Part III Mahamanglik pitrswarup — पृष्ठ 461–470
महामाङ्गलिक पितृ स्वरूप आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री ३ · पृष्ठ 461–470
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ऋणमोचनोपायोपनिषत् है | हिं ऐसे स्थानों में अपना सहज वैर छोड़ देते हैं । कलुषितान्तःकरण मनुष्य भी ऐसे स्थान पर पहुँच कर शान्तिलाभ करने में समर्थ हो जाता है । ऐसे पवित्र भूप्रदेश ही शास्त्र में ' क्षेत्र ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । वाराणसी का भूप्रदेश पवित्र है । गङ्गातोय ब्रह्म का साक्षात् द्रवरूप है, अतएव यह क्षेत्र भी है, तीर्थ भी है । परन्तु कुरुक्षेत्र केवल क्षेत्र ही है । गयास्थान गयाप्राण के सम्बन्ध से क्षेत्र भी है, फल्गु नदी के सम्बन्ध से तीर्थ भी है । हमें प्रेतात्मा का बन्धन - विमोक अभीष्ट हैं | फल्गुभाव इसी इष्टसिद्धि का सहायक है । वह यहाँ पल्गु नदी के अनुग्रह से प्रकृत्या प्राप्त है । इन्हीं सब कारणों से गयाश्राद्ध के लिए यही स्थान उपयुक्त माना गया है । परन्तु ये सब सिद्धान्त हैं किन के लिए?, कौन इन पर विश्वास करेगा?, उत्तर- ' श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' यही भगवद्वचन है । आस्तिक श्रद्धालुओं के लिए जहाँ केवल आप्त वचन हीं पर्याप्त है, वहाँ नास्तिक - श्रद्धाशून्य अभिनिविष्टों का अनुरञ्जन स्वयं ब्रह्मा से भी सम्भव नहीं है । महानात्मा के लिए होने वाला गयाश्राद्ध इस औपपातिक महानात्मा की भी मुक्ति का कारण बन जाता है, एवं परम्परया कम्र्मात्मबन्धनासक्तिविमोक का कारण भी बन जाता है, यह कहा गया है । यदि जीवनदशा में हीं कम्म माने विदेहभाव प्राप्त कर लिया, तो ऐसे मुक्तात्मा के लिए गया श्राद्ध एकान्ततः अन-पेक्षित बन जाता है । शास्त्रविहित निवृत्तिमुलक निष्कामकर्मी के सम्यगनुष्ठान से कर्मात्मा का विद्या-रूप ज्ञानाग्नि प्रज्वलित हो पड़ता है । यह प्रज्वलित ज्ञानाग्नि- ' सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते ' सिद्धान्तानुसार कम्र्मात्मा के प्राज्ञ भाग पर प्रतिष्ठित भावना - वासनात्मक सम्पूर्ण सञ्चित कम्र्म्मो को. निःशेषकर डालता है । ऐसा निष्कामयोगी, गीतापरिभाषानुसार बुद्धियोगी इस प्रकार ज्ञानाग्निप्रभाव से निर्धूतकिल्विष बनता हुआ विदेहभाव प्राप्त कर सर्वबन्धनविमोक - प्रभाव से अन्तकाल में-' ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति, न स पुनरावर्त्तते, न स पुनरावर्त्तते ' । दूसरा उपाय है - योगमार्ग । योगी कायाकल्प के द्वारा एक ही क्षण में अनेक शरीर धारण कर सर्वकर्म्मभुक्ति का अनुगामी बनता हुआ मुक्त हो जाता है । उक्त लक्षण ज्ञानानि केवल सञ्चित कम्र्मापाय में हीं समर्थ है । प्रक्रान्त कर्म्मव्यूह को सहस्र ज्ञानाग्नि भी क्षीण नहीं कर सकते । कारण स्पष्ट है । एक व्याध मृग पर बाण चलाने के लिए सन्नद्ध खड़ा है । यदि आपने प्रक्षेप से पहिले उसे उपहृत कर लिया, तब तो मृगरक्षा सम्भव है । यदि