्रारण विभूति-ते - सम्बन्ध से तत् प्रदेश के करण करण में अन्तर्याम-सम्बन्ध से व्याप्त हो जाता है । इसी तपःप्राण- प्रभाव से वहाँ का वातावरण शान्त- निरापद बन जाता ३६६