तीर उसके हाथ से निकल गया, तो फिर कोई उपाय नहीं है । इस दशा में केवल तूणीर के शेष बाणों को अपहृत कर आप आगे का हिंसाकर्म्म अवरुद्ध कर सकते हैं । ठीक यही अवस्था कर्मव्यूह की है । जो व्यूह चल पड़ा, उसका निरोध असम्भव है - जैसा कि -' प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः ' से स्पष्ट है । योगी लोगों को इसी प्रारब्धकर्मभुक्ति के लिए कायाकल्प का अनुगमन करना पड़ता है । ३६७
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श्राद्धविज्ञान उधर एक विदेहमुक्त निष्कामयोगी को प्रारब्ध कर्मानुसार अवश्य ही सुख - दुःखादि द्वन्द्वों, का अनुगमन करना पड़ता है । हाँ, इस सम्बन्ध में यह अवश्य कहना पड़ेगा कि, एक निष्कामयोगी का अभिक्रमरूप प्रारब्धकर्म्म नष्ट न होता हुआ भी उसके आत्मप्रत्यवाय का कारण नहीं बनता । बड़े बड़े तपस्वी प्रारद्रधकर्म्मवश शरीरपीड़ा भोगते हैं, परन्तु विश्वास कीजिए, उन तपस्वियों का आध्यात्मिक जगत् इस से अणुमात्र भी क्षुब्ध नहीं होता । ये सदा सब अवस्थाओं में- ' पूर्यमाणमचलप्रतिष्ठम् ' इस वृत्ति के अनुगामी बनें रहते हैं । इनकी इसी वृत्ति स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए भगवान्
कहा है--नेहाभिकमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
-गीता सम्पूर्ण दर्शन, सम्पूर्ण उपनिषत, तदनुगत गीताशास्त्र कम्र्मात्मा के बन्धनविमोक के बुद्धि-योगात्मक इसी मार्ग का प्रदर्शन कर रहे हैं । उन सबका निष्कर्षभूत निम्न लिखित मन्त्र हमारे सम्मुख
उपस्थित हो रहा है-" कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यतो S ति न कर्म्म लिप्यते नरे " ॥
- ईशोपनिषत् “ सांसारिक द्वन्द्वों का भार इन्द्रियों पर डालते हुए, सर्वभूतहितरति का अनुगमन करते हुए, लोक - राज - कुल- आचार - व्यवहार आदि धम्म का सम्यक् अनुष्ठान करते हुए, किसी से उद्वेग न करते हुए शास्त्रोक्त - तत्तद्वर्णानुगत यज्ञ - तपोदानादि तत्तत्कम्मों का आसक्तिरहित बन कर जरामर्य्यसत्रनामक अग्निहोत्रवत् यावज्जीवन अनुगमन करना ही कर्मात्मबन्धनविमोक का अव्यर्थ उपाय है " - मन्त्र का यही निष्कर्षार्थ है । तात्पर्य्य - ऐसे कर्मात्मा के लिए गया श्राद्ध की कोई आवश्यकता नहीं है । ऐसे मुक्तात्मा का भी पार्वणादिश्राद्ध प्रत्येक दशा में अपेक्षित है । श्राद्धद्वारा प्रेतपितर की तृप्तं-सामान्य कर्मात्मा अवश्यमेव आगन्तुक महान् से युक्त रहता है । अतः उसके लिए अवश्य श्राद्ध विधेय है । शास्त्ररहस्यानभिज्ञ तीर्थगुरुओं ( पण्डों ) के स्वार्थमय आदेशानुग्रह से साधारण जनता में आज यह भ्रम फैला हुआ है कि, “ गया श्राद्ध से हमारे सब पितर मुक्त होगए । हमनें पाली करा दी । अतः व पार्वणादि श्राद्धों की कोई आवश्यकता नहीं है " । दुःख है कि, अज्ञानतावश यह भूल आज पुष्पित- पल्लवित हो रही है । वे भूल जाते हैं कि- श्राद्ध, तथा ३६८
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+ ऋणमोचनोपायोपनिषत् गयाश्राद्ध, दोनों के लक्षीभूत पितर भिन्न भिन्न हैं । पार्वणादि श्राद्ध होता है - चान्द्रलोकस्थ उन पितरों के लिए, जो सातपुरुषपर्य्यन्त अपनी व्याप्ति रखते हैं । गयाश्राद्ध होता है - कम्र्मात्मानुगत उन पितरों के लिए, जो आगन्तुक हैं । इस कम्मं से केवल इसकी मुक्ति सम्भव है । प्रजातन्तुप्रवर्त्तक चान्द्र पितर तो दधिपत सपिण्डता है, तदवधिपर्य्यन्त के लिए बद्ध हैं । सातवीं सन्तति से आठवें परपुरुष का बन्धन - विमोक होता है । यदवधिपर्यन्त चान्द्रप्रेतपितरों का एक भी सहः पिण्ड तन्यरूप से भूमि पर सन्तान में प्रतिष्ठित है, तदवधिपर्यन्त पिण्डलालसा अनिवार्य है । एवं तदवधिपर्यन्त श्राद्धकर्म भी अनिवार्य है । इति - गया श्राद्धात्मकं चतुर्थमानृएयं कर्म ४ * - द्वितीयपरिच्छेदोपसंहार-ऋणरूप से प्राप्त ५६ कलाओं में से ३५ से आनृण्यभाव प्राप्त करने के लिए प्रजोत्पादन कर्म्म आवश्यक है, शेष २१ ऋणकलाओं के परिशोध के लिए सपिण्डीकरण स्वतः सिद्ध है, चान्द्रलोक-स्थ प्र ेतपिण्डतृप्ति के लिए पार्वणादि श्राद्धकर्म अपेक्षित है, प्र ेत - कर्मात्मानुगत आगन्तुक - औपपातिक महानात्ममुक्ति के लिए, एवं परम्परया कम्र्मात्मबन्धविमोक के लिए ' गयाश्राद्ध ' अपेक्षित है, आवश्यकतम है | इन चारों आनृण्यकम्मों की मूलप्रतिष्ठा प्रजातन्तुवितान ( पुत्रपौत्रादिरूप वंशवितान ) ही माना गया है । इसी आधार पर श्राचार्य कहते हैं-१ - ' एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्य कोऽपि गयां व्रजेत् । यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥
२ - पुत्रेण सुतः कार्य्यो यादृक् तादृक् प्रयत्नतः ।
पिण्डोदकक्रियाहेतोर्नामसङ्कीर्त्तनाय च ॥
३ - सर्व पत्यमोजश्च शौर्य्यं क्षेत्रं बलं तथा ।
पुत्रष्ठच च सौभाग्यं समृद्धिं मुख्यतां शुभाम् ॥
४ - प्रवृत्तचक्रतां चैव वाणिज्यप्रभृतीनपि ।
रोगित्वं यशो वीतशोकतां परमां गतिम् " ॥
- संग्रह: ३६६
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श्राद्धविज्ञान: -श्राद्धसम्बन्धी अतीन्द्रिय रहस्यों का यथावत विश्लेषण कर देना मादृश अनार्षदृष्टियुक्त व्यक्ति के लिए असम्भव है । गुरुप्रसाद के बल पर जैसा जो कुछ ध्यान में आया है, वह परीक्षा के लिए श्रद्धालु जगत् के सम्मुख उपस्थित कर दिया है । सर्वान्त में इस सम्बन्ध में अपनी ओर से केवल यही निवेदन करना शेष रह जाता है कि, श्राद्धकर्म्म अतीन्द्रियभावापन्न है । अतः इस सम्बन्ध में तर्ववाद को प्रणाम कर अनन्य श्रद्धा का ही अनुगमन करना चाहिए । एवं देवकार्थ्य से भी अधिक माहात्म्य रखने वाले सर्वाभीष्टफल देने वाले इस पितृकार्य की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । निम्न लिखित वचन श्राद्धकर्म के इसी माहात्म्यातिशय का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-१ -- " श्राद्धात् परतरं नान्यच्छ यस्करमुदाहृतम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्य्याद्विचक्षणः || ” ( सुमन्तुः )! २ -- " तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि । कुर्वीत श्रद्धया तस्य कुले कश्चिन सीदति ॥ " ३ - आचारमाचरेत्र पितृमेधाश्रितं नरः । ५ आयुषा -धन- पुत्रैश्च वर्द्धते नैव संशयः ॥ ” ( ब्रह्मपुराणम् ) ॥ ४. ' आयु: - पुत्रान् - यशः - स्वर्ग - कीर्ति - पुष्टिं बलं - श्रियम् ॥ । पशून् - सौख्यं – धनं - धान्यं - प्राप्नुयात् पितृपूजनात् । " ( यसः )
- " रोगः प्रकृतिस्थ चिरायुः पुत्र - पौत्रवान् ।
वानर्थभोगी च श्राद्धकामो भवेदिह ॥
परत्र च परां पुष्टिं लोकांच विपुलान् शुभान् 1 श्राद्धकृत् समवाप्नोति यशश्व विपुलं नरः ॥ " ( देवलः )
६ -- " ब्रह्म - न्द्र - रुद्र - नासत्य--- ग्नि - वसु - मारुतान् ।
विश्वेदेवान् - ऋषिगणान् - वयांसि - मनुजान् - पशून् ॥
सरीसृपान - पितृगणान् यच्चान्यद् भूतसंज्ञकम् । श्राद्धं श्रद्धान्वितः कुर्व्वन् तर्पयत्यखिलं हि तत् ॥ " ( विष्णुपुराणम् )
- " धनं- वेदान्- भिषक - सिद्धिं - कुप्यं - गा - अप्यजाविकम् ।
श्वानायुश्च विधिवद्यः- “ श्राद्धं सम्प्रयच्छति " ॥
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ऋणमोचनोपायोपनिषत ' कृत्तिकादिमरण्यन्तं स कामानान्नुयादिमान् । आस्तिकः श्रद्दद्धानथ पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः ॥ " ६ - " श्रायुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च । यच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः || ” १० - " यद्यद् ददाति विधिवत् सम्यक् श्रद्धासमन्वितः । तत् पितां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ ” ११ – “ देवकार्य्याद् द्विजातीनां पितृकार्य्यं विशिष्यते । दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ ( मनुः ) । ' पितरो वाक्यमिच्छन्ति ' इस श्रद्धेय वचन को आधार मान कर उक्त वाङमय पिण्डद्वारा श्रद्धेय पितुःपिण्ड की पूर्णतृप्ति करते हुए, उनसे निम्न लिखित अनुग्रह की कामना करते हुए द्वितीय परिच्छेद उपरत किया जा रहा है-" कामो जज्ञे प्रथमो नैनं देवा-श्रायुः पितरो न मर्त्याः । ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा-“ मह ” स्तस्मै ते काम नम इत् कृणोमि " ( अथर्व ६२।१६ ) " गोत्रं नोऽभिवर्द्धन्ताम् "
" दातारो नोऽभिवर्द्धन्तां - वेदाः सन्ततिरेव च ।
श्रद्धा च नो मा व्यगमद्- बहुदेयं च नोऽस्त्विति ॥
अन्नं च नो बहुभवेदतिथींश्च लभेमहि । याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कश्चन " ओम् शान्तिः! शान्ति:!! शान्ति!!! समाप्ता चेयं - ऋणमोचनोपाय विज्ञानोपनिषत् द्वितीयपरिच्छेदात्मिका I aari करोत्वया पितृदेवता -X--४०१
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श्रीः श्राद्धविज्ञानग्रन्थान्तर्गत-' सापिण्डयविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्डान्तर्गत " ऋणमोचनोपायोपनिषत् " नामक द्वितीय परिच्छेद उपरत I
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श्रीः अथ - श्राद्धविज्ञान ग्रन्थान्तर्गत— ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्डान्तर्गत " श्राशौचविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयपरिच्छेद ३ :
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परिभ दृष्टि धर्मः वेदश ओर की ह सम्ब लेकर जिसे अस्पृ सायी-राष्ट्रिय का ए ईश्वर शास्त्र ' प्रतिप ' अस्पृ कलङ्क ' शिचि क्रमश्
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श्रीः थ - सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषदि श्रशौचविज्ञानोपनिषत् परिभाषाज्ञान की विलुप्ति, एवं सांस्कृतिक पतन -यद्यपि निबन्ध आवश्यकता से अधिक विस्तृत होता जा रहा है, तथापि आवश्यकतम विषयों की दृष्टि से विवश होकर इस विस्तारभाव का आश्रय लेना अनिवार्य्यं बन रहा है । सनातन मानव-I धर्मशास्त्र से सम्बन्ध रखने वालीं परिभाषाओं के विलुप्तप्राय हो जाने से, परिभाषाओं के विश्लेषक वेदशास्त्र के पारम्परिक अध्ययनाध्यापन के उच्छिन्न हो जाने से, अनार्षग्रन्थों की अनन्यता से, ओर ओर भी कई एक ज्ञात - अज्ञात कारणों से आज सनातन विधि - विधान विचारशील विद्वानों की दृष्टि में भी जब मीमांस्य बन रहे हैं, तो ऐसी दशा में साधारणवर्ग यदि इनकी उपादेयता के सम्बन्ध में व्यामोह में पड़ जाय, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । प्रकृत प्रकरण में जिस विषय को लेकर हमें विचार करना है, उस विषयने वर्त्तमान युग में एक ऐसा तूलरूप धारण कर रक्खा है, जिसे देखकर भारतीय सांस्कृतिक पतन का भलीभाँति अनुमान लगाया जा सकता है । अस्पृश्यता के सम्बन्ध में राष्ट्रिय दृष्टिकोण-तत्त्वानुगत अशुचिभाव को लक्ष्य में रखते हुए शास्त्रकारोंनें अच्छूद्रों ( अन्त्यज अन्त्याव सायी- दस्यू- म्लेच्छों ) को अस्पृश्य माना है । शास्त्र के इस अस्पृश्यता - सिद्धान्त को लेकर भारतवर्ष के राष्ट्रिय प्राङ्गण में आज पर्याप्त कोलाहल मचा हुआ है । कहा जा रहा है कि, " अस्पृश्यता ही हिन्दूजाति का एकमात्र ऐसा कलङ्क है, जिसने भारतश्री का, भारतस्वातन्त्र्य का अपहरण किया है " । अपने आपको 7 ईश्वर के निकटतम सम्बन्धी समझने का अभिमान करने वाले, वर्णाश्रमव्यवस्था के अनन्यसमर्थक-शास्त्रप्रमाणैकशरण गीताशास्त्र जैसे शास्त्र को अपनी प्रातिस्विक सम्पत्ति उद्घोषित करने वाले, गीता-प्रतिपादित कर्म्ममार्ग को ही एकमात्र जीवन का परम पुरुषार्थ कहने वाले कतिपय राष्ट्रिय नेता ही आज ' अस्पृश्यता ' जैसे विज्ञानसिद्धान्त को, शास्त्रसिद्धान्त को, अतएव इस इश्वरीय आदेश को हिन्दूजाति का कलङ्क मान रहे हैं, और मनवा रहे हैं । ' गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः ' रूप से ' शिक्षित ' कहलाने वाला वर्त्तमान युग का शिक्षितवर्ग भी इन कल्पित राष्ट्रिय प्रवादों की ओर क्रमशः श्राकषित होता जा रहा है । ४०५
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प्रकृति का प्राकृतिक वैषम्य-श्राद्ध विज्ञान हमारे वे कर्णधार, एवं तदनुगत शिक्षित मानव असच्छूद्र की अस्पृश्यता का इसलिए विरोध कर रहे हैं कि, उनकी विशाल - उदार - तत्त्वपूर्ण दिव्यदृष्टि में ' अच्छूद्र मानव ' और वर्णमानव के स्वरूप में कोई अन्तर नहीं है । इसी आधार पर उनकी यह तात्त्विक घोषणा है कि-" वह भी उनके जैसा ही मनुष्य है । उसी शुक्र - शोणित के दाम्पत्यभाव से उत्पन्न होने वाला, उन्हीं आत्मा, मन, बुद्धि, इन्द्रियवर्गों से युक्त रहने वाला, उसी ईश्वरीय समानक्षेत्र ( भूक्षेत्र ) को अपनी आवासभूमि बनाने वाला असच्छूद्रवर्ग हम से सर्वात्मना समतुलित है । जैसे हम हैं, ठीक वैसा ही वह है । हमें जो प्राकृतिक अधिकार, जो सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं, अवश्यमेव वह भी इनका पूर्ण अधिकारी हैं । ' शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ' इस गीताराद्धान्त से भी इस समानाधिकारता का समर्थन हो रहा है । " । इस प्रकार के समदर्शन के आधार पर समानाधिकार प्रदान की व्यवस्था करने वाले आवेशाभिनिविष्ट हमारे ये आत्मबन्धु परोक्षदृष्टि से जिस सर्वनाश का बीजवपन कर रहे हैं, हन्त? उन्हें यदि यह विदित हो जाता, अथवा तो विदित करा दिया जाता कि, उह्नोंनें जिस समदर्शन के आधार पर जिस समानाधिकारता का सिद्धान्त स्थापित करने की जो भूल की है, वही भूल उनके अनुग्रह से, परमात्मा न करे ऐसा हो, भारतीय प्रजा को ऐसे गर्त्त में डाल देगी, जिससे परित्राण पाना एकमात्र अवतारपुरुष पर ही निर्भर होगा । हमारे ये विचारशील बन्धु जिसे समदर्शन कर रहे हैं, तत्त्वतः वह विषमदर्शन है, यह उस समय भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है, जब इस शब्द के प्रयोक्ता शास्त्र से हम इसकी परिभाषा कराने आगे बढ़ते हैं । " श्रोत्र - चक्षु - नासिका - मुख - हस्त पादादि - युक्त स्थूलशरीर की दृष्टि से हम सब समान हैं ", इत्याकरक समदर्शन तो भारतीय तत्त्वदृष्टि से, तथा उनकी आराध्या प्रतीच्य तत्त्वदृष्टि. से भी एकान्ततः विषमदर्शन ही है । वैषम्य ही सृष्टि का मूल उपादानकारण माना गया है । प्रकृति-रहस्यवेत्ता प्राधानिकों ( सांख्यों ) का इस सम्बन्ध में यह निर्णय है कि, प्रकृति के ' सत्त्व - रज - तम ' नामक तीनों गुणों की विषमता ही, दूसरे शब्दों में गुणत्रयरूपा प्रकृति का वैषम्य ही इस स्थूलजगत् का उपादान बनता है | क्योंकि स्थूज़जगत् का उपादान विषदा प्रकृति है, अतएव ' कारणगुणाः कार्य-गुणानारभन्ते ' न्याय से स्थूल प्रपञ्च का अगु अणु इस प्राकृतिक विषम - भाव से नित्य आक्रान्त बना रहता है । जिस दिन प्रकृति, किंवा प्रकृति ' गुणत्रय अपनी विषमता छोड़ कर साम्यभाव में परिणत हो जायँगे, उसी क्षण समस्त भौतिक प्रपञ्च प्रलयगर्भ में विलीन हो जायगा, जिसके उपक्रम को हमारे ये नवबन्धु श्रेयः पन्था मानने की भयङ्कर भूल कर रहे हैं । समानाधिकारव्यामोहन-जिस प्रकृतितन्त्र में तन्त्रायो पूर्णेश्वरपुरुष भी आवद्ध है, जिस विषम प्रकृति को, किंवा प्रकृति की विषमावस्था को आगे कर परपुरुष ( अव्ययपुरुष ) विश्व तथा विश्वप्रजा के निर्माण में समर्थ होता है, जो १०६